भाषाई लोकतंत्र का नेतृत्व तो हिन्दी को ही करना है
हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं देते हुए याद दिलाना चाहती हूँ कि अब दुकानों के बोर्ड बांग्ला में लिखना अनिवार्य कर दिया गया है। कहने का मतलब यह है कि आप किसी भी भाषा के हों, बांग्ला में ही लिखना होगा। यह अनिवार्य पहले भी था हिन्दी व अंग्रेजी के साथ बांग्ला लिखी जाती थी। उन इलाकों में जहां बांग्ला ही बोली जाती है, वहां पर यह समझ में आता है मगर जहाँ हिन्दीभाषी ही अधिक हों...वहाँ इस नियम का क्या अर्थ है, समझ के बाहर है। बंगाल सरकार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलना़डु समेत तमाम हिन्दी के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हिन्दी विद्वेषियों से पूछना चाहती हूँ कि अगर आप पर हिन्दी थोपना गलत है तो आपके राज्यों में जो हो रहा है, वह सही है। क्या सारे अधिकार क्षेत्रीयता के आधार पर निर्धारित होंगे..जब आप सिर्फ अपने राज्य की बात करते हैं तो कहीं न कहीं अपने राज्य के विस्तार को संकुचित कर रहे होते हैं। क्या आपके राज्यों में सिर्फ आपकी भाषा बोलने वाले लोग ही रहते हैं या फिर ऐसा है क्या कि वह राजस्व नहीं भरते। बंगाल का सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियां गिनवा रहा है. इस संदर्भ में, मैं यह बताना चाहूंगी कि 2011 से हमने राज्य मे...