बुधवार, 21 सितंबर 2016

हिन्दी को बोलियों से नहीं साहित्यिक साम्राज्यवाद फैलाने वालों से खतरा है


डॉक्टर दो तरह के होते हैं, एक वे जो चाहते हैं कि मरीज में उत्साह बना रहे और वह जल्दी से जल्दी ठीक हो जाए और दूसरे वे जो चाहते ही नहीं है कि मरीज को पता चले कि वह ठीक हो गया है वरना उनकी डॉक्टरी का भट्टा बैठ जाएगा, बेचारे बेरोजगार हो जाएंगे। हिन्दी की समस्या यही है कि हिन्दी के कई विद्वान और आलोचक चाहते ही नहीं हैं कि हिन्दी आम जनता तक पहुँचे वरना उनकी दुकानदारी बैठ जाएगी। वह कभी भाषा की शुद्धता को अडंगा बनाते हैं तो कभी बोलियों के अलग होने से डरते हैं मगर उनको यह अब मान लेना चाहिए कि हमारी भाषा और हमारी संस्कृति किसी विश्वविद्यालय, संस्थान, आलोचना या गोष्ठियों की सम्पत्ति नहीं है। वह आम भारतीय की भाषा है, फिर वह एक रिक्शेवाला बोले या पान की दुकान चलाने वाला या दक्षिण भारत में कोई डोसा बेचने वाला और वह हिन्दी ऐसे ही बोलेंगे जैसे आप हिन्दी मिश्रित अँग्रेजी बोलते हैं मसलन कॉलेज और कालेज और ऑफिस को आफिस। क्या आपके गलत बोलने से अँग्रेजी को क्षति पहुँची? नहीं, क्योंकि आप खुद ही मान रहे हैं कि अँग्रेजी विकसित हो रही है तो जो गलत हिन्दी बोल रहा है, उसे सुधारने में आप उसका सहयोग कर सकते हैं मगर आपको यह कहने का अधिकार नहीं है कि हिन्दी नहीं आती, मत बोलो। केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो गायकी का शौक लेकर मुंबई गए तो उनकी बांग्ला वाली हिंदी सुनकर अपने को हजारी प्रसाद द्विवेदी मानने वाले साथी गायक मज़ाक उड़ाते थे. चंदा रे चंदा रे कभी तो ज़मीं पे आऔर भारत हमको जान से प्यारा हैगाने वाले हरिहरन की हिंदी बोलने की काबलियत पर पहला सवाल इसलिए खड़ा हुआ कि वो दक्षिण भारत से हैं।
तो हे हिंदी को अपनी जागीर समझने वालों ! भारत में हिंदी किसी की भी पहली भाषा नहीं है, कोई हरियाणवी है जो खींचना को खेंचणा कहता है, कोई पंजाबी है जिसकी भाषा में राजमार्ग को राजमारग ही कहा जाता है, कोई बंगाली है जो संभव को शोंभव बोलता है. हिंदी हम सबकी है और बराबर है. सड़क को सरक बोलने वाले बिहारी की भी उतनी ही है जितनी मेरी बेटी अभी स्कूल जाएगाबोलने वाले असमिया की।
हमारी भाषाओं के लिए कितने शर्म की बात होती है कि ग़लत अंग्रेज़ी बोलने वाले को तो हम मुहं बाएं ऐसे देखते हैं जैसे प्लासी में रॉबर्ट क्लाइव आ गया हो और हिंदी पर कोई अपना रंग चढ़ाना चाहे तो चाहते हैं कि बस आह उसका तपता बदन उत्सलीला का नव अभिनंदन थालिखने वाले कवियों की तरह बोले.
अगर आप चाहते हैं कि दीपा कर्मकार अंग्रेज़ी पत्रकारों को भी अंग्रेज़ी की बजाय हिंदी में ही इंटरव्यू देती रहें, किसी मोतिहारी वाले को मैसूर में भाषा की दिक्कत न हो, ज्यादा से ज्यादा भारतीय एक सांझी भाषा में स्वाद लें, खुशिया बांटे तो सबको हिंदी बोलने दें, अपने-अपने रंग-ढंग में. टैबलेट कम्प्यूटर को गोली कम्प्यूटर लिखने वाली सरकारी संस्थाओं को नहीं, लोगों को तय करने दें कि हिंदी क्या है. देश की हर एक ज़ुबां मिलती है तभी तो हिंदी बनती है। अगर आपको हिन्दी से प्रेम है तो आपको भाषा के समग्र विकास पर ध्यान देना होगा। अब सवाल इस राज्य में सैकड़ों हिन्दी माध्यम स्कूल हैं और कॉलेज भी हैं मगर उनकी संरचना गत समस्या है, अधिकतर हिन्दी की रोटी खाने वाले अपने बच्चों को अँग्रेजी माध्यम स्कूल या कॉलेज में पढ़ाते हैं मगर आपने क्या हिन्दी माध्यम स्कूलों की संरचना को मजबूत करने के लिए आवाज उठाई। आप हिन्दी को पाठ्यक्रम में हटाने पर सवाल उठाते हैं मगर क्या आपने जवाब माँगा संबंधित काउंसिल या बोर्ड से, कि ऐसा क्यों है या कभी इतनी हिम्मत की कि जिस स्कूल में हिन्दी की उपेक्षा की जाती हो, वहाँ आप अपने बच्चों को नहीं भेजेंगे। हर कॉलेज अपने पूर्व छात्रों को याद करता है, क्या कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग ने आज तक ऐसा कोई आयोजन किया या फिर क्या आज तक विश्वविद्यालय की वेबसाइट अपडेट भी की गयी है कि आपके विभाग की गतिविधियाँ आम जनता तक पहुँचे। हिन्दी का हर संगठन अपने तरीके से काम करता है मगर हिन्दी में इतनी एकता क्यों  नहीं है कि पाँच संगठन एक साथ मिलकर कोई बड़ा काम करें। आप बोलियों के विकास को रोककर हिन्दी का विकास करेंगे? अव्वल तो यह एक स्वार्थी और मध्ययुगीन मानसिकता है कि आप अकेले न रह जाएं इसलिए अपने बच्चों को बड़ा नहीं होने देंगे और आप अगर ऐसा करते भी हैं तो भी आपके हाथ कुछ नहीं आने वाला क्योंकि किसी को दबाकर जब कोई अपना विकास करता है तो उसे प्रेम कभी नहीं मिल सकता। अगर आप अपने बरगद के लिए जबरन बोलियों को बोनसाई बनाएंगे तो बोलियाँ विद्रोह करके हिन्दी से दूर चली जाएंगी और जब मन में खटास हो तो घरवापसी कभी नहीं होगी। आप इतने असुरक्षित हैं कि आपको संख्या बल की जरूरत है, आपमें इतना आत्मविश्वास क्यों नहीं है और इतनी शक्ति क्यों नहीं है कि आपके प्रेम में इतना जोर हो कि बोलियों के विकास को प्रश्रय दें, और हृदय के स्नेह के बल पर हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दें। संख्या बल से कभी प्रेम नहीं मिल सकता और मिलेगा तो वह कभी स्थायी नहीं होगा। जबरन आप बच्चों को साथ तो रख नहीं सकते, बोलियों को साथ रखेंगे? अगर रख सकते हैं तो दिखाइए। आप जानते हैं कि इसी मानसिकता के कारण आज परिवार भी टूट रहे हैं और भाषा भी बिखर रही है। हिन्दी को आप जबरन रास्ते का काँटा बनाएंगे तो आप उसे बोलियों का शत्रु बना रहे हैं और साजिश यही है क्योंकि जब हिन्दी कमजोर रहेगी तो आपकी गाड़ी भी चलती रहेगी मगर ऐसा नहीं होगा। हिन्दी को खतरा बोलियों को आँठवीं अनुसूची में शामिल होने से नहीं है बल्कि आपकी इस मानसिकता से है कि आप तो जीएंगे मगर दूसरों को मरने के लिए छोड़ देंगे। हिन्दी के कई शब्द अँग्रेजी को अपनाने पड़े हैं, गूगल को आज प्रेमचंद जयंती मनानी पड़ रही हैं, यह हिन्दी की ताकत है। डिस्कवरी चैनल को हिन्दी को विकल्प के तौर पर रखना पड़ रहा है, यह बाजार की माँग है और बाजार की माँग हिन्दी है। अगर भोजपुरी में स्पाइडर मैन आया और उसे सराहा जा रहा है तो उससे आपको क्यों तकलीफ हो रही है। हिन्दी को खतरा ऐसे कवियों से है जिनकी अश्लील कवितता को हमेशा एक औरत की देह की जरूरत पड़ती है, हिन्दी को खतरा ऐसे अधिकारियों से है जो अनुदान लेते हैं मगर कार्यालयों के बाहर हिन्दी के गलत साइनबोर्ड हटाना अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते। हिन्दी को खतरा पैदा हो रहा है। यह थीम शाश्वत सी बन चली है। लेकिन तथ्य एकदम अलग बात कहते हैं। तथ्य यह है कि हिन्दी लगातार बढ़ रही है, फैल रही है और वह विश्वभाषा बन चली है। उसकी 'रीच' हर महाद्वीप में है और उसका बाजार हर कहीं है। हमारी फिल्मों के गानों के एलबम अमेरिका, अफ्रीका, एशिया, योरप कहीं भी मिल सकते हैं और फिल्में एक साथ विश्व की कई राजधानियों में रिलीज होती हैं। भारतवंशी हिन्दी मूल के लोग दुनिया के हर देश में रहते हैं और उनकी हिन्दी इस हिन्दी जैसी ही है। कहीं-कहीं उसकी लिपि रोमन है लेकिन हिन्दी सर्वत्र नजर आती है। चीनी भाषा के बाद दूसरी भाषा हिन्दी नजर आती है, ऐसे आंकड़े कई विद्वान दे चुके हैं। अब तो अमेरिकी प्रशासन अपने यहां हिन्दी को सिखाना चाहता है। ओबामा भारत आते हैं तो नमस्ते कहते हैं, जापान के प्रधानमंत्री आते हैं और वाराणसी के घाट पर बाकायदा आरती करते हैं और आप रो रहे हैं कि हिन्दी खत्म हो रही है। अगर आज जयललिता बिहार से उम्मीदवार उतारती हैं तो वे लाख हिन्दी से नफरत करें, बोलनी तो उनको हिन्दी ही होगी, राष्ट्रीय दर्जा पाना है तो आप हिन्दी को नजरअंदाज नहीं कर सकते, अगर करेंगे तो अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मारेंगे और यही कारण है कि कैनन से लेकर मारुति तक और सोनी से लेकर सैमसंग तक सब विज्ञप्ति हिन्दी में जारी करते हैं और यही से जुड़ी है हिन्दी जानने वालों की माँग। अगर कैनन के अधिकारी गाँव में जाते हैं तो दुभाषिया लेकर जाते हैं और कई राष्ट्राध्यक्ष भी दुभाषिए साथ रखते हैं तो यहाँ पर भी अँग्रेजी स्थानीय भाषा के साथ हिन्दी की जरूरत पड़ी तो और यहाँ भी रोजगार है।

आज हिन्दी चालीस करोड़ से कुछ ही कम की मातृभाषा कही जा सकती है। हिन्दी का दूसरा स्तर हिन्दी बोलनेवालों का है, जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं है। हिन्दी की व्याप्ति कितनी है इसका पता इसी बात से चल जाता है कि आप दक्षिणी प्रदेशों में जैसे केरल में हिन्दी को दूसरी भाषा की तरह बरता जाता देखते हैं। आंध्र, कर्नाटक में कन्नड़ के साथ हिन्दी मौजूद है। 

तमिलनाडु तक में अब हिन्दी का वैसा विरोध नहीं है जैसा कि सातवें दशक में हुआ था। अब तो तमिल सांसद हिन्दी सीखने की बात करने लगे हैं। मीडिया की मुख्य भाषा हिन्दी है। हिन्दी मीडिया अंगरेजी मीडिया से कहीं आगे है। राष्ट्रीय पाठक सर्वेक्षण में पहले पांच सबसे ज्यादा बिकने वाले अखबार हिन्दी के हैं। एक अंगरेजी का है, एक मलयालम का है, एक मराठी का और एक तेलुगु का है। एक बंगला का भी है। हिन्दी के सकल मीडिया की रीच इन तमाम भाषाई मीडिया से कई गुनी ज्यादा है। हिन्दी की स्वीकृति अब सर्वत्र है। ऐसा हिन्दी दिवसों के जरिए नहीं हुआ, न हिन्दी को राजभाषा घोषित करने से हुआ है। ऐसा इसलिए हुआ है कि हिन्दी जनता और मीडिया का नया रिश्ता बना है। यह बाजार ने बनाया है जिसे हिन्दी के विद्वान कोसते नहीं थकते। 

मीडिया की हिन्दी संचार की जबर्दस्त हिन्दी है। इतिहास में इतने विकट, व्यापक एवं विविध स्तर के संचार की हिन्दी कभी नहीं रही। वह साहित्यिक हिन्दी रहकर संदेश, उपदेश और सुधार की भाषा भर बनी रही। प्रिंट मीडिया ने उसे एक विस्तार दिया, लेकिन साक्षरों के बीच ही। रेडियो, फिल्मों और टीवी ने उसे वहां पहुंचाया जहां हिन्दी का निरक्षर समाज रहता है, उसे एक नई भाषा दी है जो म्युजिकल है। 

जिसमें एक से एक हिट गाने आते हैं जिन्हें सुनकर पैर थिरकने लगते हैं। हिन्दी टीवी के समाचारों से लेकर मनोरंजन की सबसे बड़ी भाषा है। वह इंटरनेट, मोबाइली चैट में आकर गिटपिट की भाषा बनी है। भले उसकी वर्तनी रोमन हो चली हो। वहां हिन्दी-अंगरेजी का नया निराला मिक्स मिलता है। रही कसर एफएम चैनलों की हिन्दी ने पूरी कर दी है। अब वह तेज गति से दौड़ती हुई फर्राटेदार मनोरंजक भाषा है जिसमें चुटकुले मजाक, मस्त बातें और संगीत बजता है। 
इतनी बोली जाने वाली भाषा दूसरी नहीं है। इसका कारण हिन्दी का अपना लचीला स्वभाव है, उसमें दूसरी भाषाओं को समा लेने की अद्भुत क्षमता है। आज उसके कोश में मराठी, गुजराती, पंजाबी, उर्दू, तमिल, तेलुगू, कन्नाड़, मलयालम तक के शब्द मिक्स होकर आते-जाते हैं। 

रीमिक्स की भाषा बनकर उसने सिद्ध कर दिया है कि स्पानी या लेटिनी या अंगरेजी भाषा के साथ उसकी कोई समस्या नहीं है। वे संग-संग चल सकती हैं। और यह सब हिन्दी भाषा को एक नई व्याप्ति देता है, जो अभूतपूर्व है। वह हिन्दी के एक नए जन सांस्कृतिक क्षेत्र को बताता है। जिसमें एक मिक्स करती हिन्दी रहती है, जो शुद्ध नहीं है और जो बात उसके लिए लाभ कर रही है। शुद्ध भाषा मरणासन्न हो जाती है। बहता नीर अगर भाषा है तो उसमें बहुत कुछ मिलता रहता है और बहाव उसे साफ करता रहता है, मैला नीचे बैठ जाता है और काम का साफ पानी ऊपर रह जाता है हिन्दी इस मानी में नई सफाई लेकर आई है। 




साहित्यकार किस्म के लोग इस हिन्दी का खाते हैं लेकिन इसको दूषित बताते हैं। कारण है उनका सोच अभी तक हिन्दी को किताबी और साहित्यिक मानता है जबकि कोई भी भाषा जनसंचार की भाषा बने बिना आगे नहीं बढ़ती। वह जितना विविध संचार करने में क्षमतावान होगी उतनी ही बढ़ेगी। उसमें तमाम लोग संवाद करें ऐसी भाषा आगे ही बढ़ेगी। हिन्दी इसीलिए आगे बढ़ी है और बढ़ रही है। इसके पीछे हिन्दी भाषी जनता की जरूरतों का बल है। हिन्दी जनता सबसे बड़ी उपभोक्ता जमात है। उसे संबोधित करने के लिए कॉर्पोरेट दुनिया विज्ञापन हिन्दी में पहले बनवाती है। यही हिन्दी की गुरुत्वाकर्षकता है। 

वह कॉर्पोरेट के लिए आकर्षक और सबसे बड़ा बाजार देती है। कंपनियां उसमें संवाद करती हैं। ब्रांड करती हैं। इससे एक विनियम की नई हिन्दी बनी है। साहित्य भी मरा नहीं है, वह छोटी पत्रिकाओं में रह रहा है। वही उसकी जगह भी थी। साहित्यकार अब संख्या में ज्यादा हैं चाहे वे खराब हिन्दी ही लिखते हों। तब खतरे की लॉबी बनाना क्या तर्कसंगत है। हिन्दी दिवस मनाएं न मनाएं कम से कम इस पैरानॉइया से तो मुक्त हों जो हर वक्त हिन्दी पर खतरा मंडराता देखने का आदी है।
हिंदी में महारत और डिग्री रखने वाले उम्मीदवारों को केंद्र और राज्य सरकार के कार्यालयों में बतौर हिंदी भाषा अधिकारी, सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी, शिक्षक तथा अनुवादक के तौर पर कार्य करने का अवसर मिल सकता है। इसके अलावा सार्वजनिक क्षेत्र में लैंग्वेज इंटरप्रेटर, ट्रांसलेटर और हिंदी भाषी क्षेत्रों में लिंक ऑफिसर की भूमिका का निर्वाह करने का मौका मिलता है। प्राइवेट सेक्टर में इस भाषा के एक्सपर्ट्स के लिए ढेरों नए अवसर हैं, जहां वेबसाइट कंटेंट राइटर, कॉपी राइटर, ट्रांसलेटर, इंटरप्रेटर, स्क्रिप्ट राइटर, प्रूफ रीडर, हिंदी टेलीकॉलर और एजुकेशन के तौर पर करियर बनाने का अवसर मिलता है।
आज देश में मनोरंजन का सर्वाधिक प्रचलित साधन निःसंदेह भारतीय फिल्में हैं। देश के हर कोने में हिन्दी फिल्म देखी-दिखाई जाती है। अतः हम कह सकते हैं कि हिन्दी फिल्मों ने हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में काफी योगदान दिया है। 

भारत की सर्वप्रथम सवाक फिल्म 'आलमआरा' थी, जिसे सन्‌ 1931 में आर्देशिर ईरानी ने बनाया था। यह फिल्म हिन्दी में बनी थी। कहते गर्व होगा कि प्रथम भारतीय सवाक फिल्म हिन्दी में थी। अब हम यह तो आर्देशिर ईरानी से पूछने से रहे कि उन्होंने अपनी प्रथम फिल्म हिन्दी में क्यों बनाई? अगर यह पूछना संभव भी होता तो ईरानीजी निश्चित रूप से यह कहते कि 'कैसे मूर्ख हो? अरे! हिन्दी तो हिन्दुस्तान की भाषा है। यह तो जन-जन की भाषा है। मुझे अपनी फिल्म देश की 21 करोड़ आबादी तक पहुँचाना है।'

खैर, आज हिन्दी फिल्में जितनी लोकप्रिय हैं शायद ही किसी अन्य भाषा की फिल्में होंगी। विश्व में बनने वाली हर चौथी फिल्म हिन्दी होती है। भारत में निर्मित होने वाली 60 प्रतिशत फिल्में हिन्दी भाषा में बनती हैं और वे ही सबसे अधिक चलन में होती हैं, वे ही सर्वाधिक लोकप्रिय हैं, वे ही सर्वाधिक बिकाऊ हैं।

ऐसा नहीं है कि क्षेत्रीय भाषा की फिल्में चलती ही नहीं हैं। लेकिन असमी फिल्म असम में, तेलुगु फिल्म आंध्र में ही लोकप्रिय होती हैं। इसके विपरीत हिन्दी फिल्म सारे भारत में चलती है। जिस उत्साह से वह उत्तरी भारत में दिखाई जाती है उसी उत्साह से दक्षिण भारत में भी दिखाई जाती है। इसका एक कारण यह भी है कि हिन्दी हमारी संपर्क भाषा है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक हिन्दी लिखने, पढ़ने, बोलने वाले मिल जाएँगे।

इसी प्रकार हिन्दी फिल्मों के दर्शक और प्रशंसक भी आपको पूरे देश में मिल जाएँगे। अनेकता में एकता का जीवंत उदाहरण भारतीय फिल्मोंके अतिरिक्त दूसरा हो ही नहीं सकता। 

कुछ सीमा तक दक्षिण में हिन्दी का विरोध है, लेकिन हिन्दी फिल्में लोकप्रिय हैं। खासकर तमिलनाडु में हिन्दी का विरोध किया जाता है, लेकिन इसी तमिलनाडु के तीन शहरों मदुरै, चेन्नाई और कोयंबटूर में हिन्दी फिल्म 'शोले' ने स्वर्ण जयंती मनाई थी! 'शोले' के अलावा 'हम आपके हैं कौन', 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे', 'बॉर्डर', 'दिल तो पागल है' भी पूरे देश में सफल रहीं। 'गदर' और 'लगान' जैसी कितनी ही फिल्में आई हैं जिन्होंने पूरे देश में सफलता के झंडे गाड़ दिए।

हिन्दी फिल्मों में अहिन्दी भाषी कलाकारों के योगदान के कारण भी हिन्दी को अहिन्दी भाषी प्रांतों में हमेशा बढ़ावा मिला है। सुब्बालक्ष्मी, बालसुब्रह्मण्यम, पद्मिनी, वैजयंती माला, रेखा, श्रीदेवी, हेमामालिनी, कमल हासन, चिरंजीवी, ए.आर. रहमान, रजनीकांत आदि प्रमुख सितारे हिन्दी में भी लोकप्रिय हैं। बंगाल की कई हस्तियाँ हिन्दी सिनेमा की महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रही हैं।

मसलन मन्ना डे, पंकज मलिक, हेमंत कुमार, सत्यजीत रे (शतरंज के खिलाड़ी), आर.सी. बोराल, बिमल रॉय, शर्मिला टैगोर, उत्त कुमार आदि। प्रसिद्ध अभिनेता डैनी डेंग्जोग्पा अहिन्दी राज्य सिक्किम से हैं, तो हिन्दी फिल्मों के प्रसिद्ध संगीतकार सचिन देवबर्मन तथा राहुल देव बर्मन मणिपुर के राजघराने से संबंधित थे।

इसी प्रकार हिन्दी फिल्मों के लोकप्रिय कलाकार जितेंद्र पंजाबी होने के बावजूद दक्षिण में लोकप्रिय हैं। हिन्दी फिल्मों की प्रसिद्ध हस्तियाँ स्व. पृथ्वीराज कपूर एवं उनका समस्त खानदान, दारासिंह, धर्मेन्द्र आदि पंजाब से हैं। इस प्रकार के और भी कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। 

हिन्दी फिल्में देश के साथ-साथ विदेशों में भी लोकप्रियता प्राप्त कर चुकी हैं। इस प्रकार इन फिल्मों ने देश ही नहीं अपितु विदेशों में भी हिन्दी को प्रोत्साहित किया है। राजकपूर की 'आवारा' और 'श्री 420' ने रूस में लोकप्रियता के झंडे गाड़ दिए थे। अमिताभ बच्चन, माधुरी दीक्षित, लता मंगेशकर एवं हिन्दी फिल्मों के अन्य कई कलाकार सारी दुनिया के बड़े-बड़े शहरों में अपने रंगमंचीय प्रदर्शन सफलतापूर्वक कर चुके हैं। आज भी ऑल इंडिया रेडियो के उर्दू कार्यक्रमों के फर्माइशकर्ता 90 प्रतिशत पाकिस्तानी श्रोता होते हैं। भारतीय फिल्में और गीत वहाँ सर्वाधिक प्रिय हैं। 

सिर्फ भारत के ही कलाकार विदेशों में लोकप्रिय नहीं, बल्कि कई विदेशी कलाकार हिन्दी फिल्मों की वजह से लोकप्रिय हो गए हैं। मेहँदी हसन व गुलाम अली (दोनों पाकिस्तानी गजल गायक) के हिन्दी गीत आज भारत में लोकप्रिय हैं। रूना लैला बांग्लादेश से आकर हिन्दी फिल्मों की वजह से लोकप्रिय बनीं, वहीं पाकिस्तानी अदाकारा जेबा को 'हिना' से लोकप्रियता मिली। इन सब तथ्यों से हम कह सकते हैं कि हिन्दी फिल्मों ने हिन्दी को सौ प्रतिशत प्रोत्साहन दिया है।


रविवार, 21 अगस्त 2016

जीतने वाला नायक भले हो मगर हारने वाला खलनायक नहीं होता



रियो ओलम्पिक्स में साक्षी मलिक और पी वी सिन्धु के पदक जीतने और दीपा कर्माकर के चौथे स्थान पर रहने के बाद महिला सशक्तीकरण के प्रचारकों की बाढ़ आ गयी है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और बेटी खिलाओ जैसे नारे लग रहे हैं तो कहीं पर इस प्रदर्शन मात्र से परिस्थिति में बदलाव की उम्मीद की जा रही है। साक्षी का पदक जीतना इसलिए भी खास है क्योंकि वह हरियाणा से हैं जहाँ लड़कियों का बच जाना ही बड़ी बात है। सिन्धु को लेकर अब आँध्र और तेलंगाना में जंग शुरू हो गयी है तो दूसरी ओर शोभा डे जैसे लोग भी हैं जो खिलाड़ियों पर तंज कसकर लाइमलाइट में आने के बहाने ढूँढते हैं और फटकार लगने के बाद सुर बदलने लगते हैं। समूचा हिन्दुस्तान रो रहा है कि हमारे खिलाड़ी पदक नहीं जीत सके और उनका प्रदर्शन बेहद लचर रहा। सच कहूँ तो महान के देश के हम नागरिक और यहाँ की व्यवस्था बेहद स्वार्थी और आत्मकेन्द्रित हैं जिनको किसी की तकलीफ से कोई मतलब नहीं। रियो के बहाने सशक्तीकरण की राह निकालने वालों से पूछा जाए कि क्या वे अपने बच्चों को खिलाड़ी बनाना चाहेंगे तो जवाब होगा नहीं। दीपा कर्माकर और सिन्धु की तारीफ में कसीदे पढ़ने वाले अपनी बेटियों को दुप्पटा सम्भालकर चलने की नसीहतें देते हैं और उनकी समूची इज्जत दुप्पटे में सिमट जाती है। सानिया की स्कर्ट और शादी का इतिहास खंगालने वाले अब बेटियों का सम्मान करने की सीख दे रहे हैं। क्या यह दोगलापन नहीं है? सचिन, सानिया और साइना जैसा भविष्य अपने बच्चों की चाहत सभी को होती है मगर क्या उनकी मेहनत और जज्बा और निःस्वार्थ जुनून आपमें हैं। अपने खिलाड़ियों की मेहनत को भूलने में भारतीय अव्वल हैं और उगते सूरज को सलाम करना हमारी फितरत है। कोई खिलाड़ी हारने के लिए नहीं खेलता, हार और जीत खेल का हिस्सा है। जीतने वाला नायक हो सकता है मगर हारने वाले को खलनायक बनाना जरूरी है? 125 करोड़ की आबादी वाले देश में खेल पर खर्च ही कितना किया जाता है और क्या आपके स्कूलों में भी मैदान हैं जहाँ बच्चे खेल सकें? लड़कियों के हाथ में पहले गुड़िया और बाद में बेलन थमाने वाले माँ बाप ने क्या कभी उनको बैडमिंटन का रैकेट थमाया है? यहाँ खिलाड़ी को इकोनॉमी क्लास में सफर करवाया जाता है तो कभी किसी खिलाड़ी को जूते तक नहीं मिलते। खेल मंत्री खिलाड़ियों के नाम तक नहीं जानते और अधिकतर माँ बाप का सपना बच्चों की सरकारी नौकरी होता है या डॉक्टर व मेडिकल में भेजना। महिला सशक्तीकरण के नारे लगाने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि इन महिलाओं की जीत के पीछे पुरुषों की भी मेहनत है, फिर भले ही व साक्षी और दीपा के पिता हों या सिन्धू के कोच पुलेला गोपीचंद। आपने ऐसे कितने प्रशिक्षकों को अवसर दिया है? खेल को खेल की तरह लीजिए क्योंकि आज जो हारे हैं, उन्होंने ही आपकी इज्जत कभी रखी है, फिर वह साइना हों, सानिया हों, अभिनव बिन्द्रा हों या योगेश्वर हों, हमें कोई हक नहीं बनता कि हम उनकी मेहनत का अपमान करें। एहसानफरामोशी छोड़कर उनके जज्बे को सलाम कीजिए जो सहूलियतें न होने के बावजूद अपनी जिद के दम पर पूरी दुनिया के सामने खड़े हुए। भारतीय खिलाड़ियों, आपको सलाम कि आप इस एहसानफरामोशी और तमाम दिक्कतों के बावजूद लड़ते हैं, आज हार हुई है तो कल आप जरूर जीतेंगे, हौसला मत छोड़ना कभी।

रविवार, 17 जुलाई 2016

एक कंदील मरेगी तो हजार और कंदील उठ खड़ी होंगी, जुर्म के खात्मे के लिए

तो कंदील आखिर तुम मार डाली गयी। तुम भूल गयी कि ऐसे देश में हो जहाँ औरतों का होना ही गुनाह है, वह तो बस पीछे चलने के लिए होती हैं। तुम्हारा भाई कहता है कि उसने अपनी शान (?) के लिए तुम्हारी जान ली है मगर सच तो येे है कि वह तो सिर्फ एक मोहरा है जिसका दिमाग उस लोगों के इशारे पर चलता है जिसकी टोपी सिर पर रखकर तुमने वीडियो बनाने की गुस्ताखी कर डाली। ऐसा नहीं है कंदील कि तुम हमें बहुत अच्छी लगती थी, नहीं तुम अच्छी नहीं थी (?)। भला गुस्ताख औरतें अच्छी होती हैं कभी? तुम्हारा बड़बोलापन न जाने कितनी बार मीडिया और यूट्यूब की टीआरपी बढ़ाने के काम आया था मगर उनको मसाला देने वाले बहुत हैं। मुझे तो तुम बिल्कुल अच्छी नहीें लगती थी मगर अच्छा नहीं लगने का मतलब ये थोड़ी न है कि हम जीने का हक ही छीन लें। तुमने एक भारतीय क्रिकेटर की तारीफ की, ये तुम्हारा गुनाह ही तो है। भले ही लोग तुम्हारे लिए सहानुभूति दिखा रहे हैं मगर कंदील, कुछ तुम्हारे मुल्क में और हमारे मुल्क में भी बहुत से लोगों के गुरुर को ठंडक मिली होगी कि उन्होंने एक गुस्ताख औरत को सबक सिखा दिया। तुम नहीं जानती थी कि कंदील जैसी औरतें कत्ल करने के लिए होती हैं, कम से कम तुम्हारे देश का सच तो यही है। हमारे यहाँ भी भाई प्रेम करने वाली बहनों का कटा सिर लेकर शहर में सड़क पर सरेआमं निकल पड़ते हैं और वो भी यही कहते हैं कि जो तुम्हारे भाई ने कहा। उनको किसी बात का पछतावा नहीं होता, होगा भी कैसे, आखिर औरतें इंसान थोड़ी न होती हैं, वह तो गुलाम होती हैं मगर ये सब भूल गए हैं कि एक कंदील मरेगी तो हजार और कंदील उठ खड़ी होंगी, जुर्म के खात्मे के लिए। हालांकि पाकिस्तानी मॉडल कंदील बलोच की ऑनर किलिंग के मामले में उनके दोनों भाइयों के खिलाफ केस दर्ज हो गया है। दोनों भाई असलम शाहीन और वसीम को मुख्य आरोपी बनाया गया है और वसीम को अरेस्ट भी कर लिया गया है मगर इंसाफ होगा, इस पर संदेह है। कंदील के पिता अजीम की शिकायत पर ये एफआईआर दर्ज की गई है। शनिवार को भाई वसीम (30) ने गला दबाकर कंदील की जान ले ली। कंदील के फेसबुक पोस्ट और वीडियो को लेकर भाई धमकियां दे रहा था। वो मॉडलिंग छोड़ने के लिए भी उन पर दबाव बना रहा था। बलोच अपने विवादित बयानों के लिए चर्चा में रहती थीं। हाल ही में उनकी दो शादियों की बात सामने आने से भी परिवार नाराज था।- पाकिस्तान की न्यूज वेबसाइट डॉन को मिली एफआईआर की कॉपी के मुताबिक, अजीम ने अपने दोनों बेटों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई है।  एफआईआर की कॉपी के मुताबिक, परिवार को बदनाम करने के नाम पर असलम ने वसीम को कंदील का मर्डर करने के लिए उकसाया था। 
- अजीम ने अपनी शिकायत में ये भी कहा कि दोनों भाइयों ने कंदील के पैसों के लिए उसका मर्डर किया। मर्डर के बाद से वसीम गायब था, जिसे रविवार सुबह अरेस्ट कर लिया गया। उसने हत्या की बात भी कबूल कर ली है और कहा कि उसे इसका कोई अफसोस नहीं है। वहीं, असलम अभी सेना में नायब सूबेदार के पद पर नौकरी कर रहा है। पुलिस को दिए स्टेटमेंट में कंदील के पेरेंट्स ने बताया कि हत्या के वक्त वे छत पर सो रहे थे। कंदील नीचे सो रही थी। इसी दौरान कंदील के भाई ने गला दबाकर उसकी जान ले ली। 
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हाल ही में पाकिस्तानी इमाम के साथ कंदील का सेल्फी वीडियो आने से उसकी फैमिली खासी नाराज थी। कंदील की दो शादियों के मामले सामने आने से भी फैमिली मेंबर्स नाराज थे। कंदील पंजाब प्रोविन्स के कोट अद्दू की रहने वाली थीं। उन्होंने मुल्तान शहर में घर खरीद रखा था और लंबे समय से यहीं रह रही थीं। हाल ही में कंदील ने एक इंटरव्यू में कहा था कि ईद के बाद उन्होंने अपने पेरेंट्स के साथ विदेश शिफ्ट होने का फैसला लिया है।  7 जुलाई को कंदील का कॉन्ट्रोवर्शियल म्यूजिक वीडियो 'बैन' यूट्यूब पर अपलोड किया गया था।  वीडियो वायरल हो गया। इसे 13 लाख से ज्यादा बार देखा चुका है। सिंगर आर्यन खान के इस वीडियो को लेकर सोशल मीडिया पर कंदील की काफी आलोचना भी हो रही थी।   शुक्रवार को फेसबुक पोस्ट में कंदील ने इस वीडियो को लेकर अपने सपोर्टर्स का शुक्रिया अदा किया था। उन्होंने लिखा कि वीडियो को दुनियाभर से शानदार रिस्पॉन्स मिल रहा है।
तुमने फेसबुक पोस्ट में कहा था - 'मुझे दुनिया से फर्क नहीं पड़ता'

 
कंदील ने शुक्रवार शाम 4 बजे फेसबुक पर किए एक पोस्ट में लिखा था, "इससे फर्क नहीं पड़ता कि मुझे कितनी बार कुचला जाएगा। मैं लड़ूंगी। कंदील बलोच वन वुमन आर्मी है।""कंदील उन महिलाओं के लिए इन्सपिरेशन है, जिन्हें सोसाइटी द्वारा दबाया जाता है और उनके साथ खराब बिहेव किया जाता है। "मैं कामयाबी हासिल करती रहूंगी और मुझे मालूम है कि आप मुझसे नफरत करते रहेंगे। मुझे किसी चीज से फर्क नहीं पड़ता।"दो दिन पहले लाइव टीवी शो में आशिक हुसैन नाम के शख्स ने कंदील का पति होने का दावा किया था। टीवी इंटरव्यू में कंदील ने शादी और बच्चा होने की बात मान ली थी। हालांकि, उनका दावा था कि उन्हें इस शादी के लिए मजबूर किया गया था। कंदील ने एक्स हसबैंड पर टॉर्चर के आरोप भी लगाए। कंदील ने कहा था, ''मैंने अपने बेटे को कभी नहीं बताया कि मैं उसकी मां हूं, क्योंकि ये शादी जबर्दस्ती हुई थी।' उन्होंने ये भी कहा था, ''मैं आगे पढ़ना और काम करना चाहती थी, लेकिन जबरन मेरी शादी कर दी गई, इसलिए मैंने डिवोर्स ले लिया।''
 
कंदील के मुताबिक, ''मेरा पति मुझे पीटता था। शादी के एक साल तक उसने दिन-रात मुझे टॉर्चर किया।'' उन्होंने बताया कि एक साल बाद वो अपने बेटे के साथ पति को छोड़कर भाग निकलीं और दारुल अमन में शरण ली।- कंदील के मुताबिक, बेटे की तबीयत बिगड़ गई थी और वो उसका इलाज नहीं करा सकती थी, इसलिए उसने बेटे की कस्टडी हुसैन को दी। कंदील ने सोशल मीडिया पर एक एक वीडियो पोस्ट करके पीएम नरेंद्र मोदी को चायवाला कहकर उनका मजाक उड़ाया था और कश्मीर को आजाद करने के लिए कहा था।  वो सोशल मीडिया पर इमरान खान और विराट कोहली को लेकर अपने प्यार का इजहार कर चुकी थीं।इसी साल मार्च में उन्होंने क्रिकेट के वर्ल्ड टी20 टूर्नामेंट से पहले एलान किया था कि अगर पाकिस्तान की टीम भारत को हरा देती है तो वो स्ट्रिप डांस करेंगी। लेकिन भारत ने पाकिस्तान को हरा दिया और कंदील की ये हसरत पूरी नहीं हो पाई।
कंदील बलोच पाकिस्तानी मॉडल और टीवी एक्ट्रेस थी। उसे सोशल मीडिया की ड्रामा क्वीन कहा जाता था। कंदील का असली नाम फौजिया अजीम था पहली बार वह 2013 में पाकिस्तान आइडल के ऑडिशन में देखी गई थीं। उस दौरान जजों ने उनके बेसुरे गाने सुनकर उन्हें भगा दिया था।रिजेक्ट होने पर उन्होंने कैमरे के सामने जमकर ड्रामा किया था और जजों को भला-बुरा कहा था। कैपिटल टीवी के मॉर्निंग शो में उनकी हरकतों और फिजूल की बातों का पूरे पाकिस्तान में मजाक बनता था। उसके डायलॉग डबस्मैश पर काफी पॉपुलर हैं। कंदील, वो तुमसे नफरत कर सकते थे मगर जान लेने का हक नहीं था। वो डर गए हैं, कंदील और तुम अपनी तमाम बुराईयों के बावजूद पाकिस्तान की औरतों के दिलों में बस चुकी है और अब तुम्हारी लड़ाई उनकी लड़ाई बनेगी, देख लेना।


सोमवार, 13 जून 2016

अपने हिस्से की दुनिया तलाशतीं - वाह! ये औरतें


सुषमा त्रिपाठी


इंसान चला जाए, अपनी गलियों को अपने भीतर सहेजे रखता है और बाहर की दुनिया में भी अपने हिस्से का कोना तलाश लेता है। लेखिका माधवीश्री के उपन्यास में नायिका के चरित्र में यह कोना नजर आता है। मां को समर्पित यह उपन्यास कल्पना पर आधारित हैं मगर लेखिका माधवी श्री के मुताबिक ही इसमें सभी कुछ कल्पना नहीं है।

लेखिका के अनुसार उपन्यास कोलकाता में लिखा गया था मगर इसे पढ़ने पर आपको आने वाले कल की औरतें दिखती हैं जो उनके जेहन में कहीं छुपी थीं और वक्त आते ही उपन्यास की शक्ल में जिंदा हो उठीं। 
http://wtf.forkcdn.com/www/delivery/lg.php?bannerid=600&campaignid=152&zoneid=1261&loc=http%3A%2F%2Fhindi.webdunia.com%2Fhindi-books-review%2Fbook-review-116060800060_1.html&referer=http%3A%2F%2Fhindi.webdunia.com%2Fliterature&cb=600c078964वाह ये औरतें, तीन सहेलियों की कहानी है। ऐसी औरतें जो हम अपने आसपास देखते हैं मगर उनके अंदर का विद्रोह अनदेखा रह जाता है। चरित्र को नैतिकता के पलड़े पर न तोलकर सिर्फ उसे एक मानवीय पहलू से देखा जाए तो बात समझ में आती है। रमा उस कामकाजी औरत का चेहरा है जो सोशल गैदरिंग में खुशमिजाज और आत्मनिर्भर होने का दावा करती है और अपने टूटेपन को आत्मविश्वास के सहारे जोड़ने की कोशिश करती है। उमा लेखिका है, जो स्त्री विमर्श की बातें करने वाली आधुनिक स्त्री है। पूनम है, जो गृहस्थी की दुनिया में खुद को झोंक देने वाली और अमीर घर की महिला है जो परिवार की भव्यता को अपने कीमती कपड़ों और जेवरों के माध्यम से दिखाती है।
इन तीनों की कोशिश एक ही है, अपनीअपनी दुनिया के कठघरों से अलग-अपने हिस्से का कोना तलाशना, जहां कोई बंधन न हो और जो हंसी निकले, भीतर की चट्टानों को तोड़कर निकले। एक ऐसी ख्वाहिश, जो लड़की से औरत बनी और अकेले रहने वाली हर महिला की ख्वाहिश है, जहां कंधा मिले मगर वह कंधा किसी मर्द का हो, यह बिल्कुल जरूरी नहीं है। ये तीन सहेलियां कुछ ही लम्हों में पूरी जिंदगी जीना चाहती हैं। कहानी वार्तालाप शैली में धाराप्रवाह चलती है। महसूस होता है कि कोई हमारे सामने बतिया रहा है और यही बात इस उपन्यास को भीड़ में से अलग करती है क्योंकि यहां अंदर का गुस्सा है, बतकही है मगर कोई आदर्श या किसी प्रकार का बौद्धिक बोझ नहीं है। 
 ये एक ऐसी दुनिया है जिसे न चाहते हुए भी कई बार औरतों में जीने की चाहत होती भी है मगर नैतिकता और आदर्श के बंधन में हम इन तमाम ख्यालों को पाप समझकर खुद से दूर रखते हैं। मसलन, रमा का खुद से 23 साल बड़े मर्द से शादी करना और उसके बाद भी एक प्रेमी रखना और उसका चालाकी से इस्तेमाल करना, पूनम का अपने देवर से संबंध बनाना और उमा का खुद से कम उम्र का ब्वायफ्रेंड रखना (जो अंत में उसे छोड़कर किसी और लड़की के साथ चला जाता है), ये सब किसी आम औरत के जेहन में नहीं आ सकता है और गलती से अगर आए तो वह इस ख्याल को धकेल देगी। 
 यहां गौर करने वाली बात यह है कि रमा अपने पति के गुजरने के बाद ही यह कदम उठाती है यानि पत्नी वाली वफादारी उसमें है। इसके बावजूद वह जिस समाज में रहती है, उसे इसकी अनुमति नहीं है। रही बात उमा की तो वह भी अंत में कुणाल के मित्र कुशल से शादी करती है औऱ उसका कारण यह है कि कुणाल से शादी करने का मतलब रोमांस का खत्म हो जाना है। उमा को अंत में एक ही चीज याद रहती है स्वतंत्रता, और वह उसी के साथ जी रही है।

यह उपन्यास इस बात को सामने रखता है कि औरत भले ही एक मर्द के कंधे का सहारा तलाशती हो, खुद को उसे सौंपकर अपनी दुनिया उसमें देखती हो मगर उसका पूरा होना किसी मर्द पर या मातृत्व पर निर्भर नहीं करता। उसे अपने हिस्से का कोना चाहिए जो उसे रिश्तों की तमाम परिभाषाओं से अलग सिर्फ एक औरत से परे सिर्फ एक मनुष्य के तौर पर समझे, यही तलाश इन तीनों औरतों की है, हमारी और आपकी भी है। 
 उपन्यास में कई जगहों पर घर से लेकर कार्यस्थल पर औरतों के साथ होने वाली बदसलूकी और उपेक्षा खुलकर सामने आई है जिसमें दैहिक शोषण भी शामिल है और इसमें महिला पुलिस अधिकारियों का डर भी शामिल है। इसके साथ ही समाज के निचले तबके की औरतों का विद्रोह भी शामिल है। उपन्यास में उमा और कुणाल के साथ रीना औऱ सौमित्र का रिश्ता भी शिद्दत से मौजूद है मगर उमा और रीना में जो रिश्ता है, वह खींचता है। दिल्ली जब उमा के साथ बेरहम होती है तो रीना उसका सम्बल बनती है।

दरअसल, यह उपन्यास एक मर्द और औरत के रिश्ते की कहानी नहीं कहता बल्कि इसमें औरत के औरतपन से जन्मे अपनेपन के धागे हैं जो औरतों में एक खूबसूरत रिश्ता जोड़ते हैं। इनमें उमा, रमा और पूनम के साथ उमा और रीना का रिश्ता एक कड़ी है।उपन्यास में कोलकाता जहां भी नजर आया है, शिद्दत से नजर आया है मगर जिस दिल्ली ने गढ़ा, माधवी श्री उसे भी नहीं भूलीं। एक मां की तरह जिसे अपने दोनों बच्चे प्यारे हैं। प्रूफ की गलतियां हैं मगर उपन्यास की धाराप्रवाह शैली के कारण कई बार इन पर ध्यान नहीं जाता। नई दिल्ली के श्री प्रकाशन ने इसे छापा है। लेखिका यह पहला उपन्यास है और इसे पढ़ा भी जा रहा है। खुद से बतियाना हो और अपना कोना तलाशने की कसक हो तो ये उपन्यास पढ़ा जा सकता है। 

पुस्तक -  वाह! ये औरतें
लेखिका - माधवी श्री 
प्रकाशक - श्री प्रकाशन 

 (वेबदुनिया में 13 जून 2016 को प्रकाशित समीक्षा)

रविवार, 12 जून 2016

अपने हिस्से का आसमान समेटती अकेली औरतें


- सुषमा त्रिपाठी

अकेली महिला, जब भी ये शब्द जेहन में आता है तो महिला की लाचार छवि बहुतों के दिमाग में कौंध उठती होगी। साहित्य से लेकर सिनेमा और समाज में भी महिला का अकेली होना अभिशाप ही माना जाता रहा है और इस बात की परवाह किए बगैर कि वह खुद इस बारे में क्या सोचती है। औरत अकेली क्या हुई, लोग उसे अपनी सम्पत्ति समझ बैठते हैं और यह भी कड़वी हकीकत है कि महज अकेले होने के कारण उसे आपत्तिजनक और कुछ हद तक बेहूदे प्रेम प्रस्तावों से गुजरना पड़ता है। इनकार किया तो चरित्र पर उँगलियाँ उठेंगी और हाँ कर दी तो उस पर एक एहसान लाद दिया गया मगर अब ये पन्ने पलट रहे हैं क्योंकि अब अकेली होने का मतलब लाचारी नहीं है बल्कि एक ऐसी सशक्त महिला की छवि सामने आती है जो अपने फैसले खुद करती है, जो अपना सम्मान करना जानती है और मातृत्व का सुख प्राप्त करने के लिए उसे किसी पर निर्भर होने की जरूरत नहीं पड़ती और सबसे अच्छी बात यह है कि उनके बच्चे उनका सम्मान करते हैं और उनको समझते हैं। यकीन न हो तो नीना गुप्ता और मसाबा गुप्ता पर नजर डालिए। विवियन रिचर्ड्स से उनकी शादी नहीं हुई थी मगर नीता ने मसाबा को न सिर्फ जन्म दिया बल्कि उसे योग्य भी बनाया़। हालाँकि नीना ने बाद में शादी की मगर तब तक मसाबा बड़ी हो चुकी थीं। सुस्मिता सेन और रवीना टंडन जैसी महिलाओं ने बेटियाँ गोद लेकर एक नयी मुहिम चलायी। कहने की जरूरत नहीं है कि इससे बहुत सी महिलाओं को हौसला और हिम्मत, दोनों मिले। अब यह सिलसिला बंगाल में भी देखा जा सकता है। फिल्मकार आनिंदिता सर्वाधिकारी उन महिलाओं में से हैं जो अपने दम पर चलना जानती हैं। थियेटर के माहौल में पली - बढ़ी आनिंदिता सिंगल मदर्स के लिए एक मिसाल ही नहीं बल्कि अकेले जी रही उन तमाम महिलाओं के लिए एक उम्मीद हैं जिन्होंने अविवाहित जीवन का मतलब एकाकीपन मान लिया है। वह कहती हैं कि मेरे लिए बच्चा होना काफी मायने रखता है और यह निर्णय लेने में मुझे 2 साल लग गए। आज उनका बेटा अग्निसात उनकी दुनिया बन चुका है और वे एक खुशमिजाज माँ हैं। आनंदिता अकेली नहीं हैं बल्कि मातृत्व का सुख पाने के लिए बहुत सी लड़कियाँ और महिलाएं बंधी - बंधायी विचारधारा को चुनौती दे रही हैं। एक समय था जब अविवाहित होना या तलाकशुदा होना महिलाओं के लिए कहीं न कहीं आसान नहीं था और आस - पास की सामाजिक परिस्थितियाँ उसे यह जबरन महसूस करवाती थीं कि शादी न करना या तलाक लेना एक पाप है। खासकर तलाक के मामलों में तो किसी भी महिला के चरित्र पर ही सवाल खड़े होते थे और पूरी परिस्थिति के बाद उसके लिए जिंदगी आसान नहीं रहती थी। आज इस आवरण को लड़कियाँ उतारकर ङ्गेंक रही हैं। उनको न तो अब सिंगल मदर होने में कोई दिक्कत है और न ही तमाम तकलीफें सहकर सिर्फ बच्चों के लिए अपनी पूरी जिंदगी दाँव पर लगाने की मजबूरी है। यह दौर उस सशक्त महिला का है जो अपने दम पर न सिर्फ खुद जीना सीख रही है बल्कि मातृत्व का सुख भी उठाना जानती है और इसके लिए शादी अब कोई बंधन नहीं है। आनंदिता कहती हैं कि मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूँ कि कुदरत ने मुझे माँ बनने की ताकत दी है। मैं इसे जाया नहीं होने दे सकती थी। शारीरिक तौर पर माँ बनने के लिए एक समय सीमा है मगर शादी भावनात्मक मामला है और वह बाद में भी की जा सकती है। प्यार और शादी जैसी बातें इंतजार कर सकती हैं मगर मातृत्व की समय सीमा नहीं। मैंने स्पर्म बैंक से स्पर्म खरीदा मगर मेरा बेटा अग्निसात दूसरी कोशिश के बाद हुआ। डॉक्टर मुझे हैरत से देखते थे मगर मुझे अस्पताल में भी प्यार मिला और अब भी मिल रहा है। मातृत्व का यह सफर काफी खूबसूरत है और अब काम पर भी मुझे जल्दी लौटना है। अब एक बेटी गोद लेना चाहती हूँ। ईश्‍वर ने हमें एक ही जिन्दगी दी हैं, इसे खुलकर जीना चाहिए। अब यह शहरों तक ही सीमित नहीं है बल्कि छोटे जिलों और शहरों में भी यह देखा जा रहा है। बंगाल के मुर्शिदाबाद में 53 साल की कालीदासी हल्दर ने 53 साल की उममें सिंगल मदर बनकर अपनी खुशियों को तवज्जो दी है। एक अँगेजी अखबार को दिए साक्षात्कार में कालीदासी ने बताया कि परिवार की देखरेख करने में अपनी शादी के बारे में सोचने का मौका ही नहीं मिला। एक अखबार में विर्टो ङ्गर्टिलाइजेशन प्रक्रिया पर उनकी नजर गयी और फिर उन्होंने इस पर किताब खरीदी। हालाँकि सामाजिक और नैतिकता के मोर्चे पर यह कठिन फैसला कालीदासी के लिए इतना आसान नहीं था। परिवार उनके साथ खड़ा नहीं हुआ मगर पड़ोसी उनका अकेलापन समझते थे। तमाम शारीरिक, मानसिक और सामाजिक तकलीङ्गें सहकर भी आज अपनी बेटी कत्थककली की परवरिश कर रही हैं। सिंगल मदर्स के लिए प्रशासनिक स्तर पर दस्तावेज हासिल करना भी एक मुश्किल काम है मगर वे अब हार नहीं मानतीं। इस हिम्मत का नतीजा है कि अब उनके हिस्से का सम्मान और उनके हिस्से का अधिकार उनको मिल रहा है। देखा जाए तो सिंगल मदर कोई आधुनिक शब्द नहीं है बल्कि अकेली माँओं ने अक्सर अपने बच्चों को अपने दम पर खड़ा किया। सीता हो या कुंती या ङ्गिर यशोधरा, अपने समय में एक समय के बाद ये महिलाएं अकेली ही थीं मगर आज ये सभी मातृत्व के लिहाज से मिसाल बन चुकी हैं। ङ्गर्क यह है कि तब समय और था और सामाजिक परिस्थितियों ने उनका साथ नहीं दिया मगर आज अकेली महिलाएं समाज का नजरिया ही नहीं बदल रहीं बल्कि अपने हिस्से की खुशियाँ बटोरने के साथ बिखेर भी रही हैं।

(आलेख महिला दिवस पर सलाम दुनिया हिन्दी दैनिक में मार्च 2016 को प्रकाशित)

रविवार, 29 मई 2016

आज के समय में पत्रकारिता, पत्रकार और स्त्री


 आज 30 मई है। पत्रकारिता दिवस। सोचती हूँ कि बीते एक दशक में पत्रकारों की स्थिति में क्या बदलाव आया है तो लगता है कि कुछ और नहीं सोचने का तरीका बदला है। हम दो धड़ों में बँट चुके हैं। एक वर्ग निष्पक्षता और उदासीनता में फर्क करना भूल चुका है तो दूसरा प्रबंधन को खुश करने की कला को पत्रकारिता का नाम देकर खुश है और इन सबके बीच में पिस रहा है ईमानदारी से काम करने वाला संवाददाता। दूर से देखने पर ग्लैमर मगर भीतर जाओ तो आपको पूरी जिंदगी में जितना अनुभव नहीं होगा, उतना अनुभव आप साल भर काम करके कमा सकते हैैं। अब बात औरतोॆं की करें तो अधिकतर स्वनाम धन्य अखबारों के लिए वह मसाला हैै, उससे जुड़ी खबरों में इतना मिर्च डाल दिया जाता है कि स्वाद ही कड़वा हो जाता है। सनी लियोनी को गालियाँ देने वाले उनकी अंतरंग तस्वीरों को प्रमुखता से स्थान देते हैं। खबर का स्तर यह है कि अब मीडिया अबराम का जन्मदिन भी मना रहा है। बाकायदा नग्न होती महिलाओं के वीडियो अपलोड किए जाते हैं औऱ इसमें महिलाओं के साथ महिला पत्रकारों की भी छीछालेदर हो रही है। खबरों का शीर्षक वह आशिक के साथ भाग गयी, तो सड़क पर लड़ पड़ी और इससे भी घटिया, जिसे साझा तक नहीं किया जा सकता। यह उस मानसिकता का परिचायक है जो पितृस्सत्तात्मक समाज ने भरा हैै और ऐसी संवेदनहीन पत्रकारिता लिखने वाले इसी समाज से आते हैं। तो यह है कि समाज में ही नहीं पत्रकारिता की दुनिया में भी औरतें मसाला भर ही हैं। अधिकतर हाउस लाइफस्टाइल औऱ मनोरंजन की बीट लड़कियों को ही देते हैं औऱ कई जगह तो मानसिकता यह है कि लड़की है इसलिए अधिकारी बात करते हैं। चैनलों मेंं काम कर रही शादीशुदा महिला पत्रकारों औऱ खासकर जिनके बच्चे हैैं, उनका जीवन तो इतना मुश्किल है कि कल्पना नहीं की जा सकती। कई वरिष्ठ महिला पत्रकारों को जानती हूँ जो मन मसोस कर फील्ड से रिश्ता तोड़ बैठी हैं क्योंकि घर भी देखना है। यह स्थिति कभी पुरुषों के सामने तो नहीं आती। सच तो यह है कि महिलाएं ही महिलाओं को गम्भीरता से नहीं लेतीं और न ही एक साथ आगे बढ़ रही हैं। जो है, जितना है, खुश हैं। संतोष कई बार आत्मघाती होता है। जरूरी है कि संतोष छोड़कर वह आगे एक साथ बढ़ें। अगर आप सबको साथ लेकर चलेंगी तो आगे आप ही बढ़ेंगी, और यह आपके लिए कोई नहीं करने जा रहा।

रविवार, 1 मई 2016

बंगाल के चुनाव, औपचारिकता है मगर गायब है जनता की उम्मीदें




चुनाव लगभगवखत्म। पहले से कहीं अधिक शांतिपूर्ण। बम, गोली, खून इस बार कम है। निश्चित रूप से चुनाव आयोग और केंद्रीय वाहिनी की भूमिका की तारीफ़ की जानी चाहिए मगर मतदान के प्रतिशत में फिर भी गिरावट है। सबसे दुखद और मार्मिक सत्य ये रहा कि कुर्सी की भूख अब बच्चों पर भी रहम करना भूल चुकी है। हालिशहर के बाद हावड़ा में भी बच्चों को हिंसा का शिकार होना पड़ा। नतीजों को लेकर भी अजीब सा सन्नाटा है मगर लोगों का कम मतदान करना विकल्प न होने के कारण है जिसमें हताशा और उदासीनता भी है। ये दूर होगी या नहीं अब भी कहना कठिन है। कोलकाता पोर्ट में जो सन्नाटा दिखा, वह एक डर को दर्शाता है। महिलाओं के साथ लोगों में भी अजीब सी उदासीनता दिखा। ऐसा लगता है कि मतदान अब एक औपचारिकता भर रह गया है विकल्पहीन बंगाल में।
 नतीजे चाहे जो भी हों मगर आम जनता के हिस्से में शायद ही कुछ आए। क्या पता सत्ता बदले या न बदले। 34 साल के वामपंथी शासन और 5 साल के तृणमूल के शासन में बंगाल की झोली खाली ही रही है। उत्सव हुए तो पलायन अधिक हुआ। लोकतांत्रिक औऱ बुद्धिजीवी बंगाल में आम आदमी को बाहर लाने के लिए केन्द्रीय वाहिनी और144 धारा की जरूरत पड़ रही है औऱ उस पर भी हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही है, इससे अधिक शर्मनाक क्या हो सकता है? उद्योग नहीं और न ही सुरक्षा है। बंगाल के भविष्य को 19 मई का इंतजार है तो इसमें भी उम्मीद गायब है।

मंगलवार, 8 मार्च 2016

सशक्तिकरण की राह तो हमारे घर से ही निकलती है



महिला सशक्तिकरण की बातें यूँ तो साल भर चलती रहती हैं मगर मार्च आते ही इसमें अनायास तेजी आ जाती है। साल में एक दिन महिलाओं के सम्मान को लेकर बड़े – बड़े दावे और बड़ी – बड़ी बातें की जाती हैं और 8 मार्च बीतते ही एक बार फिर घड़ी की सुई पुराने समय पर लौट आती है। समय बदला है और महिलाओं की स्थिति भी बदली है मगर क्या जमीनी हकीकत बदली है? यह सच है कि महिलाएं आगे बढ़ रही हैं और आवाज भी उठा रही हैं और बढ़ती चुनौतियों या यूँ कहें कि बढ़ते महिला अपराधों का एक बड़ा कारण यह है कि अब पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बड़ी चुनौती मिल ही है। दिल्ली का निर्भया कांड हो या पार्क स्ट्रीट का सुजैट जॉर्डन कांड, अभियुक्त इन दोनों महिलाओं को सबक सिखाना चाहते थे। आज भी फतवे, पाबंदी और नसीहतों के साथ बयानबाजी सब महिलाओं के हिस्से आ रही है। महिलाओं को लेकर सोच आज भी नहीं बदली है। आज भी दोहरी मानसिकता महिलाएं हो रही हैं। एक ओर उनको परदे पर सराहा जाता है, इंटरनेट पर खोजा जाता है तो दूसरी ओर उनको अछूत मानकर लोग किनारा भी करते हैं। जाट आरक्षण के नाम पर आंदोलन में महिलाओं को शिकार बनाया जाता है तो दूसरी ओर विश्वविद्यालयों में आजादी के नाम पर महिलाओं की गरिमा को ताक पर रखने का काम भी खुद महिलाएं ही कर रही हैं और इन सब के बीच जो पिस रही है, वह एक आम औरत है। वह आज भी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में ये सारे संघर्ष उठा रही है। यह सही है कि जब कुछ टूटता है तो प्रतिक्रिया होती है और इन अपराधों के पीछे महिलाओं की खामोशी का टूटना है। यह तस्वीर का एक पहलू है मगर स्वाधीनता, अधिकार और अभिव्यक्ति के नाम पर कहीं न कहीं रास्ते भटक रहे हैं और महिलाएं खुद आम महिलाओं की राह में मुश्किलें ला रही हैं। ऐसे में हमारी कठिनाइयों के लिए सिर्फ पुरुष नहीं, कहीं न कहीं हम भी जिम्मेदार हैं क्योंकि एक अदद पुरुष के लिए स्त्री के खिलाफ स्त्री ही खड़ी होती है और पुरुष की गलतियों को नजरअंदाज भी वही रिश्तों के नाम पर करती है। जरा सोचिए कि अगर बलात्कार, हत्या और ऐसे तमाम आरोपियों के घरों की स्त्रियाँ अगर इन अपराधियों का बहिष्कार करने लगे, पति की गलतियों को छुपाने की जगह पत्नी उसका साथ छोड़ दे और अपराध की राह पर चलने वाले या लड़कियाँ छेड़ने वाले भाई को माँ और बहन ही छोड़ दे तो क्या अपराधियों का मनोबल बचेगा? फिर भी ऐसा होता नहीं है। रिश्वत की कमाई से किटी पार्टी करने वाली और घरेलू सहायिकाओं के खिलाफ ज्यादती करने वाली, धारा 498 का दुरुपयोग कर एक आम औरत की लड़ाई को मुश्किल बनाने वाली भी औरतें ही हैं। यह सही है कि महिला सशक्तिकरण जरूरी है मगर क्या एक पहिए को ऊपर उठाने के लिए दूसरे पहिए को जमीन में गाड़ना क्या समस्या का समाधान है? क्या यह गलती को दोहराना नहीं है? प्रतिशोध से विनाश हो सकता है मगर सृजन और परिवर्तन करने के लिए संतुलन होना जरूरी है। जो गलत है, उसे छोड़िए और इसके लिए एक औरत बनकर सोचने की जरूरत है, रिश्ते उसके बाद में आते हैं। निश्चित रूप से हमें अपना अधिकार चाहिए मगर उसके लिए शुरुआत घरों से करनी होगी, जिस दिन हर घर का बेटा महिलाओं का सम्मान करना सीखेगा, उस दिन से अपराध भी अपने – आप कम होंगे और यह काम कोई और नहीं हमें और आपको करना होगा।