रविवार, 22 फ़रवरी 2015

यह कहानी सलाम दुनिया में प्रकाशित हो चुकी है




                         मोहरा
                                                    - सुषमा त्रिपाठी

"प्रदीप्त मुखर्जी, हमारी जोनल कमेटी के नये अध्यक्ष। पार्टी ने इनको यह जिम्मेदारी सौंपी है। उम्मीद है कि प्रदेश के दूसरे नेता भी उसी ईमानदारी से पार्टी को आगे बढ़ाएंगे, जिस तरह से प्रदीप्त बढ़ा रहे हैं।" तालियों की गड़गड़ाहट से सभागार गूंज उठा। सभागार के बीच से एक दुबला - पतला सांवला लड़का मंच की ओर बढ़ा। उसके गले में हार डाला गया और वह संकोच से मानो दबा जा रहा था। तालियों के बीच मंच के नीचे दो हाथ अपनी मुट्ठियों को भींचे तने जा रहे थे, कभी इन हाथों ने इसी पार्टी के लिए चोटें भी खायीं थीं और ये हाथ किसी और के नहीं, उसी सुभाष के थे जिसकी जगह प्रदीप्त को दे दी गयी थी। सुभाष से और रहा नहीं गया, कुछ सोचता, तभी मोबाइल की घंटी बजी और वह बाहर आ गया।
- "ए सुभाष दा, के होलो प्रेसिडेंट तोमादेर?"
- "नतून छेले, प्रदीप्त मुखर्जी।"
- "प्रदीप्त, तुम ही तो लाए थे, दादा उसे।"
सुभाष ने फोन काट दिया। एक - एक करके पुरानी बातें याद आने लगीं, लगा कल ही की तो बात है।
- "किंतु, सुभाष दा, आमि राजनीति करते चाइ ना। तुम तो जानते हो न, बाबा, कैसे एक - एक रुपया मेरी पढ़ाई के लिए जोड़ रहे हैं, घर कितनी मुश्किल से चल रहा है। एई शोब भालो लागे न गो, चाहता हूं कोई नौकरी मिल जाती, तो मैं भी कुछ हाथ बंटा देता। घर का कुछ तो सहारा हो जाता।"
- "एई बोका छेले। तुझे पता भी है कितना स्पार्क है तुझमें। आज की छात्र राजनीति में तेरे जैसे ब्रिलिएंट लड़कों की जरूरत है, ना, कोरिश ना।"
- "जानि ना, किछु टाइम लागबे।"
तभी किसी का हाथ कंधे पर पड़ा, सुभाष मानो नींद से जागा।
- "किछु मोने करिश ना। सामने इलेक्शन है, नये लड़कों की जरूरत है, पार्टी के लिए करना पड़ा। हम तुझे बड़ी जिम्मेदारी देंगे, आखिर प्रदीप्त को तो पार्टी में तुम ही लाए हो।"
- "विभाष दा, दूध में मक्खी जैसा था मैं, तुम्हारे लिए। बस एक काम करो, करीम को बोलो कि वह मेरे लड़कों से उलझना बंद करे। जानते हो, कल पृथा को उनके लड़कों ने छेड़ा, धक्का - मुक्की की। आपनि जानेन, कितनी मुश्किल से पार्टी को कॉलेज में खड़ा किया। अब करीम मुझको बाहर का बताकर दखल करने पर आमादा है।"
- "मैं करीम को समझा दूंगा मगर सुभाष तुझे समझना होगा कि करीम सीनियर है, उस पर से माइनोरिटी भी। उसको तो ऑपोजिशन भी तोड़ना चाहता है, मगर तुम टेंशन मत लो, कॉलेज में तुम ही रहोगे।" विभाष एकाएक गंभीर हो गया - "एक बात याद रखना, हरदयाल कॉलेज में सर्वोदय वालों को एक भी नॉमिनेशन न मिलने पाए। वहां हमारी डेमोक्रेटिक यूनियन ही जीतेगी।"
सुभाष को विदा कर विभाष पीछे मुड़ा - शेख करीम सामने खड़ा था -" मैं कहता हूं, समझा लीजिए, बच्चे को, पाड़ा में अपनी इज्जत है कि नहीं, कल जो झमेला हुआ, सर्वोदय वालों के साथ, और वह पृथा, घाट - घाट का पानी पी रखा है, उस लड़की ने।"
"चुप करो करीम।" विभाष घोष के बोल फूटे - "पता है सुभाष कितना पॉप्यूलर है। इलेक्शन का टाइम है, दिमाग से काम लो, हमने उसके सामने उसी के लड़के को खड़ा कर दिया है ना, कुछ दिन की तो बात है, फिर कितनी देर लगेगी मुझे सुभाष को हटाने में। 30 साल से यही तो करता आ रहा हूं। वैसे, लड़के दोनों होशियार हैं, रिसर्च करते तो बहुत आगे जाते मगर तब पार्टी कैसे चलती? मजबूरी है भाई।"
वह तो है, करीम की नजरें विभाष से मिलीं, और एक शैतानी हंसी गूंज उठी।

- "लेकिन, विभाष दा, इलेक्शन तो डेमोक्रेसी के लिए है, न। प्रदीप्त बोला।
अच्छा होता कि हम उनको भी मौका देते कि वह हमारी ताकत देखें।"
- "प्रदीप्त, अभी बच्चे हो, सुभाष जो कहता है, बस वही करो।" - विभाष ने दो टूक फैसला सुना दिया। प्रदीप्त ने फोन काट दिया। यूनिवर्सिटी कैंपस में कक्षाएं खत्म हो गयी थीं, वह अकेला रह गया था। तभी दीपक दिखा, उसने आवाज दी - दीपक....।
दीपक उसका सहपाठी रह चुका था, साथ में कई प्रतियोगिताएं जीती थीं उसने कॉलेज के लिए मगर अब वे एक दूसरे के विरोधी थे, अलग - अलग यूनियनें थीं उनकी। अब तो याद भी नहीं, कब एक दूसरे को देखकर हंसे थे, कब साथ चाय पी थी।
- बोल। दीपक सामने खड़ा था।
- "बैठ न।" प्रदीप्त ने दीपक को बैठने का इशारा किया मगर दीपक खड़ा रहा।
- "तेरे साथ? प्रदीप्त, तू तो बड़ा नेता हो गया है, तेरे चेलों ने देख लिया तो पार्टी से निकलवा देंगे तुझे, ऑपोजिशन पार्टी के साथ बैठेगा?"
-" तू बैठता है कि नहीं," दीपक का हाथ पकड़कर प्रदीप्त ने बैठा लिया। "क्रॉसवर्ड खेलेगा?" - और, उस दिन बाजी जमी, खिलखिलाकर दो दोस्त हंसे, अनायास उनकी आंखें छलक पड़ीं। इंसान जब कुछ खोता है तो उसे एहसास होता है कि जो खोया, वह कितना कीमती था, दोस्ती भी ऐसी ही चीज है।

इलेक्शन को कुछ ही दिन बचे थे, आज नॉमिनेशन था। पुलिस तैनात थी, कड़ा पहरा था।
- सर्वोदय, फॉर्म नहीं लेगा।
- मगर, क्यों, हारने से डरते हो क्या?
- हारना तो तुमको है। सुभाष आगे बढ़ा और सर्वोदय के समर्थक सतीश से उसने फॉर्म छीन लिया। सतीश घबराकर चला गया, दीपक सिंह सामने था। बोला - "कमजोर पर ताकत दिखाते हो, हमसे लड़ो।"
तभी किसी ने उसके सिर पर पीछे से पत्थर दे मारा मगर निशाना चूक गया। दोनों छात्र संगठन टकरा गये, बम और बोतलें, पत्थरों की बौछार शुरू हो गयी।
- "आमि छाड़बो ना।" सुभाष आगबबूला होकर पिस्तौल के साथ दीपक के सामने आ गया। यह सब देखकर प्रदीप्त का माथा घूम गया, राजनीति के नाम पर उसे खून बहाना होगा, इसकी तो कल्पना भी नहीं की थी उसने।
- "सुभाष दा, उसे छोड़ो, ए कि होच्छे? वह मेरा दोस्त है।" - प्रदीप्त चिल्ला उठा।
- "दोस्त, वह तुम्हारा होगा, मेरा और पार्टी का तो वह दुश्मन ही है और दुश्मन को मरना ही पड़ता है।" - सुभाष अड़ गया था।
- "नहीं, सुभाष दा, तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे।" दोनों उलझ गये और भारी शोर - शराबे के बीच गोली चल गयी। सब छिटककर दूर खड़े हो गये, दीपक चिल्ला उठा - "प्रदीप्त......।"
- याद आया, किसी ने उसे धक्का देकर सुभाष के सामने से हटा दिया था और तभी गोली चल गयी....जमीन पर प्रदीप्त की लहुलूहान लाश पड़ी थी। दीपक दहाड़ मारकर रो पड़ा।
- "दीपक....कानछिश केनो? शे तो विरोधी दलेर लोक छिलो।"
इधर, सुभाष फफक पड़ा, प्रदीप्त उसके छोटे भाई जैसा था, उसकी मौत नहीं चाही थी सुभाष ने - "आमि तोके मारते चाइ नि गो.....।"
सुभाष को पिस्तौल के साथ गिरफ्तार किया गया। पुलिस वैन में बैठे सुभाष की नजर दुकान में टीवी पर पड़ी, जहां विभाष घोष का बयान आ रहा था।
- "हमारी पार्टी गलत लोगों को माफ नहीं करती, सुभाष को भी माफी नहीं मिलेगी। पार्टी अध्यक्ष प्रदीप्त के घर जा रहे हैं, सुभाष को पार्टी से निकाल दिया गया है। पार्टी की जोनल कमेटी का अध्यक्ष शेख करीम को बनाने का फैसला लिया गया है, हमें उम्मीद है कि वह अपना काम पूरी ईमानदारी के साथ करेंगे।"











·         February 18, 2015
·         Written by B4M Reporter
·         Published in आवाजाही-कानाफूसी
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बरखा दत्त का नाम एनडीटीवी के लिए पर्याय हो चुका है. पर ये नाता अब टूट रहा है. बरखा दत्त अपनी मीडिया कंपनी बनाएंगी. बरखा की एनडीटीवी से विदाई पर चैनल के मालिक-मालकिन प्रणय राय और राधिका राय ने अपने सभी कर्मियों को एक आंतरिक मेल किया है, जो इस प्रकार है...

    From: Prannoy Roy
    To: Everyone in NDTV Group
    Subject: The very best

    Dear All

    Barkha Dutt was only 23 when she joined NDTV as a young reporter cum producer. NDTV was the first place she ever worked in and for two decades we have seen her evolve into one of our most prolific reporters. She has been a key member of the NDTV family and a big part of our memorable journey from a production house that created a nightly news bulletin for doordarshan to what we are today. She has worn many hats for NDTV: journalist, anchor, editor and NDTV has been both her learning ground and her second home.

    Now twenty years later we wish her all the very best as she embarks on yet another role with us. Barkha will be moving to the role of Consulting Editor. She will remain as closely associated with NDTV as she has all these years as the anchor for Buck Stops Here on weeknights and We The People on weekends. She will also be available as always for analysis and inputs on big news events and stories. While her TV relationship with NDTV remains unchanged, in her new role she will be setting up her own multi media content company and policy group. We have literally seen barkha grow from a child to an adult professional and look forward to our close bonds only strengthening further as she embarks on this new venture.

    I know you will join us in wishing Barkha the very very best.

    Radhika and Prannoy


बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

महिला पत्रकारों की स्थिति को दर्शाता लेख

(1) CHAPTER-1 EXECUTIVE SUMMARY STATUS OF WOMEN JOURNALISTS IN THE PRINT MEDIA   By Pamela Bhagat INTRODUCTION The project on the ‘Status of Women Journalists in the Print Media’ was initiated by the National Commission for Women to look into issues affecting the role of women working in the print media.  As part of a broader study on working women in India, it was executed by the Press Institute of India (PII), through empirical data that was collected from almost all the States and Union Territories of the country. The objective of the research was to examine the problems and issues confronting women working in the media, to gauge the extent of direct and indirect discrimination in the workplace and to identify contemporary issues that need to be addressed.  METHODOLOGY The research was coordinated by me with the support of media representatives from various regions - Linda Chhakchhuak from Shillong, Rajashri Dasgupta from Calcutta, Sushmita Malaviya from Bhopal, R. Akhileshwari from Hyderabad and Surekha Sule from Mumbai - who together formed a National Study Group. The National Study Group assisted with the design and implementation of the 20-page questionnaire. Usha Rai, Deputy Director, Press Institute of India, guided and steered the group.   A brain storming session with a focus group of women journalists in Delhi preceded the study, to ensure that the questionnaire was suitable and that critical aspects were addressed. The questionnaire was then pilot tested to iron out discrepancies and ambiguities. Experiences from the field surveys are outlined later in the report.   SAMPLING AND RESPONSE RATE  A total of 410 women working in the print media responded. Although there are no definite figures on the number of questionnaires distributed, estimates put the sample size at approximately 3500. This means the response rate was approximately 11.5 per cent. This was one of the most disappointing aspects of the study. There was total non-cooperation in filling in the questionnaire, especially by journalists from the English language national media.

पत्रकारिता, कोलकाता, स्त्री

मीडिया में महिलाओं के लिए बेहतर काम करना चुनौती नहीं है मगर उसके लिए सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते जाना टेढ़ी खीर है। पत्रिकाओं में महिला संपादक आपको मिल सकती है लेकिन अखबारों में, फिलहाल इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। वहीं हिन्दी अखबारों में सम्पादक बनना तो दूर की बात है, महत्वपूर्ण क्षेत्र भी मिल जाए तो यह भी बड़ी बात है, विशेषकर राजनीति और अपराध से लेकर कोर्ट में, जहाँ भद्रता नही है। तो फिर क्या होना चाहिए, और इस बारे में सोचा क्यों नहीं गया, खासकर बौद्धिक स्तर पर महान कोलकाता में, यह हैरत की बात है, यह लेख जो सामने है, इस विषय पर मानों आँखें खोलने का काम करता है

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

पुस्तक मेले का बदलता चेहरा

जब भी कोई हिन्दी पाठक पुस्तक मेले में जाता है तो उसके लिए पहली चुनौती तो हिन्दी के स्टॉल खोजना है। हिन्दी के चुनिंदा स्टॉल आनंद प्रकाशन,ज्ञानपीठ, राजकमल, जैसे नामों को छोड़ दिया जाए तो हिन्दी प्रकाशकों की रुचि पुस्तक मेले में दिख नहीं रही है। समस्या यह है कि हिन्दी तो साहित्य तक सिमटती जा रही है तो साहित्य में रुचि नहीं रखने वाले पाठकों के लिए लेखकों के पास कुछ खास नहीं रहता और है भी तो पाठकों तक वह पहुँच नहीं रहा। ऐसा नहीं है कि हिन्दी में पाठक नहीं है, पाठक जरूर हैं मगर ऊंची कीमतों पर किसी बड़े साहित्यकार की रचना को खरीदने और सजाने की उसकी स्थिति नहीं है। वह चाहे तो हजार रुपए का संकलन नहीं खरीद सकता और ये पुस्तकें पुस्तकालयों की शोभा बनकर रह जाती हैं। वैसे कड़वी सच्चाई यह है कि बंगाल की पुस्तक प्रेम वाली मानसिकता हिंदी की आम जनता नहीं है या इसे लेखकों की विफलता माना जाए कि वे सरल और रोचक शैली में गंभीर बात नहीं कह पा रहे हैं। अंग्रेजी का पाठक भी संभ्रांत वर्ग ही है और उसमें से अधिकतर युवा ही हैं। क्या वजह है कि हिन्दी का प्रसार केवल शिक्षण संस्थानों या गोष्ठियों तक सिमट गया है। कहीं यह अति बौद्धिकतावाद तो नहीं हैै जिसकी वजह से लेखकों और पाठकों के बीच दूरी आ गयी है। लेखक अब चौपाल और बाजार तक नहीं जाता, उसके अनुभवों से कहानी बनती तो है मगर जिस आम पाठक के लिए लिख रहा है, वहां तक पहुँच नहीं पा रही। हिन्दी को कार्यालयों या शिक्षण संस्थानों तक सिमटकर नहीं रहना, उसे घर के आंगन और चौपाल का सफर तय करना होगा, पुस्तक मेले में यह बात साफ हो गयी। वहीं इस बार विवेल, एनएसई के स्टॉल देेखकर यही लगा कि पुस्तक मेला कॉरपोरेट शक्ल ले रहा है। मस्ती और फूड कोर्ट के प्रति लगाव अधिक था मतलब समस्या हर भाषा के साहित्य के साथ है तो मुकाबला भी सभी को मिलकर करना होगा। साहित्य का चौपाल और आंगन तक पहुँचना जरूरी है।