बुधवार, 23 मई 2018

दिल्ली का वह सफर जिसने अपनी सीमाओं को तोड़ना सिखाया


पुराने किले की सीढ़ियों पर
सफर कैसा भी हो बहुत कुछ सिखा जाता है और किसी सफर पर निकलना अपनी सीमाओं को तोड़ने जैसा ही होता है। वैसे काम के सिलसिले में कई बाहर बाहर निकली हूँ मगर हर बार बँधा - बँधाया ढर्रा रहता है और आस - पास लोगों की भीड़। वो जो एडवेंचर कहा जाता है...वह रहता जरूर है मगर कभी अपनी हिचक को तोड़ना मुमकिन नहीं हो सका था मगर इक्तफाक बहुत कुछ बदलता है जिन्दगी भी और सोचने का तरीका भी। विमेन इकोनॉमिक फोरम में जब शगुफ्ता को सम्मानित किए जाने की सूचना मिली तो उसने अपने साथ मेरे जाने की भी व्यवस्था कर दी थी मगर मुझमें हिचक थी।

हसीन इक्तिफाक थे
टिकट को रद्द भी करवाया मगर दिल्ली मुझे बुला रही थी तो इस बीच कविता कोश के मुक्तांगन कार्यक्रम में प्रसिद्ध कवियित्री रश्मि भारद्वाज माध्यम बन गयीं। बेहद स्नेहिल स्वभाव की रश्मि जी सम्बल देना भी जानती हैं। उनके माध्यम से और कवि जयशंकर प्रसाद की प्रेरणा को लेकर लिखे गए आलेख ने अकस्मात दिल्ली यात्रा की भूमिका लिख दी। 2016 में दिल्ली पहली बार गयी थी और देश भर की महिला पत्रकारों के साथ बीते उन लम्हों ने कुछ अच्छे दोस्त भी दिये मगर घूमना न हो पाया था। ये दोनों कार्यक्रम 4-5 दिनों के अंतराल पर थे तो मेरे हाथ में 4 दिन का वक्त था। 2 मई तक तो मैं शगुफ्ता के साथ होटल पर्सना इंटरनेशनल में ठहरने वाली थी मगर इसके बाद...?
सम्मान और प्रमाण पत्र


तैयारी तो शुरू हो गयी
इस सफर की खूबसूरती इस बात में थी कि इस सफर को भी मैंने चुना था और इसके इंतजाम भी खुद किये थे। सिद्धार्थ की मदद से फ्लाइट बुक करवा ली तो अब रहने के लिए जगह देखनी थी। पहले द्वारिका सोचा क्योंकि मुक्तांगन का कार्यक्रम स्थल बिजवासन और हवाई अड्डा दोनों नजदीक थे मगर बाद में पता चला कि वह दिल्ली का न्यूटाउन है इसलिए कोई फायदा नहीं है। मित्र चंचल ने सलाह दी कि चाणक्यपुरी या आर के पुरम जैसे इलाके सही रहेंगे। माधवी (माधवी श्री) दी की सलाह पर यूथ होस्टल में डोरमेटरी और सस्ते कमरे भी देखे मगर वहाँ पहले से बुकिंग सम्भव नहीं थी और डोरमेटरी क्या होती है...मुझे यह भी पता नहीं था। दिल्ली में बंग भवन के बारे में जानती थी मगर कोई खास जानकारी नहीं थी। ऐसी स्थिति में तारणहार मेरे मित्र तथा सलाम दुनिया के सम्पादक संतोष बने और उन्होंने बंग भवन में भगत जी से परिचय करवा दिया और बात बन गयी। आनन - फानन में बुकिंग हो गयी..इत्मिनान मिला।

चलो, हवा से करें चंद बातें

दिल्ली की फ्लाइट 30 अप्रैल को थी...सुबह की। अपने शहर से शिकायतें भले ही कितनी भी हों मगर जब उसे छोड़कर जाना होता है तो मोह बढ़ जाता है और दूसरे शहर में जाकर वह इश्क बन जाता है। सुबह की खाली सड़कें और अँगड़ाई लेता मेरा कोलकाता....। ऊफ...जिन्दगी से भरा...मैं बहुत याद करने वाली थी अपना शहर। हवाई अड्डे पर शगुफ्ता से मुलाकात हुई। हम फ्लाइट में बैठे और हवा से बातें शुरू हो गयीं।

मम्मा मुझे प्लेन उड़ाना है

मेरी आगे सी सीट पर तूफान एक्सप्रेस थी....वह एक छोटी बच्ची थी जिसने यात्रा को अपनी शरारतों और बातों से बोरिंग होने से बचा दिया। मम्मी का हाथ पकड़ती और पूछती --मम्मा, मैं यहाँ क्यों बैठी हूँ, मुझे प्लेन उड़ाना है तो दूसरी ओर जहाज के ऊपर -नीचे करने के क्रम में अपनी माँ का हाथ उसने कसकर पकड़ लिया...3 साल की बच्ची और वह जोर - जोर से माँ का हाथ पकड़े रही....मैं तुम्हारे बगैर कैसे रहूँगी....बच्चे कितना सोचते हैं। हम दिल्ली पहुँचे तो उस बच्ची के साथ तस्वीर भी खिंचवा ली...वह सचमुच बहुत प्यारी थी।


हुमायूँ के मकबरे में

और...वह हुमायूँ में किसी और की तलाश

शगुफ्ता ने मेरी मुलाकात शुशा से करवायी...एक एक आजाद ख्याल...बेबाक और हँसमुख शख्सियत...वह आपको उदास नहीं रहने देगी। उससे मिलकर  हम होटल की ओर जा रहे थे और दिल्ली की कड़ी धूप से घबराए बगैर हमने तय किया कि दो दिन में जितनी जगहें देख सकते हैं...देखेंगे...तो हुमायूँ का मकबरा सामने था। हम दोनों कार से उतर पड़े...कड़ी धूप थी और लोग कम थे...। दिल्ली में लोग शायद धूप में निकलना कम पसन्द करते हैं मगर हमको कब धूप की परवाह थी और मेरी छतरी तो मेरे पास ही थी। टिकट काउंटर पर अव्यवस्था थी। बाद में आने वाले लोग पहले टिकट कटवाकर जा रहे थे। खैर टिकट तो लिया हमने और हम अन्दर गये...महीन पच्चीकारी देखी...मकबरे के ऊपर फानूस या झालर  कभी हुआ करती होगी...अब नहीं है। अफसोस यह है कि लोग घूमने आते हैं...तस्वीरें खिंचवाते हैं मगर इतिहास कुछ कहना चाहता है...वह आवाज कोई नहीं सुनता। मकबरे को और भी अधिक संरक्षण की जरूरत है और उससे भी अधिक कद्र की...। पुरातत्व विभाग अकेले कुछ नहीं कर सकता जब तक कि हम ध्यान न दें।

दिल्ली में तो सूरज भी देर तक रुकता है
साइबा जी के साथ
होटल पहुँचकर....थोड़ा आराम किया...इसके बाद दिल्ली देखने का कार्यक्रम था। इस बीच फेसबुक की मदद से साइबा जी से भी मिलना हो गया और इसके बाद थोड़ा आराम कर हम पहुँचे क्नाट प्लेस मगर ज्यादा घूमना नहीं हो पाया। करोलबाग के फुटपाथ पर लगने वाला बाजार कहीं अधिक बेहतर लगा। इससे भी मजेदार बात यह लगी कि दिल्ली में सूरज लगभग 7 बजे अस्त होता है। शाम के 6.30 बजे कोलकाता भले अन्धेरे में डूब जाए, दिल्ली रोशन रहती है। दिल्ली की लाइफ लाइन मेट्रो है और ऑटो भी, बसें कम चलती हैं तो ऑटो वालों की चाँदी तो है। यहाँ कोलकाता की तरह आप 10 - 20 और 25 रुपये में सफर नहीं कर सकते..यहाँ ऑटो का किराया 30 और 40 से लेकर 150 रुपये तक हो सकता है और अगर आप मोल - भाव करते हैं तो सीधे सुन सकते हैं - बैठना हो तो बैठो वरना उतर जाए...यह हमने भी सुना।

1 मई

होटल की दीवारों पर कबीर से एक मुलाकात
कबीर दिखे

1 मई को द्वारका के ताज में विमेन इकोनॉमिक फोरम का सम्मेलन था। शगुफ्ता को सम्मानित किया गया और मैंने हौसला अफजाई की और साथ ही मैंने होटल की खूबसूरती देखी मगर सबसे अधिक तसल्ली होटल की दीवारों पर कबीर को देखकर मिली। एक दीवार पर कबीर के दोहे बड़ी खूबसूरती से सजाये गये थे। जीवन भर शहंशाहों को दुत्कारने वाले कबीर क्या सोचते होंगे खुद इन निर्जीव दीवारों पर देखकर?   साहित्य भला किसी की सम्पत्ति थोड़े न है...और किसने कहा कि अमीरों के घरों में साहित्य नहीं जा सकता बल्कि कबीर का होना मुझे आश्वस्त कर गया। इसके बाद हम गुरुग्राम पहुँचे जो दिल्ली के एक दूसरे छोर पर ही है और किनारे पर अत्याधुनिक शहर की ऊँची - ऊँची इमारतों को देखते हुए हम आ भी गये। हम शाम को होटल से ही सरोजिनी मार्केट गये...और यहाँ सामान बेचने का अन्दाज भी निराला था चोरी का माल खुले चौराहे में....कोलकाता के ओबेराय के पास इस तरह की आवाजें आप भी सुन सकते हैं। 

ताज द्वारिका में हम

2 मई

जामा मस्जिद और पराठे वाली गली

होटल की गाड़ी जो ली थी .उसके ड्राइवर थे जोगिंदर जी और उनको ही हमने कहा था कि पुरानी दिल्ली में हमें क्या देखना था। दिल्ली में लोग काम से मतलब रखते हैं मगर उनका रवैया आप पर निर्भर करता है। ड्राइवर चचा ने बताया कि आज से 25 साल पहले दिल्ली की आबादी इतनी नहीं थी...। सुबह 11 बजे हम जामा मस्जिद में थे। बगैर पंखे के यहाँ से झरोखों से आ रही ठंडी हवाओं ने हमें भी ताजा कर दिया और मस्जिद से बाहर झाँकने पर दिखता है मीना बाजार....। इसका भी अपना इतिहास है। मस्जिद में शरीर को ढकना अनिवार्य है तो बाहर ही आपको चोगे देने के लिए लोग तैयार मिलेंगे मगर सूर्यास्त के बाद यहाँ महिलाओं को जाने की अनुमति नहीं है...धर्म के नाम पर होने वाला एक और भेदभाव मन खट्टा कर गया।
शगुफ्ता के साथ जामा मस्जिद में

लाल किले से गुजरते हुए

उस जगह पर खड़ा होना जहाँ से देश के प्रधानमंत्री जनता को सम्बोधित करते हों और शान से तिरंगा लहरा रहा हो, एक अजीब सा रोमांच भर देता है। लाल किला जाते समय ही रास्ते में ड्राइवर चाचा ने सावधान किया था और उन्होंने एक रिक्शे वाले से मोल भाव करवाने में भी मदद की। रिक्शे पर बैठते ही पहली नसीहत सामान और बैग सहेजकर रखने की नसीहत मिली। किले के बाहर विशाल प्राचीर को देखते हुए गुजरना एक अद्भुत अनुभव था। बाहर से आने वाले हर व्यक्ति को शायद ऐसा ही महसूस होता होगा मगर दिल्ली वालों के लिए यह आम बात है। किले में बिजले के तार बिछाए जा रहे हैं मगर संरक्षण पर कितना किसका ध्यान जाता है, ये सोचने वाली बात है।
लाल किला परिसर में

 ऐसा नहीं है कि किले पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। दूसरी जगहों की तुलना में इसकी स्थिति बेहतर है मगर बहुत सी चीजें आपको सँग्रहालय से गायब भी मिलेंगी..दीवारों के प्लास्टर उखड़े और भग्न दीवारें तो हर ऐतिहासिक इमारत की परेशानी है। सबसे कड़ी सुरक्षा व्यवस्था लाल किले में ही है और इसकी एक वाजिब वजह भी है। लाल किले से गुजरते हुए आपको दोनों और कलाकृतियों का बाजार मिलेगा...दिल्ली में लाल किेले को डालमिया समूह को देने की चर्चा है और लोग इससे बहुत ज्यादा खुश नहीं हैं। कल्पना कीजिए कि लाल किले पर लिखा नजर आए डालमिया सीमेंट प्रेजेंट्स...पर ये भी कहा जा रहा है कि ऐसा नहीं है क्योंकि कम्पनी सिर्फ रख - रखाव करेगी।

पराठों की खुशबू और स्वाद
जामा मस्जिद के सामने ही लाल किला है और इनके बीच में है शानदार और बेहद खास पराठे वाली गली जहाँ आपके लिए थाली में कम से कम 2 पराठे लेना अनिवार्य है और हमने भी पराठों का लुत्फ जमकर उठाया। दोपहर के 3 बज चुके थे और घूमते - घूमते भूख लग गयी थी तो हमने भी छककर खाया। इस गली में कभी 14 - 15 दुकानें हुआ करती थीं मगर अब 4 दुकानें ही रह गयी हैं। आस - पास जरी या अन्य चीजों की दुकानें हैं मगर आप आते हैं तो खुशबू पराठों के देसी घी की ही खींचती है। यहाँ के बिजेंदर कुमार बताते हैं कि कभी यह दरीबा खुर्दा नामक गाँव हुआ करता था और गली 15वीं से 16वीं सदी की है जो मुगलों ने बसाई थी।
पराठे वाली गली के पराठे

अपने ही लख्ते जिगर से खबरदार ये शहर
पुरानी दिल्ली को लेकर नयी दिल्ली के ख्याल बहुत अच्छे नहीं हैं। एक ही शहर के दो अलहदा चेहरे और हमें मिली हिदायत -पुरानी दिल्ली है, सामान सम्भालकर रखें। यहाँ गरीबी है तो अपराध भी है। आपको हर कदम पर लोग समझाते हैं कि पुरानी दिल्ली में सम्भलकर रहने की जरूरत है...ये हिदायत एक तरफ अपने ही शहर के प्रति सोच का पता देती है तो ख्याल रखने वाले एक दिल का एहसास भी दे जाता है पर यह किला देखने के लिए मुझे 3 दिन देने पड़े तो अगले दो दिनों का किस्सा भी आगे ही आने वाला है।

अपना बंगाल.....अपना बंग भवन
हेली रोड पर स्थित बंग भवन आना अपने घर आने जैसा है। 2 मई शाम 4 बजे मैं बंग भवन पहुँची। अब शगुफ्ता के जाने के बाद इस यात्रा पर अब मुझे खुद निकलना था और खुद ही देखना था। इतिहास से मुझे प्यार है और प्राचीन भारत की हर बात खींचती है। पता नहीं क्यों पहले दिन ही पुराने किले में जाकर अजीब सा खिंचाव महसूस किया और यही खिंचाव था कि इस किले को देखने 3 बार गयी और क्या पता फिर जाऊँ। बंग भवन में मेरा कमरा (जो कि डोरमेटरी था) 701था। थकी थी तो नींद आ गयी और रात को दो दक्षिण भारतीय महिलाओं ने दरवाजा खुलवाया जो बस रात गुजारने के लिए ही पहुँची थी।
हेली रोड स्थित बंग भवन


 इनमें एक हैदराबाद की थी तो दूसरी विजयवाड़ा की। रात को बंग भवन की कैंटीन में लुची व आलूदम खाया। मैंने सरल हिन्दी और थोड़ी अँग्रेजी में बात की से एक महिला हिन्दी समझती थी और मैंने भी हिन्दी में ही बात की मगर उसके साथ जो दूसरी महिला थी...उसने हिन्दी की समझ होते हुए भी जब अँग्रेजी में बात करने को कहा तो मैंने असमर्थता जता दी और बता दिया कि वह हिन्दी नहीं जानतीं तो मेरी अँग्रेजी भी अच्छी नहीं है। इसके बाद वह कुछ नहीं बोलीं और हम खिचड़ी भाषा में ही बात करते रहे। सुबह तक तक हम गप भी मारने लगे थे।

3 मई

दिल्ली के जिगर में हरियाली का टुकड़ा और वैशाली के रास्ते
दिल्ली जाने के बाद मुझे माधवी दी से मिलना था क्योंकि उनसे बगैर मिले दिल्ली का सफर अधूरा रहता है तो उनसे बात की। बंग भवन में भगत जी से मिली और वे परम हँसमुख व्यक्ति हैं। अपने घर से दूर होने पर घर की आहट भी अच्छी लगती है, यही स्थिति हर जगह है। यहाँ लोग अपने दिल में अपना घर बचाकर रखते हैं और घर की याद दिलाने वाला मिल जाए तो बात ही क्या है। बंग भवन के लोगों में भी कुछ ऐसा ही है और बांग्ला में बात करना मेरे लिए और भी अच्छा ही रहा। बंग भवन की व्यवस्था न सिर्फ किफायती है बल्कि बहुत अच्छी है। मुझे यहाँ की चाय बहुत पसन्द आयी। यहाँ के करोलबाग बाजार  में आपको सीबीआई के नाम पर ठगी करने वालों से बचने और महिलाओं का सम्मान करने की सलाह आपको लाउडस्पीकर पर हर दो कदम पर मिलेगी...कोलकाता में अब तक यह नहीं देखा।
माधवी दी के साथ लोदी गार्डेन में

चाय पीकर ही मैं निकली और और माधवी दी से मिलने चल पड़ी। हम चिन्मय मिशन के विशाल प्राँगण में मिले और यहाँ से लोदी गार्डेन चले आए जो बेहद खूबसूरत और विशाल है मगर हालत वही है। कहीं - कहीं गंदगी भी भी दिखी और मकबरों के बीच वक्त को चुराते युवा भी दिखे। माधवी दी ने महिला प्रेस क्लब की चाय पिलायी और नाश्ता भी करवा दिया।   मैं दिल्ली आयी थी और मुझे रश्मि जी से भी मिलना था जो हिन्दी की वरिष्ठ कवियित्री हैं और मुझे दिल्ली तक ले जाने का बड़ा कारण भी उनकी वजह से बना था। माधवी दी से मिलकर उनकी सलाह पर मेट्रो से राजीव चौक आयी और फिर वहाँ से वैशाली की मेट्रो पकड़ी। दिल्ली की मेट्रो में खुद ही टिकट खरीदने की सुविधा है और उससे भी अच्छी बात यह है कि यह हिन्दी में भी उपलब्ध है, सच्ची मन खुश हो गया। मेट्रो से ही दिल्ली दर्शन करके वैशाली उतरी और ऑटो के बाद रिक्शे से भटकते - भटकते उनके बताए पते पर गयी मगर इस बीच रास्ते भर रास्ता पूछना पड़ा।
रश्मि जी और  माही के साथ

 दिल्ली का उपनगरीय रूप है यह। रश्मि जी की बेटी माही बेहद प्यारी है और उनके मृदु स्वभाव ने मेरी थकान दूर कर दी। उनके फ्राइड राइस का स्वाद तो अब भी जुबान पर है। वहाँ से उनके बताने पर प्रगति मैदान तक की मेट्रो ली कि किले का सँग्रहालय भी देख डालूँ मगर जब तक गयी वह बंद हो चुका था। वहाँ के कर्मचारियों की सलाह पर अन्दर तक गयी जहाँ खुदाई चल रही थी...अन्दर तक और अधिकारियों से बातें कर एक - दो तस्वीरें लीं।

4 मई
राष्ट्रपति भवन, संसद और सँग्रहालय से होकर और इंडिया गेट के रास्ते
सुबह की चाय के बाद राष्ट्रपति भवन देखने निकल पड़ी और यह अद्भुत अनुभव था। सीढ़ियों को छुआ तो जाने क्यों आँखें छलक पड़ी...इस अनुभूति को अभिव्यक्त करना आसान नहीं है। वहीं पर एक परिवार को कहकर तस्वीर खिंचवा ली और यहीं पर मिले अनिल जी जो विदेश मंत्रालय के लिए गाड़ियाँ देते हैं। वह हर जगह रास्ता पूछकर ही निकाल रही थी और मुझे सँग्रहालय देखना था।
राष्ट्रपति भवन की सीढ़ियों पर

अनिल जी ने मुझे बिटिया का संबोधन दिया और पूछा कि कैसे जाऊँगी..मैंने कहा कि पैदल या ऑटो से निकलूँगी। पता नहीं उनके मन में क्या आया, उन्होंने अपनी गाड़ी से मुझे सँग्रहालय तक भी छोड़ दिया। दोपहर 2.15 तक मुझे संसद परिसर देखने पहुँचना था।
राष्ट्रीय सँग्रहालय परिसर में

मित्र चंचल ने व्यवस्था कर रखी थी...थोड़ी सी परेशानी के बाद मोबाइल जमा किया और भीतर घूमकर सब देखा। यह अलग बात है कि मेरे सवालों और मेरी जिज्ञासा ने सबको परेशान किया। यहाँ से निकलकर मैं बहुत थक गयी थी बाहर विशाल उद्यान में बैठ गयी और वहाँ बैठे पत्रकार बंधुओं से भी मेरा परिचय हो गया।
इसके बाद शाम को इंडिया गेट  पहुँची।  लाल किले की तरह आपको यहाँ पर भी तस्वीरें खींचने को लोग मिलेंगे। किनारों पर छोटा - मोटा बाजार भी है। वहाँ से फिर एक बार सरोजिनी मार्केट पहुँचीं।   थोड़ी सी खरीददारी कर वापस अपनी डोरमेटरी। दिल्ली की सड़कों पर पैदल यात्रियों को पहले जाने की सुविधा मिलती है और इस निर्देश का पालन भी सब करते हैं।
इंडिया गेट

5 मई

उग्रसेन की बावली...बंगाली मार्केट और इस्कॉन की शांति से गुजरना

हेली रोड के पास ही ऐतिहासिक उग्रसेन की बावली है जहाँ कभी पानी सहेजकर रखा जाता होगा। उसे देखा और उसके बाद मुझे द्वारिकाधीश मंदिर देखना था। उसका पता नहीं चला मगर इस्कॉन मंदिर को देखा। गजब का स्थापत्य और सुकून देने वाली शांति मगर बाजार तो यहाँ भी है। वस्त्रों से लेकर प्रसाद तक और एक रेस्तरां भी है। इस्कॉन मंदिर का गोविन्दा रेस्तरां यहाँ भी प्रसिद्ध है। यहाँ से फिर मेट्रो पकड़ी और पहुँची अक्षरक्षाम मंदिर जहाँ मेट्रो स्टेशन ही इसी नाम से है। हर दूसरा रिक्शा आपको मंदिर तक पहुँचाने के लिए तैयार रहता है। यहाँ भी घुटने के ऊपर के वस्त्रों पर रोक है। एक कन्या को तो मेरे सामने ही कमर से नीचे ढकने के लिए वस्त्र दिए गए। गजब  का स्थापत्य और उससे भी मजबूत सुरक्षा....मतलब छोटा -मोटा शहर ही है।  संसद की तरह ही मंदिर में मोबाइल ले जाने की इजाजत नहीं है और न ही कोई सामान। तपती दोपहर में खाली पैर चलना भी परीक्षा की तरह था मगर वह भी पार हुआ। यहाँ से वापस  से पुराने किले की अधूरी कहानी को पूरा करने निकल पड़ी और इस बार आखिरकार सँग्रहालय देखा।
इस्कॉन मंदिर

वो बर्तन भी देखे जो महाभारतकालीन बताये जा रहे हैं मगर सच कहूँ इस पौराणिक व ऐतिहासिक धरोहर को जितना मान मिलना चाहिए, वह नहीं मिल रहा है और दिल्ली की तमाम धरोहरों में यह जगह सबसे अधिक उपेक्षित है। यहाँ लोग इतिहास के मोह में न के बराबर जाते हैं और अधिकतर लोगों के लिए यह रति स्थल है...ये दुःखद है। खैर पुराने किले के बाहर मुझे वही बच्ची मिली जिससे मैंने फूल खरीदे और इंडिया गेट के पास जो पॉपकॉर्न खरीदे थे...वह उसे पैसों के साथ थमा दिये। उसकी आँखों में जो उल्सास था, वह करुणा भरी सुन्दरता लिए हुए था। यहाँ से एक बार फिर चाँदनी आयी और पराठों के साथ थोड़ा मीठा भी खरीदा। अगले दिन की तैयारी भी करनी थी इसलिए लौट आयी।

6 मई
कलात्मक संस्कृति में लिपटा साहित्य का मुक्तांगन

रविवार को दोपहर 12 बजे मैंने बंग भवन से प्रस्थान किया। भगत जी ने ओला बुक करवा दी। सब पता नहीं क्यों एक भावनात्मक लगाव से जुड़ गए थे। मैंने पानी भरने की जगह पूछी तो बोतल भी भर दी गयी..यह बहुत सुखद था।
बंग भवन और भगत जी

अब मैं बिजवासन की राह पर थी..और वहाँ कुछ जल्दी ही पहुँची जहाँ जाना था। कविता कोश का मुक्तांगन एक कैनवस की तरह है जिस पर आपको खूबसूरत तस्वीरों सी सजी दीवारें ही नहीं बल्कि हर एक फर्नीचर भी दिखता है। मन मोहने वाली जगह थी और उससे भी स्नेहिल लोग...जिनको मैं नहीं जानती थी, वे भी इतने प्रेम से मिले जैसे न जाने कब से जानते हों।
मुक्तांगन परिसर

 मेरी समझ में नहीं आ रहा था मगर रश्मि जी जैसे सब समझ रही थीं। उन्होंने न सिर्फ परिचय करवाया बल्कि मेरी फ्लाइट को देखते हुए कार्यक्रम में भी फेरबदल की। गीताश्री जी का नाम सुना था, उनको देखा भी और उनके साहित्यिक प्रसंगों में छिपे हास्य पर हँसी भी क्योंकि वह इस अंदाज में सुनातीं कि आप हँसे बगैर रह नहीं सकते। प्रज्ञा जी से मिली और अर्चना वर्मा जी के हाथों सम्मानित होना एक उपलब्धि बन गया।
आराधना जी के साथ

पँखुरी जी से मिलना न हो पाया था, यहाँ उनसे भी मुलाकात हो गयी। इन सब के बीच में आराधना जी जिस सहृदयता से सारी व्यवस्था देख रही थीं...वह अद्भुत था। मुक्तांगन के लोग और इंटिरियर के साथ वहाँ के समोसे और जलेबियाँ भी बेहद स्वादिष्ट थे।
सम्मान पाना सुखद अनुभव और उपलब्धि बना

मैंने कविता पढ़ी और मुझे अफसोस रहेगा कि मुझे बीच से ही निकलना पड़ा। तस्वीरें भी हुईं और अंत में मुझे समय से पहले एयरपोर्ट पहुँचा दिया गया...सच में ऐसे अनुभव कम होते हैं और 2018 मई की दिल्ली यात्रा मेरे सुखद अनुभवों में शामिल हो चुकी है।

अपना शहर...अपनी सड़कें...गलियाँ और अपना घर

शाम 6.30 बजे की फ्लाइट थी और यह फ्लाइट समय के पहले कोलकाता पहुँची। मेरा शहर मेरे सामने था...यहाँ कोई हड़बड़ी नहीं थी...सब आराम से हो रहा था। प्रीपेड टैक्सी बुक करवाकर लौटी..और एक सप्ताह के बाद वापस घर आ चुकी थी मगर दिल्ली की यादें मुक्तांगन से मिले प्रमाणपत्र और शील्ड के रूप में कमरे में सज चुके हैं...शुक्रिया मुक्तांगन....शुक्रिया रश्मि जी...शुक्रिया आराधना जी...शुक्रिया दिल्ली।

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