रविवार, 22 नवंबर 2020

छठ पूजा : आधुनिकता, समानता, प्रकृति के रंग से सजी परम्परा



छठ पूजा को पर्यावरण की दृष्टि से सबसे अनुकूल माना गया है। परम्परा और प्रकृति से जोड़ने वाला यह पर्व अनूठा है और अभी हाल ही में मनाया भी गया मगर दुःखद है कि कुछ आधुनिक और बुद्धिजीवी अंग्रेजीदां अखबार और पत्रकार अपने निजी हितों और सस्ती लोकप्रियता के लिए हमारी परम्परा को निशाना बना रहे हैं...कहा जा रहा है कि छठ पूजा के कारण रवीन्द्र सरोवर और सुभाष सरोवर में प्रदूषण फैल रहा है...ये तथाकथित आधुनिक भूल जाते हैं कि इस पूजा में जो अवयव हैं, उसमें केमिकल नहीं है, प्रतिमा नहीं है इसलिए लेड भी नहीं है...जो है...वह है फूल, और पत्तियों जैसे अवयव जो पानी में घुल जाते हैं और इनसे खाद भी बनायी जाती है...ऐसे लोगों को छठ के बारे में ज्ञान नहीं है...इसलिए उनके जैसे लोगों के लिए ही यह लेख हैं...हमें नहीं पता कि इसका कितना असर पड़ेगा मगर समय आ गया है कि ऐसे लोगों को बताया जाए कि उनकी हद कहाँ तक है और उनकी सीमा क्या है...फिलहाल छठ पर यह लेख...

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि के दिन छठ पूजा की जाती है। इस पूजा का आयोजन पूरे भारत वर्ष में एक साथ किया जाता है। भगवान सूर्य को समर्पित इस पूजा में सूर्य को अध्र्य दिया जाता है। पूजन में शरीर और मन को पूरी तरह साधना पड़ता है, इसलिए इस पर्व को हठयोग भी कहा जाता है। कहा जाता है 

इतिहास

- माना जाता है कि छठ का पर्व वैदिक काल से चला आ रहा है। इस व्रत में मुख्यः रूप से ॠषियों द्वारा लिखी गई ऋग्वेद सूर्य पूजन, उषा पूजन किया जाता है। इस पर्व में वैदिक आर्य संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। छठ पूजा का बहुत महत्व माना जाता है। इस पर्व को भगवान सूर्य, उषा, प्रकृति, जल, वायु आदि को समर्पित किया जाता है। छठ पर्व मूलतः सूर्य की आराधना का पर्व है, जिसे हिन्दू धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है। हिन्दू धर्म के देवताओं में सूर्य ऐसे देवता हैं जिन्हें मूर्त रूप में देखा जा सकता है।

सूर्य की शक्तियों का मुख्य श्रोत उनकी पत्नी ऊषा और प्रत्यूषा हैं। छठ में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की संयुक्त आराधना होती है। प्रात:काल में सूर्य की पहली किरण (ऊषा) और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा) को अर्घ्य देकर दोनों का नमन किया जाता है। छठ देवी को सूर्य देव की बहन बताया जाता है। लेकिन छठ व्रत कथा के अनुसार छठ देवी ईश्वर की पुत्री देवसेना बताई गई हैं। देवसेना अपने परिचय में कहती हैं कि वह प्रकृति की मूल प्रवृति के छठवें अंश से उत्पन्न हुई हैं यही कारण है कि मुझे षष्ठी कहा जाता है। देवी कहती हैं यदि आप संतान प्राप्ति की कामना करते हैं तो मेरी विधिवत पूजा करें। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को करने का विधान बताया गया है। पौराणिक ग्रंथों में इस रामायण काल में भगवान श्री राम के अयोध्या आने के पश्चात माता सीता के साथ मिलकर कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्योपासना करने से भी जोड़ा जाता है, महाभारत काल में कुंती द्वारा विवाह से पूर्व सूर्योपासना से पुत्र की प्राप्ति से भी इसे जोड़ा जाता है। सतयुग में भगवान श्रीराम, द्वापर में दानवीर कर्ण और पांच पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने सूर्य की उपासना की थी। छठी मैया की पूजा से जुड़ी एक क​था राजा प्रियवंद की है, जिन्होंने सबसे पहले छठी मैया की पूजा की थी। 



नामकरण

छठ, षष्ठी का अपभ्रंश है। कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली मनाने के बाद मनाये जाने वाले इस चार दिवसीय व्रत की सबसे कठिन और महत्त्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी की होती है। कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी को यह व्रत मनाये जाने के कारण इसका नामकरण छठ व्रत पड़ा। छठ पूजा साल में दो बार होती है एक चैत मास में और दुसरा कार्तिक मास शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि, पंचमी तिथि, षष्ठी तिथि और सप्तमी तिथि तक मनाया जाता है. षष्ठी देवी माता को कात्यायनी माता के नाम से भी जाना जाता है। 

विधि 

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को नहाय खाय से शुरू होने वाले व्रत के दौरान छठव्रती स्नान एवं पूजा पाठ के बाद शुद्ध अरवा चावल, चने की दाल और कद्दू की सब्जी ग्रहण करते हैं। दूसरे दिन खरना होता है, इसके बाद शुरू होता है 36 घंटे का 'निर्जला व्रत'। छठ महापर्व के तीसरे दिन शाम को व्रती डूबते सूर्य की आराधना करते हैं और अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देते हैं। पूजा के चौथे दिन व्रतधारी उदीयमान सूर्य को दूसरा अर्घ्य समर्पित करते हैं। इसके पश्चात 36 घंटे का व्रत समाप्त होता है और व्रती अन्न जल ग्रहण करते हैं।


वैज्ञानिक महत्व 

छठ पर्व को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो षष्ठी तिथि (छठ) को एक विशेष खगोलीय परिवर्तन होता है, इस समय सूर्य की पराबैगनी किरणें (Ultra Violet Rays) पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं इस कारण इसके सम्भावित कुप्रभावों से मानव की यथासम्भव रक्षा करने का सामर्थ्य प्राप्त होता है। पर्व पालन से सूर्य (तारा) प्रकाश (पराबैगनी किरण) के हानिकारक प्रभाव से जीवों की रक्षा सम्भव है। पृथ्वी के जीवों को इससे बहुत लाभ मिलता है। सूर्य के प्रकाश के साथ उसकी पराबैगनी किरण भी चंद्रमा और पृथ्वी पर आती हैं। सूर्य का प्रकाश जब पृथ्वी पर पहुँचता है, तो पहले वायुमंडल मिलता है। वायुमंडल में प्रवेश करने पर उसे आयन मंडल मिलता है। पराबैगनी किरणों का उपयोग कर वायुमंडल अपने ऑक्सीजन तत्त्व को संश्लेषित कर उसे उसके एलोट्रोप ओजोन में बदल देता है। इस क्रिया द्वारा सूर्य की पराबैगनी किरणों का अधिकांश भाग पृथ्वी के वायुमंडल में ही अवशोषित हो जाता है। पृथ्वी की सतह पर केवल उसका नगण्य भाग ही पहुँच पाता है। सामान्य अवस्था में पृथ्वी की सतह पर पहुँचने वाली पराबैगनी किरण की मात्रा मनुष्यों या जीवों के सहन करने की सीमा में होती है। अत: सामान्य अवस्था में मनुष्यों पर उसका कोई विशेष हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि उस धूप द्वारा हानिकारक कीटाणु मर जाते हैं, जिससे मनुष्य या जीवन को लाभ होता है। छठ जैसी खगोलीय स्थिति (चंद्रमा और पृथ्वी के भ्रमण तलों की सम रेखा के दोनों छोरों पर) सूर्य की पराबैगनी किरणें कुछ चंद्र सतह से परावर्तित तथा कुछ गोलीय अपवर्तित होती हुई, पृथ्वी पर पुन: सामान्य से अधिक मात्रा में पहुँच जाती हैं। वायुमंडल के स्तरों से आवर्तित होती हुई, सूर्यास्त तथा सूर्योदय को यह और भी सघन हो जाती है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार यह घटना कार्तिक तथा चैत्र मास की अमावस्या के छ: दिन उपरान्त आती है। ज्योतिषीय गणना पर आधारित होने के कारण इसका नाम और कुछ नहीं, बल्कि छठ पर्व ही रखा गया है।

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पारिवारिक एकता की दृष्टि से महत्व

 - छठ सिर्फ आस्था का पर्व नहीं ये उस विश्वास का त्योहार है, जहां कमाने के लिए परदेस गए बेटों का मां इस दिन लौट आने का भरोसा रखती है। दिल्ली-मुंबई और कोलकाता समेत कई देशभर के महानगरों से भर-भर कर आने वाले ट्रेनें इस बात की हर बात गवाही देते हैं कि ये परिवारों को पास लाने का भी त्योहार है। घर के पुरुष और बच्चे सभी इस व्रत में शामिल होते हैं। कई बार पुरुष रसोई के काम यानी ठेकुआ से लेकर चाय बनाने का काम खुशी से करते हैं और खुद व्रत करते भी हैं। 




लैंगिक समानता वाला पर्व 

- त्यौहार के अनुष्ठान कठोर हैं और चार दिनों की अवधि में मनाए जाते हैं। इनमें पवित्र स्नान, उपवास और पीने के पानी (वृत्ता) से दूर रहना, लंबे समय तक पानी में खड़ा होना, और प्रसाद (प्रार्थना प्रसाद) और अर्घ्य देना शामिल है। परवातिन नामक मुख्य उपासक (संस्कृत पार्व से, जिसका मतलब 'अवसर' या 'त्यौहार') आमतौर पर महिलाएं होती हैं। हालांकि, बड़ी संख्या में पुरुष इस उत्सव का भी पालन करते हैं क्योंकि छठ लिंग-विशिष्ट त्यौहार नहीं है।  

सांझ के देबई अरघिया, और किछु मांगियो जरूर, पांचों पुत्र एक धिया (बेटी), धियवा मंगियो जरूर.। 

छठ के पारंपरिक गीतों में छठी माता से बेटी देने की प्रार्थना की जाती है. एक गीत जो बहुत लोकप्रिय है, उसके बोल है - 

रूनकी झुनकी बेटी मांगीला, पढ़ल पंडितवा दामाद, छठी मइया दर्शन दींही ना आपन. ( खेलती कूदती बेटी और पढ़ा लिखा दामाद चाहिए), 

इस बारे में बात करते हुए लोकगायिका चंदन तिवारी कहती हैं, "आप देखें हमारे यहां जब आशीर्वाद में कहा जाता है दूधो नहाओ पूतो फलो या फिर पुत्रवती भव. यानी बेटी की कामना कहीं नहीं है. लेकिन छठ में बेटी की भी कामना है और धनवान नहीं बल्कि पढ़े लिखे दामाद की कामना व्रती करती है।" इस महापर्व और स्त्रियों की भूमिका के बारे में हिंदू धर्म के जानकार पंडित रामदेव पाण्डे बताते हैं, "छठ के बारे में तो कहा ही जाता है कि इस व्रत को पहली बार सतयुग में राजा शर्याति की बेटी सुकन्या ने रखा था. इसलिए इसमें स्त्री स्वर की प्रधानता है. कोई ऐसा पर्व नहीं है जिसमें बेटी की कामना हो, छठ व्रत में ये कामना है. दुर्गापूजा में भी नारी की पूजा होती है लेकिन वहां बेटी की कामना नहीं है."छठ के गीतों में सभी तरह का काम करने वाले लोगों की बेटियों का जिक्र है. एक गीत के बोल है-

छोटी रे मोटी डोमिन बेटी के लामी लामी केश,

सुपवा ले आइहा रे डोमिन, अरघ के बेर

छोटी रे मोटी मालिन बेटी के लामी लामी केश,

फुलवा ले आइहा रे मलिन, अरघ के बेर …..

सामाजिक सौहार्द और समानता वाला पर्व 

इस पूजा में जातियों के आधार पर कहीं कोई भेदभाव नहीं है, समाज में सभी को बराबरी का दर्जा दिया गया है। सूर्य देवता को बांस के बने जिस सूप और डाले में रखकर प्रसाद अर्पित किया जाता है, उसे सामा‍जिक रूप से अत्‍यंत पिछड़ी जाति के लोग बनाते हैं। इससे सामाजिक संदेश एकदम स्‍पष्‍ट है।

बिहार तथा अन्य जगहों पर छठ का व्रत मुसलमान समुदाय के लोगों द्वारा भी किया जाता है। शास्त्रों से अलग यह जन सामान्य द्वारा अपने रीति-रिवाजों के रंगों में गढ़ी गयी उपासना पद्धति है। इसके केंद्र में वेद, पुराण जैसे धर्मग्रन्थ न होकर किसान और ग्रामीण जीवन है। इस व्रत के लिए न विशेष धन की आवश्यकता है न पुरोहित या गुरु के अभ्यर्थना की। जरूरत पड़ती है तो पास-पड़ोस के सहयोग की जो अपनी सेवा के लिए सहर्ष और कृतज्ञतापूर्वक प्रस्तुत रहता है। इस उत्सव के लिए जनता स्वयं अपने सामूहिक अभियान संगठित करती है। नगरों की सफाई, व्रतियों के गुजरने वाले रास्तों का प्रबन्धन, तालाब या नदी किनारे अर्घ्य दान की उपयुक्त व्यवस्था के लिए समाज सरकार के सहायता की राह नहीं देखता। इस उत्सव में खरना के उत्सव से लेकर अर्ध्यदान तक समाज की अनिवार्य उपस्थिति बनी रहती है। यह सामान्य और गरीब जनता के अपने दैनिक जीवन की मुश्किलों को भुलाकर सेवा-भाव और भक्ति-भाव से किये गये सामूहिक कर्म का विराट और भव्य प्रदर्शन है। यह अकेला त्योहार है जिसमें डूबते सूर्य की भी आराधना की जाती है।


पर्यावरण और कृषि की दृष्टि से महत्व

इस पूजा के बारे में हम यह भी कह सकते हैं कि “यह प्रकृति की प्राकृतिक ढंग से पूजा है” और यह एक ऐसी पूजा है जो कि पर्यावरण के अनुकूल भी है। इसमें जिन-जिन साधनों का उपयोग किया जाता है, वे ज़्यादातर बांस तथा मिट्टी के ही बने होते हैं। जैसे, बांस के बने सूप और दऊरा के साथ-साथ प्रसाद बनाने के लिए मिट्टी के बर्तन का उपयोग किया जाता हैं। अगर हम धर्म से हटकर भारत के स्थानीय और पारम्परिक त्यौहारों की बात करें तो यह पर्यावरण और संस्कृति के अनुकूल ही रहते हैं। किसानों और मिट्टी से जुड़ा है छठ महापर्व। छठ महा पर्व के केन्द्र में कृषि, मिट्टी और किसान रहते हैं। धरती से उपजी हुई सामयिक फसलें और फल-सब्जी ही इस व्रत के दौरान प्रसाद के रुप में चढ़ाई जाती है। स्वच्छ मिट्टी से बने चूल्हे पर और मिट्टी के बर्तन में नहाय-खाय, खरना और पूजा का  प्रसाद तैयार किया जाता है। प्रकृति की गोद में उपजे बांस से बने सूप में पूजन सामग्री रखकर अर्घ्य दिया जाता है। बांस का बना सूप, दौरा, टोकरी, मउनी तथा मिट्टी से बना दीप, चौमुखा व पंचमुखी दीया और कंद-मूल व फल जैसे ईख, सेव, केला, संतरा, नींबू, नारियल, अदरक, हल्दी, सूथनी, पानी फल सिंघाड़ा , चना, चावल (अक्षत), ठेकुआ जैसी छठ पूजा की सामग्रियां हमें प्रकृति से जोड़ती हैं। पुरानी परंपरागत वस्तुएं बिल्कुल बेकार नहीं हैं। छठ महापर्व के लिए ईंख, गागर नीबू, सुथनी, शरीफा कमरख, शकरकंद जैसे देसी फलों की जरुरत पड़ती है जो कि हमें स्ट्रॉबेरी, एप्पल,पाइनेपल, कीवी जैसे विदेशी फलों वाले जमाने में भी इन परंपरागत फलों और सब्जियों का स्वास्थ्यवर्द्धक महत्व समझाता है। 


अब तो ग्लोबल हो गया छठ 

सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका है और प्रवासी बिहारियों की भी। बिहारी अपनी संस्कृति को अपने साथ ले गये और अमेरिका से लन्दन तक छठ पूजा होने लगी। लन्दन में छठ गीत के वीडियो शूट होने लगे। छठ को लोकप्रिय बनाने में चम्पारण टॉकीज की बड़ी भूमिका है। शारदा सिन्हा की आवाज में पहिले - पहल हम कइलीं...गीत के वीडियो को इस कदर लोकप्रियता मिली कि अब बेजोड़ लगातार वीडियो ला रहा है। इस बार का वीडियो मैथिली में है। इससे हुआ यह है कि अश्लील और सस्ते गीतों को जनता ने नकारना शुरू किया और वे अपनी गुणवत्ता सुधारने के लिए विवश हो रहे हैं। छठ अब गरीब या मध्यमवर्गीय परिवारों तक सीमित नहीं रहा बल्कि अभिजात्य संस्कृति वाले भी इसे अपना रहे हैं और वह भी मूल परम्परा के साथ। कोरोना काल में पोखर को पुनर्जीवित करने की बात आयी तो घर में ही पोखर बनाने की बात भी। कहने का मतलब यह कि बिहार अब ग्लोबल दुनिया के साथ चलने लगा है। विदेशी बिहार में छठ कर रहे हैं। ईरानी महिला के छठ गीत का वीडियो वायरल हो रहा है...यही प्रमाण हैं।


छठी मइया को समर्पित निर्देशक व यशी फिल्म्स प्राइवेट लिमिटेड के कंटेंट हेड कुमार सौरव सिन्हा ने ब्रिटिश व भारतीय कलाकारों को लेकर छठ पूजा गीत ‘छठ पूजा इन लंदन’ के वीडियो की शूटिंग लंदन में किया है. निर्देशक सौरव सिन्हा ने विश्वस्तर पर भोजपुरी को नई पहचान इस छठ गीत से दिलाई है। छठ पूजा इन लंदन इस साल का सबसे महंगा छठ गीत है, जिसे यशी फिल्मस के ऑफिशियल यूट्यूब चैनल से रिलीज किया गया है और रिलीज होते ही यह खूब देखा जा रहा है। यह छठ गीत काफी मार्मिक और हृदय स्पर्शी है। इस वीडियो में ब्रिटिश अभिनेता सैमी जोनास हेनी नजर आ रहे हैं  जो विभिन्न हाई बजट फिल्मों जैसे वेलकम टू न्यूयॉर्क, हाई एंड यारियां में काम कर चुके हैं. परिणीति चोपड़ा अभिनीत उनकी आगामी नेटफ्लिक्स फिल्म ‘द गर्ल ऑन द ट्रेन’ है।

हमें यह समझना चाहिए कि छठ जैसे पारम्परिक पर्व समाज और पर्यावरण के लिए कितने ज़रुरी हैं। भारत भौगोलिक और सांस्कृतिक रुप से बहुत ही विभिन्नताओं वाला देश है। इसके हर भाग में अपने स्थान के आधार पर कुछ ना कुछ त्यौहार मनाए जाते हैं। ये त्यौहार वहां की ज़रूरतों के आधार पर होते हैं। आज भी भारत के आदिवासी इलाकों में वहां के लोग अपने आस-पास के प्राकृतिक स्थानीय घटकों की पूजा करते हैं। जैसे, जंगल में रहने वाले लोग अपने जंगल को देवता मानकर पूजा करते हैं। इसी तरह पहाड़ों के लोग पहाड़ो को पूजते हैं।

साभार तथा सन्दर्भ - वेबदुनिया, जी न्यूज, बीबीसी, प्रभात खबर, 



शनिवार, 21 नवंबर 2020

सरंचना चाहिये तो खर्च करिये, बहाने मत बनाइये




हम सब न बड़े कनफ़्यूज़ लोग हैं, वेतन ज्यादा से ज्यादा चाहिये, भत्तों में कमी बर्दाश्त नहीं, सुविधायें ए क्लास चाहिये, हमें स्टेटस की ऐसी लत लगी है की बजट न हो, तब भी कर्ज लेकर, खर्च कम करके बच्चों को महंगे निजी स्कूलों में पढ़ायेंगे मगर सरकारी स्कूलों को सुधारने पर ध्यान नहीं देंगे। अब जरा आपत्तिजनक बात करती हूँ। इनमें से कई गरीब और जरूरतमंदों को धरने देते समय ऐसी सिगरेट पीते देखी है, जिसका एक पैकेट ही 100-150 रुपये का आता होगा, हॉस्टल्स से शराब की बोतलें भी पकड़ी गईं हैं, आउटसाइडर आते हैं, पड़े भी रहते हैं, मैने ऐसे भी विद्यार्थी देखे हैं जो कड़े परिश्रम से पढ़ते और पढ़ाते हैं, नौकरी करते हैं, और अपने सपने पूरे करते हैं। हमें सरंचना चाहिये और 10 रुपये किराये में रहना है। इस देश में गरीब हैं मगर गरीबी बाधा नहीं बनती तभी यहाँ ए पी जे कलाम हुए जिन्होने अखबार बेचकर पढ़ाई की। अगर आप अपनी वेतन वृद्घि के लिए 40 साल इन्तजार नहीं कर सकते तो किसी संस्थान को इस कड़ी प्रतियोगिता और महंगाई के बीच क्यों फीस बढ़ाने के लिए इन्तजार करना चाहिये, क्या ये बेहतर नहीं होगा की विद्यार्थियो के लिए आंशिक कार्य की व्यव्स्था करनी चाहिये, 200-300 या 600 रुपये कोई इतनी बड़ी रकम नहीं है। जितनी सहानूभूति देने में शब्द खर्च किये जाते हैं, उतने शब्द आप इन बच्चों को काम देने में कर सकते हैं और अगर इसकी अवधि में थोड़ा लचीलापन हो तो यह पढ़ाई से बिल्कुल नहीं टकरायेगा। यकीं नहीं है तो माध्यमिक और उच्च माध्यमिक के नतीजे देख लीजिये, उच्च शिक्षा में तो स्थिति बेहतर है और राजनीति बक्श दे तो और बेहतर होगी।

हम अपने युवाओं को खैरात की लत न लगने दें तो ही बेहतर है। हमारी समस्या यह है की हमें अपने संस्थानों को विश्व के शीर्ष संस्थानों में देखना है। हमें नौकरी भी लाखों की चाहिये मगर फीस हम अंग्रेजों के जमाने की ही देंगे। मेरी समझ से यह गलत है। इस देश की बढ़ती आबादी और लाखों शिक्षण संस्थानों को उन्नत कर पाना किसी सरकार के लिए सम्भव नहीं है। खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश, राजस्थान जैसे बड़े राज्यों में तो और कठिन है। दरअसल, शिक्षा विरोधी सरकार नहीं है, हम खुद हैं जो चाहते ही नहीं की कई नियमों में जकड़े सरकारी संस्थान निजी संस्थानों के समकक्ष खड़े हो सकें। किसी के हाथ -पैर बाँधकर उसे रॉकेट उड़ाने के आदेश जैसा ही है यह। सरंचना चाहिये तो खर्च करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिये।
बाकी हिप्प्क्रेसी में तो डॉक्टरेट है ही
जरूरत की सही परिभाषा रखिये।
संस्थान की गरिमा को ताक पर रखने वालों से कोई हमदर्दी नहीं मेरी, सचित्र उदाहरण भरे पड़े हैं
सरंचना चाहिये तो खर्च करिये, बहाने मत बनाइये, सहानूभूति नहीं, बच्चों को आत्मनिर्भर बनाइये परजीवी नहीं
#जे एन यू समेत हर संस्थान के लिए#

 

भारत के पर्व सांस्कृतिक और आर्थिक चेतना का उल्लास हैं....समझिए



पर्व और त्योहार ,,,,हमारी सांस्कृतिक चेतना और आर्थिक प्रगति की आवश्यकता है। इनको निशाना बनाकर अपना उल्लू सीधा करना गलत है मगर हो यही रहा है। पशुओं में भी जीव है, कुत्तों में तो जान बसती है, गाय तो फिर भी काम की नहीं और बकरा भी, इनकी जान की कोई कीमत नहीं है। पशुओं से भी भेदभाव, कुत्ता क्लास बढ़ाता है, गाड़ियों में घूम सकता है, गाय का गोबर गन्दा है और अमेज़न ऑर्गेनिक होकर बिकता है, फिर भी गाय की सेवा करने वाले दकियानूसी हैं। कुत्ता आपसे सेवा करवाता है, आप भी उसका मल उठाते हैं मगर फिर भी आप अभिजात्य हैं, कई दर्जा ऊपर हैं
एक जगह पढ़ा था जानवर कहलाना इन्सान की अपमान लगता है, और शेर कहा जाये तो उछलता है, शेर में जानवर ही न या कोई अलग श्रेणी है। कुछ लोग तो इसलिये नाराज हो जाते हैं की कुत्ता को कुत्ता क्यों कहा, कुतिया को कुतिया क्यों कहा, अब ये न कहें तो क्या कहें। जब बिल्ली को बिल्ली, बैल को बैल कह सकते हैं तो भला कुत्ते को कुत्ता क्यों न कहें? क्या ये अन्य जानवरों से अन्याय नहीं है? कुत्ते को ज्यादा भाव देकर आप उसका तुष्टिकरण कर रहे हैं
वैसे गाय मरने के बाद भी खाल दे जाती है, वह दम्भी और पागल नहीं होती, कुत्ता पागल हो जाये तो काट खाता है, 14 इन्जेक्शन लेने पड़ते हैं और अन्त में खुद को बचाने के लिये आप ही उसे नगर पालिका को देते हैं या खुद गोली मार देते हैं।




पीछे मत पड़िए, हमले का जवाब जवाबी भी होता है, हम अगर बकरीद पर बकरों की जान बचाने लगे, नकली क्रिसमस ट्री के कारण होने वाले नुकसान बताने लगे जिसकी जरूरत है
और हमारे पास तो उत्सव के हजार तरीके हैं, आपके पास तो वो भी नहीं, तो जरा सोचिये, हमने भी इनके खिलाफ अभियान छेड़ा, मामला किया और एक दिन पहले खबर आये की ईद, बकरीद, क्रिसमस पर कोई खुशी नहीं मनायेगा। अरे। हाँ, कोरोना में चर्च या मस्जिद जाने से भी तो कोरोना फैलेगा, क्रिसमस के जश्न से भी तो फैलेगा, हमारे यहाँ नदियों को पूजा जाता है, छठ के बहाने घाट और दिवाली के कारण घर साफ होते हैं। हमारे यहाँ मिट्टी के दिये हैं। आपके क्रिसमस ट्री और हर सामान में प्लास्टिक, चमकीले कागज का उपयोग है,
सयाने बुद्धिजीवियों की बुद्धि सिगरेट और जाम के बगैर खुलती ही नहीं। गुरु और शिष्य, दोनों ही मैत्री भाव से इसका सेवन कहीं भी करते हैं, एबीपी ग्रुप से लेकर तमाम अखबारों में अश्लील तस्वीरें और टी 2 में हुक्के बार वाली तस्वीर छपती है, ये भी बताया जाता है की मिलेगा कहाँ, तो अब हम सब भी पीछे पड़ेंगे
प्रोपेगेंडा का जवाब भी उसी तरीके से दिया जायेगा। हम भी अपील करवाएंगे की लोग ईद और क्रिसमस न मनाएं, चर्च और मस्जिद न जाएं।बाजार में न जाएं। सिगरेट पीने वालों के खिलाफ भी हम अब खड़े होंगे, अब आप देखते रहिये।आपकी रैलियों पर रोक लगवाएंगे