बुधवार, 3 जनवरी 2018

अब मेरा लाइब्रेरी कार्ड अधूरा रह जायेगा


ये तस्वीर सर ने साक्षात्कार के समय दी थी
-सुषमा त्रिपाठी

जीवन में आश्वस्ति हो तो संघर्ष आसान हो जाते हैं और पुस्तकालयाध्यक्ष आश्वस्त करने वाला हो तो किताबों तक पहुँचना आसान हो जाता है। जालान पुस्तकालय में वह आश्वस्त करने वाली कुर्सी सूनी हो गयी है...तिवारी सर नहीं हैं वहाँ पर। अब मुझसे कोई नहीं कहेगा कहाँ हो आजकल। दिखायी नहीं पड़ती हो या कार्ड बनवा लिया....आज की दुनिया में ये शब्द बड़े अनमोल है, ऐसी दुनिया में जहाँ किसी के पास किसी के लिए कोई फुरसत नहीं है। मेरे जीवन में लाइब्रेरी का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है...वह मेरी शरणस्थली है और एक ऐसी जगह जहाँ मुझे आश्वस्त करने वाले, सही राह दिखाने वाले लोग मिले हैं....किताबों के बीच से जिन्दगी को जीने का रास्ता निकला है...जालान गर्ल्स कॉलेज में मैंने पास कोर्स किया था और ऑनर्स नहीं होने के कारण एम ए में मेरा दाखिला उस समय नहीं हो पा रहा था इसलिए उन दिनों स्पेशल ऑनर्स करना पड़ता था मगर मुझे कोई जानकारी नहीं थी। होती भी कहाँ से, मेरी दुनिया घर से कॉलेज और कॉलेज से घर तक सीमित थी...मधुलता मैम ने सावित्री गर्ल्स कॉलेज के बारे में बताया मगर किसी कारणवश वहाँ भी मेरा दाखिला नहीं हो पा रहा था...ऐसी स्थिति में श्रीराम तिवारी सर देवदूत बनकर आए और मेरा दाखिला हो गया...तब से लेकर आज तक...सर हमेशा मेरे लिए आदरणीय रहे। कॉलेज के हर आयोजन में उनका सहयोग मिला। तिवारी सर मुझे कभी सिर्फ पुस्तकालयाध्यक्ष लगे ही नहीं, कभी एहसास ही नहीं हुआ कि पुस्तकालय में मैं एक आम लड़की हूँ... कभी कोई औपचारिकता महसूस ही नहीं होने दी उन्होंने और भइया ने। शायद यही वजह है कि परेशान होती हूँ तो सीधे लाइब्रेरी ही जाती हूँ...थोड़ी देर किताबों के बीच रहकर फिर खड़ी हो जाती रही हूँ और किताबों से प्रेम के पीछे यह स्नेह भी सम्बल बना है। हमेशा बेखटके फोन किया या सीधे लाइब्रेरी पहुँच गयी और कभी भी वे नाराज नहीं होते थे। उनका होना पिता की छाँव जैसी आश्वस्ति देता था और लाइब्रेरी एक परिवार की तरह थी जहाँ...नोक झोंक में श्रीमोहन भइया को हम सहेलियाँ परेशान करतीं थीं और कई बार हमारे चक्कर में भइया को तिवारी सर से डाँट पड़ जाती...वे दिन दुर्लभ हैं और तमाम सफलताओं पर भारी हैं...वे जीवन के स्वर्णिम दिन हैं....भइया नियमों का हवाला देते तो तिवारी सर से बोलकर हम ज्यादा किताबें लिया करते...तब जीवन इतना जटिल नहीं था....पत्रकारिता जीवन में व्यस्तता के बावजूद समय निकालकर कुछ मिनटों के लिए ही सही मैं लाइब्रेरी जाती रही हूँ...और वहाँ सर मुझे कुल्हड़ वाली चाय पिलाना नहीं भूलते थे। मेरे लाइब्रेरी कार्ड पर उनके हस्ताक्षर रहते...अब वह लाइब्रेरी कार्ड अधूरा रह जायेगा। सर मेरी खबरें पढ़ते थे और नाम भी खोजते थे...पिता भी तो ऐसे ही होते हैं। पिछले साल जब पुस्तकालयों को लेकर स्टोरी की तो सर का साक्षात्कार लिया था...इसके बाद प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय और बड़ाबाजार के संबंधों पर स्टोरी की तो सर ने फोन करके तारीफ की...तारीफें मिलती हैं मगर सर की तारीफ मेरे लिए बहुत खास है। वह महानगरीय पुस्तकालय परम्परा के स्तम्भ हैं...पुस्तकालय और कोलकाता के इतिहास को लेकर उनके पास जितनी जानकारी थी, उसका कोई विकल्प नहीं है। तिवारी सर का जाना मेरी ही नहीं इस परम्परा की क्षति है जिसकी भरपाई कर पाना आसान नहीं होगा। सर....जहाँ भी रहें....हम सब उनके लिए बच्चे ही थे...बच्चे ही रहेंगे...और वे हमेशा हमारे आस पास हैं..।

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