मंगलवार, 27 सितंबर 2016

हिन्दी केवल हिन्दी प्रदेश की ही नहीं बल्कि हर भारतीय की भाषा है


हिन्दी हमारी अपनी भाषा है और यह किसी एक दिवस विशेष की मोहताज नहीं है इसलिए आज सितम्बर का महीना नहीं होने के बावजूद हिन्दी को लेकर अपनी बात कहने जा रही हूँ।
मंच पर उपस्थित हिन्दी के विद्वतजन, गुरुजन और मेरे प्यारे दोस्तों
पता है कि आपने हिन्दी को चुना है और अब आपके मन में अपने चयन को लेकर काफी प्रश्न उठ रहे हैं। अब तो राजभाषा, राष्ट्रभाषा के झगड़े के साथ बोलियों को भी हिन्दी के लिए खतरा बताया जा रहा है। हिन्दी में रोजगार के अभाव का रोना रोया जा रहा है और राष्ट्रभाषा के रूप में भाषा के विस्तार की चाह को भी साजिश बताया जा रहा है, मैं इन सभी मुद्दों पर अपनी बात रखूँगी और मेरा प्रयास होगा कि आप जब इस मंच से जाएं तो एक नयी उर्जा के साथ जाएं  और मुझे विश्वास है कि यह होगा।
सबसे पहले समझते हैं कि यह विरोध क्यों हो रहा है। हिन्दी हमारी राजभाषा है और वह विभिन्न बोलियों को लेकर बनी निर्मित हुई है। संविधान में इसे राजभाषा का दर्जा देकर बड़ा बनाया गया है। मैं आपसे पूछती हूँ कि अगर आपके परिवार में आप आत्मनिर्भर नहीं हैं तो आप तो अपने बड़ों से ही उम्मीद करेंगे कि वह आपका खर्च वहन करे और आपके परिवार में जो भी बड़ा है, उसकी कोशिश यह होगी कि आप अपने पैर पर खड़े हों जिससे आप खुद अपना दायित्व उठा सकें मगर ऐसा न हो तो? आपको बड़ा नहीं होने दिया जाए और आपको अपनी पहचान नहीं बनाने दी जाए तो क्या आप परिवार में अपने पिता या उस व्यक्ति का सम्मान करेंगे? नहीं न, बस हिन्दी और बोलियों के बीच यही समस्या है क्योंकि बड़े होने का दर्जा छिनने और बोलियाँ बराबर न आ जाएं इसलिए हिन्दी के तथाकथित दिग्गज विद्वानों ने हिन्दी को न तो बोलियों से जुड़ने दिया और न अन्य भारतीय भाषाओं से। होना तो यह चाहिए था कि शिक्षण संस्थानों के हिन्दी विभाग में हिन्दी की बोली अथवा किसी स्थानीय भाषा के लिए अलग से पद होता, पाठ्यक्रम होता अथवा बोलियों को लेकर एक स्पेशल पेपर होता, मगर ऐसा नहीं हुआ। एक भाषा विज्ञान का पद बनाया गया और उसमें सारी बोलियों और उनके विकास को समेट दिया गया। साहित्य में बोलियों के नाम पर तुलसीदास, सूरदास और मीराबाईजैसे कई कवि हैं मगर वर्तमान समय में जो लिखा या पढ़ा जा रहा है, वह कहाँ है? हिन्दी पढ़ने वाले विद्यार्थी हर एक विभाषा, उपभाषा अथवा बोली का इतिहास और साहित्य समझते, यह चयन उन पर ही छोड़ा जा ना चाहिए था होना तो यह चाहिए था कि हिन्दी साहित्य से जुड़े कार्यक्रमों में बोलियों से संबंधित विद्वान होते, अवधी, ब्रज और मैथिली के कवि भी होते, मगर ऐसा नहीं हुआ। जब हिन्दी बोलियों को लेकर बनी है तो सिर्फ खड़ी बोली ही हिन्दी कैसे हो सकती है और बोलियों से भला हिन्दी को खतरा कैसे हो सकता है जबकि बोली की अपनी जगह है और हिन्दी का अपना विशेष स्थान। हिन्दी के अधिकारियों और संस्थानों और विश्वविद्यालयों ने अपना दायित्व नहीं निभाया इसलिए बोलियाँ भाषा बनना चाहती हैं और इसमें कोई बुराई नहीं है। हर बोली इतनी समृद्ध है कि उसे अब सिर्फ एक पेपर या विभाग में नहीं बाँधा जा सकता इसलिए उनका  हिन्दी जब पूरे देश की भाषा है तो उसे सिर्फ हिन्दी प्रदेश तक क्यों सिमटे रहना चाहिए।
अब समझते हैं कि हिन्दी के तथाकथित विद्वान बोलियों को आगे क्यों नहीं बढ़ने देना चाहते और भाषाओं से उनको समस्या क्यों है? दो बातें हैं – एक तो यह है कि बोलियाँ अगर भाषा बनीं तो उनको मिलने वाला सरकारी अथवा गैर सरकारी अनुदान कम हो जाएगा। अब तक वे जिन बोलियों को चाकर समझते रहे हैं, वह उनके समकक्ष होगी और सर्वश्रेष्ठता का जो तमगा लगाकर वे घूम रहे हैं, वह छिन जाएगा क्योंकि बोलियाँ भाषा बनीं तो उनकी प्रगति के लिए अनुदान मिलेगा और हिन्दी को मिलने वाला अनुदान प्रभावित होगा जो संस्थाओं की जेब पर असर डालेगा, इसलिए उन्होंने यह साजिश की है और हिन्दी खतरे में है का राग अलाप रहे हैं। दोस्तों, डॉक्टर दो तरह के होते हैं, एक वे जो चाहते हैं कि मरीज में उत्साह बना रहे और वह जल्दी से जल्दी ठीक हो जाए और दूसरे वे जो चाहते ही नहीं है कि मरीज को पता चले कि वह ठीक हो गया है वरना उनकी डॉक्टरी का भट्टा बैठ जाएगा, बेचारे बेरोजगार हो जाएंगे। हिन्दी की समस्या ये दूसरी तरह के डॉक्टर हैं जो चाहते ही नहीं हैं कि हिन्दी आम जनता तक पहुँचे वरना उनकी दुकानदारी बैठ जाएगी। वह कभी भाषा की शुद्धता को अडंगा बनाते हैं तो कभी बोलियों के अलग होने से डरते हैं मगर उनको यह अब मान लेना चाहिए कि हमारी भाषा और हमारी संस्कृति किसी विश्वविद्यालय, संस्थान, आलोचना या गोष्ठियों की सम्पत्ति नहीं है। वह आम भारतीय की भाषा है, फिर वह एक रिक्शेवाला बोले या पान की दुकान चलाने वाला या दक्षिण भारत में कोई डोसा बेचने वाला और वह हिन्दी ऐसे ही बोलेंगे जैसे आप हिन्दी मिश्रित अँग्रेजी बोलते हैं मसलन कॉलेज और कालेज और ऑफिस को आफिस। क्या आपके गलत बोलने से अँग्रेजी को क्षति पहुँची? नहीं, क्योंकि आप खुद ही मान रहे हैं कि अँग्रेजी विकसित हो रही है तो जो गलत हिन्दी बोल रहा है, उसे सुधारने में आप उसका सहयोग कर सकते हैं मगर आपको यह कहने का अधिकार नहीं है कि हिन्दी नहीं आती, मत बोलो। केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो गायकी का शौक लेकर मुंबई गए तो उनकी बांग्ला वाली हिंदी सुनकर अपने को हजारी प्रसाद द्विवेदी मानने वाले साथी गायक मज़ाक उड़ाते थे. चंदा रे चंदा रे कभी तो ज़मीं पे आऔर भारत हमको जान से प्यारा हैगाने वाले हरिहरन की हिंदी बोलने की काबलियत पर पहला सवाल इसलिए खड़ा हुआ कि वो दक्षिण भारत से हैं। तो हे हिंदी को अपनी जागीर समझने वालों ! भारत में हिंदी किसी की भी पहली भाषा नहीं है, कोई हरियाणवी है जो खींचना को खेंचणा कहता है, कोई पंजाबी है जिसकी भाषा में राजमार्ग को राजमारग ही कहा जाता है, कोई बंगाली है जो संभव को शोंभव बोलता है. हिंदी हम सबकी है और बराबर है. सड़क को सरक बोलने वाले बिहारी की भी उतनी ही है जितनी मेरी बेटी अभी स्कूल जाएगाबोलने वाले असमिया की। अगर आप चाहते हैं कि दीपा कर्मकार अंग्रेज़ी पत्रकारों को भी अंग्रेज़ी की बजाय हिंदी में ही इंटरव्यू देती रहें, किसी मोतिहारी वाले को मैसूर में भाषा की दिक्कत न हो, ज्यादा से ज्यादा भारतीय एक सांझी भाषा में स्वाद लें, खुशिया बांटे तो सबको हिंदी बोलने दें, अपने-अपने रंग-ढंग में. टैबलेट कम्प्यूटर को गोली कम्प्यूटर लिखने वाली सरकारी संस्थाओं को नहीं, लोगों को तय करने दें कि हिंदी क्या है. देश की हर एक ज़ुबां मिलती है तभी तो हिंदी बनती है। अगर आपको हिन्दी से प्रेम है तो आपको भाषा के समग्र विकास पर ध्यान देना होगा। अब मैं हिन्दी के विद्वानों से दो चार – बातें कहना चाहूँगी। हिन्दी का हर संगठन अपने तरीके से काम करता है मगर हिन्दी में इतनी एकता क्यों  नहीं है कि पाँच संगठन एक साथ मिलकर कोई बड़ा काम करें। आप बोलियों के विकास को रोककर हिन्दी का विकास करेंगे? अव्वल तो यह एक स्वार्थी और मध्ययुगीन मानसिकता है कि आप अकेले न रह जाएं इसलिए अपने बच्चों को बड़ा नहीं होने देंगे और आप अगर ऐसा करते भी हैं तो भी आपके हाथ कुछ नहीं आने वाला क्योंकि किसी को दबाकर जब कोई अपना विकास करता है तो उसे प्रेम कभी नहीं मिल सकता। अगर आप अपने बरगद के लिए जबरन बोलियों को बोनसाई बनाएंगे तो बोलियाँ विद्रोह करके हिन्दी से दूर चली जाएंगी और जब मन में खटास हो तो घरवापसी कभी नहीं होगी। आप इतने असुरक्षित हैं कि आपको संख्या बल की जरूरत है, आपमें इतना आत्मविश्वास क्यों नहीं है और इतनी शक्ति क्यों नहीं है कि आपके प्रेम में इतना जोर हो कि बोलियों के विकास को प्रश्रय दें, और हृदय के स्नेह के बल पर हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दें। संख्या बल से कभी प्रेम नहीं मिल सकता और मिलेगा तो वह कभी स्थायी नहीं होगा। जबरन आप बच्चों को साथ तो रख नहीं सकते, बोलियों को साथ रखेंगे? अगर रख सकते हैं तो दिखाइए। आप जानते हैं कि इसी मानसिकता के कारण आज परिवार भी टूट रहे हैं और भाषा भी बिखर रही है। हिन्दी को आप जबरन रास्ते का काँटा बनाएंगे तो आप उसे बोलियों और अन्य भाषाओं का शत्रु बना रहे हैं और साजिश यही है क्योंकि जब हिन्दी कमजोर रहेगी तो आपकी गाड़ी भी चलती रहेगी मगर ऐसा नहीं होगा। हिन्दी को खतरा बोलियों को आँठवीं अनुसूची में शामिल होने से नहीं है बल्कि आपकी इस मानसिकता से है कि आप तो जीएंगे मगर दूसरों को मरने के लिए छोड़ देंगे। हिन्दी के कई शब्द अँग्रेजी को अपनाने पड़े हैं, गूगल को आज प्रेमचंद जयंती मनानी पड़ रही हैं, यह हिन्दी की ताकत है। डिस्कवरी चैनल को हिन्दी को विकल्प के तौर पर रखना पड़ रहा है, यह बाजार की माँग है और बाजार की माँग हिन्दी है। अगर भोजपुरी में स्पाइडर मैन आया और उसे सराहा जा रहा है तो उससे आपको क्यों तकलीफ हो रही है। हिन्दी को खतरा ऐसे कवियों से है जिनकी अश्लील कवितता को हमेशा एक औरत की देह की जरूरत पड़ती है, हिन्दी को खतरा ऐसे अधिकारियों से है जो अनुदान लेते हैं मगर कार्यालयों के बाहर हिन्दी के गलत साइनबोर्ड हटाना अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते। आप लिपि की बात कर रहे हैं, हिन्दी ने भी अपनी देवनागरी से ली है, भोजपुरी भी यह कर रही है तो आपको दिक्कत क्यों है?

अब बात करते हैं उस क्षेत्र के बारे में जिसे लेकर युवाओं को हिन्दी से दूर किया जा रहा है, रोजगार और हिन्दी का प्रसार। दोस्तों, आपका भविष्य चमकते सूर्य की तरह सुनहरा है क्योंकि हिन्दी अब किसी क्षेत्र की नहीं, देश की नहीं बल्कि पूरे विश्व की भाषा है क्योंकि वह बाजार, मीडिया और आम आदमी की जरूरत है। अगर नहीं होती तो हम पर 200 साल तक शासन करने वाले ब्रिटेन को बीबीसी हिन्दी की जरूरत ही नहीं पड़ती। अगर डेयरी मिल्क कैडबरी को भारत के गाँवों में जाना है तो उसे कुछ मीठा हो जाए ही कहना पड़ेगा। अगर कैनन को गाँवों में बाजार बनाना है और संवाद करना है तो उसे स्थानीय बोली के साथ हिन्दी बोलने वाले व्यक्ति को ले जाना होगा। अगर राहुल गाँधी और जयललिता को यूपी और बिहार से चुनाव जीतना है तो उनको भोजपुरी और हिन्दी बोलनी होगी और खटिया लेकर घूमना भी होगा। हिन्दी बाजार की ही नहीं जनतंत्र की ताकत है तो जो भाषा इतनी ताकतवर हो, उसे लेकर आप हीन भावना से ग्रस्त क्यों होंगे? दोस्तों, हिन्दी के प्रति हो रही साजिश और बोलियों और भाषाओं को दूर कर नफरत पैदा करने वालों का एक ही तरीके से जवाब दिया जा सकता है और वह जवाब आप देंगे, हर भारतीय देगा, तरीका एक है – हर जगह अपनी भाषा के साथ हिन्दी भी बोलिए और जो रोना शुरू करे, उसे एक रुमाल थमा दीजिए। आइए, हिन्दी दिवस को हिन्दी, बोली व भारतीय भाषा दिवस के रूप में मनाएं और घर – घर में मनाएं। याद रखें हिन्दी, हिन्दी प्रदेश की ही नहीं बल्कि हर भारतीय की भाषा है – हिन्दी हैं हम, हिन्दी हो तुम, हिन्दी से है हमारा हिन्दोस्तां।


 (एक कार्यशाला के लिए तैयार किया गया वक्तव्य)

बुधवार, 21 सितंबर 2016

हिन्दी को बोलियों से नहीं साहित्यिक साम्राज्यवाद फैलाने वालों से खतरा है


डॉक्टर दो तरह के होते हैं, एक वे जो चाहते हैं कि मरीज में उत्साह बना रहे और वह जल्दी से जल्दी ठीक हो जाए और दूसरे वे जो चाहते ही नहीं है कि मरीज को पता चले कि वह ठीक हो गया है वरना उनकी डॉक्टरी का भट्टा बैठ जाएगा, बेचारे बेरोजगार हो जाएंगे। हिन्दी की समस्या यही है कि हिन्दी के कई विद्वान और आलोचक चाहते ही नहीं हैं कि हिन्दी आम जनता तक पहुँचे वरना उनकी दुकानदारी बैठ जाएगी। वह कभी भाषा की शुद्धता को अडंगा बनाते हैं तो कभी बोलियों के अलग होने से डरते हैं मगर उनको यह अब मान लेना चाहिए कि हमारी भाषा और हमारी संस्कृति किसी विश्वविद्यालय, संस्थान, आलोचना या गोष्ठियों की सम्पत्ति नहीं है। वह आम भारतीय की भाषा है, फिर वह एक रिक्शेवाला बोले या पान की दुकान चलाने वाला या दक्षिण भारत में कोई डोसा बेचने वाला और वह हिन्दी ऐसे ही बोलेंगे जैसे आप हिन्दी मिश्रित अँग्रेजी बोलते हैं मसलन कॉलेज और कालेज और ऑफिस को आफिस। क्या आपके गलत बोलने से अँग्रेजी को क्षति पहुँची? नहीं, क्योंकि आप खुद ही मान रहे हैं कि अँग्रेजी विकसित हो रही है तो जो गलत हिन्दी बोल रहा है, उसे सुधारने में आप उसका सहयोग कर सकते हैं मगर आपको यह कहने का अधिकार नहीं है कि हिन्दी नहीं आती, मत बोलो। केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो गायकी का शौक लेकर मुंबई गए तो उनकी बांग्ला वाली हिंदी सुनकर अपने को हजारी प्रसाद द्विवेदी मानने वाले साथी गायक मज़ाक उड़ाते थे. चंदा रे चंदा रे कभी तो ज़मीं पे आऔर भारत हमको जान से प्यारा हैगाने वाले हरिहरन की हिंदी बोलने की काबलियत पर पहला सवाल इसलिए खड़ा हुआ कि वो दक्षिण भारत से हैं।
तो हे हिंदी को अपनी जागीर समझने वालों ! भारत में हिंदी किसी की भी पहली भाषा नहीं है, कोई हरियाणवी है जो खींचना को खेंचणा कहता है, कोई पंजाबी है जिसकी भाषा में राजमार्ग को राजमारग ही कहा जाता है, कोई बंगाली है जो संभव को शोंभव बोलता है. हिंदी हम सबकी है और बराबर है. सड़क को सरक बोलने वाले बिहारी की भी उतनी ही है जितनी मेरी बेटी अभी स्कूल जाएगाबोलने वाले असमिया की।
हमारी भाषाओं के लिए कितने शर्म की बात होती है कि ग़लत अंग्रेज़ी बोलने वाले को तो हम मुहं बाएं ऐसे देखते हैं जैसे प्लासी में रॉबर्ट क्लाइव आ गया हो और हिंदी पर कोई अपना रंग चढ़ाना चाहे तो चाहते हैं कि बस आह उसका तपता बदन उत्सलीला का नव अभिनंदन थालिखने वाले कवियों की तरह बोले.
अगर आप चाहते हैं कि दीपा कर्मकार अंग्रेज़ी पत्रकारों को भी अंग्रेज़ी की बजाय हिंदी में ही इंटरव्यू देती रहें, किसी मोतिहारी वाले को मैसूर में भाषा की दिक्कत न हो, ज्यादा से ज्यादा भारतीय एक सांझी भाषा में स्वाद लें, खुशिया बांटे तो सबको हिंदी बोलने दें, अपने-अपने रंग-ढंग में. टैबलेट कम्प्यूटर को गोली कम्प्यूटर लिखने वाली सरकारी संस्थाओं को नहीं, लोगों को तय करने दें कि हिंदी क्या है. देश की हर एक ज़ुबां मिलती है तभी तो हिंदी बनती है। अगर आपको हिन्दी से प्रेम है तो आपको भाषा के समग्र विकास पर ध्यान देना होगा। अब सवाल इस राज्य में सैकड़ों हिन्दी माध्यम स्कूल हैं और कॉलेज भी हैं मगर उनकी संरचना गत समस्या है, अधिकतर हिन्दी की रोटी खाने वाले अपने बच्चों को अँग्रेजी माध्यम स्कूल या कॉलेज में पढ़ाते हैं मगर आपने क्या हिन्दी माध्यम स्कूलों की संरचना को मजबूत करने के लिए आवाज उठाई। आप हिन्दी को पाठ्यक्रम में हटाने पर सवाल उठाते हैं मगर क्या आपने जवाब माँगा संबंधित काउंसिल या बोर्ड से, कि ऐसा क्यों है या कभी इतनी हिम्मत की कि जिस स्कूल में हिन्दी की उपेक्षा की जाती हो, वहाँ आप अपने बच्चों को नहीं भेजेंगे। हर कॉलेज अपने पूर्व छात्रों को याद करता है, क्या कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग ने आज तक ऐसा कोई आयोजन किया या फिर क्या आज तक विश्वविद्यालय की वेबसाइट अपडेट भी की गयी है कि आपके विभाग की गतिविधियाँ आम जनता तक पहुँचे। हिन्दी का हर संगठन अपने तरीके से काम करता है मगर हिन्दी में इतनी एकता क्यों  नहीं है कि पाँच संगठन एक साथ मिलकर कोई बड़ा काम करें। आप बोलियों के विकास को रोककर हिन्दी का विकास करेंगे? अव्वल तो यह एक स्वार्थी और मध्ययुगीन मानसिकता है कि आप अकेले न रह जाएं इसलिए अपने बच्चों को बड़ा नहीं होने देंगे और आप अगर ऐसा करते भी हैं तो भी आपके हाथ कुछ नहीं आने वाला क्योंकि किसी को दबाकर जब कोई अपना विकास करता है तो उसे प्रेम कभी नहीं मिल सकता। अगर आप अपने बरगद के लिए जबरन बोलियों को बोनसाई बनाएंगे तो बोलियाँ विद्रोह करके हिन्दी से दूर चली जाएंगी और जब मन में खटास हो तो घरवापसी कभी नहीं होगी। आप इतने असुरक्षित हैं कि आपको संख्या बल की जरूरत है, आपमें इतना आत्मविश्वास क्यों नहीं है और इतनी शक्ति क्यों नहीं है कि आपके प्रेम में इतना जोर हो कि बोलियों के विकास को प्रश्रय दें, और हृदय के स्नेह के बल पर हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दें। संख्या बल से कभी प्रेम नहीं मिल सकता और मिलेगा तो वह कभी स्थायी नहीं होगा। जबरन आप बच्चों को साथ तो रख नहीं सकते, बोलियों को साथ रखेंगे? अगर रख सकते हैं तो दिखाइए। आप जानते हैं कि इसी मानसिकता के कारण आज परिवार भी टूट रहे हैं और भाषा भी बिखर रही है। हिन्दी को आप जबरन रास्ते का काँटा बनाएंगे तो आप उसे बोलियों का शत्रु बना रहे हैं और साजिश यही है क्योंकि जब हिन्दी कमजोर रहेगी तो आपकी गाड़ी भी चलती रहेगी मगर ऐसा नहीं होगा। हिन्दी को खतरा बोलियों को आँठवीं अनुसूची में शामिल होने से नहीं है बल्कि आपकी इस मानसिकता से है कि आप तो जीएंगे मगर दूसरों को मरने के लिए छोड़ देंगे। हिन्दी के कई शब्द अँग्रेजी को अपनाने पड़े हैं, गूगल को आज प्रेमचंद जयंती मनानी पड़ रही हैं, यह हिन्दी की ताकत है। डिस्कवरी चैनल को हिन्दी को विकल्प के तौर पर रखना पड़ रहा है, यह बाजार की माँग है और बाजार की माँग हिन्दी है। अगर भोजपुरी में स्पाइडर मैन आया और उसे सराहा जा रहा है तो उससे आपको क्यों तकलीफ हो रही है। हिन्दी को खतरा ऐसे कवियों से है जिनकी अश्लील कवितता को हमेशा एक औरत की देह की जरूरत पड़ती है, हिन्दी को खतरा ऐसे अधिकारियों से है जो अनुदान लेते हैं मगर कार्यालयों के बाहर हिन्दी के गलत साइनबोर्ड हटाना अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते। हिन्दी को खतरा पैदा हो रहा है। यह थीम शाश्वत सी बन चली है। लेकिन तथ्य एकदम अलग बात कहते हैं। तथ्य यह है कि हिन्दी लगातार बढ़ रही है, फैल रही है और वह विश्वभाषा बन चली है। उसकी 'रीच' हर महाद्वीप में है और उसका बाजार हर कहीं है। हमारी फिल्मों के गानों के एलबम अमेरिका, अफ्रीका, एशिया, योरप कहीं भी मिल सकते हैं और फिल्में एक साथ विश्व की कई राजधानियों में रिलीज होती हैं। भारतवंशी हिन्दी मूल के लोग दुनिया के हर देश में रहते हैं और उनकी हिन्दी इस हिन्दी जैसी ही है। कहीं-कहीं उसकी लिपि रोमन है लेकिन हिन्दी सर्वत्र नजर आती है। चीनी भाषा के बाद दूसरी भाषा हिन्दी नजर आती है, ऐसे आंकड़े कई विद्वान दे चुके हैं। अब तो अमेरिकी प्रशासन अपने यहां हिन्दी को सिखाना चाहता है। ओबामा भारत आते हैं तो नमस्ते कहते हैं, जापान के प्रधानमंत्री आते हैं और वाराणसी के घाट पर बाकायदा आरती करते हैं और आप रो रहे हैं कि हिन्दी खत्म हो रही है। अगर आज जयललिता बिहार से उम्मीदवार उतारती हैं तो वे लाख हिन्दी से नफरत करें, बोलनी तो उनको हिन्दी ही होगी, राष्ट्रीय दर्जा पाना है तो आप हिन्दी को नजरअंदाज नहीं कर सकते, अगर करेंगे तो अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मारेंगे और यही कारण है कि कैनन से लेकर मारुति तक और सोनी से लेकर सैमसंग तक सब विज्ञप्ति हिन्दी में जारी करते हैं और यही से जुड़ी है हिन्दी जानने वालों की माँग। अगर कैनन के अधिकारी गाँव में जाते हैं तो दुभाषिया लेकर जाते हैं और कई राष्ट्राध्यक्ष भी दुभाषिए साथ रखते हैं तो यहाँ पर भी अँग्रेजी स्थानीय भाषा के साथ हिन्दी की जरूरत पड़ी तो और यहाँ भी रोजगार है।

आज हिन्दी चालीस करोड़ से कुछ ही कम की मातृभाषा कही जा सकती है। हिन्दी का दूसरा स्तर हिन्दी बोलनेवालों का है, जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं है। हिन्दी की व्याप्ति कितनी है इसका पता इसी बात से चल जाता है कि आप दक्षिणी प्रदेशों में जैसे केरल में हिन्दी को दूसरी भाषा की तरह बरता जाता देखते हैं। आंध्र, कर्नाटक में कन्नड़ के साथ हिन्दी मौजूद है। 

तमिलनाडु तक में अब हिन्दी का वैसा विरोध नहीं है जैसा कि सातवें दशक में हुआ था। अब तो तमिल सांसद हिन्दी सीखने की बात करने लगे हैं। मीडिया की मुख्य भाषा हिन्दी है। हिन्दी मीडिया अंगरेजी मीडिया से कहीं आगे है। राष्ट्रीय पाठक सर्वेक्षण में पहले पांच सबसे ज्यादा बिकने वाले अखबार हिन्दी के हैं। एक अंगरेजी का है, एक मलयालम का है, एक मराठी का और एक तेलुगु का है। एक बंगला का भी है। हिन्दी के सकल मीडिया की रीच इन तमाम भाषाई मीडिया से कई गुनी ज्यादा है। हिन्दी की स्वीकृति अब सर्वत्र है। ऐसा हिन्दी दिवसों के जरिए नहीं हुआ, न हिन्दी को राजभाषा घोषित करने से हुआ है। ऐसा इसलिए हुआ है कि हिन्दी जनता और मीडिया का नया रिश्ता बना है। यह बाजार ने बनाया है जिसे हिन्दी के विद्वान कोसते नहीं थकते। 

मीडिया की हिन्दी संचार की जबर्दस्त हिन्दी है। इतिहास में इतने विकट, व्यापक एवं विविध स्तर के संचार की हिन्दी कभी नहीं रही। वह साहित्यिक हिन्दी रहकर संदेश, उपदेश और सुधार की भाषा भर बनी रही। प्रिंट मीडिया ने उसे एक विस्तार दिया, लेकिन साक्षरों के बीच ही। रेडियो, फिल्मों और टीवी ने उसे वहां पहुंचाया जहां हिन्दी का निरक्षर समाज रहता है, उसे एक नई भाषा दी है जो म्युजिकल है। 

जिसमें एक से एक हिट गाने आते हैं जिन्हें सुनकर पैर थिरकने लगते हैं। हिन्दी टीवी के समाचारों से लेकर मनोरंजन की सबसे बड़ी भाषा है। वह इंटरनेट, मोबाइली चैट में आकर गिटपिट की भाषा बनी है। भले उसकी वर्तनी रोमन हो चली हो। वहां हिन्दी-अंगरेजी का नया निराला मिक्स मिलता है। रही कसर एफएम चैनलों की हिन्दी ने पूरी कर दी है। अब वह तेज गति से दौड़ती हुई फर्राटेदार मनोरंजक भाषा है जिसमें चुटकुले मजाक, मस्त बातें और संगीत बजता है। 
इतनी बोली जाने वाली भाषा दूसरी नहीं है। इसका कारण हिन्दी का अपना लचीला स्वभाव है, उसमें दूसरी भाषाओं को समा लेने की अद्भुत क्षमता है। आज उसके कोश में मराठी, गुजराती, पंजाबी, उर्दू, तमिल, तेलुगू, कन्नाड़, मलयालम तक के शब्द मिक्स होकर आते-जाते हैं। 

रीमिक्स की भाषा बनकर उसने सिद्ध कर दिया है कि स्पानी या लेटिनी या अंगरेजी भाषा के साथ उसकी कोई समस्या नहीं है। वे संग-संग चल सकती हैं। और यह सब हिन्दी भाषा को एक नई व्याप्ति देता है, जो अभूतपूर्व है। वह हिन्दी के एक नए जन सांस्कृतिक क्षेत्र को बताता है। जिसमें एक मिक्स करती हिन्दी रहती है, जो शुद्ध नहीं है और जो बात उसके लिए लाभ कर रही है। शुद्ध भाषा मरणासन्न हो जाती है। बहता नीर अगर भाषा है तो उसमें बहुत कुछ मिलता रहता है और बहाव उसे साफ करता रहता है, मैला नीचे बैठ जाता है और काम का साफ पानी ऊपर रह जाता है हिन्दी इस मानी में नई सफाई लेकर आई है। 




साहित्यकार किस्म के लोग इस हिन्दी का खाते हैं लेकिन इसको दूषित बताते हैं। कारण है उनका सोच अभी तक हिन्दी को किताबी और साहित्यिक मानता है जबकि कोई भी भाषा जनसंचार की भाषा बने बिना आगे नहीं बढ़ती। वह जितना विविध संचार करने में क्षमतावान होगी उतनी ही बढ़ेगी। उसमें तमाम लोग संवाद करें ऐसी भाषा आगे ही बढ़ेगी। हिन्दी इसीलिए आगे बढ़ी है और बढ़ रही है। इसके पीछे हिन्दी भाषी जनता की जरूरतों का बल है। हिन्दी जनता सबसे बड़ी उपभोक्ता जमात है। उसे संबोधित करने के लिए कॉर्पोरेट दुनिया विज्ञापन हिन्दी में पहले बनवाती है। यही हिन्दी की गुरुत्वाकर्षकता है। 

वह कॉर्पोरेट के लिए आकर्षक और सबसे बड़ा बाजार देती है। कंपनियां उसमें संवाद करती हैं। ब्रांड करती हैं। इससे एक विनियम की नई हिन्दी बनी है। साहित्य भी मरा नहीं है, वह छोटी पत्रिकाओं में रह रहा है। वही उसकी जगह भी थी। साहित्यकार अब संख्या में ज्यादा हैं चाहे वे खराब हिन्दी ही लिखते हों। तब खतरे की लॉबी बनाना क्या तर्कसंगत है। हिन्दी दिवस मनाएं न मनाएं कम से कम इस पैरानॉइया से तो मुक्त हों जो हर वक्त हिन्दी पर खतरा मंडराता देखने का आदी है।
हिंदी में महारत और डिग्री रखने वाले उम्मीदवारों को केंद्र और राज्य सरकार के कार्यालयों में बतौर हिंदी भाषा अधिकारी, सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी, शिक्षक तथा अनुवादक के तौर पर कार्य करने का अवसर मिल सकता है। इसके अलावा सार्वजनिक क्षेत्र में लैंग्वेज इंटरप्रेटर, ट्रांसलेटर और हिंदी भाषी क्षेत्रों में लिंक ऑफिसर की भूमिका का निर्वाह करने का मौका मिलता है। प्राइवेट सेक्टर में इस भाषा के एक्सपर्ट्स के लिए ढेरों नए अवसर हैं, जहां वेबसाइट कंटेंट राइटर, कॉपी राइटर, ट्रांसलेटर, इंटरप्रेटर, स्क्रिप्ट राइटर, प्रूफ रीडर, हिंदी टेलीकॉलर और एजुकेशन के तौर पर करियर बनाने का अवसर मिलता है।
आज देश में मनोरंजन का सर्वाधिक प्रचलित साधन निःसंदेह भारतीय फिल्में हैं। देश के हर कोने में हिन्दी फिल्म देखी-दिखाई जाती है। अतः हम कह सकते हैं कि हिन्दी फिल्मों ने हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में काफी योगदान दिया है। 

भारत की सर्वप्रथम सवाक फिल्म 'आलमआरा' थी, जिसे सन्‌ 1931 में आर्देशिर ईरानी ने बनाया था। यह फिल्म हिन्दी में बनी थी। कहते गर्व होगा कि प्रथम भारतीय सवाक फिल्म हिन्दी में थी। अब हम यह तो आर्देशिर ईरानी से पूछने से रहे कि उन्होंने अपनी प्रथम फिल्म हिन्दी में क्यों बनाई? अगर यह पूछना संभव भी होता तो ईरानीजी निश्चित रूप से यह कहते कि 'कैसे मूर्ख हो? अरे! हिन्दी तो हिन्दुस्तान की भाषा है। यह तो जन-जन की भाषा है। मुझे अपनी फिल्म देश की 21 करोड़ आबादी तक पहुँचाना है।'

खैर, आज हिन्दी फिल्में जितनी लोकप्रिय हैं शायद ही किसी अन्य भाषा की फिल्में होंगी। विश्व में बनने वाली हर चौथी फिल्म हिन्दी होती है। भारत में निर्मित होने वाली 60 प्रतिशत फिल्में हिन्दी भाषा में बनती हैं और वे ही सबसे अधिक चलन में होती हैं, वे ही सर्वाधिक लोकप्रिय हैं, वे ही सर्वाधिक बिकाऊ हैं।

ऐसा नहीं है कि क्षेत्रीय भाषा की फिल्में चलती ही नहीं हैं। लेकिन असमी फिल्म असम में, तेलुगु फिल्म आंध्र में ही लोकप्रिय होती हैं। इसके विपरीत हिन्दी फिल्म सारे भारत में चलती है। जिस उत्साह से वह उत्तरी भारत में दिखाई जाती है उसी उत्साह से दक्षिण भारत में भी दिखाई जाती है। इसका एक कारण यह भी है कि हिन्दी हमारी संपर्क भाषा है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक हिन्दी लिखने, पढ़ने, बोलने वाले मिल जाएँगे।

इसी प्रकार हिन्दी फिल्मों के दर्शक और प्रशंसक भी आपको पूरे देश में मिल जाएँगे। अनेकता में एकता का जीवंत उदाहरण भारतीय फिल्मोंके अतिरिक्त दूसरा हो ही नहीं सकता। 

कुछ सीमा तक दक्षिण में हिन्दी का विरोध है, लेकिन हिन्दी फिल्में लोकप्रिय हैं। खासकर तमिलनाडु में हिन्दी का विरोध किया जाता है, लेकिन इसी तमिलनाडु के तीन शहरों मदुरै, चेन्नाई और कोयंबटूर में हिन्दी फिल्म 'शोले' ने स्वर्ण जयंती मनाई थी! 'शोले' के अलावा 'हम आपके हैं कौन', 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे', 'बॉर्डर', 'दिल तो पागल है' भी पूरे देश में सफल रहीं। 'गदर' और 'लगान' जैसी कितनी ही फिल्में आई हैं जिन्होंने पूरे देश में सफलता के झंडे गाड़ दिए।

हिन्दी फिल्मों में अहिन्दी भाषी कलाकारों के योगदान के कारण भी हिन्दी को अहिन्दी भाषी प्रांतों में हमेशा बढ़ावा मिला है। सुब्बालक्ष्मी, बालसुब्रह्मण्यम, पद्मिनी, वैजयंती माला, रेखा, श्रीदेवी, हेमामालिनी, कमल हासन, चिरंजीवी, ए.आर. रहमान, रजनीकांत आदि प्रमुख सितारे हिन्दी में भी लोकप्रिय हैं। बंगाल की कई हस्तियाँ हिन्दी सिनेमा की महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रही हैं।

मसलन मन्ना डे, पंकज मलिक, हेमंत कुमार, सत्यजीत रे (शतरंज के खिलाड़ी), आर.सी. बोराल, बिमल रॉय, शर्मिला टैगोर, उत्त कुमार आदि। प्रसिद्ध अभिनेता डैनी डेंग्जोग्पा अहिन्दी राज्य सिक्किम से हैं, तो हिन्दी फिल्मों के प्रसिद्ध संगीतकार सचिन देवबर्मन तथा राहुल देव बर्मन मणिपुर के राजघराने से संबंधित थे।

इसी प्रकार हिन्दी फिल्मों के लोकप्रिय कलाकार जितेंद्र पंजाबी होने के बावजूद दक्षिण में लोकप्रिय हैं। हिन्दी फिल्मों की प्रसिद्ध हस्तियाँ स्व. पृथ्वीराज कपूर एवं उनका समस्त खानदान, दारासिंह, धर्मेन्द्र आदि पंजाब से हैं। इस प्रकार के और भी कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। 

हिन्दी फिल्में देश के साथ-साथ विदेशों में भी लोकप्रियता प्राप्त कर चुकी हैं। इस प्रकार इन फिल्मों ने देश ही नहीं अपितु विदेशों में भी हिन्दी को प्रोत्साहित किया है। राजकपूर की 'आवारा' और 'श्री 420' ने रूस में लोकप्रियता के झंडे गाड़ दिए थे। अमिताभ बच्चन, माधुरी दीक्षित, लता मंगेशकर एवं हिन्दी फिल्मों के अन्य कई कलाकार सारी दुनिया के बड़े-बड़े शहरों में अपने रंगमंचीय प्रदर्शन सफलतापूर्वक कर चुके हैं। आज भी ऑल इंडिया रेडियो के उर्दू कार्यक्रमों के फर्माइशकर्ता 90 प्रतिशत पाकिस्तानी श्रोता होते हैं। भारतीय फिल्में और गीत वहाँ सर्वाधिक प्रिय हैं। 

सिर्फ भारत के ही कलाकार विदेशों में लोकप्रिय नहीं, बल्कि कई विदेशी कलाकार हिन्दी फिल्मों की वजह से लोकप्रिय हो गए हैं। मेहँदी हसन व गुलाम अली (दोनों पाकिस्तानी गजल गायक) के हिन्दी गीत आज भारत में लोकप्रिय हैं। रूना लैला बांग्लादेश से आकर हिन्दी फिल्मों की वजह से लोकप्रिय बनीं, वहीं पाकिस्तानी अदाकारा जेबा को 'हिना' से लोकप्रियता मिली। इन सब तथ्यों से हम कह सकते हैं कि हिन्दी फिल्मों ने हिन्दी को सौ प्रतिशत प्रोत्साहन दिया है।


रविवार, 21 अगस्त 2016

जीतने वाला नायक भले हो मगर हारने वाला खलनायक नहीं होता



रियो ओलम्पिक्स में साक्षी मलिक और पी वी सिन्धु के पदक जीतने और दीपा कर्माकर के चौथे स्थान पर रहने के बाद महिला सशक्तीकरण के प्रचारकों की बाढ़ आ गयी है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और बेटी खिलाओ जैसे नारे लग रहे हैं तो कहीं पर इस प्रदर्शन मात्र से परिस्थिति में बदलाव की उम्मीद की जा रही है। साक्षी का पदक जीतना इसलिए भी खास है क्योंकि वह हरियाणा से हैं जहाँ लड़कियों का बच जाना ही बड़ी बात है। सिन्धु को लेकर अब आँध्र और तेलंगाना में जंग शुरू हो गयी है तो दूसरी ओर शोभा डे जैसे लोग भी हैं जो खिलाड़ियों पर तंज कसकर लाइमलाइट में आने के बहाने ढूँढते हैं और फटकार लगने के बाद सुर बदलने लगते हैं। समूचा हिन्दुस्तान रो रहा है कि हमारे खिलाड़ी पदक नहीं जीत सके और उनका प्रदर्शन बेहद लचर रहा। सच कहूँ तो महान के देश के हम नागरिक और यहाँ की व्यवस्था बेहद स्वार्थी और आत्मकेन्द्रित हैं जिनको किसी की तकलीफ से कोई मतलब नहीं। रियो के बहाने सशक्तीकरण की राह निकालने वालों से पूछा जाए कि क्या वे अपने बच्चों को खिलाड़ी बनाना चाहेंगे तो जवाब होगा नहीं। दीपा कर्माकर और सिन्धु की तारीफ में कसीदे पढ़ने वाले अपनी बेटियों को दुप्पटा सम्भालकर चलने की नसीहतें देते हैं और उनकी समूची इज्जत दुप्पटे में सिमट जाती है। सानिया की स्कर्ट और शादी का इतिहास खंगालने वाले अब बेटियों का सम्मान करने की सीख दे रहे हैं। क्या यह दोगलापन नहीं है? सचिन, सानिया और साइना जैसा भविष्य अपने बच्चों की चाहत सभी को होती है मगर क्या उनकी मेहनत और जज्बा और निःस्वार्थ जुनून आपमें हैं। अपने खिलाड़ियों की मेहनत को भूलने में भारतीय अव्वल हैं और उगते सूरज को सलाम करना हमारी फितरत है। कोई खिलाड़ी हारने के लिए नहीं खेलता, हार और जीत खेल का हिस्सा है। जीतने वाला नायक हो सकता है मगर हारने वाले को खलनायक बनाना जरूरी है? 125 करोड़ की आबादी वाले देश में खेल पर खर्च ही कितना किया जाता है और क्या आपके स्कूलों में भी मैदान हैं जहाँ बच्चे खेल सकें? लड़कियों के हाथ में पहले गुड़िया और बाद में बेलन थमाने वाले माँ बाप ने क्या कभी उनको बैडमिंटन का रैकेट थमाया है? यहाँ खिलाड़ी को इकोनॉमी क्लास में सफर करवाया जाता है तो कभी किसी खिलाड़ी को जूते तक नहीं मिलते। खेल मंत्री खिलाड़ियों के नाम तक नहीं जानते और अधिकतर माँ बाप का सपना बच्चों की सरकारी नौकरी होता है या डॉक्टर व मेडिकल में भेजना। महिला सशक्तीकरण के नारे लगाने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि इन महिलाओं की जीत के पीछे पुरुषों की भी मेहनत है, फिर भले ही व साक्षी और दीपा के पिता हों या सिन्धू के कोच पुलेला गोपीचंद। आपने ऐसे कितने प्रशिक्षकों को अवसर दिया है? खेल को खेल की तरह लीजिए क्योंकि आज जो हारे हैं, उन्होंने ही आपकी इज्जत कभी रखी है, फिर वह साइना हों, सानिया हों, अभिनव बिन्द्रा हों या योगेश्वर हों, हमें कोई हक नहीं बनता कि हम उनकी मेहनत का अपमान करें। एहसानफरामोशी छोड़कर उनके जज्बे को सलाम कीजिए जो सहूलियतें न होने के बावजूद अपनी जिद के दम पर पूरी दुनिया के सामने खड़े हुए। भारतीय खिलाड़ियों, आपको सलाम कि आप इस एहसानफरामोशी और तमाम दिक्कतों के बावजूद लड़ते हैं, आज हार हुई है तो कल आप जरूर जीतेंगे, हौसला मत छोड़ना कभी।

रविवार, 17 जुलाई 2016

एक कंदील मरेगी तो हजार और कंदील उठ खड़ी होंगी, जुर्म के खात्मे के लिए

तो कंदील आखिर तुम मार डाली गयी। तुम भूल गयी कि ऐसे देश में हो जहाँ औरतों का होना ही गुनाह है, वह तो बस पीछे चलने के लिए होती हैं। तुम्हारा भाई कहता है कि उसने अपनी शान (?) के लिए तुम्हारी जान ली है मगर सच तो येे है कि वह तो सिर्फ एक मोहरा है जिसका दिमाग उस लोगों के इशारे पर चलता है जिसकी टोपी सिर पर रखकर तुमने वीडियो बनाने की गुस्ताखी कर डाली। ऐसा नहीं है कंदील कि तुम हमें बहुत अच्छी लगती थी, नहीं तुम अच्छी नहीं थी (?)। भला गुस्ताख औरतें अच्छी होती हैं कभी? तुम्हारा बड़बोलापन न जाने कितनी बार मीडिया और यूट्यूब की टीआरपी बढ़ाने के काम आया था मगर उनको मसाला देने वाले बहुत हैं। मुझे तो तुम बिल्कुल अच्छी नहीें लगती थी मगर अच्छा नहीं लगने का मतलब ये थोड़ी न है कि हम जीने का हक ही छीन लें। तुमने एक भारतीय क्रिकेटर की तारीफ की, ये तुम्हारा गुनाह ही तो है। भले ही लोग तुम्हारे लिए सहानुभूति दिखा रहे हैं मगर कंदील, कुछ तुम्हारे मुल्क में और हमारे मुल्क में भी बहुत से लोगों के गुरुर को ठंडक मिली होगी कि उन्होंने एक गुस्ताख औरत को सबक सिखा दिया। तुम नहीं जानती थी कि कंदील जैसी औरतें कत्ल करने के लिए होती हैं, कम से कम तुम्हारे देश का सच तो यही है। हमारे यहाँ भी भाई प्रेम करने वाली बहनों का कटा सिर लेकर शहर में सड़क पर सरेआमं निकल पड़ते हैं और वो भी यही कहते हैं कि जो तुम्हारे भाई ने कहा। उनको किसी बात का पछतावा नहीं होता, होगा भी कैसे, आखिर औरतें इंसान थोड़ी न होती हैं, वह तो गुलाम होती हैं मगर ये सब भूल गए हैं कि एक कंदील मरेगी तो हजार और कंदील उठ खड़ी होंगी, जुर्म के खात्मे के लिए। हालांकि पाकिस्तानी मॉडल कंदील बलोच की ऑनर किलिंग के मामले में उनके दोनों भाइयों के खिलाफ केस दर्ज हो गया है। दोनों भाई असलम शाहीन और वसीम को मुख्य आरोपी बनाया गया है और वसीम को अरेस्ट भी कर लिया गया है मगर इंसाफ होगा, इस पर संदेह है। कंदील के पिता अजीम की शिकायत पर ये एफआईआर दर्ज की गई है। शनिवार को भाई वसीम (30) ने गला दबाकर कंदील की जान ले ली। कंदील के फेसबुक पोस्ट और वीडियो को लेकर भाई धमकियां दे रहा था। वो मॉडलिंग छोड़ने के लिए भी उन पर दबाव बना रहा था। बलोच अपने विवादित बयानों के लिए चर्चा में रहती थीं। हाल ही में उनकी दो शादियों की बात सामने आने से भी परिवार नाराज था।- पाकिस्तान की न्यूज वेबसाइट डॉन को मिली एफआईआर की कॉपी के मुताबिक, अजीम ने अपने दोनों बेटों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई है।  एफआईआर की कॉपी के मुताबिक, परिवार को बदनाम करने के नाम पर असलम ने वसीम को कंदील का मर्डर करने के लिए उकसाया था। 
- अजीम ने अपनी शिकायत में ये भी कहा कि दोनों भाइयों ने कंदील के पैसों के लिए उसका मर्डर किया। मर्डर के बाद से वसीम गायब था, जिसे रविवार सुबह अरेस्ट कर लिया गया। उसने हत्या की बात भी कबूल कर ली है और कहा कि उसे इसका कोई अफसोस नहीं है। वहीं, असलम अभी सेना में नायब सूबेदार के पद पर नौकरी कर रहा है। पुलिस को दिए स्टेटमेंट में कंदील के पेरेंट्स ने बताया कि हत्या के वक्त वे छत पर सो रहे थे। कंदील नीचे सो रही थी। इसी दौरान कंदील के भाई ने गला दबाकर उसकी जान ले ली। 
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हाल ही में पाकिस्तानी इमाम के साथ कंदील का सेल्फी वीडियो आने से उसकी फैमिली खासी नाराज थी। कंदील की दो शादियों के मामले सामने आने से भी फैमिली मेंबर्स नाराज थे। कंदील पंजाब प्रोविन्स के कोट अद्दू की रहने वाली थीं। उन्होंने मुल्तान शहर में घर खरीद रखा था और लंबे समय से यहीं रह रही थीं। हाल ही में कंदील ने एक इंटरव्यू में कहा था कि ईद के बाद उन्होंने अपने पेरेंट्स के साथ विदेश शिफ्ट होने का फैसला लिया है।  7 जुलाई को कंदील का कॉन्ट्रोवर्शियल म्यूजिक वीडियो 'बैन' यूट्यूब पर अपलोड किया गया था।  वीडियो वायरल हो गया। इसे 13 लाख से ज्यादा बार देखा चुका है। सिंगर आर्यन खान के इस वीडियो को लेकर सोशल मीडिया पर कंदील की काफी आलोचना भी हो रही थी।   शुक्रवार को फेसबुक पोस्ट में कंदील ने इस वीडियो को लेकर अपने सपोर्टर्स का शुक्रिया अदा किया था। उन्होंने लिखा कि वीडियो को दुनियाभर से शानदार रिस्पॉन्स मिल रहा है।
तुमने फेसबुक पोस्ट में कहा था - 'मुझे दुनिया से फर्क नहीं पड़ता'

 
कंदील ने शुक्रवार शाम 4 बजे फेसबुक पर किए एक पोस्ट में लिखा था, "इससे फर्क नहीं पड़ता कि मुझे कितनी बार कुचला जाएगा। मैं लड़ूंगी। कंदील बलोच वन वुमन आर्मी है।""कंदील उन महिलाओं के लिए इन्सपिरेशन है, जिन्हें सोसाइटी द्वारा दबाया जाता है और उनके साथ खराब बिहेव किया जाता है। "मैं कामयाबी हासिल करती रहूंगी और मुझे मालूम है कि आप मुझसे नफरत करते रहेंगे। मुझे किसी चीज से फर्क नहीं पड़ता।"दो दिन पहले लाइव टीवी शो में आशिक हुसैन नाम के शख्स ने कंदील का पति होने का दावा किया था। टीवी इंटरव्यू में कंदील ने शादी और बच्चा होने की बात मान ली थी। हालांकि, उनका दावा था कि उन्हें इस शादी के लिए मजबूर किया गया था। कंदील ने एक्स हसबैंड पर टॉर्चर के आरोप भी लगाए। कंदील ने कहा था, ''मैंने अपने बेटे को कभी नहीं बताया कि मैं उसकी मां हूं, क्योंकि ये शादी जबर्दस्ती हुई थी।' उन्होंने ये भी कहा था, ''मैं आगे पढ़ना और काम करना चाहती थी, लेकिन जबरन मेरी शादी कर दी गई, इसलिए मैंने डिवोर्स ले लिया।''
 
कंदील के मुताबिक, ''मेरा पति मुझे पीटता था। शादी के एक साल तक उसने दिन-रात मुझे टॉर्चर किया।'' उन्होंने बताया कि एक साल बाद वो अपने बेटे के साथ पति को छोड़कर भाग निकलीं और दारुल अमन में शरण ली।- कंदील के मुताबिक, बेटे की तबीयत बिगड़ गई थी और वो उसका इलाज नहीं करा सकती थी, इसलिए उसने बेटे की कस्टडी हुसैन को दी। कंदील ने सोशल मीडिया पर एक एक वीडियो पोस्ट करके पीएम नरेंद्र मोदी को चायवाला कहकर उनका मजाक उड़ाया था और कश्मीर को आजाद करने के लिए कहा था।  वो सोशल मीडिया पर इमरान खान और विराट कोहली को लेकर अपने प्यार का इजहार कर चुकी थीं।इसी साल मार्च में उन्होंने क्रिकेट के वर्ल्ड टी20 टूर्नामेंट से पहले एलान किया था कि अगर पाकिस्तान की टीम भारत को हरा देती है तो वो स्ट्रिप डांस करेंगी। लेकिन भारत ने पाकिस्तान को हरा दिया और कंदील की ये हसरत पूरी नहीं हो पाई।
कंदील बलोच पाकिस्तानी मॉडल और टीवी एक्ट्रेस थी। उसे सोशल मीडिया की ड्रामा क्वीन कहा जाता था। कंदील का असली नाम फौजिया अजीम था पहली बार वह 2013 में पाकिस्तान आइडल के ऑडिशन में देखी गई थीं। उस दौरान जजों ने उनके बेसुरे गाने सुनकर उन्हें भगा दिया था।रिजेक्ट होने पर उन्होंने कैमरे के सामने जमकर ड्रामा किया था और जजों को भला-बुरा कहा था। कैपिटल टीवी के मॉर्निंग शो में उनकी हरकतों और फिजूल की बातों का पूरे पाकिस्तान में मजाक बनता था। उसके डायलॉग डबस्मैश पर काफी पॉपुलर हैं। कंदील, वो तुमसे नफरत कर सकते थे मगर जान लेने का हक नहीं था। वो डर गए हैं, कंदील और तुम अपनी तमाम बुराईयों के बावजूद पाकिस्तान की औरतों के दिलों में बस चुकी है और अब तुम्हारी लड़ाई उनकी लड़ाई बनेगी, देख लेना।