गुरुवार, 11 मार्च 2021

जमाना थाली के बैंगन का है


बंगाल में चुनाव होने जा रहे हैं और दल - बदल का चलन अपने चरम पर है। किसी भी शासन से मुक्ति की चाह रखने वाले के लिए दल बदलने वाला नेता रातों -रात नायक और बेचारा, दोनों बन जाता है...सक्रिय पत्रकारिता में रहते हुए हम पत्रकार सब कुछ देखते हैं...मन ही मन हँसते हैं और ऐसा दिखाते हैं कि हमें कुछ फर्क ही नहीं पड़ा। फर्क तो पड़ता है...किसी नेता के पार्टी बदल लेने से बहुत फर्क पड़ता है। अब सवाल यह है कि दल -बदल होता क्यों है...अगर पुरानी पार्टी के समर्थकों की नजर से देखा जाये तो यह अवसरवादिता है...नेता ने पार्टी छोड़ी नहीं कि उसे घेरने की तैयारी होती है, उसे खत्म करने के लिए साजिशें की जाती हैं..मगर पार्टी हो या संस्थान, कोई भी ऐसे ही नहीं छोड़ता बल्कि कई बार उससे छुड़वा दिया जाता है...हम राजनीति को गालियाँ देते जरूर हैं मगर देखा जाये तो दल - बदल या यूँ कहें कि पाला बदल हर जगह है...अब इनको 'बेपेंदी का लोटा' कहिए या 'थाली के बैंगन'...ये किसी न किसी रूप में हर जगह हैं। थाली के बैंगन का चमत्कार कहिए या कुछ और...उसके पीछे सब बैंगन बन जाते हैं...एक के पीछे दूसरा बैंगन...और रसोई खत्म....वह इस बात की गारंटी लेकर जाता है कि दूसरी पार्टी अथवा संस्थान रूपी वॉशिंग मशीन में उसके अपराध धुल जाएंगे....गलती थाली के बैंगन की नहीं है...उसे इतना कीमती तो बनाया ही उन लोगों ने है, जो उसे खरीदते हैं....मसलन बैंगनों के लुढ़कने से आज जो पार्टी परेशान है...उसने भी तो बैंगन किसी और के बगीचे से ही खरीदे थे....और आज उससे भी बड़ा व्यापारी बगीचे में आ गया है तो थाली का बैंगन तो कीमती होना ही था...लेकिन कुछ बैंगन ऐसे भी होते हैं जो थाली में रहते आ रहे हैं...अपमान सहते आ रहे हैं, धौंस सहते आ रहे हैं और उनको इन्तजार सिर्फ ऐसे किसी बड़े व्यापारी की थाली का रहता है...जहाँ जाकर वह कुछ दिन आराम से फ्रिज में तो रह सके...तो जैसे ही मौका आता है...ऐसे छोटे - मोटे बैंगन लुढ़क आते हैं। आप कहते रहिए पाला बदल मगर कॅरियर है भाई...और राजनीति हो या सरकारी नौकरी....सेवा करने कौन आता है...? सब माल कमाने आते हैं, दाम कमाने आते हैं...और जब इनमें से कुछ भी कमाने का कोई स्कोप ही न हो...तो बेचारे करें क्या....तो उनको थाली के बड़े बैंगन के पीछे जाना ही पड़ता है।

अभी मौसम चुनाव का है मगर इस पालाबदल की प्रवृति और उसके कारणों की तह में जाने की जरूरत है...कुछ लोग लम्बे समय तक हाशिए में पड़े रहने के बाद एक नयी शुरुआत के लिए दल बदलते हैं...जैसे - ज्योतिराजे सिंधिया। कांग्रेस के लगभग हर युवा नेता ने पार्टी इसी वजह से छोड़ी और कांग्रेस नेतृत्व को इससे फर्क नहीं पड़ा...क्योंकि उनको चाटुकारिता और चाटुकार पसन्द हैं...। यह कॉरपोरेट संस्कृति में होता है यानी अगर आपका काम प्रबन्धन को पसन्द भी हो तो बीच के जो चाटुकार हैं, वह आपका पत्ता काट देते हैं। आपकी एक नकारात्मक छवि निर्मित की जाती है...ऐसा घेरा बनाया जाता है कि आप बोलते भी हैं तो आपकी आवाज दब जाती है और यकीन मानिए..यह हमारे - आपके घरों में भी होता है। हमने परिवारों को लेकर जबरदस्ती की सकारात्मक तस्वीर बना रखी है...भावनाओं का ऐसा जाल बना रखा है कि उसमें अपनों की मौकापरस्ती, धोखा.., छल..सब दब जाते हैं। पितृसत्ता या कोई भी सत्ता ऐसे ही संचालित नहीं होती...उसे चलायमान रखने के पीछे ऐसे ही थाली के बैंगन होते हैं....जो अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर सम्बन्ध बनाते भी हैं और सम्बन्ध निभाते भी यही देखकर हैं कि इसमें उनका कितना फायदा है..ऐसे लोग किसी के नहीं होते...ऐसी औरतें किसी की नहीं होतीं। मजे की बात यह है कि ऐसे 'अ' सिद्धांतवादी सिर्फ स्त्रियाँ ही नहीं होतीं बल्कि पुरुष भी होते हैं....उनका काम ही रहता है कि लड़कियों के खिलाफ षडयंत्र करना और लड़कियों की आवाज से लेकर उनका काम तक दबाना...ऐसे ही लोग घर में राज करते हैं क्योंकि उनको थाली का बैंगन बनने की कला आती है, समझौते के नाम पर वह हर अपराध करते हैं और देवता बने रहते हैं। उनकी छवि पर कोई असर नहीं पड़ता तो ऐसे लोगों के चेहरे पर से नकाब कौन उतारेगा...। ध्यान में रखिएगा कि ऐसे लोग हर जगह विकल्प तैयार रखते हैं...ठीक वैसे ही जैसे कोई राजनीतिक पार्टी रखती है....ठीक वैसे ही जैसे किसी संस्थान का शीर्ष अधिकारी रखता है...और ठीक उसी तरह ऐसे लोग भी यह देखते हैं कि प्रभाव किसका है...किसके सामने झुकना सही रहेगा...पत्नियों और माँओं को भावनात्मक ब्लैकमेलिंग से बरगलाया जा सकता है और बेटी तेज - तर्ऱार हुई तो उसके सामने झुकने में कोई बुराई नहीं...बेटी को भी अचानक उस व्यक्ति में दयालुता दिखने लगती है जो कभी उसके हर कष्ट का कारण था...बेटी की माँ...खुश...कि मेरा परिवार सम्भल गया और इन सबके बीच में पिस जाते हैं वह लोग...जो सही राह पर चलते हैं...। सूरत अच्छी होने का मतलब यह थोड़ी न है कि सीरत भी अच्छी ही होगी लेकिन जमाना पैकेजिंग का है तो यह जोड़ी उसमें माहिर रहती है.. लुढ़कने में इतने माहिर कि गिरगिट भी रंग बदलना भूल जाये तो लुढ़कने की प्रैक्टिस करने लगी। जमाना थाली के बैंगन का है...थाली का बैंगन सबको खुश रखता है....दूर से दूर के रिश्तेदार के जन्मदिन से लेकर सालगिरह तक..सब उसे याद रहते हैं....रिश्तेदार भले ही भूल जाये...थाली का बैंगन नहीं भूलता...हर बात पर बवाल काटता है....उसे हर चीज के लिए पंचायत चाहिए....वह अपनी थोथी से थोथी बात को झूठ और अहंकार के मुल्लमे से कीमती बनाना चाहता है...घर में बेटी का दूसरे लड़कों से बात करना पसन्द नहीं लेकिन अगर कोई उस पर भारी हुआ तो फोन पर यह समझाता है कि बच्चों को तो समझना होगा न....थाली का बैंगन हर जगह है...विश्वविद्यालय में जिधर विभागाध्यक्ष की कुर्सी होती है, बैंगन उधर ही लुढ़कता है...दफ्तरों में जो भी बॉस की कुर्सी पर है...बैंगन उसी की जी -हुजूरी करता है....मामला रुतबे का है तो बैंगन जितना सिर चढ़ता है...उसकी बॉसगिरी उतनी ही बढ़ती है...थाली का बैंगन....राज कर रहा है....और हम उस आग के सुलगने के इंतजार में हैं जिस पर किसी थाली का साथ उसे बचा न सके....और वह बैंगन भरता बन सके...आखिर.... बेपेंदी का लोटा हो या थाली का बैंगन...उनकी नियति तो टूटना और भरता बनना ही है...।


शनिवार, 30 जनवरी 2021

अपनी दुनिया में मगन बड़ाबाजार को अब बाखबर होने की जरूरत है

 


क्या आप जानते हैं की शहर कोलकाता कभी ब्लैक कोलकाता और वाइट कोलकाता में विभाजित था। दक्षिण कोलकाता और मध्य कोलकाता का दक्षिणी भाग वाइट था और बड़ाबाज़ार और उत्तर कोलकाता ब्लैक कोलकाता था। अंग्रेज पहले सूतानाटी में आये क्योंकि यह सुरक्षित था और बाद में दक्षिण की तरफ गये इसलिए तमाम अंग्रेजी इमारतें दक्षिण और मध्य कोलकाता में हैं और ब्लैक कोलकाता में बसाए गये भारतीय इसलिए यह काला रह गया। सेठ और बसाक और बाद में मारवाड़ी समुदाय का गढ़।

और ये भी बड़ाबाजार का बड़ा दरअसल बूड़ो है, बूड़ो बांग्ला में शिव को कहते हैं और मारवाड़ी समुदाय ने इसे बड़ा बनाया। बड़ाबाजार आज भी ब्लैक ही है, स्याह। बांग्ला में पढ़िये तो सेठ, बसाक, ठाकुर का गुणगान है और इसके बाद मोटिया मजदूरों का गढ़, जिसे वो हिकारत से देखते हैं, बड़ाबाजार ने जिनको पनाह दी, दूर देश से आये जिन लोगों की शरणस्थली बना, वो भी पुष्पित पल्लवित होते ही इसे छोड़ गये। अब ये इलाका उनके लिये इतिहास की पंक्ति भर है
बड़ाबाजार ने सबको पनाह दी और सबने बड़ाबाजार को त्यागा और अब हिंदीभाषियों का वोट बैंक तोड़ने के लिये इसे स्थानांतरित करने की तैयारी है। कोई राजारहाट बड़ाबाजार नहीं बन सकता, बड़ाबाजार से पुष्पित पल्लवित होने वाले समझें की उन पर ये ऋण है। क्यों नहीं वो विकास का कोई ऐसा मॉडल विकसित करते, जिनमें इन तंग गलियों को एक नया रूप दिया जा सके। क्यों नहीं यहाँ के खाली पड़े मकानों को नया रूप देकर बड़ाबाजार को श्वेत नहीं तो गेहुआ बनाया जाय। आप राजस्थान जाकर अपनी मातृभूमि को संवार सकते हैं तो बड़ाबाजार तो आपकी शरणस्थली है, इसे क्यों नहीं? क्या यह कृतघ्नता नहीं? 
सवाल तो हम पूछेंगे की 19वीं सदी के बाद बड़ाबाजार का इतिहास क्यों दबाया गया? हमारी प्राचीन इमारतें भी आपकी हेरिटेज सूची में क्यों नहीं दिखतीं? आखिर क्यों बड़ाबाजार की पहचान उसका गौरवशाली इतिहास नहीं बल्कि हर बार लगने वाली अग्निकांड की राख को बनाया जा रहा है? आखिर कलकत्ते का वह कौन सा हिस्सा है, जहाँ पर आग नहीं लगती और कलकत्ते के किस इलाके में तंग गलियाँ नहीं हैं....कौन से हिस्से में क्षतिग्रस्त मकान नहीं हैं...तो फिर यह पहचान बड़ाबाजार के साथ ही क्यों चिपका दिये गये हैं....अगर एक विश्वविद्यालय के कार्यक्रम में मोबाइल शौचालय की व्यवस्था हो सकती है, पुस्तक मेले में पाउच में पानी मिल सकता है तो बड़ाबाजार की तंग गलियों में क्यों नहीं मिल सकता? अंग्रेजों का सौतेलापन आज भी सरकारों ने क्यों बरकरार रखा है...क्या यह बड़ाबाजार के साथ साजिश नहीं है? 
सारी दुनिया के मजदूरों को एक करने की बात करने वाले पोस्ता के मुटिया मजदूरों को क्यों नहीं अपना पाते? क्यों हिकारत से देखते हैं? क्या वो हिन्दीभाषी है इसलिए या वो बिहार से हैं इसलिए? हमारे बिहार में आपके बंगाल के दिग्गज बढ़े हैं और भागलपुर से शरत बाबू का रिश्ता तो बानगी मात्र है। 
तो अब सवाल होगा की फिर बड़ाबाजार का विकास कैसे हो, तो इसके लिये राजारहाट जाने की जरूरत नहीं है, कुछ सुझाव हैं
- बहुत से विशाल राजप्रासाद और हवेलियाँ यहाँ खाली पड़ी हैं, सरकार या फिर कोई उद्योग समूह इनको अधिग्रहीत कर के इनको, उनके मूल रूप में संवार कर खड़ा कर सकता है। मॉल्स, आवास या रेस्तरां के रूप में विकसित कर सकता है मगर ढांचा वही रखिये, क्योकि यही इसकी यू एस पी है। 

इसके बाद जो मकान खाली पड़े हों, वहाँ मजदूरों को क्वार्टर दीजिये, सडकों की भीड़ ऐसे ही कम हो जाएगी। और ये सम्भव है, यकीन न हो स्टार थिएटर, स्वामी विवेकानंद का पैतृक आवास और अंजलि का शोरूम आपके सामने है। इससे आपका खर्च भी बचेगा और अतिरिक्त जमीन भी नहीं चाहिये। जो है उसको फिर से खड़ा करिये उसके मूल रूप में।

गद्दी परम्परा को जारी रखिये, यही बड़ाबाजार की पहचान है और यही आपको अलग रखेगा, वैसे जी जैसे ताज में अलुमिनियम की केतली चलती है। 

हाथ रिक्शे को बैटरी चालित बनाइये, मोबाइल शौचालय बनाइये।

 दिवारों को पुराने कोलकाता की पेन्टिंग्स या अपने पूर्वजों के तस्वीरों से सजाइए। रेस्तरां हों तो अपने  राज्य के हिसाब से लुक दीजिये। और सबसे बड़ी बात की ये काम कोई मारवाडी या  हिन्दीभाषी करे, वो इसलिए की जिस प्यार से आप बड़ाबाजार को संवारेंगे, वो कोई और नहीं करेगा क्योकि आपके लिये बड़ाबाजार आपके पूर्वजों की अमानत होगा, बोझ नहीं।

अम्बुजा, बिड़ला, गोयनका, सब मिलें और बिहार व यू पी का श्रम मिले तो राजारहाट जाये बगैर बड़ाबाजार खड़ा हो सकता है।

सम्भव है की ये काम कठिन हो लेकिन यह होने पर आपको जो सन्तोष मिलेगा, आपकी आत्मा को जो सुकून मिलेगा, वो अनमोल होगा क्योकि आपको ऐसा लगेगा की आपने अपने बुजुर्गों की निशानी खोने नहीं दी










सोमवार, 18 जनवरी 2021

महापुरुषों पर गर्व करते हैं तो उनकी विरासत को सहेजना भी सीख लेते


मेरे एक शिक्षक कहा करते थे...मनुष्य दो परम्पराओं में जीवित रहता है...वंश परम्परा और शिष्य परम्परा। आमतौर पर वंश परम्परा में विश्वास बहुत ज्यादा रहता है...हमारे समाज में विवाह और परिकल्पना के पीछे यह एक मजबूत कारण है लेकिन कई उदाहरण ऐसे सामने आ रहे हैं जिसे देखकर सोचना पड़ रहा है..क्या वाकई वंश परम्परा इतनी मजबूत होती है...? कई ऐसे उदाहरण हैं जिसे देखकर कहा जा सकता है कि शिष्य परम्परा की डोर वंश परम्परा की तुलना में कहीं अधिक मजबूत होती है क्योंकि परिवार अधिकतर मामलों में बाधक की भूमिका में ही अधिक रहता है और यह दावा नहीं किया जा सकता है कि किसी भी परिवार में व्यक्ति की सफलता से घर का एक सदस्य प्रसन्न ही होगा या इसे स्वीकार किया भी जायेगा। शिक्षण का क्षेत्र भी इसी वजह से चिर लोकप्रिय है। कई बार आपके बच्चों को और आपके परिवार को आपकी कद्र नहीं होती लेकिन आपके विद्यार्थी आपके लिए खड़े होते हैं...तब भी जब आपने उनसे ऐसी कोई शर्त या उम्मीद नहीं रखी होती...वह आपसे प्रेम करते हैं....और दिल से प्रेम करते हैं...जहाँ कोई तुलना न के बराबर ही रहती है...याद रखिए कि मैं अकादमिक स्तर पर किसी साधारण शिक्षण संस्थान के विद्यार्थी की बात नहीं कर रही...आप इसे जरा सा और ऊँचाई पर ले जाइए। शिष्यों ने अपने गुरु की परम्परा को आगे ले जाने के लिए अपना पूरा जीवन होम कर दिया...समाज और परिवार,,,सबको त्याग दिया या फिर उनके ताने आजीवन सहे...। स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद और स्वामी श्रद्धानंद और खुद सचिन तेंदुलकर भी इसका सीधा उदाहरण है। अपने गुरु विरजानंद के वचन को रखते हुए स्वामी दयानंद सरस्वती आजीवन उनके द्वारा दिखाये मार्ग पर चले और आज भी आर्य समाज की परम्परा विद्यमान है। सचिन तेंदुलकर अपने गुरु रमाकांत आचरेकर का कितना सम्मान करते थे...यह किसी से छिपा नहीं है मगर आज इस लेख की पृष्ठभूमि जो घटना है...वह खुद में अद्भुत है मगर कुछ ऐसे सवाल भी छोड़ गयी है जिनके बारे में हमने सोचा भी नहीं है और सोचना ही चाहते हैं...। 


अभी हाल में स्वामी विवेकानंद के आवास की स्टोरी कवर करने की इच्छा पूरी हुई। स्वामी जी के इस पैतृक आवास की मूल इमारत ध्वस्त ही हो चली थी मगर रामकृष्ण मिशन ने इसे फिर से एक प्रकार से खोजकर खड़ा किया है। अब यह पैतृक आवास सह संग्रहालय तथा सांस्कृतिक केन्द्र भी है...बात इतनी सी ही नहीं है...आप इस पूरी प्रक्रिया को समझिए क्योंकि यह जगह मिशन को पूरे 30 साल की मुकदमेबाजी के बाद भी नहीं मिली थी, अतिक्रमण हटाने के लिए 54 परिवारों और व्यवसायिक केन्द्रों को पुनर्वास रामकृष्ण मिशन ने दिया है और इस प्रक्रिया में 7 साल लगे और इसके बाद बाकी 5 साल वर्तमान भवन के निर्माण में लगे...यह शिष्य परम्परा और स्वामी विवेकानंद के प्रति रामकृष्ण मिशन के उत्कट प्रेम का प्रतीक है...और यह गर्व का विषय है मगर हमारे लिए शर्म की बात होनी चाहिए।

मेरा सीधा सवाल यह है कि क्या यह सारी जिम्मेदारी रामकृष्ण मिशन की थी या होनी चाहिए? क्या स्वामी विवेकानंद सिर्फ मिशन के हैं या इस पूरे देश की जनता के हैं? क्या विचारधारा मेल नहीं खाती तो सम्मान कम हो जाता है..? यह सवाल राज्य सरकार के साथ केन्द्र सरकार से भी है...वैसे भी स्वामी जी जब जीवित थे...तब भी उनके परिवार को दरिद्रता देखनी पड़ी। माता भुवनेश्वरी के लिए खेतड़ी महाराज अजीत सिंह को पत्र लिखना पड़ा.....क्या उस समय बंगाल में रईसों का अकाल था...? 

जिस शोभाबाजार राजबाड़ी की 36 -37 इमारतें थीं...वह स्वामी जी को मठ के लए जगह क्यों नहीं दे सकी... जब कि अंग्रेजों को चर्च बनाने के लिए इस परिवार ने जमीन दी? स्वामी विवेकानंद और रवीन्द्रनाथ ठाकुर की मित्रता की बातें की जाती हैं तो फिर ऐसा क्यों हुआ कि रवीन्द्रनाथ के रहते हुए माता भुवनेश्वरी देवी को दरिद्रता में दिन काटने पड़े। याद रहे कि भुवनेश्वरी देवी पुत्र स्वामी विवेकानंद के निधन के बाद 9 साल जीवित रहीं। उनका निधन मेन्जाइटिस से 1911 में हुआ और रवीन्द्रनाथ को 1913 में नोबल पुरस्कार मिला।

स्वामी विवेकानंद और खेतड़ी महाराज अजीत सिंह

माफ कीजिए मगर मुझे ऐसा कोई कारण नजर नहीं आता कि मैं धनाढ्य ठाकुर परिवार की जमीन्दारी पर गर्व करूँ। कई बार लगता है कि जैसे उस समय भी कोई लॉबी काम करती थी जिसका काम स्वामी जी जैसे लोगों को उपेक्षित रखना था...। जमीन्दार घरानों की कमी तो थी नहीं और ईश्वर चन्द्र विद्यासागर जैसे व्यक्तित्व ने बगैर कुछ पड़ताल किये कैसे नरेन को नौकरी से निकाल दिया....क्या अन्दर ही अन्दर शीत युद्ध जैसा कुछ था या फिर स्वामी विवेकानंद की बढ़ती लोकप्रियता इन सबको रास नहीं आ रही थी...आखिर क्यों बंगाल की धरती पर एक शख्स ऐसा नहीं हो सका जो स्वामी जी की शिकॉगो यात्रा का खर्च उठा सकता......? भुवनेश्वरी देवी की तरह ही माँ शारदा को भी दरिद्रता देखनी पड़ी...क्या यही बंगालीपन था....जिसका दम भरते बंगाल का मन नहीं भरता......? 
स्वामी विवेकानंद ने कभी जड़ता को प्रोत्साहन नहीं दिया मगर आजादी के बाद वामपंथ और कांग्रेस की सरकार ने इनको लगातार उपेक्षित किया वरना ऑपरेशन सन शाइन के नाम पर खटाल उजाड़ने वाले वामपंथी सरकार इतनी कमजोर नहीं थी कि अवैध अतिक्रमण हटवाने के लिए कोई मामला 30 साल तक चले।   

जिस घर के सामने सिर झुक जाना चाहिए...आखिर वहाँ पर अतिक्रमण कोई कैसे कर सकता है और हटाने पर आप मुकदमा करेंगे....ऐसी न जाने कितनी ही हमारी धरोहरें हैं जो अतिक्रमण का शिकार हैं...बंगाली समाज जब इतना जागरुक है तो यह अपने पूर्वजों के अधिकार और उसके सम्मान के लिए आवाज क्यों नहीं उठाता...क्यों नहीं जेयू और प्रेसिडेंसी के विद्यार्थी सुबोध मलिक के घर को बचाने के लिए सामने आते हैं...जो कि निरन्तर खत्म होता जा रहा है.... रामकृष्ण मिशन स्वामी जी के आवास का निर्माण करे..यह बात समझी जा सकती है मगर पुनर्वास का जिम्मा....क्या यह सरकारों और कॉरपोरेट घरानों की जिम्मेदारी नहीं थी..क्या यह स्थानीय लोगों की जिम्मेदारी नहीं है कि अपनी धरोहरों को अतिक्रमण से बचायें....इसके लिए क्या अलग से कानून बनाने की जरूरत है या आपके पास जमीर नाम की चीज है.....आज जब यह भवन बनकर तैयार है तो बड़ी शान से बंगाल के पर्यटन के मानचित्र पर इसे दर्ज किया गया है मगर जब यह लुप्त होने की ओर था...तब यह गौरव कहाँ था...लेकिन ठाकुर के शिष्य की परम्परा बहुत मजबूत है तभी तो रामकृष्ण मिशन ने इस भवन को फिर से खड़ा किया और आप जब भी इसे देखेंगे....विश्वास मजबूत होता रहेगा मगर इसके साथ ही जब खुद पर नजर डालेंगे तो शायद खुद से नजर भी न मिला सकें।

शनिवार, 9 जनवरी 2021

खुद से पूछिए, विवेकानंद चाहिए तो क्या परमहंस बनने को तैयार हैं?

12 जनवरी आ रही है और देश में युवा दिवस मनाया जायेगा। युवाओं के साथ मैं कई सालों से काम कर रही हूँ, पत्रकारिता करते हुए युवाओं के साथ ही बात भी होती रही है और उनको समझना थोड़ा सा आसान हो गया है। हर बार मंच पर सबको यही कहते सुना है कि युवाओं को मौका मिलना चाहिए या देना चाहिए लेकिन युवाओं से हम उम्मीद यही रखते हैं कि वह आज्ञाकारी बने रहें, उनके सवालों के लिए हम तैयार नहीं रहते। जो करते हैं, वह खानापूर्ति से अधिक कुछ नहीं होता। उदाहरण के लिए अगर हम अपने कार्यक्रमों को लेकर ही बात करें तो वहाँ पर केन्द्रीय भाव इतना अधिक रहता है कि बाकी चीजें पीछे छूट जाती हैं। कहने का मतलब यह है कि कोई साहित्य पढ़े तो उसे विज्ञान से मतलब नहीं रखना चाहिए या कोई विज्ञान का विद्यार्थी है तो उसके लिए साहित्य पढ़ना एक अजूबा माना जाता है जबकि हकीकत यह है कि दोनों ही क्षेत्र से जुड़े लोगों की पसन्द उनकी शिक्षा या पाठ्यक्रम के विपरीत हो सकती है। जैसा कि पहले भी कहती रही हूँ कि हिन्दी में विशेष रूप से भाषा को सुधारने की बात होती है, भाषा को रोजगार से जोड़ने की बात होती है मगर साहित्य को रोजगार से जोड़ने की बात कम ही होती है। जिस तरह हिन्दी सिनेमा का मतलब बॉलीवुड मान लिया गया है, वैसे ही साहित्य का मतलब भी कविता या कथा साहित्य भर को मान लिया गया है। अधिकतर कार्यक्रम ऐसे होते हैं जिनमें दिग्गज ही बोलते हैं और युवाओं का काम सिर्फ सुनना होता है। ऐसा नहीं है कि युवाओं के विचार सुने नहीं जाते, सुने जाते हैं मगर बड़ों को उनकी असहमति का स्वर अब भी नहीं भाता। 

इसका एक सीधा कारण है बात करने का तरीका...सन्तुलित तरीके से अपनी बात रखना, विरोध करना या असहमति प्रकट करना हमारे युवा सीख नहीं पाये हैं। अपनी बात नहीं सुने जाने की खीझ ही नाराजगी बनती है और बात में विद्रोह और विद्रोह के नाम पर याद आती हैं राजनीतिक पार्टियाँ और उनके छात्र संगठन...जो आम युवाओं का इस्तेमाल अपनी ताकत बढ़ाने और दिखाने के लिए करते हैं। एक समय था जब छात्र राजनीति से बड़े दिग्गज नेता निकले।  सहमति और असहमति के बावजूद देश की राजनीति में उनका महत्व है। यह सोचने का विषय है कि धरने और प्रदर्शन की राजनीति की भरमार के बाद भी एक अच्छा नेता छात्र राजनीति क्यों नहीं दे सकी? उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर हिन्दी भाषी विद्याथिर्यों में एक अच्छा नेतृत्व क्यों नहीं उभर पा रहा है? क्यों हिन्दीभाषियों का प्रतिनिधित्व किसी का झंडा उठाने या बाउंसर बनने तक सिमट गया है...इन सवालों की जड़ में जब आप जाते हैं तो जवाब एक ही मिलता है...युवाओं को बोलने ही नहीं दिया जाता और जब वे बोलते हैं तो आप सुनना नहीं चाहते, जब आप मन मारकर सुन लेते हैं तो उनकी बात मानने से आपके अहं को तकलीफ होती है। शायद यही कारण है कि किसी भी कार्यक्रम के अंत में प्रश्नों के लिए 10 - 15 मिनट होते तो हैं, मगर अधिकतर मामलों में वे समय़ की कमी की भेंट चढ़ जाते हैं। किसी युवा ने सवाल कर दिया तो आप खुद को अपमानित महसूस करते हैं और कई धुरन्धर तो ऐसे होते हैं कि सवाल करने वाले विद्यार्थी या युवा का जीवन और कॅरियर तबाह करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। यकीन न आये तो कभी अकादमियों, संस्थानों की कुर्सियों पर नजर डालकर देखिएगा....विनम्रता के नाम पर चाटुकारिता की परम्परा को घी पिलाकर जिज्ञासा और ज्ञान की परम्परा में मट्ठा डाल दिया गया है। अगर परम्परा की बात करते हैं तो यह भी याद करिएगा कि रामकृष्ण परमहंस को भी स्वामी विवेकानंद के संशय का समाधान करना पड़ा था...नरेन्द्र एक ही बार में आँख बंद करके पैर छूने वाले शिष्य नहीं थे मगर गुरु का धैर्य ऐसा था कि अन्त में शिष्य ने उनको स्वीकार किया...आप विवेकानन्द जैसे शिष्य बाद में खोज लें....पहले खुद से सवाल कीजिए...क्या आप रामकृष्ण परमहंस या स्वामी दयानन्द सरस्वती के गुरु विरजानंद बनने को तैयार हैं..? सोचिए और तब युवाओं का आकलन करिए।


सोमवार, 21 दिसंबर 2020

पैर की जमीन है इतिहास, खो मत दीजिए


हम वर्तमान में जीने वाले और इतिहास से डरने वाले लोग हैं...लोग तो ईश्वर से भी डरते हैं...कई बार भक्ति में प्रेम की जगह डर ले लेता है और हम जिससे डरते हैं, उसे याद नहीं करना चाहते। इतिहास एक बड़ा दायित्व है मगर इतिहास लेखन में ईमानदारी बरतने से पहले ही उसमें जब धर्म का मसाला कुछ अधिक डाल दिया जाए तो वह विद्रूप लगने लगता है। इतिहास का चयन भी तो अपनी सुविधानुसार करने की परिपाटी है...कौन सा महापुरुष कितने वोट दिलवा सकता है...

इस समीकरण ने इतिहास में उन लोगों के साथ अन्याय करवाया जो नींव की ईंट थे। वरना क्या वजह रही होगी कि जिस दरभंगा राज परिवार ने भारत को रेलवे दी, विमानन सेवा दी, देश का पहला भूकम्प प्रतिरोधी भवन दिया...आज उनकी धरोहरों के संरक्षण की जिम्मेदारी सरकारें नहीं लेना चाहतीं। क्यों कलकत्ता विश्वविद्यालय अपने दानदाता रामेश्वर सिंह को बस रिकॉर्ड तक समेट बैठा है...आखिर जिस परिसर की जमीन उनसे ?मिली, वहाँ उनकी एक भी प्रतिमा क्यों नहीं है...क्यों उनके नाम पर आयोजन नहीं होते और कैसे एक विशाल प्रासाद को, जो कि हेरिटेज था. उसे ढहाकर इस शहर की बड़ी इमारत खड़ी कर दी गयी। 

क्यों 500 साल से अधिक पुरानी फिरंगी काली बाड़ी को हेरिटेज का दर्जा नहीं मिल सका? जिस घर ने क्रांतिकारियों को शरण दी, राजा सुबोध चन्द्र बसु मलिक की वह निशानी पत्थरों का अवशेष क्यों बन गयी है....इस हेरिटेज की मान्यता का मापदंड क्या होता होगा...और क्यों 2005 के बाद खुदाई का कोई काम बंगाल में नहीं हुआ...इतने सवाल हैं...मगर  जवाब नहीं मिलता...इतिहास को इतिहास ही रहने दीजिए...जमीन से खिलवाड़ करना अच्छी बात नहीं है। अब मन है कि इतिहास से ही बतियाया जाए....देखते हैं...सफर पर तो निकलना ही है

रविवार, 22 नवंबर 2020

छठ पूजा : आधुनिकता, समानता, प्रकृति के रंग से सजी परम्परा



छठ पूजा को पर्यावरण की दृष्टि से सबसे अनुकूल माना गया है। परम्परा और प्रकृति से जोड़ने वाला यह पर्व अनूठा है और अभी हाल ही में मनाया भी गया मगर दुःखद है कि कुछ आधुनिक और बुद्धिजीवी अंग्रेजीदां अखबार और पत्रकार अपने निजी हितों और सस्ती लोकप्रियता के लिए हमारी परम्परा को निशाना बना रहे हैं...कहा जा रहा है कि छठ पूजा के कारण रवीन्द्र सरोवर और सुभाष सरोवर में प्रदूषण फैल रहा है...ये तथाकथित आधुनिक भूल जाते हैं कि इस पूजा में जो अवयव हैं, उसमें केमिकल नहीं है, प्रतिमा नहीं है इसलिए लेड भी नहीं है...जो है...वह है फूल, और पत्तियों जैसे अवयव जो पानी में घुल जाते हैं और इनसे खाद भी बनायी जाती है...ऐसे लोगों को छठ के बारे में ज्ञान नहीं है...इसलिए उनके जैसे लोगों के लिए ही यह लेख हैं...हमें नहीं पता कि इसका कितना असर पड़ेगा मगर समय आ गया है कि ऐसे लोगों को बताया जाए कि उनकी हद कहाँ तक है और उनकी सीमा क्या है...फिलहाल छठ पर यह लेख...

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि के दिन छठ पूजा की जाती है। इस पूजा का आयोजन पूरे भारत वर्ष में एक साथ किया जाता है। भगवान सूर्य को समर्पित इस पूजा में सूर्य को अध्र्य दिया जाता है। पूजन में शरीर और मन को पूरी तरह साधना पड़ता है, इसलिए इस पर्व को हठयोग भी कहा जाता है। कहा जाता है 

इतिहास

- माना जाता है कि छठ का पर्व वैदिक काल से चला आ रहा है। इस व्रत में मुख्यः रूप से ॠषियों द्वारा लिखी गई ऋग्वेद सूर्य पूजन, उषा पूजन किया जाता है। इस पर्व में वैदिक आर्य संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। छठ पूजा का बहुत महत्व माना जाता है। इस पर्व को भगवान सूर्य, उषा, प्रकृति, जल, वायु आदि को समर्पित किया जाता है। छठ पर्व मूलतः सूर्य की आराधना का पर्व है, जिसे हिन्दू धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है। हिन्दू धर्म के देवताओं में सूर्य ऐसे देवता हैं जिन्हें मूर्त रूप में देखा जा सकता है।

सूर्य की शक्तियों का मुख्य श्रोत उनकी पत्नी ऊषा और प्रत्यूषा हैं। छठ में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की संयुक्त आराधना होती है। प्रात:काल में सूर्य की पहली किरण (ऊषा) और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा) को अर्घ्य देकर दोनों का नमन किया जाता है। छठ देवी को सूर्य देव की बहन बताया जाता है। लेकिन छठ व्रत कथा के अनुसार छठ देवी ईश्वर की पुत्री देवसेना बताई गई हैं। देवसेना अपने परिचय में कहती हैं कि वह प्रकृति की मूल प्रवृति के छठवें अंश से उत्पन्न हुई हैं यही कारण है कि मुझे षष्ठी कहा जाता है। देवी कहती हैं यदि आप संतान प्राप्ति की कामना करते हैं तो मेरी विधिवत पूजा करें। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को करने का विधान बताया गया है। पौराणिक ग्रंथों में इस रामायण काल में भगवान श्री राम के अयोध्या आने के पश्चात माता सीता के साथ मिलकर कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्योपासना करने से भी जोड़ा जाता है, महाभारत काल में कुंती द्वारा विवाह से पूर्व सूर्योपासना से पुत्र की प्राप्ति से भी इसे जोड़ा जाता है। सतयुग में भगवान श्रीराम, द्वापर में दानवीर कर्ण और पांच पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने सूर्य की उपासना की थी। छठी मैया की पूजा से जुड़ी एक क​था राजा प्रियवंद की है, जिन्होंने सबसे पहले छठी मैया की पूजा की थी। 



नामकरण

छठ, षष्ठी का अपभ्रंश है। कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली मनाने के बाद मनाये जाने वाले इस चार दिवसीय व्रत की सबसे कठिन और महत्त्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी की होती है। कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी को यह व्रत मनाये जाने के कारण इसका नामकरण छठ व्रत पड़ा। छठ पूजा साल में दो बार होती है एक चैत मास में और दुसरा कार्तिक मास शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि, पंचमी तिथि, षष्ठी तिथि और सप्तमी तिथि तक मनाया जाता है. षष्ठी देवी माता को कात्यायनी माता के नाम से भी जाना जाता है। 

विधि 

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को नहाय खाय से शुरू होने वाले व्रत के दौरान छठव्रती स्नान एवं पूजा पाठ के बाद शुद्ध अरवा चावल, चने की दाल और कद्दू की सब्जी ग्रहण करते हैं। दूसरे दिन खरना होता है, इसके बाद शुरू होता है 36 घंटे का 'निर्जला व्रत'। छठ महापर्व के तीसरे दिन शाम को व्रती डूबते सूर्य की आराधना करते हैं और अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देते हैं। पूजा के चौथे दिन व्रतधारी उदीयमान सूर्य को दूसरा अर्घ्य समर्पित करते हैं। इसके पश्चात 36 घंटे का व्रत समाप्त होता है और व्रती अन्न जल ग्रहण करते हैं।


वैज्ञानिक महत्व 

छठ पर्व को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो षष्ठी तिथि (छठ) को एक विशेष खगोलीय परिवर्तन होता है, इस समय सूर्य की पराबैगनी किरणें (Ultra Violet Rays) पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं इस कारण इसके सम्भावित कुप्रभावों से मानव की यथासम्भव रक्षा करने का सामर्थ्य प्राप्त होता है। पर्व पालन से सूर्य (तारा) प्रकाश (पराबैगनी किरण) के हानिकारक प्रभाव से जीवों की रक्षा सम्भव है। पृथ्वी के जीवों को इससे बहुत लाभ मिलता है। सूर्य के प्रकाश के साथ उसकी पराबैगनी किरण भी चंद्रमा और पृथ्वी पर आती हैं। सूर्य का प्रकाश जब पृथ्वी पर पहुँचता है, तो पहले वायुमंडल मिलता है। वायुमंडल में प्रवेश करने पर उसे आयन मंडल मिलता है। पराबैगनी किरणों का उपयोग कर वायुमंडल अपने ऑक्सीजन तत्त्व को संश्लेषित कर उसे उसके एलोट्रोप ओजोन में बदल देता है। इस क्रिया द्वारा सूर्य की पराबैगनी किरणों का अधिकांश भाग पृथ्वी के वायुमंडल में ही अवशोषित हो जाता है। पृथ्वी की सतह पर केवल उसका नगण्य भाग ही पहुँच पाता है। सामान्य अवस्था में पृथ्वी की सतह पर पहुँचने वाली पराबैगनी किरण की मात्रा मनुष्यों या जीवों के सहन करने की सीमा में होती है। अत: सामान्य अवस्था में मनुष्यों पर उसका कोई विशेष हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि उस धूप द्वारा हानिकारक कीटाणु मर जाते हैं, जिससे मनुष्य या जीवन को लाभ होता है। छठ जैसी खगोलीय स्थिति (चंद्रमा और पृथ्वी के भ्रमण तलों की सम रेखा के दोनों छोरों पर) सूर्य की पराबैगनी किरणें कुछ चंद्र सतह से परावर्तित तथा कुछ गोलीय अपवर्तित होती हुई, पृथ्वी पर पुन: सामान्य से अधिक मात्रा में पहुँच जाती हैं। वायुमंडल के स्तरों से आवर्तित होती हुई, सूर्यास्त तथा सूर्योदय को यह और भी सघन हो जाती है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार यह घटना कार्तिक तथा चैत्र मास की अमावस्या के छ: दिन उपरान्त आती है। ज्योतिषीय गणना पर आधारित होने के कारण इसका नाम और कुछ नहीं, बल्कि छठ पर्व ही रखा गया है।

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पारिवारिक एकता की दृष्टि से महत्व

 - छठ सिर्फ आस्था का पर्व नहीं ये उस विश्वास का त्योहार है, जहां कमाने के लिए परदेस गए बेटों का मां इस दिन लौट आने का भरोसा रखती है। दिल्ली-मुंबई और कोलकाता समेत कई देशभर के महानगरों से भर-भर कर आने वाले ट्रेनें इस बात की हर बात गवाही देते हैं कि ये परिवारों को पास लाने का भी त्योहार है। घर के पुरुष और बच्चे सभी इस व्रत में शामिल होते हैं। कई बार पुरुष रसोई के काम यानी ठेकुआ से लेकर चाय बनाने का काम खुशी से करते हैं और खुद व्रत करते भी हैं। 




लैंगिक समानता वाला पर्व 

- त्यौहार के अनुष्ठान कठोर हैं और चार दिनों की अवधि में मनाए जाते हैं। इनमें पवित्र स्नान, उपवास और पीने के पानी (वृत्ता) से दूर रहना, लंबे समय तक पानी में खड़ा होना, और प्रसाद (प्रार्थना प्रसाद) और अर्घ्य देना शामिल है। परवातिन नामक मुख्य उपासक (संस्कृत पार्व से, जिसका मतलब 'अवसर' या 'त्यौहार') आमतौर पर महिलाएं होती हैं। हालांकि, बड़ी संख्या में पुरुष इस उत्सव का भी पालन करते हैं क्योंकि छठ लिंग-विशिष्ट त्यौहार नहीं है।  

सांझ के देबई अरघिया, और किछु मांगियो जरूर, पांचों पुत्र एक धिया (बेटी), धियवा मंगियो जरूर.। 

छठ के पारंपरिक गीतों में छठी माता से बेटी देने की प्रार्थना की जाती है. एक गीत जो बहुत लोकप्रिय है, उसके बोल है - 

रूनकी झुनकी बेटी मांगीला, पढ़ल पंडितवा दामाद, छठी मइया दर्शन दींही ना आपन. ( खेलती कूदती बेटी और पढ़ा लिखा दामाद चाहिए), 

इस बारे में बात करते हुए लोकगायिका चंदन तिवारी कहती हैं, "आप देखें हमारे यहां जब आशीर्वाद में कहा जाता है दूधो नहाओ पूतो फलो या फिर पुत्रवती भव. यानी बेटी की कामना कहीं नहीं है. लेकिन छठ में बेटी की भी कामना है और धनवान नहीं बल्कि पढ़े लिखे दामाद की कामना व्रती करती है।" इस महापर्व और स्त्रियों की भूमिका के बारे में हिंदू धर्म के जानकार पंडित रामदेव पाण्डे बताते हैं, "छठ के बारे में तो कहा ही जाता है कि इस व्रत को पहली बार सतयुग में राजा शर्याति की बेटी सुकन्या ने रखा था. इसलिए इसमें स्त्री स्वर की प्रधानता है. कोई ऐसा पर्व नहीं है जिसमें बेटी की कामना हो, छठ व्रत में ये कामना है. दुर्गापूजा में भी नारी की पूजा होती है लेकिन वहां बेटी की कामना नहीं है."छठ के गीतों में सभी तरह का काम करने वाले लोगों की बेटियों का जिक्र है. एक गीत के बोल है-

छोटी रे मोटी डोमिन बेटी के लामी लामी केश,

सुपवा ले आइहा रे डोमिन, अरघ के बेर

छोटी रे मोटी मालिन बेटी के लामी लामी केश,

फुलवा ले आइहा रे मलिन, अरघ के बेर …..

सामाजिक सौहार्द और समानता वाला पर्व 

इस पूजा में जातियों के आधार पर कहीं कोई भेदभाव नहीं है, समाज में सभी को बराबरी का दर्जा दिया गया है। सूर्य देवता को बांस के बने जिस सूप और डाले में रखकर प्रसाद अर्पित किया जाता है, उसे सामा‍जिक रूप से अत्‍यंत पिछड़ी जाति के लोग बनाते हैं। इससे सामाजिक संदेश एकदम स्‍पष्‍ट है।

बिहार तथा अन्य जगहों पर छठ का व्रत मुसलमान समुदाय के लोगों द्वारा भी किया जाता है। शास्त्रों से अलग यह जन सामान्य द्वारा अपने रीति-रिवाजों के रंगों में गढ़ी गयी उपासना पद्धति है। इसके केंद्र में वेद, पुराण जैसे धर्मग्रन्थ न होकर किसान और ग्रामीण जीवन है। इस व्रत के लिए न विशेष धन की आवश्यकता है न पुरोहित या गुरु के अभ्यर्थना की। जरूरत पड़ती है तो पास-पड़ोस के सहयोग की जो अपनी सेवा के लिए सहर्ष और कृतज्ञतापूर्वक प्रस्तुत रहता है। इस उत्सव के लिए जनता स्वयं अपने सामूहिक अभियान संगठित करती है। नगरों की सफाई, व्रतियों के गुजरने वाले रास्तों का प्रबन्धन, तालाब या नदी किनारे अर्घ्य दान की उपयुक्त व्यवस्था के लिए समाज सरकार के सहायता की राह नहीं देखता। इस उत्सव में खरना के उत्सव से लेकर अर्ध्यदान तक समाज की अनिवार्य उपस्थिति बनी रहती है। यह सामान्य और गरीब जनता के अपने दैनिक जीवन की मुश्किलों को भुलाकर सेवा-भाव और भक्ति-भाव से किये गये सामूहिक कर्म का विराट और भव्य प्रदर्शन है। यह अकेला त्योहार है जिसमें डूबते सूर्य की भी आराधना की जाती है।


पर्यावरण और कृषि की दृष्टि से महत्व

इस पूजा के बारे में हम यह भी कह सकते हैं कि “यह प्रकृति की प्राकृतिक ढंग से पूजा है” और यह एक ऐसी पूजा है जो कि पर्यावरण के अनुकूल भी है। इसमें जिन-जिन साधनों का उपयोग किया जाता है, वे ज़्यादातर बांस तथा मिट्टी के ही बने होते हैं। जैसे, बांस के बने सूप और दऊरा के साथ-साथ प्रसाद बनाने के लिए मिट्टी के बर्तन का उपयोग किया जाता हैं। अगर हम धर्म से हटकर भारत के स्थानीय और पारम्परिक त्यौहारों की बात करें तो यह पर्यावरण और संस्कृति के अनुकूल ही रहते हैं। किसानों और मिट्टी से जुड़ा है छठ महापर्व। छठ महा पर्व के केन्द्र में कृषि, मिट्टी और किसान रहते हैं। धरती से उपजी हुई सामयिक फसलें और फल-सब्जी ही इस व्रत के दौरान प्रसाद के रुप में चढ़ाई जाती है। स्वच्छ मिट्टी से बने चूल्हे पर और मिट्टी के बर्तन में नहाय-खाय, खरना और पूजा का  प्रसाद तैयार किया जाता है। प्रकृति की गोद में उपजे बांस से बने सूप में पूजन सामग्री रखकर अर्घ्य दिया जाता है। बांस का बना सूप, दौरा, टोकरी, मउनी तथा मिट्टी से बना दीप, चौमुखा व पंचमुखी दीया और कंद-मूल व फल जैसे ईख, सेव, केला, संतरा, नींबू, नारियल, अदरक, हल्दी, सूथनी, पानी फल सिंघाड़ा , चना, चावल (अक्षत), ठेकुआ जैसी छठ पूजा की सामग्रियां हमें प्रकृति से जोड़ती हैं। पुरानी परंपरागत वस्तुएं बिल्कुल बेकार नहीं हैं। छठ महापर्व के लिए ईंख, गागर नीबू, सुथनी, शरीफा कमरख, शकरकंद जैसे देसी फलों की जरुरत पड़ती है जो कि हमें स्ट्रॉबेरी, एप्पल,पाइनेपल, कीवी जैसे विदेशी फलों वाले जमाने में भी इन परंपरागत फलों और सब्जियों का स्वास्थ्यवर्द्धक महत्व समझाता है। 


अब तो ग्लोबल हो गया छठ 

सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका है और प्रवासी बिहारियों की भी। बिहारी अपनी संस्कृति को अपने साथ ले गये और अमेरिका से लन्दन तक छठ पूजा होने लगी। लन्दन में छठ गीत के वीडियो शूट होने लगे। छठ को लोकप्रिय बनाने में चम्पारण टॉकीज की बड़ी भूमिका है। शारदा सिन्हा की आवाज में पहिले - पहल हम कइलीं...गीत के वीडियो को इस कदर लोकप्रियता मिली कि अब बेजोड़ लगातार वीडियो ला रहा है। इस बार का वीडियो मैथिली में है। इससे हुआ यह है कि अश्लील और सस्ते गीतों को जनता ने नकारना शुरू किया और वे अपनी गुणवत्ता सुधारने के लिए विवश हो रहे हैं। छठ अब गरीब या मध्यमवर्गीय परिवारों तक सीमित नहीं रहा बल्कि अभिजात्य संस्कृति वाले भी इसे अपना रहे हैं और वह भी मूल परम्परा के साथ। कोरोना काल में पोखर को पुनर्जीवित करने की बात आयी तो घर में ही पोखर बनाने की बात भी। कहने का मतलब यह कि बिहार अब ग्लोबल दुनिया के साथ चलने लगा है। विदेशी बिहार में छठ कर रहे हैं। ईरानी महिला के छठ गीत का वीडियो वायरल हो रहा है...यही प्रमाण हैं।


छठी मइया को समर्पित निर्देशक व यशी फिल्म्स प्राइवेट लिमिटेड के कंटेंट हेड कुमार सौरव सिन्हा ने ब्रिटिश व भारतीय कलाकारों को लेकर छठ पूजा गीत ‘छठ पूजा इन लंदन’ के वीडियो की शूटिंग लंदन में किया है. निर्देशक सौरव सिन्हा ने विश्वस्तर पर भोजपुरी को नई पहचान इस छठ गीत से दिलाई है। छठ पूजा इन लंदन इस साल का सबसे महंगा छठ गीत है, जिसे यशी फिल्मस के ऑफिशियल यूट्यूब चैनल से रिलीज किया गया है और रिलीज होते ही यह खूब देखा जा रहा है। यह छठ गीत काफी मार्मिक और हृदय स्पर्शी है। इस वीडियो में ब्रिटिश अभिनेता सैमी जोनास हेनी नजर आ रहे हैं  जो विभिन्न हाई बजट फिल्मों जैसे वेलकम टू न्यूयॉर्क, हाई एंड यारियां में काम कर चुके हैं. परिणीति चोपड़ा अभिनीत उनकी आगामी नेटफ्लिक्स फिल्म ‘द गर्ल ऑन द ट्रेन’ है।

हमें यह समझना चाहिए कि छठ जैसे पारम्परिक पर्व समाज और पर्यावरण के लिए कितने ज़रुरी हैं। भारत भौगोलिक और सांस्कृतिक रुप से बहुत ही विभिन्नताओं वाला देश है। इसके हर भाग में अपने स्थान के आधार पर कुछ ना कुछ त्यौहार मनाए जाते हैं। ये त्यौहार वहां की ज़रूरतों के आधार पर होते हैं। आज भी भारत के आदिवासी इलाकों में वहां के लोग अपने आस-पास के प्राकृतिक स्थानीय घटकों की पूजा करते हैं। जैसे, जंगल में रहने वाले लोग अपने जंगल को देवता मानकर पूजा करते हैं। इसी तरह पहाड़ों के लोग पहाड़ो को पूजते हैं।

साभार तथा सन्दर्भ - वेबदुनिया, जी न्यूज, बीबीसी, प्रभात खबर, 



शनिवार, 21 नवंबर 2020

सरंचना चाहिये तो खर्च करिये, बहाने मत बनाइये




हम सब न बड़े कनफ़्यूज़ लोग हैं, वेतन ज्यादा से ज्यादा चाहिये, भत्तों में कमी बर्दाश्त नहीं, सुविधायें ए क्लास चाहिये, हमें स्टेटस की ऐसी लत लगी है की बजट न हो, तब भी कर्ज लेकर, खर्च कम करके बच्चों को महंगे निजी स्कूलों में पढ़ायेंगे मगर सरकारी स्कूलों को सुधारने पर ध्यान नहीं देंगे। अब जरा आपत्तिजनक बात करती हूँ। इनमें से कई गरीब और जरूरतमंदों को धरने देते समय ऐसी सिगरेट पीते देखी है, जिसका एक पैकेट ही 100-150 रुपये का आता होगा, हॉस्टल्स से शराब की बोतलें भी पकड़ी गईं हैं, आउटसाइडर आते हैं, पड़े भी रहते हैं, मैने ऐसे भी विद्यार्थी देखे हैं जो कड़े परिश्रम से पढ़ते और पढ़ाते हैं, नौकरी करते हैं, और अपने सपने पूरे करते हैं। हमें सरंचना चाहिये और 10 रुपये किराये में रहना है। इस देश में गरीब हैं मगर गरीबी बाधा नहीं बनती तभी यहाँ ए पी जे कलाम हुए जिन्होने अखबार बेचकर पढ़ाई की। अगर आप अपनी वेतन वृद्घि के लिए 40 साल इन्तजार नहीं कर सकते तो किसी संस्थान को इस कड़ी प्रतियोगिता और महंगाई के बीच क्यों फीस बढ़ाने के लिए इन्तजार करना चाहिये, क्या ये बेहतर नहीं होगा की विद्यार्थियो के लिए आंशिक कार्य की व्यव्स्था करनी चाहिये, 200-300 या 600 रुपये कोई इतनी बड़ी रकम नहीं है। जितनी सहानूभूति देने में शब्द खर्च किये जाते हैं, उतने शब्द आप इन बच्चों को काम देने में कर सकते हैं और अगर इसकी अवधि में थोड़ा लचीलापन हो तो यह पढ़ाई से बिल्कुल नहीं टकरायेगा। यकीं नहीं है तो माध्यमिक और उच्च माध्यमिक के नतीजे देख लीजिये, उच्च शिक्षा में तो स्थिति बेहतर है और राजनीति बक्श दे तो और बेहतर होगी।

हम अपने युवाओं को खैरात की लत न लगने दें तो ही बेहतर है। हमारी समस्या यह है की हमें अपने संस्थानों को विश्व के शीर्ष संस्थानों में देखना है। हमें नौकरी भी लाखों की चाहिये मगर फीस हम अंग्रेजों के जमाने की ही देंगे। मेरी समझ से यह गलत है। इस देश की बढ़ती आबादी और लाखों शिक्षण संस्थानों को उन्नत कर पाना किसी सरकार के लिए सम्भव नहीं है। खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश, राजस्थान जैसे बड़े राज्यों में तो और कठिन है। दरअसल, शिक्षा विरोधी सरकार नहीं है, हम खुद हैं जो चाहते ही नहीं की कई नियमों में जकड़े सरकारी संस्थान निजी संस्थानों के समकक्ष खड़े हो सकें। किसी के हाथ -पैर बाँधकर उसे रॉकेट उड़ाने के आदेश जैसा ही है यह। सरंचना चाहिये तो खर्च करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिये।
बाकी हिप्प्क्रेसी में तो डॉक्टरेट है ही
जरूरत की सही परिभाषा रखिये।
संस्थान की गरिमा को ताक पर रखने वालों से कोई हमदर्दी नहीं मेरी, सचित्र उदाहरण भरे पड़े हैं
सरंचना चाहिये तो खर्च करिये, बहाने मत बनाइये, सहानूभूति नहीं, बच्चों को आत्मनिर्भर बनाइये परजीवी नहीं
#जे एन यू समेत हर संस्थान के लिए#

 

भारत के पर्व सांस्कृतिक और आर्थिक चेतना का उल्लास हैं....समझिए



पर्व और त्योहार ,,,,हमारी सांस्कृतिक चेतना और आर्थिक प्रगति की आवश्यकता है। इनको निशाना बनाकर अपना उल्लू सीधा करना गलत है मगर हो यही रहा है। पशुओं में भी जीव है, कुत्तों में तो जान बसती है, गाय तो फिर भी काम की नहीं और बकरा भी, इनकी जान की कोई कीमत नहीं है। पशुओं से भी भेदभाव, कुत्ता क्लास बढ़ाता है, गाड़ियों में घूम सकता है, गाय का गोबर गन्दा है और अमेज़न ऑर्गेनिक होकर बिकता है, फिर भी गाय की सेवा करने वाले दकियानूसी हैं। कुत्ता आपसे सेवा करवाता है, आप भी उसका मल उठाते हैं मगर फिर भी आप अभिजात्य हैं, कई दर्जा ऊपर हैं
एक जगह पढ़ा था जानवर कहलाना इन्सान की अपमान लगता है, और शेर कहा जाये तो उछलता है, शेर में जानवर ही न या कोई अलग श्रेणी है। कुछ लोग तो इसलिये नाराज हो जाते हैं की कुत्ता को कुत्ता क्यों कहा, कुतिया को कुतिया क्यों कहा, अब ये न कहें तो क्या कहें। जब बिल्ली को बिल्ली, बैल को बैल कह सकते हैं तो भला कुत्ते को कुत्ता क्यों न कहें? क्या ये अन्य जानवरों से अन्याय नहीं है? कुत्ते को ज्यादा भाव देकर आप उसका तुष्टिकरण कर रहे हैं
वैसे गाय मरने के बाद भी खाल दे जाती है, वह दम्भी और पागल नहीं होती, कुत्ता पागल हो जाये तो काट खाता है, 14 इन्जेक्शन लेने पड़ते हैं और अन्त में खुद को बचाने के लिये आप ही उसे नगर पालिका को देते हैं या खुद गोली मार देते हैं।




पीछे मत पड़िए, हमले का जवाब जवाबी भी होता है, हम अगर बकरीद पर बकरों की जान बचाने लगे, नकली क्रिसमस ट्री के कारण होने वाले नुकसान बताने लगे जिसकी जरूरत है
और हमारे पास तो उत्सव के हजार तरीके हैं, आपके पास तो वो भी नहीं, तो जरा सोचिये, हमने भी इनके खिलाफ अभियान छेड़ा, मामला किया और एक दिन पहले खबर आये की ईद, बकरीद, क्रिसमस पर कोई खुशी नहीं मनायेगा। अरे। हाँ, कोरोना में चर्च या मस्जिद जाने से भी तो कोरोना फैलेगा, क्रिसमस के जश्न से भी तो फैलेगा, हमारे यहाँ नदियों को पूजा जाता है, छठ के बहाने घाट और दिवाली के कारण घर साफ होते हैं। हमारे यहाँ मिट्टी के दिये हैं। आपके क्रिसमस ट्री और हर सामान में प्लास्टिक, चमकीले कागज का उपयोग है,
सयाने बुद्धिजीवियों की बुद्धि सिगरेट और जाम के बगैर खुलती ही नहीं। गुरु और शिष्य, दोनों ही मैत्री भाव से इसका सेवन कहीं भी करते हैं, एबीपी ग्रुप से लेकर तमाम अखबारों में अश्लील तस्वीरें और टी 2 में हुक्के बार वाली तस्वीर छपती है, ये भी बताया जाता है की मिलेगा कहाँ, तो अब हम सब भी पीछे पड़ेंगे
प्रोपेगेंडा का जवाब भी उसी तरीके से दिया जायेगा। हम भी अपील करवाएंगे की लोग ईद और क्रिसमस न मनाएं, चर्च और मस्जिद न जाएं।बाजार में न जाएं। सिगरेट पीने वालों के खिलाफ भी हम अब खड़े होंगे, अब आप देखते रहिये।आपकी रैलियों पर रोक लगवाएंगे

रविवार, 25 अक्तूबर 2020

बॉलीवुड को धकेल कर एक दूसरे के घाव हरे होने से बचाइए...बस यही सौहार्द है

क्या यह जरूरी था...एकता दिखाने का क्या यह एकमात्र रास्ता है जबकि हम मानसिक तौर पर तैयार ही नहीं है


जब मुझसे कोई बुरे लहजे से बात करता है..या किसी के साथ कड़वे अनुभव हों...तो मैं नजरअन्दाज कर भी दूँ तो उसे माफ नहीं कर पाती...यह आपके साथ भी होता होगा...परिवार बँट जाते हैं तो उनको अलग होना पड़ता है...वह दूर हो जाते हैं....मगर दूर होकर भी पास रहते हैं। अगर दूर नहीं भी होते तो एक सीमा बन ही जाती है....अपने - अपने दायरे में अपनी - अपनी दुनिया में हम जी रहे होते हैं....अब सवाल है कि आज यह किस्सा छिड़ा ही क्यों....सवाल तो मतभेद और असहमतियों के बीच साथ रहने का है...। बस यही वजह है...अब इस निजी घटना को देश और धर्म के चश्मे से दूर रखकर देखिए...।

गंगा - जमुनी तहजीब की बात की जाती है...रोटी - बेटी के रिश्ते की बात की जाती है...(बेटे की बात क्यों नहीं होती...ये तो अब भी नहीं पता है)...और यह सब कहते हुए यह बात भुला दी जाती है कि गंगा का भी अपना अस्तित्व है और जमुना यानी यमुना का भी....तो ये दोनों नदियाँ अपना अस्तित्व खोकर एक दूसरे में मिल जाएं,..क्या यह इतना जरूरी है औऱ सबसे बड़ी बात कि क्या हम मानसिक रूप से तैयार हैं...हमारा इतिहास उठाकर देखिए...हम मानते हैं कि पूर्वजों की गलतियों के लिए (फिर चाहे वह कहीं से भी हो, कोई भी हो) आज की पीढ़ी को दोष नहीं दिया जा सकता...देना भी नहीं चाहिए....मगर अतीतजीवी भारतीय...क्या अपना वह इतिहास भूल सकते हैं....हकीकत यह है कि नहीं भूल सकते...जमीनी धरातल पर जाकर देखिए....दोस्तियाँ गहरी निभी हैं...पीढ़ियों तक चली हैं मगर शादी का मामला....दूसरा है।


समाज..संस्कृति...खान - पान.....जब शादी की बात आती है तो ये साथ आ जाते हैं...आज भी अन्तरजातीय विवाह पूरी तरह स्वीकार नहीं किये जा रहे....200 साल तक राज करने वाले अंग्रेजों को हम भूले नहीं हैं और आप सोच रहे हैं कि क्रूरता से भरा इतिहास भूल जाया जाए...यह सम्भव नहीं है...मगर यह सम्भव है कि इतिहास की कड़वाहट से आगे बढ़ने की कोशिश की जाए...एक दूसरे से अलग रहकर भी सम्मान दिया जाए...यह ख्याल रखा जाए कि एक की वजह से दूसरे के घाव हरे न हों...।

आप आज तक मुगलों से इस बात को लेकर नाराज हैं कि उन सबने आपके मंदिर तोड़ दिए...वह गलत थे...मगर जब मंदिर तोड़ना गलत है तो मस्जिद या कोई भी धर्मस्थल तोड़ना महिमामंडित कैसे किया जा सकता है? ठीक इसी तरह....संन्यासियों की हत्या, मंदिरों को तोड़ना...ये सब सही कैसे है...एक मस्जिद टूटने का दर्द आप भूल नहीं पा रहे हैं और आप उम्मीद कर रहे हैं कि जिस देश के पुस्तकालय, मंदिर...खजाने....सब ध्वस्त कर दिये गये...वह साथ घुल - मिलकर रहें...आप उनकी जगह रहकर देखिए...क्या यह सही है...क्या ये हो सकता है...? बँटवारे के घाव, 1984 के घाव...न जाने कितने घाव हैं औऱ जब इन जख्मों को भूलने की कोशिश की जाती है...आप उनमें पिन चुभो देते हैं...

खुद को गंगा का बेटा कहने वाले राही मासूम रजा से ज्यादा प्यार कोई इस देश को करेगा...वह जिन्होंने महाभारत के संवाद लिखे...वह क्या कम भारतीय हैं.. तो फिर आप उनसे भारतीयता का सबूत क्यों माँगते हैं...जो रह नहीं सकते...आप उनको देखना तक नहीं चाहते मगर जो रहना चाहते हैं...उनके साथ आप क्या कर रहे हैं...आप औरंगजेब की क्रूरता याद रखते हैं तो दारा शिकोह को क्यों भूल जाते हैं....जिसने आपके धर्म को समझने की कोशिश की और धर्म है क्या...मानवीय आचरण को धारण करना ही तो धर्म है....क्या आप रहीम और रसखान को इसलिए भूल जाएंगे कि वह आपके धर्म के नहीं हैं...मेरा सीधा सवाल यह है कि गंगा को गंगा की तरह और यमुना को यमुना की तरह स्वीकार कर के अपनी राह पर चलना क्या इतना मुश्किल है...बीमारी का इलाज करना हो तो पहले स्वीकार करना पड़ता है कि हम बीमार हैं...और तब होता है बीमारी का उपचार...अभी आप मानिए कि मानसिक तौर पर आप गंगा और यमुना को मिलाने के लिए तैयार नहीं हैं।

इस घाव में एकतरफा खंजर घोपा है बॉलीवुड ने....जान - बूझकर हिन्दुओं को अपमानित करना, उनका गलत चरित्र - चित्रण करना, तस्करों...अपराधियों का महिमा मंडन करना...ये सब बॉलीवुड की ही देन हैं....आप लगातार किसी एक धर्म या मजहब को टारगेट करेंगे तो विरोध तो होगा...हिन्दू हैं तो मुसलमानों को गलत दिखाएंगे...मुसलमान हैं तो हिन्दुओं को गाली देंगे और ये काम अब हिन्दू निर्देशक भी करते हैं। पारम्परिक चिह्न, धर्म, पूजा....देवी - देवता...क्या इन सब का मजाक उड़ाए बगैर आप कहानी नहीं बुन सकते...गलत को गलत कहिए मगर हर तरह के गलत को गलत कहिए...किसी एक को टारगेट करना बदनीयती के अलावा कुछ नहीं...।

क्या साथ रहने के लिये रिश्ता जोड़ना जरूरी है, क्या मित्रता और सौहार्द के धागे इतने कमजोर हैं की आपको इनको विवाह का आवरण देना ही होगा। क्या हम अलग रहकर, एक दूसरे को सम्मान देकर, दूर रहकर, शान्ति से नहीं रह सकते?अगर स्नेह है, प्रेम है, सम्वेन्दनशीलता है, किसी आवरण की जरूरत नहीं है, प्रेम करने के लिये और भाईचारे के लिये खुद अपने अस्तित्व को खत्म कर देना समाधान नहीं है। 

आप ये मानिये की सदियों बाद भी हम मानसिक रूप से तैयार नहीं हैं और इतिहास देखेंगे तो इसका कारण भी दिखता है, हर धर्म, अपने अनुसार रहे, किसी को किसी के लिये ढलने की जरूरत नहीं, बस अलग भी हैं तो एक दूसरे को सम्मान दीजिये, प्रेम बना रहेगा।

घरों में देखिये, आप यही करते आ रहे हैं तो इस मामले में क्या परेशानी है? दूर रहकर प्यार बढ़ता ही है, आप एक दूसरे का महत्व समझते हैं, उनकी इज्जत करते हैं। 

अगर विज्ञापन में जो वधू है, वो हिन्दू ही रहती, और यह मुस्लिम परिवार उसे बेटी मानकर आशीर्वाद देने उसके घर जाता तो क्या प्रेम कम हो जाता? क्या किसी को प्रेम करने के लिये बहू या दामाद बनाना इतना अधिक जरूरी है, क्या ये मानसिक जड़ता नहीं है?

कुछ बातों को स्वीकार कर लेना बेहतर होता है, हर बार घाव कुरेदने की जरूरत क्या है, आप जबरन अपना सेकुलरवाद मत लादिये उन पर। 

समय आ गया है मित्रता के एंगल को ज्यादा प्रोत्साहित किया जाये, उसे उदारता से स्वीकार किया जाये। हमारी आधी समस्या का समाधान यहीं जो जायेगा।

मेरी भी दोस्त है, और वो जैसी है, मुझे उसी रूप में प्रिय है, उस पर मुझे पूरा भरोसा है और मुझे उसमें कुछ भी नहीं बदलना है। हमने एक दूसरे को कभी बदलने की कोशिश नहीं की, करेंगे भी नहीं,  और मुझे उस पर गर्व है। फ़ील्ड पर भी बहुत से ऐसे साथी हैं। वो जो हैं, जैसे हैं, वैसे स्वीकार करिये। प्रेम का मतलब दोस्ती भी है और दोस्ती से गहरा कुछ नहीं है।

जरूरत है कि आम हिन्दू और मुस्लिम इस षडयन्त्र को समझें...और एक दूसरे के लिए आवाज उठाएं...हिन्दू को मुसलमानों के लिए और मुसलमानों को हिन्दुओं के लिए खड़ा होना होगा...अपने - अपने धर्म के कट्टरपंथियों पर लगाम कसनी होगी..तभी आप शांति से बढ़ सकेंगे...मानसिक रूप से तैयार होंगे और जिस एकत्व की बात की जा रही है...उसे अपनी मर्जी से आप खुद अपना सकेंगे। कोई भी फिल्मकार हमें नहीं सिखा सकता कि हमें अपने देश में कैसे रहना है। तनिष्क के जिस विज्ञापन पर विरोध हुआ...उसे गौर से देखिए तो पता चलेगा कि एक छवि निर्मित करने की कोशिश हुई है....एक को ऊपर और एक को नीचे करने की साफ कोशिश है...विरोध इस पर है और जायज है...अगर विज्ञापन में धर्म उल्टा भी होता...तब भी इसका इतना ही विरोध होता और होना चाहिए।

सच तो यह है कि हिन्दू - मुस्लिम बगैर आपकी थोपी गयी गंगा - जमुनी तहजीब के भी एक दूसरे को स्वीकार करते हुए बहुत खुशहाली से एक दूसरे के साथ रह सकते हैं, रहते आ रहे हैं...उनको आपकी नसीहत की जरूरत नहीं है...तो जस्ट अंडरस्टैंड बॉलीवुड एंड ग्लैमर वर्ल्ड बिहेव योरसेल्फ। अपना प्रोपेगेंडा अपने जेब में रखो, दफा हो जाओ और हमें शांति से रहने दो....


शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

हिन्दी और सिनेमा : किसी काम की नहीं...हट जाने दें ये दूरियाँ



साहित्य औऱ अभिव्यक्ति के अन्य कई क्षेत्रों का एक बेहद अनूठा सम्बन्ध रहा है। खासकर हिन्दी साहित्य का सम्बन्ध पत्रकारिता से तो बहुत ही गहरा है। कहने की जरूरत नहीं है कि हिन्दी पत्रकारिता का आरम्भिक काल साहित्य को साथ लेकर चला है। भारतेन्दु जितने सफल लेखक हैं, उतने ही अच्छे पत्रकार भी हैं। उन्होंने 'बाल विबोधिनी' पत्रिका, 'हरिश्चंद्र पत्रिका' और 'कविवचन सुधा' पत्रिकाओं का संपादन किया। इस कड़ी में बाल मुकुन्द गुप्त, उपेन्द्र नाथ 'अश्क' अज्ञेय समेत अनगिनत साहित्यकारों का नाम आता है।
कहने की जरूरत नहीं है कि हिन्दी साहित्य जब तक पत्रकारिता के साथ रहा, तब तक दोनों का ही स्वर्णिम काल रहा मगर हिन्दी की समस्या यह है कि इसे शुद्धतावादियों ने ऐसी अभिजात्यता से लाद दिया है कि हिन्दी का हाथ धीरे - धीरे सबसे छूटता गया। हिन्दी के बौद्धिक दिग्गजों ने इसकी सरलता को अपने अहंकार से काट डाला और हालत यह है कि असुरक्षा के बोध से लदे हिन्दी के साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी और बुद्धिजीवियों के अहंकार ने हिन्दी को उपेक्षित और अकेला कर दिया है। 
पत्रकारिता जैसी ही स्थिति हिन्दी सिनेमा और साहित्य की है मगर दिक्कत यह है कि पत्रकारिता के मसले पर गर्व के साथ हिन्दी साहित्य को जोड़ लिया जाता है मगर बात सिनेमा की हो तो उसे 'सस्ता' और 'बाजारू' जैसे विशेषण दिये जाते हैं और इस चक्कर में सिनेमा जैसे शानदार क्राफ्ट का तिरस्कार किया जाता है, किया जाता रहा है जबकि सिनेमा एक श्रमसाध्य और सामूहिक कार्य है। सिनेमा ने हमेशा से साहित्य का दामन थामा है मगर हिन्दी वालों की अभिजात्यता ने उसका हाथ झटका है।
अब जरा कड़वी बात की जाए..तो हिन्दी को सिनेमा का ग्लैमर पसन्द है, उसके जरिए प्रचार भी पसन्द है मगर उसे अपनाना पसन्द नहीं है जबकि सिनेमा ने अक्सर हिन्दी साहित्य की श्रेष्ठ कृतियों को अपनाया है। समझने की जरूरत है कि हर क्राफ्ट का अपना एक गणित है...अपनी जरूरतें हैं और वह एक उद्योग है....साहित्य या पटकथा उसका आधार अवश्य है मगर उसके बाद एक लम्बी प्रक्रिया है..जिसे साहित्य समझ नहीं पाता या समझना नहीं चाहता। लेखक का काम एक किताब के प्रकाशन के बाद पूरा हो जाता है और प्रचार के नाम कुछ संगोष्ठियाँ मगर सिनेमा का काम इतने भर से नहीं चलता...। उद्योग तो साहित्य भी है मगर वे स्वीकार नहीं करना चाहते क्योंकि प्रचार का काम तो सम्बन्धों और मंचों से चल ही जाता है...। इस बात का दुःख है कि किताबें बिकती नहीं हैं मगर किताब के प्रचार पर धेला खर्च करने की जरूरत नहीं समझी जाती और इसके लिए प्रकाशक को भी दोष देकर लाभ नहीं है क्योंकि लेखक का काम अधिकतर मामलों में पांडुलिपि सौंपने औऱ इसके बाद रॉयल्टी की आस में दिन गिनना रह जाता है। अपने करीबियों और उच्च अधिकारियों, संस्थाओं और संगठनों तक पुस्तक पहुँचाने से हो जाता है...और न भी हो तो किताबों को आम जनता तक ले जाने के अन्य सृजनशील प्रयोग करने की जहमत वे  नहीं उठाते।
आपकी किताबों को सामने लाने का काम सिनेमा करता है..सिनेमा ने हमेशा से साहित्य को अपनाया है। कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि किसी फिल्म और धारावाहिक के बाद ही किसी किताब की माँग अचानक बढ़ गयी मगर हिन्दी का परिष्कृत साहित्यिक वर्ग सिनेमा को ऐसी हेय दृष्टि से देखता है कि उसे कलाकार नचनिया  लगते हैं, गीत फूहड़, सस्ते और बाजारू लगते हैं मगर ऐसा क्यों हुआ...यह उनके विचार में नहीं आता। मेरा सीधा सवाल यह है कि क्या आज साहित्य का सिनेमा से सीधा रिश्ता होता और आज सिनेमा में इतनी गन्दगी होती जितनी आज दिख रही है...? साहित्य सबसे अधिक सम्वेदनशील, बड़ा औऱ पुराना है, आधार है इसलिए उसकी जिम्मेदारी सबसे अधिक है। आप तालाब को गन्दा कहकर उसे साफ करने की जिम्मेदारी से नहीं बच सकते मगर अफसोस की बात यह है आज साहित्य सिनेमा में हस्तक्षेप तो नहीं करता बल्कि उसे ताने जरूर मारता है। 
मजेदार बात यह है कि सिनेमा के गीतकारों को तुच्छ ठहराने और उनको साहित्य से अलग मान लेने पर भी साहित्यकार को यह कहने में गर्व ही होता है कि फलाने - फलाने निर्माता, फलानी किताब पर फलानी फिल्म बना रहे हैं...अब ये अजीब सा कॉम्प्लेक्स है...आप कमतर समझते हैं और उस दुनिया में अंश मात्र भी जुड़ जाने पर आपको बहुत अच्छा लगता है।
साहित्य और सिनेमा का रिश्ता गहरा ही नहीं बल्कि बहुत गहरा रहा है। इस बाबत हमें सिनेमा के इतिहास को समझना होगा। सिनेमा और साहित्य दो पृथक विधाएँ हैं लेकिन दोनों का पारस्परिक संबंध बहुत गहरा है। जब कहानी पर आधारित फिल्में बनने की शुरुआत हुई तो इनका आधार साहित्य ही बना। भारत में बनने वाली पहली फीचर फिल्म दादा साहब फाल्के ने बनाई जो भारतेंदु हरिशचंद्र के नाटक 'हरिशचंद्र' पर आधारित थी। गौर कीजिए कि पत्रकारिता के क्षेत्र में भी भारतेतन्दु पूरा युग हैं। जिस प्रकार हिन्दी साहित्य में फंतासी उपन्यासों का दौर रहा, वैसे ही बोलती फिल्मों का शुरुआती दौर पारसी थिएटर की विरासत भर था जहाँ अति नाटकीयता और गीत संगीत बहुत होता था। 
अब बात मुंशी जी की करते हैं। हिंदी साहित्य के सर्वाधिक महत्वपूर्ण और लोकप्रिय कथाकार मुंशी प्रेमचंद ने यह सोचकर सिनेमा जगत में प्रवेश किया था कि वहां से होनेवाली आमदनी से उनकी आर्थिक दुश्वारियां खत्म हो जाएंगी, किंतु फिल्म लेखन में जिस प्रकार की पाबंदियां और निर्माताओं का दबाव होता है उसे उनका सजग और सरोकारी लेखकीय व्यक्तित्व स्वीकार नहीं कर सका. 1934 में वे फिल्में बनाने वाली कंपनी अजंता सिने टोन में बतौर लेखक 8 हजार रूपए सालाना वेतन पर नियुक्त हुए थे. उनकी लिखी पहली फिल्म मजदूर थी, जो की मिल मजदूरों की जिंदगी पर आधारित थी. लेकिन इसे सेंसर बोर्ड ने पास नहीं किया. करीब 11 महीने बाद इसी कहानी पर गरीब मजदूर नाम से फिल्म बनी, जिसमें यूनियन लीडर की भूमिका खुद प्रेमचंद ने निभाई थी. यह फिल्म काफी सफल रही. इसके बाद उन्होंने नवजीवन फिल्म की कहानी लिखी। सेवासदन में कहानी को तोड़ने - मोड़ने का पेश करने पर उनको दुःख हुआ और सिनेमा को उन्होंने अलविदा कह दिया। यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि सिनेमा का प्रेमचन्द से मोह भंग नहीं होता है।  वे ऐसे चंद साहित्याकारों में से थे, जिनकी कृतियों पर सर्वाधिक फिल्में बनीं. उनके निधन के दो साल बाद के. सुब्रमण्यम ने  1938 में सेवासदन उपन्यास पर फ़िल्म बनाई जिसमें सुब्बालक्ष्मी ने मुख्य भूमिका निभाई थी. 1941 में उनके उपन्यास रंगभूमि पर इसी नाम से फिल्म बनी. इसके अलावा गोदान पर 1963 और गबन पर 1966 में फिल्में बनीं. उपन्यासों के अलावा प्रेमचंद की कई कहानियों पर भी फ़िल्में भी बनी हैं.  1941 में उनकी उर्दू कहानी औरत की फितरत पर स्वामी नाम की फिल्म बनी। 1953 में आई बिमल रॉय की दो बीघा जमीन की भी कहानी प्रेमचंद की ही थी. बलराज साहनी और निरूपा राय अभिनित हीरा और मोती भी प्रेमचंद की एक कहानी दो बैल पर आधारित थी. 70 के दशक में सत्यजीत रे ने प्रेमचंद की कहानी शतरंज के खिलाड़ी पर इसी नाम से फिल्म बनाई. सत्यजीत रे ने प्रेमचंद की एक और कहानी सद्गति पर भी 1981 में इसी नाम से फिल्म बनाई थी….  1977 में मृणाल सेन ने उनकी कहानी  कफ़न पर आधारित ओका ऊरी कथा नाम से तेलुगु में फ़िल्म बनाई जिसको सर्वश्रेष्ठ तेलुगु फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला. प्रेमचंद के मशहूर उपन्यास 80 के दशक में उनके उपन्यास निर्मला पर टीवी धारावाहिक का भी निर्माण हुआ जो काफी लोकप्रिय हुआ. नई सदी में गुलजार ने भी प्रेमचंद की कहानियों पर दूरदर्शन के लिए धारावाहिक बनाए। जाहिर है कि दूरी साहित्य ने ही बनायी...
ठीक है कि साहित्य समझौता नहीं कर सकता मगर क्या साहित्य सिनेमा में अपनी जगह नहीं बना सकता? हम गीतकारों और पटकथा लेखकों को साहित्यकार क्यों नहीं मान सकते...किसी कोलाज या नाटक में किसी फिल्म का कोई बढ़िया गीत क्यों नहीं आ सकता। रही बात सस्तेपन की तो जरा रीतिकाल उठाकर देख लीजिए...उपन्यासों में भी रति वर्णन ऐसा मिलता है कि हिन्दी फिल्में भी शरमा जाएँ और आप कहते हैं कि अलग हैं हम...विद्यापति के कई पद ऐसे भी थे जिनको भरी कक्षा में पढ़ाने में शिक्षकों को भी शर्म आ जाती है। फिल्मी गीतों में अपशब्द बर्दाश्त नहीं हैं मगर धूमिल की कविता में वह क्लासिक बन जाता है। किसी फिल्म में गालियाँ हों तो बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा और काशी का अस्सी में गालियाँ हों तो....अरे, वह तो प्रामाणिकता को बढ़ाता है...और बच्चों के लिए...उनके हिस्से में तो आपने कुछ रखा ही नहीं। तो बात सिनेमा की हो रही है। 
अच्छा साहित्य को लेकर जो फिल्में बनतीं हैं या बनीं हैं, आपने उसके प्रचार के लिए कुछ किया...नहीं किया क्योंकि किया होता तो अच्छी साहित्यिक फिल्में पिटतीं नहीं। आखिर फिल्मकारों को क्यों हार मान लेनी पड़ती है? सीधा कारण है कि साहित्यकारों ने कोई रुचि ही नहीं दिखायी और न ही फिल्मकार की विवशता को समझा है। 
   'तीसरी कसम' को भले ही श्रेष्ठ फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। लेकिन, ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह असफल हुई थी, जिसके कर्ज के बोझ तले निर्माता शैलेंद्र की तनाव में मौत हो गई! कई प्रशंसित कहानियाँ लिख चुके कहानीकार राजेंद्र सिंह बेदी की किताब 'एक चादर मैली सी' पर भी जब फिल्म बनी तो उसे दर्शकों ने नकार दिया। चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी 'उसने कहा था' पर बनी फिल्म भी नहीं चली! वहीं चित्रलेखा आज भी क्लासिक फिल्म मानी जाती है। जब भी फिल्म औऱ साहित्य के बीच समझ बनी है. उसके परिणाम हमेशा अच्छे रहे हैं। ! बासु चटर्जी बांग्ला भाषी थे लेकिन उन्होंने राजेंद्र यादव के उपन्यास 'सारा आकाश' पर फिल्म बनाई जो नहीं चली! लेकिन, मन्नू भंडारी की कहानी 'यही सच' पर 'रजनीगंधा' बनाई तो वह सफल हुई। हिंदी साहित्यकारों का फिल्मों में असर 70 के दशक में ही ज्यादा नजर आया। इस दौर को लाने का श्रेय कथाकार कमलेश्वर को दिया जाना चाहिए। उपेंद्रनाथ अश्क और अमृतलाल नागर के बाद कमलेश्वर ही वह साहित्यकार थे, जिन्होंने सिनेमा की भाषा और दर्शकों की मानसिकता को समझा। बड़े टेलीविजन सीरियल के बाद वे फिल्मों में भी लंबे समय तक टिके रहे। गुलजार ने कमलेश्वर की कथा पर जब 'आंधी' और 'मौसम' बनाई तो देखने वालों का ट्रेंड ही बदल गया। इसके लिए गुलजार भी जिन्हें श्रेय दिया जा सकता है। उन्होंने कहानी की संवेदना को गहराई से समझा और दोनों फिल्मों की पटकथा, संवाद और गीत खुद ही लिखे। । हिंदी साहित्यकारों का फिल्मों में असर 70 के दशक में ही ज्यादा नजर आया। इस दौर को लाने का श्रेय कथाकार कमलेश्वर को दिया जाना चाहिए। उपेंद्रनाथ अश्क और अमृतलाल नागर के बाद कमलेश्वर ही वह साहित्यकार थे, जिन्होंने सिनेमा की भाषा और दर्शकों की मानसिकता को समझा। बड़े टेलीविजन सीरियल के बाद वे फिल्मों में भी लंबे समय तक टिके रहे। 


 प्रेमचन्द की कहानी पर सत्यजीत राय ने शतरंज की खिलाड़ी बनायी थी औऱ वह आज भी बेहतरीन और सफल फिल्म के रूप में याद की जाती है। गिरीश कर्नाड एक अच्छे अभिनेता व निर्देशक रहे और कन्नड़ में बतौर साहित्यकार भी उनको पूरा सम्मान मिला मगर हिन्दी वालों ने सिनेमा से जुड़े साहित्यकारों को कभी नहीं अपनाया। कुछ साल पहले अमृता प्रीतम के उपन्यास पिंजर पर फिल्म बनी थी, इसके बाद हाल ही में पंचलैट आई और अच्छी बात यह रही है कि इसे साहित्य जगत ने अपनाया..मगर इसमें तेजी लाने की जरूरत है। 
वरिष्ठ पत्रकार जयराम शुक्ल लिखते हैं 'सिनेमा जितना उदार रहा साहित्य उतना ही आत्मकेंद्रित। सिनेमा ने सबके लिए बाँहें फैलाकर रखीं जबकि साहित्य ने महबूब,के.आसिफ,कमाल अमरोही और यहां तक कि गुरुदत्त जैसे महान फिल्मकारों की ऐसी इज्ज़त नहीं बख्सी जैसा कि सिनेमा ने खुद को दाँव पर लगाकर साहित्यकारों को सिर माथे पर लिया। चौकसे जी सिनेमा और साहित्य के गठबंधन हैं।उनका व्याख्यान सिनेमा को न सिर्फ साहित्यिक अपितु आध्यात्मिक और दार्शनिक नजरिए से समझने का नजरिया देता है।' 
अगर किसी प्रस्तुति को किसी गीत से मजबूती मिलती है तो उसका स्वागत होना ही चाहिए...आप जिस दुनिया को कोसते हैं, उसकी तमाम विशेषताएँ समाहित हैं...साहित्य से प्रेम करने वालों की रिंगटोन पर 'मुन्नी बदनाम हुई' जैसे गीत मिलते हैं। हमारा मानना है कि हिन्दी अगर सही मायनों में आम आदमी तक जाना चाहती है तो उसे आम आदमी की पसन्द, उसके चयन को समझना होगा, उस विधा को अपनाना होगा, अन्य माध्यमों को आत्मसात करना होगा। खुले हृदय से हर क्षेत्र को सम्मान देकर उसे दूसरे माध्यमों को अपनाना चाहिए, तभी हिन्दी का अधिकार होगा कि वह अन्य विधाओं से कुछ कह सके, सिनेमा से भी।
इनपुट - बात - बेबात,  हिन्दी समय में इकबाल रिजवी का आलेख व इंटरनेट पर अन्य सामग्री

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सोमवार, 15 जून 2020

काश...सुशांत आप अपने बेस्ट फ्रेंड होते...



सुशांत सिंह राजपूत अब हमारे बीच नहीं हैं। वह सुशांत जो न जाने कितने युवाओं का आदर्श रहे और वह एक सफल जीवन जी रहे थे। आज यह कहा जा रहा है कि अवसाद ने उनकी जान ले ली। सुख की परिभाषा को लेकर नये मुहावरों से पूरा सोशल मीडिया पट गया है। यह सही है कि अवसाद की जड़ कहीं न कहीं अकेलेपन से उपजे विषाद में है मगर क्या सच इतना सा है....नहीं, सच इतना सा नहीं है। झाँकने की जरूरत है कि जिस समय आप सोशल मीडिया पर ज्ञान दे रहे हैं, आपके आस - पास और आपके अपने बच्चों को आपने कहाँ तक समझा है..समझा है या नहीं..। क्या आप उसकी जिद और जरूरतों का फर्क समझ रहे हैं?
मुझे यह सवाल करने का बड़ा मन है कि जो लोग कह रहे हैं कि अभिभावकों से बात की जाये...क्या उन अभिभावकों ने संवाद के लिए माहौल बनाया है? बच्चे आपसे डरते हैं और वह डर प्रेम नहीं है...और उनका यह डर आपको अच्छा भी लगता है। क्या आप अपने बच्चों की असहमति को सुनने और समझने का दम रखते हैं? क्या अपने बच्चों में आपने इतना साहस भरा है कि वह आपके सामने वह सब कुछ कह सकें जो आपको पसन्द नहीं हो? सबसे बड़ा प्रश्न तो यह है कि क्या भारतीय समाज में बच्चों के जन्म के पीछे का कारण सिर्फ प्रेम ही होता भी है? क्या यह सच नहीं है कि बच्चे के जन्म का कारण सामाजिक दबाव भी है...फलाना 2 बच्चों की माँ बन गयी...फलाना के बच्चे स्कूल जाने लगे...और यहाँ बंजर जमीन है...ये सब वाक्य कौन कहता है?
सच तो यह है कि हमारे यहाँ बच्चों का जन्म दम्पति की इच्छा से अधिक इसलिए होता है कि शादी को इतने साल हो गये...बच्चा नहीं हुआ...पड़ोस में बातें होने लगी हैं....समाज क्या कहेगा...वंश कैसे चलेगा...इतनी लड़कियाँ हो गयीं, अब तो कुल का एक चिराग चाहिए..........मुझे दादा - दादी, पिता, फलाना - ढिमकाना बनना है....ऐसे तानों से तंग आकर अगर कोई लड़की माँ या दम्पति अभिभावक बनते हैं तो आपको लगता है कि वह इस अनचाही सन्तान को प्रेम दे सकेंगे...जबकि वे तैयार ही नहीं हैं? आपको कोई फर्क नहीं पड़ता कि बहू या बेटी की नौकरी छूटेगी..बेटे को गृहस्थी बसानी अब तक नहीं आई...वह तैयार भी नहीं हैं...माता - पिता बनने के लिए मगर 'वह आपको खुश करने के लिए अपनी इच्छाओं की बलि चढ़ा देते हैं और आप इस जीत का बाकायदा जश्न मनाते हैं और वह बच्चा आपकी ट्रॉफी बन जाता है...खुद से पूछिए क्या यह आपका अधिकार है...।
अच्छा हमारे घर में बच्चे. कभी बच्चों की तरह जी सके हैं...बेचारे ने आँखें खोली ही नहीं कि आप उसे डॉक्टर व इंजीनियर बनाने के सपने देखने लगते हैं। उसे चित्रकार बनना है और आप उसे क्रिकेटर बनायेंगे। शर्मा जी का बेटा स्कूल में टॉप कर रहा है तो बच्चों को 10 ट्यूशन पढ़ाएँगे....बगैर यह समझे कि उस पर कितना भार पड़ रहा है....औऱ उस पर से ताने भी....इतना कुछ तो कर रहा हूँ...शहर के सबसे महँगे स्कूल में पढ़ाया...महँगे से महँगा खिलौना दिया.....और क्या चाहिए? क्या बच्चे ने कभी माँगा था यह सब कुछ? आप उसके लिए नहीं, अपनी जिद के लिए मेहनत कर रहे हैं और फल उसकी जिन्दगी को दाँव पर लगाकर पाना चाहते हैं...क्या यही प्यार है? लड़की हुई औऱ साँवली हुई तो उसे हमेशा दबी हुई रंगत की याद दिलवाने वाले भी आप ही हैं।
माफ कीजिएगा....मैं नहीं मानती कि माँ - बाप का प्यार निःस्वार्थ होता है...बिल्कुल नहीं होता...और सारे बच्चे उनके लिए बराबर भी नहीं होते। वे अपने मेधावी, प्रतिभाशाली और सुन्दर बच्चों पर अधिक ध्यान भी देते हैं और उनके कारण दूसरे बच्चों को दबाते भी हैं। सच तो यह है कि जो बच्चा उनकी आँकाक्षाओं पर खरा उतरता है, जो उनका बुढ़ापा सुरक्षित रख सकता है...वह उसी के पीछे भागते हैं, उसी के हितों की रक्षा करते हैं और उसी के लिए दूसरे हर बच्चे को दबाते हैं...आप इसे प्यार कहते होंगे...मैं नहीं मान सकती। दशरथ के चार बच्चे थे...वन में सीता - लक्ष्मण भी गये तो फिर वे राम का नाम लेकर क्यों मरे? बुढ़ापे को सुरक्षित रखने के लिए खुद माएँ बेटियों को जहर दे सकती हैं...बहुओं के साथ अन्याय कर सकती हैं...अधिकतर तब जब बेटा बड़ा हो..क्योंकि घर का मालिक वही होता है...और यही प्रश्रय पाकर उसमें वर्चस्व की भावना पनपती है...वह अपने भाई - बहनों को मनुष्य नहीं बल्कि अपना आश्रित और बहुत हद तक सम्पत्ति समझता है...आर्थिक क्षमता के कारण वह उनके जीवन और सपनों को मार देना अपना अधिकार समझता है...और इसकी जड़ माँ के उसी प्रेम में है..वरना इतनी हिम्मत युधिष्ठिर में कहाँ से आ गयी कि उसने अपने भाइयों और पत्नी तक को दाँव पर लगा दिया? अगर ऐसा न होता तो जिस बेटे ने उसके तमाम बेटों और बहू को दाँव पर लगा दिया, कुन्ती उस युधिष्ठिर के हाथ काट देती। हस्तिनापुर की पुत्रवधू के चीरहरण का प्रयास करने वाले दुर्योधन को गाँधारी उसी समय श्राप देती...विकर्ण का साथ देती मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ तो इसका कारण यही था कि दोनों को पता था कि सम्राट दोनों में से कोई एक बनेगा और उनकी वृद्धावस्था उनके साथ ही सुरक्षित रहेगी। महात्मा गाँधी होंगे बहुत महान, पर वह एक अच्छे पिता नहीं थे..बच्चों के साथ तो हमेशा कस्तूरबा ही रहीं। मैं कैसे मान लूँ कि माता - पिता के लिए हर बच्चा बराबर है जबकि यही माँ बेटी के हिस्से का घी बेटों को देती है..उसे सबके बाद खाने की नसीहत देती है...उसे बड़े बच्चों का ध्यान रहता है और उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके छोटे बच्चे अपने भाई - बहनों की सम्पत्ति बन गये हैं और पारिवारिक जिम्मेदारियों के नाम पर शोषण के शिकार हैं...। भतीजों को स्कूल छोड़ने से लेकर घर के काम तक उसके जिम्मे हैं और अगर उसने शादी नहीं की तब तो वह पूरे घर का गुलाम है...जब वह झुँझलाता है...नाराज होता है तो सबको गलती उसकी ही दिखती है मगर अपने भीतर झाँकने की हिम्मत नहीं है। क्या जिसकी शादी नहीं होती, उसका अपना कोई सुख या निजी जीवन नहीं होता...और खासकर वह लड़की हो...तब तो उसे अक्सर याद दिलाया जाता है कि...वह इस घर पर बोझ है और शादी होती तो इतने बच्चों की माँ होती। शादी करना या न करना, किसी का निजी अधिकार है...निजी चयन है...आखिर इसे तय करने वाला आपका समाज कौन होता है? मेरी बहुत से युवाओं से बात होती है और सब के सब अपने माता - पिता का बहुत आदर सम्मान करने वाले मिले...यहाँ तक कि उनके सुख के लिए उन सबने अपनी इच्छाओं का गला तक घोंटा  मगर आज तक मुझे एक भी अभिभावक ऐसा नहीं मिला जिसने यह कहा हो कि उसके लिए उसका बच्चा किसी भी बिरादरी या समाज से बड़ा है और वह उनकी इच्छा का सम्मान करते हैं? आपकी नजर में यह ममता हो सकती है, माफ कीजिए मेरी नजर में नहीं है।
जो बच्चा जितने बड़े पद पर है...वह उतना ही दुलारा है...क्योंकि उनके पैसों से सबकी जिन्दगी चलती है मगर कभी भी उसने न तो अपना बोझ बाँटा और न अपने दुःख बाँटे...और आप समझते रहिए कि आप गंगा तर गये। जब बेटियों को उनके ससुराल में कष्ट होता है तो उनको समाज की याद दिलाकर  एडजस्ट करके सह जाने की सीख देने वाले यही माता - पिता होते हैं...। दहेज हत्या हुई तो मामले को रफा - दफा करवाने में खुद लड़की के माता - पिता शामिल रहते हैं क्योंकि उनको बदनामी का डर रहता है। अशोक तोदी...प्रियंका के कौन हैं...ये बताने की जरूरत नहीं है। महानता का ये जो आवरण आपने लगा रखा है....अब उसे खोल दीजिए....घिनौना लगता है ये सब।
जो बेटी जितने बड़े और समृद्ध घर में ब्याही गयी है...उसका आदर -सत्कार उतना ही अधिक होता है....यह पक्षपात क्या  बाहर से आकर कोई करता है... समानता भारतीय परिवारों ने आखिर सिखायी कब और नहीं सिखाई तो बच्चों को घुटन नहीं होगी तो क्या होगी? बहुत कम माता - पिता होते हैं जो औसत और कमजोर बच्चों के साथ खड़े रहें और ऐसे माता - पिता हैं मगर अपवाद की तरह..यकीन न हो तो कभी किसी मानसिक अस्पताल का चक्कर लगा लीजिए।
अब बात आती है प्रेम की तो मध्यमवर्गीय परिवारों में तो बेटियों की माएँ लड़कों से बात करने की मनाही करती हैं और ऐसा न करने पर जहर खिला देने की बात भी करती हैं...आपको इसमें ममता दिखती है...मुझे नहीं दिखती...बेटी या बेटे को दुर्भाग्य या सौभाग्य से प्रेम हो गया तो सबसे पहले उसकी जासूसी होगी...समझाया जायेगा...दोस्तों को कोसा जाएगा...पढ़ाई छुड़वाने की तमाम कोशिशें (खासकर लड़कियों के मामले में) की जाएँगी और किसी भी प्रकार उनको प्रताड़ित करके उनको भटकने से बचाने की तथाकथित कोशिश होगी...बेटों के साथ भी यह होता है मगर इमोशनल ब्लैकमेलिंग होती है पर यह फैक्टर काम करता है कि लड़का है...हाथ से चला गया तो क्या करोगी...लड़कियों की जबरन शादी की जाती है या उनको मजबूरन शादी करनी पड़ती है (खासकर तब जब उसे बीच भंवर में उसके प्रेम ने छोड़ दिया हो)....तो ऐसी स्थिति में बच्चों के लिए कौन सा सुखी संसार रच रहे होते हैं...उसका ताना - बाना मैं भी समझना चाहूँगी...आप कहेंगे...मेरे भीतर आग है...जी हाँ है...जरूर है...क्योंकि मैंने अपनी क्लासमेट और सहेली को ऐसे ही खोया है.....वह बहुत मेधावी थी...उसके मोतियों जैसे अक्षर आज भी मेरी डायरी में दर्ज हैं...जब देखती हूँ..अन्दर कुछ टूटता है....।
अपराधबोध और धोखा...जब एक साथ मिले और पास में कोई न हो तो कोई क्या करे...आपके आस - पास, आपके अपने ही घर में महीनों से कोई खामोश पड़ा है...क्या आपने एक बार भी उसका हाथ पकड़कर पूछा...कि वह क्या कहना चाहता है? उसको सुनने की फुरसत है आपके पास?
आस - पास इसी दहेज के कारण जानें जाती देखी हैं...इसलिए तकलीफ तो है...मैंने युवाओं को टूटते - तड़पते देखा है इसलिए दर्द तो है...जिन्दगी भर संघर्ष रहा है तो मेरी समझ में यह सब आता है....
अब बात सुशांत की....तो पहले उनका संघर्ष देखिए...आज जो रो रहे हैं...उनमें से कई ऐसे भी होंगे जिन्होंने 'ऐ बिहारी' कहकर उनका मजाक उड़ाया होगा...सब जानते हैं कि अंकिता के साथ वे गम्भीर रिश्ते में थे...और 6 साल दोनों साथ रहे....सुशांत जिस समाज से थे क्या उनके इस अर्न्तजातीय प्यार के लिए जगह रही होगी? क्या बेटे को चुरा लेने के आरोप अंकिता पर नहीं लगे होंगे...बेटियों को जूझने और लड़ने की आदत तो पड़ ही जाती है पर क्या बेटों को हार मान लेना, जाने देना, खुद को अभिव्यक्त करना सिखाया है कभी आपने। वह यही सुनता आया है कि मर्द रोया नहीं करते...औरतों को कंट्रोल करना सिखाया है...मेल इगो आपने उसकी नस - नस में डाला है...तभी तो वह इन्कार नहीं सह पाता। जब आप अपने बच्चों को बिरादरी, स्टेटर, रुतबा और समाज का सबक सिखा रहे होते हैं तो एक बार उनकी आँखों में झाँकिये...उस वक्त उनके भीतर बहुत कुछ टूट रहा होता है। सुशांत के भीतर भी टूटा होगा...उनके और भी रिश्ते टूटे और वे किसी के सामने नहीं खुल सके। शादी कोई रिहैबिलिटेशन सेंटर नहीं है और न ही शादी कर देने से किसी समस्या का समाधान होता है मगर अधिकतर समाधान इसी में खोज लिए जाते हैं...अगर सुशांत खुद के साथ एक रिश्ता बना सकते, अपने लिए बोल सकते....लड़ सकते...तब शायद सब कुछ सही होता
आप बात प्यार की करते हैं और आपका परिवारवाद प्रतियोगिता, घृणा, द्वेष, विषमता पर टिका है..आखिर परिवारों में एक लोकतान्त्रिक परिवेश क्यों नहीं हो सकता। बकवास मत कीजिए....आपके समाज में प्रेम विवाह के लिए जगह नहीं है और अन्तर्जातीय शादियों के लिए तो बिल्कुल नहीं है। मतलब आपने बच्चों को समझ क्या रखा है...वह क्या मशीन हैं जो एक दिल निकालकर रख दिया और दूसरा फिट कर लिया....एक इन्सान को चाहने का मतलब भी आपके समाज को पता होता तो इतनी ऑनर - किलिंग नहीं होती हमारे देश में। अपने कलेजे में जहाँ पत्थर रखा है...वहाँ से एक झील निकालिए...
 मूव ऑन होना, न कहना और न को स्वीकारना, आज के युवाओं को सीखना पड़ेगा। किसी पर भी इतना अधिक निर्भर न रहें कि वह आपकी जरूरत बन जाए और आपके मानसिक शोषण व अवसाद का कारण भी...खुद से एक रिश्ता बनाइए क्योंकि आपके सबसे अच्छे दोस्त आप खुद हैं....और आपका विकल्प सिर्फ आप हैं..कोई दूसरा नहीं।

सोमवार, 30 मार्च 2020

महामारी को मात दो...फिर अपनी धरती पर लौटो,,,माटी पुकार रही है



21 दिनों के लॉकडाउन ने बहुत कुछ दिखाया...बुरे वक्त में अच्छे और बुरे कई तरह के लोग दिखे...घटनायें दिखीं....समय के साथ हर चीज आयेगी - जायेगी...मगर एक चीज कभी किसी सच्चे भारतीय खासकर बिहार, झारखंड या यूपी के रहने वालों के कलेजे में टीस बनकर रहेगी....रहनी चाहिए...यह वह आग है जिसका जिन्दा रहना बहुत जरूरी है मगर इसके लिए सुरक्षित और जिन्दा रहना जरूरी है....इसलिए तमाम दिक्कतों के बाद भी अपनी लड़ाई को जिन्दा रखने के लिए लॉकडाइन का पालन करो....मगर अपमान की इस आग को बुझने मत देना.....खुद को इसमें झोक  दो और कुन्दन बनकर लौटो..।

लौटो कि यही आग इन राज्यों को, पूर्वान्चल की उस जनता को एक नया जन्म देगी...। जब कभी आप होली के रंगों में अपने परिवार के साथ डूबे रहते हैं....जब दिवाली पर दीये जला रहते हैं...तब ये लोग अपने घरों में नहीं रहते...वह आपके घरों में फूल सजा रहे होते हैं....वह एक प्यार भरी दुलार के लिए तरस जाते हैं...क्योंकि जबकी इसकी जरूरत होती है तब आप उनसे अपनी कम्पनी की बिक्री बढ़वाते हैं...। आपकी मशीनों पर काम करते हुए न जाने कितने मर जाते हैं...कितने अपाहिज हो जाते हैं...उनकी हड़ताल आपको इतनी नागवार गुजरती है कि आप पुलिस और प्रशासन से बात करते हैं...और कारखाने बंद कर देते है...लाठीचार्ज करवाते हैं...आपके हाथ इतने लम्बे हैं कि आप उनको फँसाकर जेल भिजवा सकते हैं।
ये आपको हमेशा से खटकते थे...आप न जाने कब से अपनी राजनीति की लम्बी पारी के लिए भेजना चाहते थे...आज एक महामारी ने आपको मौका दिया है। जिन्होंने आपको रहने के लिए आलीशान इमारतें दीं, आप उनको दो दिन के लिए उसके एक कोने में नहीं रख सके। जिसने 21 साल आपके पास आपकी हर जरूरत के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया...आपके पास उसके लिए 21 दिन भी नहीं थे....जिनका उगाया हुआ अनाज खाकर आपकी चमड़ी मोटी हो गयी है...आपके पास उसके लिए एक वक्त की रोटी नहीं थी...आप रोते रहे....एक मायावी दुनिया में संवेदना बरसाते रहे...पर सड़क पर नहीं उतरे....आपको डर है कि ये मजदूर आपको बीमार कर देंगे...आप कोरोना संक्रमित हो जायेंगे...मगर संक्रमित तो आप पहले से ही हैं...आपको अभिजात्य अहंकार का संक्रमण है...आप स्वार्थ के वायरस से संक्रमित हैं....आप खोखले हो चुके हैं।

देश के कोने -कोने से खबरें आ रही हैं....वह चले जा रहे हैं...नंगे पैर....धूम में...ठीक उसी वक्त जब आप अपने मोबाइल पर स्टेटस डाल रहे होते हैं...उसी वक्त एक बच्चा चलते -चलते थककर बैठ जाता है...आप परिवार के साथ हैं...वह परिवार से दूर... पलायन का सिलसिला जारी है। हालांकि, शुक्रवार की रात के मुकाबले शनिवार रात को एक्सप्रेस वे पर पैदल यात्रियों की तादाद कुछ कम थी। इन लोगों को कहीं पुलिस से खाने को कुछ सामान मिल जाता है, तो कहीं आम नागरिकों मदद के लिए आगे आ जाते हैं। अपने बीवी-बच्चों और परिवारों के साथ अपने किराये के छोटे से कमरे को छोड़, घर की ओर पलायन करने वालों की यह भीड़ थोड़ी-थोड़ी देर में घटती-बढ़ती रहती है। कुछ गठरियां, कुछ पोटलियां और थोड़ा सा पानी लेकर लोग निकल पड़े हैं। इस आस में कि कहीं कोई बस या ट्रक मिल जाये। किसी के कॉन्ट्रेक्टर ने काम बंद कर दिया तो किसी को मकान मालिक ने निकाल दिया। किसी को दिहाड़ी के लिए कोई काम ही नहीं मिल रहा, तो कोई तीन दिन से भूखा है। कोरोना ने मानो इन लोगों की जिंदगियों पर ही ताला जड़ दिया है। कुछ तो भूख से मर भी जा रहे हैं...आखिर इस अन्यास का हिसाब कौन देगा...?
आखिर अपराध क्या है इनका कि ये गरीब हैं...मजदूर हैं...फटे कपड़े पहनते हैं...पेट की मार ने पहले गाँव -घर  सब छुड़वाया था आज सियासत ने उनको शहर के बाहर कर दिया है...शहर को उनकी जरूरत नहीं है...जरूरत होगी जब बाग में पानी देना होगा...दरवानी करनी होगी...खाना बनाना होगा...घर में पोंछा लगाना होगा...माल उठाना होगा....आपकी जो थोड़ी-बहुत सहानुभूति है वह अपने लिए है...अपनी जरूरतों के लिए है...।

आप जिनका अपमान कर रहे हैं...वह चन्द्रगुप्त....अशोक और चाणक्य के वंशज हैं...आप जिस जमीन को हिकारत से देखते हैं....उसने सिद्धार्थ को बुद्ध बनाया....मोहनदास को गाँधी बनाया....उसी धरती से राम निकले...कृष्ण निकले...आपने आज इन सबको एक साथ विस्थापित कर दिया...।
तो पूर्वांचल के योद्धाओं....कहाँ रह रहे हो...किसके लिए अपनी उम्र....अपनी प्रतिभा...सब खत्म कर रहे हो...क्यों कर रहे हो...लौट चलो...उस मिट्टी को उर्वर बनाओ कि उसकी फसल कभी तुमसे हिसाब नहीं माँगेगी...अपनी तकनीक, शिक्षा, प्रतिभा....सबके दम पर अपनी मिट्टी को खड़ा करो...यही तुम्हारा संकल्प होना चाहिए....इन सेठों और हृदयहीन सर्जकों को तुम्हारी जरूरत नहीं है....पर माँ को है...जिसने दही खिलाकर अपने कलेजे पर पत्थर रखकर तुमको विदा किया था...तुम्हारी प्रतिभा पर तुम्हारे पिता का हक है...उस आँगन का हक है जो तुम्हारे इन्तजार में पथरा चुका है...अब लौट चलो....वहीं पर...जो तुम्हारा है....ठीक है...इतनी कमाई पहले न हो...मगर परिवार का बल रहेगा...दोस्तों का साथ रहेगा....आशीर्वाद रहेगा तो तुम आसमान को भी अपने कदमों में झुका सकते हो। अगर आप अपनी दुनिया में सफल हैं तो भी अब आपकी बारी है कि अपनी मिट्टी का कर्ज उतारें.,..इसमें आपके शेयरों के भाव शायद कम हों...मगर सन्तुष्टि का सेन्सेक्स हजारों गुना पार होगा....।

https://www.shubhjita.com/

अपने गाँवों में उद्योग लगाइए और ऐसे उद्योग लगाइए जिससे ये हरी - भरी धरती फिर सज सके...स्कूल खोलिए...शौचालय की व्यवस्था कीजिए...स्टार्टअप में पैसा लगाइए...वैसे ही यूपी...बिहार....और झारखंड को फिर से खड़ा कीजिए....जैसे कभी आपकी माँ ने आपको जन्म दिया था। शिक्षा का प्रसार करिए....आधुनिकता और परम्परा से जोड़िए...दबा हुआ इतिहास खोज निकालिए...अपनी बोलियों पर काम  कीजिए....कुछ भी कीजिए मगर लौटिए...अभी पराई धरती से ज्यादा आपकी मिट्टी को आपकी जरूरत है...परायेपन से भरे आपके एकाकीपन व अपराधबोध को यही एक तरीका भर सकता है। वह तुमको श्रमिक कहते हैं...मगर तुम उनकी दुनिया के राज लेकर लौटे हो...उनके उद्योग अपने गाँवों में खड़े करो....तुम फिनिक्स पक्षी हो...अपनी राख से भी जन्म लेना जानते हो....पूर्वान्चल ने इस देश को दिशा दी है....ज्ञान दिया है....अब तुम्हारी बारी है....तुम्हारी धरती....तुम्हारी मिट्टी तुमको बुला रही है....लौटो और नवजीवन दो अपनी मिट्टी को.,..संकल्पवीरों का साथ तो ईश्वर देता है...देखना एक दिन लोग तुम सबके लिए तरसेंगे....और सब तुम्हारी तरफ ही देखेंगे...जैसे अभी पूरा देश देख रहा है....लौट चलो।

मंगलवार, 7 जनवरी 2020

वैचारिक लोकतन्त्र का मतलब अराजकता का समर्थन नहीं


अचानक ही हर कोई छात्रों के हितों को लेकर सक्रिय हो उठा है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हमला क्या हुआ, सारे देश के बुद्धिजीवी और लेखक एक साथ सक्रिय हो उठे हैं। विश्वविद्यालयों में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए मगर क्या वैचारिक लोकतांत्रिक अधिकारों के नाम पर अराजकता का समर्थन किया जा सकता है। आप जब किसी संस्थान विशेष को लेकर कुछ अधिक ही द्रवित होते हैं तो उस समय अन्य संस्थानों और विद्यार्थियों के साथ अन्याय कर रहे होते हैं....मुझे लगता है कि इस समय देश में यही हो रहा है।
क्या विरोध करने का एक बड़ा कारण यह नहीं है कि इस समय केन्द्र में जो सरकार है, वह आपको फूटी आँखों नहीं सुहाती? यह सर्वविदित सत्य है कि देश के बुद्धिजीवी वर्ग में 80 प्रतिशत वामपन्थ से प्रभावित है। साहित्य से लेकर सिनेमा और इतिहास में इनका दबदबा रहा है, इनके द्वारा गढ़ा गया इतिहास पढ़कर हम बड़े हुए हैं और वैचारिक आत्महीनता से त्रस्त रहे हैं मगर इस समय वामपन्थ को दक्षिण पन्थ से कड़ी चुनौती मिल रही है और हमेशा की तरह विद्यार्थियों को इस्तेमाल किया जा रहा है। जरा सोचिएगा, क्या हर विद्यार्थी आन्दोलन करना चाहता है, नहीं....जेयू और प्रेसिडेंसी से लेकर जेएनयू तक में ऐसे विद्यार्थी हैं जो किसी प्रकार के आन्दोलन से मतलब नहीं रखना चाहते..पढ़ना चाहते हैं मगर उन पर दबाव डालकर उनके सीनियर अपनी रैलियों में ले जाते हैं तो कई बार तो शिक्षकों ने भी अपने हितों के लिए विद्यार्थियों से धरना करवाया है। आखिर हम किस तरह के विद्यार्थियों के समर्थन में हैं...वह...जो संवाद की जगह 56 घंटे तक एक वृद्ध उपकुलपति को अपने कब्जे में रखता है..या वह जिनकी कैद में एक उपकुलपति बीमार हो जाता है,..। तय कीजिए कि आप किसके साथ खड़े हैं...वह छात्र...जो संस्थानों में बमबाजी करते हैं...बोतलें फेंकते हैं...वीसी के कक्ष के सामने कपड़े डालकर विरोध जताते हैं या वे जो अन्र्तर्वस्त्रों में उनकी मेज पर नाचते हैं....आपको किस तरह का प्रदर्शन चाहिए...छात्र राजनीति में हिंसा हमेशा से रही है मगर कभी भी बुद्धिजीवी और कलाकार इस कदर मुखर नहीं हुए...क्योंकि केन्द्र में सरकार किसी की भी हो...सत्ता उनकी ही रही...कौन नहीं जानता कि संस्थानों में किस प्रकार का भाई - भतीजावाद रहा...आप तब खामोश रहे क्योंकि आपकी सत्ता को चुनौती नहीं मिली।
क्या ऐसे ही डरे हुए शिक्षक चाहिए आपको?

आप इसे स्वतन्त्रता कह सकते हैं मगर विश्वविद्यालय परिसर में सिगरेट की राख और ऐतिहासिक शिक्षण संस्थानों में प्रेम केलियाँ करते युगल पूरी अश्लीलता के साथ सामने आते हैं...बाकायदा शराब की बोतलें..और कन्डोम...बरामद होते हैं...तो वह किसी शिक्षण संस्थान का आदर्श स्वरूप नहीं होती मगर आपके मुँह से एक शब्द नहीं निकलता...मगर इनमें से कुछ ऐसे बच्चे हैं जो असहज होते हैं...क्योंकि वे आम घरों से आने वाली लड़कियाँ भी होती हैं। बच्चे सिर्फ इस्तेमाल किये जाते हैं...
याद कीजिए 2010 में एसएफआई समर्थक स्वपन कोले की टीएमसीपी समर्थकों ने किस तरह पीट - पीटकर हत्या की थी...तब क्यों नहीं दिल काँपे आपके?
ये आपकी विचारधारा से अलग हैं इसलिए इनके साथ यही सलूक होना चाहिए? 

भारत में छात्र राजनीति का आरम्भ आज़ादी से लगभग सौ वर्ष पहले अठारह सौ अड़तालीस  में दादा भाई नौरोजी की  “स्टूडेंट सोसाइटी” की स्थापना के साथ हुआ। आज़ादी की लड़ाई में भी छात्र संगठनो ने अहम् भूमिका निभाई थी। वर्तमान में भी भारतीय राजनीति में कई बड़े चहरे हैं जिनकी शुरुआत छात्र राजनीति से हुई है असम के भूतपूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत, अरुण जेटली,लालू प्रसाद यादव आदि भी उसमे शामिल हैं।भारतीय लोकतंत्र में ऐसे कई उदाहरण हैं जिनमे छात्र शक्ति ने सत्ता को अपनी ताक़त दिखाई है और कई सफल आंदोलन किये हैं।जेपी आन्दोलन में भी छात्र संगठनो की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। पर दुर्भाग्यवश वर्तमान छात्र राजनीति से अपना इतिहास दोहराये जाने की आशा करना भी कल्पना से परे की बात है।
आपको ऐसे थके परेशान शिक्षक और प्रशासक चाहिए ?

आजकल की छात्र राजनीति में सभी छात्र-संगठन किसी न किसी राजनीतिक दल की छात्र ईकाई के रूप में कार्य कर रहे हैं जिनका एकमात्र लक्ष्य चुनाव जीतना होता है।ये छात्र संगठन चुनाव जीतने के लिए सारे हथकंडे अपनाते हैं जिनका प्रयोग मुख़्य राजनीतिक दल अपने चुनाव जीतने के लिए करते हैं।देश के अधिकतर छात्र नेता खुद अराजकता फैलाते नज़र आते हैं।राजनीतिक दलों के इशारों पर काम कर अपनी टिकट पक्की करना ही उनका एकमात्र लक्ष्य रहता है।अधिकतर छात्र नेताओं का सम्बन्ध किसी न किसी बड़े नेता से होता है और ये नेता अपने प्रियजनों को छात्र-नेता के रूप में स्थापित कर उनका राजनीतिक भविष्य बनाने के लिए अनैतिक कार्यो का सहारा लेने में कोई गुरेज़ नही करते।
ये सही है?

जिन विद्यार्थियों के पास फीस के पैसे नहीं होते, उनके पास पोस्टर, सिगरेट और शराब के पैसे कहाँ से आते होंगे...यह पूछने की जरूरत नहीं है। छात्र आन्दोलन का इतिहास नया नहीं है...आपातकाल से चला आ रहा है।  1974 में छात्र आन्दोलन आपातकाल के विरोध में शुरू हुआ। इसी दौरान अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और समाजवादी छात्रो ने पहली बार एकसाथ कर छात्र संघर्ष समिति का गठन कर आपातकाल का विरोध किया। जिसके लालू प्रसाद यादव अध्यक्ष चुने गए थे और सुशील कुमार मोदी महासचिव चुने गए थे जो आज बिहार के उप मुख्यमंत्री हैं। आपातकाल के विरोध प्रदर्शन के दौरान बहुत से छात्रों को बेरहमी से पीटा गया और उनको जेल में बंद कर दिया गया था। नेतृत्व विहीन आपातकाल आन्दोलन को नयी उर्जा के लिया जय प्रकाश नारायण को छात्रो द्वारा आमंत्रित किया गया और उसके बाद उन्होंने 'सम्पूर्ण क्रांति' का नारा दिया।

गोपालचंद्र सेन की हत्या
गांधी जब 1930 के दशक में बंगाल का दौरा कर रहे थे तो एक युवक उनके भाषणों से बहुत प्रभावित हुआ। जल्दी ही उसे एक समस्या का अहसास हुआ– गांधी को सुनने को जमा हुए लोग उन्हें ठीक से सुन नहीं पा रहे थे इसलिए उसने गांधी को एक स्वनिर्मित ‘पोर्टेबल स्पीकर’ भेंट किया– महात्मा को बहुत खुशी हुई। यह युवक गोपालचंद्र सेन थे, और उन्होंने अंत तक गांधीवादी जीवन जीया। सेन 1960 के दशक में जादवपुर विश्वविद्यालय के कुलपति बने. ये बंगाल में भारी अशांति का दौर था। खास कर युवाओं के लिए जो कि नक्सल आंदोलन से जुड़ रहे थे। जल्दी ही जादवपुर विश्वविद्यालय राजनीति और आंदोलनों का अखाड़ा बन गया। नक्सल छात्रों ने सेन से परीक्षाएं रद्द करने को कहा। सेन सहमत नहीं हुए। उनका कहना था कि जिन्हें बहिष्कार करना है वो करें पर इच्छुक छात्रों के लिए परीक्षाओं का आयोजन नहीं करना गलत होगा। परीक्षाएं हुईं। छुट्टियां शुरू हो जाने पर सेन ने पास होने का सर्टिफिकेट अपने आवास पर वितरित करने की पेशकश की। इस बीच बंगाल में नक्सलों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई में तेजी आ रही थी। 30 दिसंबर 1970 को सेन अपने आवास की तरफ बढ़ रहे थे।अगले ही दिन वह सेवानिवृत होने वाले थे। शाम के छह बजे का वक्त था और वह एक सहकर्मी की कार में बैठकर जाने के लिए राजी नहीं हुए थे।
विरोध का यह तरीका असहज करता है

परिसर में ठीक पुस्तकालय के सामने सेन की हत्या कर दी गई. किसी को नहीं पता किसने की हत्या, पर इसके पीछे नक्सलियों का हाथ बताया गया। आज उस जगह पर स्थापित स्मारक इतिहास के उस काले अध्याय की याद दिलाता है। पूर्व कुलपति अभिजीत चक्रवर्ती ने 17 सितंबर 2014 की सुबह अपने कार्यालय भवन का घेराव कर रहे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस बुलाने की वजह के रूप में सेन हत्याकांड का ही उल्लेख किया था। तब पुलिस कार्रवाई में बहुत से छात्र घायल हो गए थे।
छात्र दरअसल कैंपस में यौन दुर्व्यवहार की एक घटना पर पर्याप्त कदम नहीं उठाने और निष्क्रियता दिखाने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन का विरोध कर रहे थे। विरोध का तरीका ऐसा कि विश्वविद्यालय में पढ़ाई लगभग 6 माह के लिए ठप हो गयी। विरोध अपनी जगह है मगर क्या इसका तरीका अभद्रता होनी चाहिए? आम तौर पर जेयू का दीक्षांत समारोह 24 दिसम्बर को ही होता है। आज भी दीक्षान्त समारोह स्थल की सजावट पर लगी कालिख, बहिष्कार के नारे और अब डिग्री फाड़ने की घटना....क्या शिक्षण संस्थानों की गरिमा का हनन नहीं है..या तथाकथित फासीवादी ताकतों के विरोध का हर तरीका जायज समझकर इसे भी स्वीकार कर लेंगे आप?
वैचारिक लोकतन्त्र का मतलब क्या होता है...एक बात समझनी है...यही कि गिलानी के समर्थन में नारे लगाए जाएँ....भारत के टुकड़े करने और कश्मीर की आजादी के नारे लगाए जाएँ? वैचारिक लोकतन्त्र का मतलब हर विचारधारा को सुनना और समझना है तो किसी विशेष विचारधारा के होने के कारण अपमानित करने की छूट कैसे और क्यों दी जानी चाहिए...क्या जेयू के विद्यार्थियों ने बाबुल सुप्रियो के साथ जो बदसलूकी की...उसे स्वीकार किया जाना चाहिए या प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और वीसी अनुराधा लोहिया के साथ जो बर्ताव विद्यार्थियों ने किया...आप उसे अपनी सहमति देंगे...क्यों नहीं तब जेएनयू की तरह लोग सामने आए?
इसे स्वीकार करने जा रहे हैं क्या आप ?

इसके पहले 2013 में एसएफआई नेता सुदीप्त गुप्त की मौत हुई थी और तब हुई थी जब प्रदर्शन के बाद पुलिस वैन में उनको ले जा रही थी और बस से गिरकर उनकी मौत हो गयी थी। हालांकि माकपा का दावा रहा है कि उनकी मौत पुलिस हिरासत में हुई...कितने शिक्षक उनके लिए सड़क पर उतरे थे...यह भी सवाल उठता है?
2 साल पहले की बात है। उत्तर दिनाजपुर के इस्लामपुर में द्वारीभिटा हाई स्कूल में बांग्ला शिक्षक की नियुक्ति को की मांग पर करीब 2000 छात्रों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया था। आरोप है कि छात्र पुलिस पर ईट पत्थर आदि फेंक रहे थे। इस बीच पुलिस ने छात्रों पर आंसू गैस के गोले छोड़े, रबड़ की गोलियां चलाई और लाठीचार्ज भी किया लेकिन बाद में मौके पर पहुंचे थाना प्रभारी ने छात्रों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। पुलिस की फायरिंग में राजेश सरकार नाम के 27 साल के एक पूर्व छात्र और तापस बर्मन नाम के एक अन्य छात्र की मौत हो गयी थी। आपमें से कितने लोग सड़क पर उतरे थे....? क्या यह बर्बरता नहीं थी या इन बच्चों की जान की कीमत इसलिए नहीं थी कि ये राजधानी से नहीं बल्कि किसी जिले के सुदूर कस्बे में रहते थे...। तृणमूल का एक नेता जग से प्रहार कर शिक्षिका का सिर फोड़ देता है...तब शिक्षकों का मान खतरे में नहीं पड़ता...चयनित विरोध इस देश में लोकतन्त्र स्थापित नहीं कर सकता...बॉलीवुड के तमाम सितारे जेएनयू पहुँच सकते हैं क्योंकि जो प्रचार उनको जेएनयू देगा...वह इस्लामपुर का स्कूल नहीं दे सकता।
FILE PHOTO OF PROTESTS IN JNU AGAINST THE HANGING OF AFZAL GURU IN 2016https://freepresskashmir.com/2017/12/25/jnu-cancels-srinagar-entrance-examination-centre-its-strategy-allege-kashmiri-students/
ये जेएनयू ही है और साथ में लिंक भी है
तय कीजिए कि आपकी लड़ाई किससे है...आपको केन्द्र से, भाजपा से, संघ के होने से आपत्ति है...घृणा है क्योंकि वे हिंसा फैला रहे हैं....मगर उतनी ही कट्टरता आपके अन्दर भरी है...विद्यार्थियों का दमन सत्ता पक्ष हमेशा से करता आया है मगर आज सत्ता आपके वैचारिक विरोधी के पास है इसलिए आप विरोध कर रहे हैं,..काश कि आप विद्यार्थियों के लिए लड़ते..जिन प्रोफेसरों का वेतन लाखों में है...वह क्या चाहें तो विद्यार्थियों को नि:शुल्क नहीं पढ़ा सकते.? आप खुद से पूछिए कि आप सही मायनों में कितनी बार विद्यार्थियों के लिए उतरे हैं...उनके प्रश्न उठाए हैं...निजी स्कूलों में मोटा वेतन पाने वालों ने कितनी बार अपने संस्थानों में फीस वृद्धि का विरोध किया है ? सबको पता है कि छात्र संगठन के चुनाव वर्चस्व का मामला है, बंगाल के कॉलेजों में होने वाली हिंसा के कारण कितने प्रिंसिपल इस्तीफा दे चुके हैं...यह अराजकता आपकी चिन्ता का कारण क्यों नहीं बनती?

अगर जयचन्द गलत है तो बख्तियार खिलजी भी सही नहीं है...चयनित विरोध के कारण आम जनता साहित्य और साहित्यकारों से दूर हो रही है..सवाल यह है कि अगर आप वैचारिक लोकतन्त्र की वकालत करते हैं तो वह लोकतन्त्र किसी वाद या दल विशेष तक सीमित क्यों है...क्यों कि किसी दल विशेष का होने की वजह से किसी नेता अथवा नेत्री को अपमानित होना चाहिए...आपको दिल्ली की हिंसा दिखती है तो बंगाल की हिंसा क्यों नहीं देखते आप?
आन्दोलन का मतलब अराजकता नहीं होता और साजिशें रचने में कोई छात्र संगठन या नेता पीछे नहीं है...आप शौक से आन्दोलन कीजिए मगर जो विद्यार्थी या शिक्षक अपना काम करना चाहते हैं...उनको खींचने या धमकाकर लाने का लाइसेंस आपको किसने दे दिया.? सिर्फ इसलिए कि आप किसी पार्टा या विचारधारा को पसन्द नहीं करते....आप उनको लेकर फैसला नहीं कर सकते...जो बात एक पक्ष के लिए सही है,,,वह दूसरे पक्ष के लिए गलत नहीं होनी चाहिए और न हो सकती है..।
विद्या विनय देती है...आपने अपने विद्यार्थियों में सिर्फ अहंकार और अकड़ भरी है.....और आप इसे सफलता मानते हैं तो इससे बड़ा दुर्भाग्य कुछ नहीं है। यही अकड़ उनकी समस्याओं की जड़ है...अनुशासनहीन आन्दोलन कभी भी स्वीकार नहीं हो सकता...। सच तो यह है कि संस्थानों में इस तरह की राजनीति और राजनीतिक पार्टियों के लिए जगह होनी ही नहीं चाहिए...और अगर स्वागत करना है तो स्वागत सबका कीजिए। आन्दोलन और अराजकता के फर्क को समझिए और नहीं समझेंगे तो आने वाला इतिहास आपको माफ नहीं करेगा।