इस परिवर्तन ने सिर्फ राज्य नहीं, देश बचाया है
बंगाल में 15 साल बाद सत्ता बदल चुकी है । सत्ता परिवर्तन को लेकर बहुत सी बातें कही जा रही हैं । जनता जिस तरह से खुशी मना रही है, वह ऐसा लग रहा है जैसे आजादी ही बंगाल को मिली है...बात सच भी है । बंगाल की राजनीतिक पार्टियां अपने स्वार्थ में इस हद तक अंधी हो चुकी हैं कि वो बंगाल को भारत का राज्य नहीं बल्कि एक स्वतंत्र देश ही समझ कर चल रही थीं और बौद्धिक वर्ग के लिए यह एक ऐसा कोना है जो सिर्फ उनका है, सिर्फ उनकी वामपंथी और धार्मिक तुष्टीकरण का ठिकाना है । सच यही है कि आप लोगों ने हिंदुओं और सनातन परंपरा को इतना उपेक्षित किया और सुनियोजित तरीके से दबाने की कोशिश की, और क्रूरता की हद तक दबाया । वो यह भूल गए कि बंगाल की मूल आत्मा सनातन है और यह बात 2026 के चुनावों में बंगाल की जनता ने याद दिला दी है । सच कहूँ तो बंगाल की जनता ने सिर्फ बंगाल को नहीं, देश को बचाया है । मुझे हैरत होती है जिस देश में हिंदुओं को काटा जा रहा है, घर और मंदिर जलाए जा रहे हैं, उसके प्रति लोगों में इतनी ममता कहाँ से आती है, मेरी नजर में यही देश द्रोह है । बुद्धिजीवियों के पैरों की जमीन खिसक गई है तो उसके पीछे उनका आहत अहंकार है । निश्चित रूप से जो राज्य आरंभ से हिन्दुत्व से परे अपनी एक स्वतंत्र विचारधारा और सत्ता लेकर चल रहा हो, जहां सनातन की बात करना फासीवादी ताकतों का साथ देना माना जाता रहा हो, जो अपनी परिकल्पित दुनिया में जी रहा हो, उसके लिए यह परिवर्तन बड़ा झटका है । कई दशकों तक पहले कांग्रेसी, फिर वामपंथी और इसके बाद तृणमूल की सत्ता में रहने के बाद बंगाल कहीं न कहीं अपनी भारतीय परम्पराओं से कट रहा था । कई बार मुझे यह लगा कि बंगाल भारत के अन्य राज्यों से अपनी एक अलग ही विचारधारा में बंध गया था और इसने खुद को संकीर्ण बना लिया था । यहाँ धर्मनिरपेक्ष होने का मतलब कहीं न कहीं सनातन परम्पराओं को तुच्छ समझकर उनका अपमान करना रह गया था । बंगाल का बौद्धिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक वर्ग जनता से कट चुका है, यह कहने में मुझे जरा भी हिचक नहीं है । मेरे कई मित्र वामपंथी विचारधारा के हैं । बचपन से ही माकपा का राज देखा है, कॉलेज और विश्वविद्यालय के दिनों में कहीं न कहीं वामपंथ की घुट्टी पिलाई जाती रही है । जाहिर है कि इसका असर मुझ पर भी रहा मगर पत्रकारिता के क्षेत्र में आई तो पिरामिड जैसे उल्टा हो गया । यहाँ बातें सब मानवता की करते हैं मगर व्यवहार में वह नहीं दिखती । वाममोर्चा के दिनों में शिक्षण संस्थानों में अत्याचार कम नहीं थे । जमीन पर लोगों की घृणा मैंने कई बार देखी है मगर तृणमूल के दौर में यह चरम पर पहुँच गयी । सत्ता का चेहरा बदला था, लोग नहीं बदले थे । एसएफआई और माकपा के कैडरों ने छात्र परिषद पर कम अत्याचार नहीं किए हैं । अनगिनत खबरें की हैं मारपीट, हिंसा, रैगिंग की, आईआईआईएसटी शिवपुर जो पहले बेसू था, वहाँ अक्सर खून बहता था । नंदीग्राम हिंसा, सिंगुर आंदोलन में बहुत रक्तपात हुआ और मरे तो आम लोग मरे । ममता बनर्जी ने मौत का तमाशा बनाकर सत्ता हासिल की थी और भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस और माकपा मौन साधे रहे । वाममोर्चा के समय एक झटके में कई बी.एड कॉलेज अपनी मान्यता खो बैठे । इसके बाद पास-फेल हटने से शिक्षा व्यवस्था लचर हो गई । हजारों नौकरियाँ गईं , युवा सड़क पर लठियाँ खाते रहे, मालदा - मुर्शिदाबाद में हिन्दू मारे जाते रहे, घर छोड़ने पर मजबूर किए जाते रहे, दुष्कर्म को छोटो साजानो घटना बताया जाता रहा मगर किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा । बंगाल का एक समृद्ध इतिहास रहा है, ऐसे हजारों स्थल हैं जिनको विकसित किया जाए तो पर्यटन बढ़ेगा पर अपने सियासी फायदे के लिए पुरानी सरकारों ने होने नहीं दिया ।
पत्रकारों से मारपीट, उनको दो कौड़ी का बताना, हिन्दी अखबारों को विज्ञापन न देना, यह बताना... और उसमें हम जैसे पत्रकार, जिनको अक्सर संभल कर लिखने की हिदायत मिलती रही, उनके लिए यह परिवर्तन सुखद है ।
एस आई आर में मुसलमानों से ज्यादा हिंदुओं के नाम कटे हैं । तृणमूल की दहशत इतनी है कि आप राह चलते किसी से खुलकर बात नहीं कर सकते तो वो भला वोट डालने देंगे... बंगाल को बचाने के लिए, फर्जी लोगों को मतदाता सूची से निकालने के लिए यह जरूरी था जो हुआ....आप शौक से रोते रहिए...।

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