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मिशनरी पत्रकारिता के आवरण से पत्रकारिता को बाहर निकालिए

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30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस हम मनाते हैं । पत्रकारिता को मिशन, सेवा, ध्येय मानकर साहित्य से जोड़ा जाता है और मीडिया को कोसना पत्रकारिता से जुड़े आयोजनों की परम्परा बन गयी है । मैं पत्रकार हूँ तो आज मैं पत्रकार के रूप में ही बात करूँगी और मेरी कोशिश होगी कि वह बातें भी रख सकूँ जो कोई समझने को तैयार नहीं है । शिक्षा दान महादान है, साहित्य और कला समाज का दर्पण है, चिकित्सक भगवान है...ये हम सुनते आ रहे हैं मगर यथार्थ के धरातल पर सभी कार्यक्षेत्रों को प्रोफेशन मान लिया गया है और इन क्षेत्रों में काम कर रहे लोगों के लिए कमाई के भरपूर मौके हैं । वेतन बोर्ड है, इस देश में संगठन हैं, परीक्षाएं होती हैं, सुविधाएं हैं, पेंशन हैं और इनके परिवारों के लिए एक सुरक्षित भविष्य है जबकि ये सभी क्षेत्र मिशन ही माने जाते रहे हैं। मेरा सवाल यह है कि जब समाज लगभग सभी कार्यक्षेत्रों के प्रति इतनी उदारता है तो पत्रकारिता को प्रोफेशन मानने में दिक्कत क्या है? हम पेशेवर होकर भी संगठित रहकर बेहतर काम कर सकते हैं । वह दिन गये जब जनोन्मुख पत्रकारिता होती थी, उसकी अंतिम झलक आपात काल में दिखी । फिर लोकपाल...