सोमवार, 20 अगस्त 2018

खौफनाक गुजरा अगस्त 2018, ‘अजातशत्रु’ अटल संग गये सोमनाथ व करुणानिधि


सुषमा त्रिपाठी

सोमनाथ चटर्जी और लालकृष्ण आडवाड़ी के साथ

क्या खोया, क्या पाया जग में
मिलते और बिछुड़ते मग में
मुझे किसी से नहीं शिकायत
यद्यपि छला गया पग-पग में
एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें!

ये अगस्त खौफनाक गुजरा....और अगस्त का यह सप्ताह भारतीय राजनीति का युगान्त साबित हुआ। देश ने एक के बाद, एक नहीं तीन दिग्गज नेताओं को खोया। गत 7 अगस्त को पहले करुणानिधि और फिर गत 13 अगस्त को पूर्व लोकसभाध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी गये। देश इस सदमे से उबर भी नहीं पाया कि स्वतन्त्रता दिवस के अगले दिन गत 16 अगस्त को ही युगपुरुष अटल बिहारी वाजपेयी ने भी इस भौतिक जगत से नाता तोड़ लिया। हम शोक सन्तप्त हैं, निःशब्द हैं और रह - रहकर इतिहास अपने पन्ने पलट रहा है। हम भी पीछे मुड़कर देख रहे हैं...वह मैत्रीभाव...जिस पर न पार्टी की राजनीति हावी हो सकी और न विचारधाराओं की विभिन्नता बल्कि वहाँ तो नजर आती है परस्पर आदर की भावना..। भाजपा के वरिष्ठ नेता वाजपेयी पहली बार 1996 में 13 दिनों के लिए, 1998 में 13 महीने और फिर 1999 से 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। वाजपेयी 1991, 1996, 1998, 1999 और 2004 में लखनऊ से लोकसभा सांसद रहे हैं। वाजपेयी बतौर प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा करने वाले पहले और अब तक के एकमात्र गैर-कांग्रेसी नेता रहे हैं। केन्द्र में मोदी सरकार के आने के बाद वाजपेयी को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया।
अगर सोमनाथ चटर्जी की बात करें तो उनकी उदारता, उनकी विद्वता हमेशा याद की जाती रहेगी। सोमनाथ चटर्जी ने अपनी ही पार्टी में अपनी उपेक्षा अंत समय तक सही मगर अटल जी को उनकी पार्टी से सदैव सम्मान मिला। सम्मान की पराकाष्ठा इसके अधिक क्या होगी कि उनकी अंतिम यात्रा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उनके पीछे पैदल चले...दरअसल, यह प्रधानमंत्री का सौजन्य और अपने गुरु के प्रति आदर तो है मगर इससे भी अधिक वाजपेयी जी का उदात्त, उदार और विराट व्यक्तित्व है जिसने उनको ‘अजातशत्रु’ बना दिया। इस अजातशत्रु के सामने देश नतमस्तक है जिसने राजनीति को सौजन्य का शिखर दिया...जिनकी गर्जना ने पाकिस्तान को दहला दिया। वे ‘एक नहीं, दो नहीं करो बीसों समझौते’ कविता में दहाड़ते हैं - ‘धमकी, जेहाद के नारों से, हथियारों से/कश्मीर कभी हथिया लोगे, यह मत समझो/हमलों से, अत्याचारों से, संहारों से/भारत का भाल झुका लोगे, यह मत समझो।’ 


पूर्व लोकसभाध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी और वाजपेयी जी के सम्बन्ध बड़े गहरे थे। सोमनाथ चटर्जी वामपन्थी विचारधारा के थे लेकिन विपरीत धुरी कहलाने वाली भाजपा नेता व पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से उनके बेहतर सम्बन्ध थे, तभी तो एक बार 2002 में पद से इस्तीफा देने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने उनका हाथ पकड़कर इस्तीफा न देने की गुजारिश की थी। वहीं 2008 में सोमनाथ चटर्जी लोकसभा में अपना प्रोटोकॉल को तोड़ते हुए अटल बिहारी वाजपेयी के आने पर अपनी कुर्सी से खड़े हो गए। आज की सियासत में असमान विचारधाराओं के नेताओं के बीच न तो ऐसा सौजन्य दिखता है और न ही ऐसी मैत्री दिखती है। दोनों नेताओं के साथ संयोग था कि दोनों 10 बार सांसद रहे और दोनों 1984 के चुनाव में हारे भी। आपातकाल के दौरान जब सोमनाथ चटर्जी ने अपना पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए विदेश मंत्रालय में जमा कराया तो उन्हें पासपोर्ट वापस नहीं किया गया। इस पर चटर्जी ने विदेश जाने के लिए पश्‍चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्घार्थशंकर राय से कई बार गुहार लगाई लेकिन बात नहीं बनी। 1977 में सत्ता परिवर्तन के बाद जब वाजपेयी विदेश मंत्री बने तो सोमनाथ चटर्जी ने उन्हें आपबीती बतायी। इस पर विदेश मंत्रालय का अधिकारी उसी शाम को सोमनाथ चटर्जी के घर पर पासपोर्ट लेकर पहुँच गया। इन दोनों नेताओं की मित्रता का एक और प्रसंग आता है। 2002 के गोधराकांड पर 2005 में लोकसभा में जमकर हंगामा हुआ। तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने गोधरा कांड के लिए संघ को जिम्मेदार ठहराया। इस पर वाजपेयी कुछ बोलना चाहते थे लेकिन लालू बार-बार उन्हें टोक रहे थे। इससे नाराज चटर्जी ने कहा कि वाजपेयी के भाषण के बीच में टोका-टोकी न की जाए।  अटल जी की दृढ़ता देखिए कि वे गुजरात के तत्कालीन सीएम और अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को उनका राजधर्म याद दिलाने से नहीं चूके।
बहुत कम लोग जानते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने पिता के साथ कानून की पढ़ाई की थी। उन्होंने कानपुर के डीएवी कॉलेज से कानून में डिग्री की इच्छा अपने पिता से जताई थी, जिसके बाद उनके पिता ने भी अपने बेटे के साथ कानून की डिग्री के लिए दाखिला लिया। यहाँ तक कि कानून के छात्र के रूप में पिता-पुत्र एक साथ एक सत्र के दौरान एक ही हॉस्टल के एक कमरे में रहे। वाजपेयी जी की निष्पक्षता और उनका दृढ़ संकल्प पोखरण विस्फोट के बाद लगी आर्थिक पाबंदियों के बीच उनके अडिग रवैये से मिलता है। 11 और 13 मई 1998 को पोखरण में पाँच भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट करके अटल बिहारी वाजपेयी जी ने भारत को परमाणु शक्ति सम्पन्न देश घोषित कर दिया। इन तमाम आर्थिक प्रतिबन्धों से उबरकर विरासत में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक आर्थिक रूप से सुदृढ़ भारत ही दिया। पोखरण के बाद जब भारत को प्रतिबंधित करने की कोशिशें हुई तब भी चट्टान बने रहे। उन्हों खुद ही लिखा भी-‘दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते/ टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते।’

महाकवि नीरज और अटल जी 
कवि नीरज

यह बरबस नही बल्कि बड़ी शिद्दत से एक नाम उभरता है पंडित गोपालदास नीरज का। इस महाकवि और अटल विहारी वाजपेयी की कुंडली के सभी ग्रह एक ही जैसे रहे हैं। सिर्फ चन्द्रमा का अंतर रहा है। नीरज जी इस को लेकर कई बार चर्चा किया करते थे। यह इत्तफाक ही है कि नीरज जी ने भी अपनी अनन्त की यात्रा अभी अभी हाल ही में गत 19 जुलाई को शुरू की है। कुछ ही दिन बीते हैं। आज अटल जी उसी अनन्त यात्रा पर निकल पड़े। ये दोनों ही ऐसे यात्री हैं जिनकी संवेदना और रचना शक्ति बराबर की कही जाती रही। राजनीति में होकर भी अटल जी और नीरज जी ने एक साथ मंचों पर कविताएं पढ़ीं और खूब फाकामस्ती भी की। दोनों के संघर्ष के दिन एक जैसे रहे लेकिन जब समय आया तो दोनों की स्वरलहरी लालकिले से भी गूँजी।
अगर बात करुणानिधि की करें तो सोमनाथ चटर्जी जैसा सम्बन्ध वाजपेयी जी का करुणानिधि से नहीं है। वैसे करुणानिधि का मूल्यांकन करते समय उनके सारे पक्षों को देखना होगा। हालांकि राष्ट्रीय राजनीति से सम्पर्क होने के साथ उनका आक्रामक तमिलवाद कम से कम सार्वजनिक स्तर पर मद्धिम पड़ा। राजीव गाँधी सरकार के खिलाफ अभियान चलाने के भी वे सहभागी बने। 1989 में वी पी सिंह सरकार गठित कराने में उनकी मुख्य भूमिका थी। यहां से उनकी राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका आंरभ हुई और इसका असर उन पर अवश्य हुआ। 1996 की संयुक्त मोर्चा सरकार में द्रमुक के नेता मंत्री बने। फिर 1999 में जयललिता की अटलबिहारी वाजपेयी सरकार से समर्थन वापसी के बाद हुए चुनाव में उन्होंने भाजपा की मदद की तथा राजग सरकार में उनके सांसद मंत्री बने। अगर करुणानिधि की राजनीतिक विचारधारा को देखें तो इसे बहुत बड़ा बदलाव कहा जा सकता है। द्रमुक एक ऐसी पार्टी के नेतृत्व में सरकार में शामिल हुई जो उसकी विचारधारा के हमेशा विरुद्ध रही। जनसंघ से लेकर भाजपा न केवल हिंदुत्व के विचारों पर आधारित थी, बल्कि आर्य -द्रविड़ बँटवारे का हमेशा विरोध करती रही और हिन्दी को राजभाषा बनाने की समर्थक भी थी। इसे आप बदलाव कहिए या केन्द्रीय सत्ता में आने का अवसरवाद मगर इसे वाजपेयी जी के राजनीतिक कौशल के रूप में देखा जा सकता है कि गठबन्धन सरकार को उन्होंने 13 दिन और 13 माह की विफलता के बाद तीसरी बार पूरी तरह चलाया। 
करुणानिधि के साथ अटल जी


हालाँकि बाद में भाजपा से करुणानिधि का मतभेद हुआ एवं यूपीए के गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। 2014 तक सरकार में रहते हुए उनका आक्रामक तमिलवाद का स्वर कभी देखने को नहीं मिला। 
बच्चों की तरह मनमौजी, खाने - पाने के शौकीन रात को 2 बजे भी चिउडा और ठंडई के लिए पहुँच जाते थे। ग्वालियर के फालका बाजार स्थित नमकीन व्यवसायी सुन्नूलाल गुप्ता ‘बेडर’ की दुकान पर वे स्पेशल चिवड़ा खाने आते थे। सुन्नूलाल बताते हैं कि ‘एक बार अटलजी विदेश मंत्री रहते हुए चुनावी सभा के सिलसिले में ग्वालियर आए थे। उनके लिए चिउडा (नमकीन) तैयार करना था। चूंकि अटलजी की सारी सभाएं देर से चल रही थीं, इसलिए मैंने सोचा कि शायद आज वह ग्वालियर नहीं आएंगे और मैं दुकान बंद करके छत पर सो गया। इसी बीच, रात के 2 बजे पुलिस की गाड़ियाँ सायरन बजाती हुईं मेरी दुकान के आगे आकर रुक गयीं। जब मैं नीचे उतरा तो उन्हीं गाड़ियों के बीच एक कार में से केन्द्रीय मंत्री अटलजी उतरे और बोले- ‘मैं हूँ अटल बिहारी, चिवड़ा तैयार है ?’ अटलजी को देखकर मेरे शरीर में स्फूर्ति आ गई और मैं झट से तैयार होकर दुकान के नीचे पहुँच गया। तत्काल स्पेशल मेवों का चिवड़ा तैयार कर उन्हें दे दिया। उन्होंने मुझे मूल्य से ज्यादा पैसे दिए। ऐसा कभी नहीं हुआ कि अटल जी ने ज्यादा पैसे नहीं दिए हों।’ अटलजी जब भी मथुरा आते तो वहाँ चौक बाजार के मूँग की दाल के पकौड़े जरूर खाते। चाइनीज और फिल्मों के शौकीन तो सोमनाथ चटर्जी को आजीवन फुटबॉल से लगाव रहा। जाने कितने किस्से, जाने कितनी यादें छोड़ गयी यह त्रयी। समय गुजरेगा, इतिहास करवट लेगा मगर  एक खालीपन और एक रीतापन हमेशा रहेगा। खुद वाजपेयी जी के शब्दों में -सूर्य तो फिर भी उगेगा/ धूप तो फिर भी खिलेगी/ लेकिन मेरी बगीची की/ हरी-हरी दूब पर/ ओस की बूँद/हर मौसम में नहीं मिलेगी। फिर भी काल के कपाल पर लिखने वाले अटल जी एक उम्मीद हैं, एक प्रेरणा हैं मगर मौत भला स्मृतियों से कैसे जीत सकती है। यादें हैं और विश्‍वास है क्योंकि बकौल अटल जी - 
मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, 
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल का नहीं।

(सलाम दुनिया में 19 अगस्त को प्रकाशित आलेख)

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