हिन्दी मेला...नयी पीढ़ी का मंच और हम सबका ऑक्सीजन



बस एक साल और पूरे 25 साल हो जाएंगे....हिन्दी मेले को। पहली बार आई तो प्रतिभागी के रूप में...सेठ सूरजमल जालान गर्ल्स कॉलेज में स्नातक की छात्रा थी और अब बतौर पत्रकार 15 साल होने जा रहे हैं और 20 साल हो रहे हैं मेले से जुड़े हुए। इन 20 सालों में उतार चढ़ाव भी देखे मगर मेला और मेला परिवार हमेशा साथ रहा। सही है कि आज बहुत से लोग जा चुके हैं मगर मेला कल भी मिलवाता था और आज भी मिलवाता आ रहा है...मेले का तो काम ही यही है। 
हमारे समय की बड़ी चुनौतियाँ भाषा और अपसंस्कृति तो है ही मगर उससे भी बड़ी चुनौती है युवाओं के साथ तमाम पीढ़ी को एक सृजनात्मक तथा संगठनात्मक राह पर लाना...मैं अपनी बात करूँ तो जब मेले में पहली बार आई तो ऐसे मोड़ पर थी जहाँ कोई राह नहीं सूझ रही थी..बहुत कुछ कहना था...बहुत कुछ करना था मगर कुछ भी समझ नहीं आ रहा था...कई बार ऐसे मोड़ भी आये....जहाँ लगा कि हर रास्ता बंद हो चुका है...निराश हुई मगर हारी नहीं तो इसके पीछे यह एक मंच था जिसने साहित्य को किताबों से निकालकर जीवन से जोड़ा। हिन्दी मेला ऐसी जगह है जिसने कभी किसी रिप्लेस नहीं किया, कभी अजनबी नहीं बनाया, कभी किसी को बाँधा नहीं और बगैर भेद भाव के सबकी बातें सुनीं और अपनाया।
मतभेद हुए मगर मनभेद नहीं बल्कि सब एक दूसरे की जरूरत में खड़े रहे...तमाम दिक्कतों और मतभेदों के बावजूद...परिवार इसे ही तो कहते हैं न। पत्रकारिता में जब मैं आयी तो स्पष्ट तौर पर कह सकती हूँ कि साहित्य को बेहद उपेक्षा से देखा जाता था...साहित्यिक विज्ञप्तियों की जगह कचरे के डब्बे में होती थी...साहित्यिक खबरें न के बराबर होती थीं और साहित्य का मतलब कहानियाँ भर होता था। कई बार मुझे कहा जाता कि साहित्य पढ़ने वाले अच्छे पत्रकार नहीं हो सकते क्योंकि वे संवेदनशील होते हैं और संवेदना के लिए अखबारों की खबरों में जगह नहीं होती...जाहिर है कि यह एक भी संघर्ष था। इस पर ये भी सच है कि ऐसे अखबार कम बेहद कम थे। अधिकतर अखबारों और मीडिया के बड़े  वर्ग का सहयोग हिन्दी मेले को मिला है। फिर भी जद्दोजहद और उपेक्षा के बीच पूरा एक दशक गुजरा और ऐसे मे हिन्दी मेला और मिशन मेरा ऑक्सीजन बने रहे और मेरी संवेदना और जीजिविषा अगर जिन्दा भी है तो इसका श्रेय हिन्दी मेले को जाता है। 

 अपनापन ही हिन्दी मेले  की संस्कृति है। आपको यहाँ भले ही तामझाम न मिले...बहुते ज्यादा सुविधाएं भी न मिलें मगर जो लगाव और अपनापन मिलेगा....वह आपको ऑक्सीजन देता है....मुझे भी मिला। हिन्दी मेले ने ऐसा परिवार दिया है जो तमाम शिकवे शिकायतों के बीच आपको एक अपनेपन की मिठास देता है...आपकी सृजनात्मकता को मंच देता है। 

सर, राजेश भइया, ऋतेश भइया....मनोज भइया..ममता.....कितने नाम लूँ.....जगह कम पड़ जाएगी....। एक ऐसी जगह जो अपरिचित को भी परिचित बनाती है....जहाँ छोटे से छोटा और नये से नया व्यक्ति भी अपनी बात रख सकता है और सबसे अच्छी बात कि उसे न सिर्फ सुना जाता है बल्कि जरूरत पड़े तो अपनाया भी जाता है। आज संवेदनशीलता ने मेरी कलम को मजबूत बनाया है क्योंकि वह सोच सकती है...उपेक्षाओं के बीच लड़ने और जीतने की जिद भी हिन्दी मेले से मिली है...अभिव्यक्तिगत स्वतंत्रता युवाओं की ही नहीं सबकी जरूरत है। वो यहाँ मिलती है। 

एक ऐसा उत्सव जो कोलकाता के पूरे साहित्यिक जगत को एक छत के नीचे ला देता है...मरुस्थल में हरीतिमा जैसा है। यहाँ छोटों की बात सुनी जाती है तो बड़ों को भी सम्मान मिलता है... अखबार जब प्रमुखता से मेले की खबरों को स्थान देते हैं तो अजीब सा संतोष मिलता है। मेले ने हर कार्यक्षेत्र को प्रतिभाएं दी हैं और वे हर जगह अपनी छाप छोड़ रहे हैं। पत्रकारिता तो है ही मगर हमारी एक अटूट पहचान य़ह है कि हम हिन्दी मेले से बोल रहे हैं और यह पहचान काफी है। मीडिया और सांस्कृतिक जगत में बगैर मान्यताप्राप्त पत्रकारों के लिए जगह तो है मगर पहचान नहीं...हिन्दी मेले की ओर से दिया जाने वाला पत्रकारिता, शिक्षा और नाट्य सम्मान इस कमी को पूरा करता है। 

लगभग 20 साल तो हो रहे हैं मगर समाज को एक स्वस्थ और संवेदनात्मक वातावरण देना है तो ऐसे एक नहीं कई मेलों की जरूरत है। कम से कम इस मुहिम को मजबूत बनाना समय की ही नहीं हमारी भी जरूरत है....आइए न हाथ बढ़ाएं। जो जा चुके हैं....एक बार फिर लौटें....अपना मेला तो अपना ही है न तो आइए एक बार.....फिर अपनी जड़ों की ओर...

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