रविवार, 22 मार्च 2015

हो सकता है कि जो लिखने जा रही हूँ वह बहुतों को नागवार गुजरे, यह भी कहा जा सकता है कि कुछ नियम ही ऐसे हैं मगर नियम जब आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाने लगे, तब ऐसा ही  होता है, कहकर खुद को समझाना बहुत कठिन होता है, कुछ पेशेवर तकाजा भी है और हो सकता है कि यह दूतावासों से लेकर हवाई अड़्ों की संस्कृति हो। बात अमेरिकन सेंटर की हो रही है, जहाँ कई सालों से आना जाना होता रहा है। सुरक्षा के लिए जाँच भी तकाजा है, यह भी स्वीकार कर लिया जाए इसका तरीका बाध्य कर देता है कि यह सोचा जाए कि क्या हम अपने ही देश में हैं। और हाँ, तो दूसरों के बनाए नियम हम पर क्यों लागू होंगे। जाँच के नाम पर आपका सामान बिखेरकर तलाशी लेना, और फिर आपको आपको पानी पीने को बाध्य करना, अनचाहे ही शक का दायरा खड़ा करता है। सवाल यह है कि विदेशों में तो हमारे पूर्व राष्ट्रपति से लेकर अभिनेताओं तक को तलाशी के नाम पर अपमान सहना   पड़ा है तो फिर मैं क्यों शिकायत कर रही हूँ। वैसे क्या बराक ओबामा को भी भारत आने पर  तलाशी देनी पड़ी होगी। हद तो तब हो जाती है जब कई बार आपको असमय दवा खाने को कह दिया जाता है। बात विश्वास की है और जब विश्वास न हो तो ढोंग नहीं करना चाहिए। एक ओर भारत और अमेरिका के रिश्ते मजबूत करने की दुहाई दी जाती है और दूसरी ओर तलाशी के नाम पर संदिग्ध बनाया जा रहा है। अपने ही देश में कम से कम इस सम्मान के हकदार तो हैं कि बुलाया जाए तो विश्वास भी किया जाए। गाँधी ने आंदोलन किया, नमक कानून तोड़ा, उसके पहले दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजों के कानून तोड़े, तो उनको यह सब  नहीं करना चाहिए था क्यों कि देश पर शासन तो अंग्रेजों का था, उन्होंने विरोध किया मगर हम वह भी नहीं करेंगे क्योंकि हम भारतीय हैं और एक भारतीय होने के नाते यह नागवार गुजरा। मुझे लगता है कि जलियावाला बाग हत्याकांड के लिए जनरल डायर के साथ वे भारतीय सिपाही भी जिम्मेदार थे जिन्होंने गोलियाँ चलायीं। सुरक्षा लिए जाँच से आपत्ति नहीं है मगर सुरक्षा की जाँच के नाम पर अपमान पर आपत्ति जरूर है। बापू को अब दक्षिण अफ्रीका की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि भारत में ही अमरीका, ब्रिटेन औऱ अफ्रीका, तीनों आ गये हैं। क्या करूँ, उनके नियम ही ऐसे हैं

रविवार, 8 मार्च 2015

महिला सशक्तीकरण का मतलब पुुरुषों का नहीं उस पितृसत्तात्मकता का विरोध करना है जो परंपरा के नाम पर स्त्रियों को कमतर समझकर उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित रखती है। कहने को स्त्री और पुरुष समाज के दो पहिए हैं मगर स्त्री वह पहिया है जिसे जिम्मेदारियों के नाम पर घिसा तो गया मगर अधिकारों का तेल नहीं लगने दिया गया। जो लोग परदा प्रथा और देवी बनाकर स्त्री से आज भी मध्ययुगीन सभ्यता में जीने की उम्मीद रखते हैं, जो स्त्री को उपभोग की सामग्री मानकर उस पर अधिकार जताते हैं, दहेज या प्रेम में ठुकराए जाने पर उस पर तेजाब फेंकते है और बलात्कार या हिंसा को लड़कियों की नियति मानते हैं उनसे ही यह सवाल है, क्या आप शादी के नाम पर अपनी ससुराल को दहेज देना पसंद करेंगे, और वहां रहना पसंद करेंगे। कैेसे लगेगा जब दहेज के साथ आपको वह तमाम काम करने पड़ेे जो आपकी पत्नी करती है। क्या करेंगे जब धोखेबाजी की शिकार कोई प्रेमिका आपके चेहरे पर तेजाब फेंके। क्या होगा जब यौन हिंसा की घटनाएं आपके साथ हों। घर की इज्जत के नाम पर लड़कियों की जान लेने वालों को कैसा लगेगा जब ऐसी घटिया हरकतों के लिए लड़कियां हिंसक हो उठें, लड़कों की पढ़ाई या नौकरी छुड़वाकर घर पर बैठाया जाए। नौकरी करने वाली कई महिलाएं अपने बच्चों केे लिए घर पर बैठ जाती हैं, क्या कोई पुरुष अपनी पत्नी के लिए नौकरी छोड़ सकता है। जो बात आपलोगोों के लिए बुरी है, वह हमारे लिए अच्छी कैसे हो सकती है,, आखिर अपराध करने वालों से बहनों का भी अपमान होता है, जरा सोचिए ऐसे अपराधियों के घर की स्त्रियों पर क्या गुजरती होगी। आप अपने घर की लड़कियों को इज्जत समझते हैं तो दूसरे घर की लड़कियों का सम्मान आपका सम्मान क्यों नहीं है। जो पुरुष वाकई पहलेे महिलाओं का सम्मान करें, स्वीकृति दें तो महिला दिवस मनाएं वरना हमें पाखंड की जरूरत नहीं है, बख्श दीजिए हमें।