रविवार, 29 मई 2016

आज के समय में पत्रकारिता, पत्रकार और स्त्री


 आज 30 मई है। पत्रकारिता दिवस। सोचती हूँ कि बीते एक दशक में पत्रकारों की स्थिति में क्या बदलाव आया है तो लगता है कि कुछ और नहीं सोचने का तरीका बदला है। हम दो धड़ों में बँट चुके हैं। एक वर्ग निष्पक्षता और उदासीनता में फर्क करना भूल चुका है तो दूसरा प्रबंधन को खुश करने की कला को पत्रकारिता का नाम देकर खुश है और इन सबके बीच में पिस रहा है ईमानदारी से काम करने वाला संवाददाता। दूर से देखने पर ग्लैमर मगर भीतर जाओ तो आपको पूरी जिंदगी में जितना अनुभव नहीं होगा, उतना अनुभव आप साल भर काम करके कमा सकते हैैं। अब बात औरतोॆं की करें तो अधिकतर स्वनाम धन्य अखबारों के लिए वह मसाला हैै, उससे जुड़ी खबरों में इतना मिर्च डाल दिया जाता है कि स्वाद ही कड़वा हो जाता है। सनी लियोनी को गालियाँ देने वाले उनकी अंतरंग तस्वीरों को प्रमुखता से स्थान देते हैं। खबर का स्तर यह है कि अब मीडिया अबराम का जन्मदिन भी मना रहा है। बाकायदा नग्न होती महिलाओं के वीडियो अपलोड किए जाते हैं औऱ इसमें महिलाओं के साथ महिला पत्रकारों की भी छीछालेदर हो रही है। खबरों का शीर्षक वह आशिक के साथ भाग गयी, तो सड़क पर लड़ पड़ी और इससे भी घटिया, जिसे साझा तक नहीं किया जा सकता। यह उस मानसिकता का परिचायक है जो पितृस्सत्तात्मक समाज ने भरा हैै और ऐसी संवेदनहीन पत्रकारिता लिखने वाले इसी समाज से आते हैं। तो यह है कि समाज में ही नहीं पत्रकारिता की दुनिया में भी औरतें मसाला भर ही हैं। अधिकतर हाउस लाइफस्टाइल औऱ मनोरंजन की बीट लड़कियों को ही देते हैं औऱ कई जगह तो मानसिकता यह है कि लड़की है इसलिए अधिकारी बात करते हैं। चैनलों मेंं काम कर रही शादीशुदा महिला पत्रकारों औऱ खासकर जिनके बच्चे हैैं, उनका जीवन तो इतना मुश्किल है कि कल्पना नहीं की जा सकती। कई वरिष्ठ महिला पत्रकारों को जानती हूँ जो मन मसोस कर फील्ड से रिश्ता तोड़ बैठी हैं क्योंकि घर भी देखना है। यह स्थिति कभी पुरुषों के सामने तो नहीं आती। सच तो यह है कि महिलाएं ही महिलाओं को गम्भीरता से नहीं लेतीं और न ही एक साथ आगे बढ़ रही हैं। जो है, जितना है, खुश हैं। संतोष कई बार आत्मघाती होता है। जरूरी है कि संतोष छोड़कर वह आगे एक साथ बढ़ें। अगर आप सबको साथ लेकर चलेंगी तो आगे आप ही बढ़ेंगी, और यह आपके लिए कोई नहीं करने जा रहा।

रविवार, 1 मई 2016

बंगाल के चुनाव, औपचारिकता है मगर गायब है जनता की उम्मीदें




चुनाव लगभगवखत्म। पहले से कहीं अधिक शांतिपूर्ण। बम, गोली, खून इस बार कम है। निश्चित रूप से चुनाव आयोग और केंद्रीय वाहिनी की भूमिका की तारीफ़ की जानी चाहिए मगर मतदान के प्रतिशत में फिर भी गिरावट है। सबसे दुखद और मार्मिक सत्य ये रहा कि कुर्सी की भूख अब बच्चों पर भी रहम करना भूल चुकी है। हालिशहर के बाद हावड़ा में भी बच्चों को हिंसा का शिकार होना पड़ा। नतीजों को लेकर भी अजीब सा सन्नाटा है मगर लोगों का कम मतदान करना विकल्प न होने के कारण है जिसमें हताशा और उदासीनता भी है। ये दूर होगी या नहीं अब भी कहना कठिन है। कोलकाता पोर्ट में जो सन्नाटा दिखा, वह एक डर को दर्शाता है। महिलाओं के साथ लोगों में भी अजीब सी उदासीनता दिखा। ऐसा लगता है कि मतदान अब एक औपचारिकता भर रह गया है विकल्पहीन बंगाल में।
 नतीजे चाहे जो भी हों मगर आम जनता के हिस्से में शायद ही कुछ आए। क्या पता सत्ता बदले या न बदले। 34 साल के वामपंथी शासन और 5 साल के तृणमूल के शासन में बंगाल की झोली खाली ही रही है। उत्सव हुए तो पलायन अधिक हुआ। लोकतांत्रिक औऱ बुद्धिजीवी बंगाल में आम आदमी को बाहर लाने के लिए केन्द्रीय वाहिनी और144 धारा की जरूरत पड़ रही है औऱ उस पर भी हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही है, इससे अधिक शर्मनाक क्या हो सकता है? उद्योग नहीं और न ही सुरक्षा है। बंगाल के भविष्य को 19 मई का इंतजार है तो इसमें भी उम्मीद गायब है।