शुक्रवार, 21 मई 2021

एकतरफा प्यार और भाईचारा अब और नहीं निभाना हमें

 

क्या इससे बीमारी नहीं फैलेगी?

आज एक ऐसे निषय को छूने जा रही हूँ जिस पर बात करने में भी लोगों को दिक्कत होती है। खुद मैंने भी नहीं सोचा था कि मैं इस मुद्दे पर कुछ कहूँगी। व्यक्तिगत तौर पर किसी धार्मिक मामले पर लिखने से मुझे परहेज ही रहा है मगर धार्मिक मामला जब राष्ट्रीय होने लगे। जब धर्मनिरपेक्षता और अनेकता में एकता जैसे शब्दों और वाक्यों का दुरुपयोग होने लगे और चालाकी से खामोशी को ढाल बना लिया जाये तो बोलना ही पड़ता है। यही कारण है कि एक वर्जित विषय पर बात करने की शुरुआत कर रही हूँ और वह भी भावनात्मक रूप से नहीं नहीं, किसी कुंठा के साथ नहीं बल्कि तथ्यों के साथ इतिहास में जाकर तलाशते हुए..।

जी हाँ, इस्लाम और हिन्दू - मुस्लिम रिश्ते पर ही बात कर रही हूँ। भारत से विदेशों में गये और जाकर बसने वाले अप्रवासी भारतीय अर्द्ध भारतीय माने जाते हैं...इंडो - अमरीकी....इंडो चाइनीज जैसे शब्द उनके लिए हैं मगर भारत में वसुधैव कुटुम्बकम की परम्परा रही है। हमने सबको अपना लिया...उनको भी भारतीय मान लिया जिन्होंने हमारे इतिहास से खिलवाड़ किया, हमारे मंदिर तोड़े, हमारे पुस्तकालय जलाये...धर्मान्तरण के नाम पर हमारे पूर्वजों के साथ अमानवीय लोहमर्षक अत्याचार किये..मगर सबसे बड़ा सवाल है कि क्या उन्होंने कभी अपनी गलती मानी? मनुस्मृति और बाह्मणों के अत्याचार का हवाला देकर आज तक सामान्य वर्ग और हिन्दू धर्म को मानसिक रूप से प्रताड़ित करते हुए गालियाँ दी जाती हैं। इसके बावजूद कि अयोग्य होते हुए भी अल्पसंख्यक और निचली जातियों के नाम पर आप हमारे अधिकारों पर कब्जा जमाये बैठे हैं...तो आज आपको सुनना होगा...अगर हम आपकी गालियाँ सुन रहे हैं तो आज आप भी खरी - खरी सुनेंगे और खासकर वह अल्पसंख्यक (?) जो शिक्षित तो हैं मगर हिन्दू उनके लिए सिर्फ टूल हैं अपनी तरक्की का...वह जो धर्मनिरपेक्षता के नाम पर सारी सुविधाएं उठाते हैं और जब जरूरत पड़े तो मजहब का परदा लगा लेते हैं.,..जुबान पर जिनकी ताला लग जाता है...वह सभी प्रबुद्ध और प्रगतिशील, शिक्षित मुस्लिम, धर्मनिरपेक्ष और अपनी पहचान के संकट से गुजरने वाले बुद्धिजीवी सुनेंगे। मेरा सवाल उनकी खामोशी को लेकर है जिसमें एक चालाकी है..।

भाईचारे का मतलब यह नहीं होता कि किसी के अधिकारों को खत्म करके, किसी की सुरक्षा से समझौता करके वोटबैंक बनाकर किसी एक वर्ग को आगे बढ़ाया जाए और वह इतना बढ़े कि मनमानी के मद में पागल होता जाए...बल्कि यह होता है कि दोनों ही वर्गों और धर्मों की अस्मिता को बरकरार रखा जाये और दोनों धर्म एक दूसरे के लिए खड़े हों...मगर इस्लाम की सबसे ज्यादा लड़ाई तो हिन्दू लड़ रहे हैं...क्या आप धर्मनिरपेक्ष मुस्लिम दोस्त, बन्धु कभी हिन्दू और हिन्दी के पक्ष में लड़े हैं....जवाब है नहीं....आपके लिए कोई राजेश, सुरेश, सतबीर एक दूसरे की जान का दुश्मन बन जाता है और आप तमाशा देखते हैं और उसका आनन्द उठाते हैं...फिर कैसा भाईचारा? जिन्ना ने आपके लिए देश बना दिया मगर वह आपके साथ नहीं रहा मगर आपके कारण कोई गाँधी अपने ही धर्म के लोगों के बीच बुरा बना,...इस देश ने आप मुस्लिमों के कारण गाँधी को खोया क्योंकि गाँधी आपके हक की ही बात कर रहे थे...वह देश को एक रखना चाहते थे....कोई खान अब्दुल गफ्फार खान भी था जो आपकी ही कौम का था और इस मुल्क से बहुत प्यार करता था मगर आपने अपना आदर्श जिन्ना को चुना। हमें मस्जिदों में जाने से कोई ऐतराज नहीं लेकिन आप मंदिर की तारीफ करने से डरते हैं....क्या यह मौकापरस्ती नहीं है कि सुविधाएं चाहिए तो भारतीय बन जाओ और जब जिम्मेदारी निभानी हो तो मजहबी बन जाओ, मेरा सवाल इस मौकापरस्ती से है...। एक अयोध्या की मस्जिद टूटी और आपने कोहराम मचा दिया...जनाब...कोहराम तो हमें मचाना चाहिए...क्योंकि आपकी सारी मस्जिदें ही हमारे मंदिरों के मलवे पर बनी हैं... आपको फिलिस्तीन में मुसलमानों के मरने का गम है मगर आप पाकिस्तान में हिन्दू लड़कियों के धर्मान्तरण और बांग्लादेश में टूट रहे मंदिरों पर आप एक शब्द नहीं कहते...एक नेता पूरे कोलकाता को मिनी पाकिस्तान बताता है और आपके मुँह में दही जमा रहता है...एक ओवेसी कहता है कि वह 15 मिनट में हिन्दओं को साफ कर देगा और आपमें इतनी हिम्मत नहीं कि आप तनकर यह कह सकें कि एक मुसलमान के होते हुए किसी ओवेसी की यह हिम्मत नहीं है कि ऐसा कहे.,..ऐसा कहने से पहले उसे एक मुसलमान का सामना करना होगा....न....आप सुनते हैं और चुप रह जाते हैं। कश्मीर में आतंकियों की मौत पर दुःख मनाते हैं....भारतीय ध्वज लहराने पर कासगंज में किसी चन्दन को मार डालते हैं,,,,किसी अंकित की ऑनर किलिंग कर देते हैं और जब खुद पर बात आई तो खुद को विक्टिम बताते हैं...। अपनी कौम को अगर आपनी रूढ़ियों के अन्धेरे में रहने दिया तो आप दोषी हैं...आप खुद आगे बढ़े और अपनी प्रगतिशीलता और भारत के प्रति प्रेम अगर आप अपने बच्चों को नहीं सिखा सके हैं, अगर आप तबलीगी जमात, ओवेसी, ओसामा बिन लादेन को भारत से ज्यादा प्रेम करते हैं...तो आप पर सवाल उठेंगे।

दरअसल, कोई भारतीय़ ऐसी नापाक हरकत कर ही नहीं सकता क्योंकि भारतीय होने का मतलब आधार कार्ड और राशन कार्ड का नम्बर भर नहीं है, आपके पूर्वज बाहर से आए, आक्रमणकारी थे और जिनके हाथ हमारे पूर्वजों के खून से रंगे हो, जो भारत के हारने पर पटाखे चलाता हो, वह क्या भारतीय होने के योग्य है?  भारत के अधिकांश मुस्लिम लोगों के पूर्वज हिन्दू ही थे इस बारे में विभिन्न स्रोतों से जानकारी प्राप्त होती हैं । फ़्रन्कोईस गौइटर ने अपनी पुस्तक में माना है कि 99 प्रतिशत से अधिक भारतीय मुस्लिम लोग, हिन्दू मूल के थे जो धर्मान्तरित हुए। इसी प्रकार के विवरण अन्य स्रोतों से भी मिलते है की वर्तमान दक्षिण पूर्वी एशिया के मुस्लिम जनसँख्या के मूल पूर्वज हिंदू थे। 

महाराष्ट्र के एक मस्जिद से लोगों द्वारा पुलिस अफसर को खदेड़ने का वीडियो लोगों को देखने को मिला। चार मीनार के आस-पास की भीड़ की तस्वीरें हों या पंजाब के बाज़ारों से आई तस्वीरें, देख कर हर बार यही प्रश्न उठता है कि नियमों को लेकर जब मुस्लिम समाज द्वारा व्यक्तिगत या सामूहिक आचरण की बात आती है तो फिर प्रशासन को क्या हो जाता है? तब उन्हें क्या हो जाता है जो हिन्दू त्योहारों या धार्मिक समारोहों के खिलाफ लगातार बोलने में जरा भी नहीं हिचकते? क्या हो जाता है जो महामारी के संक्रमण रोकने की जिम्मेदारी केवल हिन्दू समाज पर डालना चाहते हैं? 

आप खुद को भारतीय नागरिक बताते हैं और सारी सुविधाएं पाते हैं..। नोटबंदी के समय बैंकों के सामने कतारों में सबसे पहले नोट बदलने की होड़ से लेकर हर सरकारी सुविधा का लाभ उठाने में आप आगे रहते हैं...सरकारें आपका तुष्टिकरण करती हैं लेकिन आप चुपचाप मलाई खाते हैं। चलिए मान लिया ममता बनर्जी तुष्टिकरण करती हैं मगर आपकी जिम्मेदारी क्या है...आपने फायदा क्यों लिया...अगर आप अपनी मस्जिद के शीर्ष पद पर किसी हिन्दू को नहीं चाहते तो आपने यह कैसे मान लिया है कि मंदिर के शीर्ष पद हम आपकी कौम के किसी व्यक्ति को स्वीकार कर लेंगे? आपने क्यों नहीं कहा कि नहीं, यह गलत है और ऐसा नहीं होना चाहिए...जब आपको ईमाम भत्ता मिला तो आपने ऐतराज क्यों नहीं किया और क्यों नहीं कहा कि अगर हर धर्म के प्रतिनिधि को यह भत्ता मिले वरना आप इसे मंजूर नहीं करेंगे...जब आपकी अकादमी को आगे ले जाने की बात हो रही थी तो आपने क्यों नहीं कहा कि हिन्दी अकादमी को भी बराबर का हक मिलना चाहिए और जब ईद के लिए बाजार खुल रहे हैं तो नवरात्रि पर भी बाजार खुलने चाहिए? आखिर गरीबी तो धर्म नहीं देखती...यह अच्छा है कि पैगम्बर मोहम्मद के नाम पर कार्टून बने तो आप गर्दनें उतार लेंगे और आपके एम. एफ. हुसैन हमारे देवी - देवताओं के अश्लील चित्र बनाकर हमारा अपमान करें तो वह आपकी नजर में कला है। यह क्या विचित्र नहीं लगता कि एक तरफ तो आप महिलाओं को परदे में रखते हैं और सब शाहीन बाग जैसे आन्दोलन होते हैं तो उनको ही सड़क पर उतार देते हैं...अपनी तस्दीक के लिए जब आप कागजात माँगते हैं तो आप कागज नहीं दिखाना चाहते....जब हमें कागज दिखाने में ऐतराज नहीं है तो आपको क्या दिक्कत है।

अगर आपकी कट्टरता बुरी नहीं है तो हमारी कट्टरता गलत कैसे हो सकती है...जब आप हिन्द पर राज्य करने का ख्वाब संजोते हैं तो हम अपने धर्म की रक्षा क्यों न करें...अगर गज्बा ए हिन्द सही है तो हिन्दू राष्ट्र की कल्पना गलत क्यों और कैसे है? अगर आप भारतीय हैं तो इस्लाम आपका मूल धर्म तो है नहीं क्योंकि यहाँ पर धर्मान्तरण से ही इस्लाम का प्रसार हुआ यानी आपके पूर्वज हिन्दू थे...और सम्भव है कि वह धर्म की रक्षा के लिए ही वीरगति को प्राप्त हुए हैं तो आप किसके लिए लड़ रहे हैं। क्या जवाब देंगे अपने पूर्वजों को...कभी सोचा है...। अपनी कौम के बच्चों को भी आपने नफरत ही सिखायी है...वरना मदरसे हथियार रखने की जगह तो नहीं थे...हम हिन्दुओं को अपने धार्मिक मामलों तक ही किसी धार्मिक गुरु की बात सुननी होती है और उसकी भी बाध्यता नहीं है..मगर आपको वोट किसको देना है...यह भी आपकी मस्जिदों से तय होता है...आप हिन्दुओं को काफिर कहते हैं और अपनी हुकूमत के लिए भी आपको एक हिन्दू और वह भी एक ब्राह्मण ही चाहिए....ऐसे में आपको अपना मजहब क्यों याद नहीं आता? आपने नयी दुनिया की रोशनी अपने बच्चों को दी नहीं...वरना खुलकर इन्सानियत और भारत के लिए बोलते। 

इस्लाम में वह लोग भी हैं जो इस देश के लिए जिए...और इस देश के लिए शहादतें दीं...जिन्होंने इस देश को एक किया...आपके आदर्श वह होने चाहिए....अजीम प्रेम जी से सीखिए...हमारे पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे कलाम से सीखिए...कैप्टन हामिद की शहादत को हम भारतीय कैसे भूल सकते हैं...आपको दारा -शिकोह से सीखना चाहिए...रहीम..रसखान...ताज बेगम...आप इनसे क्यों नहीं सीखते....हम ओवेसी या मौलानाओं से शिकायत नहीं कर सकते क्योंकि शिकायत हमें आप जैसे पढ़े - लिखे लोगों से है...उनकी खामोशियों से है...उनकी बेईमानियों से है। भारत को नेताओं ने नहीं, जनता ने बनाया है और जब जनता ठान ले तो उसकी ही इच्छा चलती है। जिस तरह ताली एक हाथ से नहीं बजती, उसी तरह भाईचारा और रिश्ते एकतरफा नहीं होते...गंगा - यमुना अपने अस्तित्व को बनाये रखकर एक दूसरे की रक्षा करके ही साथ रह सकते हैं...और यह तब होगा जब वह एक -दूसरे के बारे में सोचें...उनके हक में आवाज उठाए...उनकी हिफाजत करें...अगर ओम को अजान से दिक्कत नहीं है तो अजान को मंदिरों की घंटियों से समस्या नहीं होनी चाहिए...अगर नेता हमें लड़वा रहे हैं तो यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम उनके उकसावे या सुविधाओं के जाल में न फँसें और तुष्टिकरण न होने दें। किसी को दिखावे के लिए टोपी या तिलक न लगाना पड़े...ऐसे उदाहरण सामने लाइए जिन पर भारत को गर्व हो...अगर शरीयत से मोह है तो संविधान से मिलने वाली सुविधाओं का लोभ भी आपको छोड़ना होगा..,दूसरों की नहीं जानती मगर मैं इतना जानती हूँ कि अगर आपका आदर्श औरंगजेब हैं....अगर आप भारत की हार पर जश्न मनाते हैं...अगर आपको मिनी पाकिस्तान जैसे शब्दों से फर्क नहीं पड़ता...अगर आप वन्दे् मातरम पर ऐतराज करते हैं...अगर आपके लोग आतंक बनकर दूसरों को असुरक्षित कर रहे हैं और आप तुष्टिकरण की मलाई खा रहे हैं तो मेरे लिए आपका सम्मान करना या आपसे प्रेम करना सम्भव नहीं है...भारत भूमि की सन्तान हूँ और इतनी कृतघ्न नहीं कि मैं गुरु गोविन्द सिंह, गुरु तेग बहादुर, छत्रपति शिवाजी महाराज. महारानी जीजाबाई, महाराणा प्रताप के बलिदानों को भूल जाऊँ। मुझे अजान से दिक्कत नहीं है मगर आपको भी हमारे यज्ञ, हवन, मंदिर की घंटियों...त्योहारों का स्वागत करना होगा...। घर - घर में हवन हो, ओम् की ध्वनि हो...गुरुवाणी हो....चर्च की प्रार्थना हो...बुद्घम् शरणं गच्छामि की ध्वनि हो....ऐसा भारत चाहिए मुझे..मेरे तिरंगे को सम्मान मिले...तिरंगे का सम्मान आपका सम्मान हो...ऐसा देश चाहिए हमें।  हमें कुछ गलत कहा जाए तो आपको बुरा लगे...कोई हमारे खिलाफ फैसले ले तो आप हमारे लिए खड़े हो...कोई आपको बुरा कहे तो उसका विरोध करें..कोई आपके अधिकार छीनें तो हम तन जाए...पर जो हो मामला दोतरफा हो...एकतरफा प्यार और भाईचारा अब नहीं निभाना हमें।

मंगलवार, 11 मई 2021

देशप्रेम की सुगन्ध से होकर गुजरता है कवि गुरु का मानवीय विश्व प्रेम

 


रवीन्द्रनाथ...विश्वकवि...कवि गुरु और बंगाल के प्राण हैं रवीन्द्रनाथ ठाकुर। रवीन्द्रनाथ के एक विचार को लेकर कहा जाता है कि उन्होंने मानवता को देश प्रेम से अधिक महत्व दिया...लेकिन लोग यह बताना भूल जाते हैं कि कवि गुरु की मानवता और विश्व प्रेम देश प्रेम के मार्ग से होकर ही गुजरते हैं। रवीन्द्रनाथ ने कभी देश प्रेम का विरोध नहीं किया...जो लोग यह कहते हैं कि वे उग्र राष्ट्रवाद के विरोधी थे...उनको एक बार महाजाति सदन जरूर देखना चाहिए जिसका शिलान्यास उन्होंने किया था और इस महाजाति सदन की स्थापना के पीछे किसी और का नहीं बल्कि हमारे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की ही परिकल्पना और योगदान था। रवीन्द्रनाथ 12 वेलिंग्टन स्क्वायर पर स्थित राजा सुबोध मलिक बासु के घर आते थे और यहीं आया करते थे अरविंद घोष...जो कि उस समय क्रांतिकारी विचारधारा से ही प्रेरित थे और इसी दिशा में काम भी कर रहे थे। रवींद्रनाथ संभवतः ऐसे अकेले व्यक्ति थे जिन्होंने दो देशों भारत और बांग्लादेश के लिए राष्ट्रीय गान लिखा। बचपन से कुशाग्र बुद्धि के रवींद्रनाथ ने देशी और विदेशी साहित्य दर्शन संस्कृति आदि को अपने अंदर समाहित कर लिया था और वह मानवता को विशेष महत्व देते थे। इसकी झलक उनकी रचनाओं में भी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होती है।

रवीन्द्रनाथ को गाते हुए हम बड़े हुए...काबुलीवाला कहानी हम सबने पढ़ी है...उसमें भी देश प्रेम अप्रत्यक्ष रूप से दिख सकता है...काबुली वाले की तड़प में काले पानी की सजा पाने वाले क्रांतिकारियों की व्यथा सी दिख पड़ती है मुझे। इस बार के बंगाल चुनाव में जिस तरह से 'खेला होबे' और 'खेला शेष होबे' के नारे उछले...जिस तरह से जय बांग्ला के राग बेसुरा किया गया...उसने मन को विचलित कर दिया है...सोचती हूँ...ऐसे नारों पर कवि गुरु की क्या प्रतिक्रिया होती, वो कवि जिसने अपने सृजन संसार में पूरे विश्व को समाहित कर लिया....वह जिसने पूरे विश्व को अपनाया...जिसने यह तक कह दिया कि “जब तक जिंदा हूं, मानवता के ऊपर राष्ट्रभक्ति की जीत नहीं होने दूंगा।”....उन पर क्षेत्रीयता का बोझ लाद दिया गया,...किसी भी बड़े व्यक्तित्व से प्रेरित होना कोई बड़ी बात नहीं...हम सब होते हैं...तभी तो गाँधी का चरखा देश में चल पाया...मगर आज उसी राज्य में जब इस प्रेरणा में कटाक्ष खोजा जाता है तो मन डूबकर फिर से कवि गुरु को खोजना चाहता है....इसीलिए आज पहली बार मैं लिख भी रही हूँ...रवीन्द्र संगीत को गाने के लिए भी पहले उसे पढ़ना पड़ता है...समझना पड़ता है...स्कूल के दिनों से ही रवीन्द्र संगीत गाती आ रही हूँ और कॉलेज में तो समझा भी...संगीत सीखते हुए भी रवीन्द्र संगीत गाया...'तुमि कैमोन करे गान...करो हे गुनि'...मुझे तो कभी नहीं लगा कि रवीन्द्र सिर्फ बंगाल के हैं और मैं बिहार से हूँ,,'अबांगाली' हूँ इसलिए मेरा रवीन्द्रनाथ पर कोई अधिकार नहीं,,,,हम सबको सिखाते हुए कभी भी हमारी शिक्षिकाओं ने यह भेद नहीं किया...फिर वह कौन लोग हैं जो हमारे कवि गुरु को अपनी संकीर्णताओं में लपेट लेना चाहते हैं..? 

इस देश ने भगवा वस्त्रों में आध्यात्मिकता खोजी है....आप रक्त खोज लेते हैं.. आपको राम से चिढ़ है...ठाकुर के तो नाम में ही राम है...रामकृष्ण परमहंस...भगवा स्वामी विवेकानंद समेत कई विभूतियों का गौरव है...उसे राजनीतिक हथियार बना देने का अधिकार आपको किसने दे दिया....जब लिख रही हूँ तो बादल छाए हैं....और गीत याद आ रहा है....मन मोरो मेघेर संगी....बादल की भी कोई जाति या राज्य होता है भला...कविगुरु समेत अन्य विभूतियाँ भी तो इन बादलों की तरह ही हैं....साहित्य का अमृत बरसाती हैं...समुद्र मंथन से निकला अमृत अगर समुद्र में रह जाता तो क्या होता इस संसार का....इसी तरह रवीन्द्र का गौरव अगर बंगाल तक ही रह जाए..गाँधी गुजरात तक ही रह जायें...दिनकर बिहार तक ही रह जायें तो क्या होगा इस देश का...इस देश की संस्कृति का? 

भारत के राष्ट्रगान को लेकर भी कहा जाता रहा है कि यह जॉर्ज पंचम के स्वागत में लिखा गया है...जो भी हो...जो चयनित अंश हमारे संविधान में स्वीकृत है...वह हमारा गौरव है मगर इन पंक्तियों को देखें - 

रात्रि प्रभातिल उदिल रविच्छवि

पूरब-उदय-गिरि-भाले,

साहे विहन्गम, पून्नो समीरण

नव-जीवन-रस ढाले,

तव करुणारुण-रागे

निद्रित भारत जागे

तव चरणे नत माथा,

जय जय जय हे, जय राजेश्वर,

भारत-भाग्य-विधाता,

जय हे, जय हे, जय हे,

जय जय जय जय हे

यहाँ राजेश्वर का सम्बोधन किसके लिए है...यह जानने की प्रबल इच्छा है...इन पंक्तियों को देखिए - 

 ‘আমার সোনার বাংলা, আমি তোমায় ভালোবাসি।

         চিরদিন তোমার আকাশ, তোমার বাতাস, আমার প্রাণে বাজায় বাঁশি।


आमार सोनार बांग्ला, आमि तोमाय भालोबासि

चिरदिन तोमार आकाश, तोमार बाताश, आमार प्राणे बाजाय बांशि।

क्या इसमें आपको स्वदेश प्रेम नहीं दिखता....निश्चित रूप से बंगाल की वंदना है इन पंक्तियों में, लेकिन रवीन्द्र देश की बात भी करते हैं...

‘ও আমার দেশের মাটি, তোমার ‘পরে ঠেকাই মাথা।

        তোমাতে বিশ্বময়ীর তোমাতে বিশ্বমায়ের আঁচল পাতা।

        তুমি মিশেছ মোর দেহের সনে, তুমি মিলেছ মোর প্রাণের সনে,

        তোমার ওই শ্যামলবরণ কোমল মূর্তি মর্মে গাঁথা।

        ওগো মা, তোমার কোলে জনম আমার, মরণ তোমার বুকে।’


- ओ आमार देशेर माटि, तोमार परे ठेकाई माथा।

तोमाते विश्वमयीर तोमाते, विश्व मायेर आंचल पाता।

तुमि मिशेछो मोर देहेर सने, तुमि मिलेछो मोर प्राणेर सने,

तोमार ओई श्यामल वरण कोमल मूर्ति मर्मे गाँथा।

ओ गो मा, तोमार कोले जनम आमार, मरण तोमार बूके।

 मातृ भूमि को माँ कहकर कवि गुरु ने अनेक गीत लिखे हैं और मातृभूमि का गौरव गान किया है...कवि विश्व से प्रेम अवश्य करते हैं मगर उनका यह प्रेम देश और मातृभूमि की वन्दना से होकर गुजरता है। एक उक्ति को लेकर उसका सन्दर्भ बिगाड़ देना भी अपराध ही है जो कि तथाकथित बुद्धिजीवी न जाने कब से करते आ रहे हैं। इन पंक्तियों को देखिए -

‘সার্থক জনম আমার জন্মেছি এই দেশে।

        সার্থক জনম, মা গো তোমায় ভালোবেসে।

        জানিনে তোর ধনরতন আছে কিনা রাণীর মতন;

        শুধু জানি আমার অঙ্গ জুড়ায় তোমার ছায়ায় এসে।

        কোন বনেতে জানি নে ফুল গন্ধে এমন করে আকুল,

        কোন গগনে ওঠে রে চাঁদ এমন হাসি হেসে।

        আঁখি মেলে তোমার আলো প্রথম আমার চোখ জুড়ালো,

        ওই আলোতেই নয়ন রেখে মুদব নয়ন শেষে


सार्थक जनम आमार जन्मेछि ऐई देशे

सार्थक जनम, माँ गो तोमा. भालोबेसे

जानिने तोर धनरतन आछे किना रानीर मतन

शूधू जानि आमार अंग जुड़ाय तोमार छाया एशे।

कोन गगने उछे रे चाँद एमन हासि हेंसे।

आँखि मेले तोमार आलो प्रथम आमार चोख जुड़ालो,

ओई आलोतेई नयन रेखे मूदेर नयन शेषे।


रवीन्द्रनाथ जिन्होंने जलियावाला बाग हत्याकांड के विरोध में नाइटहुड की उपाधि लौटा दी...जिन्होंने बंग भंग के विरोध में राखी बन्धन किया...उन रवीन्द्रनाथ को बंगाल और गुजरात में बाँटने चले हैं आप...लज्जा नहीं आती...? रवीन्द्रनाथ वह हैं जो असहमतियों को सम्मान देते रहे...महात्मा गाँधी से भी उनकी असहमतियाँ रहीं मगर एक दूसरे को दोनों ने सम्मान दिया...गाँधी उसी गुजरात से आते हैं जिनकी प्रतिमा के नीचे बैठकर आमरण अनशन होते हैं..आज उसी गुजरात की आलोचना करते आप नहीं थकते। यहाँ न्यूज क्लिक वेबसाइट पर मिले प्रदीप सिंह के एक आलेख का उल्लेख करना भी प्रासंगिक है। लेखक कहते हैं, 'टैगोर और गांधी के विचार, व्यवहार और समझ में जमीन-आसमान का अंतर था। दोनों का यह रिश्ता बराबरी का नहीं एक ‘शिक्षक’ और एक ‘छात्र’ के संदर्भ में है।

टैगोर एक उत्कृष्ट कवि थे जो ‘गुरुदेव’ के नाम से जाने जाते हैं और मोहनदास करमचंद गांधी ‘महात्मा गांधी’ के रूप में लोकप्रिय हुए। आइए हम यह देखते हैं कि आधुनिक भारत के दो महान शख्सियतों को ‘गुरुदेव’ और ‘महात्मा’ का पदनाम कैसे मिला ?


गांधी जी जब भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से गहरे रूप से जुड़े तब यह आंदोलन नेतृत्वहीनता का शिकार था। अरबिंदो घोष और बाल गंगाधर तिलक के राष्ट्रीय आंदोलन से दूर जाने से देश की राजनीति में एक शून्य आ गया था। दरअसल, अलीपुर बम कांड के बाद अरविंदो घोष ने सक्रिय राजनीति से हट कर आध्यात्मिक मार्ग अपना लिया। लंबे समय से स्वराज का अलख लगाते-लगाते तिलक का निधन हो गया था।


इस परिदृश्य का चित्रण करते हुए काकासाहेब कालेलकर लिखते हैं, “एक अंधकारमय और निराशावादी समय”, “भ्रम की एक गहरी अवधि” ने और “निराशा” को जन्म दिया। इसी समय रबींद्रनाथ टैगोर की नजर गांधी पर आकर टिक गयी। जब टैगोर ने इस आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए गांधी को चुना था, तो वह भी केवल इसलिए की उनके सामने उपलब्ध विकल्पों में शायद वह सबसे बेहतर थे।


यह टैगोर ही हैं जिन्होंने गांधी के लिए ‘महात्मा’  शब्द का प्रयोग किया था। टैगोर ने स्पष्ट किया, “‘महात्मा एक स्वतन्त्र आत्मा को संदर्भित करता है जो स्व अब व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं है। यह एक ऐसा स्व है जिसमें सभी शामिल हैं” लेकिन जब टैगोर ने गांधी को ‘महात्मा’ कहा, तो वे अभी तक एक मुक्त आत्मा नहीं थे। इसलिए ‘महात्मा’  शब्द की व्याख्या करते हुए गांधी का वर्णन नहीं था क्योंकि वे उस समय तक ‘महात्मा’ होने के बिंदु पर थे, लेकिन अभी महात्मा बनने के लिए उन्हें अपनी क्षमताओं का और अधिक विकास करना था।गांधी ने टैगोर द्वारा दिए गए इस पदनाम पर खरा उतरने की उम्मीद के बीच अपने को असमर्थ महसूस किया और टैगोर की मदद मांगी। उन्होंने टैगोर को ‘गुरुदेव’ के नाम से संबोधित करते हुए कहा कि यदि वे चाहते हैं  कि ‘गांधी’ महात्मा’ बने तो उन्हें गांधी का ‘गुरु’ बनना होगा। इस प्रकार गांधी का ‘महात्मा’ बनना गांधी और टैगोर का एक संयुक्त प्रयास था।

जब पूना में आमरण अनशन के दौरान गांधी की तबीयत खराब हो गई, तो टैगोर उनसे मिलने के लिए शांतिनिकेतन से पूना पहुंचे थे। जब गांधी ने उपवास तोड़ा, तो उनके सचिव, महादेव देसाई ने टैगोर से गांधी की पसंद की गीतांजलि की एक कविता सुनाने का अनुरोध किया। बाद में टैगोर ने बताया कि गांधी की उपस्थिति में, वह उस धुन को भूल गए थे जिसमें उन्होंने मूल रूप से कविता की रचना की थी, लेकिन फिर भी उन्होंने इसे गाया।

गांधी और टैगोर विचार औऱ व्यवहार के दो भावभूमि पर खड़े थे। लेकिन दोनों का सपना एक था। वह सपना देश को पराधीनता की बेड़ी से मुक्त करके भौतिक संसाधनों से युक्त और आद्यात्मिकता से सराबोर देश बनाना था। साझा स्वप्न को साकार करने के लिए दोनों महापुरुष एक दूसरे के करीब आए। यहां विचार कभी आड़े नहीं आया। लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखा जाए तो महज चुनाव जीतने के लिए विचार परिवर्तन और भिन्न मत रखने वालों पर तीखे हमले किए जा रहे हैं। जबकि दोनों पक्षों का दावा देशहित होता है।'

आपको जिस हिन्दी से शिकायत है...और जिसे लेकर आप अपनी भाषा के प्रति असुरक्षित हो जाते हैं....कवि गुरु ने उस भाषा के महत्व को समझा और यही कारण है कि विश्व भारती में एक हिन्दी भवन भी स्थापित हुआ। रवीन्द्र नाथ कहा करते थे, "शान्ति निकेतन को समस्त जातिगत तथा भौगोलिक बन्धनों से अलग हटाना होगा, यही मेरे मन में है। समस्त मानव-जाति की विजय-ध्वजा यहीं गड़ेगी। पृथ्वी के स्वादेशिक अभिमान के बंधन को छिन्न-भिन्न करना ही मेरे जीवन का शेष कार्य रहेगा।" यही हिन्दी भवन आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का कार्यक्षेत्र रहा...उस हिन्दी को अपमानित करना क्या कविगुरु के विचारों का अपमान करना नहीं है?

अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए टैगोर ने 1921 में शान्तिनिकेतन में 'यत्र विश्वम भवत्येकनीडम' (सारा विश्व एक घर है) के नए आदर्श वाक्य के साथ विश्व भारती विश्वविद्यालय की स्थापना की। विश्वकवि गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर (टैगोर) को मान देते हुए 1935 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय ने उन्हें डी-लिट उपाधि से अलंकृत किया। इस आयोजन के बाद वह प्रयागराज चले गए थे। तब महामना मदन मोहन मालवीय ने स्वयं पत्र लिखकर गुरुदेव को काशी बुलाया था। रवींद्रनाथ टैगोर ने 1888 में छह महीने तक प्रवास किया और यहां का छोटा सा इतिहास भी लिखा। यहीं पर मानसी की अधिकांश कविताएं व नौका डूबी के कई अंश लिखे। उनके प्रवास स्थान पर एक पार्क है। रवींद्र नाथ टैगोर अपने दूर के रिश्तेदार गगनचंद्र राय के यहां गोराबाजार आवास पर ठहरे थे। यहां रहते गुरुदेव की घनिष्टता एक अंग्रेज सिविल सर्जन से हो गई। रवींद्रनाथ अपनी कविताओं का अनुवाद उन्हें सुनाया करते थे। गुरुदेव यहां लार्ड कार्नवालिस समाधि उद्यान में शाम को घूमने जाया करते थे। 

चलिए हमने तो कवि गुरु पर अपनी बात कही....लगे हाथों आप भी बता दीजिए कि आपने प्रसाद, निराला, तुलसी, सूर...कबीर को कितना पढ़ा है...बांग्ला में प्रेमचंद को छोड़कर कितने साहित्यकारों को सम्मान मिलता है,,,,क्या आप भी हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों को वैसे ही सेलिब्रेट करते हैं,,,,जैसे हम रवीन्द्रनाथ को कर रहे हैं,,,,और करते रहेंगे....। मुझे लगता है कि किसी देश का होने के लिए उस देश का जन्म लेना ही काफी नहीं है...उस देश को समझना..और अपना बनाना जरूरी है,...तभी तो सिस्टर निवेदिता, मीरा बेन और मदर टेरेसा से लेकर फादर कामिल बुल्के को हम उतना ही सम्मान देते हैं..। 

आप बात तो विश्व को गाँव बनाने की करते हैं मगर सत्य यह है कि अपनी कुंठाओं के गाँव को आपने दुनिया समझ लिया है। आप चाहते हैं कि आपकी भाषा, आपकी संस्कृति का जयगान हो और आप श्रेष्ठता का दर्प लिये घूमते रहें,.,,,सम्मान एक हाथ से नहीं मिलता,,,सम्मान पाने के लिए पहले सम्मान देना पड़ता है...हमारे लिए कवि गुरु, नेता जी की पहचान इसलिए नहीं है कि वे बंगाल में जन्मे,,,,वह हमारे मन में इसलिए हैं कि उन्होंने खुद को एक क्षेत्र में सीमित नहीं रखा,,,बल्कि इस भारत देश को ,,,समूचे विश्व को अपना लिया....वह कुंठित लोग नहीं थे...नेता जी ने "कोलकाता चलो' का नारा नहीं दिया..."दिल्ली चलो' कहा...इसलिए इस देश के लोकगीतों में वह अब तक बसे हुए हैं....ये लोग आपकी कुंठाओं से बहुत ऊपर हैं...उनको समझना पड़ता है...समझ भाषा, जाति, संस्कृति....क्षेत्र नहीं देखती...देखती तो कार्ल मार्क्स आपके पुरोधा न होते...कवि गुरु बंगाली अस्मिता से अधिक भारतीय वसुधेव कुटुम्बकम के परिचायक हैं,....अब जाते - जाते द्विजेन्द्रलाल राय का एक गीत भी आपके लिए 

- দ্বিজেন্দ্রলাল রায়

ধনধান্য পুষ্পভরা

ধনধান্য পুষ্পভরা আমাদের এই বসুন্ধরা;

তাহার মাঝে আছে দেশ এক- সকল দেশের সেরা;

সে যে স্বপ্ন দিয়ে তৈরি সে দেশ স্মৃতি দিয়ে ঘেরা;

এমন দেশটি কোথাও খুঁজে পাবে নাকো তুমি,

সকল দেশের রানী সে যে-আমার জন্মভূমি।

धनधान्य पुष्पभरा आमादेर एई वसुन्धरा

ताहार माझे आछे देश एक..सकल देशेर शेरा

शे जे स्वप्न दिये तेरि से देश स्मृति दिये घेरा

एमन देशटि कोथाओ खूँजे पाबे नाको तूमि,

सकल देशेर रानी से जे, आमार जन्मभूमि


स्त्रोत साभार - 

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दैनिक जागरण

शुक्रवार, 7 मई 2021

जीता कोई भी हो...हारी तो बस जनता है

 

चुनाव खत्म हो चुके हैं....तीसरी बार तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी ने राज्य की कमान सम्भाल ली है..बड़े जोर - शोर से तृणमूल की जीत का डंका बजाया जा रहा है.....तमाम बड़े और आधुनिक बुद्धिजीवी...कलाकार...खिलाड़ी...पत्रकार...सब के सब दीदी की महिमा गाने में लगे हैं....सही भी है...क्योंकि दुनिया चढ़ते सूरज को सलाम करती है...समय गवाह है कि सत्ता जिसके पास रहती है...लोग वहीं जाते हैं....जाहिर सी बात है...सफलता किसे नहीं अच्छी लगती...जीतने वाले से सब नजदीकियाँ बनाकर रखते हैं...उनके सामने झुकते ही नहीं...चरण वंदना तक करने लगते हैं...लेकिन अपनी आत्मा से पूछिएगा तो....इसमें क्या सचमुच प्रेम है....या आतंक है...और यह आतंक..दोनों ही तरफ से है और बीच में पिस रहे हैं लोग...आम जनता...जिसका कोई अपराध नहीं...अपराध है तो बस इतना कि उसने अपने लोकतांत्रिक अधिकार का उपयोग किया...आधुनिक भारत में आज यही सबसे बड़ा अपराध है...न..मैं किसी का पक्ष नहीं ले रही...पर क्या यह सच नहीं कि तृणमूल ने भाजपा का भय दिखाकर तीसरी बार सत्ता हासिल की है....खासकर मुसलमानों को भाजपा का भय दिखाया...मुसलमानों ने तो भाजपा को रोकने के लिए तृणमूल को चुना ....ध्रुवीकरण की यह राजनीति है....मगर क्या उसके आम मुद्दे...केन्द्र में रहे...लोग भाजपा पर नफरत की राजनीति का आरोप लगाते हैं....लेकिन जितनी घृणा मुझे पढ़े - लिखे...शिक्षित बड़बोले वामपंथियों में दिखती है...उतनी कहीं नहीं....मुझे मेरे कई वामपंथी मित्र (जो मुझे निष्पक्ष पत्रकारिता का पाठ पढ़ाते रहते हैं) ...मेरे व्हाट्सऐप पर भी भारत के हर भाजपा शासित प्रदेश के अपराध की खबरें भेजते रहते हैं लेकिन...एक भी खबर ऐसी नहीं दिखी जिसमें किसी भाजपा कर्मी के साथ हुए अत्याचार की खबर हो...क्यों? कई ऐसे लोग हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कभी समझाते हैं तो कभी एक कदम आगे बढ़ जाते हैं...

हिन्दी के लिए काम कर रही संस्थाओं में वामपंथी चेतना इतनी अधिक सक्रिय है कि वे साहित्य को भी दक्षिण पंथी और वामपंथी खेमे में बाँट देते हैं और उनको ही शिक्षण संस्थानों में पढ़ाया जाता है जो वामपंथी विचारधारा से ओत प्रोत हो और उसकी विचारधारा को आगे ले जाये...आप खुद अव्वल दर्जे के पक्षपाती हैं...आपने बहुत से ऐसे श्रेष्ठ साहित्यकारों को हाशिए पर रखा क्योंकि वे आपकी नजर में संघी हैं...या आपकी विचारधारा से मेल नहीं खाते...आप ऐसे लोगों को दोयम दर्जे का मानते हैं...कोलकाता के लगभग साहित्यिक संगठनों को करीब से देखने का मौका मिला है....पहले समझ नहीं पाती थी मगर अब जब देख रही हूँ तो फिर वहाँ रहने का कोई मतलब नहीं बनता...तो दूरी बना ली...क्यों मैथिलीशरण गुप्त, गोपाल सिंह नेपाली, सुभद्रा कुमारी चौहान...रहीम..रसखान...आचार्य चतुरसेन शास्त्री..अमृतलाल नागर, भगवती चरण वर्मा, विमल मित्र..माखनलाल ततुर्वेदी...कन्हैया लाल माणिकलाल मुंशी.. सियाराम शरण गुप्त, सोहनलाल द्विवेदी,...आचार्य चन्द्रबली पांडेय... जैसे साहित्यकार आपके पाठ्यक्रम से बाहर हैं...।

आज हिन्दी साहित्य के कई विद्यार्थी इनका नाम तक नहीं जानते...जिन आचार्य विष्णुकांत शास्त्री ने कलकत्ता विश्वविद्यालय को अपना जीवन दे दिया आज उसके हिन्दी पाठ्यक्रम में भी उनके लिए जगह नहीं...सबसे बड़े पक्षपाती और एकांगी दृष्टिकोण रखने वाले लोग दूसरों को फासिस्ट कहते हैं तो हँसी के अतिरिक्त और कुछ नहीं आती। आखिर हिंसा के खिलाफ ऐसे बुद्धिजीवियों ने आवाज नहीं उठाई...गौरी लंकेश को लेकर रोने वाले...अपने ही राज्य में हो रही मौतों पर इसलिए मौन साधे रहे क्योंकि यहाँ इनके हाथ से मलाई निकल सकती थी...क्या आपको अधिकार है कि आप नैतिकता की बात करें?

इस चुनाव में जगह - जगह पोस्टर लगाये गये...बीजेपी के वोट दिबेन ना....क्या यह जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन नहीं है...और वे होते कौन हैं हमको बताने वाले कि हमें किसको वोट करना है और किसको नहीं...इस चुनाव में आम आदमी ने स्वेच्छाचारिता और मनमानी की हदें पार होती देखीं...बंगाल की अभिजात्य जनता ने भारतीय होने से अधिक जरूरी बांगाली होना समझा...मगर यह बांगाली होना क्या है...हमारी नजर में भारत में रहने वाले हर नागरिक को जिस तरह भारतीय कहते हैं...वैसे ही बंगाल में रहने वाला हर नागरिक बंगाली ही है..मगर यहाँ इस पहचान को क्षेत्रीयता से जोड़ा गया....आए दिन यूपी - बिहार - झारखंड के लोगों को गुंडा कहा जाता है...और हिन्दी भाषी लोग पलक पांवड़े बिछाए अपनी हताशा को खुशी में बदलने की कोशिश कर रहे हैं...।

इस बार के चुनाव में 'खेला होबे' और 'जय बांग्ला' का नारा दिया गया....और इसमें आपको कुछ भी गलत, अभद्र या धमकी देने वाला नहीं लगा....जो बंगाल अपने मंचों पर भी बॉलीवुड संगीत और डीजे बर्दाश्त नहीं करता...अपनी संस्कृति की दुहाई दिया फिरता है....वहाँ यह स्लोगन ...बाकायदा डीजे के साथ विरोधियों को धमकाने के लिए दिया गया औऱ बंगाल के वामपंथी समाज और हिन्दी के रीढ़विहीन समाज को इसमें कुछ भी बुरा नहीं लगा? 

बंगाल की जनता के पास चयन था कहाँ...एक तरफ आतंक तो दूसरी तरफ निरंकुश रूढ़िवादी लोग...जो स्त्री को नियंत्रित करने में अपनी ताकत झोंकते रहे...जो विकास की बात नहीं करते बल्कि यह बताते कि महिलाओं को क्या पहनना चाहिए..क्या नहीं...लव जेहाद के खिलाफ क्या करेंगे...क्या आपको लगता है कि जनता को इसकी जरूरत है...21वीं सदी के भारत को 8वीं सदी का शासन नहीं चाहिए..फिर वह बंगाल हो या उत्तर प्रदेश हो...मगर ममता यह शासन किसके भरोसे देने वाली हैं,,,अपने बेलगाम युवा कार्यकर्ताओं के भरोसे.....? इस लिहाज से तो एबीवीपी भी पीछे नहीं..आपने अपने स्वार्थ के लिए युवाओं को अपराधियों में बदल दिया...पर आप उनको कैसा भविष्य देने वाले हैं...यह भी जानना जरूरी है...राम को रंग किया जाएगा...क्या यह तुष्टिकरण की राजनीति भाजपा और तृणमूल की तारणहार हो सकेगी।

मर रहा है तो आम आदमी मर रहा है...घरों में उसके आग लग रही है,..दुकानें उसकी जल रही हैं...कोरोना के खतरे को धता बताकर भाजपा और तृणमूल के रैली उत्पात ने बंगाल के आम आदमी को मौत का उपहार दिया है...। दीदी जिस बिहारी से नफरत करती हैं...आज उसी बिहारी की बदौलत तीसरी बार कुर्सी पर बैठी हैं।

इस मामले में अगर सबसे अधिक फायदे में रहा तो वह हैं प्रशांत किशोर...उनको भाजपा से और जद (यू) से बदला लेना था और अब बंगाल में उनकी राजनीतिक जमीन तैयार होगी...प्रशांत किशोर को सब कुछ पता था मगर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और तथाकथित प्रोफेशनल जिद में उन्होंने बंगाल की जनता को दांव पर लगा दिया.. मुसलमानों के मतों का ध्रुवीकरण करने वाले प्रशांत किशोर ही थे...वह जानते हैं कि यूपी - बिहार और झारखंड के लोगों को लेकर तृणमूल का रवैया क्या है....इसके बावजूद उन्होंने अपने फायदे के लिए सबका भविष्य,  सबकी जिन्दगी दाँव पर लगा दी। उनको जलते बंगाल की आग से ,.,..,खून से कोई फर्क नहीं पड़ता...प्रशांत किशोर जी ...अब इन लाशों पर चलकर राज्य सभा जायेंगे...और उनके साथ यशवंत सिन्हा भी हैं...,मुबारक हो ...नेता ऐसे ही होते हैं....गलती हमारी थी...हमने आपको मनुष्य समझ लिया था।

पर एक बात...आप कब तक ऐसी पार्टी को बचाएंगे जिसमें सिर्फ एक ही व्यक्ति है...जिसने कभी किसी को पनपने ही नहीं दिया,....समय सबका आता है...सबका समय बदलता है...इतिहास भी बदलता हैं...यह उत्थान काल है तो पराभव भी साथ ही है....बंगाल आपके लिए एक सीढ़ी है...और राजनीति की शतरंज पर आपने तृणमूल को मोहरा बनाकर अपना बदला पूरा किया...क्या आपको आधुनिक द्रोणाचार्य कहा जाए...आप खुश हैं....आपकी रणनीति काम कर गयी....आप चाणक्य कहे जा रहे हैं ...क्या आप वाकई खुश हैं...तो संन्यास किसलिए लिया...हाँ....रक्त से जो जमीन आपने सींची है...उसकी फसल तो आप काटेंगे ही...भावी राज्यसभा सांसद ...एक बिहारी...लेकिन...बस इतिहास आपको जयचंद की तरह ही याद रखेगा...अगर बिहारियों के साथ किसी भी तरह की बदसलूकी होती है और बिहारी ही क्यों....बंगाल में होने वाली हर हिंसा के जिम्मेदार आप होंगे और हमारी नजर में आप जयचंद ही हैं.,..एक द्रोही...और कुछ नहीं। हम बंगाल के बिहारी आपका यह उपकार कभी नहीं भूलेंगे।

मंगलवार, 4 मई 2021

कविगुरु और आपकी आत्ममुग्धता के आगे भी एक दुनिया है

क्या हिन्दीभाषियों पर खुद को सत्ता के प्रति समर्पित साबित करने का दबाव है...क्या वे खुद को बंगाली से भी अधिक बंगाली साबित करने में लगे हैं...और इसके लिए वे किसी भी हद तक जा रहे हैं...सोचते - सोचते अब इस नतीजे पर पहुँचना पड़ रहा है कि ऐसा ही है और यह बीमारी पढ़े - लिखे बुद्धिजीवी वर्ग में अधिक है....यह असहज ही नहीं बल्कि नकली भी है...सोच का दायरा सिर्फ बंगाल तक सिमट गया है और क्योंकि सत्ता को खुश करना है तो उसके हर विरोधी पर अपनी कुंठा के तीर चलाए जा रहे हैं....एक समय था जब वाम का जोर था...आज बंगाल का हर दूसरा युवा वाम विचारधारा को वहन करता जा रहा है और राम उसके लिए एक अवशब्द लगने लगे हैं....बात व्यक्तित्व की हो तो भी अगर कोई विरोधी विचारधारा का मिल जाये तो लोग इनबॉक्स में जाकर भी उस पर अपना क्रोध निकालते हैं, उसे प्रभावित करने या नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। खुद में 72 छेद हों मगर सामने वाले के सामने अकड़ ऐसी कि पूछिए मत...अपमानजनक मीम साझा करने में कोई पक्ष पीछे नहीं है...हम समझते थे कि यह रोग बच्चों तक सीमित होगा मगर कई बच्चों के अभिभावक भी यही सब करने लगें तो उनको खुद से पूछना चाहिए कि वे नयी पीढ़ी को क्या सिखा रहे हैं...

राजनीतिक विचारधारा कुछ भी हो...मगर सोशल मीडिया के दौर में आपका अभद्रता में लिपटा शालीन व्यवहार भी आपकी पोल खोलने के लिए काफी है। इस लम्बी भूमिका के पीछे भी एक कारण है...पीएम साब की दाढ़ी...जिसको देखकर भद्र लोक से लेकर भद्र लोक में अपनी गिनती करवाने को व्याकुल हिन्दी समाज को मिर्च लगी है क्योंकि उनको लगता है पीएम रवीन्द्रनाथ बनने का प्रयास कर रहे हैं। 

रवीन्द्रनाथ बड़े कवि हैं...बंगाल के लिए तो बहुत बड़े पर क्या इसका मतलब यह है कि वह इतने अनुकरणीय हैं कि कोई व्यक्ति अपनी पूरी जीवन शैली अपना पहनावा बदल दे...वह भी ऐसे व्यक्ति के लिए जिसे वह ठीक से जानता भी नहीं है...रवीन्द्रनाथ बंगाल की शक्ति हैं तो बंगाल की सीमा भी रवीन्द्रनाथ ही हैं। जिस धरती पर चैतन्य महाप्रभु, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, खुदीराम बोस जैसी अंसख्य विभूतियाँ हों...वहाँ कोई सिर्फ रवीन्द्रनाथ को क्यों चुनेगा...कम से कम हम जैसे लोग तो कतई नहीं चुनेंगे...

बंगाल की पूरी दुनिया ही इसी आभामण्डल में सिमटी है...आत्ममुग्धता के भंवर में फँसा बंगाली समाज इस मरीचिका से बाहर निकलना ही नहीं चाहता। उसने बंकिम चन्द्र, शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय, ताराशंकर बन्द्योपाध्याय जैसे लेखकों को रवीन्द्र बरगद के नीचे दबा दिया। बेटी को माँ कहने वाले समाज ने बेटी को सम्मान तो खूब दिया मगर उसके अधिकारों की रक्षा करना उसे याद नहीं रहा। अगर ऐसा होता तो स्वर्ण कुमारी देवी, सरला देवी चौधरी, बेगम रुकैया, प्रीतिलता वादेदर, कादंबिनी गांगुली की जयंती धूमधाम से मनती,,,जैसे कविगुरु की मनती है..।

ये किस दृष्टिकोण से आपको रवीन्द्रनाथ ठाकुर का अनुकरण लगा...?

तृणमूल में एक ही महिला केन्द्र में है..,मगर उसने मशक्त युवा नेत्रियों को खड़ा नहीं किया। छात्र संगठनों के पास कद्दावर छात्राएं नेतृत्व के लिए नहीं हैं। माकपा और कांग्रेस जैसे दलों में स्त्रियाँ हाशिए पर ही हैं और जो हैं..उनके पास अपनी आवाज नहीं है...

किस बात का अहंकार है आपको...आत्म मुग्धता के जाल में फँसे वामपंथी इतिहास याद करते लोगों खासकर युवाओं को अहंकार किस बात का है..? पर बात दाढ़ी की...तो आपको रवीन्द्रनाथ ही याद क्यों आए...ठाकुर रामकृष्ण परमहंस याद आते...गुरु नानक को याद कर लेते...ऋषि परम्परा को याद कर लेते...कबीर...गुरु गोविन्द सिंह को याद कर लेते...जो लोग पद और पुरस्कार के लालच में रातों - रात अपनी विचारधारा बदल लें...पूँजीवाद को गरियाते हुए उसी के चरणों में लोटने लगे तो ऐसे रीढ़विहीन लोगों से उम्मीद क्या की जाए। हिन्दीभाषी बुद्धिजीवियों पर तो सिर्फ तरस ही खाया जा सकता है। जो लोग कोरोना और प्रोटोकॉल को लेकर पीएम पर ताने कस रहे थे...आज तृणमूल के उत्पात और राज्य में चुनाव के बाद होने वाली हिंसा पर मौन हैं। बंगाल जल रहा है और आप नीरो की तरह बाँसुरी बजा रहे हैं...धिक्कार है आप पर।

ममता अगर मदर टेरेसा से प्रभावित हैं तो यह अपराध नहीं है तो पीएम की दाढ़ी में दिखते रवीन्द्रनाथ से इतना भय क्यों है..जबकि पीएम मोदी ...रवीन्द्रनाथ से नहीं...नाना जी देशमुख से प्रभावित हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन समाज सेवा में लगा दिया....बहुतों ने तो नाम भी नहीं सुना होगा.....मगर सत्य तो यही है कि कविगुरु के आगे भी एक दुनिया है और हर किसी को रवीन्द्रनाथ अनुप्राणित करते हों,. यह जरूरी नहीं है। 

शनिवार, 1 मई 2021

या मानवी सर्व भूतेषू - भाग -2 - मानवी का पत्र

 


ईश्वर के नाम खुला पत्र, 

  दयालु, करुणा निधान, भोले -भण्डारी...कृपा सिन्धु कहे जाने वाले ईश्वर....यह तुम्हारी ही सन्तान का पत्र है....जिसे तुमने ही एक उद्देश्य से धरती पर भेजा है....धरती को सन्दर बनाने का उद्देश्य है....तुम्हारा ही अंश हूँ मैं....वह धरती...जिसे तुमने रचा है और आज जिसके प्रति तुम निष्ठुर हो चले हो....वह भी तुम्हारी ही रचना है...तुम्हारी ही एक प्रिय सन्तान ठाकुर रामकृष्ण परमहंस ने कहा था...जतो मत...ततो पथ...मैं कट्टर नहीं हूँ...जो धरती तुम्हारे प्रकोप से कराह रही है...उस धरती की सभी सन्तानें भी बुरी नहीं हैं...मेरे लिए धर्म एक ही है मानवता....सन्तान को गढ़ना तो माता - पिता का काम है.....धरती का यही नियम है...सन्तान....अच्छी हो या बुरी हो....उसे मार्ग दिखाना...उसके सिर पर हाथ रखना तो उनका ही दायित्व है.....जब तुमने उसे ही बनाया है तो हे ईश्वर....उसके पाप - पुण्य, उसके सभी कर्म - दुष्कर्म का भागी भी तुमको ही बनना चाहिए...आज धरती पर जो हो रहा है, उसका कारण क्या तुम्हारी उदासीनता नहीं है....कैसे अभिभावक हो तुम प्रभु...जिसने बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दिया और सुध तक नहीं लेती है....माता - पिता की नजर अपने बच्चों पर रहती है और तुमने उस धरती से मुँह मोड़ लिया...जो तुम्हारी ही रचना है...जिसके मोह में पड़कर तुम धरती पर आते रहते हो...क्या उस धरती के प्रति तुम्हारा कुछ दायित्व नहीं है...अन्तर्यामी हो प्रभु...हम सबके मन में क्या चल रहा है...तुम सब जानते हो....माता -पिता रुष्ट होते हैं...डाँटते हैं...तुम डाँट चुके....थोड़ा पीटते भी हैं....तुम पीट भी चुके...पर माता - पिता सन्तान की गलती पर उसके प्राण थोड़ी न छीनते हैं......मगर तुम तो वही कर रहे हैं....जब बच्चे ही नहीं होंगे तो तुमको माता - पिता कहेगा कौन....

हे महादेव....तुम्हारी ही ज्योति से जन्मी हूँ मैं.....याद है न आपको.....आपका कैलाश पर्वत इसी धरती पर है......क्या इस भारत भूमि और समस्त सृष्टि का ऋण तुम पर नहीं है? भारत भूमि की काशी आपके ही त्रिशूल पर टिकी है, आप अपनी ही नगरी उजाड़ने में लगे हैं....यह कैसा क्रोध प्रभु...हे माता विन्ध्यवासिनी...जय माँ शेरावाली कहकर....आपके भक्त अनगिनत कष्ट सहकर आपके द्वार चले आते हैं...कई तो बीच में ही चले जाते हैं....क्या इनकी दुर्दशा देखकर आपका हृदय नहीं पसीजता....शिव - शक्ति आखिर धरती की दुर्दशा कैसे देख रहे हैं....जिसे करुणा चाहिए...उसे आप क्रोधाग्नि में जला रहे हैं....आखिर क्यों.....? क्या धरती का संरक्षण आप सबका दायित्व नहीं है....? 

संसार में जो होता है...आपकी इच्छा से होता है...जब आपकी इच्छा के बगैर एक पत्ता तक नहीं हिल सकता है तो सृष्टि में जो गलत हो रहा है...उसका भागी सिर्फ मनुष्य कैसे....आप अपने दायित्व से पीछे कैसे हट सकते हैं...और यही स्थिति रही तो क्या कोई विश्वास के साथ कह सकेगा कि 'चिन्ता की बात नहीं....ईश्वर हैं न...सब सम्भाल लेंगे? ' अपने बच्चों की श्रद्धा, उनका विश्वास, उनकी निष्ठा...उनका समर्पण....उनका परिश्रम...क्या आपके लिए कोई मायने नहीं रखता? एक बार धरती का दुःख तो समझ लेते....आपकी एक सती ने प्राण त्यागे थे तो आपने समूची सृष्टि में तांडव मचा दिया था...आज मनुष्य मर रहा है...वह किसके समक्ष तांडव करे...प्रभु भय से कुछ नहीं होता....न प्रीति होती है....न श्रद्धा जन्म लेती है....अगर भक्ति का मापदंड करुणा, प्रेम..श्रद्धा न हो तो वह बेकार है....क्या मेरे प्रभु इतने निष्ठुर और कमजोर हैं कि उनको अपनी सत्ता जताने के लिए विनाश की आवश्यकता पड़े?  मैं नहीं मानती.....आप सक्षम हैं.....आप सृष्टि के रचयिता हैं....अपनी इतनी सुन्दर रचना को ....नष्ट होते आप नहीं देख सकते....देखना चाहिए भी नहीं है...क्योंकि सृजन का एक छोटा सा बीज प्रलय की विकरालता पर भारी है....

माँ सरस्वती भी तो सृजन का मंत्र देती हैं....इसी सृजन से ही तो धरती और सुन्दर हुई है...संगीत, नृत्य, श्लोक, प्रतिमाएं, चित्र, ये सब तो मनुष्य ने ही गढ़े हैं...आपकी दृष्टि उसकी रचनात्मकता पर क्यों नहीं पड़ी....आपकी ही महिमा का बखान है....हर जगह....लोग कण - कण में आपको देखते हैं...उनके सृजन में कला के प्रति प्रेम ही नहीं बल्कि दृढ़ विश्वास भी है....क्या इस विश्वास की रक्षा करना आपका दायित्व नहीं है....? हे सृष्टि के पालक विष्णु....माता लक्ष्मी....आपका क्षीरसागर इसी धरती पर है.....हे राम.....आप तो राजा राम ....हैं....राम राज्य का उदाहरण दिया जाता है....अपनी अयोध्या को संकट में कैसे छोड़ सकते हैं.....हे कृष्ण....आपकी मथुरा....वृन्दावन....द्वारिका....सब आपकी राह देख रहे हैं....माँ काली तो हमारे पास ही वास ही करती हैं....क्या आप अपने बच्चों की रक्षा नहीं करेंगी माते....? माता लक्ष्मी...दीपावली पर अपने बच्चों का उत्साह तो आप देखती ही होंगी...आपके होते हुए आपके बच्चे भूखे मर रहे हैं....मैं तो देवत्व की तमाम परिभाषाओं को देखकर सोच में पड़ जा रही हूँ...यहाँ मानव बुरा है तो वह मानवता के लिए अपने प्राण भी दे रहा है..नैतिकता और मानवता के मापदंड ईश्वर के लिए अलग और धरती और धरतीवासियों के लिए अलग हों...यह तो हो नहीं सकता न.....

आप प्रलय लाकर भी देवता हैं और धरती पर मनुष्य के प्राणों की रक्षा करने वाले मनुष्य के योगदान का कुछ भी मूल्य नहीं....प्रश्न तो हमको आपसे करने चाहिए...अपने - अपने कार्यों के बाद धरती को बगैर सुरक्षा के आपने छोड़ कैसे दिया...? क्या धरती का निरन्तर संरक्षण आपका दायित्व नहीं था? अगर मनुष्य ने कुछ गलत किया तो उसे आरम्भ में ही आपने क्यों नहीं रोका...? बहुत से देवता, ऋषि - मुनि ऐसे हैं जिन्होंने छल - प्रपंच का सहारा लिया....मगर वे पूजे जाते हैं....अगर यह सही है तो मनुष्य पूजनीय क्यों नहीं हो सकता? क्या धरती वालों से भक्ति प्राप्त कर...अपने महिमा मंडन पर सन्तुष्ट हो जाना ही देवत्व है और यही मनुष्य करे तो वह उसका अहंकार बन जाता है...? 

मैं बहुत नासमझ हूँ...मैंने ईश्वर को परम पिता परमेश्वर कहा है...माताओं में माँ को देखा है....बच्चा अपने माता - पिता से शिकायत न करे तो किससे करे...कहाँ जाये...?  आप यह विनाशलीला बन्द करें....तब तो सृजन का कार्य आगे बढ़े...पहले अपनी क्रोधाग्नि से मेरी धरती मइया को मुक्त करेंगे तभी तो उनकी हरितिमा वापस लौटेगी....मक्का - मदीना....जेरुसलम....ननकाना साहब.....सारी दुनिया में आपके अलग - अलग रूप पूजे जाते हैं पर मैं तो भारत भूमि से हूँ...वहीं भारत भूमि .....जहाँ आपने असंख्य अवतार लिए...लीलाएं कीं....बताया कि वसुधैव कुटुम्बकम होता क्या है.....क्या उस वसुधा के प्रति उस भारत भूमि के प्रति आपको लेश मात्र भी मोह नहीं....जरा सा भी प्रेम नहीं हैं....वह हमारी ही नहीं आपकी भी मातृभूमि है.....जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी....

आप ही तो कहते हैं....यदा - यदा हि धर्मस्य......तो हम आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं....अब बहुत हुआ....यह तांडव समाप्त कीजिए....वरना ऐसा न हो....आपके प्रति विश्वास रखने वाला ही कोई न हो क्यों भक्त को ईश्वर चाहिए तो ईश्वर को भी भक्त चाहिए...अगर संतान को माता - पिता चाहिए तो माता - पिता को भी सन्तान चाहिए....अब अपना वरद हस्त धरती माता पर रखिए....इतना गुस्सा ठीक नहीं ...मान जाइए....मनाने वाले रूठ गये तो बड़ी दिक्कत होगी फिर....कहे देते हैं....सुन रहे हैं न आप लोग....आइए....हम सब आपकी करुणा की प्रतीक्षा में हैं....जीवन का रस धरती पर बरसाइए...कि सृजन का रथ चलता रहे.....।

मानवी

आप सबका अंश और उससे पहले धरतीपुत्री


मानवी पत्र के उत्तर की प्रतीक्षा में है....धरती पर हो रहा करुण - क्रन्द्रन....वायरस के कारण हो रहे मृत्यु तांडव ने उसे विवश कर दिया था कि अब वह अपनी बात कहे...उसने कहा और एक कागज उसे पैर के पास पड़ा मिला...

प्रिय पुत्री मानवी,

प्रसन्नता है कि तुम अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित हो...देखो...बहुत कुछ करना बाकी है...तो विश्राम नहीं, अब श्रम के लिए तैयार रहो...धरती की चिन्ता मत करना...अब सब ठीक होगा..।

निर्माण, पालन और विध्वंस...यही तो सृष्टि के नियम हैं..पुराने पत्ते झड़ते हैं तभी तो वसन्त आता है...बुरा बीतता है तो अच्छा होता है....अंधकार के गर्भ में ही तो प्रकाश छिपा होता है...। रात बीतती है तो भोर होती है...तुम वही भोर हो...।

हमने कभी नहीं चाहा कि आडम्बर से हमें पूजा जाये या कोई भय के कारण कोई हमारी आराधना करे...अगर भय भक्ति का कारक है तो इससे अधिक शोचनीय....और लज्जास्पद तो कुछ हो ही नहीं सकता...। हम तुम्हारी इस बात से सहमत हैं कि प्रत्येक देवी - देवता एक जैसे नहीं तो मनुष्य भी सारे एक जैसे नहीं हैं...नियम तो फिर नियम हैं...अगर ध्यान से देखोगी तो पाओगे कि हर एक अवतार में देवी - देवताओं ने भी अपने कर्म फल को स्वीकार किया है...मनुष्यों की तरह की सुख - दुःख का जीवन जीया मगर यह हम मानते हैं कि धरती का संरक्षण सिर्फ मनुष्यों का ही दायित्व नहीं...अपितु हमारा भी है...निरंतर संरक्षण हमारा दायित्व है....धरतीवासियों की पीड़ा अब समाप्त होगी। हम...तुम्हारी और हमारी धरती को स्वस्थ कर रहे हैं...। हम अपना दायित्व निभायेंगे, निभा रहे हैं...तुम अपना दायित्व निभाओ...हमारा संरक्षण....स्नेह...प्रेम...समस्त भावनाएं तुम्हारे साथ हैं....

विजयिनी भव

समस्त देवलोक परिवार