सोमवार, 26 जून 2017

हिन्दी पत्रकारिता के प्रोफेशनल जादूगर एस पी और खबरों की बेरहम दुनिया

- सुषमा त्रिपाठी

हिन्दी का कोई पत्रकार मीडिया के फलक पर तरह छाए कि चकाचौंध भरे इस समय में उसे भुलाया न जा सके,तो आज के समय में यह एक बड़ा आश्चर्य है,  एक बड़ी घटना है। दूरदर्शन के मेट्रो पर आज तक के प्रस्तोता के रूप में ही सुरेन्द्र प्रताप सिंह को देखा था और मेरी तरह न जाने कितने पत्रकारों का रिश्ता खबरों की दुनिया से जुड़ गया।
तब चैनलों की भीड़ नहीं थीं, दूरदर्एशन सरकार दर्शन अधिक लगता था, एेसे समय में एस पी का नाम और उनकी सच्चाई भरी सादगी पर हमारा भरोसा था और आज यह भरोसा आदर्श में बदल गया है, हालाँकि पुख्ता आदर्श जैसा शब्द अब शब्द जाल ही लगता है।

आज के समय में पत्रकारिता एक व्यवसाय है और ये एस पी ही थे जिन्होंने पहली बार अखबार को उद्योग माना था। वे पत्रकारिता में मिशनरी की बातें नहीं करते मगर ये जरूर मानते हैं कि पेशे के प्रति प्रतिबद्धता होनी जरूरी है। आज वे जीवित होते तो पत्रकारिता को धंधा बनाने की वकालत कभी नहीं करते। आज भी मेरी तरह अधिकतर लोग उनको आज तक के माध्यम से पहचानते हैं मगर सच तो यह है कि सुरेन्द्र प्रताप सिंह की एक अकादमिक और बौद्धिक पृष्ठभूमि थी जिसने उनको संवेदनशील बनाया और यही कारण है कि वे खबरों में मानवीय पक्ष को सामने रखने के हिमायती व पक्षकार बने। यही बौद्धिकता और विषयों पर गहरी पकड़ थी जिसने उनको धर्मयुग के प्रशिक्षु पत्रकार से रविवार के सम्पादक और आजतक जैसी सफलता दी मगर नवभारत टाइम्स को टाइम्स ऑफ इंडिया का हिन्दी संस्करण न बनने देने के लिए उन्होंने जो इस्तीफे का फैसला किया, वह जिद भी इसी संवेदनशीलता और आत्मीयता की देन थी जिससे एस पी चाहकर भी मुक्त नहीं हो सके। सच तो यह है कि मीडिया की चकाचौंध भरा इलेक्ट्रानिक माध्यम उनकी सीमा बना। अगर वे आजतक छोड़ देते तो शायद हमारे समय की पत्रकारिता का स्वरूप ही कुछ और होता। अगर जुड़े रहते और वही उर्जा दे पाते तो आज चैनलों में होने वाला एंकरिंग और टॉक शो के नाम पर होने वाला शोर शायद कम होता, एक दूसरे पर कीचड़ उछालने की परम्परा शायद थम जाती मगर ऐसा नहीं हुआ। वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी कहते हैं कि विजुअल मीडिया में खबरों को परोसने की वर्तमान सीमा से एस पी का कैनवस कहीं बड़ा था। इसलिए हर घटना के अनछुए पहलुओं को अगले दिन अखबारों में टटोलना और चाहते या न चाहते हुए भी किसी सम्पादक की तरह उस पर टिप्पणी करना उसकी निजी जरूरत तो थी ही, वह हर सहकर्मी को उसका अहसास भी कराते कि आज तक के मार्फत जो हो रहा है या वे जो कर रहे हैं, वह सम्पूर्ण नहीं है। उनकी अपनी कुलबुलाहट, अपनी बेचैनी भी कभी उस हद तक परवान चढ़ती कि उन्हें समाचार परोसने के विजुअल तरीके पर खीझ भी होती, उपहार अग्निकांड इस खीज का अंतिम सत्य साबित हुआ।‘आप एस पी के चेहरे को गौर से देखिए तो आज तक के दिनों में उनकी बेपरवाही नहीं दिखती, ऐसा लगता है कि कुछ है जिसे वो खोज रहे हैं, कुछ है जिसे शायद उन्होंने खो दिया है।
अगर आप एस पी के जीवन को गौर से देखे तो यह बात और भी पुख्ता रूप में साबित होती है। मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे एस पी एक प्रोफेसर हुआ करते थे। यारबाज, मददगार और जिज्ञासु होने के साथ पढ़ाकू भी थे मगर किताबी कीड़ा नहीं थे। गारुलिया जूट मिल हाई स्कूल में पढ़े एस पी के घर में माधुरी, दिनमान और धर्मयुग जैसी पत्रिकाएँ आती थीं। रेस देखने 40 किमी दूर कोलकाता जाते थे। कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर और एलएलबी और सुरेन्द्रनाथ कॉलेज से एलएलबी की पढ़ाई की, बैरकपुर राष्ट्रीय कॉलेज में व्याख्याता बने। अपने छात्रजीवन में सीपीआई के छात्र संगठन एआईएसएफ मे रहते हुए काँग्रेस के कद्दावर नेता प्रियरंजन दासमुंशी को उन्होंने हराया था। नक्सली हिंसा देखी। स्पष्टवादी आरम्भ से ही थे। टाइम्स ऑफ इंडिया समूह से जब साक्षात्कार के लिए बुलाया गया तो कह दिया कि इससे बेहतर नौकरी मिली तो वे छोड़ देंगे, क्योंकि मुझे पता नहीं था कि यहाँ नौकरी नहीं गुलामी करनी होगी। साक्षात्कार धर्मयुग के सख्त और अनुशासनप्रिय सम्पादक धर्मवीर भारती ने लिया था तो पत्रकारिता में पहली बार प्रवेश धर्मयुग में बतौर प्रशिक्षु पत्रकार ही हुआ मगर इस सख्त वातावरण को उन्होंने दोस्ताना बना दिया। फिर भी काम के प्रति गम्भीरता कम नहीं थी। कुछ दिनों के लिए माधुरी गए जरूर मगर फिर भारती जी ने बुला लिया। उनके सम्पादन में तटस्थता के लिए जगह थी और वे लेखकों को स्वतन्त्रता दिया करते थे। रविवार संजय गाँधी और इन्दिरा गाँधी के अंकों को जलाने के कारण चर्चा का विषय बना। सरकार विरोधी पत्रिका होने के कारण विज्ञापनों से वंचित होना पड़ा। संगीत के जबरदस्त शौकीन थे। 1991 के उत्तरार्ध में एस पी ने नवभारत टाइम्सछोड़ने के बाद 1992 में इंडिया टुडेमें एक कॉलम मतांतरनाम से शुरू किया, जो महत्वपूर्ण है। बाद में आजतककी शुरुआत करने के बाद फिर से उन्होंने इंडिया टुडेके लिए विचारार्थनाम से स्तंभ लिखा जिसका पहला आलेख 31 दिसंबर 1995 के अंक में मेहमान का पन्नानाम के स्तंभ में छपा था। विचारार्थ’ 30 अप्रैल 1996 तक ही चल पाया।

रविवार का महत्व वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय के इन शब्दों से पता चलता है - रविवार और संडे ने ही खोजी पत्रकारिता की नींव डाली। पहली बार हिन्दी में लिखने वाले पत्रकारों की बड़ी रिपोर्टें अँग्रेजी में न केवल छपीं बल्कि उन पर हंगामा भी हुआ।...हवा में तैरती घटनाओं को सूँघना और उन्हें बड़ी रिपोर्ट में तब्दील कर देना एस पी का अद्भुत गुण था। वहीं मनमोहन सरल कहते हैं कि सुरेन्द्र प्रताप सिंह इस विचार को प्रश्रय देते थे कि अखबार की लीड खबर के लिए भी लेखक बाहर से हायर किया जाना चाहिए। सम्पादकीय भी उसी से लिखवाया जाए, जो उस विषय का जानकार हो। यह एस पी की सम्पादकीय उदारता दिखाता है, आज के सम्पादकों के लिए यह उदारता बड़ी बात हो सकती है।
अगर बात मिशन से प्रोफेशन वाली हो तो पहले ही कहा जा चुका है कि एस पी पत्रकारिता को प्रोफेशन के रूप में देखते थे। एस पी ने एक बार कहा था कि हिन्दी पत्रकारिता में साहित्यकार ही मुख्यतः पत्रकार के रूप में सामने आए हैं, लेकिन यह एक तरह से पत्रकारिता का सौभाग्य था तो दुर्भाग्य भी था क्योंकि साहित्यकार लोग पत्रकारिता को हमेशा दूसरे दर्जे का काम मानते रहे और इस प्रकार अहसान की मुद्रा में पत्रकारिता करते रहे जबकि पत्रकारिता अपने आप में एक अलग और स्वतन्त्र विधा है जो कि लोगों से सीधे संवाद करने के लिए काम में लायी जाती है।...आज जो लोग आ रहे हैं, जरूरी नहीं कि अच्छे पत्रकार हों, अच्छे सम्पादक हों मगर कम से कम उनका कमिटमेंट बहुत साफ है। एक अच्छे पत्रकार को कुछ भी पढ़ते रहना चाहिए। विश्वसनीयता का सवाल आज उठ रहा है, हमेशा से उठता रहा है मगर अपने समय से आगे बढ़कर एस पी ने जो कहा, वह आज भी उतना ही बड़ा सच है, जितना पहले हुआ करता था। वे कहते हैं मेरे ख्याल से हमारी सबसे बड़ी चुनौती है – क्रेडिबिलिटी, (विश्वसनीयता)। आज पत्रकारों की क्रेडिबिलिटी बहुत संदिग्ध होती जा रही है। छोटे शहरों में आप जाएँगे तो आप पाएँगे कि अब पत्रकार की इमेज पुलिस वाली होती जा रही है। लोग पत्रकार से डरते हैं। सुबह – सुबह लोग पत्रकारों को देखकर घबराते हैं। तो चिन्ता का विषय है कि कैसे पत्रकार की क्रेडिबिलिटी वापस लायी जाए, कैसे वह पुलिस का पर्यायवाची न बने, कैसे पत्रकार अपनी पत्रकारिता के जरिए सत्ता में पहुँचकर अपना या दूसरों का काम न करवाएँ, कैसे पत्रकारिता खुद को प्रतिष्ठित करने का साधन न बने, कैसे सम्पादक लोग अखबार के जरिए पुरस्कार लेना, विदेश यात्राएँ करना, नौकरियाँ दिलाना, अपने लिए मकान बनाना, आउट ऑफ टर्न  कार अलॉट  कराना आदि न करें। एस पी पर आधारित पुस्तक शिला पर आखिरी अभिलेख लिखने वाले पत्रकार निर्मलेंदु कहते हैं कि एस पी ने बोलचाल और अपनी प्रकृति के अनुरूप हिन्दी का व्यवहार कर अँग्रेजी न जानने वाले हिन्दीभाषी को यह भरोसा दिलाया कि उसकी भाषा कोई गयी – गुजरी भाषा नहीं। एस पी हिन्दी के पहले पत्रकार और सम्पादक थे जिन्होंने अखबार को न केवल एक उद्योग के रूप में देखा, बल्कि पहचाना भी।


 अखबारों की एजेंसियों पर बढ़ती निर्भरता भी उनको नहीं रास आती थी। उन्होंने कहा कि बाकी दुनिया में जो भी अच्छे अखबार हैं, उनमें खबरें केवल होती हैं जो सचमुच खबरें होती हैं, बाकी चीजें या खबरें अखबार अपनी तरह से बनाकर देता है। हमारे यहाँ यह है कि एजेंसी जो तय कर दे, वही खबर बन जाती है। वे आगे कहते हैं कि - मैं यह नहीं कहता कि पत्रकार धार्मिक भावना से अछूता रहे, पर इतना जरूर सोचता हूँ कि पत्रकार को चाहिए कि इस भावना को दबाकर, समेट कर रखे। बस, इसका प्रचार अखबार के माध्यम से न करे। अगर आज का मीडिया ये बात समझ ले तो इस देश में आधी से अधिक हिंसा यूँ ही कम हो जाए। वो कहते हैं कि खबरें देते वक्त मानवीय पक्ष को ध्यान में रखना जरूरी है। सबसे पहले तो हम यह देखते हैं कि जो खबर हम दे रहे हैं, उसके पीछे उद्देश्य क्या है? हम इसे क्यों दे रहे हैं? इससे समाज का कुछ भला होने वाला है या नहीं।
विडम्बना यह रही है कि इतने दिग्गज पत्रकार ने खुद को वह बनाने की कोशिश की जो वो कभी नहीं थे और न हो सकते थे। टीआरपी के लिए जिस तरह की बेशर्म मानसिकता होनी चाहिए थी, वह खुद में नहीं ला सकते थे। वे टीआरपी के लिए अन्धविश्वास को बढ़ावा नहीं दे सकते थे और कुछ नहीं कर पाने की बेचैनी उपहारकांड की खबरों के दौरान उनके चेहरे पर देखी जा सकती थी...वह चेहरा आज भी परेशान करता है। अपनी प्रतिभा, बौद्धिकता, सम्पादकीय विश्लेषण शक्ति और खबरों से खेलने की आदत रखने वाले एस पी ने खुद को एक दायरे में कैद कर लिया था और शायद ऐसा करते समय उनमें घुटन भी रही होगी। उनके सहयोगी रह चुके पत्रकार उदयन शर्मा का कहना है कि आज तक के बाद उसने (एस पी) प्राइवेट पर्सन बनने का अप्राकृतिक प्रयास किया और तनाव के दुष्चक्र ने उसे दबोच लिया। आप एक खिलखिलाते इंसान के सिर पर रातों रात गम्भीरता का बोझा नहीं लाद सकते हैं। एक इमोशनल व्यक्ति को मशीनी पुर्जा नहीं बना सकते हैं। वहीं गोपाल शर्मा कहते हैं कि दिल्ली के माहौल ने उसे हमेशा –हमेशा के लिए चौकन्ना, चाक – चौबंद बना दिया था।...दरअसल चौबीसों घंटे चौकन्ना रहना और शंकाओं में रहना उसकी मृत्यु का कारण बना। शब्दों और खबरों के बाजीगर को कैद नहीं होना था, शायद उड़ान भर दी होती तो उनके साथ हिन्दी पत्रकारिता की उड़ान भी और ऊँची होती मगर उनको समझकर हम आगे की राह पर चल तो सकते ही हैं।


सन्दर्भ - शिला पर आख़िरी अभिलेख, सम्पादक - निर्मलेंदु)

शुक्रवार, 16 जून 2017

नेता नहीं, अनुगामी और बाउंसर बना रही है आज की छात्र राजनीति




छात्र अगर इस देश का भविष्य हैं तो छात्र राजनीति उस भविष्य की दिशा निर्धारित करती है। शिक्षा के क्षेत्र में पत्रकारिता करते हुए बहुत से छात्र नेताओं से पाला पड़ा है और कुछ अनुभव ऐसे हुए कि लगता है कि अब इस पर बात होनी चाहिए क्योंकि देश भर में और बंगाल में तो युवाओं पर सबसे अधिक प्रभाव इन छात्र नेताओं का पड़ता है। यही कारण है कि कोई भी राजननीतिक पार्टी लिंग्दोह कमिशन की सिफारिशें लागू करने में कतराती है मगर बंगाल की छात्र राजनीति उस हिंसक मोड़ पर आ चुकी है कि सत्ताधारी पार्टी को अपने ही छात्र संगठन की गतिविधियों को लेकर सोचना पड़ रहा है। हालत यह है कि खुद मुख्यमंत्री और शिक्षामंत्री भी छात्र संसद की जगह छात्र परिषद को लेकर गम्भीर हैं और सेंट जेवियर्स का मॉडल राज्य भर में लागू करना चाहते हैं। 
छात्र राजनीति ने देश को बड़े – बड़े नेता दिए हैं मगर तब और आज में अन्तर है, कहते हुए दुःख हो रहा है मगर अधिकतर छात्र नेताओं ने अपना गौरव, स्वाभिमान, ईमानदारी और साहस ताक पर रख दिया है, उनका सारा वक्त मीडिया को मैनेज करने में और पार्टी हाई कमान को खुश करने में बीत रहा है, वे अब गलतियों पर चुप्पी साधना सीख रहे हैं और भ्रष्टाचार तथा चापलूसी से बगैर किसी विचारधारा के अपना भविष्य बना रहे हैं। शिक्षामंत्री और मुख्यमंत्री का करीबी बन जाना, उनके काम करना और उनका माउथ पीस बनकर पत्रकारों से निपटना उनकी जरूरत और भविष्य की सीढ़ी बन गयी है। पिछले 14 साल में काम करते हुए कम से कम 8 -9 साल तो शिक्षा क्षेत्र की खबरें लिखी हैं और तकलीफ होती है कि यह सोचकर कि आज की छात्र राजनीति में विचारधारा और स्वतंत्र सत्ता का घनघोर अभाव है। पार्टी कमान की पुस्तक का अनुवाद, उनके गीतों का प्रचार और नकारात्मक खबरें करने से रोकना उनकी प्राथमिकता है और वे इसके लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।

 आन्दोलन के तरीके जबरन बात मनवाने और शिक्षकों से बदसलूकी पर उतर आए हैं, ऐसे में शिक्षण संस्थानों का भविष्य क्या होगा, यह सोचकर ही डर लग जाता है। हाल ही में एक छात्र नेता से मेरी मुलाकात हुई, फोन से बात होती थी मगर विद्यार्थियों की समस्या और रिक्त पड़े पदों को लेकर छात्र मनस्थिति जानने के लिए सम्पर्क किया, मिलने गयी, (बता दूँ कि यह उसका भी आग्रह था) मगर उससे मिलकर संकुचित व कुंठित सोच पर गुस्से से अधिक निराशा हुई, क्योंकि ऐसे ही लोग हमारे शिक्षण संस्थानों में प्रोफेसर बनेंगे, चाटुकारिता के दम पर तरक्की की सीढ़ियाँ चढ़ेंगे और हर उस समस्या को दबाएँगे जो उनकी पार्टी के खिलाफ जाती हो। इन छात्र नेताओं की पहुँच भी है और प्रभाव भी और पत्रकारिता के तथाकथित पहरेदारों की मेहरबानी से उनकी मानसिकता ये बन गयी है कि वे जब चाहे किसी भी रिपोर्टर या पत्रकार को खबर लिखने से रोक सकते हैं और पार्टी या अखबार के जरिए समस्या उठाने वाले अखबार का तबादला भी करवा सकते हैं।
 ये तमाम बातें उस दिन मुझे उस छात्र नेता से जानने को मिलीं जो उपरोक्त बातों को मेरे मामले में भी लागू करने का दावा करता था, मैंने उसकी पूरी बात सुनी, अपने संस्थान पर विश्वास था, फिर भी थोड़ी देर के लिए संशय हुआ जिसे मैंने कार्यालय आते ही दूर किया मगर ये अनुभव भी सिखाने वाला रहा, छात्र नेताओं की मानसिकता समय की मानसिकता भी बताती है। जब छात्र नेता विद्याथिर्यों की समस्याओं की जगह यह तय करने लगें कि कौन सा पत्रकार क्या लिखेगा, कितना लिखेगा, उसे किस तरह मैनेज किया जाए, कौन सा मसला उठाने नहीं देना है, कौन सा मुद्दा दबाना है, किस रिपोर्टर को देख लेनेऔर किसका तबादला करवाने की जरूरत है, तो ये खतरनाक संकेत हैं। यह छात्र नेता भी बडबोलेपन का मारा था जो एक पत्रकार के सामने दूसरे पत्रकार को मैनेज करने की बात कर रहा था, बगैर यह समझे कि नेता आते – जाते रहते हैं, सरकारें भी आती – जाती रहती हैं, पत्रकार हमेशा पत्रकार ही रहता है और उनमें एकता भी होती है। मैं कह नहीं सकती पर क्या पता, वो मुझे भी मैनेज करना चाहता था ताकि डींग हांक सके कि उसने तीर मार लिया है मगर उसे निराशा हाथ लगी है। क्यों नहीं छात्र नेता मैनेज करने से अधिक जरूरी चीजों पर ध्यान देते हैं? हालांकि तसल्ली मिली मगर उस वक्त मुझे समस्या की गहराई का एहसास हुआ और यही वजह है कि सालों बाद मुझे लग रहा है कि इस पर बात होनी जरूरी है। 

 हमारे विश्वविद्यालय में एक प्रोफेसर हैं जो छात्र राजनीति करते – करते ही प्रोफेसर बने हैं और उनकी छात्रा रह चुकी हूँ इसलिए अब सोचकर ही डर जाती हूँ कि क्या शिक्षण संस्थान पार्टी मुख्यालय बनकर रह जाएँगे जहाँ वीसी से लेकर शिक्षक तक सब सहमे रहेंगे। मुझे याद आता है कि वह किस कदर सवाल करने वालों का माखौल उड़ाया करते थे और उसे हतोत्साहित करने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ते थे। आज भी उनकी हर बात में कुँठा ही नजर आती है जो दूसरों के आगे बढ़ने से परेशान होता है। मेरी मुलाकात जिससे हुई, वह इन दिनों साहित्य लेकर एक वरिष्ठ कवि को लेकर शोध कर रहा है इसलिए पीड़ा अधिक हुई क्योंकि साहित्य पढ़कर भी गरिमा और संवेदना आपके व्यवहार और आचरण में न आए तो आपका साहित्य पढ़ना और शिक्षक बनना बेकार है। आप चापलूसी करके ऊँचा पद पा सकते हैं, अनुगामी पा सकते हैं मगर नेता नहीं बन सकते क्योंकि सच्चा नेता वैचारिक तौर पर स्वतंत्र होता है, उसकी विचारधारा में विरोधाभास नहीं होता है, उसका व्यक्तित्व मैनेज करने में विश्वास नहीं रखता और न ही समस्या को दबाने में, न ही अपनी ताकत दिखाने में उसे यकीन है। 
आपकी आँखें हमेशा नीची और जुबान बंद रहेगी, आपका इस्तेमाल वोटबैंक बढ़ाने और बड़े नेताओं की रैलियों में भीड़ बढ़ाने के लिए होगा। आप आज हैं, कल रहेंगे या नहीं, इसका विश्वास आपको भी नहीं है, हर समय असुरक्षा में जीना, तोड़ –फोड़ करना आपकी नियति है। ये समझने के लिए आत्मसम्मान की जरूरत पड़ती है मगर आज के छात्र नेताओं में इसका नितांत अभाव है, वे अधजल गगरी, छलकत जाए की कहावत, सार्थक करते हैं। देश भर के विश्वविद्यालयों में जिस तरह मार – काट चल रही है, छात्र संसद चुनाव को जिस तरह युद्ध बना दिया गया है, वह छात्र नेताओं और छात्र राजनीति की पराजय है। छात्र नेताओं को अगर तरक्की मिले भी या वे कितने भी बड़े नेता हो जाएँ, उनका काम न अब तक बदला है और न ही बदलने की सम्भावना है, वे अधिक से अधिक बाउंसर बन सकते हैं, विपक्षी नेताओं को धक्के मारना, धक्का – मुक्की करना, रैलियों की भीड़ बढ़ाना और सदन से बाहर कर देना और विपक्ष में हों तो सदन से वॉकआउट करके नायाब तरीकों से प्रदर्शन करना, उनकी नियति बस यही है।

 छात्र राजनीति आज नेता नहीं अनुगामी और बाउंसर बनाती है। जहाँ तक हिन्दी भाषी छात्र नेताओं की स्थिति है तो बंगाल में उनकी स्थिति में अधिक बदलाव नहीं आया। तृणमूल को जब पहली बार सत्ता मिली तो बहुत से वामपंथी छात्र नेताओं ने एसएफआई का साथ छोड़ा और टीएमसीपी में आ गए क्योंकि यहाँ मूल्यों का मामला ही नहीं था, सिर्फ अवसरवादिता का सहारा लेकर आगे बढ़ने की चाह थी। आज बंगाल की छात्र राजनीति में एक भी ऐसा हिन्दीभाषी नेता नहीं है, जिससे उम्मीदें जुड़ सकें। सच तो यह है कि किसी भी राजनीतिक पार्टी में हिन्दी भाषी छात्र नेता बेहद कम हैं और जो हैं, उनकी राजनीतिक यात्रा और बौद्धिक ऊँचाई नौकरी पाने तक सीमित रहती है। ये लोग हर जगह हाजिरी बजाते हैं। ये वामपंथी हैं या सत्ता के साथ, समझ में नहीं आता, वे जाते हैं क्योंकि उनको नौकरी बचानी है। एक सच यह भी है कि बंगाल में पार्टियाँ हिन्दीभाषियों को पत्ता नहीं देतीं, बंगाल से छात्र राजनीति कर शीर्ष स्तर पर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाले हिन्दीभाषी छात्र नेता न के बराबर हैं।
 इसका कारण यह है वे आगे बढ़ने के लिए हद से ज्यादा झुकते हैं और चाटुकारिता को साधन बनाते हैं। इतने सालों में काम करते हुए तमाम विरोधों के बावजूद किसी ने इतने खुले तौर पर पत्रकारों और मीडिया को मैनेज करने की बात नहीं कही थी मगर आज छात्र राजनीति छिछले स्तर पर आ गयी है, इसका पता मुझे इस मुलाकात में हो गया। आज जितनी गुटबाजी होती है, उतनी 10 साल पहले नहीं थी और थी भी तो उसे सामने नहीं आने दिया जाता था। आज किसी प्रकार का सृजनात्मक काम बहुत कम हो गया है, सरस्वती पूजा में भी पार्टी विभाजन है। सीयू के दो द्वार पर दो छात्र संगठनों की पूजा और उसमें भी एक के कार्यक्रम में हद दर्जे की अश्लीलता नजर आती है। जिससे मुलाकात हुई, वह भी अन्ध अनुगामी ही है जिसके पास अपनी सोच नहीं है। अन्य छात्र संगठनों में भी विरोध के नाम पर धरना और प्रदर्शन ही होता है और दिक्कत यह है कि इसके पीछे शिक्षक भी हैं या यूँ कहें कि वे इसे प्रोत्साहित ही कर रहे हैं। सीयू के वीसी के टेबल पर जब एक शिक्षक संगठन की अध्यक्ष हाथ पटककर धमकी भरे अन्दाज में बात करती है तो वह अपनी गरिमा खो बैठती है, भूल जाती है कि वह एक शिक्षिका है। जेयू में जब दीक्षांत समारोह स्थल के बाहर छात्र राज्यपाल के खिलाफ अपशब्द लिखते हैं और पास ही धरना दे रहे शिक्षक समारोह का बहिष्कार कर बाहर जमे रहते हैं तो उनको सोचना होगा कि वे भावी पीढ़ी को कौन सी दिशा दिखा रहे हैं। सोचना पड़ रहा है, जो सिर उठाकर चलना भूल गए, क्या वे अपनी संतानों और विद्यार्थियों को ईमानदारी और स्वाभिमान का पाठ पढ़ा सकेंगे। अगर पढ़ाएंगे भी तो क्या अपना सामना कर सकेंगे, आने वाली पीढ़ी की आँखों में आँखें डालकर अपनी बात कह सकेंगे, क्या उनको सच कहना, अडिग रहना सिखा सकेंगे....लगता तो नहीं है।

 आज विधान सभा से लेकर लोकसभा में भी नेता नहीं बल्कि बाउंसर हैं तो इसकी वजह यही है कि संड़ाध पेड़ की जड़ में घुस गयी है। शिक्षक खुद दो खेमों में बँटे हैं, वह कौन सी राह नयी पीढ़ी को दिखाएँगे, यह सोचने वाली बात है क्योंकि सेमिनारों में और अपने आयोजनों में उनको छात्र नेताओं की जरूरत रहती है, उनमें खुद भय समाया है। आज कोई भी शिक्षक प्रिंसिपल नहीं बनना चाहता, छात्र राजनीति में विरोध के तरीके ताला लगाने, शिक्षकों को पीटने, वीसी का कॉलर पकड़ने और वीसी को ओलेक्स पर बेचने तक सीमित रह गयी है। मुझे याद आता है जब कूटा के विरोध प्रदर्शन में दिवंगत दिव्येंदु पाल दा को किस कदर पीटा गया था, उनके कपड़े तक फाड़ डाले गए थे। कोई भी शिक्षक इस पूरे कृत्य के विरोध में नहीं आया। मैं प्रदर्शनकारी डरे – सहमे शिक्षकों के चेहरे नहीं भुला पाती। सच तो यह है कि छात्र और कुछ हद तक शिक्षक राजनीति का वतर्मान परिदृश्य नेतृत्व के सही मायने ही नहीं समझता, वह सिर्फ अपने हितों की रक्षा तक सिमट कर रह गया है। आज की छात्र राजनीति नेता नहीं बनाती, वह या तो अनुगामी बनाती है या बाउंसर.....पत्रकारों को मैनेज करने वाले मित्रों और भाइयों, तुम चाहे जितनी भी ऊँचाई छू लो, तुम्हारी नियति भी यही है।

बुधवार, 14 जून 2017

मन्त्री जी का अनशन



-        सुषमा त्रिपाठी
फलकपुर में बड़ी हलचल थी..आज जिले के डीएम के पास जाना था...सरपंच जी आकर सब किसानों को कह गए थे, अबकी रैली में भीड़ करनी थी। प्रजातंत्र का हाथ पार्टी के जिलाध्यक्ष हुक्काम सिंह की जीप भी हरिया के खेतों के बीच से खड़ी फसल को रौंदती हुई रैली का प्रचार करती गुजर गयी थी। हरिया को भी सरपंच साहेब का धमकी भरा अनुरोध मिल गया था और आज तो सांझ को सारे छोटे – बड़े किसानों को बुलाया भी था।
कड़ी धूप में काम करते हुए हरिया हलकान था, खेत से घर दूर था....भागो के लिए कितने दिन से बाजार से साड़ी लेने का मन बनाया था मगर जीप से कुचली फसल को जब भी देखता...आह भरकर बैठ जाता। 4 दिन से कुछ खाया नहीं था, ऊपर से ये बवाल, फसल मंडी तक जाए नहीं तो घर कैसे चले। घर में अन्न का एक दाना न बचा था और साहूकार था कि उधार देने को तैयार न था। पेड़ की छाव के नीचे पसरे हरिया के माथे से पसीना पानी बनकर बह आया था....आदमी 2 दिन भूखा रहे तो चल भी जाए मगर घर में बच्चों के पेट में तो अन्न डालना ही था...भागो की फटी साड़ी देखकर मन भर आता मगर मन बेजार था। सरपंच जी ने कहा था कि प्रजातन्त्र पार्टी से हुक्काम सिंह किसानों को राहत में राशन देंगे और आन्दोलन जम गया तो सरकार भी मुआवजा देगी, बस इस बार किसानों को साथ देना होगा जमके।
समझ में बात तो आ गयी मगर भूखे पेट भजन कैसे होए। भूखे पेट अंतड़ियाँ मरोड़ मार रही थी...रहा न गया तो बोल पड़ा...सरपंच साहेब, उ सब तो ठीक है मगर 4 दिन से अन्न का दाना घर नहीं गया। बच्चे बिलबिला रहे हैं, पेट ही न भरे तो आन्दोलन कैसे करे। मंडी में अनाज ले जाते हैं तो ट्रक रोक देते हैं और आग भी लगा देते हैं...आप लोग बड़े हो. दो – चार बोरी इधर से उधर हो तो भी फरक नहीं पड़ेगा...हमारा गुजारा तो मुस्किल है।
सरपंच साहब के बदन में आग लग गयी....चुनाव का मौसम न होता तो अब तक भगा देते मगर प्रजातन्त्र पार्टी का कमिशन आड़े आ गया। उस पर सरकार की पार्टी के अध्यक्ष भी मिलकर गए थे, गोटी फिक्स हो गयी तो विधायकी का टिकट पक्का था और जीतने के लिए किसानों का साथ जरूरी था...सरपंच रिस्क नहीं ले सकते थे...आँखों के सामने बैनर घूम रहा था...बड़ा सा लहरदार...हल थामे मूँछों पर ताव देते....उफ! क्या जचूँगा....ख्वाहिश ने दिमाग के गर्म पानी पर ठंडक डाल दी...बोले...बिन लड़े ही सुख राज चाहते हो....इ आन्दोलन क्या अपना घर भरने के लिए हो रहा है, प्रदेश का हाल जानते हो, अखबार पढ़ते...बोलते – बोलते याद आया...अनपढ़ हरिया अखबार कैसे पढ़ेगा...रुके। तुम खाली अपने पेट की सोचो...अपने और भाइयों के बारे में सोचा करो...जानते हो, किसानों की जिन्दगी बन जाएगी...जिन्दगी...अरे...दूसरे प्रदेश में सरकार कर्जामाफी की है....हमारे यहाँ काहे नहीं करेगी...सब मिले हैं हरिया और जब तक तुम सब न लड़ोगे कैसे होगा। सरपंच साहब के गोदाम में अनाज की कमी नहीं थी, एक बोरा दे देते तो कुछ बिगड़ता नहीं मगर अनाज जमा करके रखेंगे, तभी तो आसमान के भाव में बेचेंगे...बेटे महेन्द्र ने एक कार देखी है, जिद किए बैठा है...इसी अनाज से तो दाम निकलेंगे।
हरिया की समझ में इतनी मोटी – मोटी बातें नहीं आतीं। उसकी आँखों के सामने भागो की फटी साड़ी और हड्डी सी काया लिए बच्चों का सूखा, उदास चेहरा घूम रहा था। मन तो था कि सरपंच के मुँह पर मुक्का मारकर अभी निकल जाए मगर सरपंच ने रैली में जाने पर 500 रुपए, नारे लगाने पर 700 रुपए, अनाज ट्रक से गिराने पर 1000 रुपए और पथराव करने पर 1500 रुपए देने की बात कही थी, खाना – पीना अलग से मिलता और शहर घूमना भी हो जाता...1500 रुपए में तो घर का खर्चा कुछ दिन तो चल जाएगा। गोली लगी तो सरकार मुआवजा देगी....सुना 10 -20 लाख रुपए देती है और घायल होने पर भी 5 लाख मिल जाते हैं। ऊपर से कर्जमाफी हो गयी तो खेती बच जाए।
हरिया तड़प उठा – इतने पैसे मिले तो बच्चों का जीवन सुधर जाए। सरीर का क्या है, एक दिन माटी में ही तो मिलना है। दूसरा कोई रास्ता नहीं. गिड़गिड़ाते बोला – सरपंच साहेब..तब तो थोड़ा राशन देते तो मदद हो जाती...घर में 4 दिन से अन्न का दाना नहीं है। सरपंच साहब को किसानों को मैनेज करना था...5 किलो चावल, 5 किलो अरहर की दाल दे दी...रैली में आ जाना वरना खाया – पीया निकल जाएगा। हरिया वहाँ से निकला।
गाँव में सब किसान गरीब नहीं थे। सरपंच साहब की ही कई बीघा जमीन और ट्रैक्टर थे मगर उनकी तरह हर किसान की पहुँच नहीं थी, फसल  के भाव बराबर नहीं मिलते थे। चौपाल के टेलिविजन पर दूरदर्शन चलता था और किसानों के हँसते चेहरे और भारी – भारी बातें सुनकर हरिया सोच में पड़ जाता....ये सब उसके गाँव तक क्यों नहीं पहुँचता। उसके बगल में रहने वाले रामबालक पर ऐसा कर्जा चढ़ा कि बिचारे ने फंदा लगा लिया। घरवाली को बाहर काम करने नहीं दे सकता था और बेटी की शादी के लिए कर्जा लेना पड़ा। 30 हजार लिए थे, सूद सहित 50 हजार हो गए...लेनदार रोज घर में धमक देते और गालियाँ सुनाकर जाते। एक दिन थक गया और मौत में मुक्ति पा ली। ऐसा नहीं था गाँव में सरकार के अधिकारी नहीं आते थे, मगर मुट्ठी गरम करने के लिए पैसे कहाँ थे...सुना है कि किसानों के लिए कई योजनाएँ भी हैं...अपने गाँव में तो एक भी नहीं दिखती। जिले के मुख्यालय में फटेहाल किसानों को जाने की मंजूरी नहीं मिलती और मन्त्री जी गाँव तक आते नहीं। एक बार जिले तक भी गया था हरिया...दरवान ने ऐसा दुरदुराया कि फिर हिम्मत न पड़ी। खेत में काम कर पसीना बहाने वाला किसान सैम्पू – साबुन का खर्च कहाँ से उठाए। साबुन शहर से लाता भी तो सोने के गहने की तरह छुपाता...एक टिकिया कम से कम 3 महीने तो चले। कर्जा तो हरिया ने भी लिया था मगर रकम अभी इतनी बड़ी नहीं थी मगर भूख बढ़ती जा रही थी। गाँव के स्कूल में टाट पर बैठाकर बच्चों को पढ़ाते...बेटा सूरज कुछ दिन गया...मगर खेत में हाथ बँटाने वाला कोई न था, पढ़ाई छूट गयी।
21 को रैली थी..मई का महीना...झुलसाने वाली धूप। हरिया तैयार था। शहर तक जाना था...गाँव के पार हुक्काम सिंह ने मैटाडोर भेजी थी। उसकी तरह बहुत से हलवाहे थे...खेतों की फसल को हसरत भरी निगाह से देखते मैटाडोर में बैठ गए..गाँव को जी भर के देखा...क्या पता कल क्या हो?
राजधानी की सीमा पर उतार दिया गया, यहाँ से पैदल जाना था। पुलिस तैनात थी और हाथ में माइक, पेन और कैमरा लिए कुछ लोग भी थे...राम जाने कौन है। हरिया को ट्रक में से अनाज फेंकना था...मन कैसा तो हो रहा था...मर – मर के अनाज उगाया है...कैसे फेके...हाथ काँप रहे थे..मगर आँख के सामने भूखा परिवार और 1000 रुपए के गर्म नोट नाच गए....दुर्बल हो गया था, जोर लगाना पड़ा मगर किसी तरह गिरा दिया.....सड़क को सुनहरा करता गेहूँ बिखर गया था.....हरिया के मन में ख्याल आया...इसमें से थोड़ा अनाज उसके सूरज को मिल जाता...कम से कम पेट तो भरता। अब बारी दूध गिराने की थी...1000 रुपए अतिरिक्त....टैंकर गाड़ी के किनारे पर लाया...सामने फुट पर एक नंगे बच्चे पर नजर पड़ी। हरिया काँप गया...धीरे से पास में रखा गिलास निकाला...पानी पीने के लिए लाया था...उसमें थोड़ा दूध निकाला...चुपके से बच्चे को दिया...जी कड़ा किया और दूध का टैंकर पलट दिया। बच्चे के मुँह पर दूध की छींटे पड़ीं....कैमरों की रोशनी उजली सड़क पर तैर गयी। एक रिपोर्टर आया....कुछ मुँह में घुसा कर बोला...आप किसान हैं, इतना अन्न बर्बाद करते तकलीफ नहीं हुई। बवाल बढ़ गया था...पुलिस का लाउडस्पीकर गूँज रहा था...पुलिस वापस लौटने को कह रही थी...वहीं हुक्काम सिंह की आवाज भी एक साथ गूँज रही थी....भाइयों, वापस मत लौटना....हमको कर्जामाफी चाहिए...हरिया घबराकर पीछे हटा, रिपोर्टर पीछे दौड़ा....दो – चार और पीछे हाथ में पैड और मोबाइल लिए आ गए...कैमरे की चकाचौध से हरिया डर के भागा...तब तक किसी ने पुलिस पर पथराव कर दिया...हरिया बेतहाशा भाग रहा था...पाँव के नीचे गेहूँ, चावल, सब्जी, दूध सब आ रहे थे मगर उसे खबर नहीं थी....गोली चल गयी थी....कहाँ हरिया 10 – 20 लाख की सोच रहा था, कहाँ अब उसके पैर नहीं रुक रहे थे। उसके साथ आए मँगरु को गोली लगी थी...खून से लथपथ मँगरु सड़क पर कराह रहा था....पानी – पानी करते –करते प्राण छूटे। प्रजातन्त्र पार्टी के बड़े नेता का सिर फूटा था...हरिया ने देखा...उनके लिए स्ट्रेचर, पुलिस सब जुट गए...ये किसानों के लिए आन्दोलन है...हरिया बुदबुदाया...। गोलीकांड में 3 किसान मारे गए...हरिया ने देखा...पुलिस के बड़े अधिकारी ने बयान दिया कि गोली पुलिस ने नहीं चलायी। प्रशासन सकते में था, डीएम नहीं जानते थे कि बात इतनी बढ़ जाएगी...ऊपर तक खबर नहीं की थी...फोन लगाया....कृषि मन्त्री जी से बात करवा दीजिए....आवाज आयी...साहब व्यस्त हैं, योग दिवस की तैयारी कर रहे हैं। डीएम अखिलेश चौधरी परेशान थे...इधर हुक्काम सिंह और किसान नेता हरिहर चौधरी मीडिया के सामने मुख्यमंत्री को ललकार रहे थे....मुख्यमंत्री को जवाब देना होगा। कर्जमाफी कीजिए...किसान हलकान है...आन्दोलन चल रहा था। हरिया जम गया था...चाय और नाश्ता मिला तो जान में जान आयी...टीवी पर नजर गयी...4 लोग चिल्ला रहे थे, इतने में उसकी नजर एक चेहरे पर पड़ी...अरे...ये तो अपने सरपंच साहेब हैं...टीवी पर, एक रिपोर्टर आया...कुछ कहेंगे...अब हरिया का डर कम हो गया था, भागा नहीं...कहिए...सरपंच साहब को दिखाया और बोला....उनको पहचानते...रिपोर्टर लापरवाही से बोला...हाँ किसान नेता हैं, हरिया बोल पड़ा...उ हे तो हम सबको लाए हैं.....। रिपोर्टर के हाथ में ब्रेकिंग न्यूज लग गयी थी...हमारे साथ स्टूडियो चलिए...एंकर ने किसान नेता लाने को कहा था..काम बन गया आज के शो का। तभी टीवी पर प्रदेश के मन्त्री और मुख्यमंत्री की तस्वीर नजर आयी...शांति बनाने की अपील के साथ विपक्ष को लताड़ती हुई तस्वीर।
डीएम चाहते थे कि कोई भी मन्त्री एक बार इलाके में लोगों को समझा दे..तो मन्त्री साहब को डर था कि आन्दोलन का गुस्सा उन पर न निकल पड़े। शहर में जाम और अनाज की बर्बादी...अच्छा मसाला था मगर सरकार परेशान थी....चुनाव का गणित बिगड़ सकता था...आखिर समाधान मुख्यमंत्री भोलेनाथ ठाकुर ने निकाला....अनशन! अनशन करूँगा.....शहर के लीला मैदान में बैठूँगा...जब तक किसान भाई नहीं मानते...तब तक अनशन होगा। भारतवासी पार्टी के समर्थक तैयारी में जुट गए...मैदान में आनन – फानन में सफाई हुई, एसी...कूलर लगने लगा...तम्बू बिछे...कुर्सियाँ लगीं....डीएम साहेब निलंबित किए जा चुके थे।
अनशन की खबर प्रजातंत्र पार्टी को लगी....सीएम तो सब फुटेज खा जाएँगे....सामने कौन आए...सबकी नजर हुक्काम सिंह पर गयी....यहाँ भी अनशन....किसान नेता अनशन करेंगे किसानों के लिए...सरकार को झुकना होगा।
वहीं हरिया रिपोर्टर के साथ स्टूडियो में आ गया था, या यूँ कहें ला दिया गया था....उसे तरीके के कपड़े पहनाए गए....खाना खिलाया गया...बहस में उसे कुछ नहीं करना होता था...बस चुप रहना होता था...जहाँ बोलता...सारे बुद्धिजीवी...मन्त्री, नेता और गोरी वाली मेम साब बोलती...उसका चेहरा दिखने लगा था...चलते समय कुछ रुपए दिए गए...1000 रुपए। उसे एयर कंडिशन में रखना जरूरी था...कैमरे के सामने प्रेजेंटेबल दिखना जरूरी था, इसलिए वह 4 दिन स्टूडियो में सुरक्षाकमिर्यों के पास ठहरा दिया गया था।
मुख्य मन्त्री जी का अनशन शुरू हो गया था....कैमरों की नजर सीएम साहब के चेहरे पर जमी थी। मुख्यमन्त्री जी ने भरे गले से किसानों से आन्दोलन वापस लेने की अपील की, हर सम्भव सहायता करने का आश्वासन दिया। हरिया का मन भर आया....इतना बड़ा आदमी भूखा है....भूख तो गरीबों के लिए है।
काम हो गया था...स्टूडियो से वह बाहर निकल गया था...गाँव की खुली हवा में रहने वालों को एसी से कितने दिन मतलब रहे। भटकता – भटकता लीला मैदान के पास चला गया....सब परेशान...मुख्यमंत्री न खाए तो बाकी मन्त्री कैसे खाए...अनशन तो तुड़वाना भी होगा....हरिया बाहर बैठा सोच रहा था कि गाँव कैसे जाए....वहाँ चिन्ता हो रही थी कि किसानों से कैसे बुलवाया जाए कि मन्त्री जी अनशन खत्म कर दें। तभी भारतवासी पार्टी के युवा नेता बकबक सिंह की नजर हरिया पर पड़ी...टीवी पर उसने हरिया को देखा था.....अब हरिया ही एकमात्र सहारा था....अब हरिया की ड्यूटी यहाँ थी...2 हजार रुपए मिले....नये कपड़े....मुख्यमंत्री जी के पास ऐसे थोड़े न ले जाया जा सकता था। कैमरे फिर जमा हुए....अबकी हरिया ने मुख्यमंत्री से आन्दोलन वापस लेने की अपील की, उसी आन्दोलन की, जहाँ वह कुछ दिन पहले हरिया मोहरा था....मुख्यमंत्री जी मान गए...हरिया ने नींबू का शरबत पिलवाकर मुख्यमंत्री जी का अनशन तुड़वाया, मुख्यमंत्री जी ने गले लगाया...। अब 3 हजार रुपए आ गए थे...भागो की साड़ी ले सकेगा...भूखे दूध पीते बच्चे का चेहरा नाच गया....सब उसकी दुआ है..।

वहीं दूसरी ओर सरपंच साहब हरिया पर गरमा गए थे...पाँव की जूती मुकाबले में आ गया था...किसान नेता बन गया था...वे हुक्काम सिंह के साथ अनशन पर बैठ गए थे....मगर मुख्यमंत्री का अनशन तुड़वाकर हरिया बाजी मार गया था....जेब में 3 हजार रुपए, भागो की साड़ी...बीज..सूरज का स्कूल....सब हरिया के चेहरे के सामने थे....टीवी के परदे पर आने वाला किसान नेता बन गया था.....भारतवासी पार्टी का चेहरा...हरिया जीरो से हीरो बन गया था....आन्दोलन टूट रहा था...किसान घर लौट रहे थे....मन्त्री जी का अनशन भी खत्म हो गया था।

शुक्रवार, 9 जून 2017

सरकार सुधरे मगर हमें भी मुफ्तखोरी छोड़नी होगी, तभी बचेंगे किसान


मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के बाद किसान आन्दोलन की आग पंजाब और राजस्थान तक पहुँच रही है। किसान हमारे लिए मौसम हैं, अन्नदाता, हर अखबार, हर मीडिया, हर ब्लॉग, जहाँ देखिए अन्नदाता को श्रद्धा अर्पित की जा रही है। सोशल मीडिया पर आँसू बहाए जा रहे हैं, तमिलनाडु के किसान जब जंतर मंतर में धरना दे रहे थे, तब भी बहाए जा रहे थे, आगे भी बहाए जाते रहेंगे। सरकार को घेरने वालों को एक मुद्दा मिल गया है, बाकी सब कुछ ज्वलनशील बनाना तो उनके बाएँ हाथ का खेल है। दरअसल, समस्या की जड़ कहीं और नहीं हमारे भीतर है। जस्टिन बीबर के शो पर 100 करोड़ खर्च करने वाला यह देश, 76 हजार रुपए में एक टिकट खरीदने वाले हम शहरी, शिक्षित, सभ्य, सम्भ्रांत और बुद्धिजीवी जब पहले तो फुटपाथ पर फल और सब्जियाँ बेचने वालों से तो कुछ खरीदते नहीं हैं, खरीदते हैं तो 18 रुपए किलो प्याज को 5 रुपए में खरीदते हैं, दूध का भाव 1 रुपए लीटर भी बढ़ गया तो आन्दोलन से लेकर  आगजनी करते हैं और फिर किसान को उसकी फसल की लागत नहीं मिलती तो छाती पीटते हैं। हर गृहिणी या गृह स्वामी जब आधे से कम दम दरों पर राशन खरीद कर लाता है तो उसे विजेता घोषित कर दिया जाता है और बेचने वाले गरीब खलनायक घोषित कर दिए जाते हैं। सारे देश में सब्जियाँ, फल, अनाज और दूध पानी के भाव बिक रही हैं मगर उनको खरीद कौन रहा है, हम और आप। कहने का मतलब यह है कि कोई मजबूरी में ऐसा कर रहा है तो हम और आप उसकी मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं। आपकी पार्टियों में जो फल आते हैं, आप होटलों में जो खरीद रहे हैं और मेहमानों को दिखा रहे हैं, यह अमेरिका का सेब, फ्रांस का अँगूर और न जाने क्या क्या...जो 700  रुपए का एक तो आप उसी समय अपने अन्नदाता को मौत के मुँह में धकेल रहे होते हैं। अधिकतर लोग जब गाँवों से सब्जी या कोई भी सामान इसलिए खरीदते हैं क्योंकि यह आपको पानी के भाव मिलता है। सबसे बड़े खरीददार हम हैं और खपत की मात्रा हम पर निर्भर करती है तो किसानों को सरकार से ज्यादा किसी की जरूरत है तो हमारी है। वो हम तक नहीं आ पाते, हम तो उन तक जा ही सकते हैं। सरकार नहीं खरीदती तो हम खरीदें, सप्ताह में या महीने में एक बार अगर किसी कॉम्पेल्क्स या कालोनी के लोग आस पास के किसानों से सामूहिक तौर पर खरीददारी करें तो बिचौलियों की जरूरत ही न पड़े मगर तय कीजिए कि आप 18 रुपए किलों का आलू 3 रुपए किलो में खरीदने की हसरत नहीं पालेंगे। किसान किसी सरकार से नहीं हारा है, वह हमसे और आपसे हारा है। क्या हर औद्योगिक संस्था सीएसआर के तहत किसानों के लिए कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था नहीं कर सकती या एक मंडी उनके लिए नहीं बनायी जा सकती।


 अगर सरकार किसानों को बचाने के लिए कुछ नहीं करती तो क्या हमें उनको मरने के लिए छोड़ देना चाहिए? अगर किसानों से सचमुच प्यार है तो जब भी सब्जी खरीदें, मोलभाव न करें, यह मुश्किल है मगर सोशल मीडिया पर आँसू बहाने से अच्छा है कि कुछ मेहनत खुद की जाए। आश्र्चर्य होता है कि हमारे प्रधानमंत्री लंदन और म्यामांर पर आँसू बहाते हैं मगर भूमिपुत्रों के लिए एक शब्द उनके मुँह से नहीं निकलता। आपने किसानों की आय दुगनी करने का वायदा किया मगर इसके लिए कोई रोडमैप था? कोशिश की जानी चाहिए थी कि हमारे यहाँ से निर्यात बढ़े, आयात हो तो वह भी सशर्त हो। अगर आप दाल ला रहे हैं तो सामने वाले देश से सुनिश्चित करें कि वह भी हमारे यहाँ खाद्यान और सब्जियाँ खरीदें। मैं खेती के बारे में अधिक नहीं जानती मगर जो पढ़ा है, उसके हिसाब से यह तो कह ही सकती हूँ कि दिक्कत अतिरिक्त उत्पादन में नहीं बल्कि वितरण, विपणन और निर्यात प्रणाली में है। हमारे यहाँ जो भी औद्योगिक विकास होता है, उसमें कृषि को वरीयता मिलनी चाहिए और इस लिहाज से आयुर्वेद और खाद्य प्रसंस्करण समेत कृषि को प्रोत्साहित करने वाले तमाम उद्योगों को विशेष सुविधाएँ दी जानी चाहिए। सौ बात की एक बात, खपत होगी और हम पानी के भाव पर खरीददारी की हसरत त्यागेंगे तो माँग के अनुसार उत्पादन होगा और उसका फायदा किसानों को होगा। बिचौलियों को बीच से हटाने की जरूरत है इसलिए जैसा कि बंगाल में हुआ है, देश में ब्लॉक स्तर पर मंडी बनाने की जरूरत है। किसानों को फसल की कीमत खुद तय करने दीजिए और जरूरत पड़े तो कीमतें तय  करने के लिए एक स्वायत्त संस्था गठित कीजिए जिसमें किसानों के प्रतिनिधि हों और वे किसी भी राजनीतिक दल से न हों। उनके लिए खेती का कम से कम 15 वर्ष का अनुभव अनिवार्य हो। गलती प्रशासन की भी है, अगर दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री आरम्भ में ही किसानों के पास जाते तो हालात बेकाबू होते ही नहीं। किसानों के कुछ प्रतिनिधियों से बात करने से बेहतर था कि इलाके में जाकर खुद उनकी बात सुनते। मुफ्तखोरी किसी भी समस्या का इलाज नहीं है और न ही कर्जमाफी से बात बनेगी। मनमोहन सिंह की सरकार ने भी कर्जमाफी की थी, चुनाव हार गयी। क्या ये बेहतर नहीं होगा कि कर्जमाफी की जगह किसानों को ही सक्षम बनाया जाए कि उनको इस बैसाखी की जरूरत ही न पड़े। जल संचयन के उन्नत तरीके खोजे जाएँ तो अकाल में भी फसल सुरक्षित रहेगी। किसानों के लिए कृषि पाठशाला हो। स्कूली और कॉलेज स्तर पर पाठ्यक्रम में कृषि एक विषय हो जिसमें किसान से लेकर, कृषि के प्राकृतिक व आधुनिक तरीकों, कृषि के इतिहास, बीज, खाद, वितरण व विपणन प्रणाली, कृषि ऐप से लेकर उपकरण से लेकर दूसरे देशों की कृषि व्यवस्था से संबंधित समसामायिक अध्ययन हो। इस पाठ्यक्रम के तहत एक पेपर ऐसा हो जिसमें कम से कम 6 माह गाँवों में विद्यार्थी गुजारे। इससे युवा पीढ़ी कृषि का महत्व समझेगी, रोजगार सृजन होगा क्योंकि गाँवों से जुड़ना वहाँ के लोगों को रोजगार देने के लिए जरूरी है। कृषि तकनीक देश में विकसित हों। इस देश में कम्प्यूटर और सॉफ्टवेयर इंजीनियर की तरह एग्रीकल्चर इंजीनियर और एग्रीकल्चर डॉक्टर्स की जरूरत है जो फसल को कीटों से बचाने और उसे बेहतर बनाने में मदद करें। काँग्रेस से लेकर भाजपा तक, कर्जमाफी चुनावी हथियार ही अधिक रहा है मगर अर्थव्यवस्था पर इसका प्रतिकूल प्रभाव ही पड़ता है। आरबीआई के गर्वनर उर्जित पटेल ने रेपो रेट को यथावत रखने की जानकारी दी और यह भी कहा कि "मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के प्रस्ताव में कहा गया है कि अगर बड़े पैमाने पर किसानों के ऋण माफ किए गए तो इससे वित्तीय घाटा बढ़ने का खतरा है।" उन्होंने कहा कि जब तक राज्यों के बजट में वित्तीय घाटा सहने की क्षमता नहीं आ जाती, तब तक किसानों के ऋण माफ करने से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह पिछले 2-3 साल में हुए वित्तीय लाभ को घटा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि वित्तीय घाटा बढ़ने से जल्द ही महंगाई भी बढ़ने लगेगी। पटेल ने कहा कि पहले भी देखा गया है कि किसानों के ऋण माफ करने से महंगाई बढ़ी है। उन्होंने कहा, "इसलिए हमें बेहद सावधानी से कदम रखने चाहिए, इससे पहले कि स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाए।" अगर खजाना ही खाली हो गया तो अन्नदाताओं की मदद कैसे होगी, यह भी सोचने वाली बात है। अब बात आन्दोलन पर, तो इसका समय और तरीका अपने आप में संदेहजनक है। दोनों भाजपा शासित राज्यों में एक साथ आन्दोलन का उग्र होना और कई मामलों में फल, सब्जियों और दूध को जबरन बहाया जाना इसे दिशाभ्रमित करता है, जिसका समर्थन कतई नहीं किया जा सकता। बसों में आग लगाना, सरकारी इमारतें और वाहन फूँकना, क्या इससे समस्या का समाधान निकलेगा? लगभग 780 करोड़ रुपए से अधिक की फल और सब्जियाँ नष्ट की जा चुकी हैं। निश्चित तौर पर सरकार और प्रशासनिक स्तर पर खामियाँ हुई हैं, किसानों पर गोली चलाने का समर्थन कतई नहीं किया जा सकता मगर सवाल यह उठता है कि किसानों को अपनी बात रखने के लिए किसी राजनीतिक पार्टी की जरूरत क्यों पड़े? वह  क्यों खुद को इस्तेमाल होने दे रहे हैं। यह छुपी हुई बात नहीं है कि मध्यप्रदेश में काँग्रेस और महाराष्ट्र में शिवसेना ने मुख्य रूप से आग में घी डालने का काम किया है मगर इससे नुकसान किसे हो रहा है। 


अगर आप सोचते हैं कि फल, सब्जी अनाज और दूध फेंकना ही आन्दोलन है तो आपको अन्नदाता कहा ही नहीं जाना चाहिए क्योंकि ये सब कुछ किसानों का ही है, आज अगर फसल मंडी में फसल नहीं जा पा रही है तो उससे जो क्षति होगी वह किसानों की होगी, वहाँ जो मरेंगे, किसान ही मरेंगे। किसानों की समस्या सरकार ही नहीं बल्कि हमारी अपनी सोच, कमजोरी और आत्मकेन्द्रित मानसिकता के कारण ही है इसलिए अगर किसानों की मदद ही करनी है तो मुफ्तखोरी पहले हमें ही छोड़नी होगी।


सोमवार, 5 जून 2017

दीदी, आपके राज्य में हिन्दी माध्यम विद्यालय उपेक्षित बच्चे हैं



प्रधानमन्त्री मोदी की तरह दीदी भी इन दिनों मूड में हैं....प्रधानमंत्री जी रेडियो पर चौपाल जमाते हैं  और दीदी? वह तो जहाँ जा रही हैं, चौपाल वहीं बैठ जा रही है। कभी डॉक्टरों की, कभी प्रोफेसरों की, कभी प्रिंसिपलों की तो कभी अधिकारियों के बाद हाल में शोधार्थियों की क्लास लगा दे रही हैं और हर क्लास का अपना कनेक्शन है। ये ध्यान देने वाली बात है कि दीदी की क्लास में अधिकतर दीदी बोलती हैं, बाकी लोग सुनते हैं, यदा – कदा बोलते भी हैं तो डरते हुए बोलते हैं। गलती से एक या दो शब्द भी इधर – उधर हो जाए तो बस वहीं झाड़ पड़ जाएगी..पता नहीं क्या – क्या सुनना पड़ जाए। दीदी राजनीतिक निष्पक्षता की कायल हैं, शिक्षण संस्थानों में राजनीतिक भाषण सुनाया जाए उनको गवारा नहीं है मगर उनके हर मन्त्री के कार्यालय और शिक्षण संस्थानों के यूनियन रूम में दीदी की तस्वीर होनी ही चाहिए। दीदी कहती हैं कि शिक्षण संस्थानों में किसी राजनेता का राजनीतिक भाषण नहीं सुनाया जाना चाहिए (वैसे कहा जा रहा है कि शायद वह भाषण मन की बात जैसा कार्यक्रम था) मगर उनकी रैलियों में जो युवा जाते हैं, उनको कान में रुई लगाकर जानी चाहिए, ये सलाह नहीं दी गयी। जिस तरह दुनिया गोल है और जहाज को उड़ा पंछी जहाज पर वापस आता है, उसी तरह दीदी सौहार्द और गुणवत्ता के साथ बांग्ला को विश्व बांग्ला की चाहे जितनी भी बातें कर लें मगर सब्जी में नमक की तरह मोदी, भाजपा, आरएसएस, माकपा और काँग्रेस के जिक्र के बगैर फंड का रोना और केन्द्र को कोसना जारी रहता है और वही बच्चे भी सुनते हैं। कई बार तो कक्षाओं से शिक्षक भी इन रैलियों में नजर आते हैं, तथाकथित स्वशासित विश्वविद्यालयों के वाइस चांसलरों से लेकर स्वायत्त कहे जाने वाले राज्य शिक्षा परिषदों के शीर्ष अधिकारी भी रहते हैं। अब पार्थ बाबू भले ही शिक्षण संस्थानों को गैर राजनीतिक बनाने की कितनी ही बातें करें मगर ऐसे माहौल में राजनीति से दूरी कैसे होगी, वही जानें। जिस प्रकार किसी भी शुभ काम की शुरुआत गणेश वन्दना के साथ होती है, उसी प्रकार उनके मन्त्री, मन्त्री ही नहीं, किसी स्वायत्त शिक्षा परिषद के नतीजों की घोषणा या फिर किसी विश्वविद्यालय का कोई भी काम दीदी वन्दना के साथ आरम्भ होता है जबकि उनका कोई राजनीतिक कनेक्शन  दूर तक नहीं होता, यह बीमारी पूरे देश में है। ऐसे में सीधे कहिए न कि आपकी पार्टी का भाषण ही रहेगा, किसी और की नहीं वरना क्या जरूरत है कि शिक्षामंत्री विश्वविद्यालय में अपनी पार्टी की छात्र यूनियन के साथ बैठक करें। 
दीदी ने निजी स्कूलों के साथ बैठक की जिनमें मध्यम वर्गीय या उच्च वर्गों या यूँ कहें कि मंत्रियों,अधिकारियों और कारोबारियों के बच्चे पढ़ते हैं, दीदी को सबकी खबर मिलती रहती है, मतलब ये कि अँग्रेजीदाँ, क्रीमी लेयर जमात इन स्कूलों में ही तैयार होती है। इन तमाम स्कूलों संरचना और सुविधाओं की कमी नहीं है, फीस आसमान छू रही है, अभिभावक परेशान हैं, अच्छा किया। आपने क्लास ले ली मगर इनसे स्कूलों में फीस कहाँ कम हुई या कहाँ तक होगी, यह सोचने वाली बात है। आपने कहा कि आप चाहती हैं कि बंगाल की प्रतिभा और बढ़े। इसके लिए हमने(सरकार) ने एक सेल्फ रेगुलेटरी कमिशन गठित करने का फैसला किया है। कमिशन में शिक्षा विभाग, पुलिस व महानगर के शैक्षणिक संस्थानों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। कमिशन फी ट्रक्चर की निगरानी करेगा। हर जिले से एक प्रतिनिधि कमिशन में होगा। आपने शिक्षण संस्थानों को अपनी वेबसाइट शुरू करने का परामर्श देते हुए कहा कि इसके माध्यम से अभिभावक अपनी शिकायतें दर्ज कर सकेंगे। अब क्या आपको पता नहीं है कि हर सम्पन्न स्कूल अपनी आय का अधिकतर हिस्सा वेबसाइट पर ही खर्च करते हैं जो उनके प्रचार का महत्वपूर्ण अंग है। आपने फीस नियंत्रित करने के लिए कमिशन बनाया और इसमें इन स्कूलों के ही लोग हैं, माने अपराधी भी वही होंगे और फैसला भी वही सुनाएँगे। इस पर उम्मीद यह है कि बदलाव होगा, खुद को धोखा देना है। आपको अँग्रेजी माध्यम स्कूलों पर इतना भरोसा है कि आप सेल्फ रेग्यूलेटरी कमिशन बनाती हैं, इतना भरोसा हिन्दी माध्यम स्कूलों पर क्यों नहीं है? आपकी बैठक में फीस पर बात हुई और अभिभावकों की ओर से एक भी प्रतिनिधि नहीं था। 

वे स्कूल वेबसाइट पर इतना खर्च करते हैं, जितने में एक बेचारा सरकारी हिन्दी माध्यम स्कूल कई महीनों के लिए अपना खर्च निकाल लेता है। इन स्कूलों के पास चमचमाती इमारतें नहीं हैं, अधिकतर स्कूल किराए के मकानों में चलते हैं और यही वजह है कि कई लोकप्रिय हिन्दी माध्यम स्कूल उच्च माध्यमिक का दर्जा नहीं पा सके हैं। दीदी आप स्कूलों के विस्तार की बात कर रही हैं मगर इन हिन्दी माध्यम स्कूलों को कई बीघे जमीन नहीं चाहिए, आप पास की कोई इमारत दे देंगी तो भी हर स्कूल की क्षमता दुगनी हो जाएगी। मैंने जिन कॉलेजों (स्पेशल ऑनर्स किया है, इसलिए 2 कॉलेज हैं) से स्नातक और बाद में ऑनर्स किया, वहाँ पढ़ाई से लेकर गतिविधियाँ और प्रोफेसर सब बहुत अच्छे हैं, मगर उनको आधारभूत संरचना के अभाव के कारण उनको नैक का अच्छा ग्रेड नहीं मिल सकता। अधिकतर स्कूलों में शिक्षकों के पद खाली हैं, आपको स्वच्छ भारत से एलर्जी है मगर निर्मल बांग्ला अभियान के तहत भी न तो सुरक्षा कर्मियों के पद हैं और न सफाई कर्मियों के, स्कूल स्वच्छ कैसे रहेंगे? बेंचें हैं तो टूटी हुई हैं, बच्चे उड़ती रेत पर बैठकर मिड डे मिल खाते हैं। जिस पृष्ठभूमि के साथ ये बच्चे इन स्कूलों में आते हैं, उनके पास साफ –सुथरे कपड़े नहीं होते, पूरा साल बीतने को होता है तो किताबें मिलती हैं और जो किताबें मिलती हैं, वो बांग्ला किताबों का घटिया अनुवाद भर होती हैं। इन स्कूलों की संचालन समितियों में जो शिक्षक हैं, वह अभी आपकी पार्टी के समर्थक हैं, जब माकपा की थी, तो उनके समर्थक हुआ करते थे। कहने का मतलब यह है कि हिन्दी माध्यम स्कूलों के शिक्षक और प्रशासकों की कोई विचारधारा नहीं होती, वे बस विचारधारा की बातें करते हैं, उनकी विचारधारा सत्ता के अनुसार बदलती रहती है। वे शिकायतें करते हैं मगर कभी नहीं चाहते कि उनका नाम मीडिया में आए। वे कभी रैलियाँ नहीं करते, घेराव नहीं करते, हम जैसे पत्रकार जब कहते हैं कि शिक्षक जब तक नहीं बोलते तो समस्याएँ कैसे सुधरेंगी तो शिक्षक कहते हैं कि बस चल रहा है, क्या करेंगे...तकलीफ इस बात की है उनमें तड़प नहीं है, दीदी, ये सब आपके हाथ में हैं इसलिए आप इन स्कूलों, शिक्षकों और बच्चों को लेकर निश्चित हैं, आप जानती हैं कि मतदाताओं का बड़ा वोट बैंक सुरक्षित है। 

आप इनके साथ शायद बैठक कर भी लें मगर यह तो तय है कि यहाँ अदालत भी आप होंगी और जज भी। इन स्कूलों से टॉपर कभी नहीं निकलते और निकलेंगे भी नहीं। पता नहीं कैसे इस बार आदर्श मेधासूची में चौथे स्थान पर आ गया, आ गया क्योंकि वह जिस स्कूल में है, वह भी इस शहर के नामचीन स्कूलों में है और उसका नाम और साक्षात्कार भी स्थानीय मीडिया के लिए करेले के जूस की तरह था, नाम लेना था मगर परहेज के साथ। उच्च माध्यमिक शिक्षा परिषद में तमाम भाषाओं के शीर्ष अंक पाने वालों के नाम बताए गए मगर हिन्दी में अव्वल कौन रहा, यह हम नहीं जान सके। अध्यक्षा महोदया को हिन्दी में दिलचस्पी नहीं थी। इन स्कूलों से विद्रोह तो दूर, किसी भी सरकार के खिलाफ विरोध की आवाज तक नहीं निकलेगी। बैठकों में सत्ता को गाली देने वाले लोग सरकारी जनप्रतिनिधियों के स्वागत में पलक – पाँवड़े बिछाए रहेंगे, मीडिया कुछ लिखे तो गुजारिश करेंगे कि उनका नाम उनके ही बयान में नहीं आए और कल्पना करेंगे कि यह सूरत बदले मगर उनको सीरत बदलने की जरूरत नहीं पड़े। आप यह कमजोरी जानती हैं और हर पार्टी जानती है इसलिए आपकी पार्टी जीतेगी, आपकी सरकार बनेगी मगर हिन्दी माध्यम स्कूलों की हालत कभी नहीं बदलेगी। दीदी, इस राज्य में जब सब बराबर है तो आपकी त्रिभाषा नीति हर किसी पर बराबर रूप से लागू क्यों नहीं हो सकती? निजी स्कूलों में वह बोर्ड परीक्षाओं पर लागू नहीं होगा, सिर्फ स्कूली स्तर पर लागू होगा जबकि इन स्कूलों के पास न साधन की कमी है और सिखाने के तरीकों की, शिक्षकों की कमी भी नहीं होगी मगर जो हिन्दी माध्यम स्कूल 240 रुपए की फीस में अपनी स्कूल चला रहे हैं, जिनको लकड़ी की पट्टी लगाकर कक्षाएँ अलग करनी पड़ रही हैं, जिनके पास पहले से ही शिक्षक नहीं हैं, उनको आपकी त्रिभाषा नीति अपनानी पड़ेगी, क्या इसके लिए संरचना है? मगर सीख जाएँगे क्योंकि हिन्दी माध्यम स्कूलों में भी तो बांग्ला के माध्यम से विषय पढ़ाए जा रहे हैं। अब सवाल यह कि हिन्दी माध्यम स्कूलों को रवीन्द्रनाथ को पढ़ने से कोई आपत्ति नहीं है मगर क्या बांग्ला माध्यम सरकारी स्कूलों में प्रसाद, निराला, महादेवी वर्मा, निर्मल वर्मा को बोर्ड परीक्षाओं तक पढ़ाया जाएगा? अगर हाँ, तो यह स्वागत योग्य है और नहीं तो यह एकतरफा फैसला क्योंआप हिन्दी का स्वागत करती हैं और आपकी बैठक में हिन्दी माध्यम स्कूल का एक भी प्रतिनिधि नहीं होता। होता भी है तो उसकी बात नहीं सुनी जाती। लगभग हर प्रशासनिक बैठक में हिन्दीभाषियों की उपस्थिति न के बराबर है। उनकी जुबान खुलती भी है तो आपकी प्रशस्ति के लिए। 
आपको लगता है कि क्रीमी लेयर वाले 5 -10 प्रतिशत स्कूलों के प्रतिनिधि, मालिक और प्रिंसिपल पूरे हिन्दी समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं तो ऐसा नहीं है। सरकारी बांग्ला माध्यम स्कूलों को जितना अनुदान मिलता है, उसका आधा भी हिन्दी माध्यम स्कूलों को मिले तो उनको जीवनदान मिल जाए। दरअसल इस राज्य में हिन्दी, हिन्दी भाषी और हिन्दी माध्यम दूसरे दर्जे के नागरिक हैं और महज वोट बैंक हैं। हिन्दी माध्यम स्कूल इस राज्य में किसी उपेक्षित बच्चे की तरह हैं। दीदी ने अस्पतालों की क्लास ली और फर्जी डॉक्टर राज्य भर से ऐसे धराए जाने लगे। मतलब बिहार और बंगाल की दोस्ती यहाँ भी सलामत है, वहाँ टॉपर फर्जी, यहाँ डॉक्टर फर्जी, हिसाब – किताब बराबर। इस राज्य के 12 हजार से अधिक स्कूलों में लाखों विद्यार्थी आते हैं और इसमें एक बड़ा हिस्सा हिन्दी माध्यम में पढ़ने वाले बच्चों का है, वे फीस देते हैं, आपकी बातें सुनते है क्योंकि सुनने के सिवाय वे कुछ भी नहीं कर सकते क्योंकि जो दोयम दर्जे के हैं, वे फैसले नहीं सुना सकते। इन स्कूलों से कभी टॉपर नहीं निकलेंगे, चाटुकार निकलेंगे मगर नेता नहीं निकलेंगे, आप सुरक्षित हैं।





नैन्सी महज एक घटना नहीं, तमाचा है


हम बेहद क्रूर समय में जी रहे हैं। क्रूर ही नहीं बल्कि वीभत्स और संवेदनहीन कहना शायद ज्यादा सही है। इस पर संवेदनहीनता के तार जब परिवार से जुड़ने लगते हैं तो स्थिति और खतरनाक हो जाती है मगर बात सिर्फ पारिवारिक रंजिश तक नहीं है बल्कि यह यह सवाल हमारे सामाजिक ढाँचे पर भी खड़ा होता है। बिहार की नैन्सी झा की बर्बर हत्या महज न्याय व्यवस्था पर ही नहीं बल्कि हमारी सामाजिक व्यवस्था पर भी करारा तमाचा है। जिस देश में बच्चे सुरक्षित नहीं हैं, उस देश के भविष्य का अच्छा होना महज मिथक है और कुछ नहीं। 12 साल की नैन्सी डीएम बनना चाहती थी मगर उसके सपने नोंच लिए गए। पारिवारिक रंजिश में हत्या होना कोई नयी बात नहीं हैं, उत्तर भारत और पूर्वी भारत में तो इसे बेहद सामान्य तरीके से लिया जाता है मगर नैन्सी के साथ जो हुआ, वह आपको अन्दर से हिला डालने के लिए काफी है। नैन्सी का परिवार सदमे में है, माँ खामोश है और पिता अन्दर से टूट गए हैं मगर परिवार ही नहीं, उस बच्ची के साथ हुई क्रूरता से पूरी मानवता सदमे में हैं। नैन्सी को मार डाला गया क्योंकि हत्यारे उसकी बुआ की शादी रोकना चाहते थे। नैन्सी के दादा सत्येंद्र झा का कहना है कि नैन्सी का अपहरण पड़ोस के पवन कुमार झा और उसके साथी लल्लू झा ने किया था मगर बाधा डालने के लिए अपहरण करने के बाद शादी रुक जाती तो नैन्सी को छोड़ा जा सकता था। बच्ची के शरीर पर तेजाब फेंकना उसकी नसें काटना राक्षसी प्रवृति के अलावा कुछ और नहीं है। 6 साल पहले छेड़खानी करने पर पवन को पीटा गया था और कहा जा रहा है कि पवन ने बदला लेने के लिए ऐसा किया मगर इससे भी खतरनाक है व्यवस्था का सही समय पर नहीं जागना। पुलिस अगर समय पर कार्रवाई करती तो शायद नैन्सी को बचाया जा सकता था। ऐसा क्यों है कि आजकल हर घटना पर कार्रवाई के लिए सोशल मीडिया पर होने वाली क्रांति का इंतजार किया जा रहा है, जब तक सोशल मीडिया पर वायरल न हो, न तो मीडिया जाग रहा है, न कानून और न व्यवस्था। सरकार के तीन साल पूरे होने का जश्न मना रहे चैनलों के लिए यह आम बात है, कोई मुद्दा नहीं। सवाल बिहार की शराबबंदी को लेकर भी है क्योंकि बताया जाता है पवन को जब पकड़ा गया था तो वह नशे में धुत था। परिजनों के अनुसार पुलिस ने पवन को आधे घंटे के भीतर छोड़ दिया। बहरहाल मामले में एसआईटी गठित हो गयी है मगर इतना काफी नहीं है। हालांकि पुलिस इस मामले में दुष्कर्म और तेजाब फेंकने की बातों को खारिज कर रही है मगर नैन्सी का शव जिस हालत में मिला है, वह एक सवाल तो खड़ा करता है। नैन्सी का मामला सामने आ गया मगर सोचिए ऐसे कितने बच्चे होंगे, जिनके साथ ऐसा कुछ होता है तो भी सामने नहीं आता। नैन्सी महज एक घटना नहीं, एक तमाचा है, हमारी व्यवस्था पर, हमारी संवेदना पर और हमारे समाज पर, जिसमें क्रूरता का लुत्फ उठाने की प्रवृति बढ़ रही है लगातार।