सोमवार, 30 मार्च 2020

महामारी को मात दो...फिर अपनी धरती पर लौटो,,,माटी पुकार रही है



21 दिनों के लॉकडाउन ने बहुत कुछ दिखाया...बुरे वक्त में अच्छे और बुरे कई तरह के लोग दिखे...घटनायें दिखीं....समय के साथ हर चीज आयेगी - जायेगी...मगर एक चीज कभी किसी सच्चे भारतीय खासकर बिहार, झारखंड या यूपी के रहने वालों के कलेजे में टीस बनकर रहेगी....रहनी चाहिए...यह वह आग है जिसका जिन्दा रहना बहुत जरूरी है मगर इसके लिए सुरक्षित और जिन्दा रहना जरूरी है....इसलिए तमाम दिक्कतों के बाद भी अपनी लड़ाई को जिन्दा रखने के लिए लॉकडाइन का पालन करो....मगर अपमान की इस आग को बुझने मत देना.....खुद को इसमें झोक  दो और कुन्दन बनकर लौटो..।

लौटो कि यही आग इन राज्यों को, पूर्वान्चल की उस जनता को एक नया जन्म देगी...। जब कभी आप होली के रंगों में अपने परिवार के साथ डूबे रहते हैं....जब दिवाली पर दीये जला रहते हैं...तब ये लोग अपने घरों में नहीं रहते...वह आपके घरों में फूल सजा रहे होते हैं....वह एक प्यार भरी दुलार के लिए तरस जाते हैं...क्योंकि जबकी इसकी जरूरत होती है तब आप उनसे अपनी कम्पनी की बिक्री बढ़वाते हैं...। आपकी मशीनों पर काम करते हुए न जाने कितने मर जाते हैं...कितने अपाहिज हो जाते हैं...उनकी हड़ताल आपको इतनी नागवार गुजरती है कि आप पुलिस और प्रशासन से बात करते हैं...और कारखाने बंद कर देते है...लाठीचार्ज करवाते हैं...आपके हाथ इतने लम्बे हैं कि आप उनको फँसाकर जेल भिजवा सकते हैं।
ये आपको हमेशा से खटकते थे...आप न जाने कब से अपनी राजनीति की लम्बी पारी के लिए भेजना चाहते थे...आज एक महामारी ने आपको मौका दिया है। जिन्होंने आपको रहने के लिए आलीशान इमारतें दीं, आप उनको दो दिन के लिए उसके एक कोने में नहीं रख सके। जिसने 21 साल आपके पास आपकी हर जरूरत के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया...आपके पास उसके लिए 21 दिन भी नहीं थे....जिनका उगाया हुआ अनाज खाकर आपकी चमड़ी मोटी हो गयी है...आपके पास उसके लिए एक वक्त की रोटी नहीं थी...आप रोते रहे....एक मायावी दुनिया में संवेदना बरसाते रहे...पर सड़क पर नहीं उतरे....आपको डर है कि ये मजदूर आपको बीमार कर देंगे...आप कोरोना संक्रमित हो जायेंगे...मगर संक्रमित तो आप पहले से ही हैं...आपको अभिजात्य अहंकार का संक्रमण है...आप स्वार्थ के वायरस से संक्रमित हैं....आप खोखले हो चुके हैं।

देश के कोने -कोने से खबरें आ रही हैं....वह चले जा रहे हैं...नंगे पैर....धूम में...ठीक उसी वक्त जब आप अपने मोबाइल पर स्टेटस डाल रहे होते हैं...उसी वक्त एक बच्चा चलते -चलते थककर बैठ जाता है...आप परिवार के साथ हैं...वह परिवार से दूर... पलायन का सिलसिला जारी है। हालांकि, शुक्रवार की रात के मुकाबले शनिवार रात को एक्सप्रेस वे पर पैदल यात्रियों की तादाद कुछ कम थी। इन लोगों को कहीं पुलिस से खाने को कुछ सामान मिल जाता है, तो कहीं आम नागरिकों मदद के लिए आगे आ जाते हैं। अपने बीवी-बच्चों और परिवारों के साथ अपने किराये के छोटे से कमरे को छोड़, घर की ओर पलायन करने वालों की यह भीड़ थोड़ी-थोड़ी देर में घटती-बढ़ती रहती है। कुछ गठरियां, कुछ पोटलियां और थोड़ा सा पानी लेकर लोग निकल पड़े हैं। इस आस में कि कहीं कोई बस या ट्रक मिल जाये। किसी के कॉन्ट्रेक्टर ने काम बंद कर दिया तो किसी को मकान मालिक ने निकाल दिया। किसी को दिहाड़ी के लिए कोई काम ही नहीं मिल रहा, तो कोई तीन दिन से भूखा है। कोरोना ने मानो इन लोगों की जिंदगियों पर ही ताला जड़ दिया है। कुछ तो भूख से मर भी जा रहे हैं...आखिर इस अन्यास का हिसाब कौन देगा...?
आखिर अपराध क्या है इनका कि ये गरीब हैं...मजदूर हैं...फटे कपड़े पहनते हैं...पेट की मार ने पहले गाँव -घर  सब छुड़वाया था आज सियासत ने उनको शहर के बाहर कर दिया है...शहर को उनकी जरूरत नहीं है...जरूरत होगी जब बाग में पानी देना होगा...दरवानी करनी होगी...खाना बनाना होगा...घर में पोंछा लगाना होगा...माल उठाना होगा....आपकी जो थोड़ी-बहुत सहानुभूति है वह अपने लिए है...अपनी जरूरतों के लिए है...।

आप जिनका अपमान कर रहे हैं...वह चन्द्रगुप्त....अशोक और चाणक्य के वंशज हैं...आप जिस जमीन को हिकारत से देखते हैं....उसने सिद्धार्थ को बुद्ध बनाया....मोहनदास को गाँधी बनाया....उसी धरती से राम निकले...कृष्ण निकले...आपने आज इन सबको एक साथ विस्थापित कर दिया...।
तो पूर्वांचल के योद्धाओं....कहाँ रह रहे हो...किसके लिए अपनी उम्र....अपनी प्रतिभा...सब खत्म कर रहे हो...क्यों कर रहे हो...लौट चलो...उस मिट्टी को उर्वर बनाओ कि उसकी फसल कभी तुमसे हिसाब नहीं माँगेगी...अपनी तकनीक, शिक्षा, प्रतिभा....सबके दम पर अपनी मिट्टी को खड़ा करो...यही तुम्हारा संकल्प होना चाहिए....इन सेठों और हृदयहीन सर्जकों को तुम्हारी जरूरत नहीं है....पर माँ को है...जिसने दही खिलाकर अपने कलेजे पर पत्थर रखकर तुमको विदा किया था...तुम्हारी प्रतिभा पर तुम्हारे पिता का हक है...उस आँगन का हक है जो तुम्हारे इन्तजार में पथरा चुका है...अब लौट चलो....वहीं पर...जो तुम्हारा है....ठीक है...इतनी कमाई पहले न हो...मगर परिवार का बल रहेगा...दोस्तों का साथ रहेगा....आशीर्वाद रहेगा तो तुम आसमान को भी अपने कदमों में झुका सकते हो। अगर आप अपनी दुनिया में सफल हैं तो भी अब आपकी बारी है कि अपनी मिट्टी का कर्ज उतारें.,..इसमें आपके शेयरों के भाव शायद कम हों...मगर सन्तुष्टि का सेन्सेक्स हजारों गुना पार होगा....।

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अपने गाँवों में उद्योग लगाइए और ऐसे उद्योग लगाइए जिससे ये हरी - भरी धरती फिर सज सके...स्कूल खोलिए...शौचालय की व्यवस्था कीजिए...स्टार्टअप में पैसा लगाइए...वैसे ही यूपी...बिहार....और झारखंड को फिर से खड़ा कीजिए....जैसे कभी आपकी माँ ने आपको जन्म दिया था। शिक्षा का प्रसार करिए....आधुनिकता और परम्परा से जोड़िए...दबा हुआ इतिहास खोज निकालिए...अपनी बोलियों पर काम  कीजिए....कुछ भी कीजिए मगर लौटिए...अभी पराई धरती से ज्यादा आपकी मिट्टी को आपकी जरूरत है...परायेपन से भरे आपके एकाकीपन व अपराधबोध को यही एक तरीका भर सकता है। वह तुमको श्रमिक कहते हैं...मगर तुम उनकी दुनिया के राज लेकर लौटे हो...उनके उद्योग अपने गाँवों में खड़े करो....तुम फिनिक्स पक्षी हो...अपनी राख से भी जन्म लेना जानते हो....पूर्वान्चल ने इस देश को दिशा दी है....ज्ञान दिया है....अब तुम्हारी बारी है....तुम्हारी धरती....तुम्हारी मिट्टी तुमको बुला रही है....लौटो और नवजीवन दो अपनी मिट्टी को.,..संकल्पवीरों का साथ तो ईश्वर देता है...देखना एक दिन लोग तुम सबके लिए तरसेंगे....और सब तुम्हारी तरफ ही देखेंगे...जैसे अभी पूरा देश देख रहा है....लौट चलो।

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