शुक्रवार, 17 मई 2019

ध्वज के एक रंग नहीं, तीन रंग चाहिए...एक रंग केसरिया भी है

श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा पर कालिख पोती गयी

इन दिनों बंगाल में लोकतंत्र की हवा बह रही है। हर कोई यहाँ लोकतंत्र का रक्षक बना हुआ है और लोकतंत्र की रक्षा का मतलब है यहाँ पर भगवा को रोकना और भाजपा को न आने देना। इसके लिए लोकतंत्र के तथाकथित समर्थक कुछ भी करने को तैयार हैं, किसी से भी हाथ मिलाने को तैयार हैं और कुछ भी भूलने को तैयार हैं। लोकतंत्र का मतलब होता है कि हर किसी का अधिकार है कि वह भारत के किसी भी राज्य में रहे और जब बात राजनीति की आती है तो हर एक राजनीतिक दल को प्रचार का, जनता तक पहुँचने का और अपनी बात रखने का अधिकार है। एक समय था जब हम वाममोर्चा सरकार की आलोचना इसलिए करते थे कि यह पार्टी हिंसा के बल पर वोट पाती आ रही थी। जब चुनाव प्रचार के समय पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की हत्या हुई सारा देश शोक में डूबा। जब गौरी लंकेश की हत्या हुई...बिलबिलाकर सारे प्रबुद्ध सोशल मीडिया पर टूट पड़े, रोहित वेमुला का शोक अब तक मनाया जा रहा है मगर इस चुनाव में छत्तीसगढ़ और कश्मीर में 2 भाजपा और एक आरएसएस नेता की हत्या कर दी गयी, कहीं कोई सुगबुगाहट तक नहीं हुई। 22 साल के सुदीप्त गुप्त की जान गयी, कोई फर्क नहीं पड़ा। आसिफा के लिए देश आँसू बहाने वाले भूल गये कि इसी राज्य में मध्यमग्राम में एक किशोरी के साथ 2 बार बलात्कार हुआ और प्रताड़ना से तंग आकर उसने जान दे दी, बिहार के रहने वाले टैक्सी चालक पिता ने तो राज्य ही छोड़ दिया...शोर हुआ और सजा भी मिली  मगर राष्ट्रीय मुद्दा नहीं बना...पता है, इन सब का कसूर क्या था....इनका खून हरा नहीं था...।
याद कीजिए कि उस समय खुद ममता बनर्जी केन्द्रीय वाहिनी चाहती थीं और आज जब सरकार इनकी है तो वही केन्द्रीय वाहिनी बाधक है। ये वही ममता बनर्जी हैं जिन्होंने तापसी मलिक की जली हुई लाश की तस्वीरें दिखाकर सहानुभूति की लहर हासिल की थीं, जिन्दा तो जिन्दा, इन्होंने एक बच्ची की मौत का फायदा उठाया।
हमारे महापुरुष किसी एक राज्य या पार्टी के रंग के मोहताज नहीं

ये वहीं ममता बनर्जी हैं जिन्होंने अपने कार्यकाल में हुए पार्क स्ट्रीट बलात्कार कांड को साजानो घटना बताया...और जब एक काबिल अपसर ने इस मामले की तह तक जाकर जाँच की तो उनको पद से हटा दिया...जी हाँ, मैं दमयन्ती सेन की ही बात कह रही हूँ। यूपी, बिहार व झारखंड के लोग इनको कभी नहीं सुहाए, वोट बैंक की मजबूरी न होती तो ये हिन्दीभाषियों को टिकट तक नहीं देतीं और आज हिन्दीभाषियों का एक धड़ा...इनको महामहिम मानने में जुटा है...खैर हिन्दीवालों को तो किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता, बिहार और भोजपुरी के नाम पर दुकानें चलाने वाले भी चुप बैठे हैं..डर से या किसी लालच से...। जो महिला खुद मुख्यमंत्री होकर एक भ्रष्टाचारी पुलिस अधिकारी को बचाने के लिए धरने पर बैठ जाती है...वह लोकतंत्र की रक्षा कैसे करती हैं...ये तो आप ही जानते हैं...हम नहीं जानते।
अनुदान और ओहदा बड़ी चीजें होती हैं। पाठ्यक्रम में इन्द्रधनुष के लिए प्रयुक्त बांग्ला शब्द में राम होने के कारण उसे बदल दिया गया और उसे रंग बना दिया गया...सिंगुर आन्दोलन को तो अब पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया है...। स्थिति यह है कि आज नन्दीग्राम और सिंगुर के लोग खुद कहते हैं कि उनको ठगा गया है मगर अन्धभक्तों को यह बात समझ नहीं आएगी। यदि बंगाल में लोकतंत्र है तो सबको इस बात की आजादी होनी चाहिए कि वह अपने तरीके से अपना जीवन जीए मगर बंगाल में क्या ऐसा है...? कौन सा लोकतंत्र ये इजाजत देता है कि कोई दल किसी राज्य में नहीं आ सकता। जब हर सभा के बाद भाजपा समर्थकों की हत्या कर पेड़ से लटकाया गया तो लोकतंत्र खतरे में नहीं पड़ा। जब मोहम्मद सलीम से लेकर बाबुल सुप्रियो तक की गाड़ी में तोड़फोड़ की गयी...तब भी लोकतंत्र खतरे में नहीं पड़ा। जब श्यामा प्रसाद की मुखर्जी की प्रतिमा को तोड़ा गया और कालिख लगायी गयी तब बंगाली अस्मिता खतरे में नहीं पड़ी थी और न ही बंगाली समाज को फर्क पड़ा था..मगर आज विद्यासागर को बंगाली अस्मिता का प्रतीक बताया जा रहा है जो शायद खुद वे भी नहीं चाहते। इसके पहले भी नेताजी, नेहरु जी की प्रतिमाओं को निशाना इसी बंगाल में बनाया गया मगर त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति के गिरने पर हाहाकार मचाने वालों को यह सब नहीं दिखता। ये लोग तब भी मौन रहे जब टीएमसीपी के गुंडों ने तीन साल पहले सीयू में प्रोफेसरों पर हाथ उठाया और उनके कपड़े फाड़े...मैं खुद उस समय थी वहाँ पर इसलिए ये नजारा मेरी नजर के सामने आज भी आ जाता है। इनके मुँह में तब भी दही जमा रहा जब मी़डियाकर्मियों को इनकी लोकतांत्रिक सरकार ने पिटवाया।   महापुरुषों का सम्मान भी क्या पार्टी का रंग देखकर तय होता है? कहते हैं कि कविगुरु रवीन्द्रनाथ की मानवता ही उनका दर्शन है, ये कौन सा मानवतावाद है जो अभिजात्यता के दम्भ में देश के दूसरे हिस्सों से आए लोगों पर हँसने की इजाजत देता है और उनको निकाल बाहर करने को उकसाता है? आपकी संस्कृति को तब खतरा क्यों नहीं पहुँचा जब प्रेसिडेंसी में वीसी की मेज पर अर्न्तवस्त्र पहनकर विद्यार्थियों ने प्रदर्शन किया...इसमें कौन सी शालीनता नजर आती है..इसका उत्तर तो मुझे हिन्दी समाज से भी चाहिए और भद्रलोक कहे जाने वाले बुद्धिजीवियों से भी। आपकी आत्मा को तब कष्ट क्यों नहीं पहुँचा जब तापस पाल ने खुद को चन्दननगर का माल बताकर विरोधियों के घरों में घुसकर स्त्रियों का बलात्कार कहने की बात कही। आपकी भुजाएँ तब क्यों नहीं फड़कतीं जब अनुब्रत जैसे लोग हिंसा की धमकी नकुलदाना खिलाकर देने की बात कहते हैं? इस राज्य में तो राहुल गाँधी तक का हेलिकॉप्टर नहीं उतरने दिया गया...अमित शाह, मोदी और योगी क्या अब इस राज्य में पासपोर्ट लेकर आएंगे? बंगाल के मनीषी...इस देश का गौरव हैं, अपनी तिजोरियों में बंद करना छोड़िए...आपको यह अधिकार ही नहीं है...और वे आपकी सम्पत्ति नहीं हैं।
नेहरु जी को कैसे भूल गये आप


आखिर क्या कारण है कि हिन्दी माध्यम स्कूलों के बच्चे बांग्ला से अनूदित पाठ्यपुस्तकें पढ़ने को विवश रहे और आपके उदार शिक्षा जगत में किसी को आपत्ति नहीं हुई। कितने शिक्षाविद् और बुद्धिजीवी इसे लेकर जागरुक हुए। अब बात विद्यासागर जी की प्रतिमा की...पहले तो लोकतंत्र में सबको प्रचार का अधिकार है तो फिर अमित शाह से आपको परेशानी क्यों है? अगर आपकी जमीन इतनी पुख्ता है तो एक रोड शो या सभा से आपका क्या बिगड़ने वाला है, वह आते और चले जाते? चलिए मान लिया कि लोकतंत्र में विरोध का भी अधिकार है, काले झंडे दिखाने पर भी आपत्ति नहीं है मगर ये रोड शो की शुरुआत में आपने क्यों नहीं दिखाए...जब वे बंगाल में उतरे तब क्यों नहीं दिखाए..? आखिर हमला किसकी तरफ से हुआ...उकसाया किसने और शाम को 7 बजे इतने विद्यार्थी कॉलेज में या सीयू के पास कर क्या रहे थे...सीसीटीवी डेढ़ माह से खराब है तो बनवाया क्यों नहीं गया...आपने जो जगह चुनी और जो तरीका चुना..वह बताता है कि दाल में काला नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली थी...सब जानते हैं कि विद्यासागर से स्वामी विवेकानन्द का घर बस कुछ कदम की दूरी पर है..दरअसल, आपकी मंशा ही यही थी कि रोड शो के दौरान विरोध के नाम पर कुछ ऐसा करना है कि न सिर्फ इसमें खलल पड़े बल्कि भाजपा को बदनाम भी किया जा सके और आपने यह काम सफलतापूर्वक किया है।
विद्यासागर की मूर्ति पर हमला हर भारतीय पर प्रहार है..जिसने भी किया उसे कड़ी सजा दीजिए मगर इन पर राजनीति करना भी इनका अपमान है और इस समय बंगाल में यही हो रहा है

 उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के जिन गुंडों की बात की जा रही है, अगर वे नहीं होते तो शायद शाह पर हमले की कालिख भी इस राज्य पर लग चुकी होती...मगर प्रतिक्रिया में भी विद्यासागर की प्रतिमा पर हमले और उसे तोड़ने का समर्थन किसी भी रूप में नहीं किया जा सकता...हम नहीं करते....कोई भी पार्टी हो...भाजपा हो या आपके समर्थक...सख्त कार्रवाई होनी चाहिए...चुनाव में जिस तरह खून बह रहा है...उसे देखकर तो सब समझ रहे हैं कि बंगाल में क्लबों को 2 -2 लाख देने का कारण क्या है और वह भी तब, जब आपके ही अनुसार राज्य कर्ज में डूबा है...जनता बेवकूफ नहीं है....उसे बरगलाने की कोशिश मत करिए....जिस तरह तिरंगा आपके हरे रंग के बगैर अधूरा है, वैसे ही वह केसरिया के बगैर भी अधूरा है...धर्मनिरपेक्षता का मतलब ध्वज के एक रंग को खारिज करना नहीं होता, उसे उसके मूल धार्मिक अधिकारों से वंचित करना नहीं होता....। जिस भगवा रंग को आपने आतंक का रंग बनाया है, मत भूलिए कि वह भगवा ही हमारे पूर्वजों का रंग है...राम और कृष्ण ने पहना, महात्मा बुद्ध ने पहना, भगवान महावीर ने पहना,  स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द ने पहना...सच तो यह है कि बंगाल ही नहीं, इस देश की आत्मा के रंग में यह रंग गहराई से शामिल है...आप इसे खारिज नहीं कर सकते..।.

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