रविवार, 21 फ़रवरी 2016

इतिहास ने सिखाया - स्त्री को एक दूसरे के लिए लड़ना सीखना होगा

पन्ने चाहे इतिहास के हों या धर्म के, औरतों के लिए मापदण्ड हमेशा से ही अधिक कठोर रहे हैं। बाजीराव मस्तानी देखी  और मस्तानी से अधिक काशीबाई की खामोशी और व्यथा परेशान कर गयी। इतिहास के पन्नों में काशीबाई के साथ न्याय नहीं हुआ। अपनी पत्नी का विश्वास तोड़कर भी बाजीराव नायक बने रहे और प्रेम के नाम पर दीवानगी दिखाने वाली मस्तानी भी अपनी छाप छोड़ गयी मगर इन दोनों की निशानी पर अपनी ममता लुुटाने वाली काशीबाई को कहीं जगह नहीं मिली। जो छूट बाजीराव को मिली, क्या वह छूट उस समय में काशीबाई को मिलने की कल्पना भी की जा सकती है। फिल्म में प्रियंका चोपड़ा ने उस पीड़ा को जिस तरह से जीया है, वह वाकई झकझोर देने वाला है। प्रेम की बातें करने वाले समाज ने दो औरतों को हमेशा लड़वाया है। नियमों को अपनी सुविधा के लिए और पुरुषप्रधान समाज ने हमेशा से तोडा और मरोड़ा है। संसार के हित का हवाला देकर द्रौपदी को पांच पांडवो से विवाह कर उनको अपनाने पर यह व्यवस्था विवश करती है। उसे न्यायसंगत भी
ठहराती है तो दूसरी तरफ कर्ण से अपमानित भी करवाती है। जब भी महाभारत की कहानियां सुनती हूं, हजारों सवाल परेशान कर जाते हैं। हर पांडव शक्ति के विस्तार के लिए फिर विवाह करता है और द्रौपदी से उम्मीद की जाती है कि वह इसे स्वीकार कर हमेशा उनका साथ दे। अगर कहानी में सिर्फ पात्र बदल जाते और द्रौपदी पांडवों के अतिरिक्त किसी को चुनती तो? क्या ये समाज उसे जीने देता? चयन का अधिकार हमेशा पुरुषों के पास ही क्यों होता है? द्रौपदी अपनी इच्छानुसार नहीं बल्कि नियति के अनुसार जीती रही और अंत में स्वर्ग के लिए उसे त्याग दिया गया। उसका आंचल खाली ही रहा। स्त्री शोषित होती है और वो भी दूसरी ही स्त्री के द्वारा। उस दूसरी स्त्री को पुरुष हथियार बनाता है और दोनों स्त्रियां उस पुरुष पर अधिपत्य के लिए एक दुसरे के खिलाफ खड़ी हो जाती हैं जबकि सत्य तो यह है कि दोनों के साथ ही छल हुआ है। एक से अधिक विवाह करने पर प्रश्न खड़े होते हैं तो पुरूषों के मामले में यह नियम लागू क्यों नहीं होता? इस तरह के मामलों में हार हमेशा स्त्री की होती है, फिर चाहे वह पत्नी हो या प्रेमिका। पूरी कहानी पलट सकती है, बशर्ते स्त्री एक दुसरे के खिलाफ नहीं, बल्कि एक दुसरे के लिए लड़ना सीख ले और खुद को पहचाने। जिस दिन पुरूषों पर उसकी निर्भरता नहीं होगी, उस दिन से वह जीतना सीख जाएगी।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें