शुक्रवार, 9 जून 2017

सरकार सुधरे मगर हमें भी मुफ्तखोरी छोड़नी होगी, तभी बचेंगे किसान


मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के बाद किसान आन्दोलन की आग पंजाब और राजस्थान तक पहुँच रही है। किसान हमारे लिए मौसम हैं, अन्नदाता, हर अखबार, हर मीडिया, हर ब्लॉग, जहाँ देखिए अन्नदाता को श्रद्धा अर्पित की जा रही है। सोशल मीडिया पर आँसू बहाए जा रहे हैं, तमिलनाडु के किसान जब जंतर मंतर में धरना दे रहे थे, तब भी बहाए जा रहे थे, आगे भी बहाए जाते रहेंगे। सरकार को घेरने वालों को एक मुद्दा मिल गया है, बाकी सब कुछ ज्वलनशील बनाना तो उनके बाएँ हाथ का खेल है। दरअसल, समस्या की जड़ कहीं और नहीं हमारे भीतर है। जस्टिन बीबर के शो पर 100 करोड़ खर्च करने वाला यह देश, 76 हजार रुपए में एक टिकट खरीदने वाले हम शहरी, शिक्षित, सभ्य, सम्भ्रांत और बुद्धिजीवी जब पहले तो फुटपाथ पर फल और सब्जियाँ बेचने वालों से तो कुछ खरीदते नहीं हैं, खरीदते हैं तो 18 रुपए किलो प्याज को 5 रुपए में खरीदते हैं, दूध का भाव 1 रुपए लीटर भी बढ़ गया तो आन्दोलन से लेकर  आगजनी करते हैं और फिर किसान को उसकी फसल की लागत नहीं मिलती तो छाती पीटते हैं। हर गृहिणी या गृह स्वामी जब आधे से कम दम दरों पर राशन खरीद कर लाता है तो उसे विजेता घोषित कर दिया जाता है और बेचने वाले गरीब खलनायक घोषित कर दिए जाते हैं। सारे देश में सब्जियाँ, फल, अनाज और दूध पानी के भाव बिक रही हैं मगर उनको खरीद कौन रहा है, हम और आप। कहने का मतलब यह है कि कोई मजबूरी में ऐसा कर रहा है तो हम और आप उसकी मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं। आपकी पार्टियों में जो फल आते हैं, आप होटलों में जो खरीद रहे हैं और मेहमानों को दिखा रहे हैं, यह अमेरिका का सेब, फ्रांस का अँगूर और न जाने क्या क्या...जो 700  रुपए का एक तो आप उसी समय अपने अन्नदाता को मौत के मुँह में धकेल रहे होते हैं। अधिकतर लोग जब गाँवों से सब्जी या कोई भी सामान इसलिए खरीदते हैं क्योंकि यह आपको पानी के भाव मिलता है। सबसे बड़े खरीददार हम हैं और खपत की मात्रा हम पर निर्भर करती है तो किसानों को सरकार से ज्यादा किसी की जरूरत है तो हमारी है। वो हम तक नहीं आ पाते, हम तो उन तक जा ही सकते हैं। सरकार नहीं खरीदती तो हम खरीदें, सप्ताह में या महीने में एक बार अगर किसी कॉम्पेल्क्स या कालोनी के लोग आस पास के किसानों से सामूहिक तौर पर खरीददारी करें तो बिचौलियों की जरूरत ही न पड़े मगर तय कीजिए कि आप 18 रुपए किलों का आलू 3 रुपए किलो में खरीदने की हसरत नहीं पालेंगे। किसान किसी सरकार से नहीं हारा है, वह हमसे और आपसे हारा है। क्या हर औद्योगिक संस्था सीएसआर के तहत किसानों के लिए कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था नहीं कर सकती या एक मंडी उनके लिए नहीं बनायी जा सकती।


 अगर सरकार किसानों को बचाने के लिए कुछ नहीं करती तो क्या हमें उनको मरने के लिए छोड़ देना चाहिए? अगर किसानों से सचमुच प्यार है तो जब भी सब्जी खरीदें, मोलभाव न करें, यह मुश्किल है मगर सोशल मीडिया पर आँसू बहाने से अच्छा है कि कुछ मेहनत खुद की जाए। आश्र्चर्य होता है कि हमारे प्रधानमंत्री लंदन और म्यामांर पर आँसू बहाते हैं मगर भूमिपुत्रों के लिए एक शब्द उनके मुँह से नहीं निकलता। आपने किसानों की आय दुगनी करने का वायदा किया मगर इसके लिए कोई रोडमैप था? कोशिश की जानी चाहिए थी कि हमारे यहाँ से निर्यात बढ़े, आयात हो तो वह भी सशर्त हो। अगर आप दाल ला रहे हैं तो सामने वाले देश से सुनिश्चित करें कि वह भी हमारे यहाँ खाद्यान और सब्जियाँ खरीदें। मैं खेती के बारे में अधिक नहीं जानती मगर जो पढ़ा है, उसके हिसाब से यह तो कह ही सकती हूँ कि दिक्कत अतिरिक्त उत्पादन में नहीं बल्कि वितरण, विपणन और निर्यात प्रणाली में है। हमारे यहाँ जो भी औद्योगिक विकास होता है, उसमें कृषि को वरीयता मिलनी चाहिए और इस लिहाज से आयुर्वेद और खाद्य प्रसंस्करण समेत कृषि को प्रोत्साहित करने वाले तमाम उद्योगों को विशेष सुविधाएँ दी जानी चाहिए। सौ बात की एक बात, खपत होगी और हम पानी के भाव पर खरीददारी की हसरत त्यागेंगे तो माँग के अनुसार उत्पादन होगा और उसका फायदा किसानों को होगा। बिचौलियों को बीच से हटाने की जरूरत है इसलिए जैसा कि बंगाल में हुआ है, देश में ब्लॉक स्तर पर मंडी बनाने की जरूरत है। किसानों को फसल की कीमत खुद तय करने दीजिए और जरूरत पड़े तो कीमतें तय  करने के लिए एक स्वायत्त संस्था गठित कीजिए जिसमें किसानों के प्रतिनिधि हों और वे किसी भी राजनीतिक दल से न हों। उनके लिए खेती का कम से कम 15 वर्ष का अनुभव अनिवार्य हो। गलती प्रशासन की भी है, अगर दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री आरम्भ में ही किसानों के पास जाते तो हालात बेकाबू होते ही नहीं। किसानों के कुछ प्रतिनिधियों से बात करने से बेहतर था कि इलाके में जाकर खुद उनकी बात सुनते। मुफ्तखोरी किसी भी समस्या का इलाज नहीं है और न ही कर्जमाफी से बात बनेगी। मनमोहन सिंह की सरकार ने भी कर्जमाफी की थी, चुनाव हार गयी। क्या ये बेहतर नहीं होगा कि कर्जमाफी की जगह किसानों को ही सक्षम बनाया जाए कि उनको इस बैसाखी की जरूरत ही न पड़े। जल संचयन के उन्नत तरीके खोजे जाएँ तो अकाल में भी फसल सुरक्षित रहेगी। किसानों के लिए कृषि पाठशाला हो। स्कूली और कॉलेज स्तर पर पाठ्यक्रम में कृषि एक विषय हो जिसमें किसान से लेकर, कृषि के प्राकृतिक व आधुनिक तरीकों, कृषि के इतिहास, बीज, खाद, वितरण व विपणन प्रणाली, कृषि ऐप से लेकर उपकरण से लेकर दूसरे देशों की कृषि व्यवस्था से संबंधित समसामायिक अध्ययन हो। इस पाठ्यक्रम के तहत एक पेपर ऐसा हो जिसमें कम से कम 6 माह गाँवों में विद्यार्थी गुजारे। इससे युवा पीढ़ी कृषि का महत्व समझेगी, रोजगार सृजन होगा क्योंकि गाँवों से जुड़ना वहाँ के लोगों को रोजगार देने के लिए जरूरी है। कृषि तकनीक देश में विकसित हों। इस देश में कम्प्यूटर और सॉफ्टवेयर इंजीनियर की तरह एग्रीकल्चर इंजीनियर और एग्रीकल्चर डॉक्टर्स की जरूरत है जो फसल को कीटों से बचाने और उसे बेहतर बनाने में मदद करें। काँग्रेस से लेकर भाजपा तक, कर्जमाफी चुनावी हथियार ही अधिक रहा है मगर अर्थव्यवस्था पर इसका प्रतिकूल प्रभाव ही पड़ता है। आरबीआई के गर्वनर उर्जित पटेल ने रेपो रेट को यथावत रखने की जानकारी दी और यह भी कहा कि "मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के प्रस्ताव में कहा गया है कि अगर बड़े पैमाने पर किसानों के ऋण माफ किए गए तो इससे वित्तीय घाटा बढ़ने का खतरा है।" उन्होंने कहा कि जब तक राज्यों के बजट में वित्तीय घाटा सहने की क्षमता नहीं आ जाती, तब तक किसानों के ऋण माफ करने से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह पिछले 2-3 साल में हुए वित्तीय लाभ को घटा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि वित्तीय घाटा बढ़ने से जल्द ही महंगाई भी बढ़ने लगेगी। पटेल ने कहा कि पहले भी देखा गया है कि किसानों के ऋण माफ करने से महंगाई बढ़ी है। उन्होंने कहा, "इसलिए हमें बेहद सावधानी से कदम रखने चाहिए, इससे पहले कि स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाए।" अगर खजाना ही खाली हो गया तो अन्नदाताओं की मदद कैसे होगी, यह भी सोचने वाली बात है। अब बात आन्दोलन पर, तो इसका समय और तरीका अपने आप में संदेहजनक है। दोनों भाजपा शासित राज्यों में एक साथ आन्दोलन का उग्र होना और कई मामलों में फल, सब्जियों और दूध को जबरन बहाया जाना इसे दिशाभ्रमित करता है, जिसका समर्थन कतई नहीं किया जा सकता। बसों में आग लगाना, सरकारी इमारतें और वाहन फूँकना, क्या इससे समस्या का समाधान निकलेगा? लगभग 780 करोड़ रुपए से अधिक की फल और सब्जियाँ नष्ट की जा चुकी हैं। निश्चित तौर पर सरकार और प्रशासनिक स्तर पर खामियाँ हुई हैं, किसानों पर गोली चलाने का समर्थन कतई नहीं किया जा सकता मगर सवाल यह उठता है कि किसानों को अपनी बात रखने के लिए किसी राजनीतिक पार्टी की जरूरत क्यों पड़े? वह  क्यों खुद को इस्तेमाल होने दे रहे हैं। यह छुपी हुई बात नहीं है कि मध्यप्रदेश में काँग्रेस और महाराष्ट्र में शिवसेना ने मुख्य रूप से आग में घी डालने का काम किया है मगर इससे नुकसान किसे हो रहा है। 


अगर आप सोचते हैं कि फल, सब्जी अनाज और दूध फेंकना ही आन्दोलन है तो आपको अन्नदाता कहा ही नहीं जाना चाहिए क्योंकि ये सब कुछ किसानों का ही है, आज अगर फसल मंडी में फसल नहीं जा पा रही है तो उससे जो क्षति होगी वह किसानों की होगी, वहाँ जो मरेंगे, किसान ही मरेंगे। किसानों की समस्या सरकार ही नहीं बल्कि हमारी अपनी सोच, कमजोरी और आत्मकेन्द्रित मानसिकता के कारण ही है इसलिए अगर किसानों की मदद ही करनी है तो मुफ्तखोरी पहले हमें ही छोड़नी होगी।


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