रविवार, 25 जुलाई 2021

काश दीदी... बगैर 'खेला किये' चुनाव की जगह जनता का दिल जीततीं



नेताओं को अपने पुराने दिन और पुराने बयान नहीं भूलने चाहिए मगर कोई भी नेता इनको याद नहीं रखता। एक समय था जब भारत में नेताओं के बीच से सही नेतृत्व मिलता था। आजादी के बाद भी 60 और 70 के दशक तक नेता फिर भी मिल जाते थे। फिर 80 का दशक आया और संख्या सिमटती गयी और आज हमारे पास जो नेता हैं, उनको अपनी इमेज बनाने के लिए काम करना पड़ रहा है, पेशेवर सेवाएँ लेनी पड़ रही हैं, प्रचार पर पानी की तरह पैसा बहाना पड़ रहा है। वे स्वनिर्मित नेतृत्व का आभामण्डल तैयार जरूर करते हैं पर वह एक मृगतृष्णा के सिवाय कुछ भी नहीं है।

जिस देश में देश पर व्यक्तित्व भारी पड़ने लगे..वहाँ हमें ठहरकर सोचने की जरूरत है कि आखिर हम किस दिशा में जा रहे हैं। लोग अपना दल बदलने से पहले हजार बार सोचते थे, आज हर चुनाव के पहले नेताओं की मंडी लगने लगी है। प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष रूप से, होटलों में विधायकों को बंद करना पड़ रहा है, रातों - रात सरकारें बदल जा रही हैं और आज की राजनीति कॉरपोरेट संस्कृति में ढलती जा रही है। अगर कॉरपोरेट कार्यसंस्कृति की कर्मठता, अनुशासन, परिणाम पर केन्द्रित होने तक बात सीमित रहती..तब तक फिर भी बात समझ में आती थी लेकिन जनता उपभोक्ता नहीं है...हर व्यक्ति नागरिक है इसलिए नेताओं को अपनी वाणी और आचरण दोनों पर संयम रखना चाहिए मगर आज संयम छोड़िए, सामान्य शिष्टाचार भी नहीं दिखता।

आप कहेंगे कि इतनी बड़ी भूमिका की जरूरत क्यों पड़ गयी...महँगे पेट्रोल ने अटल बिहारी वाजपेयी का बैलगाड़ी प्रतिवाद याद दिला दिया और अब साइकिल वाला प्रतिवाद हो रहा है। प्रतिवाद में एक मर्यादा का होना अनिवार्य़ है। जब बात प्रतिवाद की हो रही है तो इतिहास की ओर देखने की जरूरत पड़ती है...याद आता है सिंगुर औऱ नंदीग्राम आन्दोलन। याद आता है गोलीकांड..सिंगुर आन्दोलन...जिसने ममता बनर्जी को सत्ता तक पहुँचाया।

नंदीग्राम इस बार बंगाल विधानसभा में छाया रहा और ममता बनर्जी यहाँ से चुनाव हार गयीं। एक अच्छा व्यक्ति वह है जो अपनी विजय पर अभिमान न करें और पराजय को गरिमा से स्वीकारना सीखे...दुःख की बात यह है कि दीदी में यह दोनों ही गुण नहीं है। अपने नेताओं की अराजकता पर न तो उन्होंने कल रोक लगायी थी और न ही अब रोक लगा रही है। किसी भी राज्य अथवा देश के सत्ताधारी दल में एक गरिमा होनी चाहिए मगर तृणमूल में जिस प्रकार के नेता और मंत्री हैं...वह उनको गरिमा की सीमा से कोसों दूर ले जाती है। कहते हैं कि जैसा राजा होता है, प्रजा भी वैसी ही होती है, अगर आधुनिकता की भाषा में कहें तो जैसा मुखिया होगा, वैसी ही जनता होगी...और आज बंगाल की जनता को दीदी के खेल में आनन्द आने लगा है। 

बंगाल की संस्कृति सनातन परम्परा की संस्कृति है, बौद्धिकता के आवरण में लपेटी गयी विदेशी आक्रमणकारियों की संस्कृति नहीं है। भले ही सत्ता इस सत्य को दबाने का जितना भी प्रयास करे, सत्य दब नहीं सकता, किसी के घर पर जबरन कब्जा करके बैठ जाने से वह घर आपका नहीं हो जाता लेकिन दीदी अपनी तुष्टिकरण की राजनीति के चक्कर में इस सत्य को दबाने में जुटी हैं और वामपंथी, कांग्रेस औऱ अल्पसंख्यक राजनीति की गुटबंदी से उनको सहयोग मिल रहा है। विधानसभा चुनाव में भाजपा की पराजय से सब बंगाल की जनता की बड़ी तारीफें कर रहे हैं, ऐसे लोगों को याद रखना चाहिए कि हिंसा और गुंडागर्दी से पायी गयी विजय स्थायी नहीं होती, विरोधियों को दबाने की धुन में जब आम आदमी पर अत्याचार होने लगें. तुष्टिकरण की आड़ में जब एक बड़ी आबादी को दबाया जाने लगे तो प्रतिकार होता है और वह पराजय का कारण बनता है। राजनीति और समय में कुछ भी स्थायी नहीं होता...आज जो नहीं हो पाया...वह कल होगा। दीदी को इतिहास देखना चाहिए....कम से कम अपने पुराने दिनों को अवश्य स्मरण करना चाहिए और सोचना चाहिए कि जब अन्याय से परेशान जनता ने 34 साल का शासन उखाड़ फेंका तो देर न सवेर दमन का अंत होता ही है।

इसकी दिशा तो विधानसभा चुनाव ने तय कर दी है। भाजपा ने सीटें भले ही नहीं जीतीं लेकिन बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य से वाममोर्चा और कांग्रेस को गायब कर वह राज्य की प्रमुख पार्टी अवश्य बन गयी है। हो सकता है कि दल -बदल के कारण उसकी सीटें कम हों लेकिन उसने बंगाल की आम जनता को जो उम्मीद दी है, धीरे - धीरे लोगों के दिलों में जगह बना रही है और आपके अन्याय आपको आम जनता से दूर कर रहे हैं। राजनीतिक तिकड़मबाजी से सरकार बन सकती है, दिल नहीं जीते जाते। इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी ने दिल जीते थे, लोकगीतों में गाँधी और नेहरू के नाम दर्ज हैं मगर बंगाल से जो नाम आता है, वह नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का है। दीदी को अपनी जीत पर गर्व जरूर हो रहा होगा...लेकिन उसमें कितना भय है, वह देखिए...एक जननेत्री कहलाने वाली नेत्री को जो 2011 में जनता के समर्थन से जीतकर बंगाल में आयी, आज उसे प्रशांत किशोर जैसे कॉरपोरेट रणनीतिकार की मदद लेनी पड़ रही है, तो यह पतन नहीं तो और क्या है? ये ऐसा है कि किसी बच्चे ने पास होने लायक नम्बर ग्रेस मार्क्स की मदद से पा लिये। कभी खुद को गौर से देखिएगा...आप क्या थीं और क्या होती जा रही हैं...क्रोध, चिड़चिड़ापन. खोने का डर और ऐसे नेताओं पर आपकी बढ़ती जा रही निर्भरता...जिनको आप सम्भवतः कभी खुद देखना भी नहीं चाहती होंगी। 

तृणमूल और भाजपा की कोई तुलना हो ही नहीं सकती। भाजपा एक अनुशासित और कार्यकर्ता आधारित संगठित जनाधार वाली पार्टी है। आर एस एस से घृणा आप जितनी भी कर लें मगर अपने अनुशासन और सेवा कार्यों के कारण वह आम जनता के पास है....और पूरे देश में यही स्थिति है। दूसरी तरफ नन्दीग्राम मामले में दीदी के व्यवहार के कारण जो 5 लाख रुपये का जुर्माना लगा है...वह उनकी छवि को कमजोर करता है...नंदीग्राम की जनता की आलोचना कर उन्होंने उस जनता का अपमान किया, जिसने उनको मुख्यमंत्री बनाया। 

अब दीदी उसी राह पर चल रही हैं, जिसका विरोध करके वह खुद सत्ता में आयी थीं...तापसी मलिक को मोहरा बनाकर कुर्सी पाना अलग बात है पर तमाम विरोध के बावजूद पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की जो गरिमामयी छवि बंगाल की जनता के मन में है, दीदी...उसके आस - पास भी नहीं फटक सकतीं। पराजय और माकपा से चिढ़ के बाद भी आम जनता बुद्धदेव बाबू के सामने आदर से सिर झुकाती है...कई बार मनुष्य हारकर भी हृदय में बस जाता है। भाजपा वह पार्टी है जो जरूरत पड़ने पर त्रिवेन्द्र सिंह रावत जैसों से इस्तीफा ले सकती है, योगी तक को सोचने पर मजबूर कर सकती है और येदुरप्पा को भी सफाई देनी पड़ती है। आज अगर नरेन्द्र मोदी के पक्ष में जनाधार न होता तो सम्भव था कि पार्टी उन पर भी विचार करती। इस पार्टी में व्यक्ति मजबूत तो होता है पर दल का पर्याय कभी नहीं बनता..यह गुण वाममोर्चा में है पर निष्पक्षता नहीं, अगर होती हो तो सोमनाथ चटर्जी जैसे दिग्गज नेता का इस तरह अपमान न होता...वाममोर्चा के हाशिये पर जाने का कारण भी ऐसे नेताओं की उपेक्षा करना ही है। अगर बात तृणमूल की करें तो तृणमूल का मतलब ममता माना जाता है, अगर व्यक्ति किसी संगठन, देश या समाज का पर्याय बनने लगे तो उसका पतन होते देर नहीं लगती। विश्वास न हो तो अपनी समकालीन जयललिता और मायावती और मुलायम और राजद जैसी पार्टियों को देख लीजिए। आज कांग्रेस के सिकुड़ने का कारण ही यही है कि वह गाँधी परिवार में सिमट गया है और नतीजा है कि पार्टी का हर दिग्गज नेता पार्टी छोड़ रहा है। जब तक ममता हैं, उनके नेता तृणमूल के साथ हैं...क्या ममता बनर्जी मजबूती से कह सकती हैं कि उनके न रहने पर अभिषेक बनर्जी को वह स्वीकृति मिलेगी? खासतौर पर तब जब कि जनता के बीच उनकी वैसी लोकप्रियता नहीं हैं, चाटुकारों के भरोसे पायी गयी लोकप्रियता स्थायी नहीं होती।

अब बात करते हैं, दीदी के उनकी ही नीतियों से पलटने की। हमने नंदीग्राम की बात की। आज 13 साल बाद तृणमूल टाटा का स्वागत करने के लिए आतुर हुई जा रही है और यही वह पार्टी है जिसके कारण टाटा को बंगाल से जाना पड़ा था और लाभ मिला गुजरात को जिसने मौके को पहचाना। आपने जिन कृषकों की आड़ में राजनीति की, वह खुद उद्योग चाहते थे...लेकिन आपने राजनीति की। । सिंगुर आंदोलन वास्तव में किसानों का आंदोलन नहीं होकर ममता बनर्जी का राजनीतिक आंदोलन था। अधिकांश किसान भूमि देने पर सहमत थे और उन्होंने क्षतिपूर्ति भी ले ली थी। 997.11 एकड़ में मात्र 400 एकड़ के भू-स्वामी क्षतिपूर्ति लेने को तैयार नहीं थे और ममता ने उन्हीं लोगों को आधार बनाकर आन्दोलन किया था। दरअसल, किसान आपके लिए सीढ़ी थे। आप भी जानती थीं कि उद्योगों की आवश्यकता भी उतनी ही है, जितनी कृषि की, लेकिन आपने इसे राजनीति का हथियार बनाया, सत्ता प्राप्त की, टाटा को राज्य से बाहर किया..सुप्रीम कोर्ट तक मामला गया, आप जीतीं भी। आज वहाँ उद्योग लग जाता तो सम्भव है कि जिले की दशा और राज्य की अर्थव्यवस्था बदल जाती पर आपने ऐसा नहीं होने दिया।

दीदी, आप क्या देश की दूसरी इंदिरा गाँधी बनने का प्रयास कर रही हैं,,और इसके लिए इमेज बनाने में लगी हैं मगर याद रखिए कि इंदिरा जी में कोई अच्छाई या बुराई हो सकती है मगर उनके व्यक्तित्व में जो गरिमा थी, जो नेतृत्व क्षमता था, वह किसी प्रशांत किशोर की मदद लेने से नहीं आ सकती। आप तो खुद को इतिहास में नायिका की तरह दर्ज होते देखना चाहती हैं.. तभी तो आपने अपने शासनकाल में ही, अपनी ही सरकार में रहते हुए उस सिंगुर आन्दोलन को इतिहास में दर्ज करवाया जो आपके लिए सत्ता की सीढ़ी से अधिक कुछ नहीं था। भारत छोड़ो आंदोलन, स्वतंत्रता संग्राम, सिपाही विद्रोह और प्लासी का युद्ध इतिहास के पाठ्यक्रम में शामिल हैं और छात्र इस पर अध्ययन भी करते हैं। सवाल उठता है कि क्या सिंगुर आंदोलन ऐतिहासिक कारणों से सचमुच इतना महत्वपूर्ण हो गया था कि उसे पाठ्यक्रम में शामिल किया जाता? आपने आमरी कांड में अभियुक्तों को हत्यारा कहा और बाद में आपके मंत्री उन अभियुक्तों के साथ मंच साझा करते नजर आए...आप पर किस तरह विश्वास किया जाए। आपने धर्मनिरपेक्षता का हवाला देकर रामधनु को रंगधनु बना दिया और आपके उच्च माध्यमिक शिक्षा परिषद की अध्यक्ष खुलेआम नतीजों की घोषणा करते हुए विद्यार्थी के धर्म का खुलासा करती हैं....क्या यही आपका खेला है?  आपने बंगाल की सुसंस्कृत, परम्परा को मानने वाली जनता को अराजक भीड़ बना दिया है...जिसकी भाषा की मिठास में अभद्रता बढ़ती जा रही है...आप कहाँ ले आयी हैं बंगाल को खुद देखिए....इतिहास आपको कभी माफ नहीं करेगा...आप मनुष्य हैं, अमृतपान नहीं किया आपने और भविष्य का इतिहास आपकी इच्छा से नहीं लिखा जायेगा और आपकी छवि बंगाल की निरंकुश, अहंकारी, अभद्र और तुष्टिकरण की अभ्यस्त मुख्यमंत्री से अधिक नहीं होगी क्योंकि इतिहास किताबों से अधिक जनता के दिलों में बसता है और जिन्होंने आपके राज्य में हिंसा देखी है, वह कभी आपको देवी मानने से रहे।

आप और आपके शिक्षामंत्री ने शिक्षाविदों का परामर्श लेने की जरूरत तक नहीं समझी। क्या सुप्रीम कोर्ट के निर्णय भर से कोई घटना इतिहास बन सकती है? अगर हाँ, तो निर्भया कांड में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया...उसे इतिहास की किताबों में दर्ज होना चाहिए। आज 13 साल बाद आपने क्या किया...जिसके खिलाफ लड़ीं...आज उसी उद्योग समूह का स्वागत करने के लिए तैयार हैं तो यह बताता है कि राज्य में बेरोजगारी कितनी विकट है...आपकी आतुरता इसका प्रमाण है। 

बहरहाल पार्थ चटर्जी ने कहा कि नमक से इस्पात तक बनाने वाले कारोबारी समूह ने कोलकाता में अपने कार्यालयों के लिए एक और टाटा सेंटर स्थापित करने में रुचि दिखाई है। चटर्जी ने यहाँ तक कहा,''टाटा के साथ हमारी कभी कोई दुश्मनी नहीं थी, न ही हमने उनके खिलाफ लड़ाई लड़ी. वे इस देश के सबसे सम्मानित और सबसे बड़े व्यापारिक घरानों में से एक हैं. आप टाटा को (सिंगूर उपद्रव के लिए) दोष नहीं दे सकते।'' वैसे हम उत्सुक हैं कि सिंगुर आन्दोलन का जो पाठ आप अपनी छवि बनाने के लिए बच्चों को पढ़ाती आ रही हैं...उसका क्या करेंगी?






शुक्रवार, 21 मई 2021

एकतरफा प्यार और भाईचारा अब और नहीं निभाना हमें

 

क्या इससे बीमारी नहीं फैलेगी?

आज एक ऐसे निषय को छूने जा रही हूँ जिस पर बात करने में भी लोगों को दिक्कत होती है। खुद मैंने भी नहीं सोचा था कि मैं इस मुद्दे पर कुछ कहूँगी। व्यक्तिगत तौर पर किसी धार्मिक मामले पर लिखने से मुझे परहेज ही रहा है मगर धार्मिक मामला जब राष्ट्रीय होने लगे। जब धर्मनिरपेक्षता और अनेकता में एकता जैसे शब्दों और वाक्यों का दुरुपयोग होने लगे और चालाकी से खामोशी को ढाल बना लिया जाये तो बोलना ही पड़ता है। यही कारण है कि एक वर्जित विषय पर बात करने की शुरुआत कर रही हूँ और वह भी भावनात्मक रूप से नहीं नहीं, किसी कुंठा के साथ नहीं बल्कि तथ्यों के साथ इतिहास में जाकर तलाशते हुए..।

जी हाँ, इस्लाम और हिन्दू - मुस्लिम रिश्ते पर ही बात कर रही हूँ। भारत से विदेशों में गये और जाकर बसने वाले अप्रवासी भारतीय अर्द्ध भारतीय माने जाते हैं...इंडो - अमरीकी....इंडो चाइनीज जैसे शब्द उनके लिए हैं मगर भारत में वसुधैव कुटुम्बकम की परम्परा रही है। हमने सबको अपना लिया...उनको भी भारतीय मान लिया जिन्होंने हमारे इतिहास से खिलवाड़ किया, हमारे मंदिर तोड़े, हमारे पुस्तकालय जलाये...धर्मान्तरण के नाम पर हमारे पूर्वजों के साथ अमानवीय लोहमर्षक अत्याचार किये..मगर सबसे बड़ा सवाल है कि क्या उन्होंने कभी अपनी गलती मानी? मनुस्मृति और बाह्मणों के अत्याचार का हवाला देकर आज तक सामान्य वर्ग और हिन्दू धर्म को मानसिक रूप से प्रताड़ित करते हुए गालियाँ दी जाती हैं। इसके बावजूद कि अयोग्य होते हुए भी अल्पसंख्यक और निचली जातियों के नाम पर आप हमारे अधिकारों पर कब्जा जमाये बैठे हैं...तो आज आपको सुनना होगा...अगर हम आपकी गालियाँ सुन रहे हैं तो आज आप भी खरी - खरी सुनेंगे और खासकर वह अल्पसंख्यक (?) जो शिक्षित तो हैं मगर हिन्दू उनके लिए सिर्फ टूल हैं अपनी तरक्की का...वह जो धर्मनिरपेक्षता के नाम पर सारी सुविधाएं उठाते हैं और जब जरूरत पड़े तो मजहब का परदा लगा लेते हैं.,..जुबान पर जिनकी ताला लग जाता है...वह सभी प्रबुद्ध और प्रगतिशील, शिक्षित मुस्लिम, धर्मनिरपेक्ष और अपनी पहचान के संकट से गुजरने वाले बुद्धिजीवी सुनेंगे। मेरा सवाल उनकी खामोशी को लेकर है जिसमें एक चालाकी है..।

भाईचारे का मतलब यह नहीं होता कि किसी के अधिकारों को खत्म करके, किसी की सुरक्षा से समझौता करके वोटबैंक बनाकर किसी एक वर्ग को आगे बढ़ाया जाए और वह इतना बढ़े कि मनमानी के मद में पागल होता जाए...बल्कि यह होता है कि दोनों ही वर्गों और धर्मों की अस्मिता को बरकरार रखा जाये और दोनों धर्म एक दूसरे के लिए खड़े हों...मगर इस्लाम की सबसे ज्यादा लड़ाई तो हिन्दू लड़ रहे हैं...क्या आप धर्मनिरपेक्ष मुस्लिम दोस्त, बन्धु कभी हिन्दू और हिन्दी के पक्ष में लड़े हैं....जवाब है नहीं....आपके लिए कोई राजेश, सुरेश, सतबीर एक दूसरे की जान का दुश्मन बन जाता है और आप तमाशा देखते हैं और उसका आनन्द उठाते हैं...फिर कैसा भाईचारा? जिन्ना ने आपके लिए देश बना दिया मगर वह आपके साथ नहीं रहा मगर आपके कारण कोई गाँधी अपने ही धर्म के लोगों के बीच बुरा बना,...इस देश ने आप मुस्लिमों के कारण गाँधी को खोया क्योंकि गाँधी आपके हक की ही बात कर रहे थे...वह देश को एक रखना चाहते थे....कोई खान अब्दुल गफ्फार खान भी था जो आपकी ही कौम का था और इस मुल्क से बहुत प्यार करता था मगर आपने अपना आदर्श जिन्ना को चुना। हमें मस्जिदों में जाने से कोई ऐतराज नहीं लेकिन आप मंदिर की तारीफ करने से डरते हैं....क्या यह मौकापरस्ती नहीं है कि सुविधाएं चाहिए तो भारतीय बन जाओ और जब जिम्मेदारी निभानी हो तो मजहबी बन जाओ, मेरा सवाल इस मौकापरस्ती से है...। एक अयोध्या की मस्जिद टूटी और आपने कोहराम मचा दिया...जनाब...कोहराम तो हमें मचाना चाहिए...क्योंकि आपकी सारी मस्जिदें ही हमारे मंदिरों के मलवे पर बनी हैं... आपको फिलिस्तीन में मुसलमानों के मरने का गम है मगर आप पाकिस्तान में हिन्दू लड़कियों के धर्मान्तरण और बांग्लादेश में टूट रहे मंदिरों पर आप एक शब्द नहीं कहते...एक नेता पूरे कोलकाता को मिनी पाकिस्तान बताता है और आपके मुँह में दही जमा रहता है...एक ओवेसी कहता है कि वह 15 मिनट में हिन्दओं को साफ कर देगा और आपमें इतनी हिम्मत नहीं कि आप तनकर यह कह सकें कि एक मुसलमान के होते हुए किसी ओवेसी की यह हिम्मत नहीं है कि ऐसा कहे.,..ऐसा कहने से पहले उसे एक मुसलमान का सामना करना होगा....न....आप सुनते हैं और चुप रह जाते हैं। कश्मीर में आतंकियों की मौत पर दुःख मनाते हैं....भारतीय ध्वज लहराने पर कासगंज में किसी चन्दन को मार डालते हैं,,,,किसी अंकित की ऑनर किलिंग कर देते हैं और जब खुद पर बात आई तो खुद को विक्टिम बताते हैं...। अपनी कौम को अगर आपनी रूढ़ियों के अन्धेरे में रहने दिया तो आप दोषी हैं...आप खुद आगे बढ़े और अपनी प्रगतिशीलता और भारत के प्रति प्रेम अगर आप अपने बच्चों को नहीं सिखा सके हैं, अगर आप तबलीगी जमात, ओवेसी, ओसामा बिन लादेन को भारत से ज्यादा प्रेम करते हैं...तो आप पर सवाल उठेंगे।

दरअसल, कोई भारतीय़ ऐसी नापाक हरकत कर ही नहीं सकता क्योंकि भारतीय होने का मतलब आधार कार्ड और राशन कार्ड का नम्बर भर नहीं है, आपके पूर्वज बाहर से आए, आक्रमणकारी थे और जिनके हाथ हमारे पूर्वजों के खून से रंगे हो, जो भारत के हारने पर पटाखे चलाता हो, वह क्या भारतीय होने के योग्य है?  भारत के अधिकांश मुस्लिम लोगों के पूर्वज हिन्दू ही थे इस बारे में विभिन्न स्रोतों से जानकारी प्राप्त होती हैं । फ़्रन्कोईस गौइटर ने अपनी पुस्तक में माना है कि 99 प्रतिशत से अधिक भारतीय मुस्लिम लोग, हिन्दू मूल के थे जो धर्मान्तरित हुए। इसी प्रकार के विवरण अन्य स्रोतों से भी मिलते है की वर्तमान दक्षिण पूर्वी एशिया के मुस्लिम जनसँख्या के मूल पूर्वज हिंदू थे। 

महाराष्ट्र के एक मस्जिद से लोगों द्वारा पुलिस अफसर को खदेड़ने का वीडियो लोगों को देखने को मिला। चार मीनार के आस-पास की भीड़ की तस्वीरें हों या पंजाब के बाज़ारों से आई तस्वीरें, देख कर हर बार यही प्रश्न उठता है कि नियमों को लेकर जब मुस्लिम समाज द्वारा व्यक्तिगत या सामूहिक आचरण की बात आती है तो फिर प्रशासन को क्या हो जाता है? तब उन्हें क्या हो जाता है जो हिन्दू त्योहारों या धार्मिक समारोहों के खिलाफ लगातार बोलने में जरा भी नहीं हिचकते? क्या हो जाता है जो महामारी के संक्रमण रोकने की जिम्मेदारी केवल हिन्दू समाज पर डालना चाहते हैं? 

आप खुद को भारतीय नागरिक बताते हैं और सारी सुविधाएं पाते हैं..। नोटबंदी के समय बैंकों के सामने कतारों में सबसे पहले नोट बदलने की होड़ से लेकर हर सरकारी सुविधा का लाभ उठाने में आप आगे रहते हैं...सरकारें आपका तुष्टिकरण करती हैं लेकिन आप चुपचाप मलाई खाते हैं। चलिए मान लिया ममता बनर्जी तुष्टिकरण करती हैं मगर आपकी जिम्मेदारी क्या है...आपने फायदा क्यों लिया...अगर आप अपनी मस्जिद के शीर्ष पद पर किसी हिन्दू को नहीं चाहते तो आपने यह कैसे मान लिया है कि मंदिर के शीर्ष पद हम आपकी कौम के किसी व्यक्ति को स्वीकार कर लेंगे? आपने क्यों नहीं कहा कि नहीं, यह गलत है और ऐसा नहीं होना चाहिए...जब आपको ईमाम भत्ता मिला तो आपने ऐतराज क्यों नहीं किया और क्यों नहीं कहा कि अगर हर धर्म के प्रतिनिधि को यह भत्ता मिले वरना आप इसे मंजूर नहीं करेंगे...जब आपकी अकादमी को आगे ले जाने की बात हो रही थी तो आपने क्यों नहीं कहा कि हिन्दी अकादमी को भी बराबर का हक मिलना चाहिए और जब ईद के लिए बाजार खुल रहे हैं तो नवरात्रि पर भी बाजार खुलने चाहिए? आखिर गरीबी तो धर्म नहीं देखती...यह अच्छा है कि पैगम्बर मोहम्मद के नाम पर कार्टून बने तो आप गर्दनें उतार लेंगे और आपके एम. एफ. हुसैन हमारे देवी - देवताओं के अश्लील चित्र बनाकर हमारा अपमान करें तो वह आपकी नजर में कला है। यह क्या विचित्र नहीं लगता कि एक तरफ तो आप महिलाओं को परदे में रखते हैं और सब शाहीन बाग जैसे आन्दोलन होते हैं तो उनको ही सड़क पर उतार देते हैं...अपनी तस्दीक के लिए जब आप कागजात माँगते हैं तो आप कागज नहीं दिखाना चाहते....जब हमें कागज दिखाने में ऐतराज नहीं है तो आपको क्या दिक्कत है।

अगर आपकी कट्टरता बुरी नहीं है तो हमारी कट्टरता गलत कैसे हो सकती है...जब आप हिन्द पर राज्य करने का ख्वाब संजोते हैं तो हम अपने धर्म की रक्षा क्यों न करें...अगर गज्बा ए हिन्द सही है तो हिन्दू राष्ट्र की कल्पना गलत क्यों और कैसे है? अगर आप भारतीय हैं तो इस्लाम आपका मूल धर्म तो है नहीं क्योंकि यहाँ पर धर्मान्तरण से ही इस्लाम का प्रसार हुआ यानी आपके पूर्वज हिन्दू थे...और सम्भव है कि वह धर्म की रक्षा के लिए ही वीरगति को प्राप्त हुए हैं तो आप किसके लिए लड़ रहे हैं। क्या जवाब देंगे अपने पूर्वजों को...कभी सोचा है...। अपनी कौम के बच्चों को भी आपने नफरत ही सिखायी है...वरना मदरसे हथियार रखने की जगह तो नहीं थे...हम हिन्दुओं को अपने धार्मिक मामलों तक ही किसी धार्मिक गुरु की बात सुननी होती है और उसकी भी बाध्यता नहीं है..मगर आपको वोट किसको देना है...यह भी आपकी मस्जिदों से तय होता है...आप हिन्दुओं को काफिर कहते हैं और अपनी हुकूमत के लिए भी आपको एक हिन्दू और वह भी एक ब्राह्मण ही चाहिए....ऐसे में आपको अपना मजहब क्यों याद नहीं आता? आपने नयी दुनिया की रोशनी अपने बच्चों को दी नहीं...वरना खुलकर इन्सानियत और भारत के लिए बोलते। 

इस्लाम में वह लोग भी हैं जो इस देश के लिए जिए...और इस देश के लिए शहादतें दीं...जिन्होंने इस देश को एक किया...आपके आदर्श वह होने चाहिए....अजीम प्रेम जी से सीखिए...हमारे पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे कलाम से सीखिए...कैप्टन हामिद की शहादत को हम भारतीय कैसे भूल सकते हैं...आपको दारा -शिकोह से सीखना चाहिए...रहीम..रसखान...ताज बेगम...आप इनसे क्यों नहीं सीखते....हम ओवेसी या मौलानाओं से शिकायत नहीं कर सकते क्योंकि शिकायत हमें आप जैसे पढ़े - लिखे लोगों से है...उनकी खामोशियों से है...उनकी बेईमानियों से है। भारत को नेताओं ने नहीं, जनता ने बनाया है और जब जनता ठान ले तो उसकी ही इच्छा चलती है। जिस तरह ताली एक हाथ से नहीं बजती, उसी तरह भाईचारा और रिश्ते एकतरफा नहीं होते...गंगा - यमुना अपने अस्तित्व को बनाये रखकर एक दूसरे की रक्षा करके ही साथ रह सकते हैं...और यह तब होगा जब वह एक -दूसरे के बारे में सोचें...उनके हक में आवाज उठाए...उनकी हिफाजत करें...अगर ओम को अजान से दिक्कत नहीं है तो अजान को मंदिरों की घंटियों से समस्या नहीं होनी चाहिए...अगर नेता हमें लड़वा रहे हैं तो यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम उनके उकसावे या सुविधाओं के जाल में न फँसें और तुष्टिकरण न होने दें। किसी को दिखावे के लिए टोपी या तिलक न लगाना पड़े...ऐसे उदाहरण सामने लाइए जिन पर भारत को गर्व हो...अगर शरीयत से मोह है तो संविधान से मिलने वाली सुविधाओं का लोभ भी आपको छोड़ना होगा..,दूसरों की नहीं जानती मगर मैं इतना जानती हूँ कि अगर आपका आदर्श औरंगजेब हैं....अगर आप भारत की हार पर जश्न मनाते हैं...अगर आपको मिनी पाकिस्तान जैसे शब्दों से फर्क नहीं पड़ता...अगर आप वन्दे् मातरम पर ऐतराज करते हैं...अगर आपके लोग आतंक बनकर दूसरों को असुरक्षित कर रहे हैं और आप तुष्टिकरण की मलाई खा रहे हैं तो मेरे लिए आपका सम्मान करना या आपसे प्रेम करना सम्भव नहीं है...भारत भूमि की सन्तान हूँ और इतनी कृतघ्न नहीं कि मैं गुरु गोविन्द सिंह, गुरु तेग बहादुर, छत्रपति शिवाजी महाराज. महारानी जीजाबाई, महाराणा प्रताप के बलिदानों को भूल जाऊँ। मुझे अजान से दिक्कत नहीं है मगर आपको भी हमारे यज्ञ, हवन, मंदिर की घंटियों...त्योहारों का स्वागत करना होगा...। घर - घर में हवन हो, ओम् की ध्वनि हो...गुरुवाणी हो....चर्च की प्रार्थना हो...बुद्घम् शरणं गच्छामि की ध्वनि हो....ऐसा भारत चाहिए मुझे..मेरे तिरंगे को सम्मान मिले...तिरंगे का सम्मान आपका सम्मान हो...ऐसा देश चाहिए हमें।  हमें कुछ गलत कहा जाए तो आपको बुरा लगे...कोई हमारे खिलाफ फैसले ले तो आप हमारे लिए खड़े हो...कोई आपको बुरा कहे तो उसका विरोध करें..कोई आपके अधिकार छीनें तो हम तन जाए...पर जो हो मामला दोतरफा हो...एकतरफा प्यार और भाईचारा अब नहीं निभाना हमें।

मंगलवार, 11 मई 2021

देशप्रेम की सुगन्ध से होकर गुजरता है कवि गुरु का मानवीय विश्व प्रेम

 


रवीन्द्रनाथ...विश्वकवि...कवि गुरु और बंगाल के प्राण हैं रवीन्द्रनाथ ठाकुर। रवीन्द्रनाथ के एक विचार को लेकर कहा जाता है कि उन्होंने मानवता को देश प्रेम से अधिक महत्व दिया...लेकिन लोग यह बताना भूल जाते हैं कि कवि गुरु की मानवता और विश्व प्रेम देश प्रेम के मार्ग से होकर ही गुजरते हैं। रवीन्द्रनाथ ने कभी देश प्रेम का विरोध नहीं किया...जो लोग यह कहते हैं कि वे उग्र राष्ट्रवाद के विरोधी थे...उनको एक बार महाजाति सदन जरूर देखना चाहिए जिसका शिलान्यास उन्होंने किया था और इस महाजाति सदन की स्थापना के पीछे किसी और का नहीं बल्कि हमारे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की ही परिकल्पना और योगदान था। रवीन्द्रनाथ 12 वेलिंग्टन स्क्वायर पर स्थित राजा सुबोध मलिक बासु के घर आते थे और यहीं आया करते थे अरविंद घोष...जो कि उस समय क्रांतिकारी विचारधारा से ही प्रेरित थे और इसी दिशा में काम भी कर रहे थे। रवींद्रनाथ संभवतः ऐसे अकेले व्यक्ति थे जिन्होंने दो देशों भारत और बांग्लादेश के लिए राष्ट्रीय गान लिखा। बचपन से कुशाग्र बुद्धि के रवींद्रनाथ ने देशी और विदेशी साहित्य दर्शन संस्कृति आदि को अपने अंदर समाहित कर लिया था और वह मानवता को विशेष महत्व देते थे। इसकी झलक उनकी रचनाओं में भी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होती है।

रवीन्द्रनाथ को गाते हुए हम बड़े हुए...काबुलीवाला कहानी हम सबने पढ़ी है...उसमें भी देश प्रेम अप्रत्यक्ष रूप से दिख सकता है...काबुली वाले की तड़प में काले पानी की सजा पाने वाले क्रांतिकारियों की व्यथा सी दिख पड़ती है मुझे। इस बार के बंगाल चुनाव में जिस तरह से 'खेला होबे' और 'खेला शेष होबे' के नारे उछले...जिस तरह से जय बांग्ला के राग बेसुरा किया गया...उसने मन को विचलित कर दिया है...सोचती हूँ...ऐसे नारों पर कवि गुरु की क्या प्रतिक्रिया होती, वो कवि जिसने अपने सृजन संसार में पूरे विश्व को समाहित कर लिया....वह जिसने पूरे विश्व को अपनाया...जिसने यह तक कह दिया कि “जब तक जिंदा हूं, मानवता के ऊपर राष्ट्रभक्ति की जीत नहीं होने दूंगा।”....उन पर क्षेत्रीयता का बोझ लाद दिया गया,...किसी भी बड़े व्यक्तित्व से प्रेरित होना कोई बड़ी बात नहीं...हम सब होते हैं...तभी तो गाँधी का चरखा देश में चल पाया...मगर आज उसी राज्य में जब इस प्रेरणा में कटाक्ष खोजा जाता है तो मन डूबकर फिर से कवि गुरु को खोजना चाहता है....इसीलिए आज पहली बार मैं लिख भी रही हूँ...रवीन्द्र संगीत को गाने के लिए भी पहले उसे पढ़ना पड़ता है...समझना पड़ता है...स्कूल के दिनों से ही रवीन्द्र संगीत गाती आ रही हूँ और कॉलेज में तो समझा भी...संगीत सीखते हुए भी रवीन्द्र संगीत गाया...'तुमि कैमोन करे गान...करो हे गुनि'...मुझे तो कभी नहीं लगा कि रवीन्द्र सिर्फ बंगाल के हैं और मैं बिहार से हूँ,,'अबांगाली' हूँ इसलिए मेरा रवीन्द्रनाथ पर कोई अधिकार नहीं,,,,हम सबको सिखाते हुए कभी भी हमारी शिक्षिकाओं ने यह भेद नहीं किया...फिर वह कौन लोग हैं जो हमारे कवि गुरु को अपनी संकीर्णताओं में लपेट लेना चाहते हैं..? 

इस देश ने भगवा वस्त्रों में आध्यात्मिकता खोजी है....आप रक्त खोज लेते हैं.. आपको राम से चिढ़ है...ठाकुर के तो नाम में ही राम है...रामकृष्ण परमहंस...भगवा स्वामी विवेकानंद समेत कई विभूतियों का गौरव है...उसे राजनीतिक हथियार बना देने का अधिकार आपको किसने दे दिया....जब लिख रही हूँ तो बादल छाए हैं....और गीत याद आ रहा है....मन मोरो मेघेर संगी....बादल की भी कोई जाति या राज्य होता है भला...कविगुरु समेत अन्य विभूतियाँ भी तो इन बादलों की तरह ही हैं....साहित्य का अमृत बरसाती हैं...समुद्र मंथन से निकला अमृत अगर समुद्र में रह जाता तो क्या होता इस संसार का....इसी तरह रवीन्द्र का गौरव अगर बंगाल तक ही रह जाए..गाँधी गुजरात तक ही रह जायें...दिनकर बिहार तक ही रह जायें तो क्या होगा इस देश का...इस देश की संस्कृति का? 

भारत के राष्ट्रगान को लेकर भी कहा जाता रहा है कि यह जॉर्ज पंचम के स्वागत में लिखा गया है...जो भी हो...जो चयनित अंश हमारे संविधान में स्वीकृत है...वह हमारा गौरव है मगर इन पंक्तियों को देखें - 

रात्रि प्रभातिल उदिल रविच्छवि

पूरब-उदय-गिरि-भाले,

साहे विहन्गम, पून्नो समीरण

नव-जीवन-रस ढाले,

तव करुणारुण-रागे

निद्रित भारत जागे

तव चरणे नत माथा,

जय जय जय हे, जय राजेश्वर,

भारत-भाग्य-विधाता,

जय हे, जय हे, जय हे,

जय जय जय जय हे

यहाँ राजेश्वर का सम्बोधन किसके लिए है...यह जानने की प्रबल इच्छा है...इन पंक्तियों को देखिए - 

 ‘আমার সোনার বাংলা, আমি তোমায় ভালোবাসি।

         চিরদিন তোমার আকাশ, তোমার বাতাস, আমার প্রাণে বাজায় বাঁশি।


आमार सोनार बांग्ला, आमि तोमाय भालोबासि

चिरदिन तोमार आकाश, तोमार बाताश, आमार प्राणे बाजाय बांशि।

क्या इसमें आपको स्वदेश प्रेम नहीं दिखता....निश्चित रूप से बंगाल की वंदना है इन पंक्तियों में, लेकिन रवीन्द्र देश की बात भी करते हैं...

‘ও আমার দেশের মাটি, তোমার ‘পরে ঠেকাই মাথা।

        তোমাতে বিশ্বময়ীর তোমাতে বিশ্বমায়ের আঁচল পাতা।

        তুমি মিশেছ মোর দেহের সনে, তুমি মিলেছ মোর প্রাণের সনে,

        তোমার ওই শ্যামলবরণ কোমল মূর্তি মর্মে গাঁথা।

        ওগো মা, তোমার কোলে জনম আমার, মরণ তোমার বুকে।’


- ओ आमार देशेर माटि, तोमार परे ठेकाई माथा।

तोमाते विश्वमयीर तोमाते, विश्व मायेर आंचल पाता।

तुमि मिशेछो मोर देहेर सने, तुमि मिलेछो मोर प्राणेर सने,

तोमार ओई श्यामल वरण कोमल मूर्ति मर्मे गाँथा।

ओ गो मा, तोमार कोले जनम आमार, मरण तोमार बूके।

 मातृ भूमि को माँ कहकर कवि गुरु ने अनेक गीत लिखे हैं और मातृभूमि का गौरव गान किया है...कवि विश्व से प्रेम अवश्य करते हैं मगर उनका यह प्रेम देश और मातृभूमि की वन्दना से होकर गुजरता है। एक उक्ति को लेकर उसका सन्दर्भ बिगाड़ देना भी अपराध ही है जो कि तथाकथित बुद्धिजीवी न जाने कब से करते आ रहे हैं। इन पंक्तियों को देखिए -

‘সার্থক জনম আমার জন্মেছি এই দেশে।

        সার্থক জনম, মা গো তোমায় ভালোবেসে।

        জানিনে তোর ধনরতন আছে কিনা রাণীর মতন;

        শুধু জানি আমার অঙ্গ জুড়ায় তোমার ছায়ায় এসে।

        কোন বনেতে জানি নে ফুল গন্ধে এমন করে আকুল,

        কোন গগনে ওঠে রে চাঁদ এমন হাসি হেসে।

        আঁখি মেলে তোমার আলো প্রথম আমার চোখ জুড়ালো,

        ওই আলোতেই নয়ন রেখে মুদব নয়ন শেষে


सार्थक जनम आमार जन्मेछि ऐई देशे

सार्थक जनम, माँ गो तोमा. भालोबेसे

जानिने तोर धनरतन आछे किना रानीर मतन

शूधू जानि आमार अंग जुड़ाय तोमार छाया एशे।

कोन गगने उछे रे चाँद एमन हासि हेंसे।

आँखि मेले तोमार आलो प्रथम आमार चोख जुड़ालो,

ओई आलोतेई नयन रेखे मूदेर नयन शेषे।


रवीन्द्रनाथ जिन्होंने जलियावाला बाग हत्याकांड के विरोध में नाइटहुड की उपाधि लौटा दी...जिन्होंने बंग भंग के विरोध में राखी बन्धन किया...उन रवीन्द्रनाथ को बंगाल और गुजरात में बाँटने चले हैं आप...लज्जा नहीं आती...? रवीन्द्रनाथ वह हैं जो असहमतियों को सम्मान देते रहे...महात्मा गाँधी से भी उनकी असहमतियाँ रहीं मगर एक दूसरे को दोनों ने सम्मान दिया...गाँधी उसी गुजरात से आते हैं जिनकी प्रतिमा के नीचे बैठकर आमरण अनशन होते हैं..आज उसी गुजरात की आलोचना करते आप नहीं थकते। यहाँ न्यूज क्लिक वेबसाइट पर मिले प्रदीप सिंह के एक आलेख का उल्लेख करना भी प्रासंगिक है। लेखक कहते हैं, 'टैगोर और गांधी के विचार, व्यवहार और समझ में जमीन-आसमान का अंतर था। दोनों का यह रिश्ता बराबरी का नहीं एक ‘शिक्षक’ और एक ‘छात्र’ के संदर्भ में है।

टैगोर एक उत्कृष्ट कवि थे जो ‘गुरुदेव’ के नाम से जाने जाते हैं और मोहनदास करमचंद गांधी ‘महात्मा गांधी’ के रूप में लोकप्रिय हुए। आइए हम यह देखते हैं कि आधुनिक भारत के दो महान शख्सियतों को ‘गुरुदेव’ और ‘महात्मा’ का पदनाम कैसे मिला ?


गांधी जी जब भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से गहरे रूप से जुड़े तब यह आंदोलन नेतृत्वहीनता का शिकार था। अरबिंदो घोष और बाल गंगाधर तिलक के राष्ट्रीय आंदोलन से दूर जाने से देश की राजनीति में एक शून्य आ गया था। दरअसल, अलीपुर बम कांड के बाद अरविंदो घोष ने सक्रिय राजनीति से हट कर आध्यात्मिक मार्ग अपना लिया। लंबे समय से स्वराज का अलख लगाते-लगाते तिलक का निधन हो गया था।


इस परिदृश्य का चित्रण करते हुए काकासाहेब कालेलकर लिखते हैं, “एक अंधकारमय और निराशावादी समय”, “भ्रम की एक गहरी अवधि” ने और “निराशा” को जन्म दिया। इसी समय रबींद्रनाथ टैगोर की नजर गांधी पर आकर टिक गयी। जब टैगोर ने इस आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए गांधी को चुना था, तो वह भी केवल इसलिए की उनके सामने उपलब्ध विकल्पों में शायद वह सबसे बेहतर थे।


यह टैगोर ही हैं जिन्होंने गांधी के लिए ‘महात्मा’  शब्द का प्रयोग किया था। टैगोर ने स्पष्ट किया, “‘महात्मा एक स्वतन्त्र आत्मा को संदर्भित करता है जो स्व अब व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं है। यह एक ऐसा स्व है जिसमें सभी शामिल हैं” लेकिन जब टैगोर ने गांधी को ‘महात्मा’ कहा, तो वे अभी तक एक मुक्त आत्मा नहीं थे। इसलिए ‘महात्मा’  शब्द की व्याख्या करते हुए गांधी का वर्णन नहीं था क्योंकि वे उस समय तक ‘महात्मा’ होने के बिंदु पर थे, लेकिन अभी महात्मा बनने के लिए उन्हें अपनी क्षमताओं का और अधिक विकास करना था।गांधी ने टैगोर द्वारा दिए गए इस पदनाम पर खरा उतरने की उम्मीद के बीच अपने को असमर्थ महसूस किया और टैगोर की मदद मांगी। उन्होंने टैगोर को ‘गुरुदेव’ के नाम से संबोधित करते हुए कहा कि यदि वे चाहते हैं  कि ‘गांधी’ महात्मा’ बने तो उन्हें गांधी का ‘गुरु’ बनना होगा। इस प्रकार गांधी का ‘महात्मा’ बनना गांधी और टैगोर का एक संयुक्त प्रयास था।

जब पूना में आमरण अनशन के दौरान गांधी की तबीयत खराब हो गई, तो टैगोर उनसे मिलने के लिए शांतिनिकेतन से पूना पहुंचे थे। जब गांधी ने उपवास तोड़ा, तो उनके सचिव, महादेव देसाई ने टैगोर से गांधी की पसंद की गीतांजलि की एक कविता सुनाने का अनुरोध किया। बाद में टैगोर ने बताया कि गांधी की उपस्थिति में, वह उस धुन को भूल गए थे जिसमें उन्होंने मूल रूप से कविता की रचना की थी, लेकिन फिर भी उन्होंने इसे गाया।

गांधी और टैगोर विचार औऱ व्यवहार के दो भावभूमि पर खड़े थे। लेकिन दोनों का सपना एक था। वह सपना देश को पराधीनता की बेड़ी से मुक्त करके भौतिक संसाधनों से युक्त और आद्यात्मिकता से सराबोर देश बनाना था। साझा स्वप्न को साकार करने के लिए दोनों महापुरुष एक दूसरे के करीब आए। यहां विचार कभी आड़े नहीं आया। लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखा जाए तो महज चुनाव जीतने के लिए विचार परिवर्तन और भिन्न मत रखने वालों पर तीखे हमले किए जा रहे हैं। जबकि दोनों पक्षों का दावा देशहित होता है।'

आपको जिस हिन्दी से शिकायत है...और जिसे लेकर आप अपनी भाषा के प्रति असुरक्षित हो जाते हैं....कवि गुरु ने उस भाषा के महत्व को समझा और यही कारण है कि विश्व भारती में एक हिन्दी भवन भी स्थापित हुआ। रवीन्द्र नाथ कहा करते थे, "शान्ति निकेतन को समस्त जातिगत तथा भौगोलिक बन्धनों से अलग हटाना होगा, यही मेरे मन में है। समस्त मानव-जाति की विजय-ध्वजा यहीं गड़ेगी। पृथ्वी के स्वादेशिक अभिमान के बंधन को छिन्न-भिन्न करना ही मेरे जीवन का शेष कार्य रहेगा।" यही हिन्दी भवन आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का कार्यक्षेत्र रहा...उस हिन्दी को अपमानित करना क्या कविगुरु के विचारों का अपमान करना नहीं है?

अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए टैगोर ने 1921 में शान्तिनिकेतन में 'यत्र विश्वम भवत्येकनीडम' (सारा विश्व एक घर है) के नए आदर्श वाक्य के साथ विश्व भारती विश्वविद्यालय की स्थापना की। विश्वकवि गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर (टैगोर) को मान देते हुए 1935 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय ने उन्हें डी-लिट उपाधि से अलंकृत किया। इस आयोजन के बाद वह प्रयागराज चले गए थे। तब महामना मदन मोहन मालवीय ने स्वयं पत्र लिखकर गुरुदेव को काशी बुलाया था। रवींद्रनाथ टैगोर ने 1888 में छह महीने तक प्रवास किया और यहां का छोटा सा इतिहास भी लिखा। यहीं पर मानसी की अधिकांश कविताएं व नौका डूबी के कई अंश लिखे। उनके प्रवास स्थान पर एक पार्क है। रवींद्र नाथ टैगोर अपने दूर के रिश्तेदार गगनचंद्र राय के यहां गोराबाजार आवास पर ठहरे थे। यहां रहते गुरुदेव की घनिष्टता एक अंग्रेज सिविल सर्जन से हो गई। रवींद्रनाथ अपनी कविताओं का अनुवाद उन्हें सुनाया करते थे। गुरुदेव यहां लार्ड कार्नवालिस समाधि उद्यान में शाम को घूमने जाया करते थे। 

चलिए हमने तो कवि गुरु पर अपनी बात कही....लगे हाथों आप भी बता दीजिए कि आपने प्रसाद, निराला, तुलसी, सूर...कबीर को कितना पढ़ा है...बांग्ला में प्रेमचंद को छोड़कर कितने साहित्यकारों को सम्मान मिलता है,,,,क्या आप भी हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों को वैसे ही सेलिब्रेट करते हैं,,,,जैसे हम रवीन्द्रनाथ को कर रहे हैं,,,,और करते रहेंगे....। मुझे लगता है कि किसी देश का होने के लिए उस देश का जन्म लेना ही काफी नहीं है...उस देश को समझना..और अपना बनाना जरूरी है,...तभी तो सिस्टर निवेदिता, मीरा बेन और मदर टेरेसा से लेकर फादर कामिल बुल्के को हम उतना ही सम्मान देते हैं..। 

आप बात तो विश्व को गाँव बनाने की करते हैं मगर सत्य यह है कि अपनी कुंठाओं के गाँव को आपने दुनिया समझ लिया है। आप चाहते हैं कि आपकी भाषा, आपकी संस्कृति का जयगान हो और आप श्रेष्ठता का दर्प लिये घूमते रहें,.,,,सम्मान एक हाथ से नहीं मिलता,,,सम्मान पाने के लिए पहले सम्मान देना पड़ता है...हमारे लिए कवि गुरु, नेता जी की पहचान इसलिए नहीं है कि वे बंगाल में जन्मे,,,,वह हमारे मन में इसलिए हैं कि उन्होंने खुद को एक क्षेत्र में सीमित नहीं रखा,,,बल्कि इस भारत देश को ,,,समूचे विश्व को अपना लिया....वह कुंठित लोग नहीं थे...नेता जी ने "कोलकाता चलो' का नारा नहीं दिया..."दिल्ली चलो' कहा...इसलिए इस देश के लोकगीतों में वह अब तक बसे हुए हैं....ये लोग आपकी कुंठाओं से बहुत ऊपर हैं...उनको समझना पड़ता है...समझ भाषा, जाति, संस्कृति....क्षेत्र नहीं देखती...देखती तो कार्ल मार्क्स आपके पुरोधा न होते...कवि गुरु बंगाली अस्मिता से अधिक भारतीय वसुधेव कुटुम्बकम के परिचायक हैं,....अब जाते - जाते द्विजेन्द्रलाल राय का एक गीत भी आपके लिए 

- দ্বিজেন্দ্রলাল রায়

ধনধান্য পুষ্পভরা

ধনধান্য পুষ্পভরা আমাদের এই বসুন্ধরা;

তাহার মাঝে আছে দেশ এক- সকল দেশের সেরা;

সে যে স্বপ্ন দিয়ে তৈরি সে দেশ স্মৃতি দিয়ে ঘেরা;

এমন দেশটি কোথাও খুঁজে পাবে নাকো তুমি,

সকল দেশের রানী সে যে-আমার জন্মভূমি।

धनधान्य पुष्पभरा आमादेर एई वसुन्धरा

ताहार माझे आछे देश एक..सकल देशेर शेरा

शे जे स्वप्न दिये तेरि से देश स्मृति दिये घेरा

एमन देशटि कोथाओ खूँजे पाबे नाको तूमि,

सकल देशेर रानी से जे, आमार जन्मभूमि


स्त्रोत साभार - 

राइजिंगबीडी डॉट कॉम

कविता कोश

न्यूज क्लिक

दैनिक जागरण

शुक्रवार, 7 मई 2021

जीता कोई भी हो...हारी तो बस जनता है

 

चुनाव खत्म हो चुके हैं....तीसरी बार तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी ने राज्य की कमान सम्भाल ली है..बड़े जोर - शोर से तृणमूल की जीत का डंका बजाया जा रहा है.....तमाम बड़े और आधुनिक बुद्धिजीवी...कलाकार...खिलाड़ी...पत्रकार...सब के सब दीदी की महिमा गाने में लगे हैं....सही भी है...क्योंकि दुनिया चढ़ते सूरज को सलाम करती है...समय गवाह है कि सत्ता जिसके पास रहती है...लोग वहीं जाते हैं....जाहिर सी बात है...सफलता किसे नहीं अच्छी लगती...जीतने वाले से सब नजदीकियाँ बनाकर रखते हैं...उनके सामने झुकते ही नहीं...चरण वंदना तक करने लगते हैं...लेकिन अपनी आत्मा से पूछिएगा तो....इसमें क्या सचमुच प्रेम है....या आतंक है...और यह आतंक..दोनों ही तरफ से है और बीच में पिस रहे हैं लोग...आम जनता...जिसका कोई अपराध नहीं...अपराध है तो बस इतना कि उसने अपने लोकतांत्रिक अधिकार का उपयोग किया...आधुनिक भारत में आज यही सबसे बड़ा अपराध है...न..मैं किसी का पक्ष नहीं ले रही...पर क्या यह सच नहीं कि तृणमूल ने भाजपा का भय दिखाकर तीसरी बार सत्ता हासिल की है....खासकर मुसलमानों को भाजपा का भय दिखाया...मुसलमानों ने तो भाजपा को रोकने के लिए तृणमूल को चुना ....ध्रुवीकरण की यह राजनीति है....मगर क्या उसके आम मुद्दे...केन्द्र में रहे...लोग भाजपा पर नफरत की राजनीति का आरोप लगाते हैं....लेकिन जितनी घृणा मुझे पढ़े - लिखे...शिक्षित बड़बोले वामपंथियों में दिखती है...उतनी कहीं नहीं....मुझे मेरे कई वामपंथी मित्र (जो मुझे निष्पक्ष पत्रकारिता का पाठ पढ़ाते रहते हैं) ...मेरे व्हाट्सऐप पर भी भारत के हर भाजपा शासित प्रदेश के अपराध की खबरें भेजते रहते हैं लेकिन...एक भी खबर ऐसी नहीं दिखी जिसमें किसी भाजपा कर्मी के साथ हुए अत्याचार की खबर हो...क्यों? कई ऐसे लोग हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कभी समझाते हैं तो कभी एक कदम आगे बढ़ जाते हैं...

हिन्दी के लिए काम कर रही संस्थाओं में वामपंथी चेतना इतनी अधिक सक्रिय है कि वे साहित्य को भी दक्षिण पंथी और वामपंथी खेमे में बाँट देते हैं और उनको ही शिक्षण संस्थानों में पढ़ाया जाता है जो वामपंथी विचारधारा से ओत प्रोत हो और उसकी विचारधारा को आगे ले जाये...आप खुद अव्वल दर्जे के पक्षपाती हैं...आपने बहुत से ऐसे श्रेष्ठ साहित्यकारों को हाशिए पर रखा क्योंकि वे आपकी नजर में संघी हैं...या आपकी विचारधारा से मेल नहीं खाते...आप ऐसे लोगों को दोयम दर्जे का मानते हैं...कोलकाता के लगभग साहित्यिक संगठनों को करीब से देखने का मौका मिला है....पहले समझ नहीं पाती थी मगर अब जब देख रही हूँ तो फिर वहाँ रहने का कोई मतलब नहीं बनता...तो दूरी बना ली...क्यों मैथिलीशरण गुप्त, गोपाल सिंह नेपाली, सुभद्रा कुमारी चौहान...रहीम..रसखान...आचार्य चतुरसेन शास्त्री..अमृतलाल नागर, भगवती चरण वर्मा, विमल मित्र..माखनलाल ततुर्वेदी...कन्हैया लाल माणिकलाल मुंशी.. सियाराम शरण गुप्त, सोहनलाल द्विवेदी,...आचार्य चन्द्रबली पांडेय... जैसे साहित्यकार आपके पाठ्यक्रम से बाहर हैं...।

आज हिन्दी साहित्य के कई विद्यार्थी इनका नाम तक नहीं जानते...जिन आचार्य विष्णुकांत शास्त्री ने कलकत्ता विश्वविद्यालय को अपना जीवन दे दिया आज उसके हिन्दी पाठ्यक्रम में भी उनके लिए जगह नहीं...सबसे बड़े पक्षपाती और एकांगी दृष्टिकोण रखने वाले लोग दूसरों को फासिस्ट कहते हैं तो हँसी के अतिरिक्त और कुछ नहीं आती। आखिर हिंसा के खिलाफ ऐसे बुद्धिजीवियों ने आवाज नहीं उठाई...गौरी लंकेश को लेकर रोने वाले...अपने ही राज्य में हो रही मौतों पर इसलिए मौन साधे रहे क्योंकि यहाँ इनके हाथ से मलाई निकल सकती थी...क्या आपको अधिकार है कि आप नैतिकता की बात करें?

इस चुनाव में जगह - जगह पोस्टर लगाये गये...बीजेपी के वोट दिबेन ना....क्या यह जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन नहीं है...और वे होते कौन हैं हमको बताने वाले कि हमें किसको वोट करना है और किसको नहीं...इस चुनाव में आम आदमी ने स्वेच्छाचारिता और मनमानी की हदें पार होती देखीं...बंगाल की अभिजात्य जनता ने भारतीय होने से अधिक जरूरी बांगाली होना समझा...मगर यह बांगाली होना क्या है...हमारी नजर में भारत में रहने वाले हर नागरिक को जिस तरह भारतीय कहते हैं...वैसे ही बंगाल में रहने वाला हर नागरिक बंगाली ही है..मगर यहाँ इस पहचान को क्षेत्रीयता से जोड़ा गया....आए दिन यूपी - बिहार - झारखंड के लोगों को गुंडा कहा जाता है...और हिन्दी भाषी लोग पलक पांवड़े बिछाए अपनी हताशा को खुशी में बदलने की कोशिश कर रहे हैं...।

इस बार के चुनाव में 'खेला होबे' और 'जय बांग्ला' का नारा दिया गया....और इसमें आपको कुछ भी गलत, अभद्र या धमकी देने वाला नहीं लगा....जो बंगाल अपने मंचों पर भी बॉलीवुड संगीत और डीजे बर्दाश्त नहीं करता...अपनी संस्कृति की दुहाई दिया फिरता है....वहाँ यह स्लोगन ...बाकायदा डीजे के साथ विरोधियों को धमकाने के लिए दिया गया औऱ बंगाल के वामपंथी समाज और हिन्दी के रीढ़विहीन समाज को इसमें कुछ भी बुरा नहीं लगा? 

बंगाल की जनता के पास चयन था कहाँ...एक तरफ आतंक तो दूसरी तरफ निरंकुश रूढ़िवादी लोग...जो स्त्री को नियंत्रित करने में अपनी ताकत झोंकते रहे...जो विकास की बात नहीं करते बल्कि यह बताते कि महिलाओं को क्या पहनना चाहिए..क्या नहीं...लव जेहाद के खिलाफ क्या करेंगे...क्या आपको लगता है कि जनता को इसकी जरूरत है...21वीं सदी के भारत को 8वीं सदी का शासन नहीं चाहिए..फिर वह बंगाल हो या उत्तर प्रदेश हो...मगर ममता यह शासन किसके भरोसे देने वाली हैं,,,अपने बेलगाम युवा कार्यकर्ताओं के भरोसे.....? इस लिहाज से तो एबीवीपी भी पीछे नहीं..आपने अपने स्वार्थ के लिए युवाओं को अपराधियों में बदल दिया...पर आप उनको कैसा भविष्य देने वाले हैं...यह भी जानना जरूरी है...राम को रंग किया जाएगा...क्या यह तुष्टिकरण की राजनीति भाजपा और तृणमूल की तारणहार हो सकेगी।

मर रहा है तो आम आदमी मर रहा है...घरों में उसके आग लग रही है,..दुकानें उसकी जल रही हैं...कोरोना के खतरे को धता बताकर भाजपा और तृणमूल के रैली उत्पात ने बंगाल के आम आदमी को मौत का उपहार दिया है...। दीदी जिस बिहारी से नफरत करती हैं...आज उसी बिहारी की बदौलत तीसरी बार कुर्सी पर बैठी हैं।

इस मामले में अगर सबसे अधिक फायदे में रहा तो वह हैं प्रशांत किशोर...उनको भाजपा से और जद (यू) से बदला लेना था और अब बंगाल में उनकी राजनीतिक जमीन तैयार होगी...प्रशांत किशोर को सब कुछ पता था मगर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और तथाकथित प्रोफेशनल जिद में उन्होंने बंगाल की जनता को दांव पर लगा दिया.. मुसलमानों के मतों का ध्रुवीकरण करने वाले प्रशांत किशोर ही थे...वह जानते हैं कि यूपी - बिहार और झारखंड के लोगों को लेकर तृणमूल का रवैया क्या है....इसके बावजूद उन्होंने अपने फायदे के लिए सबका भविष्य,  सबकी जिन्दगी दाँव पर लगा दी। उनको जलते बंगाल की आग से ,.,..,खून से कोई फर्क नहीं पड़ता...प्रशांत किशोर जी ...अब इन लाशों पर चलकर राज्य सभा जायेंगे...और उनके साथ यशवंत सिन्हा भी हैं...,मुबारक हो ...नेता ऐसे ही होते हैं....गलती हमारी थी...हमने आपको मनुष्य समझ लिया था।

पर एक बात...आप कब तक ऐसी पार्टी को बचाएंगे जिसमें सिर्फ एक ही व्यक्ति है...जिसने कभी किसी को पनपने ही नहीं दिया,....समय सबका आता है...सबका समय बदलता है...इतिहास भी बदलता हैं...यह उत्थान काल है तो पराभव भी साथ ही है....बंगाल आपके लिए एक सीढ़ी है...और राजनीति की शतरंज पर आपने तृणमूल को मोहरा बनाकर अपना बदला पूरा किया...क्या आपको आधुनिक द्रोणाचार्य कहा जाए...आप खुश हैं....आपकी रणनीति काम कर गयी....आप चाणक्य कहे जा रहे हैं ...क्या आप वाकई खुश हैं...तो संन्यास किसलिए लिया...हाँ....रक्त से जो जमीन आपने सींची है...उसकी फसल तो आप काटेंगे ही...भावी राज्यसभा सांसद ...एक बिहारी...लेकिन...बस इतिहास आपको जयचंद की तरह ही याद रखेगा...अगर बिहारियों के साथ किसी भी तरह की बदसलूकी होती है और बिहारी ही क्यों....बंगाल में होने वाली हर हिंसा के जिम्मेदार आप होंगे और हमारी नजर में आप जयचंद ही हैं.,..एक द्रोही...और कुछ नहीं। हम बंगाल के बिहारी आपका यह उपकार कभी नहीं भूलेंगे।

मंगलवार, 4 मई 2021

कविगुरु और आपकी आत्ममुग्धता के आगे भी एक दुनिया है

क्या हिन्दीभाषियों पर खुद को सत्ता के प्रति समर्पित साबित करने का दबाव है...क्या वे खुद को बंगाली से भी अधिक बंगाली साबित करने में लगे हैं...और इसके लिए वे किसी भी हद तक जा रहे हैं...सोचते - सोचते अब इस नतीजे पर पहुँचना पड़ रहा है कि ऐसा ही है और यह बीमारी पढ़े - लिखे बुद्धिजीवी वर्ग में अधिक है....यह असहज ही नहीं बल्कि नकली भी है...सोच का दायरा सिर्फ बंगाल तक सिमट गया है और क्योंकि सत्ता को खुश करना है तो उसके हर विरोधी पर अपनी कुंठा के तीर चलाए जा रहे हैं....एक समय था जब वाम का जोर था...आज बंगाल का हर दूसरा युवा वाम विचारधारा को वहन करता जा रहा है और राम उसके लिए एक अवशब्द लगने लगे हैं....बात व्यक्तित्व की हो तो भी अगर कोई विरोधी विचारधारा का मिल जाये तो लोग इनबॉक्स में जाकर भी उस पर अपना क्रोध निकालते हैं, उसे प्रभावित करने या नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। खुद में 72 छेद हों मगर सामने वाले के सामने अकड़ ऐसी कि पूछिए मत...अपमानजनक मीम साझा करने में कोई पक्ष पीछे नहीं है...हम समझते थे कि यह रोग बच्चों तक सीमित होगा मगर कई बच्चों के अभिभावक भी यही सब करने लगें तो उनको खुद से पूछना चाहिए कि वे नयी पीढ़ी को क्या सिखा रहे हैं...

राजनीतिक विचारधारा कुछ भी हो...मगर सोशल मीडिया के दौर में आपका अभद्रता में लिपटा शालीन व्यवहार भी आपकी पोल खोलने के लिए काफी है। इस लम्बी भूमिका के पीछे भी एक कारण है...पीएम साब की दाढ़ी...जिसको देखकर भद्र लोक से लेकर भद्र लोक में अपनी गिनती करवाने को व्याकुल हिन्दी समाज को मिर्च लगी है क्योंकि उनको लगता है पीएम रवीन्द्रनाथ बनने का प्रयास कर रहे हैं। 

रवीन्द्रनाथ बड़े कवि हैं...बंगाल के लिए तो बहुत बड़े पर क्या इसका मतलब यह है कि वह इतने अनुकरणीय हैं कि कोई व्यक्ति अपनी पूरी जीवन शैली अपना पहनावा बदल दे...वह भी ऐसे व्यक्ति के लिए जिसे वह ठीक से जानता भी नहीं है...रवीन्द्रनाथ बंगाल की शक्ति हैं तो बंगाल की सीमा भी रवीन्द्रनाथ ही हैं। जिस धरती पर चैतन्य महाप्रभु, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, खुदीराम बोस जैसी अंसख्य विभूतियाँ हों...वहाँ कोई सिर्फ रवीन्द्रनाथ को क्यों चुनेगा...कम से कम हम जैसे लोग तो कतई नहीं चुनेंगे...

बंगाल की पूरी दुनिया ही इसी आभामण्डल में सिमटी है...आत्ममुग्धता के भंवर में फँसा बंगाली समाज इस मरीचिका से बाहर निकलना ही नहीं चाहता। उसने बंकिम चन्द्र, शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय, ताराशंकर बन्द्योपाध्याय जैसे लेखकों को रवीन्द्र बरगद के नीचे दबा दिया। बेटी को माँ कहने वाले समाज ने बेटी को सम्मान तो खूब दिया मगर उसके अधिकारों की रक्षा करना उसे याद नहीं रहा। अगर ऐसा होता तो स्वर्ण कुमारी देवी, सरला देवी चौधरी, बेगम रुकैया, प्रीतिलता वादेदर, कादंबिनी गांगुली की जयंती धूमधाम से मनती,,,जैसे कविगुरु की मनती है..।

ये किस दृष्टिकोण से आपको रवीन्द्रनाथ ठाकुर का अनुकरण लगा...?

तृणमूल में एक ही महिला केन्द्र में है..,मगर उसने मशक्त युवा नेत्रियों को खड़ा नहीं किया। छात्र संगठनों के पास कद्दावर छात्राएं नेतृत्व के लिए नहीं हैं। माकपा और कांग्रेस जैसे दलों में स्त्रियाँ हाशिए पर ही हैं और जो हैं..उनके पास अपनी आवाज नहीं है...

किस बात का अहंकार है आपको...आत्म मुग्धता के जाल में फँसे वामपंथी इतिहास याद करते लोगों खासकर युवाओं को अहंकार किस बात का है..? पर बात दाढ़ी की...तो आपको रवीन्द्रनाथ ही याद क्यों आए...ठाकुर रामकृष्ण परमहंस याद आते...गुरु नानक को याद कर लेते...ऋषि परम्परा को याद कर लेते...कबीर...गुरु गोविन्द सिंह को याद कर लेते...जो लोग पद और पुरस्कार के लालच में रातों - रात अपनी विचारधारा बदल लें...पूँजीवाद को गरियाते हुए उसी के चरणों में लोटने लगे तो ऐसे रीढ़विहीन लोगों से उम्मीद क्या की जाए। हिन्दीभाषी बुद्धिजीवियों पर तो सिर्फ तरस ही खाया जा सकता है। जो लोग कोरोना और प्रोटोकॉल को लेकर पीएम पर ताने कस रहे थे...आज तृणमूल के उत्पात और राज्य में चुनाव के बाद होने वाली हिंसा पर मौन हैं। बंगाल जल रहा है और आप नीरो की तरह बाँसुरी बजा रहे हैं...धिक्कार है आप पर।

ममता अगर मदर टेरेसा से प्रभावित हैं तो यह अपराध नहीं है तो पीएम की दाढ़ी में दिखते रवीन्द्रनाथ से इतना भय क्यों है..जबकि पीएम मोदी ...रवीन्द्रनाथ से नहीं...नाना जी देशमुख से प्रभावित हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन समाज सेवा में लगा दिया....बहुतों ने तो नाम भी नहीं सुना होगा.....मगर सत्य तो यही है कि कविगुरु के आगे भी एक दुनिया है और हर किसी को रवीन्द्रनाथ अनुप्राणित करते हों,. यह जरूरी नहीं है। 

शनिवार, 1 मई 2021

या मानवी सर्व भूतेषू - भाग -2 - मानवी का पत्र

 


ईश्वर के नाम खुला पत्र, 

  दयालु, करुणा निधान, भोले -भण्डारी...कृपा सिन्धु कहे जाने वाले ईश्वर....यह तुम्हारी ही सन्तान का पत्र है....जिसे तुमने ही एक उद्देश्य से धरती पर भेजा है....धरती को सन्दर बनाने का उद्देश्य है....तुम्हारा ही अंश हूँ मैं....वह धरती...जिसे तुमने रचा है और आज जिसके प्रति तुम निष्ठुर हो चले हो....वह भी तुम्हारी ही रचना है...तुम्हारी ही एक प्रिय सन्तान ठाकुर रामकृष्ण परमहंस ने कहा था...जतो मत...ततो पथ...मैं कट्टर नहीं हूँ...जो धरती तुम्हारे प्रकोप से कराह रही है...उस धरती की सभी सन्तानें भी बुरी नहीं हैं...मेरे लिए धर्म एक ही है मानवता....सन्तान को गढ़ना तो माता - पिता का काम है.....धरती का यही नियम है...सन्तान....अच्छी हो या बुरी हो....उसे मार्ग दिखाना...उसके सिर पर हाथ रखना तो उनका ही दायित्व है.....जब तुमने उसे ही बनाया है तो हे ईश्वर....उसके पाप - पुण्य, उसके सभी कर्म - दुष्कर्म का भागी भी तुमको ही बनना चाहिए...आज धरती पर जो हो रहा है, उसका कारण क्या तुम्हारी उदासीनता नहीं है....कैसे अभिभावक हो तुम प्रभु...जिसने बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दिया और सुध तक नहीं लेती है....माता - पिता की नजर अपने बच्चों पर रहती है और तुमने उस धरती से मुँह मोड़ लिया...जो तुम्हारी ही रचना है...जिसके मोह में पड़कर तुम धरती पर आते रहते हो...क्या उस धरती के प्रति तुम्हारा कुछ दायित्व नहीं है...अन्तर्यामी हो प्रभु...हम सबके मन में क्या चल रहा है...तुम सब जानते हो....माता -पिता रुष्ट होते हैं...डाँटते हैं...तुम डाँट चुके....थोड़ा पीटते भी हैं....तुम पीट भी चुके...पर माता - पिता सन्तान की गलती पर उसके प्राण थोड़ी न छीनते हैं......मगर तुम तो वही कर रहे हैं....जब बच्चे ही नहीं होंगे तो तुमको माता - पिता कहेगा कौन....

हे महादेव....तुम्हारी ही ज्योति से जन्मी हूँ मैं.....याद है न आपको.....आपका कैलाश पर्वत इसी धरती पर है......क्या इस भारत भूमि और समस्त सृष्टि का ऋण तुम पर नहीं है? भारत भूमि की काशी आपके ही त्रिशूल पर टिकी है, आप अपनी ही नगरी उजाड़ने में लगे हैं....यह कैसा क्रोध प्रभु...हे माता विन्ध्यवासिनी...जय माँ शेरावाली कहकर....आपके भक्त अनगिनत कष्ट सहकर आपके द्वार चले आते हैं...कई तो बीच में ही चले जाते हैं....क्या इनकी दुर्दशा देखकर आपका हृदय नहीं पसीजता....शिव - शक्ति आखिर धरती की दुर्दशा कैसे देख रहे हैं....जिसे करुणा चाहिए...उसे आप क्रोधाग्नि में जला रहे हैं....आखिर क्यों.....? क्या धरती का संरक्षण आप सबका दायित्व नहीं है....? 

संसार में जो होता है...आपकी इच्छा से होता है...जब आपकी इच्छा के बगैर एक पत्ता तक नहीं हिल सकता है तो सृष्टि में जो गलत हो रहा है...उसका भागी सिर्फ मनुष्य कैसे....आप अपने दायित्व से पीछे कैसे हट सकते हैं...और यही स्थिति रही तो क्या कोई विश्वास के साथ कह सकेगा कि 'चिन्ता की बात नहीं....ईश्वर हैं न...सब सम्भाल लेंगे? ' अपने बच्चों की श्रद्धा, उनका विश्वास, उनकी निष्ठा...उनका समर्पण....उनका परिश्रम...क्या आपके लिए कोई मायने नहीं रखता? एक बार धरती का दुःख तो समझ लेते....आपकी एक सती ने प्राण त्यागे थे तो आपने समूची सृष्टि में तांडव मचा दिया था...आज मनुष्य मर रहा है...वह किसके समक्ष तांडव करे...प्रभु भय से कुछ नहीं होता....न प्रीति होती है....न श्रद्धा जन्म लेती है....अगर भक्ति का मापदंड करुणा, प्रेम..श्रद्धा न हो तो वह बेकार है....क्या मेरे प्रभु इतने निष्ठुर और कमजोर हैं कि उनको अपनी सत्ता जताने के लिए विनाश की आवश्यकता पड़े?  मैं नहीं मानती.....आप सक्षम हैं.....आप सृष्टि के रचयिता हैं....अपनी इतनी सुन्दर रचना को ....नष्ट होते आप नहीं देख सकते....देखना चाहिए भी नहीं है...क्योंकि सृजन का एक छोटा सा बीज प्रलय की विकरालता पर भारी है....

माँ सरस्वती भी तो सृजन का मंत्र देती हैं....इसी सृजन से ही तो धरती और सुन्दर हुई है...संगीत, नृत्य, श्लोक, प्रतिमाएं, चित्र, ये सब तो मनुष्य ने ही गढ़े हैं...आपकी दृष्टि उसकी रचनात्मकता पर क्यों नहीं पड़ी....आपकी ही महिमा का बखान है....हर जगह....लोग कण - कण में आपको देखते हैं...उनके सृजन में कला के प्रति प्रेम ही नहीं बल्कि दृढ़ विश्वास भी है....क्या इस विश्वास की रक्षा करना आपका दायित्व नहीं है....? हे सृष्टि के पालक विष्णु....माता लक्ष्मी....आपका क्षीरसागर इसी धरती पर है.....हे राम.....आप तो राजा राम ....हैं....राम राज्य का उदाहरण दिया जाता है....अपनी अयोध्या को संकट में कैसे छोड़ सकते हैं.....हे कृष्ण....आपकी मथुरा....वृन्दावन....द्वारिका....सब आपकी राह देख रहे हैं....माँ काली तो हमारे पास ही वास ही करती हैं....क्या आप अपने बच्चों की रक्षा नहीं करेंगी माते....? माता लक्ष्मी...दीपावली पर अपने बच्चों का उत्साह तो आप देखती ही होंगी...आपके होते हुए आपके बच्चे भूखे मर रहे हैं....मैं तो देवत्व की तमाम परिभाषाओं को देखकर सोच में पड़ जा रही हूँ...यहाँ मानव बुरा है तो वह मानवता के लिए अपने प्राण भी दे रहा है..नैतिकता और मानवता के मापदंड ईश्वर के लिए अलग और धरती और धरतीवासियों के लिए अलग हों...यह तो हो नहीं सकता न.....

आप प्रलय लाकर भी देवता हैं और धरती पर मनुष्य के प्राणों की रक्षा करने वाले मनुष्य के योगदान का कुछ भी मूल्य नहीं....प्रश्न तो हमको आपसे करने चाहिए...अपने - अपने कार्यों के बाद धरती को बगैर सुरक्षा के आपने छोड़ कैसे दिया...? क्या धरती का निरन्तर संरक्षण आपका दायित्व नहीं था? अगर मनुष्य ने कुछ गलत किया तो उसे आरम्भ में ही आपने क्यों नहीं रोका...? बहुत से देवता, ऋषि - मुनि ऐसे हैं जिन्होंने छल - प्रपंच का सहारा लिया....मगर वे पूजे जाते हैं....अगर यह सही है तो मनुष्य पूजनीय क्यों नहीं हो सकता? क्या धरती वालों से भक्ति प्राप्त कर...अपने महिमा मंडन पर सन्तुष्ट हो जाना ही देवत्व है और यही मनुष्य करे तो वह उसका अहंकार बन जाता है...? 

मैं बहुत नासमझ हूँ...मैंने ईश्वर को परम पिता परमेश्वर कहा है...माताओं में माँ को देखा है....बच्चा अपने माता - पिता से शिकायत न करे तो किससे करे...कहाँ जाये...?  आप यह विनाशलीला बन्द करें....तब तो सृजन का कार्य आगे बढ़े...पहले अपनी क्रोधाग्नि से मेरी धरती मइया को मुक्त करेंगे तभी तो उनकी हरितिमा वापस लौटेगी....मक्का - मदीना....जेरुसलम....ननकाना साहब.....सारी दुनिया में आपके अलग - अलग रूप पूजे जाते हैं पर मैं तो भारत भूमि से हूँ...वहीं भारत भूमि .....जहाँ आपने असंख्य अवतार लिए...लीलाएं कीं....बताया कि वसुधैव कुटुम्बकम होता क्या है.....क्या उस वसुधा के प्रति उस भारत भूमि के प्रति आपको लेश मात्र भी मोह नहीं....जरा सा भी प्रेम नहीं हैं....वह हमारी ही नहीं आपकी भी मातृभूमि है.....जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी....

आप ही तो कहते हैं....यदा - यदा हि धर्मस्य......तो हम आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं....अब बहुत हुआ....यह तांडव समाप्त कीजिए....वरना ऐसा न हो....आपके प्रति विश्वास रखने वाला ही कोई न हो क्यों भक्त को ईश्वर चाहिए तो ईश्वर को भी भक्त चाहिए...अगर संतान को माता - पिता चाहिए तो माता - पिता को भी सन्तान चाहिए....अब अपना वरद हस्त धरती माता पर रखिए....इतना गुस्सा ठीक नहीं ...मान जाइए....मनाने वाले रूठ गये तो बड़ी दिक्कत होगी फिर....कहे देते हैं....सुन रहे हैं न आप लोग....आइए....हम सब आपकी करुणा की प्रतीक्षा में हैं....जीवन का रस धरती पर बरसाइए...कि सृजन का रथ चलता रहे.....।

मानवी

आप सबका अंश और उससे पहले धरतीपुत्री


मानवी पत्र के उत्तर की प्रतीक्षा में है....धरती पर हो रहा करुण - क्रन्द्रन....वायरस के कारण हो रहे मृत्यु तांडव ने उसे विवश कर दिया था कि अब वह अपनी बात कहे...उसने कहा और एक कागज उसे पैर के पास पड़ा मिला...

प्रिय पुत्री मानवी,

प्रसन्नता है कि तुम अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित हो...देखो...बहुत कुछ करना बाकी है...तो विश्राम नहीं, अब श्रम के लिए तैयार रहो...धरती की चिन्ता मत करना...अब सब ठीक होगा..।

निर्माण, पालन और विध्वंस...यही तो सृष्टि के नियम हैं..पुराने पत्ते झड़ते हैं तभी तो वसन्त आता है...बुरा बीतता है तो अच्छा होता है....अंधकार के गर्भ में ही तो प्रकाश छिपा होता है...। रात बीतती है तो भोर होती है...तुम वही भोर हो...।

हमने कभी नहीं चाहा कि आडम्बर से हमें पूजा जाये या कोई भय के कारण कोई हमारी आराधना करे...अगर भय भक्ति का कारक है तो इससे अधिक शोचनीय....और लज्जास्पद तो कुछ हो ही नहीं सकता...। हम तुम्हारी इस बात से सहमत हैं कि प्रत्येक देवी - देवता एक जैसे नहीं तो मनुष्य भी सारे एक जैसे नहीं हैं...नियम तो फिर नियम हैं...अगर ध्यान से देखोगी तो पाओगे कि हर एक अवतार में देवी - देवताओं ने भी अपने कर्म फल को स्वीकार किया है...मनुष्यों की तरह की सुख - दुःख का जीवन जीया मगर यह हम मानते हैं कि धरती का संरक्षण सिर्फ मनुष्यों का ही दायित्व नहीं...अपितु हमारा भी है...निरंतर संरक्षण हमारा दायित्व है....धरतीवासियों की पीड़ा अब समाप्त होगी। हम...तुम्हारी और हमारी धरती को स्वस्थ कर रहे हैं...। हम अपना दायित्व निभायेंगे, निभा रहे हैं...तुम अपना दायित्व निभाओ...हमारा संरक्षण....स्नेह...प्रेम...समस्त भावनाएं तुम्हारे साथ हैं....

विजयिनी भव

समस्त देवलोक परिवार


   

   

शनिवार, 24 अप्रैल 2021

तो ए मंजीत बाबू ...

 

 अब आप कहेंगे कि ठगा जाने के बाद ठग को कोई लिखता है भला...उसको तो कोसता है सब...अरे...रुकिये जरा...कोस तो हम भी रहे हैं...लेकिन थोड़ा कोसना तो हमको अपने लिए सुरक्षित रखना होगा...काहे कि गलती तो हमरा भी है...उ बटन टिपवाये...अउर हम टीपते चले गये...तो हम अपने को कोस चुके हैं...लेकिन लिख रहे हैं कि अब लगा कि बतियाना चाहिए...जाने किस जामताड़ा...अनारताड़ा से हैं इ लोग लेकिन ...कुछ बात करना ही है तो देखिए टोकियेगा मत....ओनली लिसेन...बूझे...तो

हाँ तो...मंजीत और अनिल...अरे...आप तो इतने डरपोक हैं कि नमवो असली नहीं रखे हैं...उ तो पेटीएम का स्लिप देखकर पता चला कि एक ठो इरशाद है और दूसरा देवेन्दर...हमरे जैसे लोगों के लिए तो अव्वल दर्जे के छछंदूर..

.का लगा था आपको...आपसे ठगाकर हम मातम मनाएंगे...? देखिए...हम पहले ही बोले कि मीडिया से हैं...एक नम्बर के थेथर...ऊपर से हैं बिहारी...और लिखने का भी है बीमारी.....देख लीजिए विद् स्माइलिंग फेस आपके सामने हैं...हाँ तो हम का कह रहे थे...आपके माता - पिता ने आपका नाम कितना प्रेम से रखा होगा...मेरा नाम करेगा रोशन टाइप...अउर आप लोग का किये जी...मिट्टी में उनका नाम मिला दिये...शरम तो आपको होगा नहीं...निर्लज्ज हैं...तभी तो ऐसा काम करते हैं आप लोग....

आप तो माल उड़ा रहे हैं...ऐश कर रहे हैं और आपके पीछे...आपको खोजते हुए जब पुलिस घर पहुँचती होगी तो कभी सोचा है आपने कि आपके बूढ़े माता - पिता का क्या हाल हुआ होगा....किसी के मेहनत का कमाई उड़ाकर अगर उनको आप दवा भी देंगे तो वह जहर होगा उनके लिए...अनाज खरीदेंगे...तो उसमें किसी का बद्दुआ होगा...क्योंकि यह भी हो सकता है कि आप जो अनाज खरीद रहे हैं...उसमें किसी किसी किसान का पैसा होगा...जो बीज खरीदने के लिए रखा हो...जिसके घर में बच्चे भूखे हों...पशुओं के लिए चारा न हो...और जो पैसा आपने लूटा...वह उसकी आखिरी पूंजी हो...हम जानना चाहते हैं कि क्या आपका हाथ उठेगा ऐसा अनाज खरीदने और खाने के लिए...? अगर अपने परिवार के लिए ठगी कर रहे हैं तो क्या ऐसा पैसा बरकत देगा और परिवार का भला होगा...?  कैसा लगता होगा कि जिस माता - पिता ने आपको इतना बड़ा किया...अपना खून देकर बड़ा किया....आपने बदले में उनको क्या दिया...एक अपराधी का बाप होने की सजा...उस माँ का गुनाह क्या है जिसने 9 महीने आपको अपनी कोख में सींचा कि बेटा या बेटी...जो भी हों...बुढ़ापे का सहारा बनेंगे...आपने उनको क्या दिया...अपराधी की माँ होने का दर्द...एक बार भी नहीं सोचा कि आप पकड़े जाएंगे तो आपके पीछे आपके घरवालों का क्या होगा...आपकी बहन य़ा आपके भाई को उसकी ससुराल और दोस्तों में आपके कुकर्मों के कारण ताने सुनने को मिलेंगे तो उनकी दशा क्या होगी...इस बहन ने आपकी कलाई पर राखी बाँधी थी...आप उसकी ऐसे रक्षा करेंगे...और कल को आपके कारण इनमें से किसी ने कुछ गलत कर दिया तो क्या खुद को माफ कर सकेंगे आप...?

और यह अपराध की गठरी लेकर कैसे जीते हैं आप..यह जानना भी दिलचस्प है...मैं कोई संत या महात्मा नहीं हूँ पर इन्सान तो हूँ...भाई आपको क्या हक है कि आप अपने स्वार्थ के लिए इन सबकी जिन्दगी नर्क बना दें....नींद कैसे आती है आपको.....ओह सॉरी...आप तो चोर हैं...ठग हैं...वह तो सोते ही नहीं.....लेकिन आप अपनी मृतात्मा का क्या करते हैं....अच्छा यह बताइए कि आईने में जब अपनी शक्ल देखते हैं तो क्या आपको शर्म आती है....पुलिस से भाग सकते हैं....खुद से कैसे भागेंगे....अपनी अन्तरआत्मा से कैसे भागेंगे ?

हम सब इन्सान  हैं...मुझे आपके लिए कोई तकलीफ नहीं है पर मैं सिहर जाती हूँ जब मैं आपके घरवालों के बारे में सोचती हूँ...उस औरत के बारे में सोचती हूँ जिसकी शादी उसके पिता ने बड़े चाव से की होगी कि कोई एक नेक बन्दा उसकी बेटी को खुश रखेगा...खुश रखने का क्या नायाब तरीका निकाला है दामाद ने....आपकी सास आपकी बलाएं कैसे लेती होंगी...आपकी पत्नी या माँ जब भी व्रत करती होंगी आपकी लम्बी उमर के लिए ...गौर से देखियेगा...उसमें एक पश्चाताप है...आप आज  नहीं तो कल...पकड़े ही जाएंगे...फिर कभी वह औरत कैसे जीएगी...कभी आपने सोचा है...कि ये दुनिया उसके साथ कैसा बर्ताव करेगी...?

मैं पत्रकार हूँ जी...कैदियों की जिन्दगी को भी कवर किया है...उनकी बेबसी...मैंने आँखों से देखी है...अदालतों में उनके घर वालों को तड़पते देखा है...आपका क्या है...आप ऐश कीजिए लेकिन आप पकड़े गये और आपको छुड़ाने में...मुकदमा लड़ने में बूढ़ा बाप अदालतों के चक्कर लगाता रहे...घर - बार सब बिक जाये....मगर आपको थोड़े न फर्क पड़ेगा...बेटे की रिहाई के इन्तजार में बूढ़ी माँ की आँखें पथरा जाए...मगर आपका क्या है...कीजिए ठगी...भागते रहिए...आपकी पूरी जिन्दगी आप भागते ही तो  रहे हैं....पुलिस से...परिवार से...दोस्तों....बच्चों से और खुद से भी।

ये देश उन वीरों की भूमि है जिन्होंने देश को आजाद करवाने के लिए प्राण दिये....इतिहास तो पढ़े नहीं होंगे तो जिस स्मार्टफोन से लूटते हैं...न कभी उस पर इतिहास पढ़ भी लीजिएगा...आपने जिस सेना का नाम लेकर ठगी की..या जो लोग पुलिस या डॉक्टर का नाम लेकर ठगी करते हैं...वह नहीं  जानते कि यह सब इस देश की प्राण वायु हैं...आपने उन वीरों का अपमान किया जो आपकी सुरक्षा के लिए देश की सरहद पर जान दे रहे हैं...अब आप सोच लीजिए कि आपकी बेहयाई की सुपर हाइट क्या है...और क्या होगा जब आप पकड़े जाएंगे...कैसे एहसानफरामोश हैं जी आप...?

बहुत से लोग गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड के चक्कर में इ सब करते हैं...अगर आपका भी इहे मामला है तो उससे पूछिएगा कि पुलिस जब आपको गिरफ्तार करेगी तो भी क्या आपसे वह ब्याह करेगी या करेगा या फिर अच्छे खानदान के किसी सपूत या सुपुत्री के साथ फेरे लेंगे...अगर ऐसा हुआ तब तो आपका बंटाधार हो जाएगा...चोर भी बने...और पियार भी तेल लेने गया आपको चूना लगाकर...तो जो आप सबको उल्लू बना रहे हैं...कहीं आप ही तो सबसे बड़े उल्लू तो नहीं बन रहे...माने पूछ रहे हैं...काहे कि इस समाज में भाई और बहिन एक दूसरे के लिए खड़े नहीं होते...एक गंडासा लेकर खानदान की इज्जत की आड़ में बहिन का गला काटता है और तो बहिन अपनी लवेबुल भौजाई का जीना इसलिए हराम कर देती है कि भाई के बियाह में उसकी मर्जी नहीं चली...खैर...भाई - बहन एक दूसरे के लिए खड़े हों तब तो समाज का ही तकदीर बदल जाएगा...लेकिन ऐसा है नहीं..।

अच्छा, आपने दीवार पिक्चर देखी है....देखी ही होगी...मेरा बाप चोर है वाली लाइन याद है....आपके बच्चे के साथ ऐसा हो तो जिम्मेदार कौन होगा....कैसे बाप हैं आप...देखिए साहब ...हम सब इन्सान हैं....पैसा क्या है...आएगा और जाएगा...हम सब यादों में पहचाने जाते हैं....बाकी अपनी औकात...एक तस्वीर...मुट्ठी भर राख और धूल से नहीं है...कुछ भी साथ नहीं जाने वाला...लोग हमें याद रखेंगे...कि हमने अपनी पूरी जिन्दगी किया क्या है...आपको कैसे याद किया जाएगा...और क्या आपके बच्चे याद भी रखना चाहेंगे...नहीं....जिनके लिए आप यह सब कर रहे हैं न...कोई नहीं याद करेगा आपको क्योंकि कोई भी खुद को एक अपराधी का पिता...या अपराधी का बच्चा....ऐसे कोई याद करे..नहीं चाहता...तो आपके पास...ऐसा कुछ नहीं होगा...ज्यादा से ज्यादा दो बूँद आँसू गिरेंगे और वह भी आपके कर्मों को याद करके पोंछ लिये जाएंगे....तो आपका नसीब यह है मंजीत बाबू ....आपके हिस्से में न याद हैं और न दो बूँद आँसू....

तो हम आपको समर्पित एक कविता के साथ अपनी बात फिलहाल खत्म करते हैं...ज्ञानेंद्रपति का नाम सुने नहीं होंगे...टाइम तो चोरी के नुस्खे निकालने में जाता होगा...तो पढ़िएगा...चेतना पारीक उनकी कविता है...उनसे माफी माँगते हुए सारी दुनिया के ठगों को समर्पित एक कविता

.....

मंजीत भाई कैसे हो?

भाग रहे हो अब भी

या छुपकर कहीं लेटे हो

क्या कर रहे हो...

किसी सिपाही का 

आधार कार्ड चुरा रहे हो

या फिर मार्केटप्लेस पर

ठगी का जाल फैला रहे हो

गूगल पे हो या फोन पे

या फिर से तुम

पेटीएम पर ही

मुझ जैसे किसी अनाड़ी से 

पे का बटन दबवा रहे हो....

अनिल भाई...कैसे हो...

सिस्टर - ब्रदर कहकर

अब किसकी गर्दन दबा रहे हो

अच्छा स्लिप तो नाम इरशाद है तुम्हारा

अहा...कितना सुन्दर शब्द

हर महफिल में कहते हैं इरशाद

तो इरशाद....

अब किसके खाते से

पैसे उड़ा रहे हो....

देवेन्द्र भाई, 

किसको कंगाल बना रहे हो?

अच्छा बताना

माँ - बाप से..बीबी से

नजर मिला पाते हो

या पकड़े जाने के डर से

सालों से घर ही नहीं गये हो..

तरसे हो सूनी कलाई लिये

या बच्चे की तोतली जुबान के लिए

देखो...तुमने भी तो ठगी की

अच्छा बतलाना...

कैसे इतनी बद्ददुआओं का 

बोझ उठा रहे हो...

मंजीत भाई

यह वह मिट्टी है जहाँ

रत्नाकर वाल्मिकी बन गये

रत्नावली के वचनों से

तर गये तुलसीदास..

रामचरित मानस पढ़ते हो

या भाते हैं तुमको वेद व्यास

आल्हा - उदल याद हैं या फिर रासो..

बैठ जाओ अब मंजीत

खुद से भागकर अब

तुम बहुत थक से गये हो...

लेकिन भागकर जाओगे कहाँ

आँखें बन्द करोगे 

तो सुनाई देगा आर्तनाद

जिनको तुमने दिये हैं आँसू

....सुन लो भाई 

तुम भागते रहे...

जिन्दगी भर...

जन्मों  तक 

मेरी शुभकामनाएं हैं तुम्हारे साथ

माथे की मणि खो चुके 

रिसते घाव लिए घूमते

अश्वत्थामा से मुलाकात 

तुम्हारी तय है.,...

क्योंकि वह तो 

तुम्हारे ही मन में है...

मंजीत भाई कैसे हो...

भाग रहे हो अब भी

या छुपकर कहीं लेटे हो


गुरुवार, 11 मार्च 2021

जमाना थाली के बैंगन का है


बंगाल में चुनाव होने जा रहे हैं और दल - बदल का चलन अपने चरम पर है। किसी भी शासन से मुक्ति की चाह रखने वाले के लिए दल बदलने वाला नेता रातों -रात नायक और बेचारा, दोनों बन जाता है...सक्रिय पत्रकारिता में रहते हुए हम पत्रकार सब कुछ देखते हैं...मन ही मन हँसते हैं और ऐसा दिखाते हैं कि हमें कुछ फर्क ही नहीं पड़ा। फर्क तो पड़ता है...किसी नेता के पार्टी बदल लेने से बहुत फर्क पड़ता है। अब सवाल यह है कि दल -बदल होता क्यों है...अगर पुरानी पार्टी के समर्थकों की नजर से देखा जाये तो यह अवसरवादिता है...नेता ने पार्टी छोड़ी नहीं कि उसे घेरने की तैयारी होती है, उसे खत्म करने के लिए साजिशें की जाती हैं..मगर पार्टी हो या संस्थान, कोई भी ऐसे ही नहीं छोड़ता बल्कि कई बार उससे छुड़वा दिया जाता है...हम राजनीति को गालियाँ देते जरूर हैं मगर देखा जाये तो दल - बदल या यूँ कहें कि पाला बदल हर जगह है...अब इनको 'बेपेंदी का लोटा' कहिए या 'थाली के बैंगन'...ये किसी न किसी रूप में हर जगह हैं। थाली के बैंगन का चमत्कार कहिए या कुछ और...उसके पीछे सब बैंगन बन जाते हैं...एक के पीछे दूसरा बैंगन...और रसोई खत्म....वह इस बात की गारंटी लेकर जाता है कि दूसरी पार्टी अथवा संस्थान रूपी वॉशिंग मशीन में उसके अपराध धुल जाएंगे....गलती थाली के बैंगन की नहीं है...उसे इतना कीमती तो बनाया ही उन लोगों ने है, जो उसे खरीदते हैं....मसलन बैंगनों के लुढ़कने से आज जो पार्टी परेशान है...उसने भी तो बैंगन किसी और के बगीचे से ही खरीदे थे....और आज उससे भी बड़ा व्यापारी बगीचे में आ गया है तो थाली का बैंगन तो कीमती होना ही था...लेकिन कुछ बैंगन ऐसे भी होते हैं जो थाली में रहते आ रहे हैं...अपमान सहते आ रहे हैं, धौंस सहते आ रहे हैं और उनको इन्तजार सिर्फ ऐसे किसी बड़े व्यापारी की थाली का रहता है...जहाँ जाकर वह कुछ दिन आराम से फ्रिज में तो रह सके...तो जैसे ही मौका आता है...ऐसे छोटे - मोटे बैंगन लुढ़क आते हैं। आप कहते रहिए पाला बदल मगर कॅरियर है भाई...और राजनीति हो या सरकारी नौकरी....सेवा करने कौन आता है...? सब माल कमाने आते हैं, दाम कमाने आते हैं...और जब इनमें से कुछ भी कमाने का कोई स्कोप ही न हो...तो बेचारे करें क्या....तो उनको थाली के बड़े बैंगन के पीछे जाना ही पड़ता है।

अभी मौसम चुनाव का है मगर इस पालाबदल की प्रवृति और उसके कारणों की तह में जाने की जरूरत है...कुछ लोग लम्बे समय तक हाशिए में पड़े रहने के बाद एक नयी शुरुआत के लिए दल बदलते हैं...जैसे - ज्योतिराजे सिंधिया। कांग्रेस के लगभग हर युवा नेता ने पार्टी इसी वजह से छोड़ी और कांग्रेस नेतृत्व को इससे फर्क नहीं पड़ा...क्योंकि उनको चाटुकारिता और चाटुकार पसन्द हैं...। यह कॉरपोरेट संस्कृति में होता है यानी अगर आपका काम प्रबन्धन को पसन्द भी हो तो बीच के जो चाटुकार हैं, वह आपका पत्ता काट देते हैं। आपकी एक नकारात्मक छवि निर्मित की जाती है...ऐसा घेरा बनाया जाता है कि आप बोलते भी हैं तो आपकी आवाज दब जाती है और यकीन मानिए..यह हमारे - आपके घरों में भी होता है। हमने परिवारों को लेकर जबरदस्ती की सकारात्मक तस्वीर बना रखी है...भावनाओं का ऐसा जाल बना रखा है कि उसमें अपनों की मौकापरस्ती, धोखा.., छल..सब दब जाते हैं। पितृसत्ता या कोई भी सत्ता ऐसे ही संचालित नहीं होती...उसे चलायमान रखने के पीछे ऐसे ही थाली के बैंगन होते हैं....जो अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर सम्बन्ध बनाते भी हैं और सम्बन्ध निभाते भी यही देखकर हैं कि इसमें उनका कितना फायदा है..ऐसे लोग किसी के नहीं होते...ऐसी औरतें किसी की नहीं होतीं। मजे की बात यह है कि ऐसे 'अ' सिद्धांतवादी सिर्फ स्त्रियाँ ही नहीं होतीं बल्कि पुरुष भी होते हैं....उनका काम ही रहता है कि लड़कियों के खिलाफ षडयंत्र करना और लड़कियों की आवाज से लेकर उनका काम तक दबाना...ऐसे ही लोग घर में राज करते हैं क्योंकि उनको थाली का बैंगन बनने की कला आती है, समझौते के नाम पर वह हर अपराध करते हैं और देवता बने रहते हैं। उनकी छवि पर कोई असर नहीं पड़ता तो ऐसे लोगों के चेहरे पर से नकाब कौन उतारेगा...। ध्यान में रखिएगा कि ऐसे लोग हर जगह विकल्प तैयार रखते हैं...ठीक वैसे ही जैसे कोई राजनीतिक पार्टी रखती है....ठीक वैसे ही जैसे किसी संस्थान का शीर्ष अधिकारी रखता है...और ठीक उसी तरह ऐसे लोग भी यह देखते हैं कि प्रभाव किसका है...किसके सामने झुकना सही रहेगा...पत्नियों और माँओं को भावनात्मक ब्लैकमेलिंग से बरगलाया जा सकता है और बेटी तेज - तर्ऱार हुई तो उसके सामने झुकने में कोई बुराई नहीं...बेटी को भी अचानक उस व्यक्ति में दयालुता दिखने लगती है जो कभी उसके हर कष्ट का कारण था...बेटी की माँ...खुश...कि मेरा परिवार सम्भल गया और इन सबके बीच में पिस जाते हैं वह लोग...जो सही राह पर चलते हैं...। सूरत अच्छी होने का मतलब यह थोड़ी न है कि सीरत भी अच्छी ही होगी लेकिन जमाना पैकेजिंग का है तो यह जोड़ी उसमें माहिर रहती है.. लुढ़कने में इतने माहिर कि गिरगिट भी रंग बदलना भूल जाये तो लुढ़कने की प्रैक्टिस करने लगी। जमाना थाली के बैंगन का है...थाली का बैंगन सबको खुश रखता है....दूर से दूर के रिश्तेदार के जन्मदिन से लेकर सालगिरह तक..सब उसे याद रहते हैं....रिश्तेदार भले ही भूल जाये...थाली का बैंगन नहीं भूलता...हर बात पर बवाल काटता है....उसे हर चीज के लिए पंचायत चाहिए....वह अपनी थोथी से थोथी बात को झूठ और अहंकार के मुल्लमे से कीमती बनाना चाहता है...घर में बेटी का दूसरे लड़कों से बात करना पसन्द नहीं लेकिन अगर कोई उस पर भारी हुआ तो फोन पर यह समझाता है कि बच्चों को तो समझना होगा न....थाली का बैंगन हर जगह है...विश्वविद्यालय में जिधर विभागाध्यक्ष की कुर्सी होती है, बैंगन उधर ही लुढ़कता है...दफ्तरों में जो भी बॉस की कुर्सी पर है...बैंगन उसी की जी -हुजूरी करता है....मामला रुतबे का है तो बैंगन जितना सिर चढ़ता है...उसकी बॉसगिरी उतनी ही बढ़ती है...थाली का बैंगन....राज कर रहा है....और हम उस आग के सुलगने के इंतजार में हैं जिस पर किसी थाली का साथ उसे बचा न सके....और वह बैंगन भरता बन सके...आखिर.... बेपेंदी का लोटा हो या थाली का बैंगन...उनकी नियति तो टूटना और भरता बनना ही है...।


शनिवार, 30 जनवरी 2021

अपनी दुनिया में मगन बड़ाबाजार को अब बाखबर होने की जरूरत है

 


क्या आप जानते हैं की शहर कोलकाता कभी ब्लैक कोलकाता और वाइट कोलकाता में विभाजित था। दक्षिण कोलकाता और मध्य कोलकाता का दक्षिणी भाग वाइट था और बड़ाबाज़ार और उत्तर कोलकाता ब्लैक कोलकाता था। अंग्रेज पहले सूतानाटी में आये क्योंकि यह सुरक्षित था और बाद में दक्षिण की तरफ गये इसलिए तमाम अंग्रेजी इमारतें दक्षिण और मध्य कोलकाता में हैं और ब्लैक कोलकाता में बसाए गये भारतीय इसलिए यह काला रह गया। सेठ और बसाक और बाद में मारवाड़ी समुदाय का गढ़।

और ये भी बड़ाबाजार का बड़ा दरअसल बूड़ो है, बूड़ो बांग्ला में शिव को कहते हैं और मारवाड़ी समुदाय ने इसे बड़ा बनाया। बड़ाबाजार आज भी ब्लैक ही है, स्याह। बांग्ला में पढ़िये तो सेठ, बसाक, ठाकुर का गुणगान है और इसके बाद मोटिया मजदूरों का गढ़, जिसे वो हिकारत से देखते हैं, बड़ाबाजार ने जिनको पनाह दी, दूर देश से आये जिन लोगों की शरणस्थली बना, वो भी पुष्पित पल्लवित होते ही इसे छोड़ गये। अब ये इलाका उनके लिये इतिहास की पंक्ति भर है
बड़ाबाजार ने सबको पनाह दी और सबने बड़ाबाजार को त्यागा और अब हिंदीभाषियों का वोट बैंक तोड़ने के लिये इसे स्थानांतरित करने की तैयारी है। कोई राजारहाट बड़ाबाजार नहीं बन सकता, बड़ाबाजार से पुष्पित पल्लवित होने वाले समझें की उन पर ये ऋण है। क्यों नहीं वो विकास का कोई ऐसा मॉडल विकसित करते, जिनमें इन तंग गलियों को एक नया रूप दिया जा सके। क्यों नहीं यहाँ के खाली पड़े मकानों को नया रूप देकर बड़ाबाजार को श्वेत नहीं तो गेहुआ बनाया जाय। आप राजस्थान जाकर अपनी मातृभूमि को संवार सकते हैं तो बड़ाबाजार तो आपकी शरणस्थली है, इसे क्यों नहीं? क्या यह कृतघ्नता नहीं? 
सवाल तो हम पूछेंगे की 19वीं सदी के बाद बड़ाबाजार का इतिहास क्यों दबाया गया? हमारी प्राचीन इमारतें भी आपकी हेरिटेज सूची में क्यों नहीं दिखतीं? आखिर क्यों बड़ाबाजार की पहचान उसका गौरवशाली इतिहास नहीं बल्कि हर बार लगने वाली अग्निकांड की राख को बनाया जा रहा है? आखिर कलकत्ते का वह कौन सा हिस्सा है, जहाँ पर आग नहीं लगती और कलकत्ते के किस इलाके में तंग गलियाँ नहीं हैं....कौन से हिस्से में क्षतिग्रस्त मकान नहीं हैं...तो फिर यह पहचान बड़ाबाजार के साथ ही क्यों चिपका दिये गये हैं....अगर एक विश्वविद्यालय के कार्यक्रम में मोबाइल शौचालय की व्यवस्था हो सकती है, पुस्तक मेले में पाउच में पानी मिल सकता है तो बड़ाबाजार की तंग गलियों में क्यों नहीं मिल सकता? अंग्रेजों का सौतेलापन आज भी सरकारों ने क्यों बरकरार रखा है...क्या यह बड़ाबाजार के साथ साजिश नहीं है? 
सारी दुनिया के मजदूरों को एक करने की बात करने वाले पोस्ता के मुटिया मजदूरों को क्यों नहीं अपना पाते? क्यों हिकारत से देखते हैं? क्या वो हिन्दीभाषी है इसलिए या वो बिहार से हैं इसलिए? हमारे बिहार में आपके बंगाल के दिग्गज बढ़े हैं और भागलपुर से शरत बाबू का रिश्ता तो बानगी मात्र है। 
तो अब सवाल होगा की फिर बड़ाबाजार का विकास कैसे हो, तो इसके लिये राजारहाट जाने की जरूरत नहीं है, कुछ सुझाव हैं
- बहुत से विशाल राजप्रासाद और हवेलियाँ यहाँ खाली पड़ी हैं, सरकार या फिर कोई उद्योग समूह इनको अधिग्रहीत कर के इनको, उनके मूल रूप में संवार कर खड़ा कर सकता है। मॉल्स, आवास या रेस्तरां के रूप में विकसित कर सकता है मगर ढांचा वही रखिये, क्योकि यही इसकी यू एस पी है। 

इसके बाद जो मकान खाली पड़े हों, वहाँ मजदूरों को क्वार्टर दीजिये, सडकों की भीड़ ऐसे ही कम हो जाएगी। और ये सम्भव है, यकीन न हो स्टार थिएटर, स्वामी विवेकानंद का पैतृक आवास और अंजलि का शोरूम आपके सामने है। इससे आपका खर्च भी बचेगा और अतिरिक्त जमीन भी नहीं चाहिये। जो है उसको फिर से खड़ा करिये उसके मूल रूप में।

गद्दी परम्परा को जारी रखिये, यही बड़ाबाजार की पहचान है और यही आपको अलग रखेगा, वैसे जी जैसे ताज में अलुमिनियम की केतली चलती है। 

हाथ रिक्शे को बैटरी चालित बनाइये, मोबाइल शौचालय बनाइये।

 दिवारों को पुराने कोलकाता की पेन्टिंग्स या अपने पूर्वजों के तस्वीरों से सजाइए। रेस्तरां हों तो अपने  राज्य के हिसाब से लुक दीजिये। और सबसे बड़ी बात की ये काम कोई मारवाडी या  हिन्दीभाषी करे, वो इसलिए की जिस प्यार से आप बड़ाबाजार को संवारेंगे, वो कोई और नहीं करेगा क्योकि आपके लिये बड़ाबाजार आपके पूर्वजों की अमानत होगा, बोझ नहीं।

अम्बुजा, बिड़ला, गोयनका, सब मिलें और बिहार व यू पी का श्रम मिले तो राजारहाट जाये बगैर बड़ाबाजार खड़ा हो सकता है।

सम्भव है की ये काम कठिन हो लेकिन यह होने पर आपको जो सन्तोष मिलेगा, आपकी आत्मा को जो सुकून मिलेगा, वो अनमोल होगा क्योकि आपको ऐसा लगेगा की आपने अपने बुजुर्गों की निशानी खोने नहीं दी










सोमवार, 18 जनवरी 2021

महापुरुषों पर गर्व करते हैं तो उनकी विरासत को सहेजना भी सीख लेते


मेरे एक शिक्षक कहा करते थे...मनुष्य दो परम्पराओं में जीवित रहता है...वंश परम्परा और शिष्य परम्परा। आमतौर पर वंश परम्परा में विश्वास बहुत ज्यादा रहता है...हमारे समाज में विवाह और परिकल्पना के पीछे यह एक मजबूत कारण है लेकिन कई उदाहरण ऐसे सामने आ रहे हैं जिसे देखकर सोचना पड़ रहा है..क्या वाकई वंश परम्परा इतनी मजबूत होती है...? कई ऐसे उदाहरण हैं जिसे देखकर कहा जा सकता है कि शिष्य परम्परा की डोर वंश परम्परा की तुलना में कहीं अधिक मजबूत होती है क्योंकि परिवार अधिकतर मामलों में बाधक की भूमिका में ही अधिक रहता है और यह दावा नहीं किया जा सकता है कि किसी भी परिवार में व्यक्ति की सफलता से घर का एक सदस्य प्रसन्न ही होगा या इसे स्वीकार किया भी जायेगा। शिक्षण का क्षेत्र भी इसी वजह से चिर लोकप्रिय है। कई बार आपके बच्चों को और आपके परिवार को आपकी कद्र नहीं होती लेकिन आपके विद्यार्थी आपके लिए खड़े होते हैं...तब भी जब आपने उनसे ऐसी कोई शर्त या उम्मीद नहीं रखी होती...वह आपसे प्रेम करते हैं....और दिल से प्रेम करते हैं...जहाँ कोई तुलना न के बराबर ही रहती है...याद रखिए कि मैं अकादमिक स्तर पर किसी साधारण शिक्षण संस्थान के विद्यार्थी की बात नहीं कर रही...आप इसे जरा सा और ऊँचाई पर ले जाइए। शिष्यों ने अपने गुरु की परम्परा को आगे ले जाने के लिए अपना पूरा जीवन होम कर दिया...समाज और परिवार,,,सबको त्याग दिया या फिर उनके ताने आजीवन सहे...। स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद और स्वामी श्रद्धानंद और खुद सचिन तेंदुलकर भी इसका सीधा उदाहरण है। अपने गुरु विरजानंद के वचन को रखते हुए स्वामी दयानंद सरस्वती आजीवन उनके द्वारा दिखाये मार्ग पर चले और आज भी आर्य समाज की परम्परा विद्यमान है। सचिन तेंदुलकर अपने गुरु रमाकांत आचरेकर का कितना सम्मान करते थे...यह किसी से छिपा नहीं है मगर आज इस लेख की पृष्ठभूमि जो घटना है...वह खुद में अद्भुत है मगर कुछ ऐसे सवाल भी छोड़ गयी है जिनके बारे में हमने सोचा भी नहीं है और सोचना ही चाहते हैं...। 


अभी हाल में स्वामी विवेकानंद के आवास की स्टोरी कवर करने की इच्छा पूरी हुई। स्वामी जी के इस पैतृक आवास की मूल इमारत ध्वस्त ही हो चली थी मगर रामकृष्ण मिशन ने इसे फिर से एक प्रकार से खोजकर खड़ा किया है। अब यह पैतृक आवास सह संग्रहालय तथा सांस्कृतिक केन्द्र भी है...बात इतनी सी ही नहीं है...आप इस पूरी प्रक्रिया को समझिए क्योंकि यह जगह मिशन को पूरे 30 साल की मुकदमेबाजी के बाद भी नहीं मिली थी, अतिक्रमण हटाने के लिए 54 परिवारों और व्यवसायिक केन्द्रों को पुनर्वास रामकृष्ण मिशन ने दिया है और इस प्रक्रिया में 7 साल लगे और इसके बाद बाकी 5 साल वर्तमान भवन के निर्माण में लगे...यह शिष्य परम्परा और स्वामी विवेकानंद के प्रति रामकृष्ण मिशन के उत्कट प्रेम का प्रतीक है...और यह गर्व का विषय है मगर हमारे लिए शर्म की बात होनी चाहिए।

मेरा सीधा सवाल यह है कि क्या यह सारी जिम्मेदारी रामकृष्ण मिशन की थी या होनी चाहिए? क्या स्वामी विवेकानंद सिर्फ मिशन के हैं या इस पूरे देश की जनता के हैं? क्या विचारधारा मेल नहीं खाती तो सम्मान कम हो जाता है..? यह सवाल राज्य सरकार के साथ केन्द्र सरकार से भी है...वैसे भी स्वामी जी जब जीवित थे...तब भी उनके परिवार को दरिद्रता देखनी पड़ी। माता भुवनेश्वरी के लिए खेतड़ी महाराज अजीत सिंह को पत्र लिखना पड़ा.....क्या उस समय बंगाल में रईसों का अकाल था...? 

जिस शोभाबाजार राजबाड़ी की 36 -37 इमारतें थीं...वह स्वामी जी को मठ के लए जगह क्यों नहीं दे सकी... जब कि अंग्रेजों को चर्च बनाने के लिए इस परिवार ने जमीन दी? स्वामी विवेकानंद और रवीन्द्रनाथ ठाकुर की मित्रता की बातें की जाती हैं तो फिर ऐसा क्यों हुआ कि रवीन्द्रनाथ के रहते हुए माता भुवनेश्वरी देवी को दरिद्रता में दिन काटने पड़े। याद रहे कि भुवनेश्वरी देवी पुत्र स्वामी विवेकानंद के निधन के बाद 9 साल जीवित रहीं। उनका निधन मेन्जाइटिस से 1911 में हुआ और रवीन्द्रनाथ को 1913 में नोबल पुरस्कार मिला।

स्वामी विवेकानंद और खेतड़ी महाराज अजीत सिंह

माफ कीजिए मगर मुझे ऐसा कोई कारण नजर नहीं आता कि मैं धनाढ्य ठाकुर परिवार की जमीन्दारी पर गर्व करूँ। कई बार लगता है कि जैसे उस समय भी कोई लॉबी काम करती थी जिसका काम स्वामी जी जैसे लोगों को उपेक्षित रखना था...। जमीन्दार घरानों की कमी तो थी नहीं और ईश्वर चन्द्र विद्यासागर जैसे व्यक्तित्व ने बगैर कुछ पड़ताल किये कैसे नरेन को नौकरी से निकाल दिया....क्या अन्दर ही अन्दर शीत युद्ध जैसा कुछ था या फिर स्वामी विवेकानंद की बढ़ती लोकप्रियता इन सबको रास नहीं आ रही थी...आखिर क्यों बंगाल की धरती पर एक शख्स ऐसा नहीं हो सका जो स्वामी जी की शिकॉगो यात्रा का खर्च उठा सकता......? भुवनेश्वरी देवी की तरह ही माँ शारदा को भी दरिद्रता देखनी पड़ी...क्या यही बंगालीपन था....जिसका दम भरते बंगाल का मन नहीं भरता......? 
स्वामी विवेकानंद ने कभी जड़ता को प्रोत्साहन नहीं दिया मगर आजादी के बाद वामपंथ और कांग्रेस की सरकार ने इनको लगातार उपेक्षित किया वरना ऑपरेशन सन शाइन के नाम पर खटाल उजाड़ने वाले वामपंथी सरकार इतनी कमजोर नहीं थी कि अवैध अतिक्रमण हटवाने के लिए कोई मामला 30 साल तक चले।   

जिस घर के सामने सिर झुक जाना चाहिए...आखिर वहाँ पर अतिक्रमण कोई कैसे कर सकता है और हटाने पर आप मुकदमा करेंगे....ऐसी न जाने कितनी ही हमारी धरोहरें हैं जो अतिक्रमण का शिकार हैं...बंगाली समाज जब इतना जागरुक है तो यह अपने पूर्वजों के अधिकार और उसके सम्मान के लिए आवाज क्यों नहीं उठाता...क्यों नहीं जेयू और प्रेसिडेंसी के विद्यार्थी सुबोध मलिक के घर को बचाने के लिए सामने आते हैं...जो कि निरन्तर खत्म होता जा रहा है.... रामकृष्ण मिशन स्वामी जी के आवास का निर्माण करे..यह बात समझी जा सकती है मगर पुनर्वास का जिम्मा....क्या यह सरकारों और कॉरपोरेट घरानों की जिम्मेदारी नहीं थी..क्या यह स्थानीय लोगों की जिम्मेदारी नहीं है कि अपनी धरोहरों को अतिक्रमण से बचायें....इसके लिए क्या अलग से कानून बनाने की जरूरत है या आपके पास जमीर नाम की चीज है.....आज जब यह भवन बनकर तैयार है तो बड़ी शान से बंगाल के पर्यटन के मानचित्र पर इसे दर्ज किया गया है मगर जब यह लुप्त होने की ओर था...तब यह गौरव कहाँ था...लेकिन ठाकुर के शिष्य की परम्परा बहुत मजबूत है तभी तो रामकृष्ण मिशन ने इस भवन को फिर से खड़ा किया और आप जब भी इसे देखेंगे....विश्वास मजबूत होता रहेगा मगर इसके साथ ही जब खुद पर नजर डालेंगे तो शायद खुद से नजर भी न मिला सकें।

शनिवार, 9 जनवरी 2021

खुद से पूछिए, विवेकानंद चाहिए तो क्या परमहंस बनने को तैयार हैं?

12 जनवरी आ रही है और देश में युवा दिवस मनाया जायेगा। युवाओं के साथ मैं कई सालों से काम कर रही हूँ, पत्रकारिता करते हुए युवाओं के साथ ही बात भी होती रही है और उनको समझना थोड़ा सा आसान हो गया है। हर बार मंच पर सबको यही कहते सुना है कि युवाओं को मौका मिलना चाहिए या देना चाहिए लेकिन युवाओं से हम उम्मीद यही रखते हैं कि वह आज्ञाकारी बने रहें, उनके सवालों के लिए हम तैयार नहीं रहते। जो करते हैं, वह खानापूर्ति से अधिक कुछ नहीं होता। उदाहरण के लिए अगर हम अपने कार्यक्रमों को लेकर ही बात करें तो वहाँ पर केन्द्रीय भाव इतना अधिक रहता है कि बाकी चीजें पीछे छूट जाती हैं। कहने का मतलब यह है कि कोई साहित्य पढ़े तो उसे विज्ञान से मतलब नहीं रखना चाहिए या कोई विज्ञान का विद्यार्थी है तो उसके लिए साहित्य पढ़ना एक अजूबा माना जाता है जबकि हकीकत यह है कि दोनों ही क्षेत्र से जुड़े लोगों की पसन्द उनकी शिक्षा या पाठ्यक्रम के विपरीत हो सकती है। जैसा कि पहले भी कहती रही हूँ कि हिन्दी में विशेष रूप से भाषा को सुधारने की बात होती है, भाषा को रोजगार से जोड़ने की बात होती है मगर साहित्य को रोजगार से जोड़ने की बात कम ही होती है। जिस तरह हिन्दी सिनेमा का मतलब बॉलीवुड मान लिया गया है, वैसे ही साहित्य का मतलब भी कविता या कथा साहित्य भर को मान लिया गया है। अधिकतर कार्यक्रम ऐसे होते हैं जिनमें दिग्गज ही बोलते हैं और युवाओं का काम सिर्फ सुनना होता है। ऐसा नहीं है कि युवाओं के विचार सुने नहीं जाते, सुने जाते हैं मगर बड़ों को उनकी असहमति का स्वर अब भी नहीं भाता। 

इसका एक सीधा कारण है बात करने का तरीका...सन्तुलित तरीके से अपनी बात रखना, विरोध करना या असहमति प्रकट करना हमारे युवा सीख नहीं पाये हैं। अपनी बात नहीं सुने जाने की खीझ ही नाराजगी बनती है और बात में विद्रोह और विद्रोह के नाम पर याद आती हैं राजनीतिक पार्टियाँ और उनके छात्र संगठन...जो आम युवाओं का इस्तेमाल अपनी ताकत बढ़ाने और दिखाने के लिए करते हैं। एक समय था जब छात्र राजनीति से बड़े दिग्गज नेता निकले।  सहमति और असहमति के बावजूद देश की राजनीति में उनका महत्व है। यह सोचने का विषय है कि धरने और प्रदर्शन की राजनीति की भरमार के बाद भी एक अच्छा नेता छात्र राजनीति क्यों नहीं दे सकी? उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर हिन्दी भाषी विद्याथिर्यों में एक अच्छा नेतृत्व क्यों नहीं उभर पा रहा है? क्यों हिन्दीभाषियों का प्रतिनिधित्व किसी का झंडा उठाने या बाउंसर बनने तक सिमट गया है...इन सवालों की जड़ में जब आप जाते हैं तो जवाब एक ही मिलता है...युवाओं को बोलने ही नहीं दिया जाता और जब वे बोलते हैं तो आप सुनना नहीं चाहते, जब आप मन मारकर सुन लेते हैं तो उनकी बात मानने से आपके अहं को तकलीफ होती है। शायद यही कारण है कि किसी भी कार्यक्रम के अंत में प्रश्नों के लिए 10 - 15 मिनट होते तो हैं, मगर अधिकतर मामलों में वे समय़ की कमी की भेंट चढ़ जाते हैं। किसी युवा ने सवाल कर दिया तो आप खुद को अपमानित महसूस करते हैं और कई धुरन्धर तो ऐसे होते हैं कि सवाल करने वाले विद्यार्थी या युवा का जीवन और कॅरियर तबाह करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। यकीन न आये तो कभी अकादमियों, संस्थानों की कुर्सियों पर नजर डालकर देखिएगा....विनम्रता के नाम पर चाटुकारिता की परम्परा को घी पिलाकर जिज्ञासा और ज्ञान की परम्परा में मट्ठा डाल दिया गया है। अगर परम्परा की बात करते हैं तो यह भी याद करिएगा कि रामकृष्ण परमहंस को भी स्वामी विवेकानंद के संशय का समाधान करना पड़ा था...नरेन्द्र एक ही बार में आँख बंद करके पैर छूने वाले शिष्य नहीं थे मगर गुरु का धैर्य ऐसा था कि अन्त में शिष्य ने उनको स्वीकार किया...आप विवेकानन्द जैसे शिष्य बाद में खोज लें....पहले खुद से सवाल कीजिए...क्या आप रामकृष्ण परमहंस या स्वामी दयानन्द सरस्वती के गुरु विरजानंद बनने को तैयार हैं..? सोचिए और तब युवाओं का आकलन करिए।


सोमवार, 21 दिसंबर 2020

पैर की जमीन है इतिहास, खो मत दीजिए


हम वर्तमान में जीने वाले और इतिहास से डरने वाले लोग हैं...लोग तो ईश्वर से भी डरते हैं...कई बार भक्ति में प्रेम की जगह डर ले लेता है और हम जिससे डरते हैं, उसे याद नहीं करना चाहते। इतिहास एक बड़ा दायित्व है मगर इतिहास लेखन में ईमानदारी बरतने से पहले ही उसमें जब धर्म का मसाला कुछ अधिक डाल दिया जाए तो वह विद्रूप लगने लगता है। इतिहास का चयन भी तो अपनी सुविधानुसार करने की परिपाटी है...कौन सा महापुरुष कितने वोट दिलवा सकता है...

इस समीकरण ने इतिहास में उन लोगों के साथ अन्याय करवाया जो नींव की ईंट थे। वरना क्या वजह रही होगी कि जिस दरभंगा राज परिवार ने भारत को रेलवे दी, विमानन सेवा दी, देश का पहला भूकम्प प्रतिरोधी भवन दिया...आज उनकी धरोहरों के संरक्षण की जिम्मेदारी सरकारें नहीं लेना चाहतीं। क्यों कलकत्ता विश्वविद्यालय अपने दानदाता रामेश्वर सिंह को बस रिकॉर्ड तक समेट बैठा है...आखिर जिस परिसर की जमीन उनसे ?मिली, वहाँ उनकी एक भी प्रतिमा क्यों नहीं है...क्यों उनके नाम पर आयोजन नहीं होते और कैसे एक विशाल प्रासाद को, जो कि हेरिटेज था. उसे ढहाकर इस शहर की बड़ी इमारत खड़ी कर दी गयी। 

क्यों 500 साल से अधिक पुरानी फिरंगी काली बाड़ी को हेरिटेज का दर्जा नहीं मिल सका? जिस घर ने क्रांतिकारियों को शरण दी, राजा सुबोध चन्द्र बसु मलिक की वह निशानी पत्थरों का अवशेष क्यों बन गयी है....इस हेरिटेज की मान्यता का मापदंड क्या होता होगा...और क्यों 2005 के बाद खुदाई का कोई काम बंगाल में नहीं हुआ...इतने सवाल हैं...मगर  जवाब नहीं मिलता...इतिहास को इतिहास ही रहने दीजिए...जमीन से खिलवाड़ करना अच्छी बात नहीं है। अब मन है कि इतिहास से ही बतियाया जाए....देखते हैं...सफर पर तो निकलना ही है

रविवार, 22 नवंबर 2020

छठ पूजा : आधुनिकता, समानता, प्रकृति के रंग से सजी परम्परा



छठ पूजा को पर्यावरण की दृष्टि से सबसे अनुकूल माना गया है। परम्परा और प्रकृति से जोड़ने वाला यह पर्व अनूठा है और अभी हाल ही में मनाया भी गया मगर दुःखद है कि कुछ आधुनिक और बुद्धिजीवी अंग्रेजीदां अखबार और पत्रकार अपने निजी हितों और सस्ती लोकप्रियता के लिए हमारी परम्परा को निशाना बना रहे हैं...कहा जा रहा है कि छठ पूजा के कारण रवीन्द्र सरोवर और सुभाष सरोवर में प्रदूषण फैल रहा है...ये तथाकथित आधुनिक भूल जाते हैं कि इस पूजा में जो अवयव हैं, उसमें केमिकल नहीं है, प्रतिमा नहीं है इसलिए लेड भी नहीं है...जो है...वह है फूल, और पत्तियों जैसे अवयव जो पानी में घुल जाते हैं और इनसे खाद भी बनायी जाती है...ऐसे लोगों को छठ के बारे में ज्ञान नहीं है...इसलिए उनके जैसे लोगों के लिए ही यह लेख हैं...हमें नहीं पता कि इसका कितना असर पड़ेगा मगर समय आ गया है कि ऐसे लोगों को बताया जाए कि उनकी हद कहाँ तक है और उनकी सीमा क्या है...फिलहाल छठ पर यह लेख...

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि के दिन छठ पूजा की जाती है। इस पूजा का आयोजन पूरे भारत वर्ष में एक साथ किया जाता है। भगवान सूर्य को समर्पित इस पूजा में सूर्य को अध्र्य दिया जाता है। पूजन में शरीर और मन को पूरी तरह साधना पड़ता है, इसलिए इस पर्व को हठयोग भी कहा जाता है। कहा जाता है 

इतिहास

- माना जाता है कि छठ का पर्व वैदिक काल से चला आ रहा है। इस व्रत में मुख्यः रूप से ॠषियों द्वारा लिखी गई ऋग्वेद सूर्य पूजन, उषा पूजन किया जाता है। इस पर्व में वैदिक आर्य संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। छठ पूजा का बहुत महत्व माना जाता है। इस पर्व को भगवान सूर्य, उषा, प्रकृति, जल, वायु आदि को समर्पित किया जाता है। छठ पर्व मूलतः सूर्य की आराधना का पर्व है, जिसे हिन्दू धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है। हिन्दू धर्म के देवताओं में सूर्य ऐसे देवता हैं जिन्हें मूर्त रूप में देखा जा सकता है।

सूर्य की शक्तियों का मुख्य श्रोत उनकी पत्नी ऊषा और प्रत्यूषा हैं। छठ में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की संयुक्त आराधना होती है। प्रात:काल में सूर्य की पहली किरण (ऊषा) और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा) को अर्घ्य देकर दोनों का नमन किया जाता है। छठ देवी को सूर्य देव की बहन बताया जाता है। लेकिन छठ व्रत कथा के अनुसार छठ देवी ईश्वर की पुत्री देवसेना बताई गई हैं। देवसेना अपने परिचय में कहती हैं कि वह प्रकृति की मूल प्रवृति के छठवें अंश से उत्पन्न हुई हैं यही कारण है कि मुझे षष्ठी कहा जाता है। देवी कहती हैं यदि आप संतान प्राप्ति की कामना करते हैं तो मेरी विधिवत पूजा करें। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को करने का विधान बताया गया है। पौराणिक ग्रंथों में इस रामायण काल में भगवान श्री राम के अयोध्या आने के पश्चात माता सीता के साथ मिलकर कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्योपासना करने से भी जोड़ा जाता है, महाभारत काल में कुंती द्वारा विवाह से पूर्व सूर्योपासना से पुत्र की प्राप्ति से भी इसे जोड़ा जाता है। सतयुग में भगवान श्रीराम, द्वापर में दानवीर कर्ण और पांच पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने सूर्य की उपासना की थी। छठी मैया की पूजा से जुड़ी एक क​था राजा प्रियवंद की है, जिन्होंने सबसे पहले छठी मैया की पूजा की थी। 



नामकरण

छठ, षष्ठी का अपभ्रंश है। कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली मनाने के बाद मनाये जाने वाले इस चार दिवसीय व्रत की सबसे कठिन और महत्त्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी की होती है। कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी को यह व्रत मनाये जाने के कारण इसका नामकरण छठ व्रत पड़ा। छठ पूजा साल में दो बार होती है एक चैत मास में और दुसरा कार्तिक मास शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि, पंचमी तिथि, षष्ठी तिथि और सप्तमी तिथि तक मनाया जाता है. षष्ठी देवी माता को कात्यायनी माता के नाम से भी जाना जाता है। 

विधि 

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को नहाय खाय से शुरू होने वाले व्रत के दौरान छठव्रती स्नान एवं पूजा पाठ के बाद शुद्ध अरवा चावल, चने की दाल और कद्दू की सब्जी ग्रहण करते हैं। दूसरे दिन खरना होता है, इसके बाद शुरू होता है 36 घंटे का 'निर्जला व्रत'। छठ महापर्व के तीसरे दिन शाम को व्रती डूबते सूर्य की आराधना करते हैं और अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देते हैं। पूजा के चौथे दिन व्रतधारी उदीयमान सूर्य को दूसरा अर्घ्य समर्पित करते हैं। इसके पश्चात 36 घंटे का व्रत समाप्त होता है और व्रती अन्न जल ग्रहण करते हैं।


वैज्ञानिक महत्व 

छठ पर्व को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो षष्ठी तिथि (छठ) को एक विशेष खगोलीय परिवर्तन होता है, इस समय सूर्य की पराबैगनी किरणें (Ultra Violet Rays) पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं इस कारण इसके सम्भावित कुप्रभावों से मानव की यथासम्भव रक्षा करने का सामर्थ्य प्राप्त होता है। पर्व पालन से सूर्य (तारा) प्रकाश (पराबैगनी किरण) के हानिकारक प्रभाव से जीवों की रक्षा सम्भव है। पृथ्वी के जीवों को इससे बहुत लाभ मिलता है। सूर्य के प्रकाश के साथ उसकी पराबैगनी किरण भी चंद्रमा और पृथ्वी पर आती हैं। सूर्य का प्रकाश जब पृथ्वी पर पहुँचता है, तो पहले वायुमंडल मिलता है। वायुमंडल में प्रवेश करने पर उसे आयन मंडल मिलता है। पराबैगनी किरणों का उपयोग कर वायुमंडल अपने ऑक्सीजन तत्त्व को संश्लेषित कर उसे उसके एलोट्रोप ओजोन में बदल देता है। इस क्रिया द्वारा सूर्य की पराबैगनी किरणों का अधिकांश भाग पृथ्वी के वायुमंडल में ही अवशोषित हो जाता है। पृथ्वी की सतह पर केवल उसका नगण्य भाग ही पहुँच पाता है। सामान्य अवस्था में पृथ्वी की सतह पर पहुँचने वाली पराबैगनी किरण की मात्रा मनुष्यों या जीवों के सहन करने की सीमा में होती है। अत: सामान्य अवस्था में मनुष्यों पर उसका कोई विशेष हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि उस धूप द्वारा हानिकारक कीटाणु मर जाते हैं, जिससे मनुष्य या जीवन को लाभ होता है। छठ जैसी खगोलीय स्थिति (चंद्रमा और पृथ्वी के भ्रमण तलों की सम रेखा के दोनों छोरों पर) सूर्य की पराबैगनी किरणें कुछ चंद्र सतह से परावर्तित तथा कुछ गोलीय अपवर्तित होती हुई, पृथ्वी पर पुन: सामान्य से अधिक मात्रा में पहुँच जाती हैं। वायुमंडल के स्तरों से आवर्तित होती हुई, सूर्यास्त तथा सूर्योदय को यह और भी सघन हो जाती है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार यह घटना कार्तिक तथा चैत्र मास की अमावस्या के छ: दिन उपरान्त आती है। ज्योतिषीय गणना पर आधारित होने के कारण इसका नाम और कुछ नहीं, बल्कि छठ पर्व ही रखा गया है।

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पारिवारिक एकता की दृष्टि से महत्व

 - छठ सिर्फ आस्था का पर्व नहीं ये उस विश्वास का त्योहार है, जहां कमाने के लिए परदेस गए बेटों का मां इस दिन लौट आने का भरोसा रखती है। दिल्ली-मुंबई और कोलकाता समेत कई देशभर के महानगरों से भर-भर कर आने वाले ट्रेनें इस बात की हर बात गवाही देते हैं कि ये परिवारों को पास लाने का भी त्योहार है। घर के पुरुष और बच्चे सभी इस व्रत में शामिल होते हैं। कई बार पुरुष रसोई के काम यानी ठेकुआ से लेकर चाय बनाने का काम खुशी से करते हैं और खुद व्रत करते भी हैं। 




लैंगिक समानता वाला पर्व 

- त्यौहार के अनुष्ठान कठोर हैं और चार दिनों की अवधि में मनाए जाते हैं। इनमें पवित्र स्नान, उपवास और पीने के पानी (वृत्ता) से दूर रहना, लंबे समय तक पानी में खड़ा होना, और प्रसाद (प्रार्थना प्रसाद) और अर्घ्य देना शामिल है। परवातिन नामक मुख्य उपासक (संस्कृत पार्व से, जिसका मतलब 'अवसर' या 'त्यौहार') आमतौर पर महिलाएं होती हैं। हालांकि, बड़ी संख्या में पुरुष इस उत्सव का भी पालन करते हैं क्योंकि छठ लिंग-विशिष्ट त्यौहार नहीं है।  

सांझ के देबई अरघिया, और किछु मांगियो जरूर, पांचों पुत्र एक धिया (बेटी), धियवा मंगियो जरूर.। 

छठ के पारंपरिक गीतों में छठी माता से बेटी देने की प्रार्थना की जाती है. एक गीत जो बहुत लोकप्रिय है, उसके बोल है - 

रूनकी झुनकी बेटी मांगीला, पढ़ल पंडितवा दामाद, छठी मइया दर्शन दींही ना आपन. ( खेलती कूदती बेटी और पढ़ा लिखा दामाद चाहिए), 

इस बारे में बात करते हुए लोकगायिका चंदन तिवारी कहती हैं, "आप देखें हमारे यहां जब आशीर्वाद में कहा जाता है दूधो नहाओ पूतो फलो या फिर पुत्रवती भव. यानी बेटी की कामना कहीं नहीं है. लेकिन छठ में बेटी की भी कामना है और धनवान नहीं बल्कि पढ़े लिखे दामाद की कामना व्रती करती है।" इस महापर्व और स्त्रियों की भूमिका के बारे में हिंदू धर्म के जानकार पंडित रामदेव पाण्डे बताते हैं, "छठ के बारे में तो कहा ही जाता है कि इस व्रत को पहली बार सतयुग में राजा शर्याति की बेटी सुकन्या ने रखा था. इसलिए इसमें स्त्री स्वर की प्रधानता है. कोई ऐसा पर्व नहीं है जिसमें बेटी की कामना हो, छठ व्रत में ये कामना है. दुर्गापूजा में भी नारी की पूजा होती है लेकिन वहां बेटी की कामना नहीं है."छठ के गीतों में सभी तरह का काम करने वाले लोगों की बेटियों का जिक्र है. एक गीत के बोल है-

छोटी रे मोटी डोमिन बेटी के लामी लामी केश,

सुपवा ले आइहा रे डोमिन, अरघ के बेर

छोटी रे मोटी मालिन बेटी के लामी लामी केश,

फुलवा ले आइहा रे मलिन, अरघ के बेर …..

सामाजिक सौहार्द और समानता वाला पर्व 

इस पूजा में जातियों के आधार पर कहीं कोई भेदभाव नहीं है, समाज में सभी को बराबरी का दर्जा दिया गया है। सूर्य देवता को बांस के बने जिस सूप और डाले में रखकर प्रसाद अर्पित किया जाता है, उसे सामा‍जिक रूप से अत्‍यंत पिछड़ी जाति के लोग बनाते हैं। इससे सामाजिक संदेश एकदम स्‍पष्‍ट है।

बिहार तथा अन्य जगहों पर छठ का व्रत मुसलमान समुदाय के लोगों द्वारा भी किया जाता है। शास्त्रों से अलग यह जन सामान्य द्वारा अपने रीति-रिवाजों के रंगों में गढ़ी गयी उपासना पद्धति है। इसके केंद्र में वेद, पुराण जैसे धर्मग्रन्थ न होकर किसान और ग्रामीण जीवन है। इस व्रत के लिए न विशेष धन की आवश्यकता है न पुरोहित या गुरु के अभ्यर्थना की। जरूरत पड़ती है तो पास-पड़ोस के सहयोग की जो अपनी सेवा के लिए सहर्ष और कृतज्ञतापूर्वक प्रस्तुत रहता है। इस उत्सव के लिए जनता स्वयं अपने सामूहिक अभियान संगठित करती है। नगरों की सफाई, व्रतियों के गुजरने वाले रास्तों का प्रबन्धन, तालाब या नदी किनारे अर्घ्य दान की उपयुक्त व्यवस्था के लिए समाज सरकार के सहायता की राह नहीं देखता। इस उत्सव में खरना के उत्सव से लेकर अर्ध्यदान तक समाज की अनिवार्य उपस्थिति बनी रहती है। यह सामान्य और गरीब जनता के अपने दैनिक जीवन की मुश्किलों को भुलाकर सेवा-भाव और भक्ति-भाव से किये गये सामूहिक कर्म का विराट और भव्य प्रदर्शन है। यह अकेला त्योहार है जिसमें डूबते सूर्य की भी आराधना की जाती है।


पर्यावरण और कृषि की दृष्टि से महत्व

इस पूजा के बारे में हम यह भी कह सकते हैं कि “यह प्रकृति की प्राकृतिक ढंग से पूजा है” और यह एक ऐसी पूजा है जो कि पर्यावरण के अनुकूल भी है। इसमें जिन-जिन साधनों का उपयोग किया जाता है, वे ज़्यादातर बांस तथा मिट्टी के ही बने होते हैं। जैसे, बांस के बने सूप और दऊरा के साथ-साथ प्रसाद बनाने के लिए मिट्टी के बर्तन का उपयोग किया जाता हैं। अगर हम धर्म से हटकर भारत के स्थानीय और पारम्परिक त्यौहारों की बात करें तो यह पर्यावरण और संस्कृति के अनुकूल ही रहते हैं। किसानों और मिट्टी से जुड़ा है छठ महापर्व। छठ महा पर्व के केन्द्र में कृषि, मिट्टी और किसान रहते हैं। धरती से उपजी हुई सामयिक फसलें और फल-सब्जी ही इस व्रत के दौरान प्रसाद के रुप में चढ़ाई जाती है। स्वच्छ मिट्टी से बने चूल्हे पर और मिट्टी के बर्तन में नहाय-खाय, खरना और पूजा का  प्रसाद तैयार किया जाता है। प्रकृति की गोद में उपजे बांस से बने सूप में पूजन सामग्री रखकर अर्घ्य दिया जाता है। बांस का बना सूप, दौरा, टोकरी, मउनी तथा मिट्टी से बना दीप, चौमुखा व पंचमुखी दीया और कंद-मूल व फल जैसे ईख, सेव, केला, संतरा, नींबू, नारियल, अदरक, हल्दी, सूथनी, पानी फल सिंघाड़ा , चना, चावल (अक्षत), ठेकुआ जैसी छठ पूजा की सामग्रियां हमें प्रकृति से जोड़ती हैं। पुरानी परंपरागत वस्तुएं बिल्कुल बेकार नहीं हैं। छठ महापर्व के लिए ईंख, गागर नीबू, सुथनी, शरीफा कमरख, शकरकंद जैसे देसी फलों की जरुरत पड़ती है जो कि हमें स्ट्रॉबेरी, एप्पल,पाइनेपल, कीवी जैसे विदेशी फलों वाले जमाने में भी इन परंपरागत फलों और सब्जियों का स्वास्थ्यवर्द्धक महत्व समझाता है। 


अब तो ग्लोबल हो गया छठ 

सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका है और प्रवासी बिहारियों की भी। बिहारी अपनी संस्कृति को अपने साथ ले गये और अमेरिका से लन्दन तक छठ पूजा होने लगी। लन्दन में छठ गीत के वीडियो शूट होने लगे। छठ को लोकप्रिय बनाने में चम्पारण टॉकीज की बड़ी भूमिका है। शारदा सिन्हा की आवाज में पहिले - पहल हम कइलीं...गीत के वीडियो को इस कदर लोकप्रियता मिली कि अब बेजोड़ लगातार वीडियो ला रहा है। इस बार का वीडियो मैथिली में है। इससे हुआ यह है कि अश्लील और सस्ते गीतों को जनता ने नकारना शुरू किया और वे अपनी गुणवत्ता सुधारने के लिए विवश हो रहे हैं। छठ अब गरीब या मध्यमवर्गीय परिवारों तक सीमित नहीं रहा बल्कि अभिजात्य संस्कृति वाले भी इसे अपना रहे हैं और वह भी मूल परम्परा के साथ। कोरोना काल में पोखर को पुनर्जीवित करने की बात आयी तो घर में ही पोखर बनाने की बात भी। कहने का मतलब यह कि बिहार अब ग्लोबल दुनिया के साथ चलने लगा है। विदेशी बिहार में छठ कर रहे हैं। ईरानी महिला के छठ गीत का वीडियो वायरल हो रहा है...यही प्रमाण हैं।


छठी मइया को समर्पित निर्देशक व यशी फिल्म्स प्राइवेट लिमिटेड के कंटेंट हेड कुमार सौरव सिन्हा ने ब्रिटिश व भारतीय कलाकारों को लेकर छठ पूजा गीत ‘छठ पूजा इन लंदन’ के वीडियो की शूटिंग लंदन में किया है. निर्देशक सौरव सिन्हा ने विश्वस्तर पर भोजपुरी को नई पहचान इस छठ गीत से दिलाई है। छठ पूजा इन लंदन इस साल का सबसे महंगा छठ गीत है, जिसे यशी फिल्मस के ऑफिशियल यूट्यूब चैनल से रिलीज किया गया है और रिलीज होते ही यह खूब देखा जा रहा है। यह छठ गीत काफी मार्मिक और हृदय स्पर्शी है। इस वीडियो में ब्रिटिश अभिनेता सैमी जोनास हेनी नजर आ रहे हैं  जो विभिन्न हाई बजट फिल्मों जैसे वेलकम टू न्यूयॉर्क, हाई एंड यारियां में काम कर चुके हैं. परिणीति चोपड़ा अभिनीत उनकी आगामी नेटफ्लिक्स फिल्म ‘द गर्ल ऑन द ट्रेन’ है।

हमें यह समझना चाहिए कि छठ जैसे पारम्परिक पर्व समाज और पर्यावरण के लिए कितने ज़रुरी हैं। भारत भौगोलिक और सांस्कृतिक रुप से बहुत ही विभिन्नताओं वाला देश है। इसके हर भाग में अपने स्थान के आधार पर कुछ ना कुछ त्यौहार मनाए जाते हैं। ये त्यौहार वहां की ज़रूरतों के आधार पर होते हैं। आज भी भारत के आदिवासी इलाकों में वहां के लोग अपने आस-पास के प्राकृतिक स्थानीय घटकों की पूजा करते हैं। जैसे, जंगल में रहने वाले लोग अपने जंगल को देवता मानकर पूजा करते हैं। इसी तरह पहाड़ों के लोग पहाड़ो को पूजते हैं।

साभार तथा सन्दर्भ - वेबदुनिया, जी न्यूज, बीबीसी, प्रभात खबर,