रविवार, 17 फ़रवरी 2019

अभिजात्यता के कवच से बाहर निकलिए...रोशनी दूर तक फैली है




हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता का सम्मेलन समाप्त हो गया है। 18 साल के बाद इस तरह का आयोजन निश्चित रूप से एक अच्छी पहल है मगर इन दो दिनों में मुझे समझ में आ गया कि आज की साहित्यिक पत्रकारिता की लोकप्रियता कम क्यों हो रही है, (अगर वाकई ऐसा है)। जब से कॉलेज में गयी, विश्वविद्यालय पहुँची और पिछले 15 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूँ...एक ही राग सुनती आ रही हूँ...बड़ा संकट हैं, पत्रिकाएं सिमट रही हैं, लोग पढ़ना नहीं चाहते..अभिव्यक्ति का संकट है...मीडिया में साहित्य का परिदृश्य सिकुड़ रहा है..सरकार आजादी छीन रही है....और मजे की बात यह है कि ये राग अलापते हुए जो शोधार्थी थे, आज प्रोफेसर और देश के दिग्गज विद्वानों में शुमार हैं...अच्छा -खासा बैंक बैलेंस है...गाड़ी है, शोहरत है और सम्मान भी है...मगर सालों बाद भी कुछ नहीं बदला...क्योंकि ये बदलाव को देखना ही नहीं चाहते..या इनकी नजर में बदलाव सिर्फ उतना है जो उनकी दृष्टि को स्वीकार है। याद रहे कि सरकार अब भाजपा की है, ये रुदन मार्क्सवादियों के जमाने से चला आ रहा है। तब समझ में नहीं आता था मगर आज चीजों को समझ रही हूँ तो बतौर पत्रकार इन सारे आरोपों पर घोर आपत्ति है। मजे की बात यह है कि जिन साहित्यकारों के नाम पर उपेक्षा का रोना रो रहे हैं, आपने भी उनके लिए क्या किया? आप सरकार से बात नहीं करेंगे क्योंकि यह आपकी शान के खिलाफ है..और यह साहित्य का काम नहीं है आपकी नजर में....साहित्य का स्थान ऊँचा है और इतना ऊँचा हो गया है कि जमीन पर कदम रखने में उसे परेशानी होने लगी है। इतना याद रखना चाहिए कि निराला, प्रसाद या नागार्जुन से लेकर प्रेमचन्द समेत तमाम कवियों को किसी साहित्यिक पत्रिका के सम्पादक ने महान नहीं बनाया। ये सब महान बने क्योंकि इनको जनता ने अपनाया और जब जनता ने अपनाया तब जाकर आलोचकों और आप जैसे दिग्गजों ने इनको पूजा। इन सभी ने पहले आम आदमी की तकलीफों को जीया, भोगा, सरकार के प्रति इनका विद्रोह जन मन की अभिव्यक्ति था क्योंकि इन जैसा हर साहित्यकार जनता के बीच रहा। आटा, नमक और तेल की चिन्ता ने इनके साहित्य को कमतर नहीं बनाया। आज के अधिकतर सम्पादकों में जनता तक जाने की इच्छा ही नहीं है और न ही वे कोशिश करते हैं। आपको रेडिमेड वातावरण चाहिए और रेडिमेड पाठक से लेकर लोकप्रियता भी रेडिमेड चाहिए। आपका संघर्ष पत्रिका निकालने तक सीमित है..मगर कहानी, आलेख और कविता से इतर आपकी पत्रिकाएं किस सरोकार से जुड़ती हैं। आप किसानों पर बात करते हैं, किसानों के प्रति नीतियों को लेकर सरकार को कोसते हैं मगर कृषि सम्बन्धित एक भी आलेख या एक भी कार्यशाला या उससे सम्बन्धित जानकारी आपकी पत्रिकाओं में नहीं रहती..आप पत्रिका के कार्यालय में उन पर बात करते हैं जबकि जरूरत तो एक किसान तक जाने की है। किसानों की आत्महत्या का रोना बहुत रोया जाता है, कितने लेखक और सम्पादक किसानों की मदद करने पहुँचे? आपको शिकायत है कि युवा साहित्य नहीं पढ़ रहे, भाषा उनकी सही नहीं है, कितनी पत्रिकाओं ने शिक्षण संस्थानों तक ये प्रस्ताव रखा कि वे विद्यार्थियों तक जाएंगे और उनको भाषा व व्याकरण का ज्ञान देंगे...उनको साहित्यकारों से सम्बन्धित जगहें दिखाएंगे? अव्वल तो हर सम्पादक कह देगा कि यह साहित्यिक पत्रकारिता का काम ही नहीं है, इस पर वह कोशिश करेगा तो उसके दरवाजे शहरों के पॉश स्कूल, कॉलेजों या निजी शिक्षण संस्थानों के लिए खुलते हैं। हकीकत यह है कि किसी साधारण स्कूल का शिक्षक उसकी दृष्टि में कोई मायने नहीं रखता है। आप युवाओं की बात करते हैं मगर आपके लेखन में न तो युवाओं के मुद्दे हैं और न उनके लिए किसी तरह की व्यावहारिक जमीन पर उतर सकने वाली कोई पहल। अगर आप संगठन या पत्रिका से जुड़े हैं तो जरूर अपने विद्यार्थियों को इमोशनली ब्लैकमेल कर अपनी सभाओं में ले जाते हैं। भला हो यूजीसी का जिसने प्रमाणपत्र का जिसकी वजह से बच्चे आज लिख रहे हैं। आपको रेडिमेड लेखक चाहिए जो गलतियाँ न करें मगर आप युवाओं को तराशने के लिए तैयार नहीं हैं, उन पर परिश्रम नहीं करना चाहते इसलिए नए लेखकों और नए बच्चों के लिए तक आप तक पहुँच पाना ही बड़ी उपलब्धि है।
आज का मीडिया अगर टीआरपी से चल रहा है तो आप भी विवादों का सहारा लेकर और कई बार उसे गढ़कर टीआरपी चाहते हैं। ऐसा हाल ही में विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के मामले में हुआ, भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार को लेकर हुआ, जागरण संवादी को लेकर हुआ..साहित्य की इमेज आपके लिए मायने नहीं रखती। हर गलत चीज का बहिष्कार करने वाले आयोजक ऐसे विवाद खड़े करने वाले सम्पादकों का बहिष्कार कभी नहीं करते। वो बाकायदा सम्मानित अतिथि के रूप में आपके मंच पर उपस्थित हैं, आप दूसरों को क्या आदर्श सिखाएंगे और बच्चे आपसे क्या सीखेंगे। आप शोषण के खिलाफ लिखते हैं और अधिकांश साहित्यिक पत्रिकाएं अवैतनिक कार्यकर्ताओं के भरोसे चल रही हैं, क्या ये शोषण नहीं है? आप चाहते हैं कि लोग आपकी पत्रिका खरीदकर पढ़ें मगर आपकी इच्छा है कि लेखक अपनी किताबें बाकायदा डाक से अपने खर्च तक आप तक पहुँचाएं, क्या ये दोहरापन नहीं है? आज क्यों युवाओं से नहीं लिखवाया जा रहा है, अगर आपको मैथिलीशरण गुप्त चाहिए तो पहले महावीर प्रसाद द्विवेदी तो बनिए। साहित्य में कोई वाद नहीं होना चाहिए, अगर साहित्य समावेशी है तो वहाँ खेमेबाजी का क्या काम, मगर सम्पादकों में खेमेबाजी है, वामपंथ, दक्षिणपंथ और एक दूसरे को खारिज करने की प्रवृत्ति भी है तो आप कौन सी स्वायत्तता सिखा रहे हैं जब आपके अन्दर अपने से भिन्न मत वालों को स्वीकार करने और उनको सुनने की शक्ति नहीं है।
अपनी पत्रिका जनता तक पहुँचाने के लिए आप संघर्ष करते हैं,समझौते भी करते हैं तो आप आम मीडिया से अलग कैसे हैं..जबकि आप भी वही कर रहे हैं। अब बात जब मीडिया की है तो आपको पता होना चाहिए कि जो अभिजात्यता बोध और  उसका अहं साहित्यिक पत्रकारिता में चल सकता है, मीडिया में उसके लिए कोई जगह नहीं है। हम पत्रकार जरूरत पड़ने पर झोपड़ों से लेकर फुटपाथ तक पर भी काम कर सकते हैं और मुझे नहीं लगता कि किसी भी सम्पादक को इसमें शर्म आती होगी। साहित्यिक पत्रकारिता में खर्च वह नहीं है जो किसी आम मीडिया में है। हम लेखकों और प्रकाशकों तक, संस्थाओं तक और कई बार शिक्षण संस्थानों से लेकर साहित्यिक पत्रिकाओं तक जाते हैं। कुछ एक संस्थाओं को छोड़ दूँ तो याद नहीं आता कि किसी उपरोक्त माध्यमों के किसी भी प्रतिनिधि ने कोई इच्छा जतायी हो कि वह किताबों से इतर व्यावहारिक स्तर पर कुछ करना चाहता है। सच तो यह है कि सबकी नजर बड़े संचार माध्यमों और बड़े अखबारों पर रहती है, वे छोटे संचार माध्यमों से जुड़ना पसन्द नहीं करते और न ही किसी बड़े अखबार से अपने रिश्ते बिगाड़ना चाहते हैं। सम्पादकों में यह समझौतावादी रवैया ही मीडिया में साम्राज्यवाद का पोषक है। ऐसे में आप सभी अखबारों को दोष नहीं दे सकते और न आपको देना चाहिए। अगर छोटे स्तर पर कोई काम कर रहा हो तो भी 2 -3 रुपए का अखबार खरीदना आपको अपने पैसे की बर्बादी लगता है और आप चाहते हैं कि कोई आपकी 15 से 200 रुपए आपकी पत्रिका पर खर्च करे और वह भी विवाद और कुछ कहानियाँ पढ़ने के लिए..साहब ऐसा नहीं होता। आपकी नजर में जनसत्ता ही अखबार हैं और आप तमाम आकलन उसे आधार मानकर करते हैं तो आपका आकलन अधूरा भी है और एकांगी भी है। दुनिया सिर्फ बड़े अखबारों तक नहीं है।
हकीकत यह है कि आज साहित्य जनता तक जा रहा है तो उसी मीडिया के कारण जा रहा है जिसे आप गालियाँ देते नहीं थकते। हम साहित्य को हिस्सा बना सकते हैं मगर हमारे सरोकार आपकी तरह सीमित नहीं है, हमारी दुनिया आपकी तरह छोटी नहीं है। हमारे लिए संगोष्ठी जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण नल में पानी न आने से परेशान लोग हैं, कक्षाओं में टूटी बेंच है, पुलवामा के शहीद हैं, और सोने का भाव है, जाहिर है कि जगह की कमी तो होगी और इस स्थानाभाव के बावजूद हम आपके कार्यक्रमों, आपकी गतिविधियों, प्रयासों, समीक्षाओं को जगह देते हैं। आपके लिए विज्ञापन महत्व नहीं रखते मगर मीडिया में पत्रकारों से लेकर ग्रुप डी के स्टाफ व हॉकर तक को रोजगार मिलता है...उसके लिए वेतन की जरूरत पड़ती है, हमारे लिए साहित्य एक हिस्सा है, अनिवार्य हिस्सा है..हमारे लिए जनता ही सबसे बड़ा साहित्य है। आपको किसी रिक्शे वाले या पान विक्रेता को पत्रिका पढ़वाने में शर्म आती होगी, हमें नहीं आती...हर घर - घर तक जाते हैं, किताबें पढ़वाते हैं, अपने अंक पढ़वाते हैं, उनकी समस्याओं को सामने रखते हैं, डंडे खाते हैं, तब जाकर हमें वह सम्मान मिलता है। एक लेखक की हत्या हो गयी तो आपने अवार्ड वापसी शुरू कर दी मगर न जाने कितने पत्रकार पिटते और मारे जाते हैं, कई भूखे रह जाते हैं...वह आपके साहित्य के लिए अछूत हैं। आपके तमाम आयोजनों की सफलता में मीडिया का बड़ा योगदान है और एक लम्बी यात्रा तय करने में भी। आप  पत्रकारों  की मुश्किलों पर बात नहीं करते क्योंकि उनमें आपकी तरह अभिजात्यता नहीं है...वह साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता का हिस्सा नहीं है..तो यह दूरी आपने बनायी है, हमने नहीं।

हर पत्रिका व माध्यम में साहित्य है और बाकायदा साहित्यिक महोत्सव भी हैं मगर आप उसे देखना नहीं चाहते। आजतक में साहित्य है, समीक्षाएं, कई दिग्गज लेखक लिखते हैं, अमर उजाला काव्य है। कोलकाता में सलाम दुनिया में 2 दिन, रविवार और बुधवार को साहित्य परिशिष्ट निकलता है, जागरण में सप्तरंग है। प्रभात खबर से लेकर वेबदुनिया तक के साहित्यिक परिशिष्ट हैं मगर आपको साहित्य नहीं दिखता। अखबारों में हर दिन साहित्यिक गतिविधियों की खबरें छपती हैं। आप खुद नियमित तौर पर खबरें भेजते हैं मगर आपको साहित्य नहीं दिखता। कई शहरों में तो रोज कला और साहित्य का एक पेज निकलता है और ये तो मैंने भोपाल में देखा है। बाकायदा साहित्य और कला के संवाददाता हैं, छपते -छपते पिछले 30 साल से सैकड़ों पन्नों का साहित्य विशेषांक निकाल रहा है। हर अखबार की पत्रिका में साहित्य है। जागरण और आजतक से लेकर तमाम बड़े - छोटे अखबार तो साहित्यिक आयोजन करते हैं। नाटकों की समीक्षाएं भी छपती हैं। इंडिया टुडे से लेकर आउट लुक जैसी पत्रिकाओं में भी साहित्य के लिए पन्ने सुरक्षित हैं। इंडिया टुडे के साहित्यिक विशेषांक तो इतने बेस्ट सेलर रहे कि वे खत्म भी हो गये। जागरण संवादी, आजतक साहित्य, अमर उजाला का आयोजन तो बस उदाहरण हैं। एबीपी न्यूज ने बाकायदा साहित्यकारों पर तर्पण नामक श्रृंखला चलायी। आपको रवीश कुमार एनडीटीवी पर केदारनाथ सिंह नहीं दिखते। संसद में धूमिल और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना पढ़े जाते नहीं दिखते। आपको उनकी मौजूदगी की खुशी नहीं बल्कि नेताओं के मुँह से सुनने का अफसोस है, नेता क्या किसी और समाज से आते हैं? हम यह नहीं कहते कि मीडिया में सब कुछ अच्छा है मगर सब कुछ इतना बुरा भी नहीं है कि आप इससे जुड़ न सकें..जनता इतनी कमतर नहीं कि आप उसे अपनी यात्रा में शामिल करने से परहेज करें।
हम पत्रकार ही साहित्य को जनता तक ले जा रहे हैं और ले जाएंगे..तब तक ले जाएंगे क्योंकि किताबें और साहित्य किसी की सम्पत्ति नहीं है जो एक कमरे में कैद रहे, वह जनता की धरोहर है, जनता तक जाएगी, जरूर जाएगी।
सच तो यह है कि अन्धेरे को आपने अपना कवच बना लिया है। यही अन्धेरा और आपकी इसी अभिजात्यता का गौरव बोध आपको विशिष्ट बनाता है, आप अपने सम्पादक होने का अहं छो़ड़ नहीं पाते और इसलिए जो अच्छा है, उसे न तो देख पाते हैं और न ही देखना चाहते हैं...अगर यही आपका सत्य है तो...आपके प्रमाणपत्र की जरूरत किसी को नहीं है। आप अगर किसी से ईमानदारी से नहीं जुड़ते, उसका कृतित्व स्वीकार नहीं करते तो आप किसी मायने में आम मीडिया से बेहतर नहीं है।
हम आपको खारिज करते हैं।

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2019

पुलवामा : आपसी द्वेष और टीआरपी का मोह छोड़कर एक साथ खड़े होने का वक्त है ये


पुलवामा में इस कदर आतंकी हमला हुआ कि शहीद हुए 40 से अधिक जवानों के शव क्षत-विक्षत हो गए। उरी के बाद पुलवामा, हमारे सैनिकों ने शहादत दी..हम शहीद कहते जरूर हैं मगर सच तो यह है कि यह एक नृशंस हत्या है..एक कायराना हरकत। होना तो यह चाहिए कि हम एक साथ इस हमले के खिलाफ खड़े होते मगर ऐसी दुःखद और मार्मिक घड़ी में भी हम दो धड़ों में बँटे हैं। यह सही है कि सुरक्षा में चूक हुई है मगर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इसके पीछे वह लोग भी हैं जो इस देश में रहते जरूर हैं मगर उनकी आत्म पाकिस्तान में गिरवी रखी है। आश्चर्यजनक तरीके से अब भी नवजोत सिंह सिद्धू बातचीत को लेकर दलीलें दे रहे हैं और महबूबा मुफ्ती व फारुक अब्दुल्ला जैसे नेता अब भी सर्जिकल स्ट्राइक और सेना की कार्रवाई की निन्दा करने में लगे हैं..। आखिर देश का बुद्धिजीवी वर्ग कब तक आतंकियों के मानवाधिकार का ढोल पीटता रहेगा..क्या किसी सैनिक का मानवाधिकार नहीं है या वह मानव ही नहीं है। आखिर हम क्यों इतने संवेदनहीन हो गए हैं...? इस बात की पूरी आशंका है कि इसमें स्थानीय लोगों के साथ नेताओं का भी हाथ है, सब जानते हैं कि महबूबा मुफ्ती से लेकर फारुक अब्दुल्ला की सरकार सेना और सैनिकों के साथ किस तरह का व्यवहार करते हैं...आखिर जब कश्मीर जब भारत का हिस्सा है तो वहाँ के लिए अलग कानून क्यों है अब तक। हम क्यों इतनी सुविधाएं दे रहे हैं, ऐसे नेताओं को...इनकी सुरक्षा के पीछे क्यों अपने जवानों की जान दाँव पर लगा रहे हैं। यह वक्त है कि देश से अलग - थलग पड़े कश्मीर को देश की मुख्य धारा में लाया जाए..ऐसे नेताओं पर नकेल कसी जाए जो आतंकियों के प्रति हमदर्दी रखते हैं..और पाकिस्तानपरस्तों से सरकार सारी सुविधाएं और सुरक्षा छीन ले। यह तब होगा जब हम सब मिलकर इनका हर जगह से बहिष्कार करें...अगर कश्मीर में किसी और राज्य के लोग नहीं रह सकते, जमीनें नहीं खरीद सकते तो कश्मीरियों को भी इस देश के किसी हिस्से में जमीनें नहीं मिलनी चाहिए। हम जिनकी सुरक्षा के लिए अपने जाँबाज सैनिकों को तैनात कर रहे हैं, क्या वे इस लायक हैं कि इन जवानों की सुरक्षा में रहें। सरकार विपक्ष का मुँह देखकर नहीं चल सकती। केजरीवाल और राहुल गाँधी जैसे लोग सेना से सबूत माँगते रहेंगे तो क्या हम इनकी तुष्टि के लिए बैठे रहेंगे। पूरा देश कश्मीर को लेकर बहुत सोच सका है, किसी भी राज्य को अलग ध्वज की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए..कश्मीर जब भारत से अलग नहीं है तो उसके लिए अलग कानून क्यों स्वीकार किए जा रहे हैं?
पाक मीडिया का आलम तो ये है कि पाकिस्‍तान के अखबार 'द नेशन' ने इस हमले को 'फ्रीडम फाइटर' द्वारा किया गया हमला बताया है। वहीं 'द डाउन' ने इसको लेकर एक छोटी सी खबर को प्रकाशित किया है। इसको लेकर जहां भारत के लोगों में जबरदस्‍त गुस्‍सा दिखाई दे रहा है वहीं पाकिस्‍तान ने इसको लेकर भारत के आरोपों को खारिज कर दिया है। आलम ये है कि पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री इमरान खान जो भारत के साथ दोस्‍ती बनाए रखने का राग अलापते दिखाई देते हैं, ने हमले को लेकर कोई अफसोस तक जाहिर नहीं किया है। इतना ही नहीं इस हमले में संवेदना तक जताने के लिए पाकिस्‍तान सरकार का कोई मंत्री तक सामने नहीं आया। वहीं विदेश मंत्रालय के प्रवक्‍ता की तरफ से एक ट्वीट कर इसकी खानापूर्ति का काम जरूर कर दिया गया। अपने एक ट्वीट में विदेश मंत्रालय के प्रवक्‍ता डॉक्‍टर मोहम्‍मद फैजल ने घटना की निंदा की है और भारत के उन आरोपों को खारिज किया है जिसमें भारत ने इसके लिए पाकिस्‍तान को जिम्‍मेदार ठहराया था। प्रवक्‍ता का कहना है कि इसमें पाकिस्‍तान का कोई हाथ नहीं है। क्या ऐसे लोगों से भारत दोस्ती करने जा रहा है?
टीवी चैनलों पर इसको लेकर आक्रामक तरीके से कवरेज जारी है। इसे मोदी सरकार ने संज्ञान में लेते हुए निजी टीवी चैनलों को आगाह किया है। सरकार की तरफ से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने जम्मू कश्मीर के पुलवामा में गुरुवार को हुए आतंकवादी हमले की पृष्ठभूमि में सभी टीवी चैनलों से ऐसी सामग्री पेश करने से बचने को कहा है, जिससे हिंसा भड़क सकती हो अथवा देश विरोधी रुख को बढ़ावा मिलता हो। मंत्रालय की ओर से जारी परामर्श में कहा गया, ‘‘हालिया आतंकवादी हमले को देखते हुए टीवी चैनलों को सलाह दी जाती है कि वे ऐसी किसी भी ऐसी सामग्री के प्रति सावधान रहें जो हिंसा को भड़का अथवा बढ़ावा दे सकती हैं अथवा जो कानून व्यवस्था को बनाने रखने के खिलाफ जाती हो या देश विरोधी रुख को बढ़ावा देती हो या फिर  देश की अखंडता को प्रभावित करती हो।''मंत्रालय ने कहा कि सभी निजी चैनलों को इसका सख्ती से पालन करने का अनुरोध किया जाता है। मीडिया की बड़ी भूमिका है और जिम्मेदारी है। मैं हमेशा से कहती आ रही हूँ कि सुरक्षा सम्बन्धी मामलों में कवरेज के दौरान संवेदनशीलता और गोपनीयता की जरूरत है। आपका दुश्मन भी टीवी देखता है। हमें कोई जरूरत नहीं कि टीआरपी बढ़ाने के नाम पर अपनी सैन्य क्षमता, हथियारों और ठिकानों का प्रदर्शन करें...ऐसे साक्षात्कार तो प्रसारित ही नहीं होने चाहिए। विस्फोट की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा न करें...यह रक्षा मंत्रालय और सेना की अपील है। अब सरकार को इस बारे में गम्भीरता से कदम उठाने की जरूरत है। आज पाकिस्तान और आतंकी संगठन मीडिया का प्रिय विषय हैं, क्या ये अच्छा नहीं है कि पड़ोसी देश के गदहे दिखाने की जगह हम उन किसानों और उन लोगों को दिखाएं जो जमीन पर अच्छा काम कर रहे हैं। मीडिया को संवेदनशील होने की जरूरत है क्योंकि कोई टीआरपी देश की सुरक्षा से बड़ी नहीं हो सकती है।
यह वक्त दुःख का नहीं है, क्रोध का मगर इस क्रोध को बरकरार रखते हुए भी हमें एक होकर तमाम धार्मिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक मतभेदों से ऊपर उठकर साथ खड़ा होना होगा। इस देश पर, देश की सेना पर भरोसा रखिए और उन सबका बहिष्कार करिए जो इस मौके का इस्तेमाल राजनीति के लिए कर रहे हैं....हम जरूर जीतेंगे...कश्मीर हमारा था, है और रहेगा...जरूरत इस बात की है कि अब इसे भारत का हिस्सा मौखिक तौर पर नहीं, बल्कि समान कानून लागू करके बनाया जाए। हम जरूर जीतेंगे...तय है।