रविवार, 16 अक्तूबर 2016

अब वो आसमान तोड़ रही है, काव्य सँग्रह के बहाने


बहरहाल किताब छप गयी और लोकार्पण भी हो चुका है। समीक्षा भी छप गयी है। ये सपना था मगर पूरा होगा इसकी कल्पना नहीं थी मगर सच की शुरुआत तो सपना ही होता है न। लोग कहते हैं कि मेरी कविताएं प्रतिवाद की कविताएं हैं, प्रतिरोध की कविताएं हैं, सच ही है तो बगैर प्रतिवाद के स्थिति बदली है कभी। 
सुख और उपलब्धियाँ थाली में परोसी हुई नहीं मिलतीं, उसे तो हासिल करना पड़ता है, कभी तोड़कर तो कभी टूटकर। इस टूटने की प्रक्रिया में भी मेरी कविताओं से कोई जुड़ जाए और फिर जोड़ने और बढ़ने की जिद उसमें पैदा हो तो लगेगा कि जो करना चाहती थी, कर दिया। ये भी कहा गया कि मैं नकारात्मक हूँ मगर सवाल तो ये भी है न कि जब तक आप गलत की पहचान नहीं करते, अच्छा स्थापित करना कठिन होता हैै। 
मेरी कविताएं खाए - पीए अघाए लोगों के लिए नहीं हैं बल्कि आर्तनाद और अनुभव से जुड़ी कविताएं हैं और जो नकारात्मक है, उसे सकारात्मक नहीं कह सकती और जब छीना जा रहा हो तो हँसी नहीं फूटेगी। जब इंसान जूझता है तो जीवन उसके लिए विमर्श नहीं सिर्फ संघर्ष होता। स्त्री मेरे लिए सिर्फ स्त्री है, किसी दायरे में कैद नहीं कर सकती।
अनुभव  तो यही सिखा गए कि अगर आपको कोई अनचाहा माने तो उसकी नजर में चाह पाने की जिद छोड़ दीजिए क्योंकि अगर आप ऐसा करते हैं या करती हैं तो खुद अपना अपना अपमान करती हैं और जो खुद से प्यार नहीं कर सकता, वह भला जिएगा कैसे और जीतेगा कैसेे। 
अगर मैं भागना न छोड़ती तो शायद किताब भी न होती क्योंकि सालों तक जो लिखा, वह मेरी डायरी के पन्ने ही तो हैं, जिनसे मैं बतियाती रही। मानती हूँ कि बड़ी नहीं हूँ पर मैं जो भी हूँ, जैैसी भी हूँ,मैं हूँ। इतना काफी रचने के लिए। 

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