मंगलवार, 30 मई 2017

30 मई.....पत्रकारिता और पत्रकार




आज पत्रकारों का दिन है, सोशल मीडिया पर उदन्त मार्तण्ड की तस्वीरें सुबह से चल रही हैं। सद्य पुरातन पत्रकारिता की याद में आँसू बहाने वाले लोग आज के पत्रकारों को गालियाँ देकर अपना मन हल्का कर रहे हैं। पीत पत्रकारिता करने वाले अखबारों की खबर लेकर अपनी कलम को धन्य कर रहे हैं और इसी बीच कोई पत्रकार कड़ी धूप में किसी नेता का बयान लेने के लिए पसीना बहा रहा है तो कोई डेस्क पर बैठा इस बात को लेकर अपने बेटे या बिटिया को फोन पर ही बता रहा है कि उसे अमुक अमुक काम इस समय पर कर लेना चाहिए। एक वयोवृद्ध उप सम्पादक बेटी की शादी के लिए अच्छे रिश्ते की जुगाड़ की फिक्र में सम्पादन का काम सम्भाल रहे हैं तो इतने में ही घड़ी पर नजर पड़ने के बाद किसी महिला पत्रकार के हाथ कलम और कीबोर्ड पर एक साथ चल रहे हैं क्योंकि घर जाकर रात को बेटी को पढ़ाना है और पति अगले दिन काम से बाहर जा रहे हैं। रात हो चली है और कोई सम्पादक पेज छुड़वाकर राहत की साँस ले रहा होता है और दो मोबाइल एक साथ बजते हैं...एक घर आने में कितनी देर है (घर दूर है, देर रात निकलकर पहुँचने में अगले दिन की सुबह हो जाएगी) और दूसरा (इन्होंने विज्ञापन दिया है, इनका नाम जरूर जाना चाहिए।) पेज को बीच में रुकवाकर उन मशहूर उद्योगपति का नाम दिया जाता है क्योंकि नाम छूट जाने पर सम्पादक महोदय की क्लास अखबार के मालिक के सामने लग जाएगी। पब्लिक अच्छी तस्वीरें देखना चाहती हैं....ये क्या आप हमेशा लड़कों की तस्वीरें छापते हैं, फोटोग्राफरों को कहिए कि खूबसूरत और अपनी भाषा बोलने वाली युवतियों की तस्वीरें छापें।....अखबार का फिल्म पेज टेबल पर पसरा है...नोट के साथ...ये बॉलीवुड पेज है न स्कूप डालिए...अरे...सनी लियोनी की तस्वीर साड़ी में डाल रहे हैं....ये क्या मजाक है....और उसी टेबल पर एक पाठक का पत्र है...समझ में नहीं आता कि आप अखबार निकाल रहे हैं कि कोई अश्लील फिल्मी पत्रिका...अगर यही हाल रहा तो अखबार बन्द करना होगा। सम्पादक महोदय की अगली सुबह दफ्तर में ही हो गयी है...ये किसी भी अखबार या पत्रिका का नजारा है...। घर से दसियों बार फोन आ चुका है, रात भर भूखे रहने के बाद घर में घुसने के बाद एक ही कथन...तुम अखबारवालों को तो शादी ही नहीं करनी चाहिए थी.....और दफ्तर का बारुद घर में फट गया।
(आरामदेह जिन्दगी)
बाइट ले रहा हूँ या लाइव हूँ....फोन मत करना.....प्लीज.....कट से फोन के साथ रिश्ता भी कट हो गया.....महत्वपूर्ण बैठक है...चैनल को ब्रेकिंग चाहिए.....आपाधापी में पैर में वहीं चोट लगी जहाँ कल पुलिस के डंडे पड़े थे.....सोशल मीडिया पर गए....इन बिकाऊ चैनलों पर प्रतिबन्ध क्यों नहीं लगा देते...सब दलित और अल्पसंख्यक विरोधी हैं....सबको सत्ता ने खरीद लिया। (राज्य के हिसाब से खरीदने वाली पार्टी का नाम बैठा लें। ) अब छुट्टी के दिन कहाँ निकल पड़ी.....? कैसा काम है कि दम मारने को चैन नहीं है, ऑफिस से बोलकर छुट्टी ले या 8 बजे तक घर आ जा....कोई जरूरत नहीं है रात को काम करने की। लड़कियों के लिए जो नौकरी सही है, वही कर...अगली बार एसएससी का फॉर्म ला दे रहा हूँ, चुपचाप भर देना.....दिमाग में कवरेज घूम रहा है और फोन बजता है....अभी तक पहुँची नहीं आप....रहने दीजिए आपसे काम नहीं होगा। इतने आराम से रिर्पोटिंग नहीं होती है....अरे नहीं होता तो छोड़ दीजिए न....बहुत से लोग पीछे हैं...कितनों की जगह जाम करके बैठ गयी हैं.....इसके पहले कुछ बोलती...फोन कट गया और आँख से आँसू बह चले....मगर समझेगा कौन....? आँसू पोछे कि फिर फोन बजा....अगले दिन सुबह तुम्हारे कॉलेज का प्रोग्राम है...इस कॉलेज ने तुमको इतना दिया है....उम्मीद है कि तुम आओगी...।
(प्रोत्साहित करने वाला वातावरण)
भइया...आप तो मीडिया वाले हैं...सब डरते हैं आपसे...। चाय मँगा दे क्या भइया....बैठ जाइए...अरे....भइया के लिए चाय लाना.....न...न में चाय लाने के लिए लोग चले गए...भइया मेरा चाचा का लड़का का एडमिशन कराना है....आप लोगों का तो सोर्स है न करवा दीजिए न...कुछ लेना देना  हो तो भी दिक्कत नहीं...चाय आ गयी है....भइया हम गली में जगराता करवा रहे हैं, एक एड देना है, आपके अखबार में छप जाता तो...भइया...को अचानक फोन आता है....काम  कर रहे हैं या अड्डा मार रहे हैं....कुछ खबर निकली? नहीं निकली तो आ जाइए....भइया चले गए....अरे जानता नहीं...रिपोर्टर लोग हमरा मुट्ठी में है...फोन में कॉन्टेक्ट लिस्ट खुलती है....एक के बाद एक ....ए देख....।
(सेलिब्रेटी पत्रकार)
अरे....आपका बात नहीं मानेगा...आपका तो पार्टी है...हम खबर दे तो देगा मगर...एंटी है....छपेगा....आप अपना एडिटर को बोलना...अच्छा आपको तो जानता है...लो। मैडम खबर ले आती हैं....बेरोबे न, देखे निबी....।
सब खबर लाने का मतलब थोड़े न है कि छपेगी ही....आपका काम है खबर लाना...इसके बाद आपको सोचने की जरूरत नहीं है....अच्छा रुकिए देखा जाएगा....थोड़ा बचाकर लिखा कीजिए...
सॉरी दादा...खबर छोटी हो गयी...अरे मैडम, हम तो पहले ही बोला था...आपके अखबार में मुश्किल होगा....मन में आता है - हाँ, मगर वह एक बाईलाइन स्टोरी होती। खबर...किसका प्रोग्राम था.....उत्तर मिला...क्या दिया....वाह ये तो अच्छा है...लिखिए.....सामने वाली आलमारी में रख दीजिए...काम आता है कहीं देने के.....दूसरा क्या था....ये बस...अच्छा अपने पास रखिए...मेरे पास बहुत है। कुछ देगा नहीं तो फायदा क्या है इतनी दूर रिपोर्टर भेजकर....।
(निष्पक्ष व ईमानदार पत्रकारिता)
प्रोग्राम का दृश्य....हाँ रजिस्टर कर दिया...क्या है ये....उफ...इतना घटिया....कुछ अच्छा दिया कीजिए...इतनी बड़ी कम्पनी, प्रचार और ये गिफ्ट...क्या समझा है पत्रकारों को?....ठीक है.....सर....ध्यान रखेंगे....
न...हमको गिफ्ट नहीं चाहिए...शाहरुख कब आ रहा है, वह बताइए....मैं उसको एक झलक देखना चाहती हूँ और सलमान...उसको देख लिया...अब कुछ और नहीं चाहिए....थोड़ी धूप कम हो निकलेंगे...अच्छा पिकअप दीजिएगा....मेरी स्किन खराब हो गयी है....
बोला था न इसको मत बोलो...जहाँ जाता है मुँह खोल देता है....और इन लोगों को इज्जत चाहिए...भीख माँगते हैं....पत्रकार हैं ये...फोन बजा...हाँ सर पीआर यहीं पर है.....आप आइये न, हम लोग हैं न।
(सम्मानित और इज्जतदारों की प्रायोजित पत्रकारिता)
ये खबर अच्छी है....हाँ...सर बहुत अच्छी स्टोरी है और ये लोग अच्छा काम कर रहे हैं, ह्यूमन एंगल है.....हाँ, ये लोग क्या पेपर को विज्ञापन देते हैं? न में सिर हिलता है...सिंगल डीसी बना कर छोड़ दीजिए....सकारात्मक पत्रकारिता...कचरे के डिब्बे में चली जाती है....अचानक फोन आता है...हाँ सर...हाफ पेज....अच्छा फुल पेज....पूरा कवरेज देंगे सर...फोन रखा जाता है....एक साध्वी आ रही हैं और एक समाज सेवी का निधन हो गया है.....दोनों को अच्छे से लिखिए....विज्ञापन है...नाम इधर से उधर नहीं होना चाहिए....जुबान से निकलता है...सर....कहा न सिंगल....और कुछ नहीं सुनना है.....फीचर घी है और खबर दाल चावल है...घर चलता है...माने अखबार चलता है.....अखबार चलेगा तो सैलरी बढ़ेगी...। और हाँ, आगे से विज्ञापन नहीं तो खबर नहीं....याद नहीं दिलाना पड़े...फोन बजता है...हाँ आप लोग अच्छा काम कर रहे हैं मगर इससे हमारे रीडर्स को क्या मिलेगा और अखबार को क्या मिलेगा...सॉरी अखबार की पॉलिसी यही है....कुछ नहीं हो सकता। 
(धंधेबाज और प्रोफेशनल पत्रकारिता की नयी पीढ़ी का जन्म)
आपको मना किया था...इस पर लिखने से....पार्टी ऑफिस से फोन है और ये खोजी पत्रकारिता है...क्यों गए....क्या कहा...अन्याय हुआ था...गलत तरीके से जमीन ली गयी....फोन बजा....अरे, सर आप क्यों तकलीफ करते हैं...अच्छा नीचे खड़े हैं...आ जाइए...संवाददाता से...आप बैठिए....बुलाएंगे तो आइएगा....सोने से लदे लोग...आ चुके हैं....अगर यही हाल रहा तो अगली बार सोचना होगा....इंडस्ट्री कैसे टिकेगी.. बताइए...सर, नया है...सब ठीक हो जाएगा.....संवाददाता अगले दिन अखबार खोलता है....खबर पलटी जा चुकी है....फोन बजता है...भइया...आप क्या लिखे और क्या छपा..हम लोग का जगह छिन गया.....अगले पन्ने पर उसी कन्सट्रक्शन का विज्ञापन छपा है.....आँसू और मेहनत एक साथ छलक पड़ते हैं.....अब उस गली से गुजरने में ग्लानि होती है...एक अपराधबोध सा कुछ पीछा करता है....। सम्पादक महोदय का प्रोमोशन हो गया है और पत्रकार....कुछ कहने की जरूरत है?
(संवाददाता को लिखने की पूरी आजादी है और अखबार साथ खड़ा है)
मैनेजमेंट का मामला है...ट्रैफिक में गाड़ी फँस गयी है...क्राइम रिपोर्टर को बोलिए, मामला सुलझा लेगा....अरे, क्या नाम है उस लड़की का जो एविएशन करती है...उसको बोलिए....बात करे...विंडो सीट ही चाहिए...फैमली को साथ ले जा रहे हैं। हम उनको सैलरी देते हैं....अगर नहीं कर सकते हैं तो छोड़ दें....लाइन लगी है....आज ही नए बायोडाटा निकालिए...
(स्वतन्त्र पत्रकार)
हाँ, हम गाय काटने का सपोर्ट नहीं करते मगर काम अलग सिद्धांत अलग...सीएम ने कहा है तो मानना होगा....ये क्या लेकर आए हैं....कोई मारवाड़ी नहीं मिला....ये रिक्शेवाले और मूढ़ीवाले विज्ञापन देंगे....आपका अखबार कौन पढ़ता है...न कोई जरूरत नहीं हाईलाइट करने की....फोन बजा....हाँ....दो पेज...अच्छा सर अनुवाद हो जाएगा....रिपोर्टिंग में ही करवा लेंगे....सरकार की उपलब्धियाँ न....न दादा.....इसकी  क्या जरूरत थी....आप लोगों ने लायक समझा यही बहुत है।....दूसरा फोन बजा...जागरण है....ठीक है...हाफ पेज से कम नहीं होना चाहिए....अच्छा लॉन्चिंग भी है......ठीक है, प्रेस रिलीज भेज दीजिएगा। फोन कटा....दूसरे अखबारों से बात नहीं भी करेंगे तो चलेगा...कहाँ क्या चल रहा है....सब मार्केट से पता चल जाता है...लास्ट वार्निंग...अच्छा सा भाषण लिखिए...एक सम्मान समारोह में देना है.....और हाँ, एक लेख लिखवाइए किसी से आज के युग में ईमानदार और निष्पक्ष पत्रकारिता और पत्रकार

आधुनिक व समसामायिक पत्रकारिता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ...

शुक्रवार, 26 मई 2017

‘दादा’ की राह पर चलती दिख रही हैं ‘दीदी’


दिन बदलते हैं और जब दिन बदलते हैं तो पुराने दिनों को भूलने में देर नहीं लगती। अगर गुजरा हुआ कल याद भी आता है तो सत्ता में आने के बाद अधिकतर सत्ताधारी बदला लेने और कुर्सी बचाने में व्यस्त हो जाते हैं। सत्ता के नशे की तासीर शायद कुछ ऐसी ही होती है कि लोकतन्त्र की दुहाई देकर कुर्सी पाने वाले सदाचारी नेता कब दुराचार के दलदल में चले जाते हैं, पता ही नहीं चलता। ईमानदारी की जगह बेईमानी और चापलूसी ले लेती है, विनम्रता तानाशाही में इस कदर बदलती है कि स्पष्टवादी ही दुश्मन बन जाते हैं, जो लंका में जाता है, वही रावण बन जाता है और जो कुर्सी पा जाता है, वही अहंकारी और तानाशाह बन जाता है, उसे याद ही नहीं रहता है कि आज जिन चीजों के लिए वह प्रशासन और कानून को अपने हित में इस्तेमाल कर रहा है, कल यही उसके दुश्मन हुआ करते थे। सीबीआई को तोता कहा गया मगर सत्ता के हाथों इस्तेमाल होती पुलिस को क्या कहेंगे, पता नहीं। बहरहाल बंगाल में इन दिनों विपक्ष और सत्ता के बीच कुश्ती चल रही है, ममता बनर्जी जिस राह को पीछे छोड़कर आ गयी हैं, अब उसी राह पर चलने के लिए वाममोर्चा, काँग्रेस और भाजपा बेताब हैं। ममता जब विपक्ष में थीं तो खूब धरने दिया करती थीं, भूख हड़ताल भी करती थीं और इस कदर अड़ी रहती थीं कि भारत के प्रधानमंत्री का अनुरोध भी उन्होंने ठुकरा दिया। तब वाममोर्चा पर सत्ता का नशा चढ़ा था, जिद अहंकार में बदल गयी थी। नतीजा सिंगुर और नन्दीग्राम के रूप में दिखायी दिया और वाममोर्चा के अहंकार और दमन को ममता ने अपनी सीढ़ी बना लिया। वाममोर्चा खासकर माकपा ने भी धरने दिए हैं, प्रदर्शन भी किया है, कई बार वाममोर्चा नेताओं, खासकर विमान बसु की जुबान फिसली भी थी मगर तब भी बुद्धदेव भट्टाचार्य में एक अजब सी शालीनता थी। वाममोर्चा और खुद बुद्धदेव भट्टाचार्य से नाराजगी के बावजूद मुख्यमंत्री के रूप में बुद्धदेव भट्टाचार्य से नफरत नहीं की जा सकती क्योंकि उन्होंने सख्ती के बावजूद अपने पद की गरिमा बनाए रखी। आज भी यह सादगी और सरलता आपको वाममोर्चा के नेताओं में दिखती है। मुमकिन है कि तृणमूल सुप्रीमो के समर्थकों को बुरा लगे मगर निजी तौर पर मेरा मानना है कि ममता जी अपना गुजरा कल भूल चुकी हैं या फिर सत्ता के मोह ने उनको पूरी तरह बदल दिया है। बंगाल की लोकप्रिय दीदी जनता से लगातार दूर हो रही हैं। एक बड़ा सच है कि आज अगर उनको लोग सम्मान देते हैं तो उसके पीछे स्नेह और प्रेम से अधिक भय है। ममता आज या तो भय बन गयी हैं या बन जाना चाहती हैं। आज तृणमूल भले ही हर जगह जीते मगर आज उसे हिंसा का सहारा लेना पड़ रहा है, लोगों को धमकाना पड़ रहा है और उसकी जीत में ही सबसे बड़ी पराजय छिपी है। अब मुझे ममता बनर्जी में थके हुए बुद्धदेव भट्टाचार्य नजर आ रहे हैं और ममता की सरकार भी उनकी तरह ही दमन का रास्ता अपना रही है। तो क्या बुद्धदेव बाबू ही तरह ही ममता भी डरी हुई हैं? अगर ऐसा है तो दीदी के लिए आगे की राह मुश्किल हो सकती है। वर्ष 2010 तक भी किसी ने कल्पना नहीं की थी कि वाममोर्चा की इतनी बड़ी पराजय होगी मगर वाममोर्चा हारा। आज वाममोर्चा काँग्रेस के साथ मिलकर अपनी खोई हुई जमीन पाना चाहता है मगर लोगों के लिए वाममोर्चा शासन का दमन भूलना आसान नहीं है। सच तो यह है कि तृणमूल की जीत पहली बार भले ही दीदी की लोकप्रियता के कारण हुई है मगर दूसरी बार सत्ता में वापसी का कारण सिर्फ यही है कि जनता को तृणमूल का विकल्प नहीं मिल रहा है। भाजपा अब वही विकल्प बनने की कोशिश कर रही है और पार्टी की राज्यसभा सांसद रूपा गाँगुली का आक्रामक रवैया आपको ममता बनर्जी की याद दिलाता है। 1993 में ममता को राइटर्स से धक्के देकर निकाला गया और बाद में भी वाममोर्चा ने जिस तरह उनको प्रताड़ित किया,  लोगों की सहानुभूति उनसे जुड़ी। 

अब ममता बनर्जी की सरकार भी दमनकारी नीति अपना रही है और नतीजा यह है कि वह अब दोस्तों को भी दुश्मन बना रही हैं। 2009 में बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार ने जेयू में छात्रों को पिटवाया था मगर तृणमूल के शासन में तो आए दिन शिक्षकों को प्रताड़ित होना पड़ रहा है, विरोधियों पर डंडे बरसाए जा रहे हैं। जिस मीडिया के सहारे वे कुर्सी पाती हैं, उसी मीडिया पर पुलिस हमले कर रही है। धरना – प्रदर्शन की राजनीति करके सत्ता में आने वाली दीदी को विरोधियों का प्रदर्शन इतना अखरता है कि उसे रोकने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकती हैं। दरअसल, सच तो यह है कि पुलिस और प्रशासन की स्वायत्ता एक मिथ है क्योंकि जो सत्ता में रहता  है, वह पुलिस को अपने हिसाब से इस्तेमाल करता है, कल बुद्धदेव बाबू की सरकार करती थी, आज दीदी की सरकार कर रही है। वाममोर्चा और भाजपा को रोकने के लिए पुलिस जिस तरह हिंसक हुई, उसे देखकर तो यही लगता है क्योंकि जब तृणमूल की रैली निकलती है या सभा होती है तो यही पुलिस पलक – पाँवड़े बिछाए रहती है। आम आदमी को परेशानी तब भी होती है मगर पुलिस का धीरज नहीं टूटता। कल तक जिनके आगे पुलिस का सिर झुका रहता था, आज उन पर पुलिस लाठियाँ बरसाती है तो बस एक ही उक्ति याद आती है – जिसकी लाठी, उसकी भैंस। ये वही ममता बनर्जी हैं जो एनडीए के साथ रह चुकी हैं, जब कोलकाता पुलिस भाजपा समर्थकों पर लाठियाँ बरसा रही थी, तब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ठग और दगाबाज, दंगाबाज कहने वाली दीदी उनके साथ ही बैठक कर रही थी जबकि सच तो यह है कि केन्द्र सरकार की कई योजनाओं को राज्य में लागू होने ही नहीं दिया गया और जब किसी परियोजना का उद्घाटन होता है तो तृणमूल के मंत्री शिष्टाचार की सारी हदें तोड़कर केन्द्रीय मंत्री की जगह आनन – फानन में उद्घाटन कर देते हैं। ये बड़ा अजीब सा विरोधाभास है कि केन्द्र से सहायता चाहिए मगर केन्द्र से हर समय विरोध होगा। प्रकाश जावड़ेकर केन्द्रीय मंत्री होने के नाते जब वाइस चांसलरों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग करते हैं तो बंगाल के अधिकारियों और वाइस चांसलरों को भाग लेने की इजाजत नहीं दी जाती। 
यह राजनीतिक लड़ाई पड़ोसी के झगड़े की तरह लगने लगती है मगर यह ध्यान रखने की जरूरत है कि राष्ट्रीय स्तर की राजनीति करने के लिए एक शालीनता और गरिमा की जरूरत है। जब वह महिलाओं के साथ होने वाले उत्पीड़न को साजानो घटना कहती हैं और अल्पसंख्यकों की रैली में बाकायदा नमाज पढ़ने की मुद्रा में आती हैं और बरकती जैसे लोगों पर लगाम नहीं कसतीं तो यह उनका जनाधार कहीं न कहीं कम कर रहा होता है। कहते हुए अफसोस होता है मगर ये दोनों ही न तो तृणमूल में हैं और न ही खुद ममता बनर्जी में हैं। दीदी अनायास ही बुद्धदेव भट्टाचार्य की राह पर चल तो पड़ी हैं मगर भट्टाचार्य जैसे व्यावहारिक दृष्टिकोण का उनमें अभाव है, उनकी जिद अहंकार तो बन रही है मगर इसका परिणाम हम 2011 में देख चुके हैं। ममता बनर्जी की पार्टी में उनका एकमात्र विकल्प वे खुद हैं और अपना विकल्प उन्होंने तैयार होने ही नहीं दिया, ये पार्टी के लिए भी खतरनाक स्थिति है क्योंकि अभिषेक बनर्जी अगर दीदी के उत्तराधिकारी बनते भी हैं तो उनको वैसी लोकप्रियता न तो मिलेगी और न ही वैसी एकता ही फिर रहेगी क्योंकि कुर्सी सबको चाहिए। भाजपा का आक्रामक रवैया उनको परेशान कर रहा है तो दूसरी तरफ वे वाममोर्चा और काँग्रेस की दोस्ती को चाहें भी नजरअंदाज नहीं कर सकतीं। अगर बंगाल में विपक्ष एक विकल्प बनने की दिशा में सफल होता है तो यही परिणति तृणमूल और खुद तृणमूल सुप्रीमो की हो सकती है।

बुधवार, 24 मई 2017

जो वंचित हैं, अधिकारों पर अधिकार उसका भी है



पत्रकारिता में सम्पादक बहुत महत्वपूर्ण होता है और हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास के केन्द्र में ही सम्पादक ही घूमता है। पत्रकारिता पर जितना भी पढ़ा है, उसमें अखबार और सम्पादक पर ही बात होती है, वाजिब भी है। सम्पादकों की सत्ता को चुनौती देने वाली बात नहीं है मगर अखबार एक सामूहिक कर्म है, किसी भी और क्षेत्र की तरह इसलिए इसमें छोटे से छोटे अंग का अपना महत्व है। कोई भी सम्पादक चाहे कितना भी बड़ा हो, अकेले अखबार नहीं निकाल सकता, अगर टीम अच्छी न हो तो आपकी सारी योजनाएं धरी की धरी रह जाती हैं क्योंकि उनको क्रियान्वित करने वाला नहीं होता। सम्पादक अखबार का चेहरा होता है मगर क्या चेहरे पर ही ध्यान देने से समूचा शरीर स्वस्थ रह सकता है? थोड़ा सा श्रेय तो शरीर के अन्य अंगों को दिया जाना चाहिए। संवाददाता, जिला संवाददाता, कैमरामैन, फोटोग्राफर, पृष्ठ सज्जाकार, तकनीकी पक्ष, विज्ञापन, प्रसार करने वाले लोग.....किताबों में इनको एक पैराग्राफ में सलटा देने की परम्परा है और यही वास्तविकता में भी हो रहा है। बेहद कम सुविधाओं में काम करने वाले लोग हैं ये। संवाददाताओं और कुछ हद तक छायाकारों को सुविधा कम या कई बार न के बराबर भी मिले मगर श्रेय थोड़ा – बहुत मिल भी जाता है मगर दूसरे अंगों का क्या? हम न तो इन पर बात करते हैं और न ही इनके बारे में सोचते हैं। सबका रिप्लेसमेंट हमेशा तैयार रहता है और इनमें से बहुत से उपेक्षा और शोषण के शिकार भी रहते हैं। प्रबंधन और इन सभी के बीच में जितने भी लोग है, वे अपने हिसाब से स्थिति को दिखाते हैं। कारखाने के बंधुआ मजदूरों से भी खराब स्थिति इन सबकी होती है मगर न तो सवाल उठते हैं और न ही सुविधाएं मिलती हैं क्योंकि दुनिया का दस्तूर है, लोग इमारत की ऊँची मंजिल ही देखते हैं और उनको सिर्फ वही दिखाया जाता ही है। आधे से अधिक लोग असमय ही अवसादग्रस्त हो जाते हैं और अवसाद में जी रहे हैं। अजीब सा निराशाजनक वातावरण है, जहाँ कोई उम्मीद नहीं है, काम होता है और अगर इस माहोल में काम के नाम पर खानापूर्ति हो तो हमें न तो आश्चर्य होना चाहिए और न ही शिकायत होनी चाहिए। पहला संवाददाता, फोटोग्राफर, पेजमेकर, कैमरामैन और ऐसे न जाने कितने लोग हमें पत्रकारिता की मोटी – मोटी किताबों में भी नहीं मिलते और न ही खोजने की कोशिश की जाती है, उनकी स्थिति पर शोध हो, सुधारने की कोशिश हो और पुरस्कारों और सम्मानों की बरसात में एक हिस्सा उनके नाम पर भी हो....तो बात बने मगर इसके लिए बात तो होनी जरूरी है। अखबारों का वातावरण देखकर बच्चों वाली प्रतियोगिता याद आ जाती है, कई बार ऐसा भी होता है कि किसी छोटे अखबार का सम्पादक जाए तो बड़े अखबार के सम्पादक वहाँ नहीं जाएंगे क्योंकि उनके लिए दूसरों के साथ बैठना भी अपमान लगता है। एक मीडिया हाउस का व्यक्ति कभी दूसरे हाउस में जाए तो उसे ऐसे देखा जाएगा, जाने वह कहाँ का अजूबा है या उसने कितना बड़ा पाप कर दिया है। बड़ी असमंजस वाली स्थिति हो जाती है, जो आपको जानते हैं, वह भी बात नहीं करेंगे क्योंकि बाद में उनसे सवाल होंगे। कई मीडिया हाउस तो संवाददाताओं को दूसरे मीडिया हाउस से बात तक करने की इजाजत नहीं देते, ऐसा भी देखा गया है कि हिन्दी वाले ही हिन्दी वालों से बात नहीं करते और न ही उनको छूट है। हिन्दी पत्रकारिता में संदेह की परम्परा बढ़ गयी है। मैंने कलकत्ता विश्वविद्यालय में जो बीमारी देखी, वह यहाँ भी है। प्रेस क्लब का चुनाव छोड़ दिया जाए तो सभी सम्पादकों और पत्रकारों व अन्य लोगों का एक मंच पर आना और कायदे से बात करना भी दुनिया का आठवाँ अजूबा होगा। बात नहीं करना, साथ नहीं आना, हमारी समस्या की जड़ है क्योंकि इसमें कभी हीनभावना है तो कभी अहंकार है। प्रतियोगिता हो मगर स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा हो तो बात बनती और यह समस्या किसी शहर या राज्य की नहीं हर जगह ऐसा है। हम कल्पना नहीं कर सकते कि हिन्दी पत्रकारिता पर कोई बात या आयोजन हो और उसमें हर मीडिया के लोग शामिल हों, ये बस असम्भव है। पत्रकार के नाम पर बंधुआ मजदूरों को प्रश्रय दिया जाना और 90 प्रतिशत भागीदारी को अनदेखा करना यह कोई अच्छी बात नहीं है। कम से कम सुविधाओं और श्रेय पर उनका अधिकार है। पूरी जिन्दगी हिन्दी पत्रकारिता के छाया जगत को देने के बाद अगर किसी बुर्जुग छायाकार की आँखों में उपेक्षा की पीड़ा हो, किसी पेजमेकर का नाम तक हम न जाने, कोई संवाददाता जिन्दगी भर काम करने के बाद गरीबी में गुमनामी की मौत मरने पर मजबूर हो तो यह उसके लिए नहीं, पत्रकारिता जगत के पुरोधाओं के इतिहास को शर्मसार करने वाली बात होगी। यह जाहिर सी बात है कि बड़े से बड़ा बादशाह भी अजर – अमर नहीं होता, एक दिन सबका तय है जाना, मगर उसकी भूमिका तय करती है कि उसे किस तरीके से याद किया जाए। कम से कम जो बड़े पदों पर बैठे हैं और जो दिल्ली में बैठे हैं, वह यह कर सकते हैं, पत्रकारिता को आपने अगर धंधा बना ही दिया है तो धंधे में भी सुविधाओं की जरूरत होती है, श्रम को सम्मान और अधिकार की जरूरत तो कारखाने में भी होती है। आगे बढ़ना उसका अधिकार होता है। अविश्वास, संशय, संदेह, शोषण और उपेक्षा और घृणा, क्या हम पत्रकार आने वाली पीढ़ी के लिए यही छोड़कर जा रहे हैं? क्या आने वाली पीढ़ी ऐसी ही होगी जो पत्रकारिता का मतलब न समझे, उसे ग्लैमर समझे, सिर्फ फायदे की जगह समझकर काम करे और जीवन भर पेशेवर कारणों से दोस्त को भी दुश्मन समझने को बाध्य हो? अगर ऐसा परिवेश हमारे साहित्यिक, सांस्कृतिक, पत्रकारिता जगत में रहा तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा और न ही हमारे पास कोई उत्तर होगा। ऐसी स्थिति में सृजनात्मकता पर बात ही फिजूल है और सवाल यह है कि पूरे वातावरण में जो संड़ाध भर रही है, उसकी भरपाई कौन करेगा? # who will repay#