गुरुवार, 15 मार्च 2018

खबरों को खबर रहने दीजिए...ज्यादा मसाले सेहत खराब कर देंगे

सत्य तो यही है


 अब आम जनता की तरह सुप्रीम कोर्ट मीडिया से परेशान है। यह मीडिया के लिए शर्म का विषय होना चाहिए मगर खाल मोटी है, लगता नहीं कि कोई असर भी पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने बड़ी टिप्पणी करते हुए मीडिया को जिम्मेदारी से काम करने की सलाह दी है। उन्होंने एक याचिका की सुनवाई के दौरान कहा कि हम प्रेस की आजादी का सम्मान करते हैं, लेकिन प्रेस को भी अपनी जिम्मेदारी से काम करना चाहिए। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में बैठे कुछ लोग वो सोचते हैं कि वो कुछ भी लिखते हैं, कुछ लोग तख्त पर बैठकर क्या कुछ भी लिख सकते हैं. क्या ये पत्रकारिता है? वैसे भी मीडिया ट्रायल इस देश में कोई नयी बात नहीं है मगर हाल के कुछ वर्षों में इसने खतरनाक शक्ल ले ली है और एक पत्रकार न चाहते हुए भी पिस रहा है। गालियाँ भी खा रहा है और यह मीडिया प्रबंधनों की मेहरबानी से हो रहा है जिनको टीआरपी चाहिए फिर चाहे वह किसी भी कीमत पर मिले। अदालत बनकर फैसले सुनाने की तरह किसी एक पक्ष को उभारना मीडिया का काम नहीं है मगर आप कोई भी मामला उठाकर देख लीजिए यही हो रहा है। ऐसा लगता है कि कोई मुद्दा मिठाई की तरह है जिसे एक चैनल ने उभारना क्या शुरू किया, सब के सब पीछे पड़ जाते हैं। एक पत्रकार और रिपोर्टर होने के नाते मैं कह सकती हूँ कि इस तरह की खबरें संवाददाताओं या मीडियाकर्मियों की मर्जी नहीं मजबूरी हैं। 
बीबीसी का ये कार्टून एक तीखा मगर वास्तविक कटाक्ष है

यकीन मानिए कि इसके पीछे नौकरी बचाने का भय है और कुछ नहीं। एक चैनल की घटियापंथी हर पत्रकार का सिरदर्द बन जाती है। फिर चाहे वह राम –रहीम का मामला हो, श्रीदेवी की मौत हो या अब जो बंगाल में पिछले कुछ दिनों से चल रहा है। बतौर दर्शक आप भले ही मजे ले रहे हों मगर इस तरह की कवरेज करने वाले पत्रकार उस पहले चैनल को गालियाँ ही दे रहे होते हैं जिसने इसे व्यापक स्तर पर सड़ाध भरते हुए फैलाया। हर किसी का व्यक्तिगत जीवन होता है और मैं मानती हूँ कि अगर इसका असर आम जनता के हितों पर नहीं पड़ता तो इसे सामने लाया ही नहीं जाना चाहिए। प्रचार के लिए किसी भी हद तक जाने वाले सितारे कई बार अपनी हरकतों का पता खुद देते हैं या इस तरह के ट्वीट कर डालते हैं क्योंकि उनको पता है कि आप मुँह – बाये खड़े हैं उसे लपकने के लिए और आप लपक भी लेते हैं। मैं मानती हूँ कि फिल्मों की तरह कहीं न कहीं एक सीमा –रेखा तय होनी जरूरी है। आप मीडिया की आजादी की बात करते है तो आपको याद रखना होगा कि किसी की नाक (व्यक्तिगत जीवन खासकर जब वो सिर्फ स्कूप हो) जहाँ से शुरू होता है, वहाँ से आपकी आजादी खत्म हो जाती है। कई चैनलों ने बेशर्मी का परिचय देते हुए श्रीदेवी की बिकनी में तस्वीरें जारी कीं तो कई बाथटब में कूद गये...ये पत्रकारिता नहीं है। इसी दौरान जब सीरिया में बच्चे मर रहे हैं या कहीं और कोई ऐसी घटना हो रही है...नजर वहाँ पर जानी चाहिए। राजधानी दिल्ली में और अब मुम्बई में किसानों का धरना हुआ और वे कई दिनों तक चलकर नंगे – लहुलहान पैरों के साथ आये...मगर आपका कैमरा वहाँ नहीं गया...और ये तस्वीरें सोशल मीडिया पर घूमती रहीं...आपकी जवाबदेही और आपकी साख दोनों सोशल मीडिया खा रहे हैं और इसके जिम्मेदार कोई और नहीं आप हैं। कोई तुक नही है कि शमी और उनकी पत्नी के विवाद को इतना उछाला जाये...हसीन का व्हाट्सएप वायरल किया जाये...खबर दिखाइए जरूर दिखाइए मगर खबर को खबर की तरह दिखाइए...उस पर कई घंटे और दिन जाया करने का कोई मतलब  नहीं है। इन दिनों मेयर शोभन चटर्जी, उनकी पत्नी रत्ना और वैशाखी के साथ उनके रिश्तों की महाभारत पढ़ी जा रही है। मेयर के श्वसुर तक के बयान लिये जा रहे हैं....कोई बताये कि इससे जनता का कौन सा हित सधता है या यह कौन सी राष्ट्रीय समस्या है मगर एक चैनल की हरकत का खामियाजा पत्रकारों को उठाना पड़ रहा है। मुझे लगता है कि आधे से ज्यादा अपराध कम हो जायेंगे अगर मीडिया पर नियंत्रण हों...खबरों को मसाला बनाकर पेश करने वाले लोगों ने औरतों को सनसनी बना रखा है और नतीजा यह है कि जनसत्ता और एनडीटीवी जैसे चैनलों को भी इस रेस में शामिल होना पड़ रहा है, यह शर्मनाक है।
स्थिति यही हो गयी है

 आप कहते हैं कि जनता को यह पसन्द है मगर क्या आपके बच्चों को जहर खाना पसन्द है तो आप उसे जहर देंगे या उसे बेहतर विकल्प देंगे? कुछ ही चैनल ऐसे हैं जो अच्छी चीजें ला रहे हैं जिनमें से इपिक चैनल प्रमुख हैं मगर खबरिया चैनलों के लिए राजनीतिक प्रोपेगंडा ही प्रमुख है जो हुकूमत से रिश्तों के हिसाब से कवरेज करता है। जी न्यूज, इंडिया टीवी ऐसे चैनल हैं जो सरकार की नकारात्मकता को भी उपलब्धि बनाने में जुटे हैं तो एनडीटीवी है जिसे हर बात में विफलता नजर आती है। एबीपी और आजतक हैं जो सनसनीखेज खबरों को ही पत्रकारिता समझते हैं...अफसोस है। एक समय था जब हम दूरदर्शन में समाचार देखते थे तो वह भी सरकार दर्शन ही लगता था मगर फिर भी थोड़ी सी ही सही तटस्थता रहती थी। कई बार तो पत्रकार को स्पष्ट रूप से उसे कह देना पड़ रहा है कि यह खबर सरकार के विरोध या पक्ष में है इसलिए नहीं जा सकती मगर यह कहते हुए उसका सिर शर्म से कैसे झुकता है और उसे कितनी ग्लानि होती है, ये आम जनता नहीं समझेगी। बड़ी शर्म आती है जब कोई कहता है कि आपनी तो एई – शेई पार्टीर लोक....मगर हम इस शर्मिंदगी के साथ जीते हैं, जी रहे हैं...कोई नहीं समझता और न ही कोई जानता कि यह उस पत्रकार की मजबूरी है क्योंकि विकल्पहीनता ऐसी है कि हर जगह माहौल ऐसा ही है। साँप छोड़ेंगे तो अजगर से लिपटना पड़ेगा....रोजी – रोटी का मामला है। बतौर पत्रकार बड़ी कोफ्त और विचित्र स्थिति में पड़ते हैं हम जब किसी स्टोरी को करने पर ये सुनना पड़े कि ये सिंगल कॉलम जायेगी क्योंकि इसमें विज्ञापन नहीं है या किसी घटिया खबर को चार कॉलम में फैलाना होता है....कई बार लगता है कि कुछ और किया जाये...मगर आप करेंगे क्या? क्या सब छोड़कर चल देना समाधान है
ये बड़ा सवाल है

आप जब तक हैं, विरोध कर सकते हैं फिर भले ही आपकी बात सुनी जाये या न सुनी जाये मगर छोड़ देने का मतलब है कि आप अधिक गलत चीजों के लिए रास्ता बना रहे हैं सच तो यह है कि ऐसे पत्रकारों को ही हाशिये पर डाल दिया जा रहा है और फिर उसकी मदद के लिए कोई नहीं आता। अंततः कोई करे, हमें क्या...नौकरी ही तो करनी है....वाली स्थिति भी है। फिर भी स्थिति बदली जा सकती है मगर खतरा उठाना पड़ेगा। दिक्कत यह है कि एकजुटता ही नहीं है....और सबसे बड़ी बात बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधे....कम से कम खबरचियों की कहानी तो कही जा सकती है....हम वहीं कर रहे हैं मगर जिम्मेदार तो आपको होना ही पड़ेगा...वरना सुप्रीम कोर्ट ट्रेलर दिखा चुका है, पिक्चर दिखाते उसे देर नहीं लगेगी।

(सभी तस्वीरें गूगल अंकल से साभार)

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