बुधवार, 29 अगस्त 2018

संघ कट्टर है तो उतने ही कट्टर और एकांगी आप भी हैं...



विरोध की अन्धी राजनीति के शिकार जब हम हो जाते हैं तो अच्छा और बुरा कुछ नहीं दिखता। हम सिर्फ बुराइयाँ देखते हैं और उसे नीचा दिखाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। भारतीय राजनीति इन दिनों इसी दौर से गुजर रही है जहाँ न सामन्जस्य दिखता है, न सौहार्द और न शिष्टाचार। काँग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी नाराज हैं कि भीमा कोरेगाँव मामले में 5 वरिष्ठ वामपंथी सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी हुई। किसी को अघोषित आपातकाल नजर आ रहा है। इन बुद्धिजीवियों पर मेरा कुछ कहना सही नहीं है इसलिए इन पर कोई टिप्पणी नहीं करूँगी मगर उदारवाद की बात करने वाले कितने उदार हैं, ये उनको अपने अन्दर झाँकना चाहिए। आप साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों की जमात में तभी शामिल हो सकते हैं जब आप मोदी, भाजपा और आरएसएस का विरोध करें...तभी आपको जगह मिलेगी और आपको सुना जाएगा...। सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे लोग और ऐसे समूह भी दिखे जो विचारधारा के विरोध से नीचे गिरकर इस गटर तक पहुँच गये हैं कि अब व्यक्तिगत हमलों पर उतर गये हैं और यह बीमारी दोनों तरफ है...फिर भी आप खुद को उदार और सामन्जस्य करने वाला कहते हैं तो शायद उदार मानसिकता का अर्थ भी खोजना होगा। सांस्कृतिक और सृजनात्मक स्तर पर आपका लेखन भी इसी दिशा में जा रहा है कि आपने अपने आस - पास भी घेरा बना लिया है और उससे बाहर निकल ही नहीं पा रहे हैं...यह बौद्धिकता का अहं भी अहंकार ही है जो किसी और की अच्छाइयों को स्वीकार करने ही नहीं दे रहा है। यह अहंकार ही है कि आपने मान लिया कि भाजपा और आरएसएस या उनकी पार्टी के नेता किसी भी ऊँचे पद या प्रधानमंत्री पद के योग्य ही नहीं हैं और यह उतना ही घटिया और खतरनाक है जितना राहुल गाँधी को पप्पू कहकर प्रधानमंत्री पद की उनकी दावेदारी को सिरे से खारिज कर देना। हाँलाकि निजी तौर पर मैं यही मानती हूँ कि राहुल से बेहतर नेता उनकी पार्टी में हैं मगर कौन नहीं जानता कि गाँधी परिवार का विकल्प बनने वालों के साथ क्या हुआ। क्या माधवराव सिंधिया और राजेश पायलट की अकस्मात हादसों में मौत महज एक संयोग थी, मैं नहीं मानती...ये बात हजम नहीं होती। लालकृष्ण आडवाणी के सम्मान को लेकर चिन्तित हो रही पार्टी को याद आना चाहिए कि उन्होंने पार्टी के पूर्व अध्यक्ष सीताराम केसरी और पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को किस तरह किनारे लगाया था। यहाँ तक कि दिल्ली में उनका अंतिम संस्कार न नहीं होने दिया गया और न ही पार्टी मुख्यालय में उनका शव लाने दिया गया...। ये कौन सा लोकतन्त्र है, अब ये तो राहुल गाँधी समझायेंगे...राजनीति का चारणकाल देखना हो तो वर्तमान कांग्रेस को देखा जा सकता है। राजनेता लड़ते हैं....समझा जा सकता है मगर कला और साहित्य के लोग विचारधारा के विरोध को व्यक्तिगत विरोध तक ले जाते हैं तो दया भी आती है और अफसोस भी होता है। जो सम्मान अटल जी को मोदी सरकार ने दिया...उसका आधा भी आपने अपने नेताओं को नहीं दिया। कौन सा प्रधानमंत्री इस तरह पैदल चला जैसे मोदी अटल जी की अंतिम यात्रा में चले...वैसे दृष्टि आपकी अपनी है, जिस रूप में देखिए।
ये आरएसएस का ही कार्यक्रम है

 वाम पार्टियों ने 40 साल तक पार्टी को सेवा देने वाले सोमनाथ चटर्जी के साथ क्या किया...ये सब जानते हैं...इसमें कौन सा आदर छुपा था? इसे लेकर मैंने किसी बुद्धिजीवी को कभी रोते नहीं देखा....ये कौन सी उदारता है? 1993 में वाममोर्चा की ही सरकार थी जब बाल पकड़कर ममता बनर्जी को धक्के देकर राइटर्स से निकाला गया। 2007 में नन्दीग्राम में 14 किसानों पर गोलियाँ चलीं...तब भी आपकी ही सरकार थी...सिंगुर और नन्दीग्राम में जब हिंसा हुई, तब भी आपकी ही सरकार थी...क्यों नहीं आप इस पर बात करते? सर्वहारा वर्ग के लिए लड़ने और आन्दोलन की बात करने वाले वामपंथियों को याद रखना चाहिए कि खुद उनके राज में उन्होंने क्या किया था। आज केरल में हिंसा हो रही है तो भी अभी आपकी ही सरकार वहाँ पर है...क्यों नहीं बोल फूटते किसी के? अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के नाम पर लानतें भेजने वाले साहित्यकार तब क्यों मौन हो जाते हैं जब तसलीमा नसरीन को वाममोर्चा और तृणमूल, दोनों ही सरकारें बंगाल नहीं आने देतीं। कोई मुझे बताये कि शहीद दिवस पर होने वाले तमाशे को सरकारी समारोह की तरह क्यों मनाया जाता है कि आम आदमी और बच्चे भी कड़ी धूप में चलने को मजबूर होते हैं....। तृणमूल के पास ऐसा कौन सा जादू है कि किसी भाजपा नेता के दौरे के बाद ही उसकी आवभगत करने वाला अगले दिन तृणमूल में शामिल हो जाता है? मीडिया को एक बार नहीं, कई बार दीदी के राज में पीटा गया है...एक किसान को जब सवाल करने पर और एक छात्रा के सवाल करने पर जब माओवादी कहा गया तब आप खामोश क्यों रहे? आप आरएसएस से पूछते हैं कि स्वाधीनता सँग्राम में उनका योगदान क्या था तो आपको यह भी बताना चाहिए कि आपने कौन सी लड़ाई लड़ी। भगत सिंह हों या कोई और क्रान्तिकारी, वे इस देश के थे और इस देश के लिए लड़े थे...किसी खास पार्टी का लेबल चस्पा करना उनका अपमान करना है। फारर्वड ब्लॉक नेताजी के साथ कांग्रेस में हुए बर्ताव को क्यों भूल जाती है। आज के वामपंथी आखिर किस वामपंथ को अपना आधार मानते हैं? क्या वे रूस के उस वामपंथ को फॉलो करते हैं जिसकी नींव मार्क्स और लेनिन के विचारों पर पड़ी थी? लेकिन उस पर तो स्टालिन ने असल इमारत बनाई थी। और उस स्टालिन ने तो वैचारिक विरोधियों को पूरी तरह से साफ करते हुए असहिष्णुता का एक पैमाना गढ़ दिया था। भगत सिंह ऐसे असहिष्णु तो नहीं थे। या फिर आज के वामपंथी चीन के उस वामपंथ को मानते हैं जिसमें ‘साम्यवाद’ और साम्रज्यवाद के सहारे अमीरों और गरीबों के बीच का फासला लगातार बढ़ता जा रहा है। भगत सिंह तो ऐसे भी नहीं थे। आज की कम्यूनिस्ट पार्टियाँ उस आदर्श पर चल भी नहीं रही हैं। खासकर इनके छात्र संगठनों को देखती हूँ तो वह अराजकता का प्रतिरूप ही लगते हैं जिनके लिए आन्दोलन का मतलब ही शिक्षकों का घेराव कर उनकी ब्लैकमेलिंग करना ही है।

अनुशासन शब्द से इनको नफरत है। ये एसएफआई के समर्थक ही थे जिन्होंने एक प्रिंसिपल पर पेट्रोल उड़ेल दिया था और अधिकतर छात्र संगठन यही रास्ता अपना रहे हैं। कांग्रेस का छात्र संगठन तो अध्यक्ष के सामने ही लड़ पड़ता है और टीएमसीपी की गुटबाजी तो जगजाहिर है। इसमें एबीवीपी भी कम नहीं हैं.....राजनीति करने का दूसरा तरीका आग लगाने वाले बयान देना हो गया है। ये कौन सा देशप्रेम है जो आपको कश्मीर में साम्राज्यवाद देखना सिखाता है, सेना को शोषक मानना सिखाता है...सुरक्षा बलों को गालियाँ देना सिखाता है? मानवतावाद का मतलब अपने घर में आग लगाकर दुश्मनों को कमान देना कब से हो गया? ये कौन सी बौद्धिकता है जो आपको परम्परा और इतिहास को खारिज करना सिखाती है? आपने जिस चीन और रूस की परम्परा को कभी आँख से खुद नहीं देखा...उसे आप सत्य मानते हैं मगर आपकी नजर में आपका अपना प्राचीन भारतीय साहित्य, कला, स्थान और यहाँ तक कि आज सेना का अभियान फर्जी है। आप अल्पसंख्यकों में असुरक्षा भरते जा रहे हैं मगर आप तीन तलाक को लेकर कभी नहीं बोलते। दूसरी तरफ तीन तलाक पर रोने वाले वैवााहिक बलात्कार के मुद्दे पर खामोश हैं। आप छोटे बच्चों पर हिंसा को लेकर खामोश हैं। आप गौरी लंकेश और कलबुर्गी को लेकर रोते हैं मगर आपके आस -पास हर रोज पत्रकार मरते हैं तो आप उनके लिए खड़े नहीं होते। आपकी मॉब लिचिंग का विरोध भी सिलेक्टिव है। आप धार्मिक स्थलों और आरक्षण में महिलाओं को स्थान दिलाने की बात पर संसद में हंगामा नहीं करते। टिकटों के मामले में तो हर पार्टी में महिलाओं की भागीदारी न्यूनतम है। आपके लिए विचारधारा का विरोध व्यक्ति विरोध में सिमट गया है और यह आपको अब अप्रासंगिक ही नहीं हास्यास्पद बना रहा है।
आज के वामपंथी आखिर किस वामपंथ को अपना आधार मानते हैं? क्या वे रूस के उस वामपंथ को फॉलो करते हैं जिसकी नींव मार्क्स और लेनिन के विचारों पर पड़ी थी? लेकिन उस पर तो स्टालिन ने असल इमारत बनाई थी। और उस स्टालिन ने तो वैचारिक विरोधियों को पूरी तरह से साफ करते हुए असहिष्णुता का एक पैमाना गढ़ दिया था। भगत सिंह ऐसे असहिष्णु तो नहीं थे। या फिर आज के वामपंथी चीन के उस वामपंथ को मानते हैं जिसमें ‘साम्यवाद’ और साम्रज्यवाद के सहारे अमीरों और गरीबों के बीच का फासला लगातार बढ़ता जा रहा है। भगत सिंह तो ऐसे भी नहीं थे।
बात अगर योगदान की है तो आलोचकों की प्रेरणा से ही मैंने राष्ट्रीय सेवक संघ के बारे में पढ़ा। पसन्द न करने का मतलब पूरी तरह खारिज कर देना हो गया है। क्या विष्णुकान्त शास्त्री, मुरली मनोहर जोशी और सावरकर जैसे नेता इसलिए खारिज किये जाएँगे कि वह संघ से जुड़े हैं? दोनों तरफ के तथाकथित बुद्धिजीवी एक दूसरे के लिए गदहे जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं...आप क्या देकर जा रहे हैं भावी पीढ़ी को...यह सोचने वाली बात है। शर्म की बात यह है कि संसद की कार्रवाई से प्रधानमंत्री के शब्द हटाने पड़ रहे हैं तो विपक्ष का नेता गले लगकर संसद में आँख मारता है।

जब बात विरोध के साथ योगदान की चली तो पूछा गया कि संघ व आरएसएस का योगदान क्या है। मेरे मन में भी जिज्ञासा हुई तो मैंने खोजा और बीबीसी हिन्दी (जी हाँ, वही बीबीसी जो संघ और भाजपा के साथ कट्टर मोदी विरोधी भी है) की वेबसाइट पर यह आलेख मिला जो मैं आपको पढ़वा रही हूँ।
साम्प्रदायिक हिंदूवादी, फ़ासीवादी और इसी तरह के अन्य शब्दों से पुकारे जाने वाले संगठन के तौर पर आलोचना सहते और सुनते हुए भी संघ को कम से कम 7-8 दशक हो चुके हैं। दुनिया में शायद ही किसी संगठन की इतनी आलोचना की गई होगी जितनी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की की गयी है वह भी बिना किसी आधार के लेकिन यही संघ की महानता है कि संघ के ख़िलाफ़ लगा हर आरोप आख़िर में पूरी तरह कपोल-कल्पना और झूठ साबित हुआ है। इसके बावजूद इसमें कोई शक नहीं है कि आज भी कई लोग संघ को इसी नेहरूवादी दृष्टि से देखते हैं। नेहरूवादी सोच इसलिए क्योंकि देश के प्रथम प्रधानमन्त्री श्री जवाहलाल नेहरू संघ के प्रति यही नफरत वाला भाव रखते थे हालांकि ख़ुद नेहरू जी को जीते-जी अपना दृष्टि-दोष ठीक करने का एक दुखद अवसर तब मिल गया था, जब 1962 में देश पर चीन का आक्रमण हुआ था। तब देश के बाहर पंचशील और लोकतंत्र वग़ैरह आदर्शों के मसीहा जवाहरलाल न ख़ुद को संभाल पा रहे थे, न देश की सीमाओं को. लेकिन संघ अपना काम कर रहा था।

आज आपको बताते हैं राष्ट्र के लिए आरएसएस के वो 10 योगदान जो आजादी के नकली ठेकेदार करना तो दूर सोच भी नहीं सकते हैं....

१- कश्मीर सीमा पर निगरानी, विभाजन पीड़ितों को आश्रय
जब 1947 में देश का विभाजन हुआ तो संघ के स्वयंसेवकों ने अक्टूबर 1947 से ही कश्मीर सीमा पर पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों पर बगैर किसी प्रशिक्षण के लगातार नज़र रखी। ये काम न नेहरू-माउंटबेटन सरकार कर रही थी, न महाराजा हरिसिंह सरकार. उसी समय, जब पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों ने कश्मीर की सीमा लांघने की कोशिश की, तो सैनिकों के साथ कई स्वयंसेवकों ने भी अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए लड़ाई में प्राण दिए थे। विभाजन के दंगे भड़कने पर, जब नेहरू सरकार पूरी तरह हैरान-परेशान थी, संघ ने पाकिस्तान से जान बचाकर आए शरणार्थियों के लिए 3000 से ज़्यादा राहत शिविर लगाए थे।
२- 1962 का युद्ध
जब 1962 में भारत चीन का युद्ध हुआ तो सेना की मदद के लिए देश भर से संघ के स्वयंसेवक जिस उत्साह से सीमा पर पहुँचे, उसे पूरे देश ने देखा और सराहा। स्वयंसेवकों ने सरकारी कार्यों में और विशेष रूप से जवानों की मदद में पूरी ताकत लगा दी - सैनिक आवाजाही मार्गों की चौकसी, प्रशासन की मदद, रसद और आपूर्ति में मदद, और यहां तक कि शहीदों के परिवारों की भी चिंता की तथा मदद की। यही कारण था कि जवाहर लाल नेहरू को 1963 में 26 जनवरी की परेड में संघ को शामिल होने का निमंत्रण देना पड़ा। परेड करने वालों को आज भी महीनों तैयारी करनी होती है, लेकिन मात्र दो दिन पहले मिले निमंत्रण पर 3500 स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित हो गए. निमंत्रण दिए जाने की आलोचना होने पर तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्री नेहरू जी ने कहा, "यह दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है, विशेष रूप से 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को आकस्मिक आमंत्रित किया गया।"
३- कश्मीर का विलय
कश्मीर के महाराजा हरि सिंह विलय का फ़ैसला नहीं कर पा रहे थे और उधर कबाइलियों के भेस में पाकिस्तानी सेना सीमा में घुसती जा रही थी तब नेहरू सरकार तो - हम क्या करें वाली मुद्रा में मौन साधकर बैठी थी तब सरदार पटेल ने गुरुजी गोलवलकर से मदद माँगी। गुरुजी श्रीनगर पहुँचे, महाराजा से मिले. इसके बाद महाराजा ने कश्मीर के भारत में विलय पत्र का प्रस्ताव दिल्ली भेज दिया।
४- 1965 के युद्ध में क़ानून-व्यवस्था संभाली
1965 में जब भारत पकिस्तान का युद्ध हुआ तो पाकिस्तान से युद्ध के समय प्रधानमन्त्री श्री लालबहादुर शास्त्री जी को भी संघ याद आया था। शास्त्री जी ने क़ानून-व्यवस्था की स्थिति संभालने में मदद देने और दिल्ली का यातायात नियंत्रण अपने हाथ में लेने का आग्रह किया, ताकि इन कार्यों से मुक्त किए गए पुलिसकर्मियों को सेना की मदद में लगाया जा सके। घायल जवानों के लिए सबसे पहले रक्तदान करने वाले भी संघ के स्वयंसेवक थे। युद्ध के दौरान कश्मीर की हवाईपट्टियों से बर्फ़ हटाने का काम संघ के स्वयंसेवकों ने किया था।
५- गोवा का विलय
1947 में देश तो आजाद हो गया था लेकिन देश के कई हिस्से इस आजादी से अछूते थे तब दादरा, नगर हवेली और गोवा के भारत विलय में संघ ने निर्णायक भूमिका निभाई थी। 21 जुलाई 1954 को दादरा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया, 28 जुलाई को नरोली और फिपारिया मुक्त कराए गए और फिर राजधानी सिलवासा मुक्त कराई गई। संघ के स्वयंसेवकों ने 2 अगस्त 1954 की सुबह पुतर्गाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा फहराया, पूरा दादरा नगर हवेली पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त करा कर भारत सरकार को सौंप दिया। संघ के स्वयंसेवक 1955 से गोवा मुक्ति संग्राम में प्रभावी रूप से शामिल हो चुके थे. गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेप करने से नेहरू के इनकार करने पर जगन्नाथ राव जोशी के नेतृत्व में संघ के कार्यकर्ताओं ने गोवा पहुंच कर आंदोलन शुरू किया, जिसका परिणाम जगन्नाथ राव जोशी सहित संघ के कार्यकर्ताओं को दस वर्ष की सजा सुनाए जाने में निकला. हालत बिगड़ने पर अंततः भारत को सैनिक हस्तक्षेप करना पड़ा और 1961 में गोवा आज़ाद हुआ।
६- आपातकाल
1975 में प्रधानमन्त्री श्री इंदिरा गांधी जी ने जब देश में आपातकाल की घोषणा कर दी तब1975 से 1977 के बीच आपातकाल के ख़िलाफ़ संघर्ष और जनता पार्टी के गठन तक में संघ की भूमिका की याद अब भी कई लोगों के लिए ताज़ा है। सत्याग्रह में हजारों स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी के बाद संघ के कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रह कर आंदोलन चलाना शुरु किया. आपातकाल के खिलाफ पोस्टर सड़कों पर चिपकाना, जनता को सूचनाएं देना और जेलों में बंद विभिन्न राजनीतिक कार्यकर्ताओं -नेताओं के बीच संवाद सूत्र का काम संघ कार्यकर्ताओं ने सम्भाला। जब लगभग सारे ही नेता जेलों में बंद थे, तब सारे दलों का विलय करा कर जनता पार्टी का गठन करवाने की कोशिशें संघ की ही मदद से चल सकी थीं।
७- भारतीय मज़दूर संघ
भारतीय मजदूर संघ आरएसएस की ही शाखा है। 1955 में बना भारतीय मज़दूर संघ शायद विश्व का पहला ऐसा मज़दूर आन्दोलन था, जो विध्वंस के बजाए निर्माण की धारणा पर चलता था। कारखानों में विश्वकर्मा जयंती का चलन भारतीय मज़दूर संघ ने ही शुरू किया था। आज यह विश्व का सबसे बड़ा, शांतिपूर्ण और रचनात्मक मज़दूर संगठन है।
८- ज़मींदारी प्रथा का ख़ात्मा
जहां बड़ी संख्या में ज़मींदार थे उस राजस्थान में ख़ुद सीपीएम को यह कहना पड़ा था कि भैरों सिंह शेखावत राजस्थान में प्रगतिशील शक्तियों के नेता हैं। संघ के स्वयंसेवक दादोसा माननीय श्री भैरों सिंह शेखावत बाद में भारत के उपराष्ट्रपति भी बने तथा आज भी न सिर्फ राजस्थान बल्कि पूरा देश शेखावत साहब को अपना नायक मानता है।


९- शिक्षा के क्षेत्र में संघ
शिक्षा के क्षेत्र में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का योगदान अतुलनीय है. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षा भारती, एकल विद्यालय, स्वदेशी जागरण मंच, विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम आदि संघ के ही स्वयंसेवी संघठन हैं। विद्या भारती आज 20 हजार से ज्यादा स्कूल चलाता है, लगभग दो दर्जन शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेज, डेढ़ दर्जन कॉलेज, 10 से ज्यादा रोजगार एवं प्रशिक्षण संस्थाएं चलाता है। केन्द्र और राज्य सरकारों से मान्यता प्राप्त इन सरस्वती शिशु मंदिरों में लगभग 30 लाख छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं और 1 लाख से अधिक शिक्षक पढ़ाते हैं। संख्या बल से भी बड़ी बात है कि ये संस्थाएं भारतीय संस्कारों को शिक्षा के साथ जोड़े रखती हैं। अकेला सेवा भारती देश भर के दूरदराज़ के और दुर्गम इलाक़ों में सेवा के एक लाख से ज़्यादा काम कर रहा है। लगभग 35 हज़ार एकल विद्यालयों में 10 लाख से ज़्यादा छात्र अपना जीवन संवार रहे हैं। उदाहरण के तौर पर सेवा भारती ने जम्मू कश्मीर से आतंकवाद से अनाथ हुए 57 बच्चों को गोद लिया है।

१०- सेवा कार्य
देश में आयी आपदा के समय भी संघ आगे बढ़कर राष्ट्र निर्माण के कार्य में अपना योगदान दिया है। 1971 में ओडिशा में आए भयंकर चंक्रवात से लेकर भोपाल की गैस त्रासदी तक, 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों से लेकर गुजरात के भूकंप, सुनामी की प्रलय, उत्तराखंड की बाढ़ और कारगिल युद्ध के घायलों की सेवा तक - संघ ने राहत और बचाव का काम हमेशा सबसे आगे होकर किया है। भारत में ही नहीं, नेपाल, श्रीलंका और सुमात्रा तक में संघ ने आपातकालीन स्थितियों में मदद की है..!!
इस सबके बाद भी कांग्रेस पार्टी क्या अन्य सभी आजादी के नकली ठेकेदारों को संघ को गाली देने का, संघ को आतंकी बोलने का, संघ की आलोचना करने का पूर्ण अधिकार है, लेकिन संघ की जितनी ज्यादा आलोचना हुई है, संघ उतना ही ज्यादा मजबूत हुआ है तथा देश के नवनिर्माण में अपनी भूमिका निभाई है. यही कारण है कि संघ आज दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संघठन है तथा अनवरत हिन्दुस्तान तथा हिन्दुस्तान की गौरवशाली संस्कृति को संजोकर रखते हुए भारतमाता को पुनः विश्वगुरु की पदवी पर विराजमान कराने के लिए प्रयत्नशील है।
बीबीसी पर प्रकाशित आलेख का लिंक यह रहा https://www.bbc.com/hindi/india-44393179

खुद राहुल जी के नाना जी संघ की तारीफ करते हैं और राहुल जी सीधे मुस्लिम ब्रदरहुड से इसे जोड़ देते हैं। संघ के अनुशासन का लोहा तो सब मानते हैं मगर क्या वह अनुशासन आज किसी और राजनीतिक दल में है। अगर वैचारिक कट्टरता और हिन्दूत्व के कारण ही आप संघियों की बुराई करते हैं तो तुष्टिकरण की राजनीति कर आप भी इसी राह पर चल रहे हैं...आपने मुस्लिम समुदाय की जड़ता का विरोध नहीं किया...वहाँ मौलवियों के शोषण से परेशान महिलाओं का साथ कभी नहीं दिया....तो आप भी उसी राह के हिमायती साबित हो रहे हैं जिनके विरोध में आप कसीदे गढ़ते हैं। धर्मनिरपेक्षता का मतलब सर्व धर्म, सम भाव होता है न कि किसी एक समुदाय,मत अथवा धर्म को उसके बहुसंख्यकप्रिय होने की सजा देना...हिन्दू होना अगर गर्व की बात नहीं है तो ऐसा कोई कारण नहीं है कि इस पर शर्म की जाए....सोच तो आप बदल नहीं सकते....एक झूठे अहंकार और बौद्धिकतावाद से ग्रस्त होना ही अगर पैठ बनाना और सामूहिकता का अंग है तो हम तो दूर ही अच्छे हैं...क्योंकि मुझे भारतीय, भारतीयता और उसकी हर बात से प्यार है...। धन्यवाद पत्थर फेंकने के लिए और फेंकिए...इमारत तो गढ़कर रहेंगे..जय हिन्द।

(सभी तस्वीरें - साभार )

सोमवार, 20 अगस्त 2018

खौफनाक गुजरा अगस्त 2018, ‘अजातशत्रु’ अटल संग गये सोमनाथ व करुणानिधि


सुषमा त्रिपाठी

सोमनाथ चटर्जी और लालकृष्ण आडवाड़ी के साथ

क्या खोया, क्या पाया जग में
मिलते और बिछुड़ते मग में
मुझे किसी से नहीं शिकायत
यद्यपि छला गया पग-पग में
एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें!

ये अगस्त खौफनाक गुजरा....और अगस्त का यह सप्ताह भारतीय राजनीति का युगान्त साबित हुआ। देश ने एक के बाद, एक नहीं तीन दिग्गज नेताओं को खोया। गत 7 अगस्त को पहले करुणानिधि और फिर गत 13 अगस्त को पूर्व लोकसभाध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी गये। देश इस सदमे से उबर भी नहीं पाया कि स्वतन्त्रता दिवस के अगले दिन गत 16 अगस्त को ही युगपुरुष अटल बिहारी वाजपेयी ने भी इस भौतिक जगत से नाता तोड़ लिया। हम शोक सन्तप्त हैं, निःशब्द हैं और रह - रहकर इतिहास अपने पन्ने पलट रहा है। हम भी पीछे मुड़कर देख रहे हैं...वह मैत्रीभाव...जिस पर न पार्टी की राजनीति हावी हो सकी और न विचारधाराओं की विभिन्नता बल्कि वहाँ तो नजर आती है परस्पर आदर की भावना..। भाजपा के वरिष्ठ नेता वाजपेयी पहली बार 1996 में 13 दिनों के लिए, 1998 में 13 महीने और फिर 1999 से 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। वाजपेयी 1991, 1996, 1998, 1999 और 2004 में लखनऊ से लोकसभा सांसद रहे हैं। वाजपेयी बतौर प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा करने वाले पहले और अब तक के एकमात्र गैर-कांग्रेसी नेता रहे हैं। केन्द्र में मोदी सरकार के आने के बाद वाजपेयी को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया।
अगर सोमनाथ चटर्जी की बात करें तो उनकी उदारता, उनकी विद्वता हमेशा याद की जाती रहेगी। सोमनाथ चटर्जी ने अपनी ही पार्टी में अपनी उपेक्षा अंत समय तक सही मगर अटल जी को उनकी पार्टी से सदैव सम्मान मिला। सम्मान की पराकाष्ठा इसके अधिक क्या होगी कि उनकी अंतिम यात्रा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उनके पीछे पैदल चले...दरअसल, यह प्रधानमंत्री का सौजन्य और अपने गुरु के प्रति आदर तो है मगर इससे भी अधिक वाजपेयी जी का उदात्त, उदार और विराट व्यक्तित्व है जिसने उनको ‘अजातशत्रु’ बना दिया। इस अजातशत्रु के सामने देश नतमस्तक है जिसने राजनीति को सौजन्य का शिखर दिया...जिनकी गर्जना ने पाकिस्तान को दहला दिया। वे ‘एक नहीं, दो नहीं करो बीसों समझौते’ कविता में दहाड़ते हैं - ‘धमकी, जेहाद के नारों से, हथियारों से/कश्मीर कभी हथिया लोगे, यह मत समझो/हमलों से, अत्याचारों से, संहारों से/भारत का भाल झुका लोगे, यह मत समझो।’ 


पूर्व लोकसभाध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी और वाजपेयी जी के सम्बन्ध बड़े गहरे थे। सोमनाथ चटर्जी वामपन्थी विचारधारा के थे लेकिन विपरीत धुरी कहलाने वाली भाजपा नेता व पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से उनके बेहतर सम्बन्ध थे, तभी तो एक बार 2002 में पद से इस्तीफा देने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने उनका हाथ पकड़कर इस्तीफा न देने की गुजारिश की थी। वहीं 2008 में सोमनाथ चटर्जी लोकसभा में अपना प्रोटोकॉल को तोड़ते हुए अटल बिहारी वाजपेयी के आने पर अपनी कुर्सी से खड़े हो गए। आज की सियासत में असमान विचारधाराओं के नेताओं के बीच न तो ऐसा सौजन्य दिखता है और न ही ऐसी मैत्री दिखती है। दोनों नेताओं के साथ संयोग था कि दोनों 10 बार सांसद रहे और दोनों 1984 के चुनाव में हारे भी। आपातकाल के दौरान जब सोमनाथ चटर्जी ने अपना पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए विदेश मंत्रालय में जमा कराया तो उन्हें पासपोर्ट वापस नहीं किया गया। इस पर चटर्जी ने विदेश जाने के लिए पश्‍चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्घार्थशंकर राय से कई बार गुहार लगाई लेकिन बात नहीं बनी। 1977 में सत्ता परिवर्तन के बाद जब वाजपेयी विदेश मंत्री बने तो सोमनाथ चटर्जी ने उन्हें आपबीती बतायी। इस पर विदेश मंत्रालय का अधिकारी उसी शाम को सोमनाथ चटर्जी के घर पर पासपोर्ट लेकर पहुँच गया। इन दोनों नेताओं की मित्रता का एक और प्रसंग आता है। 2002 के गोधराकांड पर 2005 में लोकसभा में जमकर हंगामा हुआ। तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने गोधरा कांड के लिए संघ को जिम्मेदार ठहराया। इस पर वाजपेयी कुछ बोलना चाहते थे लेकिन लालू बार-बार उन्हें टोक रहे थे। इससे नाराज चटर्जी ने कहा कि वाजपेयी के भाषण के बीच में टोका-टोकी न की जाए।  अटल जी की दृढ़ता देखिए कि वे गुजरात के तत्कालीन सीएम और अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को उनका राजधर्म याद दिलाने से नहीं चूके।
बहुत कम लोग जानते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने पिता के साथ कानून की पढ़ाई की थी। उन्होंने कानपुर के डीएवी कॉलेज से कानून में डिग्री की इच्छा अपने पिता से जताई थी, जिसके बाद उनके पिता ने भी अपने बेटे के साथ कानून की डिग्री के लिए दाखिला लिया। यहाँ तक कि कानून के छात्र के रूप में पिता-पुत्र एक साथ एक सत्र के दौरान एक ही हॉस्टल के एक कमरे में रहे। वाजपेयी जी की निष्पक्षता और उनका दृढ़ संकल्प पोखरण विस्फोट के बाद लगी आर्थिक पाबंदियों के बीच उनके अडिग रवैये से मिलता है। 11 और 13 मई 1998 को पोखरण में पाँच भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट करके अटल बिहारी वाजपेयी जी ने भारत को परमाणु शक्ति सम्पन्न देश घोषित कर दिया। इन तमाम आर्थिक प्रतिबन्धों से उबरकर विरासत में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक आर्थिक रूप से सुदृढ़ भारत ही दिया। पोखरण के बाद जब भारत को प्रतिबंधित करने की कोशिशें हुई तब भी चट्टान बने रहे। उन्हों खुद ही लिखा भी-‘दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते/ टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते।’

महाकवि नीरज और अटल जी 
कवि नीरज

यह बरबस नही बल्कि बड़ी शिद्दत से एक नाम उभरता है पंडित गोपालदास नीरज का। इस महाकवि और अटल विहारी वाजपेयी की कुंडली के सभी ग्रह एक ही जैसे रहे हैं। सिर्फ चन्द्रमा का अंतर रहा है। नीरज जी इस को लेकर कई बार चर्चा किया करते थे। यह इत्तफाक ही है कि नीरज जी ने भी अपनी अनन्त की यात्रा अभी अभी हाल ही में गत 19 जुलाई को शुरू की है। कुछ ही दिन बीते हैं। आज अटल जी उसी अनन्त यात्रा पर निकल पड़े। ये दोनों ही ऐसे यात्री हैं जिनकी संवेदना और रचना शक्ति बराबर की कही जाती रही। राजनीति में होकर भी अटल जी और नीरज जी ने एक साथ मंचों पर कविताएं पढ़ीं और खूब फाकामस्ती भी की। दोनों के संघर्ष के दिन एक जैसे रहे लेकिन जब समय आया तो दोनों की स्वरलहरी लालकिले से भी गूँजी।
अगर बात करुणानिधि की करें तो सोमनाथ चटर्जी जैसा सम्बन्ध वाजपेयी जी का करुणानिधि से नहीं है। वैसे करुणानिधि का मूल्यांकन करते समय उनके सारे पक्षों को देखना होगा। हालांकि राष्ट्रीय राजनीति से सम्पर्क होने के साथ उनका आक्रामक तमिलवाद कम से कम सार्वजनिक स्तर पर मद्धिम पड़ा। राजीव गाँधी सरकार के खिलाफ अभियान चलाने के भी वे सहभागी बने। 1989 में वी पी सिंह सरकार गठित कराने में उनकी मुख्य भूमिका थी। यहां से उनकी राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका आंरभ हुई और इसका असर उन पर अवश्य हुआ। 1996 की संयुक्त मोर्चा सरकार में द्रमुक के नेता मंत्री बने। फिर 1999 में जयललिता की अटलबिहारी वाजपेयी सरकार से समर्थन वापसी के बाद हुए चुनाव में उन्होंने भाजपा की मदद की तथा राजग सरकार में उनके सांसद मंत्री बने। अगर करुणानिधि की राजनीतिक विचारधारा को देखें तो इसे बहुत बड़ा बदलाव कहा जा सकता है। द्रमुक एक ऐसी पार्टी के नेतृत्व में सरकार में शामिल हुई जो उसकी विचारधारा के हमेशा विरुद्ध रही। जनसंघ से लेकर भाजपा न केवल हिंदुत्व के विचारों पर आधारित थी, बल्कि आर्य -द्रविड़ बँटवारे का हमेशा विरोध करती रही और हिन्दी को राजभाषा बनाने की समर्थक भी थी। इसे आप बदलाव कहिए या केन्द्रीय सत्ता में आने का अवसरवाद मगर इसे वाजपेयी जी के राजनीतिक कौशल के रूप में देखा जा सकता है कि गठबन्धन सरकार को उन्होंने 13 दिन और 13 माह की विफलता के बाद तीसरी बार पूरी तरह चलाया। 
करुणानिधि के साथ अटल जी


हालाँकि बाद में भाजपा से करुणानिधि का मतभेद हुआ एवं यूपीए के गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। 2014 तक सरकार में रहते हुए उनका आक्रामक तमिलवाद का स्वर कभी देखने को नहीं मिला। 
बच्चों की तरह मनमौजी, खाने - पाने के शौकीन रात को 2 बजे भी चिउडा और ठंडई के लिए पहुँच जाते थे। ग्वालियर के फालका बाजार स्थित नमकीन व्यवसायी सुन्नूलाल गुप्ता ‘बेडर’ की दुकान पर वे स्पेशल चिवड़ा खाने आते थे। सुन्नूलाल बताते हैं कि ‘एक बार अटलजी विदेश मंत्री रहते हुए चुनावी सभा के सिलसिले में ग्वालियर आए थे। उनके लिए चिउडा (नमकीन) तैयार करना था। चूंकि अटलजी की सारी सभाएं देर से चल रही थीं, इसलिए मैंने सोचा कि शायद आज वह ग्वालियर नहीं आएंगे और मैं दुकान बंद करके छत पर सो गया। इसी बीच, रात के 2 बजे पुलिस की गाड़ियाँ सायरन बजाती हुईं मेरी दुकान के आगे आकर रुक गयीं। जब मैं नीचे उतरा तो उन्हीं गाड़ियों के बीच एक कार में से केन्द्रीय मंत्री अटलजी उतरे और बोले- ‘मैं हूँ अटल बिहारी, चिवड़ा तैयार है ?’ अटलजी को देखकर मेरे शरीर में स्फूर्ति आ गई और मैं झट से तैयार होकर दुकान के नीचे पहुँच गया। तत्काल स्पेशल मेवों का चिवड़ा तैयार कर उन्हें दे दिया। उन्होंने मुझे मूल्य से ज्यादा पैसे दिए। ऐसा कभी नहीं हुआ कि अटल जी ने ज्यादा पैसे नहीं दिए हों।’ अटलजी जब भी मथुरा आते तो वहाँ चौक बाजार के मूँग की दाल के पकौड़े जरूर खाते। चाइनीज और फिल्मों के शौकीन तो सोमनाथ चटर्जी को आजीवन फुटबॉल से लगाव रहा। जाने कितने किस्से, जाने कितनी यादें छोड़ गयी यह त्रयी। समय गुजरेगा, इतिहास करवट लेगा मगर  एक खालीपन और एक रीतापन हमेशा रहेगा। खुद वाजपेयी जी के शब्दों में -सूर्य तो फिर भी उगेगा/ धूप तो फिर भी खिलेगी/ लेकिन मेरी बगीची की/ हरी-हरी दूब पर/ ओस की बूँद/हर मौसम में नहीं मिलेगी। फिर भी काल के कपाल पर लिखने वाले अटल जी एक उम्मीद हैं, एक प्रेरणा हैं मगर मौत भला स्मृतियों से कैसे जीत सकती है। यादें हैं और विश्‍वास है क्योंकि बकौल अटल जी - 
मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, 
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल का नहीं।

(सलाम दुनिया में 19 अगस्त को प्रकाशित आलेख)

गुरुवार, 2 अगस्त 2018

दैवीय भाव से मुंशी जी को देख रहे हैं तो अन्य साहित्यकारों से अन्याय कर रहे हैं आप



मुंशी प्रेमचन्द हिन्दी साहित्य के प्राण पुरुष माने जाते हैं और जब उनको लेकर कुछ भी लिखा जाता है तो एक भक्ति भाव उस लेखन में समाहित होता है। हम सकारात्मक बातों को खींच - खींचकर लिखते हैं मगर उनके विरोध में जाने वाली हर बात को नजरअन्दाज करते हैं जिसके कारण उस अलौकिक छवि को आघात पहुँचे या फिर उन स्थापित मान्यताओं को चोट पहुँचे जिसका पालन हम करते आ रहे हैं। जहाँ तक मेरी समझ है, वह यही कहती है कि इस तरीके से आप चारण काव्य लिख सकते हैं मगर उसे इतिहास या आलोचना नहीं कहा जा सकता। जिन लेखकों और नायकों को हमने भगवान बना लिया है, हम उनकी खामियों को लगातार नजरअन्दाज करते हैं और उन्हीं खामियों को जब दूसरे लेखकों में या दूसरे नायकों में देखते हैं तो बाल की खाल निकालकर उनको दोयम दर्जे का ठहरा देते हैं। यह निष्पक्षता तो नहीं है अपितु अन्याय जरूर है और एक बड़ा कारण है कि आज हिन्दी, बांग्ला और अँग्रेजी साहित्य विकल्पहीनता से जूझता हुआ सिमटता जा रहा है क्योंकि कोई और नाम हमें याद आता ही नहीं है। कोई भी चरित नायक या लेखक शत - प्रतिशत खरा नहीं होता। कमल किशोर गोयनका प्रेमचन्द के बड़े अध्येता माने जाते हैं मगर जब उन्होंने प्रेमचन्द की निरपेक्ष दृष्टि से देखने का प्रयास किया तो आपने उनकी भी आलोचना कर डाली...अब क्या यह हिप्पोक्रेसी नहीं है?
मेरी समझ में लेखन का आदर्श वहाँ हैं जहाँ लेखक के जीवन और साहित्य में एकरूपता हो। प्रेमचन्द साहित्य में जितने भी ऊँचे मापदण्ड बनाते हैं, वह भी एकतरफा हैं और पुरुषों को भी वे छूट लेने देते हैं। आप कर्मभूमि के अमरकान्त का चरित्र लीजिए। प्रेमचन्द अपने नायकों को यह छूट देते हैं कि स्त्री से अनबन हो तो उनका किसी और स्त्री से प्रेम होना स्वाभाविक है...इतनी ही नहीं वे यह बातें स्त्री पात्रों से कहलाते भी हैं। सुखदा के अलावा सलीमा और कुछ हद तक मुन्नी कर्मभूमि में ऐसे ही चरित्र हैं।
पता नहीं, क्यों ऐसा लगता है कि ऐसा करके वह छूट अपने लिए ले रहे हैं। सब जानते हैं कि प्रेमचन्द का पहला विवाह 15 वर्ष की उम्र में हो गया था और बाद में विच्छेद भी हो गया। उसका कारण यह है कि वह बदसूरत थीं और झगड़े करती थीं...क्या यह दो वजहें मुंशी जी की नजर में किसी स्त्री को इतने अधिकार देती हैं कि वह किसी पुरुष को छोड़े? उनकी नायिकायें किसी कमजोर नायक को भी नहीं छोड़तीं। इतना ही नहीं, वे अपना मूल चरित्र त्यागकर झुक भी जाती हैं। सुखदा और मालती का चरित्र इस बात उदाहरण है कि मुंशी को सशक्त स्त्रियाँ भाती नहीं थीं और शहरी स्त्री तो उनकी नजर में तितली है..गोदान की मालती को उन्होंने यही नाम दिया है। उनकी सारी उम्मीदें स्त्रियों से हैं और इस बहाने उन्होंने पुरुषों के लिए भरपूर छूट ली है...अब मेरी नजर में तो यह दोहरापन है, आपकी नजर में भले ही युगीन आदर्श हो क्योंकि महाकवि निराला जैसे व्यक्ति भी उसी युग में थे जिन्होंने सरोज स्मृति जैसी कविता दी...यह पहली कविता थी जिसमें बेटी को केन्द्र में रखा गया है मगर आप प्रेमचन्द की तरह निराला को याद नहीं करते क्योंकि वह आपकी पितृसत्तात्मक संरचना में फिट नहीं बैठते। प्रेमचन्द घर में प्रेमचन्द की दूसरी पत्नी शिवरानी देवी यह मसला उठाती हैं।
प्रेमचन्द यहाँ उसी सामन्ती पुरूषवादी मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते प्रतीत होते हैं, जो सिद्धान्त रूप में तो स्त्री को देवी का दर्जा देती है, परन्तु व्यवहार में एक भोग्या से ज्यादा नहीं समझती। प्रेमचन्द के मेहता की निगाह में स्त्री के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण मूल्य हैं त्याग, सेवा और समर्पण। इन मूल्यों से विचलित होकर यदि उसने पुरूष की बराबरी की आकांक्षा में घर की चौखट लांघने का प्रत्यन किया तो वह कुलटा हो जायेगी। मेहता के लिए आदर्श नारी का रोल मॉडल गोविन्दी है, जो पति के तमाम अत्याचारों और उसकी रंगीन तबीयत को सहन करते हुए भी उसकी होकर रहती है। यही कारण है कि प्रेमचन्द के हाथों एक स्वतन्त्रचेता आधुनिक सोच वाली युवती मालती का रूपान्तरण घटनाओं की तार्किक परिणति के कारण न होकर लेखक के पूर्वग्रही विचारों के कारण होता है। मेहता की नजर में स्त्री का काम घर गृहस्थी और बच्चे सम्भालना है, तभी वह देवी कहलाने की पात्र है। देवी के इस आसन से उतरकर स्त्री ने जैसे ही पुरूष के कन्धे से कन्धा मिलाकर चलने की कोशिश की, तो वह देवी के सिंहासन से च्युत होकर कुलटा बन जाती है। इसी मानसिकता के कारण मेहता सरोज के प्रेम के उपरान्त विवाह करने के विचार को गलत ठहराता है। प्रेम स्त्री को स्वतन्त्र निर्णय और चयन का अधिकार देता है। प्रेमचन्द की परम्परावादी नारीदृष्टि स्त्री को प्रेम का अधिकार कैसे दे सकती थी?

स्त्रियों की शिक्षा का विरोध मध्यकालीन सामन्ती परिवेश में देखा जा सकता है, लेकिन आश्चर्यजनक यह है कि नवजागृति की सांस लेते और आधुनिकता की पहली सीढ़ी पर पैर रखते भारतीय समाज में प्रेमचन्द ऐसे विचारों को प्रतिष्ठित कर रहे थे। प्रेमचन्द के मेहता भी स्त्रियों को पुरूषों के समान शिक्षा देना उचित नहीं समझते और उनके लिए घरदारी और शिशु पालन को ही महत्वूपर्ण शिक्षा मानते है। इनके साथ-साथ सेवा, ध्यान और समर्पण जैसे ‘स्त्रियोचित’ मूल्य तो हैं ही। ग्रामकथा में जहां प्रेमचन्द कथा का स्वाभाविक प्रवाह होने देते है, वहाँ धनिया जैसी स्त्रियों में चुटकी भर स्वातन्त्र्य चेतना दिख भी जाती है, लेकिन नगर कथा में, जहां कथा प्रवाह का पूरा नियंत्रण लेखक के हाथों में है, मालती जैसी स्वतन्त्रचेता स्त्री को प्रेमचन्द गोविन्दी जैसी सेवा, त्याग और समर्पण जैसे मूल्यों से परिपूर्ण स्त्री बनाकर ही दम लेते है। सशक्त स्त्रियाँ मुंशी जी को नहीं भातीं..क्या यह उनकी असुरक्षा नहीं है। इतना ही नहीं, वे शिवरानी देवी को भी हतोत्साहित करते रहे। शिवरानी देवी लिखती हैं - 'एक बार गोरखपुर में डा. एनी बेसेंट की लिखी हुई एक किताब आप लाए. मैंने वह किताब पढ़ने के लिए माँगी. आप बोले - तुम्हारी समझ में नहीं आएगी. मैं बोली - क्यों नहीं आएगी ? मुझे दीजिए तो सही. उसे मैं छः महीने तक पढ़ती रही। रामायण की तरह उसका पाठ करती रही. उसके एक-एक शब्द को मुझे ध्यान में चढ़ा लेना था क्योंकि उन्होंने कहा था कि यह तुम्हारी समझ में नहीं आएगी. मैं उस किताब को खतम कर चुकी तो उनके हाथ में देते हुए बोली - अच्छा, आप इसके बारे में मुझसे पूछिए। मैं इसे पूरा पढ़ गई. आप हँसते हुए बोले - अच्छा !' इतना अविश्वास....? सब जानते हैं कि शिवरानी देवी खुद अच्छी कहानीकार थीं।
 प्रेमचन्द घर में पति की पहली पत्नी के प्रति उनकी सहानुभूति दिखती भी है। प्रेमचंद का पहला विवाह पंद्रह वर्ष की आयु में हुआ था। उस समय वे नौंवी कक्षा में पढ़ते थे। 1904 में उनकी पहली पत्नी का देहांत हो गया। आपके पिता ने केवल १५ साल की आयू में आपका विवाह करा दिया। पत्नी उम्र में आपसे बड़ी और बदसूरत थी। पत्नी की सूरत और उसके जबान ने आपके जले पर नमक का काम किया। आप स्वयं लिखते हैं, "उम्र में वह मुझसे ज्यादा थी। जब मैंने उसकी सूरत देखी तो मेरा खून सूख गया।......." उसके साथ - साथ जबान की भी मीठी न थी। आपने अपनी शादी के फैसले पर पिता के बारे में लिखा है "पिताजी ने जीवन के अन्तिम सालों में एक ठोकर खाई और स्वयं तो गिरे ही, साथ में मुझे भी डुबो दिया: मेरी शादी बिना सोंचे समझे कर डाली।" हालांकि आपके पिताजी को भी बाद में इसका एहसास हुआ और काफी अफसोस किया। रंजना अरगड़े लिखती हैं कि विवाह के नियम स्त्री तथा पुरुषों, दोनों पर समान रूप से लागू किए जाएं तथा पुरुष पत्नी के जीवन काल में दूसरा विवाह न कर पाए। पुरुष की संपत्ति पर पत्नी का पूरा अधिकार हो वह या तो उसे( अपने हिस्से की संपत्ति को) रेहन पर रखे या व्यय करे।
इसमें जो पहली बात है उसका पालन तो प्रेमचन्द जी नहीं कर पाए। पहली पत्नी के होते उन्होंने शिवरानी देवी से विवाह किया था। इस संदर्भ में शिवरानी देवी ने अपनी पुस्तक में दो स्थानों पर उल्लेख किया है। चूंकि किताब में कोई समय-क्रम नहीं है अतः पहले उल्लेख(पृ 7) को बाद वाला एवं बाद वाले उल्लेख( पृ-25,26) को पहले वाला मानना चाहिए। बस्ती, 1914 में शिवरानी देवी ने उस प्रसंग को का उल्लेख किया है जब प्रेमचन्द की पूर्व-पत्नी के भाई उनसे मिलने आते हैं और अपनी बहन के दुखों का बयान करते हैं। यह संवाद शिवरानी देवी सुन लेती हैं। पूछने पर भी प्रेमचन्द बताते नहीं हैं । शिवरानी देवी के बदन का खून गरम हो रहा था (26)। इस मुद्दे पर दोनों में तीखी बहस हो जाती है। शिवरानी देवी लिखती हैं कि वही पहला दिन था जब मुझे मालूम हुआ कि वे अभी ज़िंदा हैं। मुझे तो धोखा दिया जाता रहा कि वे मर गई हैं(26)। शिवरानी देवी जब प्रेमचन्द से इस संदर्भ में जवाब-तलब करती हैं तब प्रेमचन्द का जवाब चौंकाने वाला और कम-से-कम लेखकोचित तो नहीं ही है, (फिर प्रेमचन्द जैसा लेखक) जिसको इन्सान समझे कि जीवित है, वही जीवित है। जिसे समझे मर गया, मर गया(26)। शिवरानी देवी का आग्रह था कि उन्हें भी साथ रहने बुला लिया जाए। प्रेमचन्द के मना करने पर शिवरानी देवी कहती हैं एक आदमी का जीवन मिट्टी में मिलाने का आपको क्या हक़ है । इस पर प्रेमचन्द का जवाब है-हक़ वगैरह की कोई बात नहीं है ।(4) आश्चर्य की बात यह है कि पहली पत्नी को लेकर वे भूले से भी बात नहीं करते और न ही उनके बेटे श्रीपत राय या अमृत राय के यहाँ ऐसा उल्लेख मिलता है। हिन्दी के किसी आलोचक ने भी जरूरत नहीं समझी कि इस अधूरे पक्ष पर बात की जाये और उनकी पहली पत्नी का भी पक्ष जाना जाये।
इसी संदर्भ में जब दूसरी बार बात होती है तब शिवरानी देवी कहती हैं एक की तो मिट्टी पलीद कर दी जिसकी कुरेदन मुझे हमेशा होती है। जिसको हम बुरा समझते हैं वह हमारे ही यहाँ हो और हमारे ही हाथों हो। मैं स्वयं तकलीफ़ सहने को तैयार हूँ, पर स्त्री जाति की तकलीफ़ मैं नहीं सह सकती। मेरे पिता को मालूम होता तो आपके साथ मेरी शादी हर्गिज न करते। फिर आगे वह कहती हैं कि अगर मेरा बस चलता तो मैं सब जगह ढिंढोरा पिटवाती कि कोई भी तुम्हारे साथ शादी न करे। (5)
ये पूरा प्रकरण क्या दर्शाता है? स्त्री के सतीत्व को प्रेमचंद ने भरपूर नहीं बल्कि अतिरिक्त सम्मान दिया है और उसकी पवित्रता पJ प्रश्नचिन्ह उठाने वालों के लिये वो अपने उपन्यास ‘प्रतिज्ञा’ में लिखते हैं “स्त्री हारे दर्जे ही दुराचारिणी होती है, अपने सतीत्व से ज्यादा उसे संसार की किसी वस्तु पर गर्व नहीं होता और न ही वो किसी चीज को इतना मूल्यवान समझती है” मगर पति के कर्तव्यों पर उन्होंने चुप्पी साध रखी है।
“नारी मात्र माता है और इसके उपरान्त वो जो कुछ है वह सब मातृत्व का उपक्रम मात्र। मातृत्व विश्व की सबसे बड़ी साधना, सबसे बड़ी तपस्या, सबसे बड़ा त्याग और सबसे महान् विजय है। मुंशी जी पिता के कर्तव्यों पर क्यों मौन रहे, वही जानें।
प्रेमचन्द नारी शिक्षा को आवश्यक समझते थे। उनका मत था- ‘‘जब तक सब स्त्रियाँ शिक्षित नहीं होंगी और सब कानून-अधिकार उनको बराबर न मिल जायेंगे, तब तक महज बराबर काम करने से भी काम नहीं चलेगा।’’४ अपने उपन्यासों के पात्रों के द्वारा भी उन्होंने इस बात का समर्थन किया है। ‘गबन’ नामक उपन्यास के पात्र पं. इन्द्रभूषण का कहना है- ‘‘जब तक स्त्रियों की शिक्षा का काफी प्रचार न होगा, हमारा कभी उद्धार नहीं होगा।’’५ गोदान का पात्र प्रो. मेहता भी ‘वीमेन्स लीग’ के समारोह में भाषण देते वक्त स्त्री-शिक्षा की आवश्यकता और महत्व का उद्घाटन करता है। मजे की बात यह है कि खुद अपनी बेटी की शिक्षा पर उनका इतना ध्यान नहीं जाता..और तो और वे बाकायदा दहेज देकर बेटी की शादी भी करते हैं...कहाँ रह गया जीवन में आदर्श? दूसरी ओर निराला हैं जिन्होंने अपनी पत्नी मनोहरा देवी और बेटी सरोज को पूरा सम्मान दिया बल्कि समाज का तिरस्कार भी आजीवन सहा। रंजना अरगड़े लिखती हैं कि 'लेकिन यह बात सर्वविदित है कि प्रेमचन्द ने अपनी लड़की की पढ़ाई की तरफ़ बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया था। इसका कोई खुलासा शिवरानी देवी ने नहीं किया है। परन्तु अमृत राय ने अपनी पुस्तक कलम का सिपाही में लिखा है-
मुंशीजी की बेटी के साथ भी यही बात थी। स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई का सुयोग उसे नहीं मिला—या नहीं दिया गया। कुछ रोज़ लखनऊ के महिला विद्यालय में गई मगर फिर वहाँ से भी उसे छुड़ा लिया गया।
आजकल जहाँ अनपढ़ लड़कियों पर उंगलियाँ उठती हैं, चालीस-पैंतालीस साल पहले पढ़ी-लिखी लड़की पर उठा करती थीं। लड़की को पढ़ाना अपने आप में एक क्रांति थी। मुंशीजी भी शायद इस क्रांति के लिए तैयार नहीं थे।(13)


अमृत राय बताते हैं कि प्रेमचन्द की बेटी जब छोटी थी तब वे बस्ती में रहते थे, जो एक छोटी जगह थी। जब बेटी कछ पढ़ने-लिखने लायक हुई तब उनका गोरखपुर का आबदाना छूट गया था। बाद में कहीं भी जमकर उनका रहना नहीं हो सका। फिर लड़की को बाहर भेज कर पढ़ाना संभव न था। (यहाँ इस बात को याद कर लेना चाहिए कि महादेवी जी ने लगभग सत्याग्रह कर के इलाहाबाद जा कर पढ़ने के लिए अपने माता-पिता को राज़ी किया था। ऐसा सब के लिए संभव नहीं होता।)
कुछ इत्मीनान उनको लखनऊ में मिला। पर, अमृत राय लिखते है-बेटों की पढ़ाई, जो अपनी बहन से छोटे थे, वहीं शुरु हुई लेकिन बेटी की पढ़ाई शुरु करने के लिए तब तक ज़्यादा देर हो चुकी थी। आधे मन से कुछ कोशिश ज़रूर हुई, पर आधे मन से। क़िस्सा कोताह वह पढ़ नहीं सकी और चूल्हा पकड़े बैठी रही जो कि घर की सयानी लड़की का काम है। (14) अमृत राय तर्क भी देते हैं कि माँ की बीमारी के कारण भी, हो सकता ही कि उसे स्कूल न भेजा गया हो। बहरहाल, जो कारण रहा हो, यह बेहद अफ़सोस जनक ही कहा जाएगा कि स्त्री-शिक्षा के सघन समर्थक प्रेमचन्द स्वयं अपनी बेटी को न पढ़ा सके हों। ज़माने को लानत भेज कर भी यह बात तो बनी ही रहती है कि उनकी बेटी शिक्षा से वंचित रही।'
अधिकतर लोग समझते हैं कि मुंशी जी आर्थिक अभावों में जीए थे मगर कमल किशोर गोयनका के ये तथ्य आपकी आँख पर से परदा हटाने को काफी है। जरा ध्यान दीजिए। कमल किशोर गोयनका लिखते हैं कि 'अधिकतर लोग समझते हैं कि प्रेमचंद आर्थिक तौर पर कमज़ोर थे लेकिन यह सत्य नहीं है चूंकि उनके निधन उपरांत भी उनके बैंक में पर्याप्त राशि थी। गोयनका कहते है कि "हाँ, मैंने प्रेमचंद के गरीब न होने पर लिखा था। डा. रामविलास शर्मा ने लिखा है कि प्रेमचंद गरीबी में पैदा हुए, गरीबी में जिन्दा रहे और गरीबी में ही मर गये। यह सर्वथा तथ्यों के विपरीत है। "कुछ प्रमाण प्रस्तुत हैं:-
'उनका पहला वेतन 20 रुपये मासिक था वर्ष 1900 में जब 4-5 रुपये में लोग परिवार चलाते थे। उन्होंने लिखा है कि यह वेतन उनकी ऊँची से ऊँची उडान में भी नहीं था।
प्रेमचंद ने फरवरी, 1921 में सरकारी नौकरी से इस्तीफा दिया था। तब उनका वेतन था 150 रुपये मासिक। उस समय सोना लगभग 20 रुपये तोला (लगभग 11.5 ग्राम) था। आप सोचें आज की मुद्रा में कितना रुपया हुआ ?
प्रेमचंद ने अपनी एकमात्र पुत्री कमलादेवी के विवाह में ( 1929 में) लगभग सात हजार रूपये खर्च किये थे। इसकी जानकारी मुझे स्वयं कमलादेवी ने दी थी।
वर्ष 1929 के आसपास लमही गाँव में प्रेमचंद ने 6-7 हजार रुपये लगाकर मकान बनवाया था।
'माधुरी' पत्रिका के सम्पादक बने तो वेतन था 150 रुपये मासिक।
बम्बई की फिल्म कम्पनी में नौकरी की वर्ष 1934-35 में तब वेतन था 800 रुपये मासिक। लौटने पर बेटी के लिए हीरे की लौंग लेकर आये थे। आज की धनराशि में 800 रुपये लगभग 6-7 लाख के बराबर है।
प्रेमचंद के पास दो बीमा पालिसी थीं। उस समय यह बहुत बडी बात थी।
प्रेमचंद ने वर्ष 1936 में रेडियो दिल्ली से दो कहानियों का पाठ किया और उन्हें 100 रुपये पारिश्रमिक मिला। आज उस समय के 100 रुपये लगभग एक लाख के बराबर होंगे।
प्रेमचंद की मृत्यु के 14 दिन पहले उनके दो बैंक खातों में लगभग 4500 रुपये थे।' गोयनका लिखते हैं कि "ये सारे तथ्य उपलब्ध दस्तावेज़ों के आधार पर हैं। उनकी जीवनी से इन तथ्यों को गायब करने का क्या औचित्य था ? प्रगतिशील लेखकों को इससे बडा आघात लगा और वे आज तक मुझे गालियाँ दे रहे हैं पर वे यह नहीं कहते कि ये तथ्य झूठे हैं। वे इन्हें सत्य मानते हैं लेकिन उद्घाटन करने पर गालियाँ देते हैं। इसे ही वे वैज्ञानिक आलोचना कहते हैं । उनकी तकलीफ यह है कि उनकी झूठी स्थापनाओं की कलई खुल गयी है।"कमल किशोर जी द्वारा दिये गये तथ्य भारत दर्शन पर उपलब्ध हैं और कलकत्ता विश्वविद्यालय व साहित्यिकी के सेमिनार में उन्होंने ये बातें दोहरायी थीं और वे प्रेमचन्द जब वेतन की तुलना पूरनमासी के चाँद से करते हैं तो सच मानिए बड़ा अजीब लगता है क्योंकि उस जमाने में उनके पास जो था, बहुतों के पास नहीं था।
तुलना नहीं करते हुए भी  मुझे जयशंकर प्रसाद की छोटा जादूगर, जैनेन्द्र की पाजेब..कहीं से ईदगाह से कम नहीं लगती। रेणु की रसप्रिया तथा तीसरी कसम का अपना शिल्प है...मगर पता नहीं क्यों...आप इस पर बात नहीं करना चाहते। अगर आदर्श की बात की जाए और उपेक्षित पात्रों की बात की जाए तो मैथिली शरण गुप्त मुंशी जी के बहुत पहले इसकी शुरुआत कर चुके थे। उन्होंने उर्मिला और कैकयी जैसे चरित्रों को उठाया जो कि बड़ी बात है मगर आप इनको एक युग का हिस्सा मानकर छोड़ देते हैं। महादेवी वर्मा का गद्य किस मायने में कम है, ये तो आलोचक समझें मगर आप उनको छायावाद में भी सबसे पीछे रखते हैं। आप सुभद्रा कुमारी चौहान पर बात नहीं करते जिन्होंने हमें झाँसी की रानी जैसी कविता दी। हमने ये जो सन्दर्भ हैं..वे महज हिस्सा हैं...बात करेंगे तो दूर तक जायेगी मगर हिन्दी साहित्य और भारतीय इतिहास की चर्चा को आप दूर तक ले जाना चाहते हैं तो आपको किसी भी लेखक को अलौकिक भाव से देखना बन्द करना हो, फिर वह आपके मुंशी जी ही क्यों न हों।
(सन्दर्भ - भारत दर्शन, सीयू में कमल किशोर गोयनका का व्याख्यान तथा लेखिका रंजना अरगड़े के ब्लॉग से...साभार.और बाकी जो मैं सोचती हूँ)