युवाओं के आक्रोश को सही दिशा चाहिए
जंतर - मंतर पर युवाओं ने डेरा जमा रखा है। देश भर में युवाओं का आक्रोश उबाल पर है । परीक्षाओं में पेपर लीक होने के विरोध में आंदोलन शुरू हुआ । इसके पहले भी आंदोलन होते रहे हैं मगर युवाओं के इस आक्रोश के साथ दिक्कत यह है कि जब राजनीतिक पार्टियां हस्तक्षेप करती हैं तो मुद्दा ही हाईजैक हो जाता है। भारत में इतने छात्र संगठन हैं मगर ऐसा क्यों है कि इनमें से एक भी युवाओं के लिए सामने नहीं आ रहा । आज युवाओं के पास एक भी ऐसा चेहरा ऐसा नहीं है जो उनका नेतृत्व कर सके । आज के युवाओं के सामने रोल मॉडल चुनने का संकट है । उनके आक्रोश तो है पर उसे दिशा देने वाला कोई नहीं है और न ही कोई समझने वाला है । कहीं न कहीं आत्मविश्वास अहंकार में बदल रहा है । इसकी बानगी हम होक कलरव में भी देख चुके हैं और अब जंतर - मंतर पर देख रहे हैं । युवा वर्ग बंटा हुआ है । एक वह है जो जमीन पर लड़ रहा है, व्यवस्था से लड़ रहा है। अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए उसके पास पैसे नहीं हैं, संसाधन नहीं हैं, कोई समझने वाला नहीं है और महत्वाकांक्षाएं बहुत हैं। जब वह इनको पूरा नहीं कर पाता तो यह जमा हुआ असंतोष ही आक्रोश बन जाता है क्योंकि वह खुद में ही उलझा है। बदतमीजी को वह साहस समझ रहा है । दूसरी तरफ दूसरा वर्ग वह है जो समृद्ध है, उसने लक्जरी पाई है । उसने कभी असफलता का मुंह नहीं देखा, मुंह खोलते ही उसे हर चीज मिलती रही है और एडजस्टमेंट उसकी डिक्शनरी में नहीं है। हर चीज सुलभ होने के कारण उसमें जिद है, अहंकार है जो उसे एरोगेंट बना रहा है । वह अपने आगे किसी को नहीं समझ रहा । ऐसी स्थिति में जब जमीन पर कोई चीज नहीं मिलती तो उसका आक्रोश बढ़ जाता है ।
जिस तरह से घोटालों और भ्रष्टाचार के कारण हजारों युवाओं ने नौकरियां गंवा दीं । पेपर लीक होने के कारण लाखों युवा प्रभावित हो रहे हैं तो आक्रोश होना स्वाभाविक है । शिक्षकों को युवाओं के लिए साथ खड़ा होना चाहिए था, मुझे शिक्षक दिख नहीं रहे। इसका लाभ वह ताकतें उठा रही हैं जो युवाओं को बरगला रही हैं । अगर प्रदर्शन की बात करूँ तो सही समय पर हस्तक्षेप करने की जरूरत है जो नहीं हुआ और न ही हो रहा है । सिस्टम को सुधारने पर फोकस होना चाहिए था मगर सरकारें हमेशा से पल्ला झाड़ने में लगी हैं ।
युवा पिस रहे हैं..शिक्षा तो है पर शिक्षक नहीं हैं । पेपर लीक हो रहे हैं, नौकरियां नहीं हैं । पैसे कमाने की होड़ लगी है । सोशल मीडिया ने युवाओं की सोच को ऐसा प्रभावित किया है कि दिखावे की शान -शौकत वाली जिंदगी उनके लिए सफलता है । चैट जीपीटी के दौर में, एआई के दौर में जमीनी तौर पर मेहनत करना युवा भूल रहे हैं ।
युवा नाराज हैं, उनमें आक्रोश है पर क्या यह आक्रोश नया है...बिल्कुल नया नहीं हैं। कारण यह है कि हर तरह की व्यवस्था से उनका विरोध हमेशा से रहा है। आप इसे जेनरेशन गैप कह सकते हैं मगर अन्तर यह है कि व्यवस्था चाहे परिवार की हो, समाज की या तंत्र की..मतभेद और विरोध हमेशा से रहे हैं और रहेंगे । अन्तर यह है कि पहले युवा पीढ़ी के आक्रोश को दिशा मिलती थी क्योंकि वह अनुभवों का आदर करना और सुनना जानते थे, जरूरत पड़े तो झुकना जानते थे। वह समय संयुक्त परिवारों का था जब बच्चे अपनी बात समझाने के लिए सिर्फ माता -पिता पर निर्भर नहीं रहते थे । घर में चाचा, दादा, दादी, चाची और बुआ से लेकर ताऊ जैसे रिश्ते थे। भाई -बहन थे और वह चचेरे, फुफेरे और ममेरे भी हों तो भी बच्चे मन की बात कहते थे और उनकी बात सुनी जाती थी। समझी भी जाती थी तो आक्रोश को दिशा मिलती थी क्योंकि अपनेपन का दायरा बढ़ जाता था । अगर घर - परिवार में कोई न हो तो शिक्षक उसे समझते थे और उस आक्रोश को दिशा देते थे। बच्चों और युवाओं की उर्जा को सकारात्मक तरीके से चैनलाइज किया जाता था । तब आई क्यू के साथ ई क्यू ऐसे ही विकसित होता था और उनमें संवेदना होती थी । अगर बच्चे को किसी ने डांट दिया तो यह प्रेस्टीज इश्यू नहीं बनता था । आज युवाओं को जीवन जीने कला सिखाने वाला कोई नहीं है। तब माता - पिता बहुत सहज थे मगर आज संयुक्त परिवार कम हैं और जो हैं, वह औपचारिकता निभा रहे हैं। उनमें प्रेम की जगह प्रतियोगिता है। परिवार का मतलब बदल गया है। माता - पिता बच्चों को अपनी सम्पत्ति मान रहे हैं...निजता के नाम पर उनको बाकी के परिवार से अलग किया जाता रहा । नतीजा यह है कि उनकी दुनिया जन्म के साथ ही संकुचित हो गयी है । वह खुद को अभिव्यक्त नहीं पा रहे, असंतोष भीतर जड़ें जमा रहा है । इसके बाद सामन्य वर्ग से आने वाले जिन मेधावी विद्यार्थियों का आरक्षण के नाम पर भविष्य खत्म हो रहा है, उनकी निराशा और कुंठा अपनी जगह है। बचपन और युवावस्था में अनुशासन की जरूरत होती है, संयम की जरूरत है मगर आज के बच्चे समझौता शब्द नहीं जानते । वह महत्वाकांक्षी हैं और इतने महत्वाकांक्षी कि उनको जो चीज पसंद आ गयी, वह उनको हर हाल में चाहिए । आज बच्चों को समय नहीं दे पाने के अपराधबोध में माता -पिता बगैर सोचे - समझे उनकी हर मांग पूरी कर रहे हैं। एडजस्टमेंट और झुकना जैसे शब्द आज के युवाओं को अपराध लगता है । मोबाइल और सोशल मीडिया के जाल में फंसी रहने वाली इस पीढ़ी को जमीनी संघर्ष की आदत नहीं है । हर चीज आसानी से मिलने के कारण वह उसका मोल नहीं समझ रहे । पाठ्यक्रम इतना आसान कर दिया गया है कि उसका महत्व ही खत्म हो गया है । आसानी से अच्छे नम्बर पाने वाले बच्चे जब धरातल पर उतरते हैं तो उनका पिरामिड उलट जाता है और उनका आक्रोश भी । सोशल मीडिया की चकाचौंध को जब जीवन में उतारने की कोशिश करते हैं तो उनको धक्का लगता है । आज बच्चे और युवा डिग्री वाले मेधावी तो हैं मगर उनकी संवेदनाएं सूख गयी हैं और वह रिश्तों का महत्व नहीं समझ रहे । युवाओं को हर तरह से समेटने की जरूरत है और इसकी शुरुआत परिवार से होगी । शिक्षकों को सामने आना होगा और सरकार को समझना होगा क्योंकि दमन करने से समस्या का समाधान नहीं होता । यह सुनिश्चित कीजिए कि बाहरी ताकतें अपना उल्लू सीधा करने के लिए हमारे बच्चों का इस्तेमाल न करें ।

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