मंगलवार, 4 मई 2021

कविगुरु और आपकी आत्ममुग्धता के आगे भी एक दुनिया है

क्या हिन्दीभाषियों पर खुद को सत्ता के प्रति समर्पित साबित करने का दबाव है...क्या वे खुद को बंगाली से भी अधिक बंगाली साबित करने में लगे हैं...और इसके लिए वे किसी भी हद तक जा रहे हैं...सोचते - सोचते अब इस नतीजे पर पहुँचना पड़ रहा है कि ऐसा ही है और यह बीमारी पढ़े - लिखे बुद्धिजीवी वर्ग में अधिक है....यह असहज ही नहीं बल्कि नकली भी है...सोच का दायरा सिर्फ बंगाल तक सिमट गया है और क्योंकि सत्ता को खुश करना है तो उसके हर विरोधी पर अपनी कुंठा के तीर चलाए जा रहे हैं....एक समय था जब वाम का जोर था...आज बंगाल का हर दूसरा युवा वाम विचारधारा को वहन करता जा रहा है और राम उसके लिए एक अवशब्द लगने लगे हैं....बात व्यक्तित्व की हो तो भी अगर कोई विरोधी विचारधारा का मिल जाये तो लोग इनबॉक्स में जाकर भी उस पर अपना क्रोध निकालते हैं, उसे प्रभावित करने या नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। खुद में 72 छेद हों मगर सामने वाले के सामने अकड़ ऐसी कि पूछिए मत...अपमानजनक मीम साझा करने में कोई पक्ष पीछे नहीं है...हम समझते थे कि यह रोग बच्चों तक सीमित होगा मगर कई बच्चों के अभिभावक भी यही सब करने लगें तो उनको खुद से पूछना चाहिए कि वे नयी पीढ़ी को क्या सिखा रहे हैं...

राजनीतिक विचारधारा कुछ भी हो...मगर सोशल मीडिया के दौर में आपका अभद्रता में लिपटा शालीन व्यवहार भी आपकी पोल खोलने के लिए काफी है। इस लम्बी भूमिका के पीछे भी एक कारण है...पीएम साब की दाढ़ी...जिसको देखकर भद्र लोक से लेकर भद्र लोक में अपनी गिनती करवाने को व्याकुल हिन्दी समाज को मिर्च लगी है क्योंकि उनको लगता है पीएम रवीन्द्रनाथ बनने का प्रयास कर रहे हैं। 

रवीन्द्रनाथ बड़े कवि हैं...बंगाल के लिए तो बहुत बड़े पर क्या इसका मतलब यह है कि वह इतने अनुकरणीय हैं कि कोई व्यक्ति अपनी पूरी जीवन शैली अपना पहनावा बदल दे...वह भी ऐसे व्यक्ति के लिए जिसे वह ठीक से जानता भी नहीं है...रवीन्द्रनाथ बंगाल की शक्ति हैं तो बंगाल की सीमा भी रवीन्द्रनाथ ही हैं। जिस धरती पर चैतन्य महाप्रभु, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, खुदीराम बोस जैसी अंसख्य विभूतियाँ हों...वहाँ कोई सिर्फ रवीन्द्रनाथ को क्यों चुनेगा...कम से कम हम जैसे लोग तो कतई नहीं चुनेंगे...

बंगाल की पूरी दुनिया ही इसी आभामण्डल में सिमटी है...आत्ममुग्धता के भंवर में फँसा बंगाली समाज इस मरीचिका से बाहर निकलना ही नहीं चाहता। उसने बंकिम चन्द्र, शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय, ताराशंकर बन्द्योपाध्याय जैसे लेखकों को रवीन्द्र बरगद के नीचे दबा दिया। बेटी को माँ कहने वाले समाज ने बेटी को सम्मान तो खूब दिया मगर उसके अधिकारों की रक्षा करना उसे याद नहीं रहा। अगर ऐसा होता तो स्वर्ण कुमारी देवी, सरला देवी चौधरी, बेगम रुकैया, प्रीतिलता वादेदर, कादंबिनी गांगुली की जयंती धूमधाम से मनती,,,जैसे कविगुरु की मनती है..।

ये किस दृष्टिकोण से आपको रवीन्द्रनाथ ठाकुर का अनुकरण लगा...?

तृणमूल में एक ही महिला केन्द्र में है..,मगर उसने मशक्त युवा नेत्रियों को खड़ा नहीं किया। छात्र संगठनों के पास कद्दावर छात्राएं नेतृत्व के लिए नहीं हैं। माकपा और कांग्रेस जैसे दलों में स्त्रियाँ हाशिए पर ही हैं और जो हैं..उनके पास अपनी आवाज नहीं है...

किस बात का अहंकार है आपको...आत्म मुग्धता के जाल में फँसे वामपंथी इतिहास याद करते लोगों खासकर युवाओं को अहंकार किस बात का है..? पर बात दाढ़ी की...तो आपको रवीन्द्रनाथ ही याद क्यों आए...ठाकुर रामकृष्ण परमहंस याद आते...गुरु नानक को याद कर लेते...ऋषि परम्परा को याद कर लेते...कबीर...गुरु गोविन्द सिंह को याद कर लेते...जो लोग पद और पुरस्कार के लालच में रातों - रात अपनी विचारधारा बदल लें...पूँजीवाद को गरियाते हुए उसी के चरणों में लोटने लगे तो ऐसे रीढ़विहीन लोगों से उम्मीद क्या की जाए। हिन्दीभाषी बुद्धिजीवियों पर तो सिर्फ तरस ही खाया जा सकता है। जो लोग कोरोना और प्रोटोकॉल को लेकर पीएम पर ताने कस रहे थे...आज तृणमूल के उत्पात और राज्य में चुनाव के बाद होने वाली हिंसा पर मौन हैं। बंगाल जल रहा है और आप नीरो की तरह बाँसुरी बजा रहे हैं...धिक्कार है आप पर।

ममता अगर मदर टेरेसा से प्रभावित हैं तो यह अपराध नहीं है तो पीएम की दाढ़ी में दिखते रवीन्द्रनाथ से इतना भय क्यों है..जबकि पीएम मोदी ...रवीन्द्रनाथ से नहीं...नाना जी देशमुख से प्रभावित हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन समाज सेवा में लगा दिया....बहुतों ने तो नाम भी नहीं सुना होगा.....मगर सत्य तो यही है कि कविगुरु के आगे भी एक दुनिया है और हर किसी को रवीन्द्रनाथ अनुप्राणित करते हों,. यह जरूरी नहीं है। 

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