रविवार, 30 अक्तूबर 2016

रक्षा क्षेत्र को मजबूत करने के लिए कृषि और हस्तशिल्प को हथियार बनाना होगा

स्वदेशी का नारा नया नहीं है मगर इस्तेमाल करने वाले की मनोभावना को समझना निर्भर करता है। पिछले कई साल से दिवाली के बाजार पर लिखती रही हूँ और हर बार चीनी लाइट, झालरों और दीयों की बढ़ती बादशाहत से परेशान भारतीय कारीगरों की परेशानी ही देखी है। यह बादशाहत उनके आत्मविश्वास को मारती आ रही है। ऐसा नहीं है कि ये दबदबा एक दिन या साल में खत्म होगा मगर चीन के प्रति गुस्सा हमारे कारीगरों के लिए संजीवनी बन रहा है। भले ही पीएमओ ने आधिकारिक तौर पर चीन के बहिष्कार की बात नहीं कही मगर स्वदेशी पर जोर देने का संदेश उन्होंने जरूर दिया है और उनकी लोकप्रियता ही है कि इसका असर भी पड़ रहा है। आज भी बहिष्कार को लेकर आम दुकानदार यही समझते हैं कि बहिष्कार करने को मोदी ने कहा है और इसे मानना चाहिए। इस पर राजनीतिक घटनाक्रम ने आग में घी डालने का काम किया। चीन ने जिस तरह से पाकिस्तान को खुुलकर समर्थन किया, एक आम भारतीय के लिए वह नाराजगी का कारण बना। इस पर एक अभियान चला एक दिया देश के सैनिक के नाम, और सोशल मीडिया पर इसका भरपूर प्रचार भी चला। इस बार की दिवाली कवरेज में यह गुस्सा भारतीय बाजार के लिए वरदान साबित हुआ और बाजार ने इसका फायदा भी उठाया। अब जो कारीगर भटक रहे हैं, उनको संगठित रूप देकर आगे लाने की तैयारी की जा रही है। जाहिर है कि मॉल तक आम कारीगर की पहुँच होती है तो उच्च वर्ग का धनी तबका जो गंदगी के कारण बस्तियों में जाकर हस्तशिल्प नहीं खरीद पाता, वह भी इन कारीगरों के सामान खरीदेगा क्योंंकि उसके पास पूँजी भी है और हस्तशिल्प अब स्टेटस का मामला है। स्वदेशी अब हीनता नहीं स्टेटस का मामला है और स्टेटस बाजार में पकड़ मजबूत बनाता है। बाजार में पकड़ मजबूूत होगी तो कारीगरों की स्थिति में सुधार होगा और उनकी गुणवत्ता में और भी सुधार होगा। अब स्वदेशी क्रांति को मॉल संस्कृति से जोड़ दिया जाए तो भारतीय हस्तशिल्प और संस्कृति दोनों वैश्विक स्तर पर मजबूत बनेंगे। इन दोनों के बीच पुल बनने का काम गैैर सरकारी संगठन तथा मीडिया बन सकते हैं। इस बार गौर करने वाली बात यह है कि महँगा होने के बावजूद लोगों ने भारतीय सामान खरीदा और यह कहकर खरीदा कि देश का पैसा देश में रहेगा। कई लोग ऐसे भी थे जिन्होंने यह स्वीकार किया कि हस्तशिल्प में मेहनत है और कारीगरों को इसकी कीमत मिलनी चाहिए। लोगों की इस सोच ने कारीगरों के आत्मविश्वास को बढ़ाया है और अब वे उत्साहित होकर चीन को टक्कर देेने के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं। जब वे यह कहते हैं कि ये चाइना का नहीं इंडिया का माल है, टूटेगा नहीं, तो वह आत्मविश्वास खुलकर दिखता है। अगर इस लहर को स्थायी बनाने में हमें सफलता मिलती है तो चीन के सस्ते माल का दबदबा टूटते देर नहीं लगेगी।

आज के समय की जरूरत है कि हस्तशिल्प के महत्व को उद्योग जगत समझे और सरकार के साथ इसे संगठित रूप देने में सहायता करे। अगर उद्योग जगत हस्तशिल्प को समर्थन देता है तो ये उनके लिए भी फायदे का सौदा है। कारीगरों की स्थिति सुधरने से गुणवत्ता में जोर सुधार होगा, वह देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में सहायक होगा। अर्थव्यवस्था मजबूत होगी तो हम सैनिकों की स्थिति को सुधार होगा और हम रक्षा क्षेत्र में अधिक खर्च करेंगे और हम मजबूत हुए तो विश्व में हमारा कद बढ़ेगा और तब एक चीन क्या दस चीन भी हमसे पंगा लेने से डरेंगे। इस बार के बहिष्कार का असर ऐसा पड़ा है कि ड्रैगन बौखलाकर निवेश कम करने की धमकी दे रहा है मगर वह ऐसा नहीं करेगा क्योंकि एफडीआई के कारण दूसरे देश उसका विकल्प बनने को तैयार हैं, अगर वह निवेश कम करता है तो नुकसान उसका है क्योंकि बहुत से देश भारतीय बाजार को लेकर उत्सुक हैं। भारतीय बाजार को कम आँकने का मतलब है कि वह अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारेगा। स्वदेशी क्रांति को मजबूत करने में सोशल मीडिया का महत्वपूर्ण योगदान है इसलिए इसका तो इस बार धन्यवाद करना चाहिए।। भारतीय कृषि और हस्तशिल्प को मजबूती देने का मतलब रक्षाक्षेत्र को मजबूत करना है इसलिए गो फॉर स्वदेशी।

रविवार, 16 अक्तूबर 2016

अब वो आसमान तोड़ रही है, काव्य सँग्रह के बहाने


बहरहाल किताब छप गयी और लोकार्पण भी हो चुका है। समीक्षा भी छप गयी है। ये सपना था मगर पूरा होगा इसकी कल्पना नहीं थी मगर सच की शुरुआत तो सपना ही होता है न। लोग कहते हैं कि मेरी कविताएं प्रतिवाद की कविताएं हैं, प्रतिरोध की कविताएं हैं, सच ही है तो बगैर प्रतिवाद के स्थिति बदली है कभी। 
सुख और उपलब्धियाँ थाली में परोसी हुई नहीं मिलतीं, उसे तो हासिल करना पड़ता है, कभी तोड़कर तो कभी टूटकर। इस टूटने की प्रक्रिया में भी मेरी कविताओं से कोई जुड़ जाए और फिर जोड़ने और बढ़ने की जिद उसमें पैदा हो तो लगेगा कि जो करना चाहती थी, कर दिया। ये भी कहा गया कि मैं नकारात्मक हूँ मगर सवाल तो ये भी है न कि जब तक आप गलत की पहचान नहीं करते, अच्छा स्थापित करना कठिन होता हैै। 
मेरी कविताएं खाए - पीए अघाए लोगों के लिए नहीं हैं बल्कि आर्तनाद और अनुभव से जुड़ी कविताएं हैं और जो नकारात्मक है, उसे सकारात्मक नहीं कह सकती और जब छीना जा रहा हो तो हँसी नहीं फूटेगी। जब इंसान जूझता है तो जीवन उसके लिए विमर्श नहीं सिर्फ संघर्ष होता। स्त्री मेरे लिए सिर्फ स्त्री है, किसी दायरे में कैद नहीं कर सकती।
अनुभव  तो यही सिखा गए कि अगर आपको कोई अनचाहा माने तो उसकी नजर में चाह पाने की जिद छोड़ दीजिए क्योंकि अगर आप ऐसा करते हैं या करती हैं तो खुद अपना अपना अपमान करती हैं और जो खुद से प्यार नहीं कर सकता, वह भला जिएगा कैसे और जीतेगा कैसेे। 
अगर मैं भागना न छोड़ती तो शायद किताब भी न होती क्योंकि सालों तक जो लिखा, वह मेरी डायरी के पन्ने ही तो हैं, जिनसे मैं बतियाती रही। मानती हूँ कि बड़ी नहीं हूँ पर मैं जो भी हूँ, जैैसी भी हूँ,मैं हूँ। इतना काफी रचने के लिए।