मंगलवार, 13 मार्च 2018

ये पब्लिक है, सब जानती है


आपने एक गम्भीर क्षेत्र को सर्कस बनाकर छोड़ दिया है, शायद एक जोकर भी आपसे कहीं ज्यादा संवेदनशील होगा


कहते हैं कि खबर तो खबर होती है मगर आज प्रशस्ति खबर बन रही है। मीडिया में अब ग्लैमर का राज है और पत्रकारों पर बेशर्म होने का दबाव...हम एक विचित्र युग देख रहे हैं। अपनी माँगों को लेकर धरतीपुत्र किसान नंगे पैर चलकर कई दिनों का सफर तय कर शहर पहुँचते हैं। उनका सम्मान करना तो दूर की बात है, उनको शहरी माओवादी बता दिया जाता है। नंगे और छिले हुए पैर...वाले किसान के खेतों से आपको अन्न मिलता है और आप उसका ही अपमान करते हैं। उसका जायज हक तक नहीं देते। किसान आन्दोलन पर और उसके कारणों को लेकर बहुत बातें हो रही हैं...देश भर में आन्दोलन हो रहे हैं मगर हमारा मीडिया बाथ टब की तहकीकात से बाहर नहीं निकल पा रहा है।
सुन सकते हैं तो इन खामोश आँखों की चीख सुनिए
एक या दो दिन दिन नहीं बल्कि कई – कई दिनों तक आप माया के महिमा गान से निकल नहीं पा रहे हैं और आप खुद को जनता और सच्चाई की आवाज बता रहे हैं। अमिताभ बच्चन का तबीयत खराब होना राष्ट्रीय समस्या बन जाता है और आप पल – पल की खबर दिखाते हैं...। मैं खुद मीडिया में हूँ मगर मीडिया के इस बर्ताव से आहत भी हूँ और हैरान भी हूँ। दो लोगों का नितांत व्यक्तिगत जीवन आपके परदों पर छाया रहता है। आखिर किसी सेलिब्रिटी को भी जरूरत से ज्यादा फुटेज क्यों मिलनी चाहिए? आप खबर दिखाइए मगर खबर को क्या खबर की तरह नहीं दिखाया जाना चाहिए? कोई भी जरूरी मुद्दा आप के लिए बेहद छोटा बन जाता है। आपने श्रीदेवी की मौत से आगे जाकर उनके अंतिम संस्कार तक को महाकवरेज बना डाला। किसी का मरना भी आपके लिए टीआरपी है। अदालतों के पहले आप ट्रायल कर रहे हैं मगर सच तो यह है कि यह कई बार वीभत्सता की हद तक पहुँच रहा है।
इस बाथटब में ही आपने पत्रकारिता को मार डाला
खबरें और परिचर्चा मे किम जोंग और मिसाइल या भारत – पाकिस्तान के अलावा क्या आपके पास दिखाने को कुछ नहीं है। आप इसे दर्शकों की पसन्द कहते हैं मगर ये पसन्द तय कौन करता है....? आपने किसानों की हालत नत्थू जैसी बना डाली है। दाना माझी आपके लिए सेंसेशन है और किसानों के छिले हुए पैर और उनसे निकलता हुआ रक्त वक्त की बर्बादी है। प्रिया प्रकाश की आँखों में उलझे आप किम जोंग तक पहुँचते हैं मगर सीरिया में रक्तपात के शिकार बच्चों पर आपकी नजर नहीं जाती और जाती भी है तो उसे दरकिनार कर दिया जाता है। आप हैं कि श्रीदेवी को फिर जन्म देने में लगे हैं।
क्या इससे भद्दा मजाक किसी की मौत का हो सकता है
क्या संवेदनहीन होना ही सफल पत्रकार की निशानी है? चीखकर दूसरों को चुप करवा देना पत्रकारिता नहीं है। मैंने कई चैनलों पर देखा है और देख रही हूँ कि सत्ताधारी पार्टी का महिमामंडन किया जा रहा है और विपक्ष को जबरन खलनायक बनाने की कोशिश की जा रही है। आप सबकी हरकतों का खामियाजा हम जैसे लोग उठाते हैं क्योंकि एसी कमरे से बाहर सड़कों पर जब पत्रकार निकलते हैं तो मजाक उसका ही उड़ता है और सवाल भी उसी से किये जाते हैं। आप खुद को महान और नीति - निर्णायक समझ सकते हैं मगर आपका यह रवैया पत्रकारिता के लिए घातक है। क्या आपको यह अधिकार है कि आप अपने फायदे के लिए एक गम्भीर क्षेत्र को तमाशा बनाकर छोड़ दें। 
इस वीभत्स तस्वीर को भी उतार लीजिए
आम आदमी ही क्यों एक आम पत्रकार की नजर से भी आप नीचे गिर चुके हैं। आपको क्या लगता है कि लोग समझते नहीं हैं....ये पब्लिक है महोदय...सब जानती है। आपने खबरों की दुनिया को सर्कस बनाकर छोड़ दिया है मगर आम जनता के लिए आपका यह तमाशा किसी जोकर जैसा ही है...इससे ज्यादा कुछ नहीं और आप बस इस तमाशे का हिस्सा भर हैं।

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