पत्रकारिता, कोलकाता, स्त्री

मीडिया में महिलाओं के लिए बेहतर काम करना चुनौती नहीं है मगर उसके लिए सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते जाना टेढ़ी खीर है। पत्रिकाओं में महिला संपादक आपको मिल सकती है लेकिन अखबारों में, फिलहाल इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। वहीं हिन्दी अखबारों में सम्पादक बनना तो दूर की बात है, महत्वपूर्ण क्षेत्र भी मिल जाए तो यह भी बड़ी बात है, विशेषकर राजनीति और अपराध से लेकर कोर्ट में, जहाँ भद्रता नही है। तो फिर क्या होना चाहिए, और इस बारे में सोचा क्यों नहीं गया, खासकर बौद्धिक स्तर पर महान कोलकाता में, यह हैरत की बात है, यह लेख जो सामने है, इस विषय पर मानों आँखें खोलने का काम करता है

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बिहार चुनाव में शराबबंदी, प्रशांत किशोर और मीडिया

मिशनरी पत्रकारिता के आवरण से पत्रकारिता को बाहर निकालिए

प्रेमकथा नहीं, भारतीय इतिहास व राजनीति की अनकही दास्तान है एडविना और नेहरू