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झारखंड का आंदोलन बहुत अलग है...और यहां के युवा भी

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वह कहती है पीसीएस का मेरा सपना टूट गया....ये दुख कहीं बहुत गहरा है....भीतर तक....चलो खुद के लिए कुछ न कर पाऊं पर इन बच्चों के लिए आवाज जरूर बन जाऊंगी मैं....हेमंत सोरेन ने यदि सुना नहीं तो इसी धरती पर हिसाब करके जाना पड़ेगा । वह कहती है कि सामान्य वर्ग से हूं मैं....हमारे यहां ज्यादा से ज्यादा 24 25 साल में शादी हो जाती है....मेरे पापा ने दो साल एकस्ट्रा दिया....लेकिन इन लूट मचाने वालों ने सब छीन लिया....घर नहीं जाती मैं....मेरी शादी भी नहीं हो सकती अब तो ............मैं रो भी नहीं सकती....यहां कोई भी स्टूडेंट जंतर मंतर जैसे फैंसी नहीं हैं....यहां सब गरीब हैं....यहां सब मजदूर के बच्चे हैं....यहां खाने के लिए भी एक आध सूखी रोटी मिल जाए वही बहुत है....। यह कहानी इस छात्र आन्दोलन में संघर्ष कर रहे हर दूसरे छात्र की है । झारखंड में चल रहे छात्र आन्दोलन की यह झलक है । रांची की सड़कों पर जेपीएससी और जेएसएससीपरीक्षाओं में हो रही गड़बड़ियों के खिलाफ हजारों छात्र आंदोलन कर रहे हैं। 2 जुलाई को झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) ने 14वीं संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा का रिजल्ट जारी किया था...

आप हार गए जेन जी के रहनुमाओं

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नीट के नाम पर हंगामे का अर्द्ध पटाक्षेप हो चुका है और धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षामंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया है। इस त्यागपत्र को सीजेपी की जीत बताया जा रहा है और विपक्ष अपनी पीठ खुद थपथपा रहा है । जिस तरह की भाषा प्रदर्शन के दौरान इस्तेमाल की गयी और जिस तरह की हिंसा हुई, उसे देखकर मुझे कुछ और ही लग रहा है । वामपंथ इस देश की संस्कृति, सभ्यता, पारिवारिक और सामाजिक संस्कृति के लिए दीमक बन चुके हैं और दिक्कत यह है कि चुके हुए वामपंथी शिक्षक, बुद्धिजीवी और साहित्यकार अब भी हमारे संस्थानों पर काबिज हैं । इस तरह गिर चुके हैं कि अब उठने के लिए इनको बच्चों के नन्हे कंधों का सहारा लेना पड़ रहा है। सोर्स लगाकर, नेताओं के साथ फोटो खिंचवाकर, फर्जी जाति और आयु प्रमाणपत्र खरीदकर, रिश्वत देकर अपने बच्चों की नौकरी लगवाकर , अपने चापलूस चेलों के लिए योग्य विद्यार्थियों के नंबर काटकर सीटें और नौकरियां दिलवाने वाले, पेपर लीक करवाकर, लीक किया गया पेपर खरीदकर भविष्य सेटल करने वाले आज युवा क्रांति के पुरोधा बने फिर रहे हैं...हद है । सिस्टम भ्रष्ट है तो उसका फायदा आपने भी उठाया है..ताली एक हाथ से नहीं ब...

युवाओं के आक्रोश को सही दिशा चाहिए

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जंतर - मंतर पर युवाओं ने डेरा जमा रखा है। देश भर में युवाओं का आक्रोश उबाल पर है । परीक्षाओं में पेपर लीक होने के विरोध में आंदोलन शुरू हुआ । इसके पहले भी आंदोलन होते रहे हैं मगर युवाओं के इस आक्रोश के साथ दिक्कत यह है कि जब राजनीतिक पार्टियां हस्तक्षेप करती हैं तो मुद्दा ही हाईजैक हो जाता है। भारत में इतने छात्र संगठन हैं मगर ऐसा क्यों है कि इनमें से एक भी युवाओं के लिए सामने नहीं आ रहा । आज युवाओं के पास एक भी ऐसा चेहरा ऐसा नहीं है जो उनका नेतृत्व कर सके । आज के युवाओं के सामने रोल मॉडल चुनने का संकट है । उनके आक्रोश तो है पर उसे दिशा देने वाला कोई नहीं है और न ही कोई समझने वाला है । कहीं न कहीं आत्मविश्वास अहंकार में बदल रहा है । इसकी बानगी हम होक कलरव में भी देख चुके हैं और अब जंतर - मंतर पर देख रहे हैं । युवा वर्ग बंटा हुआ है । एक वह है जो जमीन पर लड़ रहा है, व्यवस्था से लड़ रहा है। अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए उसके पास पैसे नहीं हैं, संसाधन नहीं हैं, कोई समझने वाला नहीं है और महत्वाकांक्षाएं बहुत हैं। जब वह इनको पूरा नहीं कर पाता तो यह जमा हुआ असंतोष ही आक्रोश बन ...

मिशनरी पत्रकारिता के आवरण से पत्रकारिता को बाहर निकालिए

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30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस हम मनाते हैं । पत्रकारिता को मिशन, सेवा, ध्येय मानकर साहित्य से जोड़ा जाता है और मीडिया को कोसना पत्रकारिता से जुड़े आयोजनों की परम्परा बन गयी है । मैं पत्रकार हूँ तो आज मैं पत्रकार के रूप में ही बात करूँगी और मेरी कोशिश होगी कि वह बातें भी रख सकूँ जो कोई समझने को तैयार नहीं है । शिक्षा दान महादान है, साहित्य और कला समाज का दर्पण है, चिकित्सक भगवान है...ये हम सुनते आ रहे हैं मगर यथार्थ के धरातल पर सभी कार्यक्षेत्रों को प्रोफेशन मान लिया गया है और इन क्षेत्रों में काम कर रहे लोगों के लिए कमाई के भरपूर मौके हैं । वेतन बोर्ड है, इस देश में संगठन हैं, परीक्षाएं होती हैं, सुविधाएं हैं, पेंशन हैं और इनके परिवारों के लिए एक सुरक्षित भविष्य है जबकि ये सभी क्षेत्र मिशन ही माने जाते रहे हैं। मेरा सवाल यह है कि जब समाज लगभग सभी कार्यक्षेत्रों के प्रति इतनी उदारता है तो पत्रकारिता को प्रोफेशन मानने में दिक्कत क्या है? हम पेशेवर होकर भी संगठित रहकर बेहतर काम कर सकते हैं । वह दिन गये जब जनोन्मुख पत्रकारिता होती थी, उसकी अंतिम झलक आपात काल में दिखी । फिर लोकपाल...

इस परिवर्तन ने सिर्फ राज्य नहीं, देश बचाया है

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बंगाल में 15 साल बाद सत्ता बदल चुकी है । सत्ता परिवर्तन को लेकर बहुत सी बातें कही जा रही हैं । जनता जिस तरह से खुशी मना रही है, वह ऐसा लग रहा है जैसे आजादी ही बंगाल को मिली है...बात सच भी है । बंगाल की राजनीतिक पार्टियां अपने स्वार्थ में इस हद तक अंधी हो चुकी हैं कि वो बंगाल को भारत का राज्य नहीं बल्कि एक स्वतंत्र देश ही समझ कर चल रही थीं और बौद्धिक वर्ग के लिए यह एक ऐसा कोना है जो सिर्फ उनका है, सिर्फ उनकी वामपंथी और धार्मिक तुष्टीकरण का ठिकाना है । सच यही है कि आप लोगों ने हिंदुओं और सनातन परंपरा को इतना उपेक्षित किया और सुनियोजित तरीके से दबाने की कोशिश की, और क्रूरता की हद तक दबाया । वो यह भूल गए कि बंगाल की मूल आत्मा सनातन है और यह बात 2026 के चुनावों में बंगाल की जनता ने याद दिला दी है । सच कहूँ तो बंगाल की जनता ने सिर्फ बंगाल को नहीं, देश को बचाया है । मुझे हैरत होती है जिस देश में हिंदुओं को काटा जा रहा है, घर और मंदिर जलाए जा रहे हैं, उसके प्रति लोगों में इतनी ममता कहाँ से आती है, मेरी नजर में यही देश द्रोह है । बुद्धिजीवियों के पैरों की जमीन खिसक गई है तो उसके पीछे उनका आहत...