मंगलवार, 6 दिसंबर 2022

सफलता के शिखर पर पहुँचकर उतरना और देते जाना भी एक कला है

सफलता और शिखर भी एक दिन थकाने लगते हैं, तब शांति की तलाश होती है....कुछ नहीं चाहिए होता...हमने चढ़ना सीखा, पर सीढ़ियों से उतरना और सम्मान, संतोष और संतुष्टि लेकर उतरना, लौटना एक कला है, सच तो यह है कि यही जीवन है और ये तब होता है जब हम देना सीखते हैं, देना, लौटाना अपने में ही सबसे बड़ा शिखर है, अपने मन के भीतर, किसी की मुस्कान में ...तब लगता है और कुछ नहीं चाहिए....कुछ भी नहीं.... शिखर की तलाश कभी नहीं...बस चलते रहना....और फिर बैठना...शांति से, सुकून से... जब हम सफ़लता पा लेते हैं तो हमें याद नहीं रहता कि हमारी जगह कल कोई और था, हम छोड़ना नहीं चाहते, कसकर पकड़े रहते हैं कुर्सी को, पद को, धन को, और एक संघर्ष आरंभ होता है। वो लोग जो हमें यहाँ तक लाए थे, वही हमसे मुँह मोड़ लेते हैं, वही हमसे छीनने, हमें उतारने, दूर करने को तत्पर रहते हैं... थोड़ा याद करें तो हमने भी तो यही किया था..और यह स्थिति हमारे सामने भी आ रही होती है, हमें दंभ रहता है हमने ये किया, वो किया, और तमाम जटिलताओं के बाद भी हम नहीं झुकते ....अब सोचिए क्या यह समय के प्रवाह की राह में पत्थर बनना नहीं है? अगर आपने किया तो आपके लिए भी किसी ने किया, और आप नहीं भी करते तो ईश्वर जिसको जो देने योग्य समझता है, उसे वह देकर ही रहता है, हम सिर्फ और सिर्फ माध्यम हैं और यह हमारा सौभाग्य है कि ईश्वर ने हमें चुना है, हम नहीं होते तो भी कार्य होता, नहीं होंगे तो भी सृष्टि चलेगी। तो आप जूझ किससे रहे हैं, किसी और से नहीं, अपने- आप से, अहंकार से, जब देने के बीच 'मैंने किया' आ जाता है तो वहाँ उपकार और अहसान की भावना आती है और जहाँ अहंकार हो, दर्प हो, वहाँ दमन की, नियन्त्रण की इच्छा का होना स्वाभाविक है और तब आपको आगे जाने वाले हर व्यक्ति से समस्या होती है, फिर आप शत्रु बनते हैं, बनाते हैं, अपने अहंकार की रस्सी में, दर्प के जाल में, षड्यंत्र की गुफा में ऐसे खोते हैं कि दूसरों को गिराते- गिराते खुद गिरकर समाप्त हो जाते हैं....एक समय आता है जब आप खुद को ही नहीं पहचान पाते, बहुत- कुछ बचाते हुए खुद खाली हो जाना, मुट्ठी से रेत बनकर अपनी आत्मा से खाली हो जाना, किसी की स्मृतियों में दुःस्वप्न बन जाना, सफलता बहुत कुछ छीन लेती है । खुद से जूझना तो खुद ही क्षति पहुँचाना है, खुद को कष्ट पहुँचाना है.. आप नहीं हटे तो हटा दिए जायेंगे, नहीं उतरे तो उतार दिए जायेंगे इसलिए सर्वश्रेष्ठ समय के दौरान अपनी किसी नयी यात्रा के लिए विराम जरूरी है ताकि नयी पारी में हम फिर से अपने लिए तैयार हों हर उस जगह को छोड़ देना बुद्धिमानी है, जहाँ आपकी जरूरत नहीं है, जहाँ आपको ढोया जा रहा हो, आपसे कुछ कहा जाय या नहीं पर आप समझते हैं कि क्या हो रहा है हम सबको बदल नहीं सकते पर हम अपनी तरह से वो काम करके एक उदाहरण जरूर बन सकते हैं, यही सुख है, संतुष्टि है, संतोष है..बोलकर नहीं कर के दिखाने की जरूरत है...और ये संसार आपका है...आपके पूरे अस्तित्व को प्रकाशित करता हुआ... एक बार खुद से जरूर पूछिये ..क्या आप जो कर रहे हैं, उससे खुश हैं, संतुष्ट हैं...ईमानदारी से उत्तर मिलेंगे और उस राह पर जोखिम उठाते हुए चल दीजिए...मुश्किल होगी..पर वो रास्ता और लक्ष्य आपके होंगे.. -- इसलिए मेरी नजर में जो बीत रहा है, बीतने देना चाहिए, छूट रहा है छोड़ देना चाहिए, कई बार दूसरों को नहीं खुद को मुक्त करना भी अपनी रक्षा कर लेना है, बचा लेना होता है, हम समय का क्षण मात्र हैं, उससे अधिक कुछ नहीं, तो जो मेरा है ही नहीं, उसके लिए खुद से क्या लड़ना, क्या जूझना, मैं नहीं जूझती, मुझे नहीं लड़ना था... मैं खुद को बचा ले गयी । जब हम कुछ छोड़ते हैं, जब हम उतरते हैं तो अनायास ही उन लोगों को भी बचा लेते हैं जो हमें गिराते हुए गिरते रहे, कम से कम अपनी तरफ से क्योंकि गिराने वालों की नियति उसी दिन निर्धारित हो जाती है जब वह किसी को गिराते हैं...वह खत्म होते हैं और हम चाहकर भी उनके लिए कुछ नहीं कर सकते हैं क्योंकि यह उनके ही कर्मों का परिणाम है । हमने अपने जीवन का एक लम्बा समय उनके साथ बिताया होता है इसलिए थोड़ा दुःख होता है, बुरा लगता है, सहानुभूति होती है मगर उनके पाप हमारी सहानुभूति पर भारी पड़ते हैं। सृष्टि का यही नियम है और अनिवार्य नियम है कि जिसने जो बोया है, वह उसे ही काटता है । व्यक्ति के कर्म उसकी नियति निर्धारित करते हैं और यह जरूरी भी है कि अच्छे को आदर मिले, सम्मान मिले, अधिकार मिले और दुष्टों को दंड मिले क्योंकि ऐसा नहीं हुआ तो लोगों का ईश्वर से विश्वास उठ जाएगा और लोग निराश होकर बुराई की राह पर चलेंगे । ऐसे में सृष्टि का संतुलन साधने के लिए ईश्वर ने यह व्यवस्था की है कि प्राणी को उसके कर्मों के अनुरूप ही परिणाम मिले । जीवन में बहुत कुछ देखा, षडयंत्र देखे...उन लोगों को अपने विरुद्ध होते देखा जो जीवन का आधार हुआ करते थे। कई दोस्त भी ऐसे मिले जिन्होंने एकबारगी साथ ही नहीं छोड़ा बल्कि पीठ पीछे ऐसा कुछ कर गए कि मित्रता से ही विश्वास उठने लगा...ऐसे में लोगों के अस्तित्व की रक्षा के लिए भी बहुत कुछ छोड़ा ताकि वह सही राह पर आ सकें पर हमने अपना कर्म किया और उन लोगों ने अपनी बुद्धि और विचार से कार्य किया । जीवन में प्रवंचनाएं देखीं और उन तमाम छवियों को टूटते देखा जो कभी ईश्वरतुल्य लगती थीं और नकाब उतरे तो पता चला कि वे तो मनुष्य भी नहीं थे मगर ईश्वर ने ऐसा जरूर किया कि जब भी विश्वास ऐसे डगमगाया, उसने जीवन में ऐसे लोग भेज दिए जिन्होंने उसकी शक्ति पर, मनुष्यता पर, मैत्री पर और खुद ईश्वर पर विश्वास और बढ़ा दिया । छवियों का टूटना बहुत पीड़ादायक होता है और वह भी उन छवियों का टूटना...जिनको लेकर आप अपने जीवन की राह पर चलना चाहते थे। यह सिर्फ प्रेमी - प्रेमिका या पति - पत्नी के सम्बन्धों में नहीं होता, यह पारिवारिक और पेशेवर सम्बन्धों में भी होता और आपके आस - पास होता है....तब खुद को सम्भालना बहुत कठिन होता है मगर कहा न यह उसी की शक्ति है, हम सिर्फ माध्यम हैं....उसे हमसे जो करवाना होता है, वह करवा ही लेता है...मेरे जीवन में विश्वास की भूमिका गहरी और गहरी हो चली है...

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2022

मुफ्त वाली संस्कृति और दोहरेपन से पार पाये बगैर महंगाई से बचना सम्भव नहीं

महंगाई ऐसा शब्द है जिससे जनता हमेशा से त्रस्त रही है, नेताओं के लिए यह अत्यन्त प्रिय मुद्दा है और सरकारों का सिरदर्द। महंगाई के कारण सरकारें गिरती भी रही हैं और माध्यमिक तक आते - आते तो महंगाई निबन्ध का विषय भी बनती रही है। कीमतें घटने - बढ़ने के कई कारण हो सकते हैं और दुनिया में चल रही गतिविधियों और बनती - बिगड़ती परिस्थितियों का महंगाई पर व्यापक प्रभाव रहता है। इनमें से कुछ परिस्थितियाँ ऐसी हैं जिन पर वश नहीं चलता - जैसे - प्राकृतिक आपदा हो या युद्ध या ऐसा ही कोई कारण। इन सबके बीच एक सच भी है कि महंगाई को लेकर गम्भीर प्रयासों की कमी है और राजनीतिक पार्टियों की खुराक है इसलिए वे इस मुद्दे को जिन्दा भी रखना चाहती हैं। बात करें जनता की..तो जनता दो पाटन के बीच में पिसती है और सबसे अधिक त्रस्त है मध्यम, निम्न वर्ग..। अब एक सवाल हम खुद से पूछें कि क्या हम इस गम्भीर समस्या के समाधान के लिए वाकई गम्भीर हैं? अगर वाकई मैं अपनी बात कहूँ तो नहीं और इसका कारण है कि हमारा दोहरापन..हमें मुफ्त में चीजें चाहिए, सब्सिडी चाहिए..नेताओं ने वोट बैंक की राजनीति के लिए कर्जमाफी, सब्सिडी, फ्री की राजनीति तो की ही..आम जनता में मुफ्तखोरी की आदत डाल दी है... और इसका सीधा असर मूल्यवृद्धि का कारण बनता है। सीधी सी बात यह है कि इसका सीधा रिश्ता अर्थव्यवस्था से है। सरकारें सब कुछ फ्री करती जाती हैं और नतीजा यह है कि इस फ्री का बोझ आम आदमी पर ही पड़ता है। उत्पादन, उपयोग, विक्रय और लाभ एक चक्र है और जब यह चक्र काम ही नहीं करेगा यानी व्यवसाय करने वाले की लागत ही नहीं निकलेगी और पैसा अपने ही घर से जाएगा तो वह फिर से उत्पादन और व्यवसाय करने की हिम्मत कहाँ से लायेगा। इससे उत्पादक एक - एक करके कम होंगे...माँग बढ़ेगी और पर्याप्त आपूर्ति नहीं होगी तो कीमतें बढ़ेंगी और महंगाई डायन खाती ही रहेगी। महंगाई का सम्बन्ध राज्य और केन्द्र के सम्बन्धों से भी है। खुद को बेहतर दिखाने के लिए कई बार राज्य केन्द्र की जनोपयोगी योजनाओं को लागू नहीं करते तो कई बार केन्द्र राज्यों की अच्छी योजनाओं को भी सामने नहीं लाना चाहता। मसलन पेट्रो पदार्थों की ही बात लें तो जिन राज्यों में केन्द्र की पकड़ है, वे राज्य अपना कर छोड़ते हैं और वहाँ कीमतें कम हो जाती हैं और जहाँ विरोध रहता है, वहाँ की जनता महंगा पेट्रोल खरीदने पर बाध्य है। जाहिर है कि परिवहन खर्च बढ़ेगा तो चीजें तो महंगी होंगी ही। महंगाई का एक कारण हमारी हिप्पोक्रेसी भी है मसलन इस देश वमें जस्टिन बीबर के शो की टिकटें हजारों में बिकती हैं मगर आपको फीस भरनी हो तो वह आपको महंगा लगता है। आपको संरचना भी चाहिए, सुविधाएं चाहिए और सब कुछ उत्कृष्ट चाहिए मगर पानी के भाव में चाहिए। आज भी बड़ाबाजार इलाके में या कई जगहों पर लोग सुविधाएं तो 21वीं सदी की चाहते हैं मगर कीमत उनको 15वीं सदी की चाहिए। अपने लिए हमें सब कुछ सस्ता चाहिए और बेचते समय सब कुछ महंगा बेचना है। हम महंगाई के बारे में बात ज्यादा करते हैं, उससे अधिक तमाशा करते हैं और समाधान न के बराबर। महंगाई के विरोध में जब आप हड़ताल करते हैं...तोड़फोड़ करते हैं...संस्थानों को बंद करते हैं तो इसका सीधा बोझ अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। उत्पादन और काम ठप होने से हजारों - करोड़ों का नुकसान होता है और इसकी क्षतिपूर्ति के लिए उत्पादक कीमतें बढ़ा देते हैं। हम शहरी, शिक्षित हैं, पहले तो फुटपाथ पर फल और सब्जियाँ बेचने वालों से तो कुछ खरीदते नहीं हैं, खरीदते हैं तो 18 रुपए किलो प्याज को 5 रुपए में खरीदते हैं, दूध का भाव 1 रुपए लीटर भी बढ़ गया तो आन्दोलन से लेकर आगजनी करते हैं और फिर किसान को उसकी फसल की लागत नहीं मिलती तो विलाप करते हैं। हर गृहिणी या गृह स्वामी जब आधे से कम दम दरों पर राशन खरीद कर लाता है तो उसे विजेता घोषित कर दिया जाता है और बेचने वाले गरीब खलनायक घोषित कर दिए जाते हैं। अगर आप दाल ला रहे हैं तो सामने वाले देश से सुनिश्चित करें कि वह भी हमारे यहाँ खाद्यान और सब्जियाँ खरीदें। मैं खेती के बारे में अधिक नहीं जानती मगर जो पढ़ा है, उसके हिसाब से यह तो कह ही सकती हूँ कि दिक्कत अतिरिक्त उत्पादन में नहीं बल्कि वितरण, विपणन और निर्यात प्रणाली में है। हमारे यहाँ जो भी औद्योगिक विकास होता है, उसमें कृषि को वरीयता मिलनी चाहिए और इस लिहाज से आयुर्वेद और खाद्य प्रसंस्करण समेत कृषि को प्रोत्साहित करने वाले तमाम उद्योगों को विशेष सुविधाएँ दी जानी चाहिए। सौ बात की एक बात, खपत होगी और हम पानी के भाव पर खरीददारी की हसरत त्यागेंगे तो माँग के अनुसार उत्पादन होगा और उसका फायदा किसानों को होगा। क्या ये बेहतर नहीं होगा कि कर्जमाफी की जगह किसानों को ही सक्षम बनाया जाए कि उनको इस बैसाखी की जरूरत ही न पड़े। जल संचयन के उन्नत तरीके खोजे जाएँ तो अकाल में भी फसल सुरक्षित रहेगी। किसानों के लिए कृषि पाठशाला हो। स्कूली और कॉलेज स्तर पर पाठ्यक्रम में कृषि एक विषय हो जिसमें किसान से लेकर, कृषि के प्राकृतिक व आधुनिक तरीकों, कृषि के इतिहास, बीज, खाद, वितरण व विपणन प्रणाली, कृषि ऐप से लेकर उपकरण से लेकर दूसरे देशों की कृषि व्यवस्था से संबंधित समसामायिक अध्ययन हो। इस पाठ्यक्रम के तहत एक पेपर ऐसा हो जिसमें कम से कम 6 माह गाँवों में विद्यार्थी गुजारे। इससे युवा पीढ़ी कृषि का महत्व समझेगी, रोजगार सृजन होगा क्योंकि गाँवों से जुड़ना वहाँ के लोगों को रोजगार देने के लिए जरूरी है। कृषि तकनीक देश में विकसित हों। अब अगर बैंकिंग के लिहाज से बात करें तो बात रेपो रेट की आती है। रेपो रेट बाजार से अत्यधिक मुद्रा के प्रवाह को कम करने का आरबीआई का एक टूल है। यहां बताना जरूरी है कि आरबीआई द्वारा रेपो रेट बढ़ा देने से बैंकों को आरबीआई द्वारा मिलने वाली उधार राशि पर ब्याज बढ़ जाता है। ब्याज बढ़ने से बैंक भी आम लोगों को दिए जाने वाले उधार का ब्याज बढ़ा देता है। ब्याज बढ़ने के कारण या तो उपभोक्ता बैंक से उधार लेते नहीं या लेते भी हैं तो कम राशि लेते हैं। इस तरह उपभोक्ताओं की राशि भी कम होने के कारण वे अन्य वस्तुओं को भी या तो कम खरीदते हैं या नहीं खरीदते। ऐसे में खपत से ज्यादा आपूर्ति होने की स्थिति पैदा हो जाती है और वस्तुओं के जल्दी खपत के लिए उनकी कीमतें कम हो जाती हैं ताकि उपभोक्ता इसे खरीदें। वस्तुओं के दाम घट जाने के बाद आरबीआई रेपो रेट वापस कम कर देती है। इस तरह महंगाई कम होकर बाजार अपनी पूर्व स्थिति को पा लेता है। कोविड के बाद अभी रुस - यूक्रेन के युद्ध के कारण भी स्थिति बिगड़ी है। एक तथ्य यह है कि कई बार इस तरह की स्थितियाँ उत्पन्न की जाती हैं और जिन देशों को युद्ध से फायदा होता है, वे करते हैं और इस मामले में अमेरिका को जिम्मेदार ठहराना गलत नहीं होगा। इस युद्ध का सीधा फायदा अमेरिका को मिल रहा है और उसके हथियार बिक रहे हैं। वह कई जगहों पर रुस की जगह लेना चाहता है। अमेरिका और रुस की शत्रुता वैसे भी किसी से छिपी नहीं है। अब बात समाधान की हो तो सबसे पहले हमें उर्जा के वैकल्पिक स्त्रोत तलाशने होंगे। लक्जरी और ब्रांडेड की जगह सीधे - सरल शब्द अपने शब्दकोश में लाने होंगे। किसी और से तुलना करके एक आडम्बर वाली जीवनशैली के पीछे भागेंगे महंगाई से मुक्ति नहीं मिलने वाली। हमारे घरों में ऐसी कई चीजें हैं और ऐसे कई तरीके हैं जिनसे हम अपनी जीवन शैली और हमारे बजट में एक तारतम्य स्थापित कर सकते हैं। आत्मनिर्भर बनिए, ब्रांड की जगह..उन लोगों से भी सामान खरीदिए जो आपके आस - पास ही हैं। स्थानीय उत्पादकों को वरीयता दीजिए। खरीददारी कर रहें हैं तो आपके पास सूची होनी चाहिए कि आपकी जरूरतें क्या हैं। स्वदेशी चीजें और नुस्खे इस्तेमाल करिए। फ्री के चक्कर में पड़कर अधिक खरीददारी कर जाना आपके लिए अच्छा नहीं है। बचत करिए और बच्चों को बचत करना सिखाइए। सबसे बड़ी बात यह है कि बच्चों को पैसे की कीमत पता होनी चाहिए और इसके लिए उनको आर्थिक रूप से सजग बनाने की जरूरत है। एक खबर वायरल हो रही है जिसमें एक महिला ने भीख माँगकर बेटे के लिए बाइक खरीदी...और यह गलत है..इस तरह की चीजों से प्यार नहीं दिखता। बच्चों को मुश्किलों से दूर मत रखिए बल्कि उनको मुश्किलों में मजबूत रहना और उनका समाधान निकालना सिखाइए...।