शुक्रवार, 26 मई 2017

‘दादा’ की राह पर चलती दिख रही हैं ‘दीदी’


दिन बदलते हैं और जब दिन बदलते हैं तो पुराने दिनों को भूलने में देर नहीं लगती। अगर गुजरा हुआ कल याद भी आता है तो सत्ता में आने के बाद अधिकतर सत्ताधारी बदला लेने और कुर्सी बचाने में व्यस्त हो जाते हैं। सत्ता के नशे की तासीर शायद कुछ ऐसी ही होती है कि लोकतन्त्र की दुहाई देकर कुर्सी पाने वाले सदाचारी नेता कब दुराचार के दलदल में चले जाते हैं, पता ही नहीं चलता। ईमानदारी की जगह बेईमानी और चापलूसी ले लेती है, विनम्रता तानाशाही में इस कदर बदलती है कि स्पष्टवादी ही दुश्मन बन जाते हैं, जो लंका में जाता है, वही रावण बन जाता है और जो कुर्सी पा जाता है, वही अहंकारी और तानाशाह बन जाता है, उसे याद ही नहीं रहता है कि आज जिन चीजों के लिए वह प्रशासन और कानून को अपने हित में इस्तेमाल कर रहा है, कल यही उसके दुश्मन हुआ करते थे। सीबीआई को तोता कहा गया मगर सत्ता के हाथों इस्तेमाल होती पुलिस को क्या कहेंगे, पता नहीं। बहरहाल बंगाल में इन दिनों विपक्ष और सत्ता के बीच कुश्ती चल रही है, ममता बनर्जी जिस राह को पीछे छोड़कर आ गयी हैं, अब उसी राह पर चलने के लिए वाममोर्चा, काँग्रेस और भाजपा बेताब हैं। ममता जब विपक्ष में थीं तो खूब धरने दिया करती थीं, भूख हड़ताल भी करती थीं और इस कदर अड़ी रहती थीं कि भारत के प्रधानमंत्री का अनुरोध भी उन्होंने ठुकरा दिया। तब वाममोर्चा पर सत्ता का नशा चढ़ा था, जिद अहंकार में बदल गयी थी। नतीजा सिंगुर और नन्दीग्राम के रूप में दिखायी दिया और वाममोर्चा के अहंकार और दमन को ममता ने अपनी सीढ़ी बना लिया। वाममोर्चा खासकर माकपा ने भी धरने दिए हैं, प्रदर्शन भी किया है, कई बार वाममोर्चा नेताओं, खासकर विमान बसु की जुबान फिसली भी थी मगर तब भी बुद्धदेव भट्टाचार्य में एक अजब सी शालीनता थी। वाममोर्चा और खुद बुद्धदेव भट्टाचार्य से नाराजगी के बावजूद मुख्यमंत्री के रूप में बुद्धदेव भट्टाचार्य से नफरत नहीं की जा सकती क्योंकि उन्होंने सख्ती के बावजूद अपने पद की गरिमा बनाए रखी। आज भी यह सादगी और सरलता आपको वाममोर्चा के नेताओं में दिखती है। मुमकिन है कि तृणमूल सुप्रीमो के समर्थकों को बुरा लगे मगर निजी तौर पर मेरा मानना है कि ममता जी अपना गुजरा कल भूल चुकी हैं या फिर सत्ता के मोह ने उनको पूरी तरह बदल दिया है। बंगाल की लोकप्रिय दीदी जनता से लगातार दूर हो रही हैं। एक बड़ा सच है कि आज अगर उनको लोग सम्मान देते हैं तो उसके पीछे स्नेह और प्रेम से अधिक भय है। ममता आज या तो भय बन गयी हैं या बन जाना चाहती हैं। आज तृणमूल भले ही हर जगह जीते मगर आज उसे हिंसा का सहारा लेना पड़ रहा है, लोगों को धमकाना पड़ रहा है और उसकी जीत में ही सबसे बड़ी पराजय छिपी है। अब मुझे ममता बनर्जी में थके हुए बुद्धदेव भट्टाचार्य नजर आ रहे हैं और ममता की सरकार भी उनकी तरह ही दमन का रास्ता अपना रही है। तो क्या बुद्धदेव बाबू ही तरह ही ममता भी डरी हुई हैं? अगर ऐसा है तो दीदी के लिए आगे की राह मुश्किल हो सकती है। वर्ष 2010 तक भी किसी ने कल्पना नहीं की थी कि वाममोर्चा की इतनी बड़ी पराजय होगी मगर वाममोर्चा हारा। आज वाममोर्चा काँग्रेस के साथ मिलकर अपनी खोई हुई जमीन पाना चाहता है मगर लोगों के लिए वाममोर्चा शासन का दमन भूलना आसान नहीं है। सच तो यह है कि तृणमूल की जीत पहली बार भले ही दीदी की लोकप्रियता के कारण हुई है मगर दूसरी बार सत्ता में वापसी का कारण सिर्फ यही है कि जनता को तृणमूल का विकल्प नहीं मिल रहा है। भाजपा अब वही विकल्प बनने की कोशिश कर रही है और पार्टी की राज्यसभा सांसद रूपा गाँगुली का आक्रामक रवैया आपको ममता बनर्जी की याद दिलाता है। 1993 में ममता को राइटर्स से धक्के देकर निकाला गया और बाद में भी वाममोर्चा ने जिस तरह उनको प्रताड़ित किया,  लोगों की सहानुभूति उनसे जुड़ी। 

अब ममता बनर्जी की सरकार भी दमनकारी नीति अपना रही है और नतीजा यह है कि वह अब दोस्तों को भी दुश्मन बना रही हैं। 2009 में बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार ने जेयू में छात्रों को पिटवाया था मगर तृणमूल के शासन में तो आए दिन शिक्षकों को प्रताड़ित होना पड़ रहा है, विरोधियों पर डंडे बरसाए जा रहे हैं। जिस मीडिया के सहारे वे कुर्सी पाती हैं, उसी मीडिया पर पुलिस हमले कर रही है। धरना – प्रदर्शन की राजनीति करके सत्ता में आने वाली दीदी को विरोधियों का प्रदर्शन इतना अखरता है कि उसे रोकने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकती हैं। दरअसल, सच तो यह है कि पुलिस और प्रशासन की स्वायत्ता एक मिथ है क्योंकि जो सत्ता में रहता  है, वह पुलिस को अपने हिसाब से इस्तेमाल करता है, कल बुद्धदेव बाबू की सरकार करती थी, आज दीदी की सरकार कर रही है। वाममोर्चा और भाजपा को रोकने के लिए पुलिस जिस तरह हिंसक हुई, उसे देखकर तो यही लगता है क्योंकि जब तृणमूल की रैली निकलती है या सभा होती है तो यही पुलिस पलक – पाँवड़े बिछाए रहती है। आम आदमी को परेशानी तब भी होती है मगर पुलिस का धीरज नहीं टूटता। कल तक जिनके आगे पुलिस का सिर झुका रहता था, आज उन पर पुलिस लाठियाँ बरसाती है तो बस एक ही उक्ति याद आती है – जिसकी लाठी, उसकी भैंस। ये वही ममता बनर्जी हैं जो एनडीए के साथ रह चुकी हैं, जब कोलकाता पुलिस भाजपा समर्थकों पर लाठियाँ बरसा रही थी, तब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ठग और दगाबाज, दंगाबाज कहने वाली दीदी उनके साथ ही बैठक कर रही थी जबकि सच तो यह है कि केन्द्र सरकार की कई योजनाओं को राज्य में लागू होने ही नहीं दिया गया और जब किसी परियोजना का उद्घाटन होता है तो तृणमूल के मंत्री शिष्टाचार की सारी हदें तोड़कर केन्द्रीय मंत्री की जगह आनन – फानन में उद्घाटन कर देते हैं। ये बड़ा अजीब सा विरोधाभास है कि केन्द्र से सहायता चाहिए मगर केन्द्र से हर समय विरोध होगा। प्रकाश जावड़ेकर केन्द्रीय मंत्री होने के नाते जब वाइस चांसलरों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग करते हैं तो बंगाल के अधिकारियों और वाइस चांसलरों को भाग लेने की इजाजत नहीं दी जाती। 
यह राजनीतिक लड़ाई पड़ोसी के झगड़े की तरह लगने लगती है मगर यह ध्यान रखने की जरूरत है कि राष्ट्रीय स्तर की राजनीति करने के लिए एक शालीनता और गरिमा की जरूरत है। जब वह महिलाओं के साथ होने वाले उत्पीड़न को साजानो घटना कहती हैं और अल्पसंख्यकों की रैली में बाकायदा नमाज पढ़ने की मुद्रा में आती हैं और बरकती जैसे लोगों पर लगाम नहीं कसतीं तो यह उनका जनाधार कहीं न कहीं कम कर रहा होता है। कहते हुए अफसोस होता है मगर ये दोनों ही न तो तृणमूल में हैं और न ही खुद ममता बनर्जी में हैं। दीदी अनायास ही बुद्धदेव भट्टाचार्य की राह पर चल तो पड़ी हैं मगर भट्टाचार्य जैसे व्यावहारिक दृष्टिकोण का उनमें अभाव है, उनकी जिद अहंकार तो बन रही है मगर इसका परिणाम हम 2011 में देख चुके हैं। ममता बनर्जी की पार्टी में उनका एकमात्र विकल्प वे खुद हैं और अपना विकल्प उन्होंने तैयार होने ही नहीं दिया, ये पार्टी के लिए भी खतरनाक स्थिति है क्योंकि अभिषेक बनर्जी अगर दीदी के उत्तराधिकारी बनते भी हैं तो उनको वैसी लोकप्रियता न तो मिलेगी और न ही वैसी एकता ही फिर रहेगी क्योंकि कुर्सी सबको चाहिए। भाजपा का आक्रामक रवैया उनको परेशान कर रहा है तो दूसरी तरफ वे वाममोर्चा और काँग्रेस की दोस्ती को चाहें भी नजरअंदाज नहीं कर सकतीं। अगर बंगाल में विपक्ष एक विकल्प बनने की दिशा में सफल होता है तो यही परिणति तृणमूल और खुद तृणमूल सुप्रीमो की हो सकती है।

बुधवार, 24 मई 2017

जो वंचित हैं, अधिकारों पर अधिकार उसका भी है



पत्रकारिता में सम्पादक बहुत महत्वपूर्ण होता है और हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास के केन्द्र में ही सम्पादक ही घूमता है। पत्रकारिता पर जितना भी पढ़ा है, उसमें अखबार और सम्पादक पर ही बात होती है, वाजिब भी है। सम्पादकों की सत्ता को चुनौती देने वाली बात नहीं है मगर अखबार एक सामूहिक कर्म है, किसी भी और क्षेत्र की तरह इसलिए इसमें छोटे से छोटे अंग का अपना महत्व है। कोई भी सम्पादक चाहे कितना भी बड़ा हो, अकेले अखबार नहीं निकाल सकता, अगर टीम अच्छी न हो तो आपकी सारी योजनाएं धरी की धरी रह जाती हैं क्योंकि उनको क्रियान्वित करने वाला नहीं होता। सम्पादक अखबार का चेहरा होता है मगर क्या चेहरे पर ही ध्यान देने से समूचा शरीर स्वस्थ रह सकता है? थोड़ा सा श्रेय तो शरीर के अन्य अंगों को दिया जाना चाहिए। संवाददाता, जिला संवाददाता, कैमरामैन, फोटोग्राफर, पृष्ठ सज्जाकार, तकनीकी पक्ष, विज्ञापन, प्रसार करने वाले लोग.....किताबों में इनको एक पैराग्राफ में सलटा देने की परम्परा है और यही वास्तविकता में भी हो रहा है। बेहद कम सुविधाओं में काम करने वाले लोग हैं ये। संवाददाताओं और कुछ हद तक छायाकारों को सुविधा कम या कई बार न के बराबर भी मिले मगर श्रेय थोड़ा – बहुत मिल भी जाता है मगर दूसरे अंगों का क्या? हम न तो इन पर बात करते हैं और न ही इनके बारे में सोचते हैं। सबका रिप्लेसमेंट हमेशा तैयार रहता है और इनमें से बहुत से उपेक्षा और शोषण के शिकार भी रहते हैं। प्रबंधन और इन सभी के बीच में जितने भी लोग है, वे अपने हिसाब से स्थिति को दिखाते हैं। कारखाने के बंधुआ मजदूरों से भी खराब स्थिति इन सबकी होती है मगर न तो सवाल उठते हैं और न ही सुविधाएं मिलती हैं क्योंकि दुनिया का दस्तूर है, लोग इमारत की ऊँची मंजिल ही देखते हैं और उनको सिर्फ वही दिखाया जाता ही है। आधे से अधिक लोग असमय ही अवसादग्रस्त हो जाते हैं और अवसाद में जी रहे हैं। अजीब सा निराशाजनक वातावरण है, जहाँ कोई उम्मीद नहीं है, काम होता है और अगर इस माहोल में काम के नाम पर खानापूर्ति हो तो हमें न तो आश्चर्य होना चाहिए और न ही शिकायत होनी चाहिए। पहला संवाददाता, फोटोग्राफर, पेजमेकर, कैमरामैन और ऐसे न जाने कितने लोग हमें पत्रकारिता की मोटी – मोटी किताबों में भी नहीं मिलते और न ही खोजने की कोशिश की जाती है, उनकी स्थिति पर शोध हो, सुधारने की कोशिश हो और पुरस्कारों और सम्मानों की बरसात में एक हिस्सा उनके नाम पर भी हो....तो बात बने मगर इसके लिए बात तो होनी जरूरी है। अखबारों का वातावरण देखकर बच्चों वाली प्रतियोगिता याद आ जाती है, कई बार ऐसा भी होता है कि किसी छोटे अखबार का सम्पादक जाए तो बड़े अखबार के सम्पादक वहाँ नहीं जाएंगे क्योंकि उनके लिए दूसरों के साथ बैठना भी अपमान लगता है। एक मीडिया हाउस का व्यक्ति कभी दूसरे हाउस में जाए तो उसे ऐसे देखा जाएगा, जाने वह कहाँ का अजूबा है या उसने कितना बड़ा पाप कर दिया है। बड़ी असमंजस वाली स्थिति हो जाती है, जो आपको जानते हैं, वह भी बात नहीं करेंगे क्योंकि बाद में उनसे सवाल होंगे। कई मीडिया हाउस तो संवाददाताओं को दूसरे मीडिया हाउस से बात तक करने की इजाजत नहीं देते, ऐसा भी देखा गया है कि हिन्दी वाले ही हिन्दी वालों से बात नहीं करते और न ही उनको छूट है। हिन्दी पत्रकारिता में संदेह की परम्परा बढ़ गयी है। मैंने कलकत्ता विश्वविद्यालय में जो बीमारी देखी, वह यहाँ भी है। प्रेस क्लब का चुनाव छोड़ दिया जाए तो सभी सम्पादकों और पत्रकारों व अन्य लोगों का एक मंच पर आना और कायदे से बात करना भी दुनिया का आठवाँ अजूबा होगा। बात नहीं करना, साथ नहीं आना, हमारी समस्या की जड़ है क्योंकि इसमें कभी हीनभावना है तो कभी अहंकार है। प्रतियोगिता हो मगर स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा हो तो बात बनती और यह समस्या किसी शहर या राज्य की नहीं हर जगह ऐसा है। हम कल्पना नहीं कर सकते कि हिन्दी पत्रकारिता पर कोई बात या आयोजन हो और उसमें हर मीडिया के लोग शामिल हों, ये बस असम्भव है। पत्रकार के नाम पर बंधुआ मजदूरों को प्रश्रय दिया जाना और 90 प्रतिशत भागीदारी को अनदेखा करना यह कोई अच्छी बात नहीं है। कम से कम सुविधाओं और श्रेय पर उनका अधिकार है। पूरी जिन्दगी हिन्दी पत्रकारिता के छाया जगत को देने के बाद अगर किसी बुर्जुग छायाकार की आँखों में उपेक्षा की पीड़ा हो, किसी पेजमेकर का नाम तक हम न जाने, कोई संवाददाता जिन्दगी भर काम करने के बाद गरीबी में गुमनामी की मौत मरने पर मजबूर हो तो यह उसके लिए नहीं, पत्रकारिता जगत के पुरोधाओं के इतिहास को शर्मसार करने वाली बात होगी। यह जाहिर सी बात है कि बड़े से बड़ा बादशाह भी अजर – अमर नहीं होता, एक दिन सबका तय है जाना, मगर उसकी भूमिका तय करती है कि उसे किस तरीके से याद किया जाए। कम से कम जो बड़े पदों पर बैठे हैं और जो दिल्ली में बैठे हैं, वह यह कर सकते हैं, पत्रकारिता को आपने अगर धंधा बना ही दिया है तो धंधे में भी सुविधाओं की जरूरत होती है, श्रम को सम्मान और अधिकार की जरूरत तो कारखाने में भी होती है। आगे बढ़ना उसका अधिकार होता है। अविश्वास, संशय, संदेह, शोषण और उपेक्षा और घृणा, क्या हम पत्रकार आने वाली पीढ़ी के लिए यही छोड़कर जा रहे हैं? क्या आने वाली पीढ़ी ऐसी ही होगी जो पत्रकारिता का मतलब न समझे, उसे ग्लैमर समझे, सिर्फ फायदे की जगह समझकर काम करे और जीवन भर पेशेवर कारणों से दोस्त को भी दुश्मन समझने को बाध्य हो? अगर ऐसा परिवेश हमारे साहित्यिक, सांस्कृतिक, पत्रकारिता जगत में रहा तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा और न ही हमारे पास कोई उत्तर होगा। ऐसी स्थिति में सृजनात्मकता पर बात ही फिजूल है और सवाल यह है कि पूरे वातावरण में जो संड़ाध भर रही है, उसकी भरपाई कौन करेगा? # who will repay#

रविवार, 23 अप्रैल 2017

समाज और कानून के बीच अपना वजूद और न्याय तलाशते एसिड हमलों के शिकार

तुम मेरे दिल पर लिखना चाहते थे अपना प्यार
इनकार किया तो चेहरे पर अपनी नफरत लिख दी
याद रखो, तुमने सिर्फ मेरा चेहरा जलाया है
 हौसले अब भी जिंदा हैं मेरे, छीन नहीं सकते तुम
सुना तुमने, जिंदा हूँ अपने जीने की जिद के साथ।।


नफरत और एसिड का गहरा रिश्ता है, खासकर स्त्रियों का मामला हो तो यह और गहराई से जुड़ जाता है। प्रेम निवेदन नहीं माना तो प्रतिशोध की आग को तरल कर चेहरे पर बहा देना आम बात है। स्त्री का इनकार उसकी हिमाकत है और 21वीं सदी की ओर बढ़ चले हिन्दुस्तान में नफरत और एसिड हमलों की तादाद भी बढ़ चली है मगर हमलों की शिकार महिलाओं के हौसलों को मारना इतना आसान नहीं है। अजीब बात यह है कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के पास भी 2013 तक एसिड हमलों का कोई आँकड़ा नहीं था मगर भला हो भारतीय दंड संहिता में हुए संशोधन का जिससे एसिड हमलॆ को अपराध की श्रेणी में रखा जाने लगा। जाहिर है कि आँकड़े 2014 से ही मिलते हैं और 2014 में ही एसिड हमलों के 225 मामले देखने को मिलते हैं और 2012 में 106 और 2013 के 116 मामलों से अधिक हैं। 2015 में एसिड हमलों के सबसे अधिक 249 मामले दर्ज किए गए। कहने की जरूरत नहीं है कि एसिड हमले पितृसत्तात्मक सत्ता की नियंत्रण वाली मानसिकता का परिचायक है जहाँ नियंत्रण न कर पाने की स्थिति में बौखलाहट एसिड हमलों का रूप लेती है और यह सारी दुनिया में है। यह किसी जाति, धर्म, स्थान से रिश्ता नहीं रखता बल्कि दक्षिण एशिया, चीन, नाइजेरिया, केन्या, मैक्सिको, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देशों में भी होता है। एसिड हमलों की 80 प्रतिशत शिकार महिलाएं ही होती हैं। कानून में संशोधन के बाद एसिड हमलों के मामले में 10 साल या फिर आजीवन सजा का प्रावधान है। ये भी कहा गया कि एसिड खरीदने वालों को अपना सचित्र प्रमाणपत्र दुकानदार को देना होगा और खरीददार का रिकॉर्ड दुकानदार के पास होना चाहिए मगर हम सब जानते हैं कि एसिड अब भी दुकानों में खुलेआम बिक रहा है। कानून है मगर वह लागू नहीं हो पाता।
एसिड हमलों के मामले में सबसे खराब स्थिति उत्तर प्रदेश की है और बंगाल  उसके बाद आता है। एसिड सर्वाइवर्स फाउंडेशन इंडिया (एएसएफआई) के आँकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में 2016 में एसिड हमलों के 29 मामले दर्ज हुए तो बँगाल में यह आँकड़ा 14 है, इसके बाद बिहार है जहाँ एसिड हमलों के 10 मामले हैं। पीड़ितों के मामले में बिहार आगे है जहाँ 23 एसिड पीड़ित हैं। हालाँकि यह भी ठीक है कि एसिड मामलों में कमी आयी है मगर बंगाल के बारे में यह नहीं कहा जा सकता। हाल ही में मुर्शिदाबाद के मलिकपुर में ऐसी घटना हुई जहाँ पति ने पत्नी के मुँह में एसिड डाल दिया। अस्पताल ले जाने पर महिला ने दम तोड़ दिया।
अच्छी बात यह है कि सरकार इस बारे में सोच रही है। गृह मंत्रालय ने पहले भी राज्यों को कहा है कि वे सेंट्रल विक्टिम कम्पन्सेशन फंड (सीवीसीएफ) के तहत एसिड हमलों के शिकार लोगों को कम से कम 3 लाख रुपए की राशि का चेक दें। पीड़ितों को तुरन्त लाभ पहुँचाने के लिए प्रधानमंत्री नेशनल रिलिफ फंड से 1 लाख रुपए अतिरिक्त देने की बात कही है मगर सच तो यह है कि जरूरत एसिड हमलों की शिकार महिलाओं के आत्मविश्वास को बढ़ाकर सक्षम बनाने की है। सर्जरी का खर्च इतना अधिक है कि यह राशि भी कम लगती है। एसिड हमला शारीरिक, सामाजिक और मानसिक रूप से तोड़ता है। इसे रोकने के लिए जरूरी कदम उठाए जाने अब भी बाकी हैं।
एसिड अटैक पीड़ितों के मुद्दे को कई मंचों पर उठाया गया है और जागरुकता लाने की कोशिश की जा रही है। युवाओं में इस मुद्दे को लेकर जागरुकता बढ़ाने की एक नई कोशिश है एक अनूठी कॉमिक किताब - प्रियाज़ मिरर। ये डाउनलोडेबल कॉमिक बुक ऐनिमेशन वीडियो के साथ असल ज़िंदगी की कहानियां साथ लाती है। अब उनको स्वीकृति मिल रही है। हाल ही में सोनाली मुखर्जी, लक्ष्मी और रेशमा जैसी साहसी लड़कियाँ इसकी मिसाल बनी हैं मगर अब भी यह साहस बहुत कम लड़कियों में है कि वे आगे बढ़ सकें। स्थिति को बदलने के लिए जरूरी है कि कानून व्यवस्था मजबूत हो। न्याय और राहत शीघ्र मिले और उससे भी जरूरी है कि पुरुषों में स्त्री के इनकार को स्वीकार करने का साहस हो और ये तभी होगा जब स्त्री उनके लिए महज चेहरा नहीं बल्कि एक व्यक्तित्व होगी।




गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

आखिर कोलकाता में महिला पत्रकारों पर बात हुई


आमतौर पर जब पत्रकारिता में महिलाओं पर चर्चा होती है तो वह दिल्ली तक सिमट जाती है मगर इस बार चर्चा हुई महानगर में।इस परिचर्चा में वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया में काम कर रही महिलाओं ने शिरकत की। वक्ताओं की नजर में यह परिचर्चा पत्रकारिता परिदृश्य के ठहरे हुए पानी में हलचल मचाने जैसी थी। इसका आयोजन मुश्किल मगर बेहद जरूरी था। चर्चा सार्थक रही और वक्ताओं ने विषय पर गम्भीरता से प्रकाश डाला। मैं और अपराजिता दोनों आभारी हैं। अपराजिता में खबर हैै मगर यहाँ जो दिया जा रहा है, वह अनप्लग्ड है मतलब बहुत अधिक सम्पादन नहीं किया गया है। पत्रकारों का बात करना जरूरी है चाहे वह महिला हो या पुरुष हो क्योंकि न बोलना, अभिव्यक्त न करना कुण्ठा को जन्म देता है, यही कुंठा ही हमारी सभी समस्याओं की जड़ है। हमें बात करनी होगी और पत्रकारिता के सभी माध्यमों के साथ पत्रकारों को भी एक साथ लाना होगा। प्रतियोगिता का मतलब एक दूसरे को नीचा दिखाना नहीं होता, अगर आप ऐसा करते हैं तो आप कमजोर हैं। हम एक साथ हाथ में हाथ डालकर, एक दूसरे की तारीफ कर, एक दूसरे का सहयोग करके आगे बढ़ सकते हैं और सृजनात्मक तरीके से आगे बढ़ सकते हैं। यह बहुत जरूरी है क्योंकि एक दूसरे को कष्ट देने का मतलब खुद को ही कष्ट देना है। संगोष्ठी में पत्रकारिता में महिला पत्रकारों की बदलती भूमिका और उनको जिस तरह से मीडिया में पेश किया जा रहा है, उस पर बात हुई। इस संगोष्ठी की कुछ वीडियो क्लिपिंग्स हैं जो छायाकार अदिति साहा ने उपलब्ध करवायी हैं। हम कोशिश करेंगे कि वह आपके लिए ब्लॉग पर हम ला सकें। संगोष्ठी की तस्वीेरें आप अपराजिता में देख सकते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार तथा ताजा टीवी समूह के चेयरमैन विश्वम्भर नेवर का कहना है कि आज महिला पत्रकारों की उर्जा का सृजनात्मक उपयोग जरूरी है। वेबपत्रिका अपराजिता के प्रथम वर्षपूर्ति समारोह में अपराजिता तथा रंगप्रवाह द्वारा भारतीय भाषा परिषद के सहयोग से आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए मीडिया में अवसर भी हैं और चुनौती भी हैं। भारतीय भाषा परिषद सभागार में आयोजित संगोष्ठी में उन्होंने कहा कि हमारी सामाजिक सीमाओं के कारण काम नहीं कर पातीं। पुरुष और महिलाओं के बीच सहयोग की भावना जरूरी है। छोटे शहरों से महिलाओं का उभरना बड़ा कठिन है। आज मीडिया में लड़कियों का प्रवेश बाढ़ के पानी की तरह है जिसका सृजनात्मक उपयोग आवश्यक है। अखबारों के सम्पादकों के सामने यह बड़ी चुनौती है। हमारे देश में महिला पत्रकारों के लिए अनुकूल सामाजिक परिवेश होना चाहिए। यह ज्वलंत और ज्वलनशील विषय है। स्त्री बहुत अच्छी कहानी हो सकती थी। अखबारों में सम्पादकों के नाम पत्र लिखता था और 99 प्रतिशत पत्र मैं खुद लिखता था। पहले महिलाओं के स्तम्भ भी महिलाओं के नाम से पुरुष लिखा करते थे। महिलाओं की समस्या उनके परिवार और उनके शादी जैसे सामाजिक कारणों को लेकर है। अखबारों और टीवी को अच्छी नजरिए से देखा नहीं जाता था। कई अच्छी प्रतिभाएं समाप्त हो गयीं। कई लड़कियाँ पत्रकारिता नहीं मॉडलिंग या अभिनय करना पसन्द करती हैं। 50 साल पहले लड़कियों के लिए कोई काम नहीं था। आज भी कुछ क्षेत्रों को चुनकर उनके लिए कड़ी चुनौती है।

वरिष्ठ आलोचक शम्भुनाथ ने कहा कि हिन्दी में यह पहली परिचर्चा हुई जिसमें महिला पत्रकारों ने सक्रिय भूमिका निभायीं। यह अच्छी शुरुआत है। महिलाएं मानव संसाधन का बड़ा हिस्सा हैं, दुनिया की आधी ताकत हैं। इस ताकत का इस्तेमाल सबसे पहले शिक्षा में हुआ। शिक्षा के बाद स्वास्थ्य में महिलाओं का प्रवेश हुआ और इसके बाद लोकतांत्रिक दबाव में राजनीति में प्रवेश हुआ। लोग समझते थे कि रिमोट की तरह इस्तेमाल करेंगे मगर बाद में स्त्रियों ने रिमोट बनने से इनकार कर दिया। पहले मीडिया में महिला पत्रकार कम मिलती थीं। आज कार्यक्षेत्र बढ़ा है। स्त्री की सबसे कमजोर आवाज मीडिया में है। मीडिया में स्त्री महज एक कथा है, वह ताकत नहीं बनी है। वह जब स्टोरी नहीं पावर के रूप में आएंगी तो एक गुणात्मक परिवर्तन होगा। अभी भी मीडिया पुरुष सत्ता का वर्चस्व है। 99 प्रतिशत सम्पादक पुरुष ही हैं और स्त्रियाँ भी पुरुष मूल्यों को ढो रही हैं। पुरुष समाज उदार हुआ है। विज्ञापन आज भी पुरुष मानसिकता से बने विज्ञापन हैं। अगर महिलाओं की सक्रियता बढ़ी तो स्त्री ताकत जरूर बनेगी।

 डिजिटल ब्रांड्स की निदेशक रितुस्मिता विश्वास ने कहा कि यह अच्छी बात है कि कम से कम सवाल उठाया गया मगर इस मसले को कभी नहीं उठाया और न ही योगदान पर चर्चा होती है। मैं जब छोटी थी, ग्लैमर देखा, खबरों को देखकर रोमांच हुआ और आया। गत 20 साल से देखा। मीडिया महज ग्लैमर और सेलिब्रिटी नहीं है। मीडिया ताकत की बात करती है। मध्यमवर्गीय परिवार से हूँ, शिक्षा मिली मगर ताकत नहीं था। जीवन में ऐसी घटना हुई जहाँ मुझे लगा कि ताकत जरूरी है और आज 20 साल बाद लगता है कि मैं कुछ योगदान कर रही हूँ। मीडिया में रहते हुए अनकहा सामने लाने की कोशिश करती हूँ। उत्पीड़न को सामने लाने के साथ यह जरूरी है कि अच्छे कामों पर बात की जाए जिससे सभी को प्रेरणा मिले। महिलाओं को उनकी पहचान मिलनी चाहिए। आर जे नीलम ने कहा कि रेडियो मनोरंजन प्रधान है। हम जब प्रार्थना करते हैं तो हमारी नजरों के आगे भगवान पुरुष ही आता है। मीडिया में होना बहुत चुनौतीपूर्ण है। महिलाओं से उम्मीदें अधिक की जाती हैं और वे उन पर खरी भी उतरती हैं। उससे उम्मीद की जाती है कि वह घर में किसी की मदद लें। यूनिस्को के अनुसार 24 प्रतिशत महिलाएं ही ओपिनियन मेकर हैं। टीवी विज्ञापनों में भी महिलाओं से खूबसूरत दिखने की उम्मीद की जाती है। जब तक महिलाएं उत्पाद के तौर पर देखी जाती रहेंगी, स्त्रियाँ एक दूसरे का सहयोग नहीं करतीं तब तक स्थिति नहीं सुधरेगी। महिला पत्रकारों से अधिकारी भी सहयोग नहीं करते। ब्यूटी, लाइफस्टाइल और फैशन यानि पेज 3 की कवरें महिला पत्रकार कवर करेगी, वह राजनीति या अपराध कवर नहीं कर सकती। वह सफल होती है तो उसे टेढ़ी नजरों से देखा जाता है। न्यूज चैनल, अखबारों के मालिक और सम्पादक परिवर्तन लाने के लिए आगे बढ़ सकते हैं, उनको आगे आना होगा। बातें करनी काफी नहीं हैं, स्थिति को सकारात्मक बनाने के लिए काम करना होगा। सलाम दुनिया के सम्पादक सन्तोष सिंह ने कहा कि मैं चीजों को सकारात्मक तरीके से देखने में विश्वास करता हूँ। अगर आप के अन्दर प्रतिभा है तो उसे कोई नहीं रोक सकता। सबको महसूस हो रहा है कि महिलाएं तेजी से आगे बढ़ रही हैं। समस्याओं से आगे निकलकर समाधान खोजना होगा, ऐसी कोई बाधा नहीं है। संरचना बड़ा मसला है। हर जगह पर महिलाएं जिस तेजी से आगे बढ़ रही हैं और स्थिति काफी बेहतर हुई है। 
पत्रकार तथा कवियत्री पापिया पांडे ने कहा कि पहले ही पायदान पर महिलाएं हतोत्साहित की जाती हैं। मानसिक तनाव, एक डर हमेशा रहा मगर इन अनुभवों से काफी कुछ सीखा। साहित्य और मीडिया, सृजनात्मक क्षेत्र हैं, सोचकर लिखना है। अगर मष्तिष्क मुक्त नहीं हो तो वह सोचेगा कैसे और सृजन कैसे करेगा? सुरक्षा बड़ा मसला है। एक मानसिक जंजीर थी जो लिखने नहीं देती थी, बहुत गलतियाँ होती थीं। माहौल वैसा होना चाहिए। शौचालयों की स्थिति बेहद खराब रही है। ऐसे ही माहौल में काम किया, शिकायत की है, उसे जीया है। आर्थिक स्थिति के लिए जरूरी था, काम किया। इन हालात ने मजबूत बनाया है मगर बुनियादी जरूरतें पूरी होनी चाहिए। इन छोटी – छोटी चीजों से सृजन बेहतर हो सकता है। क्यों नहीं प्रतिभाओं को उभरने के मौके क्यों नहीं मिलते? कार्यक्रम के दूसरे सत्र में रंगप्रवाह के चर्चित नाटक अंगिरा का मंचन हुआ। नाटक में कल्पना ठाकुर और जयदेव दास के जबरदस्त अभिनय ने दर्शकों को मोहित कर दिया। कार्यक्रम का संचालन अपराजिता की सम्पादक सुषमा त्रिपाठी ने किया।


सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

डर पुराण





डर बड़ा, बहुत बड़ा और व्यापक शब्द है। इन्सान चाहे जितना भी ऊँचा पद पा ले, डर नाम की बला उसका पीछा नहीं छोड़ती। खो जाने का डर, छिन जाने का डर, हर वक्त उस पर हावी रहता है। आज तक बड़े से बड़े पूँजीपति भी अपना पीछा इस डर से नहीं छुड़ा सके हैं और यही डर उनको कभी नया करने की प्रेरणा देता है तो कभी मुकाबला करने की हिम्मत, डर बहुत हद तक सर्वाइवल ऑफ फिटेस्ट का मामला है और फिट रहने की प्रक्रिया डर के कारण ही है। 

जनता का डर है कि वे आम जनता को देखते ही सभी नेता वायदों की गंगा बहाने लगते हैं, अब ये अलग बात है कि गंगा अभी तक साफ होने की राह देख रही है और आम आदमी वायदों के पूरा होने की उम्मीद में वोटजाल में हर बार फँसता है। वोटबैंक कम होने का डर है कि चुनाव में टिकट जातिगत आधार पर बँटते हैं, शंकराचार्यों और इमामों से कोई पंगा नहीं लेता और वे घोषणाएं और फतवे जारी करते रहते हैं। तुष्टिकरण की राजनीति ही है जिसके कारण न्याय की जगह वोटबैंक पर नेताओं की नजर रहती है और बंगाल जैसे राज्य में बोझ बेचारे बच्चों पर पड़ता है। 

एक ही बात को वे एक बार हिन्दू नजरिए से तो एक बार मुस्लिम नजरिए से देखने को मजबूर किए जा रहे हैं। इन्द्रधनुष बांग्ला में रामधनु से हटकर रंगधनु बन चुका है तो अब लगता है कि रामायण को भी रंगयण कर ही देना चाहिए और राम हो जाएंगे रंग। अब हमें डर है कि भारत ठहरा धर्मनिरपेक्ष देश, कल को जैन, बौद्ध, सिख और ईसाई धर्मों ने झंडा उठा लिया और कहने लगे कि उनके सम्बन्धों की शब्दावली किताबों में लाई जाए तो बच्चों का क्या होगा, राम जाने। डर अब बच्चों को लगना चाहिए कि यह धर्मनिरपेक्षता जाने जाने क्या दिखाएगी, बेचारे स्कूल में सरस्वती पूजा नहीं मना पाते और जिद करते हैं तो पुलिस लाठियाँ भाँजती है। डर ही तो है कि टिकट बाँटने के लिए योग्यता को नहीं जाति को आधार बनाया जाता रहा है।

 लालू और मुलायम माई समीकरण बिठाने में लगे हैं, अरे माई नहीं समझे आप, एम माने मुसलमान और वाई माने यादव, काश नेतागण समुदायों को वोटबैंक न समझकर उनके समग्र विकास के लिए आगे बढ़ते मगर भइया, इ सब नहीं होगा, वोटबैंक नहीं रहेगा तो जीतेंगे कैसे। भाजपा भी तो हिन्दूत्व का नारा लगाकर ही रामंदिर बनाने का वायदा करती रही है और ये रामंदिर बन जाएगा तो वोट का क्या होगा इसलिए राममंदिर अभी मुद्दा ही  है और वही रहेगा।
नोटबंदी का डर तहखानों में छुपा पैसा बाहर ला रहा है तो मोदी का डर विरोधियों को करीब ला रहा है। तुलसीदास जी सही कहते थे, भय से ही प्रीत होती है। अब ट्रम्प का डर है कि सारी दुनिया उनके डर से पगला रही है, पता नहीं कब, क्या कर दें। 

दफ्तरों में भी यही हाल है कि बॉस की गुडलिस्ट से हट जाने का डर उल्टे सीधे काम करवा रहा है। फिल्में न मिलने का डर अभिनेत्रियों से अंग प्रदर्शन करवा रहा है तो फेल हो जाने का डर परीक्षार्थियों से नकल और पकड़े जाने पर धरना करवा रहा है। कमिशन कम होने का डर ही है कि बस वाले बस को एरोप्लेन बना देते हैं और एरोप्लेन बनाने के चक्कर में कई यात्री अब तक स्वर्ग की यात्रा कर चुके हैं, अब वे स्वर्ग ही गए होंगे, यह गारंटी हम नहीं लेने वाले हैं।
 महंगाई के डर से दूधवाले दूध में पानी मिला रहे हैं। विद्यार्थियों में खुदकुशी के डर से कपिल सिब्बल ने दसवीं की बोर्ड परीक्षा ही बंद करवा दी तो अब डर को बेकार का डर बताकर ये सरकार बोर्ड परीक्षा वापस ले आयी। झूठे बरतनों के जमने का डर न हो तो मेमसाब कामवाली बाई को पत्ता ही न दें और वेतन कटने का डर न हो तो कर्मचारी समय पर आएं ही नहीं। डर नहीं होता तो वामपंथी और काँग्रेस बंगाल में हाथ नहीं मिलाते। अदालत का डर नहीं होता तो नारदा से सारधा, सब ठंडे बस्ते में चले जाते। सितारों की महंगी फीस का डर है कि निर्माता अब छोटे बजट की फिल्में बनाते हैं। भक्ति में जो डर छुपा है, उसने तो बिजनेस अम्पायर खड़ा कर दिया है, हमारी बात पर यकीन न हो तो किसी बाबा जी के प्रवचन शिविर में जाकर देख लीजिए। डर ही है भगवन कि सब तुम्हारे आगे सिर झुका रहे हैं, प्यार करने वाले भी हैं मगर कितने हैं, ये तो तुम भी जानते हो। 

डंडे का डर दिखाकर कभी पुलिस पब्लिक को धमकाती थी और अब पार्टी का डर दिखाकर गुंडे पुलिस को रुला रहे हैं। बच्चे हाथ से न निकल जाएं, तो माँ बाप अब बच्चों को फ्रेंडली नेचर दिखा रहे हैं। कल तो जो मास्टर जी डस्टर चलाकर फेंकते थे, अब विद्यार्थियों को हँसकर बुला रहे हैं। कहने का मतलब है कि डर है कि दुनिया घूम रही है मगर सौ बात की एक बात यह है कि डरकर मत रहिए, डर से काम हो सकता है, सच्ची प्रीत नहीं हो सकती है और हम तो कहेंगे कि सच बात कहिए और डरिए मत क्योंकि.....डर के आगे जीत है।

रविवार, 5 फ़रवरी 2017

कौन लेगा पत्रकारों व महिला पत्रकारों की सुरक्षा का जिम्मा



पिछले कुछ सालों में पत्रकारों पर हमले तेजी से बढ़े हैं। मध्य प्रदेश में व्यापम मामले की जाँच करने से लेकर बिहार में जंगलराज के खिलाफ आवाज उठाने वाले पत्रकारों की निर्मम हत्या कर दी गयी। पत्रकारों पर निशाना साधना, उनको धमकाना और कई बार उनको मार डालना तक काफी आसान होता है क्योंकि वे टारगेट होते हैं। बेहद दुःख और शर्म के साथ कहना पड़ रहा है कि उनकी हिफाजत के लिए कोई ठोस नीति नहीं है। इस बारे में जब बात की जाती है तो केन्द्रीय अधिकारी साफ स्वरों में कहते हैं कि यह राज्य का मामला है। अब जरा बताइए कि जहाँ राज्य ही प्रतिशोध की राजनीति में विश्वास रखता हो, वहाँ पत्रकारों और खासकर महिला पत्रकारों की सुरक्षा का दायित्व कौन लेगा? अधिकतर मामलों में तो मामले को दबाने की भरपूर कोशिश की जाती है और विरोध करने पर पत्रकार को मुँह न खोलने की नसीहत दी जाती है।


 हाल ही में धूलागढ़ मामले की कवरेज को लेकर सुधीर चौधरी और उनकी महिला सहयोगी पर बंगाल सरकार ने एफआईआर कर दी। सुधीर चौधरी एक जाना - पहचाना नाम है, उनके पास पहुँच है मगर क्या छोटे शहरों के पत्रकारों के साथ घटनाएं सामने आ सकती हैं, यह कहना मुश्किल है।  
दरअसल, यह अखबारों, चैनलों और सरकारों के बीच की केमेस्ट्री पर भी निर्भर करता है। देश में जिलागत स्तर पर देखा जाए तो पत्रकारिता में महिलाएं हैं ही नहीं। जाहिर है कि जो 1 या 2 महिलाएं काम करती हैं, उनको दोहरी और तिहरी चुनौती का सामना करना पड़ता है। कार्यक्षेत्र में पुरुष सहकर्मी उनको देखना नहीं चाहते और उनके लिए तमाम तरह की मुश्किलें खड़ी करते हैं। बात पदोन्नति की हो, तो भी जिस तेजी से पुरुषों का ग्राफ बढ़ता है, उस तेजी से महिलाओं का कॅरियर ग्राफ नहीं बढ़ता क्योंकि इसके लिए भी बॉस की मेहरबानी चाहिए और उनसे समझौते की उम्मीद की जाती है। कई महिला पत्रकारों को इस वजह से अवसाद से जूझते देखा गया है। जो नयी लड़कियाँ आ रही हैं, उनमें बहुत सी शादी होने तक ही काम करती हैं और कुछ मजबूरी में चाहकर भी दूसरे हाउस में नौकरी नहीं तलाश सकतीं। उनको सुरक्षा का दायरा चाहिए और घर को उनकी कमाई। उनकी कमाई से घर चलता है इसलिए उनके दफ्तर में उनके साथ कुछ गलत भी हो तो वे प्रतिरोध नहीं कर पातीं। 
(साभार - समाचार 4 मीडिया)
सम्पादक अथवा चीफ रिपोर्टर के लिए ऐसी लड़कियाँ बँधुआ मजदूरों की तरह दिन रात काम करती हैं और बदले में उनको बीमारी के सिवा कुछ नहीं मिलता। अगर रात को घर लौटते कोई घटना हो जाए तो भी उनमें मुँह खोलने का साहस नहीं आ पाता क्योंकि घर और दफ्तर, दोनों के बीच वे पिस रही होती हैं। ऐसी लड़कियाँ जब तक खुद आगे नहीं बढ़तीं, कोई उनकी मदद नहीं कर सकता, उनको आवाज उठानी होगी। हाल ही में हावड़ा में एक महिला पत्रकार से छेड़छाड़ और मारपीट हुई। इस महिला पत्रकार की तारीफों के कसीदे उसके अखबार में पढ़े गए मगर इस साहसी पत्रकार का नाम कोई नहीं जानता। बताया जाता है कि मीडिया से उसके बात करने पर रोक लगा दी गयी है। अब कल्पना कीजिए कि उसकी स्थिति क्या होगी
वहीं कुछ लड़कियाँ साहस दिखाती हैं और रिपोर्ट भी दर्ज करवाती हैं मगर उन पर भी मामला वापस लेने का दबाव बनाया जाता है और जाँच के बहाने उनको परेशान किया जाता है। कुछ महीनों पहले एक अखबार की महिला पत्रकार और छायाकार के साथ खबर सँग्रह करने के दौरान इस तरह की घटना हुई। इसके पहले भी विधाननगर में चुनाव कवरेज करने गए पत्रकारों के साथ मारपीट हुई और प्रतिवाद में पत्रकारों ने रैली निकाली मगर इसके बाद क्या हुआ?

आपराधिक घटनाओं की खबर करने वाली लड़कियाँ तो अक्सर इस समस्या से जूझती हैं। हाल ही में दिल्ली में महिला पत्रकारों के लिए आयोजित कार्यशाला में मेरी मुलाकात हमारा महानगर की पत्रकार नीतू विश्वकर्मा से हुई जिनको एक पुलिस अधिकारी के हाथों बदसलूकी का सामना करना पड़ा।
 खबर सँग्रह करने गयी नीतू से पुलिस ने उनका मोबाइल छीन लिया। प्रबन्धन ने साथ दिया तो खबर छपी मगर तमाम जगहों पर पत्र देने के बावजूद अब तक दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई।


 मगर नीतू के हौसले की दाद देती हूँ कि उन्होंने अपनी लड़ाई जारी रखी है। एक बात तो तय है कि हमारी मदद करने वाला कोई नहीं है इसलिए आवाज तो अपने लिए हमें खुद उठानी होगी।
सरकार पर यह दबाव बनाया जाए कि महिला हो या पुरुष, पत्रकारों की सुरक्षा और उनके हितों के लिए एक स्वायत्त आयोग बनाया जाए जहाँ वे अपनी बात रखें। इस आयोग में महिलाओं के लिए एक विशेष व्यवस्था हो जहाँ वे गोपनीयता के साथ अपनी बात रख सकें। पत्रकार देश का चौथा स्तम्भ हैं, उनकी रक्षा करना देश के लोकतन्त्र के लिए बेहद जरूरी है। अगर आपके साथ इस तरह की घटना हुई है तो खुलकर सामने आएं और अपनी बात रखें।

रविवार, 15 जनवरी 2017

हिन्दी वालों के हाथों सतायी जा रही है हिन्दी, बचाना आम जनता को होगा

हिन्दी को बचाने के लिए हिन्दी वाले अब सड़क पर उतरने की योजना बना रहे है। हवाई यात्रा कर दिल्ली पहुँच रहे हैं इसलिए कि भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता न मिले। बड़ी - बड़ी संगोष्ठियाँ होती हैं, लाखों का खर्च होता है मगर जो बुनियादी मुद्दे हैं उस पर बात ही नहीं होती।


 40 साल से पुस्तक मेले में हिन्दी के प्रकाशक स्टॉल लगाते आ रहे हैं मगर पुस्तक मेले की आयोजन समिति में हिन्दी का कोई लेखक, प्रकाशक या बुद्धिजीवी नहीं है, हिन्दी के संरक्षक खामोश हैं। पत्रकार और हिन्दी का होनेे के नाते आवाज उठायी।

http://salamduniya.in/index.php/epaper/m/23910/58555716cc1b6

हिन्दी माध्यम स्कूलों में बच्चों को साल बीतने के बाद पाठ्यपुस्तकें मिलती हैं मगर कोई आवाज नहीं उठती और न कोई सड़क पर उतरता है। बंगाल में इस्लामीकरण और तुष्टिकरण की नीति राज्य सरकार ने अपना रखी है और शर्म की बात यह है कि इस पुस्तक की अनुवाद में प्रक्रिया में हिन्दी के विद्वान शामिल हैं।
सवाल यह है कि आर्थिक कारण व्यक्ति की सोच और अन्तरात्मा पर भारी कैसे पड़ते हैं और सवाल यह है कि ऐसे व्यक्ति को सम्मान क्यों मिलना चाहिए? हिन्दी का हित बुद्धिजीवियों का लेखकों के साथ रहने में नहीं है बल्कि आम जनता तक पहुुँचने में है।

आखिर हिन्दी साहित्य तक क्यों सीमित रहे? समय आ गया है कि आम आदमी अपनी भाषा को बचाने की जिम्मेदारी उठाए और हर उस व्यक्ति का बहिष्कार करे जो उसकी भाषा, संस्कृति, सम्बन्धों की परिभाषा पर कुठाराघात कर रहे हैं।
बच्चेे देश का ही नहीं समाज का भविष्य हैं और उनको इस तरह तैयार किया जा रहा है कि न तो वे अपनी भाषा समझेंगे और न ही अपनी संस्कृति। हिन्दी किसी और के हाथों नहीं हिन्दी वालों के हाथों सतायी जा रही है, अब आगे बढ़कर इसे छीनना होगा, बस यही एक रास्ता है। हिन्दी के दिग्गजों के कारनामे की बानगी पेश है।
http://salamduniya.in/index.php/epaper/m/28671/587b9b7be9da2

गुरुवार, 5 जनवरी 2017

निराला की तरह अकेले समय को चुनौती देते हैं जटिल मुक्तिबोध

मुक्तिबोध परेशान करने वाले कवि हैं। वो परेशान करते हैं क्योंकि वे आसानी से 
समझ में नहीं आते और एक जटिल कवि हैं। इनकी कविताओं में संघर्ष है मगर इस 
संघर्ष को वे चमकीला बनाने की कोशिश नहीं करते इसलिए वे नीरस कवि भी हैं। जब तक आप मुक्तिबोध के जीवन की कठिनाइयों को नहीं समझते, तब तक आप उनकी कविताओं का सत्य भी नहीं समझ सकते। मुझे मुक्तिबोध के जीवन और कविताओं में कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की झलक मिलती है। दोनों की कविताओं और जीवन का संघर्ष एक जैसा ही है और जो उपेक्षा तत्कालीन साहित्यिक और सामयिक वातावरण से इन दोनों कवियों को मिली, वे स्वीकार नहीं कर सके और दोनों की मृत्यु कारुणिक परिस्थितियों में ही हुई।
मुक्तिबोध मूलत: कवि हैं। उनकी आलोचना उनके कवि व्यक्तित्व से ही नि:सृत और 
परिभाषित है। वही उसकी शक्ति और सीमा है। उन्होंने एक ओर प्रगतिवाद के 
कठमुल्लेपन को उभार कर सामने रखा, तो दूसरी ओर नयी कविता की ह्रासोन्मुखी 
प्रवृत्तियों का पर्दाफ़ाश किया। यहाँ उनकी आलोचना दृष्टि का पैनापन और मौलिकता 
असन्दिग्ध है। उनकी सैद्धान्तिक और व्यावहारिक समीक्षा में तेजस्विता है। जयशंकर 

प्रसाद, शमशेर, कुँवर नारायण जैसे कवियों की उन्होंने जो आलोचना की है, उसमें 

पर्याप्त विचारोत्तेजकता है और विरोधी दृष्टि रखने वाले भी उनसे बहुत कुछ सीख 

सकते हैं। काव्य की सृजन प्रक्रिया पर उनका निबन्ध महत्त्वपूर्ण है। ख़ासकर फैण्टेसी 

का जैसा विवेचन उन्होंने किया है, वह अत्यन्त गहन और तात्विक है। उन्होंने नयी 

कविता का अपना शास्त्र ही गढ़ डाला है। पर वे निरे शास्त्रीय आलोचक नहीं हैं। 

उनकी कविता की ही तरह उनकी आलोचना में भी वही चरमता है, ईमान और 

अनुभव की वही पारदर्शिता है, जो प्रथम श्रेणी के लेखकों में पाई जाती है। उन्होंने 

अपनी आलोचना द्वारा ऐसे अनेक तथ्यों को उद्घाटित किया है, जिन पर साधारणत: 

ध्यान नहीं दिया जाता रहा। 'जड़ीभूत सौन्दर्याभरुचि' तथा 'व्यक्ति के अन्त:करण के 

संस्कार में उसके परिवार का योगदान' उदाहरण के रूप में गिनाए जा सकते हैं। डॉ 

नामवर सिंह के शब्दों में - "नई कविता में मुक्तिबोध की जगह वही है ,जो छायावाद 

में निराला की थी। निराला के समान ही मुक्तिबोध ने भी अपनी युग के सामान्य 

काव्य-मूल्यों को प्रतिफलित करने के साथ ही उनकी सीमा की चुनौती देकर उस 

सर्जनात्मक विशिष्टता को चरितार्थ किया, जिससे समकालीन काव्य का सही मूल्यांकन हो सका।
हिन्दी की कविताओं में संघर्ष हो सकता है मगर बात जब कवियों का साथ देने और उनके संघर्ष में साथ खड़े होने की आती है तो कोई साहित्यिक आंदोलन ठोस रूप में नजर नहीं आता। मुक्तिबोध तारसप्तक के पहले कवि जरूर हैं मगर हम यह बात पुख्तगी के साथ नहीं कह सकते कि हिन्दी साहित्य जगत ने उनको अभी भी उनका प्राप्य दिया है। हम कवियों और साहित्यकारों को समय रहते नहीं सहेजते और उनके गुजरने के लंबे अरसे बाद उनकी शान में कसीदे पढ़ते हैं और मुक्तिबोध के मामले में भी यही हुआ। मुक्तिबोध के लिए कविता और जीवन अभिन्न थे। उनका समस्त साहित्य उस संवेदनशील रचनाकार की मार्मिक अभिव्यक्ति है जिसने अपने युग-यथार्थ को बाह्य एवं आंतरिक दोनों स्तरों पर गहराई से महसूस किया। दिमागी गुहान्धकार का ओरांग ओटांग कविता में वे कहते हैं -   
सत्य के बहाने
स्वयं को चाहते है प्रस्थापित करना।
अहं को, तथ्य के बहाने।
मेरी जीभ एकाएक ताल से चिपकती
अक्ल क्षारयुक्त-सी होती है
और मेरी आँखें उन बहस करनेवालों के
कपड़ों में छिपी हुई
सघन रहस्यमय लम्बी पूँछ देखती!!
और मैं सोचता हूँ...
कैसे सत्य हैं--
ढाँक रखना चाहते हैं बड़े-बड़े
नाख़ून!!

स्वाधीनता के बाद, देश जिस भ्रष्ट, शोषक और अन्यायपूर्ण व्यवस्था के दंश को झेल 

रहा था मुक्तिबोध अपनी कविताओं में उस व्यवस्था का असली चेहरा सामने लाते हैं 

और साथ ही उसमें व्यक्ति की अपनी भूमिका पर प्रश्न -चिन्ह लगाते हैं। राजनीतिज्ञोंपूँजीपतियों एवं बुद्धिजीवियों की दुरभिसंधि के बीच मध्यवर्ग की उदासीनता जिस संकट को जन्म दे रही थी मुक्तिबोध का साहित्य उसका विस्तृत वर्णन है। अपनी रचनाओं में अभिव्यक्ति के खतरेउठाते हुए उन्होंने वस्तु और रूप के स्थापित ढाँचों को चुनौती दी। सम्भवतः स्थापित मान्यताओं को चुनौती देने के कारण भी उनको अपने समय में स्वीकृति नहीं मिली बल्कि सवालों और चुनौतियों से जूझना पड़ा। कामायनी : एक पुनर्विचार में उन्होने यही किया है। इसीलिए अपने समय में उनका साहित्य चर्चित होने के साथ-साथ बहुविवादित भी रहा और उसका समुचित मूल्यांकन उनके जीवन-काल के बाद ही संभव हो पाया।
 1958 में राजनांद गाँव के दिग्विजय कॉलेज में वे प्राध्यापक हो गए। यहाँ रहते हुए 

उन्होंने अपना सर्वोत्तम साहित्य रचा। ब्रह्मराक्षसऔर अँधेरे मेंतथा अन्य कई महत्वपूर्ण
कविताओं के साथ-साथ ‘काठ का सपनासतह से उठता आदमी’ (कहानी-संग्रह), ‘विपात्र’ (उपन्यास) आदि की रचना इसी समय में हुई। यहीं उन्होंने कामायनीः एक पुनर्विचारको भी अंतिम रूप दिया।
ज़िन्दगी जब एक सुखद भविष्य की ओर करवट ले रही थी तभी मुक्तिबोध के साहित्यिक जीवन में एक और बड़ी दुर्घटना घटी। 1962 में उनकी पुस्तक भारत: इतिहास और संस्कृतिपर मध्यप्रदेश सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया। इस घटना ने मुक्तिबोध को बुरी तरह झकझोर दिया। चाँद का मुँह टेढ़ा है की इन पँक्तियों को देखना जरूरी है –
भयानक स्याह सन तिरपन का चाँद वह !!
गगन में कर्फ्यू है
धरती पर चुपचाप जहरीली छिः थूः है !!
पीपल के ख़ाली पड़े घोंसलों में पक्षियों के,
पैठे हैं ख़ाली हुए कारतूस।
गंजे-सिर चाँद की सँवलायी किरनों के जासूस
साम-सूम नगर में धीरे-धीरे घूम-घाम
नगर के कोनों के तिकोनों में छिपे हैं !!
चाँद की कनखियों की कोण-गामी किरनें
पीली-पीली रोशनी की, बिछाती हैं
अँधेरे में, पट्टियाँ।

 उन्हें अपने आस-पास हर ओर एक षड्यंत्र दिखाई पड़ने लगा। भयंकर असुरक्षा की भावना उन्हें घेरने लगी जिसके परिणामस्वरूप फरवरी 1964 में उन्हें पक्षाघात का झटका लगा। कई लेखक साथियों के अनुरोध पर सरकारी मदद से उन्हें नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती किया गया लेकिन उच्च चिकित्सा व्यवस्था भी उन्हें बचा न सकी। 11 सितंबर, 1964 को मुक्तिबोध को अपनी पीड़ा से छुटकारा मिल गया। कवि के जाने के बाद उनकी स्मृतियाँ और उसका परिवार समूचे परिदृश्य से या तो गायब रहता है या फिर प्रशासनिक दया पर निर्भर रहता है। उनको सामने लाने की कोशिश नहीं की जाती और इस क्रम में भावी पीढ़ी भी साहित्य से किनारा करती है। मुक्तिबोध की कविताओं में फिर भी उम्मीद जिंदा है मगर सच तो यही है कि हिन्दी का कवि हमेशा से अपने संघर्ष में अकेला ही रहता है, स्वीकृति मिलने के लिए उसे मुक्तिबोध की तरह मौत का इंतजार करना पड़ता है और यही हमारी हार है मगर हमें उम्मीद को मुक्तिबोध की तरह जिंदा रखना होगा -

हमारी हार का बदला चुकाने आयगा 

संकल्प-धर्मा चेतना का रक्तप्लावित स्वर, 

हमारे ही हृदय का गुप्त स्वर्णाक्षर 

प्रकट होकर विकट हो जायगा !! 


(हिन्दी मेले के अवसर पर प्रकाशित बुलेटिन में छपा आलेख)


गुरुवार, 10 नवंबर 2016

यह पाबंदी अर्थव्यवस्था के साथ ही हमारी आदतों को सुधारने जा रही है

सरकार ने आर्थिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए सशक्त कदम उठाया है। जाहिर है कि हर निर्णय की तरह इस निर्णय के भी इफेक्ट और साइड इफेक्ट हैं। फिलहाल साइड इफेक्ट तो आम आदमी पर पड़ रहा है और रोजमर्रा की जिंदगी थोड़ी मुश्किल हो रही है मगर इसका इफेक्ट या यूँ कहें कि इम्पैक्ट अच्छा ही होगा। बहुत बार विरोध सिर्फ विरोध के लिए होता है क्योंकि आप उस व्यक्ति को पसंद नहीं करते। इस मामले में भी काँग्रेस समेत अन्य दलों का विरोध भी कुछ ऐसा है। जब हम घर को नए सिरे से सजाते हैं तो तकलीफ होती है और यह तो पूरी अर्थव्यवस्था को फिर से सजाने जैसा है और इस फैसले के पीछे एक सटीक रणनीति है। परिवर्तन का परिणाम सकारात्मक या नकारात्मक हो सकता है मगर इस डर से बदलाव लाने की कोशिश ही न की जाए तो यह तो और भी गलत है। आप कतार में लगकर थक जाते हैं और अपनों की तकलीफ नहीं देखी जाती मगर आपको यह याद रखना चाहिए कि आपकी यह चिंता कुछ दिनों की है मगर यही बड़े नोट जब आतंकियों को ताकत देते हैं और सीमा पर हमारे जवान मारे जाते हैं तो उनके परिवारों के लिए यह जिंदगी भर का मातम होता है। सोशल मीडिया पर शहीदों को श्रद्धांजलि देना एक और बात है मगर बदलाव की प्रक्रिया में सक्रिय होकर हाथ बढ़ाना एक और बात है। आप फेसबुक पर सैनिकों का साथ देते हैं, बड़ी – बड़ी बातें करते हैं, आपको बदलाव चाहिए मगर बगैर किसी परेशानी के चाहिए, ये कैसे सम्भव है? लोग 15 लाख लाने की बातें करते हैं मगर ये काम सरकार को क्यों करना चाहिए? बगैर परिश्रम के आपके खाते में 15 लाख आते हैं तो यह क्या श्रम का अवमूल्यन नहीं है। इस पाबंदी के बहाने कई गरीबों ने खाते खोले हैं। काला धन रखने वालों की मुश्किल यही है कि अब तक जिन नौकरों और कर्मचारियों को पैर की जूती समझते थे, अब उनसे ही जबरन मुस्कराकर अदब से बात करनी पड़ रही है। अमीरों को झुकना रास नहीं आ रहा है। कतार में लगना उनकी शान के खिलाफ है। ममता दीदी को अगर उधार लेकर मिठाई खरीदनी पड़ी तो उनको खीझ नहीं होनी चाहिए क्योंकि वो तो माँ, माटी और मानुष की बात करती हैं तो उनकी खीझ से यह मान लें कि उनकी कथनी और करनी में अंतर है या फिर ये मान लें कि उनको ये चिंता सता रही है कि उनकी पेंटिंग कौन खरीदेगा और पार्टी फंड में पैसा कहाँ से आएगा? विरोधियों की चिंता का कारण भी यही है। इस पाबंदी का सामाजिक रूप से सकारात्मक पक्ष तो यही है कि ऊँच  - नीच का फर्क कुछ दिन के लिए ही सही कम होगा। 

आयकर की नजर होगी तो काले को सफेद बनाने के लिए जो भव्य धार्मिक प्रवचन होते हैं, उन पर लगाम लगेगी और इन पर लगाम लगने का मतलब बहुत हद तक अंधविश्वास और आसाराम बापुओं जैसों की कमाई पर लगाम लगना है। बैंक घाटे में चल रहे हैं और अब जिस तरह उन पर नोटों की बरसात हो रही है, उससे उम्मीद की जानी चाहिए कि बैंकों की स्थिति सुधरेगी और सरकार पर निर्भर होना कम होगा। अचानक सोने की माँग बढ़ रही है और साल में दूसरा धनतेरस मनाया जा रहा है। मंदिरों में बेकार नोट चढ़ाए जा रहे हैं। जिन्होंने रेलवे स्टेशन का चेहरा अरसे से नहीं देखा, अब वे रेलवे में टिकट आरक्षित करवा रहे हैं कि एक दिन में टिकटों की बिक्री 25 प्रतिशत बढ़ जाती है। एयरलाइंसों के अग्रिम टिकट खरीदे जा रहे हैं तो इसके सहारे सरकार भी ऐसे लोगों तक पहुँच रही है। पहली बात यह अचानक लिया गया निर्णय नहीं है क्योंकि इसकी तैयारी लगभग साल भर पहले  से हो रही थी। जो लोग निजी अस्पतालों में प्रतिबंधित नोटों को स्वीकारने की बात कर रहे हैं, उनको ये नहीं भूलना चाहिए कि ये अस्पताल वही कॉरपोरेट सेक्टर चलाता है जिनकी काली कमाई भरपूर है और टेबल के नीचे लेन – देन होते हैं। जानकारी देने का मतलब उनको सजग कर देना औऱ ऐसा होता तो इस मुहिम का ही कोई मतलब नहीं रह जाता। यही बात बैंकों पर भी लागू होती है क्योंकि बहुत से बैंक अपने ग्राहकों का काला धन सफेद करने में मददगार साबित हो सकते थे और अधिकतर निजी क्षेत्र के बैंकों में भी काली कमाई होने का अंदेशा है। विजय माल्या जैसे अरबपतियों की काली कमाई बेकार होगी। ऐसे लोग अगर बैंक जाते हैं तो भी कर चोरी के आरोप में जो 200 प्रतिशत राजस्व कर लगेगा, उससे सरकार की भी कमाई होगी। रिश्वत और भ्रष्टाचार, अनुदान या डोनेशन या फिर आतंकी कारर्वाई का साधन बड़े नोट ही हैं, इन पर भी प्रहार होगा। कॉरपोरेट कम्पनियों के कर्मचारी बैंकिंग प्रक्रिया से जोड़े जाएंगे क्योंकि कम्पनियाँ अब नोटों के झमेले में नहीं पड़ना चाहेंगी।
यह दल से ऊपर उठकर लिया गया फैसला है तो भाजपा के फंड पर भी असर पड़ना तय है तो यकीन मानिए कि छुपे तौर पर पीएम साहेब को तो उनकी पार्टी से ही गालियाँ पड़ रही होंगी। जरा सोचिए, कि कितने साल बाद आपने गुल्लक की शक्ल देखी और बचपन की आदत आपके काम आ रही है। अभिभावकों को यही सीख बच्चों को देने की जरूरत है। हाथ खोलकर बेकार के खर्चों से आप दूर हैं तो यह आपकी आदत सुधारेगा। न चाहते हुए भी अब आप प्लास्टिक मनी युग में प्रवेश कर रहे हैं। जो नए नोट आ रहे हैं, उनमें चिप भले न हो मगर आप पर नजर रखने का उसमें पूरा इंतजाम है। यह निर्णय उच्च मध्यवर्ग के अहं पर चोट करने वाला निर्णय है और यह पाबंदी अर्थव्यवस्था के साथ ही हमारी आदतों को सुधारने जा रही है तो जरा सब्र रखिए और परिर्वतन की प्रक्रिया से जुड़कर देखिए।

रविवार, 6 नवंबर 2016

कार्य के आधार पर सम्मान दीजिए, कला और संस्कृति के साथ देश भी सुरक्षित रहेगा

इस बार की छठ पूजा काफी खास थी, घर में भी पहले अर्घ्य पर बड़े दिनों बाद रही मगर इससे भी खास है अब इस पूजा को मिलने वाली स्वीकृति। बंगाल में  पिछले कुछ सालों से सेक्शनल छुट्टी होती थी मगर इस बार सचमुच अवकाश घोषित किया गया। स्वयंसेवी संस्थाएं  हमेशा ही सक्रिय रहती हैं मगर प्रशासनिक सहयोग भी बंगाल में मिल रहा है। सोशल मीडिया पर छठ पूजा की शुभकामनाएं अब और ज्यादा मिलने लगी हैं मगर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि छठ पूजा अब बिहार और उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रही और न ही सिर्फ भारत तक। अब यह सिर्फ बुजुर्गों तक भी सीमित नहीं हैै क्योंकि युवाओं को भी घाट पर दउरा उठाकर तस्वीरें पोस्ट करने में  हिचक नहीं दिखती। ये बताता है कि युवाओं को भी अपनी संस्कृति से भी उतना ही प्रेम है जितना पुरानी पीढ़ी को। अँग्रेजी और कॉन्वेंट में पढ़ा होना बाधा नहीं है। घाट पर, ट्रेन में और दूसरी जगहों पर खींची जाती तस्वीरें और छठ पर छुट्टी माँगने के लिए लगी कतारें बताती हैं कि शिक्षा संस्कृति से दूर नहीं करती, बशर्ते युवाओं को इस प्रक्रिया से जोड़ा जाए। एक अनुमान के अनुसार छठ पूजा का कारोबार 300 करोड़ रुपए का है और यह जिस तरह से फैल रहा है, और भी बड़ा होगा। विदेशों में हो रही छठ पूजा और छठ पूजा पर आते विदेशियों की बढ़ती तादाद ने इसे ताकत दी है और अब यह एक बड़ा कारण है कि बिहार और बिहारी दोनों मजबूत हुए हैं। हाल ही में शारदा सिन्हा द्वारा जारी छठ पूजा के वीडियो और इस पर की गयी मेहनत के कारण वीडियो जिस तरह से वायरल हो गयाा, वह इस स्वीकृति का सूचक है। छठ पूजा का होना जरूूरी है। छठ ही नहीं बल्कि कोई भी भारतीय त्योहार देखिए, आपको पता चलेगा कि यह आपको प्रकृति से जोड़ता हैै। चाहे वह होली के पलाश के फूल हों, दिवाली पर प्रकाश और स्वच्छता का संदेश हो या फिर जलाशयों और सूर्य के महत्व से अवगत करवाने वाली छठ पूजा है।
 छठ पूजा सामाजिक भेदभाव की जड़ता के विरुद्ध उद्घोष है। चार दिनों की पूजा और वहाँ पुरोहित की जरूरत नहीं पड़ती। एक ऐसा पर्व जहाँ डूबते सूरज को भी प्रणाम किया जाता हैै। एक ऐसा पर्व जहाँ गागर, सूप, और दउरा बनाने वालों की कला जीवित रहती है, सुथनी की जरूरत पड़ती है। जहाँ स्त्री और निखर उठती है और वह अकेली नहीं पड़ती।
अन्य व्रत एेसे हैं जहाँ सारा भार स्त्री पर पड़ता है मगर छठ ऐसा है जहाँ उसका भार उसका परिवार बाँटता है। अब समय के साथ छठ का संदेश और विस्तृत हो रहा है। नए लोकगीतों में बेटियों के लिए भी जगह है और इससे पारिवारिक बंधन औऱ मजबूत होंगे।
सांझ के देबई अरघिया, और किछु मांगियो जरूर,
पांचों पुत्र एक धिया (बेटी), धियवा मंगियो जरूर


या फिर रूनकी झुनकी बेटी मांगीला, पढ़ल पंडितवा दामाद
छठी मइया दर्शन दींही ना आपन. ( खेलती कूदती बेटी और पढ़ा लिखा दामाद चाहिए)

छठ समानता का संदेश देता हैै और अपनी संस्कृति का सम्मान करना आपको आत्मविश्वास देता है, इसे और मजबूत करना समय की माँग है। हाल ही में राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी ने बड़ी अच्छी बात कही। उन्होंने कहा कि आज पाश्चात्य सभ्यता के कारण हम अपने साहित्यकारों, संस्कृति और हस्तशिल्प का महत्व नहीं समझ रहे हैं, हमारे हीनता बोध का कारण यही है। आंचलिक भाषाएं और संस्कृति एकता का सशक्त माध्यम बन सकती हैं। आगे उन्होंने कहा कि व्यक्ति का सम्मान उसके कार्य के आधार पर होना चाहिए और सम्मान के साथ जब हम समानता देंगे तो कोई ताकत हमारे सामाजिक ढांचे को तोड़ नहीं सकती।

जिनको हम निचली जाति कहते हैं, जाहिर है कि वो जो काम करती हैं, हम नहीं कर सकते। अगर वे हमारा काम नहीं कर सकते उसी तरह हम मूर्तियाँ या कुल्हड़ नहीं बना सकते, हम सफाई नहीं कर सकते, हम जूते नहीं बना सकते, हम फसल नहीं उगा सकते, हम दउरा और सूप नहीं बना सकते, हम बरतन नहीं बना सकते, तो यही कार्य उनकी ताकत देता है। अगर हम अपने सम्मान देना सीखेंगे तो कोई वजह नहीं है कि ये कार्य करने वाले और उनकी संतानें अपनी कला को छोड़ें। वे आगे बढ़ें, जरूर बढ़े मगर उनकी कला उनकी ही नहीं हमारी भी धरोहर है, इसे सहेजना हम सबकी जिम्मेदारी है। कार्य को सम्मान दीजिए, कला और संस्कृति दोनों बचेगी और भारत बचेगा ही नहीं आगे भी बढ़ेगा। छठ का एक संदेेश यह भी है।