रविवार, 25 जुलाई 2021

काश दीदी... बगैर 'खेला किये' चुनाव की जगह जनता का दिल जीततीं



नेताओं को अपने पुराने दिन और पुराने बयान नहीं भूलने चाहिए मगर कोई भी नेता इनको याद नहीं रखता। एक समय था जब भारत में नेताओं के बीच से सही नेतृत्व मिलता था। आजादी के बाद भी 60 और 70 के दशक तक नेता फिर भी मिल जाते थे। फिर 80 का दशक आया और संख्या सिमटती गयी और आज हमारे पास जो नेता हैं, उनको अपनी इमेज बनाने के लिए काम करना पड़ रहा है, पेशेवर सेवाएँ लेनी पड़ रही हैं, प्रचार पर पानी की तरह पैसा बहाना पड़ रहा है। वे स्वनिर्मित नेतृत्व का आभामण्डल तैयार जरूर करते हैं पर वह एक मृगतृष्णा के सिवाय कुछ भी नहीं है।

जिस देश में देश पर व्यक्तित्व भारी पड़ने लगे..वहाँ हमें ठहरकर सोचने की जरूरत है कि आखिर हम किस दिशा में जा रहे हैं। लोग अपना दल बदलने से पहले हजार बार सोचते थे, आज हर चुनाव के पहले नेताओं की मंडी लगने लगी है। प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष रूप से, होटलों में विधायकों को बंद करना पड़ रहा है, रातों - रात सरकारें बदल जा रही हैं और आज की राजनीति कॉरपोरेट संस्कृति में ढलती जा रही है। अगर कॉरपोरेट कार्यसंस्कृति की कर्मठता, अनुशासन, परिणाम पर केन्द्रित होने तक बात सीमित रहती..तब तक फिर भी बात समझ में आती थी लेकिन जनता उपभोक्ता नहीं है...हर व्यक्ति नागरिक है इसलिए नेताओं को अपनी वाणी और आचरण दोनों पर संयम रखना चाहिए मगर आज संयम छोड़िए, सामान्य शिष्टाचार भी नहीं दिखता।

आप कहेंगे कि इतनी बड़ी भूमिका की जरूरत क्यों पड़ गयी...महँगे पेट्रोल ने अटल बिहारी वाजपेयी का बैलगाड़ी प्रतिवाद याद दिला दिया और अब साइकिल वाला प्रतिवाद हो रहा है। प्रतिवाद में एक मर्यादा का होना अनिवार्य़ है। जब बात प्रतिवाद की हो रही है तो इतिहास की ओर देखने की जरूरत पड़ती है...याद आता है सिंगुर औऱ नंदीग्राम आन्दोलन। याद आता है गोलीकांड..सिंगुर आन्दोलन...जिसने ममता बनर्जी को सत्ता तक पहुँचाया।

नंदीग्राम इस बार बंगाल विधानसभा में छाया रहा और ममता बनर्जी यहाँ से चुनाव हार गयीं। एक अच्छा व्यक्ति वह है जो अपनी विजय पर अभिमान न करें और पराजय को गरिमा से स्वीकारना सीखे...दुःख की बात यह है कि दीदी में यह दोनों ही गुण नहीं है। अपने नेताओं की अराजकता पर न तो उन्होंने कल रोक लगायी थी और न ही अब रोक लगा रही है। किसी भी राज्य अथवा देश के सत्ताधारी दल में एक गरिमा होनी चाहिए मगर तृणमूल में जिस प्रकार के नेता और मंत्री हैं...वह उनको गरिमा की सीमा से कोसों दूर ले जाती है। कहते हैं कि जैसा राजा होता है, प्रजा भी वैसी ही होती है, अगर आधुनिकता की भाषा में कहें तो जैसा मुखिया होगा, वैसी ही जनता होगी...और आज बंगाल की जनता को दीदी के खेल में आनन्द आने लगा है। 

बंगाल की संस्कृति सनातन परम्परा की संस्कृति है, बौद्धिकता के आवरण में लपेटी गयी विदेशी आक्रमणकारियों की संस्कृति नहीं है। भले ही सत्ता इस सत्य को दबाने का जितना भी प्रयास करे, सत्य दब नहीं सकता, किसी के घर पर जबरन कब्जा करके बैठ जाने से वह घर आपका नहीं हो जाता लेकिन दीदी अपनी तुष्टिकरण की राजनीति के चक्कर में इस सत्य को दबाने में जुटी हैं और वामपंथी, कांग्रेस औऱ अल्पसंख्यक राजनीति की गुटबंदी से उनको सहयोग मिल रहा है। विधानसभा चुनाव में भाजपा की पराजय से सब बंगाल की जनता की बड़ी तारीफें कर रहे हैं, ऐसे लोगों को याद रखना चाहिए कि हिंसा और गुंडागर्दी से पायी गयी विजय स्थायी नहीं होती, विरोधियों को दबाने की धुन में जब आम आदमी पर अत्याचार होने लगें. तुष्टिकरण की आड़ में जब एक बड़ी आबादी को दबाया जाने लगे तो प्रतिकार होता है और वह पराजय का कारण बनता है। राजनीति और समय में कुछ भी स्थायी नहीं होता...आज जो नहीं हो पाया...वह कल होगा। दीदी को इतिहास देखना चाहिए....कम से कम अपने पुराने दिनों को अवश्य स्मरण करना चाहिए और सोचना चाहिए कि जब अन्याय से परेशान जनता ने 34 साल का शासन उखाड़ फेंका तो देर न सवेर दमन का अंत होता ही है।

इसकी दिशा तो विधानसभा चुनाव ने तय कर दी है। भाजपा ने सीटें भले ही नहीं जीतीं लेकिन बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य से वाममोर्चा और कांग्रेस को गायब कर वह राज्य की प्रमुख पार्टी अवश्य बन गयी है। हो सकता है कि दल -बदल के कारण उसकी सीटें कम हों लेकिन उसने बंगाल की आम जनता को जो उम्मीद दी है, धीरे - धीरे लोगों के दिलों में जगह बना रही है और आपके अन्याय आपको आम जनता से दूर कर रहे हैं। राजनीतिक तिकड़मबाजी से सरकार बन सकती है, दिल नहीं जीते जाते। इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी ने दिल जीते थे, लोकगीतों में गाँधी और नेहरू के नाम दर्ज हैं मगर बंगाल से जो नाम आता है, वह नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का है। दीदी को अपनी जीत पर गर्व जरूर हो रहा होगा...लेकिन उसमें कितना भय है, वह देखिए...एक जननेत्री कहलाने वाली नेत्री को जो 2011 में जनता के समर्थन से जीतकर बंगाल में आयी, आज उसे प्रशांत किशोर जैसे कॉरपोरेट रणनीतिकार की मदद लेनी पड़ रही है, तो यह पतन नहीं तो और क्या है? ये ऐसा है कि किसी बच्चे ने पास होने लायक नम्बर ग्रेस मार्क्स की मदद से पा लिये। कभी खुद को गौर से देखिएगा...आप क्या थीं और क्या होती जा रही हैं...क्रोध, चिड़चिड़ापन. खोने का डर और ऐसे नेताओं पर आपकी बढ़ती जा रही निर्भरता...जिनको आप सम्भवतः कभी खुद देखना भी नहीं चाहती होंगी। 

तृणमूल और भाजपा की कोई तुलना हो ही नहीं सकती। भाजपा एक अनुशासित और कार्यकर्ता आधारित संगठित जनाधार वाली पार्टी है। आर एस एस से घृणा आप जितनी भी कर लें मगर अपने अनुशासन और सेवा कार्यों के कारण वह आम जनता के पास है....और पूरे देश में यही स्थिति है। दूसरी तरफ नन्दीग्राम मामले में दीदी के व्यवहार के कारण जो 5 लाख रुपये का जुर्माना लगा है...वह उनकी छवि को कमजोर करता है...नंदीग्राम की जनता की आलोचना कर उन्होंने उस जनता का अपमान किया, जिसने उनको मुख्यमंत्री बनाया। 

अब दीदी उसी राह पर चल रही हैं, जिसका विरोध करके वह खुद सत्ता में आयी थीं...तापसी मलिक को मोहरा बनाकर कुर्सी पाना अलग बात है पर तमाम विरोध के बावजूद पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की जो गरिमामयी छवि बंगाल की जनता के मन में है, दीदी...उसके आस - पास भी नहीं फटक सकतीं। पराजय और माकपा से चिढ़ के बाद भी आम जनता बुद्धदेव बाबू के सामने आदर से सिर झुकाती है...कई बार मनुष्य हारकर भी हृदय में बस जाता है। भाजपा वह पार्टी है जो जरूरत पड़ने पर त्रिवेन्द्र सिंह रावत जैसों से इस्तीफा ले सकती है, योगी तक को सोचने पर मजबूर कर सकती है और येदुरप्पा को भी सफाई देनी पड़ती है। आज अगर नरेन्द्र मोदी के पक्ष में जनाधार न होता तो सम्भव था कि पार्टी उन पर भी विचार करती। इस पार्टी में व्यक्ति मजबूत तो होता है पर दल का पर्याय कभी नहीं बनता..यह गुण वाममोर्चा में है पर निष्पक्षता नहीं, अगर होती हो तो सोमनाथ चटर्जी जैसे दिग्गज नेता का इस तरह अपमान न होता...वाममोर्चा के हाशिये पर जाने का कारण भी ऐसे नेताओं की उपेक्षा करना ही है। अगर बात तृणमूल की करें तो तृणमूल का मतलब ममता माना जाता है, अगर व्यक्ति किसी संगठन, देश या समाज का पर्याय बनने लगे तो उसका पतन होते देर नहीं लगती। विश्वास न हो तो अपनी समकालीन जयललिता और मायावती और मुलायम और राजद जैसी पार्टियों को देख लीजिए। आज कांग्रेस के सिकुड़ने का कारण ही यही है कि वह गाँधी परिवार में सिमट गया है और नतीजा है कि पार्टी का हर दिग्गज नेता पार्टी छोड़ रहा है। जब तक ममता हैं, उनके नेता तृणमूल के साथ हैं...क्या ममता बनर्जी मजबूती से कह सकती हैं कि उनके न रहने पर अभिषेक बनर्जी को वह स्वीकृति मिलेगी? खासतौर पर तब जब कि जनता के बीच उनकी वैसी लोकप्रियता नहीं हैं, चाटुकारों के भरोसे पायी गयी लोकप्रियता स्थायी नहीं होती।

अब बात करते हैं, दीदी के उनकी ही नीतियों से पलटने की। हमने नंदीग्राम की बात की। आज 13 साल बाद तृणमूल टाटा का स्वागत करने के लिए आतुर हुई जा रही है और यही वह पार्टी है जिसके कारण टाटा को बंगाल से जाना पड़ा था और लाभ मिला गुजरात को जिसने मौके को पहचाना। आपने जिन कृषकों की आड़ में राजनीति की, वह खुद उद्योग चाहते थे...लेकिन आपने राजनीति की। । सिंगुर आंदोलन वास्तव में किसानों का आंदोलन नहीं होकर ममता बनर्जी का राजनीतिक आंदोलन था। अधिकांश किसान भूमि देने पर सहमत थे और उन्होंने क्षतिपूर्ति भी ले ली थी। 997.11 एकड़ में मात्र 400 एकड़ के भू-स्वामी क्षतिपूर्ति लेने को तैयार नहीं थे और ममता ने उन्हीं लोगों को आधार बनाकर आन्दोलन किया था। दरअसल, किसान आपके लिए सीढ़ी थे। आप भी जानती थीं कि उद्योगों की आवश्यकता भी उतनी ही है, जितनी कृषि की, लेकिन आपने इसे राजनीति का हथियार बनाया, सत्ता प्राप्त की, टाटा को राज्य से बाहर किया..सुप्रीम कोर्ट तक मामला गया, आप जीतीं भी। आज वहाँ उद्योग लग जाता तो सम्भव है कि जिले की दशा और राज्य की अर्थव्यवस्था बदल जाती पर आपने ऐसा नहीं होने दिया।

दीदी, आप क्या देश की दूसरी इंदिरा गाँधी बनने का प्रयास कर रही हैं,,और इसके लिए इमेज बनाने में लगी हैं मगर याद रखिए कि इंदिरा जी में कोई अच्छाई या बुराई हो सकती है मगर उनके व्यक्तित्व में जो गरिमा थी, जो नेतृत्व क्षमता था, वह किसी प्रशांत किशोर की मदद लेने से नहीं आ सकती। आप तो खुद को इतिहास में नायिका की तरह दर्ज होते देखना चाहती हैं.. तभी तो आपने अपने शासनकाल में ही, अपनी ही सरकार में रहते हुए उस सिंगुर आन्दोलन को इतिहास में दर्ज करवाया जो आपके लिए सत्ता की सीढ़ी से अधिक कुछ नहीं था। भारत छोड़ो आंदोलन, स्वतंत्रता संग्राम, सिपाही विद्रोह और प्लासी का युद्ध इतिहास के पाठ्यक्रम में शामिल हैं और छात्र इस पर अध्ययन भी करते हैं। सवाल उठता है कि क्या सिंगुर आंदोलन ऐतिहासिक कारणों से सचमुच इतना महत्वपूर्ण हो गया था कि उसे पाठ्यक्रम में शामिल किया जाता? आपने आमरी कांड में अभियुक्तों को हत्यारा कहा और बाद में आपके मंत्री उन अभियुक्तों के साथ मंच साझा करते नजर आए...आप पर किस तरह विश्वास किया जाए। आपने धर्मनिरपेक्षता का हवाला देकर रामधनु को रंगधनु बना दिया और आपके उच्च माध्यमिक शिक्षा परिषद की अध्यक्ष खुलेआम नतीजों की घोषणा करते हुए विद्यार्थी के धर्म का खुलासा करती हैं....क्या यही आपका खेला है?  आपने बंगाल की सुसंस्कृत, परम्परा को मानने वाली जनता को अराजक भीड़ बना दिया है...जिसकी भाषा की मिठास में अभद्रता बढ़ती जा रही है...आप कहाँ ले आयी हैं बंगाल को खुद देखिए....इतिहास आपको कभी माफ नहीं करेगा...आप मनुष्य हैं, अमृतपान नहीं किया आपने और भविष्य का इतिहास आपकी इच्छा से नहीं लिखा जायेगा और आपकी छवि बंगाल की निरंकुश, अहंकारी, अभद्र और तुष्टिकरण की अभ्यस्त मुख्यमंत्री से अधिक नहीं होगी क्योंकि इतिहास किताबों से अधिक जनता के दिलों में बसता है और जिन्होंने आपके राज्य में हिंसा देखी है, वह कभी आपको देवी मानने से रहे।

आप और आपके शिक्षामंत्री ने शिक्षाविदों का परामर्श लेने की जरूरत तक नहीं समझी। क्या सुप्रीम कोर्ट के निर्णय भर से कोई घटना इतिहास बन सकती है? अगर हाँ, तो निर्भया कांड में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया...उसे इतिहास की किताबों में दर्ज होना चाहिए। आज 13 साल बाद आपने क्या किया...जिसके खिलाफ लड़ीं...आज उसी उद्योग समूह का स्वागत करने के लिए तैयार हैं तो यह बताता है कि राज्य में बेरोजगारी कितनी विकट है...आपकी आतुरता इसका प्रमाण है। 

बहरहाल पार्थ चटर्जी ने कहा कि नमक से इस्पात तक बनाने वाले कारोबारी समूह ने कोलकाता में अपने कार्यालयों के लिए एक और टाटा सेंटर स्थापित करने में रुचि दिखाई है। चटर्जी ने यहाँ तक कहा,''टाटा के साथ हमारी कभी कोई दुश्मनी नहीं थी, न ही हमने उनके खिलाफ लड़ाई लड़ी. वे इस देश के सबसे सम्मानित और सबसे बड़े व्यापारिक घरानों में से एक हैं. आप टाटा को (सिंगूर उपद्रव के लिए) दोष नहीं दे सकते।'' वैसे हम उत्सुक हैं कि सिंगुर आन्दोलन का जो पाठ आप अपनी छवि बनाने के लिए बच्चों को पढ़ाती आ रही हैं...उसका क्या करेंगी?






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