मिशनरी पत्रकारिता के आवरण से पत्रकारिता को बाहर निकालिए

30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस हम मनाते हैं । पत्रकारिता को मिशन, सेवा, ध्येय मानकर साहित्य से जोड़ा जाता है और मीडिया को कोसना पत्रकारिता से जुड़े आयोजनों की परम्परा बन गयी है । मैं पत्रकार हूँ तो आज मैं पत्रकार के रूप में ही बात करूँगी और मेरी कोशिश होगी कि वह बातें भी रख सकूँ जो कोई समझने को तैयार नहीं है । शिक्षा दान महादान है, साहित्य और कला समाज का दर्पण है, चिकित्सक भगवान है...ये हम सुनते आ रहे हैं मगर यथार्थ के धरातल पर सभी कार्यक्षेत्रों को प्रोफेशन मान लिया गया है और इन क्षेत्रों में काम कर रहे लोगों के लिए कमाई के भरपूर मौके हैं । वेतन बोर्ड है, इस देश में संगठन हैं, परीक्षाएं होती हैं, सुविधाएं हैं, पेंशन हैं और इनके परिवारों के लिए एक सुरक्षित भविष्य है जबकि ये सभी क्षेत्र मिशन ही माने जाते रहे हैं। मेरा सवाल यह है कि जब समाज लगभग सभी कार्यक्षेत्रों के प्रति इतनी उदारता है तो पत्रकारिता को प्रोफेशन मानने में दिक्कत क्या है? हम पेशेवर होकर भी संगठित रहकर बेहतर काम कर सकते हैं । वह दिन गये जब जनोन्मुख पत्रकारिता होती थी, उसकी अंतिम झलक आपात काल में दिखी । फिर लोकपाल के समर्थन में 2012 के आंदोलन में दिखी, उसके बाद पत्रकारिता प्रबंधन की ओर उन्मुख हो गयी । इसके बाद पत्रकारिता हाशिए पर चली गयी । पत्रकार बंधुआ मजदूर बने और प्रबंधन सरकारों के अधीन जाते दिखे । आज की पत्रकारिता व्यावसायिक पत्रकारिता है । पत्रकार आज सिर्फ नौकरी कर रहा है और उसका काम हुकुम बजाना रह गया है । हकीकत को देखने की जरूरत है और अगर कुछ बदलना है तो प्रबंधन को बदलना होगा । प्रबंधन पहले जनोन्मुख होना है क्योंकि जब वह जनोन्मुख होगा तो सदाशयता जगेगी । आज स्थिति यही है कि पत्रकार मार दिये जाते हैं, वेज बोर्ड नहीं है। ट्रस्टी बोर्ड नहीं, वेलफेयर बोर्ड नहीं है । पत्रकारिता में दाखिल होने वालों के लिए भी निगरानी का तंत्र नहीं है तो गुणवत्ता कहां से आएगी ? अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार संघ के मुताबिक पिछले वर्ष दुनिया भर में कुल 128 पत्रकारों और मीडियाकर्मियों की हत्या हुई। जिससे 2025 पत्रकारिता के लिए सबसे घातक वर्षों में से एक बन गया। पत्रकार संघ द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार मध्य-पूर्व और अरब जगत सबसे खतरनाक क्षेत्र था, जहां मुख्य रूप से संघर्ष रिपोर्टिंग के कारण 74 मौतें हुईं, जो वैश्विक कुल मौतों का लगभग 58 प्रतिशत है। अकेले फिलिस्तीन में 56 पत्रकार मारे गए। घोटाले उजागर करने पर भारत में बहुत से पत्रकार मारे जा चुके हैं । बंगाल में पिछली सरकार के समय पत्रकारों पर लाठियां बरसाई गयी थीं । पत्रकार सच लिखे तो उसके सच का साथ देने वाला कौन है ? उस पर मानहानि का मुकदमा होता है तो उसके लिए खड़ा होने वाला कौन है, उसे धमकियां मिलें तो उसका साथ देने कौन आता है ? डॉक्टर मरे, शिक्षक मरे तो आंदोलन होते हैं पर पत्रकारों को जब मारा जाता है तो क्या आपने आज तक कोई आंदोलन सुना है ? पत्रकार चाहकर भी अपने लिए आवाज नहीं उठा सकते । हिन्दी के तो अधिकतर पत्रकार सरकारी सुविधाओं से वंचित हैं । पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग असंगठित है । प्रेस क्लबों के माध्यम से जो सुविधाएं मिलती हैं, वह मान्यता प्राप्त पत्रकारों को जाती हैं । रिपोर्टर, स्ट्रींगर, फोटोग्राफर, कैमरामैन, पेज मेकर, वीडियो एडिटर, इन सब पर तो बात ही नहीं होती और इनमें से अधिकतर लोग निम्न मध्यम वर्ग से आते हैं । कोलकाता में तो हिन्दी के पत्रकारों की हितों की रक्षा करने के लिए, उनकी आवाज उठाने तक के लिए कोई संगठन नहीं है। महिला पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कहीं आवाज नहीं उठती । जिस तरह अम्बानी को देखकर पूरे समाज को अमीर नहीं माना जा सकता, वैसे ही कुछ चमकते चेहरे पत्रकार और पत्रकारिता को परिभाषित नहीं करते..पत्रकारिता वैसी ही है जैसा आपका समाज है...वह भी साहित्य की तरह समाज का दर्पण है । साहित्यकार जवाबदेह होने को बाध्य नहीं हैं...हम एक एक पंक्ति भी इधर उधर लिख दें तो मुकदमे हो जाते हैं..विरोध करें तो हत्याएं हो जाती हैं । किसी भी पत्रकार को वो सहूलियत नहीं है..एक एक बाइट के लिए..कमेंट्स के लिए घण्टों भूखे प्यासे खड़े रहना पड़ता है..कोई भी सरकार कभी भी किसी मीडिया कर्मी की नहीं होती...दमन करती है और सबसे पहले विज्ञापन बंद करती है...उसके भय से दूसरे लोग भी बंद करते हैं..। अखबार लोग खरीदते नहीं..विज्ञापन आप लोग देते नहीं...आदर्श जब आपके समाज में नहीं...जब आपके साहित्य में नहीं..तो आप पत्रकारिता से इतनी उम्मीद क्यों लगा रहे हैं...जब आप आनंद भोज कर रहे होते हैं...हम कड़ी धूप में...सर्दी में...दंगों के बीच काम कर रहे होते हैं...छुट्टियां हमारे लिए नहीं...कभी किसी त्योहार के दिन मीडिया के दफ्तरों में जाकर देखिए...वेतन ऐसा की आपके सप्ताह भर को भी काफी न हो.. अधिकतर पत्रकारों के पास पेंशन की सुविधा नहीं । .हमारी जिम्मेदारी जनता के प्रति है..एक वर्ग के प्रति नहीं है...मुझे पानी और सड़क और साहित्य के बीच चुनना होगा तो निश्चित रूप से मैं पानी-बिजली और सड़क का ही चयन करूंगी...विज्ञापन का चयन करूंगी क्योंकि उसने हमें जिंदा रखा है..सरकार और संस्थाएं छोटे अखबारों की मदद नहीं करतीं.. पत्रकारिता और पत्रकार अलग नहीं हैं तो अगर सवाल करना है. उंगली उठानी है तो पहली उंगली खुद पर...अपने समाज पर उठाइए। आज जिसके पास पैसा है, ताकत है, वही माइक उठाकर पत्रकार बन रहा है । सोशल मीडिया पर चमक रहा है मगर इन सबके बीच में जो वास्तविक पत्रकार हैं, वह पिसते हैं । जब हर क्षेत्र में प्रवेश के लिए परीक्षा हो सकती है तो पत्रकारिता के लिए क्यों नहीं ? कोई भी सरकार असंगठित मीडियाकर्मियों के हितों को लेकर क्यों नहीं सोच रही ? कोई वेतन बोर्ड नहीं है, कोई बीमा नहीं है, कोई योजना नहीं है, सुरक्षा की व्यवस्था नहीं है और वह इसलिए हम अभी तक मिशन वाली भावना में अटके हैं । पत्रकारिता को उद्योग मानने की जरूरत है, बगैर इसके चौथे स्तम्भ का टिके रहना कठिन है । लोकतंत्र के चौथे खम्भे से उम्मीदें बहुत हैं मगर उसके संरक्षण और उसकी सुरक्षा के लिए सरकारी तौर पर आज तक ठोस काम नहीं हुआ । इस देश में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के लिए भी वेतन बोर्ड है, सरकारी योजनाएं हैं, पेंशन है मगर मुट्ठी भर मान्यता प्राप्त पत्रकारों को छोड़ दिया जाए तो मीडिया के क्षेत्र में काम कर रहा बड़ा तबका इन सबसे वंचित है । यह सब इसलिए क्योंकि इस मिशनरी पत्रकारिता के आवरण में हम पत्रकार अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज नहीं उठा रहे। अब समय आ गया है कि इस मिशनरी पत्रकारिता के झोल से पत्रकारिता को मुक्ति दी जाए और इसे भी दूसरे क्षेत्रों की तरह ही देखा जाए । ........................

टिप्पणियाँ