शनिवार, 30 जनवरी 2021

अपनी दुनिया में मगन बड़ाबाजार को अब बाखबर होने की जरूरत है

 


क्या आप जानते हैं की शहर कोलकाता कभी ब्लैक कोलकाता और वाइट कोलकाता में विभाजित था। दक्षिण कोलकाता और मध्य कोलकाता का दक्षिणी भाग वाइट था और बड़ाबाज़ार और उत्तर कोलकाता ब्लैक कोलकाता था। अंग्रेज पहले सूतानाटी में आये क्योंकि यह सुरक्षित था और बाद में दक्षिण की तरफ गये इसलिए तमाम अंग्रेजी इमारतें दक्षिण और मध्य कोलकाता में हैं और ब्लैक कोलकाता में बसाए गये भारतीय इसलिए यह काला रह गया। सेठ और बसाक और बाद में मारवाड़ी समुदाय का गढ़।

और ये भी बड़ाबाजार का बड़ा दरअसल बूड़ो है, बूड़ो बांग्ला में शिव को कहते हैं और मारवाड़ी समुदाय ने इसे बड़ा बनाया। बड़ाबाजार आज भी ब्लैक ही है, स्याह। बांग्ला में पढ़िये तो सेठ, बसाक, ठाकुर का गुणगान है और इसके बाद मोटिया मजदूरों का गढ़, जिसे वो हिकारत से देखते हैं, बड़ाबाजार ने जिनको पनाह दी, दूर देश से आये जिन लोगों की शरणस्थली बना, वो भी पुष्पित पल्लवित होते ही इसे छोड़ गये। अब ये इलाका उनके लिये इतिहास की पंक्ति भर है
बड़ाबाजार ने सबको पनाह दी और सबने बड़ाबाजार को त्यागा और अब हिंदीभाषियों का वोट बैंक तोड़ने के लिये इसे स्थानांतरित करने की तैयारी है। कोई राजारहाट बड़ाबाजार नहीं बन सकता, बड़ाबाजार से पुष्पित पल्लवित होने वाले समझें की उन पर ये ऋण है। क्यों नहीं वो विकास का कोई ऐसा मॉडल विकसित करते, जिनमें इन तंग गलियों को एक नया रूप दिया जा सके। क्यों नहीं यहाँ के खाली पड़े मकानों को नया रूप देकर बड़ाबाजार को श्वेत नहीं तो गेहुआ बनाया जाय। आप राजस्थान जाकर अपनी मातृभूमि को संवार सकते हैं तो बड़ाबाजार तो आपकी शरणस्थली है, इसे क्यों नहीं? क्या यह कृतघ्नता नहीं? 
सवाल तो हम पूछेंगे की 19वीं सदी के बाद बड़ाबाजार का इतिहास क्यों दबाया गया? हमारी प्राचीन इमारतें भी आपकी हेरिटेज सूची में क्यों नहीं दिखतीं? आखिर क्यों बड़ाबाजार की पहचान उसका गौरवशाली इतिहास नहीं बल्कि हर बार लगने वाली अग्निकांड की राख को बनाया जा रहा है? आखिर कलकत्ते का वह कौन सा हिस्सा है, जहाँ पर आग नहीं लगती और कलकत्ते के किस इलाके में तंग गलियाँ नहीं हैं....कौन से हिस्से में क्षतिग्रस्त मकान नहीं हैं...तो फिर यह पहचान बड़ाबाजार के साथ ही क्यों चिपका दिये गये हैं....अगर एक विश्वविद्यालय के कार्यक्रम में मोबाइल शौचालय की व्यवस्था हो सकती है, पुस्तक मेले में पाउच में पानी मिल सकता है तो बड़ाबाजार की तंग गलियों में क्यों नहीं मिल सकता? अंग्रेजों का सौतेलापन आज भी सरकारों ने क्यों बरकरार रखा है...क्या यह बड़ाबाजार के साथ साजिश नहीं है? 
सारी दुनिया के मजदूरों को एक करने की बात करने वाले पोस्ता के मुटिया मजदूरों को क्यों नहीं अपना पाते? क्यों हिकारत से देखते हैं? क्या वो हिन्दीभाषी है इसलिए या वो बिहार से हैं इसलिए? हमारे बिहार में आपके बंगाल के दिग्गज बढ़े हैं और भागलपुर से शरत बाबू का रिश्ता तो बानगी मात्र है। 
तो अब सवाल होगा की फिर बड़ाबाजार का विकास कैसे हो, तो इसके लिये राजारहाट जाने की जरूरत नहीं है, कुछ सुझाव हैं
- बहुत से विशाल राजप्रासाद और हवेलियाँ यहाँ खाली पड़ी हैं, सरकार या फिर कोई उद्योग समूह इनको अधिग्रहीत कर के इनको, उनके मूल रूप में संवार कर खड़ा कर सकता है। मॉल्स, आवास या रेस्तरां के रूप में विकसित कर सकता है मगर ढांचा वही रखिये, क्योकि यही इसकी यू एस पी है। 

इसके बाद जो मकान खाली पड़े हों, वहाँ मजदूरों को क्वार्टर दीजिये, सडकों की भीड़ ऐसे ही कम हो जाएगी। और ये सम्भव है, यकीन न हो स्टार थिएटर, स्वामी विवेकानंद का पैतृक आवास और अंजलि का शोरूम आपके सामने है। इससे आपका खर्च भी बचेगा और अतिरिक्त जमीन भी नहीं चाहिये। जो है उसको फिर से खड़ा करिये उसके मूल रूप में।

गद्दी परम्परा को जारी रखिये, यही बड़ाबाजार की पहचान है और यही आपको अलग रखेगा, वैसे जी जैसे ताज में अलुमिनियम की केतली चलती है। 

हाथ रिक्शे को बैटरी चालित बनाइये, मोबाइल शौचालय बनाइये।

 दिवारों को पुराने कोलकाता की पेन्टिंग्स या अपने पूर्वजों के तस्वीरों से सजाइए। रेस्तरां हों तो अपने  राज्य के हिसाब से लुक दीजिये। और सबसे बड़ी बात की ये काम कोई मारवाडी या  हिन्दीभाषी करे, वो इसलिए की जिस प्यार से आप बड़ाबाजार को संवारेंगे, वो कोई और नहीं करेगा क्योकि आपके लिये बड़ाबाजार आपके पूर्वजों की अमानत होगा, बोझ नहीं।

अम्बुजा, बिड़ला, गोयनका, सब मिलें और बिहार व यू पी का श्रम मिले तो राजारहाट जाये बगैर बड़ाबाजार खड़ा हो सकता है।

सम्भव है की ये काम कठिन हो लेकिन यह होने पर आपको जो सन्तोष मिलेगा, आपकी आत्मा को जो सुकून मिलेगा, वो अनमोल होगा क्योकि आपको ऐसा लगेगा की आपने अपने बुजुर्गों की निशानी खोने नहीं दी










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