सोमवार, 13 जून 2016

अपने हिस्से की दुनिया तलाशतीं - वाह! ये औरतें


सुषमा त्रिपाठी


इंसान चला जाए, अपनी गलियों को अपने भीतर सहेजे रखता है और बाहर की दुनिया में भी अपने हिस्से का कोना तलाश लेता है। लेखिका माधवीश्री के उपन्यास में नायिका के चरित्र में यह कोना नजर आता है। मां को समर्पित यह उपन्यास कल्पना पर आधारित हैं मगर लेखिका माधवी श्री के मुताबिक ही इसमें सभी कुछ कल्पना नहीं है।

लेखिका के अनुसार उपन्यास कोलकाता में लिखा गया था मगर इसे पढ़ने पर आपको आने वाले कल की औरतें दिखती हैं जो उनके जेहन में कहीं छुपी थीं और वक्त आते ही उपन्यास की शक्ल में जिंदा हो उठीं। 
http://wtf.forkcdn.com/www/delivery/lg.php?bannerid=600&campaignid=152&zoneid=1261&loc=http%3A%2F%2Fhindi.webdunia.com%2Fhindi-books-review%2Fbook-review-116060800060_1.html&referer=http%3A%2F%2Fhindi.webdunia.com%2Fliterature&cb=600c078964वाह ये औरतें, तीन सहेलियों की कहानी है। ऐसी औरतें जो हम अपने आसपास देखते हैं मगर उनके अंदर का विद्रोह अनदेखा रह जाता है। चरित्र को नैतिकता के पलड़े पर न तोलकर सिर्फ उसे एक मानवीय पहलू से देखा जाए तो बात समझ में आती है। रमा उस कामकाजी औरत का चेहरा है जो सोशल गैदरिंग में खुशमिजाज और आत्मनिर्भर होने का दावा करती है और अपने टूटेपन को आत्मविश्वास के सहारे जोड़ने की कोशिश करती है। उमा लेखिका है, जो स्त्री विमर्श की बातें करने वाली आधुनिक स्त्री है। पूनम है, जो गृहस्थी की दुनिया में खुद को झोंक देने वाली और अमीर घर की महिला है जो परिवार की भव्यता को अपने कीमती कपड़ों और जेवरों के माध्यम से दिखाती है।
इन तीनों की कोशिश एक ही है, अपनीअपनी दुनिया के कठघरों से अलग-अपने हिस्से का कोना तलाशना, जहां कोई बंधन न हो और जो हंसी निकले, भीतर की चट्टानों को तोड़कर निकले। एक ऐसी ख्वाहिश, जो लड़की से औरत बनी और अकेले रहने वाली हर महिला की ख्वाहिश है, जहां कंधा मिले मगर वह कंधा किसी मर्द का हो, यह बिल्कुल जरूरी नहीं है। ये तीन सहेलियां कुछ ही लम्हों में पूरी जिंदगी जीना चाहती हैं। कहानी वार्तालाप शैली में धाराप्रवाह चलती है। महसूस होता है कि कोई हमारे सामने बतिया रहा है और यही बात इस उपन्यास को भीड़ में से अलग करती है क्योंकि यहां अंदर का गुस्सा है, बतकही है मगर कोई आदर्श या किसी प्रकार का बौद्धिक बोझ नहीं है। 
 ये एक ऐसी दुनिया है जिसे न चाहते हुए भी कई बार औरतों में जीने की चाहत होती भी है मगर नैतिकता और आदर्श के बंधन में हम इन तमाम ख्यालों को पाप समझकर खुद से दूर रखते हैं। मसलन, रमा का खुद से 23 साल बड़े मर्द से शादी करना और उसके बाद भी एक प्रेमी रखना और उसका चालाकी से इस्तेमाल करना, पूनम का अपने देवर से संबंध बनाना और उमा का खुद से कम उम्र का ब्वायफ्रेंड रखना (जो अंत में उसे छोड़कर किसी और लड़की के साथ चला जाता है), ये सब किसी आम औरत के जेहन में नहीं आ सकता है और गलती से अगर आए तो वह इस ख्याल को धकेल देगी। 
 यहां गौर करने वाली बात यह है कि रमा अपने पति के गुजरने के बाद ही यह कदम उठाती है यानि पत्नी वाली वफादारी उसमें है। इसके बावजूद वह जिस समाज में रहती है, उसे इसकी अनुमति नहीं है। रही बात उमा की तो वह भी अंत में कुणाल के मित्र कुशल से शादी करती है औऱ उसका कारण यह है कि कुणाल से शादी करने का मतलब रोमांस का खत्म हो जाना है। उमा को अंत में एक ही चीज याद रहती है स्वतंत्रता, और वह उसी के साथ जी रही है।

यह उपन्यास इस बात को सामने रखता है कि औरत भले ही एक मर्द के कंधे का सहारा तलाशती हो, खुद को उसे सौंपकर अपनी दुनिया उसमें देखती हो मगर उसका पूरा होना किसी मर्द पर या मातृत्व पर निर्भर नहीं करता। उसे अपने हिस्से का कोना चाहिए जो उसे रिश्तों की तमाम परिभाषाओं से अलग सिर्फ एक औरत से परे सिर्फ एक मनुष्य के तौर पर समझे, यही तलाश इन तीनों औरतों की है, हमारी और आपकी भी है। 
 उपन्यास में कई जगहों पर घर से लेकर कार्यस्थल पर औरतों के साथ होने वाली बदसलूकी और उपेक्षा खुलकर सामने आई है जिसमें दैहिक शोषण भी शामिल है और इसमें महिला पुलिस अधिकारियों का डर भी शामिल है। इसके साथ ही समाज के निचले तबके की औरतों का विद्रोह भी शामिल है। उपन्यास में उमा और कुणाल के साथ रीना औऱ सौमित्र का रिश्ता भी शिद्दत से मौजूद है मगर उमा और रीना में जो रिश्ता है, वह खींचता है। दिल्ली जब उमा के साथ बेरहम होती है तो रीना उसका सम्बल बनती है।

दरअसल, यह उपन्यास एक मर्द और औरत के रिश्ते की कहानी नहीं कहता बल्कि इसमें औरत के औरतपन से जन्मे अपनेपन के धागे हैं जो औरतों में एक खूबसूरत रिश्ता जोड़ते हैं। इनमें उमा, रमा और पूनम के साथ उमा और रीना का रिश्ता एक कड़ी है।उपन्यास में कोलकाता जहां भी नजर आया है, शिद्दत से नजर आया है मगर जिस दिल्ली ने गढ़ा, माधवी श्री उसे भी नहीं भूलीं। एक मां की तरह जिसे अपने दोनों बच्चे प्यारे हैं। प्रूफ की गलतियां हैं मगर उपन्यास की धाराप्रवाह शैली के कारण कई बार इन पर ध्यान नहीं जाता। नई दिल्ली के श्री प्रकाशन ने इसे छापा है। लेखिका यह पहला उपन्यास है और इसे पढ़ा भी जा रहा है। खुद से बतियाना हो और अपना कोना तलाशने की कसक हो तो ये उपन्यास पढ़ा जा सकता है। 

पुस्तक -  वाह! ये औरतें
लेखिका - माधवी श्री 
प्रकाशक - श्री प्रकाशन 

 (वेबदुनिया में 13 जून 2016 को प्रकाशित समीक्षा)

रविवार, 12 जून 2016

अपने हिस्से का आसमान समेटती अकेली औरतें


- सुषमा त्रिपाठी

अकेली महिला, जब भी ये शब्द जेहन में आता है तो महिला की लाचार छवि बहुतों के दिमाग में कौंध उठती होगी। साहित्य से लेकर सिनेमा और समाज में भी महिला का अकेली होना अभिशाप ही माना जाता रहा है और इस बात की परवाह किए बगैर कि वह खुद इस बारे में क्या सोचती है। औरत अकेली क्या हुई, लोग उसे अपनी सम्पत्ति समझ बैठते हैं और यह भी कड़वी हकीकत है कि महज अकेले होने के कारण उसे आपत्तिजनक और कुछ हद तक बेहूदे प्रेम प्रस्तावों से गुजरना पड़ता है। इनकार किया तो चरित्र पर उँगलियाँ उठेंगी और हाँ कर दी तो उस पर एक एहसान लाद दिया गया मगर अब ये पन्ने पलट रहे हैं क्योंकि अब अकेली होने का मतलब लाचारी नहीं है बल्कि एक ऐसी सशक्त महिला की छवि सामने आती है जो अपने फैसले खुद करती है, जो अपना सम्मान करना जानती है और मातृत्व का सुख प्राप्त करने के लिए उसे किसी पर निर्भर होने की जरूरत नहीं पड़ती और सबसे अच्छी बात यह है कि उनके बच्चे उनका सम्मान करते हैं और उनको समझते हैं। यकीन न हो तो नीना गुप्ता और मसाबा गुप्ता पर नजर डालिए। विवियन रिचर्ड्स से उनकी शादी नहीं हुई थी मगर नीता ने मसाबा को न सिर्फ जन्म दिया बल्कि उसे योग्य भी बनाया़। हालाँकि नीना ने बाद में शादी की मगर तब तक मसाबा बड़ी हो चुकी थीं। सुस्मिता सेन और रवीना टंडन जैसी महिलाओं ने बेटियाँ गोद लेकर एक नयी मुहिम चलायी। कहने की जरूरत नहीं है कि इससे बहुत सी महिलाओं को हौसला और हिम्मत, दोनों मिले। अब यह सिलसिला बंगाल में भी देखा जा सकता है। फिल्मकार आनिंदिता सर्वाधिकारी उन महिलाओं में से हैं जो अपने दम पर चलना जानती हैं। थियेटर के माहौल में पली - बढ़ी आनिंदिता सिंगल मदर्स के लिए एक मिसाल ही नहीं बल्कि अकेले जी रही उन तमाम महिलाओं के लिए एक उम्मीद हैं जिन्होंने अविवाहित जीवन का मतलब एकाकीपन मान लिया है। वह कहती हैं कि मेरे लिए बच्चा होना काफी मायने रखता है और यह निर्णय लेने में मुझे 2 साल लग गए। आज उनका बेटा अग्निसात उनकी दुनिया बन चुका है और वे एक खुशमिजाज माँ हैं। आनंदिता अकेली नहीं हैं बल्कि मातृत्व का सुख पाने के लिए बहुत सी लड़कियाँ और महिलाएं बंधी - बंधायी विचारधारा को चुनौती दे रही हैं। एक समय था जब अविवाहित होना या तलाकशुदा होना महिलाओं के लिए कहीं न कहीं आसान नहीं था और आस - पास की सामाजिक परिस्थितियाँ उसे यह जबरन महसूस करवाती थीं कि शादी न करना या तलाक लेना एक पाप है। खासकर तलाक के मामलों में तो किसी भी महिला के चरित्र पर ही सवाल खड़े होते थे और पूरी परिस्थिति के बाद उसके लिए जिंदगी आसान नहीं रहती थी। आज इस आवरण को लड़कियाँ उतारकर ङ्गेंक रही हैं। उनको न तो अब सिंगल मदर होने में कोई दिक्कत है और न ही तमाम तकलीफें सहकर सिर्फ बच्चों के लिए अपनी पूरी जिंदगी दाँव पर लगाने की मजबूरी है। यह दौर उस सशक्त महिला का है जो अपने दम पर न सिर्फ खुद जीना सीख रही है बल्कि मातृत्व का सुख भी उठाना जानती है और इसके लिए शादी अब कोई बंधन नहीं है। आनंदिता कहती हैं कि मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूँ कि कुदरत ने मुझे माँ बनने की ताकत दी है। मैं इसे जाया नहीं होने दे सकती थी। शारीरिक तौर पर माँ बनने के लिए एक समय सीमा है मगर शादी भावनात्मक मामला है और वह बाद में भी की जा सकती है। प्यार और शादी जैसी बातें इंतजार कर सकती हैं मगर मातृत्व की समय सीमा नहीं। मैंने स्पर्म बैंक से स्पर्म खरीदा मगर मेरा बेटा अग्निसात दूसरी कोशिश के बाद हुआ। डॉक्टर मुझे हैरत से देखते थे मगर मुझे अस्पताल में भी प्यार मिला और अब भी मिल रहा है। मातृत्व का यह सफर काफी खूबसूरत है और अब काम पर भी मुझे जल्दी लौटना है। अब एक बेटी गोद लेना चाहती हूँ। ईश्‍वर ने हमें एक ही जिन्दगी दी हैं, इसे खुलकर जीना चाहिए। अब यह शहरों तक ही सीमित नहीं है बल्कि छोटे जिलों और शहरों में भी यह देखा जा रहा है। बंगाल के मुर्शिदाबाद में 53 साल की कालीदासी हल्दर ने 53 साल की उममें सिंगल मदर बनकर अपनी खुशियों को तवज्जो दी है। एक अँगेजी अखबार को दिए साक्षात्कार में कालीदासी ने बताया कि परिवार की देखरेख करने में अपनी शादी के बारे में सोचने का मौका ही नहीं मिला। एक अखबार में विर्टो ङ्गर्टिलाइजेशन प्रक्रिया पर उनकी नजर गयी और फिर उन्होंने इस पर किताब खरीदी। हालाँकि सामाजिक और नैतिकता के मोर्चे पर यह कठिन फैसला कालीदासी के लिए इतना आसान नहीं था। परिवार उनके साथ खड़ा नहीं हुआ मगर पड़ोसी उनका अकेलापन समझते थे। तमाम शारीरिक, मानसिक और सामाजिक तकलीङ्गें सहकर भी आज अपनी बेटी कत्थककली की परवरिश कर रही हैं। सिंगल मदर्स के लिए प्रशासनिक स्तर पर दस्तावेज हासिल करना भी एक मुश्किल काम है मगर वे अब हार नहीं मानतीं। इस हिम्मत का नतीजा है कि अब उनके हिस्से का सम्मान और उनके हिस्से का अधिकार उनको मिल रहा है। देखा जाए तो सिंगल मदर कोई आधुनिक शब्द नहीं है बल्कि अकेली माँओं ने अक्सर अपने बच्चों को अपने दम पर खड़ा किया। सीता हो या कुंती या ङ्गिर यशोधरा, अपने समय में एक समय के बाद ये महिलाएं अकेली ही थीं मगर आज ये सभी मातृत्व के लिहाज से मिसाल बन चुकी हैं। ङ्गर्क यह है कि तब समय और था और सामाजिक परिस्थितियों ने उनका साथ नहीं दिया मगर आज अकेली महिलाएं समाज का नजरिया ही नहीं बदल रहीं बल्कि अपने हिस्से की खुशियाँ बटोरने के साथ बिखेर भी रही हैं।

(आलेख महिला दिवस पर सलाम दुनिया हिन्दी दैनिक में मार्च 2016 को प्रकाशित)

रविवार, 29 मई 2016

आज के समय में पत्रकारिता, पत्रकार और स्त्री


 आज 30 मई है। पत्रकारिता दिवस। सोचती हूँ कि बीते एक दशक में पत्रकारों की स्थिति में क्या बदलाव आया है तो लगता है कि कुछ और नहीं सोचने का तरीका बदला है। हम दो धड़ों में बँट चुके हैं। एक वर्ग निष्पक्षता और उदासीनता में फर्क करना भूल चुका है तो दूसरा प्रबंधन को खुश करने की कला को पत्रकारिता का नाम देकर खुश है और इन सबके बीच में पिस रहा है ईमानदारी से काम करने वाला संवाददाता। दूर से देखने पर ग्लैमर मगर भीतर जाओ तो आपको पूरी जिंदगी में जितना अनुभव नहीं होगा, उतना अनुभव आप साल भर काम करके कमा सकते हैैं। अब बात औरतोॆं की करें तो अधिकतर स्वनाम धन्य अखबारों के लिए वह मसाला हैै, उससे जुड़ी खबरों में इतना मिर्च डाल दिया जाता है कि स्वाद ही कड़वा हो जाता है। सनी लियोनी को गालियाँ देने वाले उनकी अंतरंग तस्वीरों को प्रमुखता से स्थान देते हैं। खबर का स्तर यह है कि अब मीडिया अबराम का जन्मदिन भी मना रहा है। बाकायदा नग्न होती महिलाओं के वीडियो अपलोड किए जाते हैं औऱ इसमें महिलाओं के साथ महिला पत्रकारों की भी छीछालेदर हो रही है। खबरों का शीर्षक वह आशिक के साथ भाग गयी, तो सड़क पर लड़ पड़ी और इससे भी घटिया, जिसे साझा तक नहीं किया जा सकता। यह उस मानसिकता का परिचायक है जो पितृस्सत्तात्मक समाज ने भरा हैै और ऐसी संवेदनहीन पत्रकारिता लिखने वाले इसी समाज से आते हैं। तो यह है कि समाज में ही नहीं पत्रकारिता की दुनिया में भी औरतें मसाला भर ही हैं। अधिकतर हाउस लाइफस्टाइल औऱ मनोरंजन की बीट लड़कियों को ही देते हैं औऱ कई जगह तो मानसिकता यह है कि लड़की है इसलिए अधिकारी बात करते हैं। चैनलों मेंं काम कर रही शादीशुदा महिला पत्रकारों औऱ खासकर जिनके बच्चे हैैं, उनका जीवन तो इतना मुश्किल है कि कल्पना नहीं की जा सकती। कई वरिष्ठ महिला पत्रकारों को जानती हूँ जो मन मसोस कर फील्ड से रिश्ता तोड़ बैठी हैं क्योंकि घर भी देखना है। यह स्थिति कभी पुरुषों के सामने तो नहीं आती। सच तो यह है कि महिलाएं ही महिलाओं को गम्भीरता से नहीं लेतीं और न ही एक साथ आगे बढ़ रही हैं। जो है, जितना है, खुश हैं। संतोष कई बार आत्मघाती होता है। जरूरी है कि संतोष छोड़कर वह आगे एक साथ बढ़ें। अगर आप सबको साथ लेकर चलेंगी तो आगे आप ही बढ़ेंगी, और यह आपके लिए कोई नहीं करने जा रहा।

रविवार, 1 मई 2016

बंगाल के चुनाव, औपचारिकता है मगर गायब है जनता की उम्मीदें




चुनाव लगभगवखत्म। पहले से कहीं अधिक शांतिपूर्ण। बम, गोली, खून इस बार कम है। निश्चित रूप से चुनाव आयोग और केंद्रीय वाहिनी की भूमिका की तारीफ़ की जानी चाहिए मगर मतदान के प्रतिशत में फिर भी गिरावट है। सबसे दुखद और मार्मिक सत्य ये रहा कि कुर्सी की भूख अब बच्चों पर भी रहम करना भूल चुकी है। हालिशहर के बाद हावड़ा में भी बच्चों को हिंसा का शिकार होना पड़ा। नतीजों को लेकर भी अजीब सा सन्नाटा है मगर लोगों का कम मतदान करना विकल्प न होने के कारण है जिसमें हताशा और उदासीनता भी है। ये दूर होगी या नहीं अब भी कहना कठिन है। कोलकाता पोर्ट में जो सन्नाटा दिखा, वह एक डर को दर्शाता है। महिलाओं के साथ लोगों में भी अजीब सी उदासीनता दिखा। ऐसा लगता है कि मतदान अब एक औपचारिकता भर रह गया है विकल्पहीन बंगाल में।
 नतीजे चाहे जो भी हों मगर आम जनता के हिस्से में शायद ही कुछ आए। क्या पता सत्ता बदले या न बदले। 34 साल के वामपंथी शासन और 5 साल के तृणमूल के शासन में बंगाल की झोली खाली ही रही है। उत्सव हुए तो पलायन अधिक हुआ। लोकतांत्रिक औऱ बुद्धिजीवी बंगाल में आम आदमी को बाहर लाने के लिए केन्द्रीय वाहिनी और144 धारा की जरूरत पड़ रही है औऱ उस पर भी हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही है, इससे अधिक शर्मनाक क्या हो सकता है? उद्योग नहीं और न ही सुरक्षा है। बंगाल के भविष्य को 19 मई का इंतजार है तो इसमें भी उम्मीद गायब है।

मंगलवार, 8 मार्च 2016

सशक्तिकरण की राह तो हमारे घर से ही निकलती है



महिला सशक्तिकरण की बातें यूँ तो साल भर चलती रहती हैं मगर मार्च आते ही इसमें अनायास तेजी आ जाती है। साल में एक दिन महिलाओं के सम्मान को लेकर बड़े – बड़े दावे और बड़ी – बड़ी बातें की जाती हैं और 8 मार्च बीतते ही एक बार फिर घड़ी की सुई पुराने समय पर लौट आती है। समय बदला है और महिलाओं की स्थिति भी बदली है मगर क्या जमीनी हकीकत बदली है? यह सच है कि महिलाएं आगे बढ़ रही हैं और आवाज भी उठा रही हैं और बढ़ती चुनौतियों या यूँ कहें कि बढ़ते महिला अपराधों का एक बड़ा कारण यह है कि अब पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बड़ी चुनौती मिल ही है। दिल्ली का निर्भया कांड हो या पार्क स्ट्रीट का सुजैट जॉर्डन कांड, अभियुक्त इन दोनों महिलाओं को सबक सिखाना चाहते थे। आज भी फतवे, पाबंदी और नसीहतों के साथ बयानबाजी सब महिलाओं के हिस्से आ रही है। महिलाओं को लेकर सोच आज भी नहीं बदली है। आज भी दोहरी मानसिकता महिलाएं हो रही हैं। एक ओर उनको परदे पर सराहा जाता है, इंटरनेट पर खोजा जाता है तो दूसरी ओर उनको अछूत मानकर लोग किनारा भी करते हैं। जाट आरक्षण के नाम पर आंदोलन में महिलाओं को शिकार बनाया जाता है तो दूसरी ओर विश्वविद्यालयों में आजादी के नाम पर महिलाओं की गरिमा को ताक पर रखने का काम भी खुद महिलाएं ही कर रही हैं और इन सब के बीच जो पिस रही है, वह एक आम औरत है। वह आज भी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में ये सारे संघर्ष उठा रही है। यह सही है कि जब कुछ टूटता है तो प्रतिक्रिया होती है और इन अपराधों के पीछे महिलाओं की खामोशी का टूटना है। यह तस्वीर का एक पहलू है मगर स्वाधीनता, अधिकार और अभिव्यक्ति के नाम पर कहीं न कहीं रास्ते भटक रहे हैं और महिलाएं खुद आम महिलाओं की राह में मुश्किलें ला रही हैं। ऐसे में हमारी कठिनाइयों के लिए सिर्फ पुरुष नहीं, कहीं न कहीं हम भी जिम्मेदार हैं क्योंकि एक अदद पुरुष के लिए स्त्री के खिलाफ स्त्री ही खड़ी होती है और पुरुष की गलतियों को नजरअंदाज भी वही रिश्तों के नाम पर करती है। जरा सोचिए कि अगर बलात्कार, हत्या और ऐसे तमाम आरोपियों के घरों की स्त्रियाँ अगर इन अपराधियों का बहिष्कार करने लगे, पति की गलतियों को छुपाने की जगह पत्नी उसका साथ छोड़ दे और अपराध की राह पर चलने वाले या लड़कियाँ छेड़ने वाले भाई को माँ और बहन ही छोड़ दे तो क्या अपराधियों का मनोबल बचेगा? फिर भी ऐसा होता नहीं है। रिश्वत की कमाई से किटी पार्टी करने वाली और घरेलू सहायिकाओं के खिलाफ ज्यादती करने वाली, धारा 498 का दुरुपयोग कर एक आम औरत की लड़ाई को मुश्किल बनाने वाली भी औरतें ही हैं। यह सही है कि महिला सशक्तिकरण जरूरी है मगर क्या एक पहिए को ऊपर उठाने के लिए दूसरे पहिए को जमीन में गाड़ना क्या समस्या का समाधान है? क्या यह गलती को दोहराना नहीं है? प्रतिशोध से विनाश हो सकता है मगर सृजन और परिवर्तन करने के लिए संतुलन होना जरूरी है। जो गलत है, उसे छोड़िए और इसके लिए एक औरत बनकर सोचने की जरूरत है, रिश्ते उसके बाद में आते हैं। निश्चित रूप से हमें अपना अधिकार चाहिए मगर उसके लिए शुरुआत घरों से करनी होगी, जिस दिन हर घर का बेटा महिलाओं का सम्मान करना सीखेगा, उस दिन से अपराध भी अपने – आप कम होंगे और यह काम कोई और नहीं हमें और आपको करना होगा। 

रविवार, 21 फ़रवरी 2016

राजनीति के शिकंजे में जेएनयू,पिस रहे छात्र

जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय इन दिनों सुर्खियों में है। खबरों में या यूँ कहें कि विवादों में रहना इस विश्वविद्यालय की खासियत है मगर अच्छी बात यह थी कि विचारधारा के टकराव के साथ सृजनात्मकता के लिए इस विश्ववि्द्यालय की अपनी पहचान थी मगर अब इसे राजनीतिक पार्टियों की नजर लगती जा रही हैै। सच तो यह है कि राजनीतिक दल कोई भी हो, विश्वविद्यालय उसके लिए एक पॉलिटिकल वोट बैंक से अधिक कुछ भी नहीं है और हर कोई इन पर कब्जा जमाने में लगा है। जेयू से लेकर जेएनयू तक, हर जगह एक ही कहानी हैै मगर इन सब में जो पिस रहा है, वह एक आम छात्र और शिक्षक (अगर वह सचमुच शिक्षक है) के साथ अभिभावक है। अब यह विश्वविद्यालयों को तय और सुनिश्चित करना होगा कि उनके होते संस्थानों को राजनीति का जहर न डसे। बहुत हुआ, अब किसी राजनीतिक पार्टी की छाया शिक्षण संस्थानों पर नहीं पड़नी चाहिए, पर अभी यह होगा, इस पर भी संशय है और यही खतरा है।

इतिहास ने सिखाया - स्त्री को एक दूसरे के लिए लड़ना सीखना होगा

पन्ने चाहे इतिहास के हों या धर्म के, औरतों के लिए मापदण्ड हमेशा से ही अधिक कठोर रहे हैं। बाजीराव मस्तानी देखी  और मस्तानी से अधिक काशीबाई की खामोशी और व्यथा परेशान कर गयी। इतिहास के पन्नों में काशीबाई के साथ न्याय नहीं हुआ। अपनी पत्नी का विश्वास तोड़कर भी बाजीराव नायक बने रहे और प्रेम के नाम पर दीवानगी दिखाने वाली मस्तानी भी अपनी छाप छोड़ गयी मगर इन दोनों की निशानी पर अपनी ममता लुुटाने वाली काशीबाई को कहीं जगह नहीं मिली। जो छूट बाजीराव को मिली, क्या वह छूट उस समय में काशीबाई को मिलने की कल्पना भी की जा सकती है। फिल्म में प्रियंका चोपड़ा ने उस पीड़ा को जिस तरह से जीया है, वह वाकई झकझोर देने वाला है। प्रेम की बातें करने वाले समाज ने दो औरतों को हमेशा लड़वाया है। नियमों को अपनी सुविधा के लिए और पुरुषप्रधान समाज ने हमेशा से तोडा और मरोड़ा है। संसार के हित का हवाला देकर द्रौपदी को पांच पांडवो से विवाह कर उनको अपनाने पर यह व्यवस्था विवश करती है। उसे न्यायसंगत भी
ठहराती है तो दूसरी तरफ कर्ण से अपमानित भी करवाती है। जब भी महाभारत की कहानियां सुनती हूं, हजारों सवाल परेशान कर जाते हैं। हर पांडव शक्ति के विस्तार के लिए फिर विवाह करता है और द्रौपदी से उम्मीद की जाती है कि वह इसे स्वीकार कर हमेशा उनका साथ दे। अगर कहानी में सिर्फ पात्र बदल जाते और द्रौपदी पांडवों के अतिरिक्त किसी को चुनती तो? क्या ये समाज उसे जीने देता? चयन का अधिकार हमेशा पुरुषों के पास ही क्यों होता है? द्रौपदी अपनी इच्छानुसार नहीं बल्कि नियति के अनुसार जीती रही और अंत में स्वर्ग के लिए उसे त्याग दिया गया। उसका आंचल खाली ही रहा। स्त्री शोषित होती है और वो भी दूसरी ही स्त्री के द्वारा। उस दूसरी स्त्री को पुरुष हथियार बनाता है और दोनों स्त्रियां उस पुरुष पर अधिपत्य के लिए एक दुसरे के खिलाफ खड़ी हो जाती हैं जबकि सत्य तो यह है कि दोनों के साथ ही छल हुआ है। एक से अधिक विवाह करने पर प्रश्न खड़े होते हैं तो पुरूषों के मामले में यह नियम लागू क्यों नहीं होता? इस तरह के मामलों में हार हमेशा स्त्री की होती है, फिर चाहे वह पत्नी हो या प्रेमिका। पूरी कहानी पलट सकती है, बशर्ते स्त्री एक दुसरे के खिलाफ नहीं, बल्कि एक दुसरे के लिए लड़ना सीख ले और खुद को पहचाने। जिस दिन पुरूषों पर उसकी निर्भरता नहीं होगी, उस दिन से वह जीतना सीख जाएगी।

रविवार, 3 जनवरी 2016

हर धर्म की असहिष्णुता की शिकार है औरत




हर धर्म की असहिष्णुता की शिकार हैं औरत

-    सुषमा त्रिपाठी

असहिष्णुता को लेकर देश का माहौल काफी गर्म रहा। गाय को बचाने वाले भी आगे रहे और गाय को महज जानवर बताकर खुद को धर्मनिरपेक्ष बताने वालों ने बीफ खाकर को शांतिप्रिय साबित करने की काफी कोशिश की। वैसे सभी धर्मों के नुमाइंदों और समाज के स्वयंभू पहरेदारों में एक बात को लेकर समानता तो है कि इनमें से हर कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से महिलाओं को अपने तलवों के नीचे रखने में यकीन रखता है और यह समानता अमेरिका, ब्रिटेन से लेकर अरब और भारत में भी है। पश्चिमी देशों के शो बिज की दुनिया में महिला कलाकारों का अंग प्रदर्शन और एक्सपोजर वहाँ की विकसित महिलाओं का शोषण और मजबूरी है। अपने देश में ही किसी को मोबाइल रखने से औरत के बिगड़ने का डर है तो कोई देर रात तक सड़क पर घूमने वाली महिलाओं को अपराध की सजा दुष्कर्म करके देता रहता है। अरब में तो महिला को बलात्कार साबित करने के लिए भी चार पुरुषों की जरूरत पड़ती है और गाड़ी चलाने वाली महिलाओं के खिलाफ तो फतवे जारी कर दिये जाते हैं। रही बात भारत की तो यहाँ आज भी डायन बताकर महिलाओं की हत्या और बलात्कार की घटनाएं होती ही रहती हैं। कभी योगी आदित्यनाथ ने जिहाद से निपटने के लिए हिंदुओं को एकजुट होने के लिए कहते हैं और ये भी कहते हैं कि हमें अपनी बेटियों को समझाना होगा कि लव जिहाद के नाम पर मुसलमानों की आबादी को हम नहीं बढ़ने देंगे। लड़कियों को बहकाकर उन्हें इस्लाम कबूल कराया जा रहा है। इससे बचने की जरूरत है। इससे एक कदम आगे बढ़कर औरतों को चार संतानें पैदा करने की नसीहत देने वाले भी इस गरीब देश में हैं। शरद यादव त्वचा के आधार पर औरतों की किस्में संसद में बताते हैं तो सपा मुखिया मुलायम ने महिला विंग सम्मेलन के दौरान महिलाओं के बारे में विवादित बयान देते हुए कहा कि लीलावती सुंदर नहीं थी बावजूद इसके सपा ने उन्हें विधानपरिषद का सदस्य बनाया था। इससे पहले भी मुलायम ने कई विवादित बयान दिये है। मुलायम बाबू बलात्कारियों के प्रति भी बड़े मुलायम रहते हैं और उन्होंने ही कहा था कि लडके हैं लड़को से गलतियां हो जाती हैं ,अब क्या इसके लिए उन्हें फांसी दे दी जाए। बलात्कार के आरोपियों के पक्ष में दिये गये बयान के बाद हुई किरकिरी के बाद भी मुलायम ने रेप पीड़िताओं के बारे में फिर विवादित बयान दिया था। उन्होंने कहा कि था कि एक महिला का चार लोग रेप नहीं कर सकते हैं। रेप कोई एक व्यक्ति करता है लेकिन मुकदमा चार लोगों के खिलाफ करा दिया जाता है। अभी हाल ही में  केरल के एक सुन्नी धर्मगुरु कांथापुरम एपी अबूबकर मुस्लीयर ने जेंडर इक्विलिटी (लैंगिक समानता) को 'गैर-इस्लामी' करार दिया।  उन्होंने कहा कि महिलाएं कभी पुरुषों के बराबर नहीं हो सकतीं, क्योंकि 'वे केवल सिर्फ बच्चे पैदा करने के लिए होती हैं।'  'ऑल इंडिया सुन्नी जमीयतुल-ए-उलेमा' के चीफ मुस्लीयर ने कोझीकोड में 'मुस्लिम स्टूडेंट्स फेडरेशन' के एक के कैंप में यह बयान दिया और  उन्होंने कहा कि जेंडर इक्विलिटी (लैंगिक समानता) ऐसी चीज है जो कभी हकीकत में हासिल नहीं हो सकती।  मुस्लीयर ने यह भी कहा कि यह इस्लाम और मानवता के खिलाफ तो है ही साथ ही बौद्धिक रूप से भी गलत है।' 'महिलाएं कभी पुरुषों के बराबर नहीं हो सकतीं। महिलाएं संकट के हालात का सामना नहीं कर सकतीं। महिलाओं में दिमागी मजबूती और दुनिया को कंट्रोल करने की ताकत नहीं होती, क्योंकि 'यह पुरुषों के हाथ में होती है।'
> उन्होंने सवाल भी किया कि दुनियाभर के हजारों हार्ट सर्जन में क्या एक भी महिला है? हैरत की बात यह है कि इस तरह के घटिया बयानों पर कारर्वाई के लिए न तो कोई सरकार आगे आती है और न ही धर्म के रखवाले इसका विरोध करते हैं। इस पर कभी कोई पुरस्कार वापसी और रैली नहीं होती। अभी हाल ही में महाराष्ट्र के शनि शिं‍गणापुर मंदिर में एक महिला के शनिदेव को तेल चढ़ाने से विवाद शुरू हो गया। खबरों के मुताबिक, 400 वर्षों से इस मंदिर के भीतर महिला के पूजा की परंपरा नहीं रही है, ऐसे में महिला द्वारा मंदिर के चबूतरे पर चढ़कर शनि महाराज को तेल चढ़ाने पर पुजारियों ने मूर्ति को अपवित्र घोषि‍त कर दिया. मंदिर प्रशासन ने 6 सेवादारों को निलंबित कर दिया है और मूर्ति का शुद्धि‍करण किया गया। जानकारी के मुताबिक, महिला द्वारा पूजा करने की तस्वीरें सीसीटीवी में कैद हैं, जिसे देखने के बाद मंदिर में जमकर हंगामा हुआ. बढ़ते विवाद को देखते हुए जहां पूजा करने वाली महिला ने यह कहते हुए प्रशासन से माफी मांगी है कि उसे परंपरा की जानकारी नहीं थी, वहीं मूर्ति को अपवित्र मानते हुए मंदिर प्रशासन ने शनिदेव का दूध से प्रतिमा का अभिषेक किया है. यही नहीं, पवित्रता के लिए पूरे मंदिर को भी धुला गया है। रानाघाट में एक नन के साथ बलात्कार होता है और थोड़ा शोर होने के बाद सब शांत हो जाते हैं। कहने का मतलब यह है कि धर्म कोई भी हो और वजह कोई भी हो, विभाजन हो या दंगे, युद्ध हो या दबाने की मानसिकता हो, हर एक के लिए महिलाएं सिर्फ शरीर हैं और सम्पत्ति हैं, उसके पास दिमाग है और उसका अपना अस्तित्व है, यह मानने के लिए समाज आज भी तैयार नहीं है इसलिए मुझे लगता है कि असहिष्णुता की शिकार हिन्दू और मुसलमान नहीं बल्कि एक औरत ही है, क्योंकि धर्म और जाति कोई भी हो, वह एक महिला को देवी या दानवी तो बनाती है मगर एक संवेदनशील मनुष्य मानने के लिए तैयार नहीं है इसलिए जिस दिन एक औरत शरीर न रहकर एक चेतनशील मनुष्य के रूप में स्वीकार की जाएगी, संसार की आधी से अधिक समस्याएं खत्म हो जाएंगी।


रविवार, 13 दिसंबर 2015

सुजैट - पीड़ा जो बनी प्रेरणा


सुजैट जॉर्डन, जब भी आप यह नाम लेते हैं तो उसका जिक्र पार्क स्ट्रीट पीड़िता के रूप में होता है मगर यह जाँबाज महिला, खुद को पीड़ित नहीं सरवाइवर, कहती थी और जिस हिम्मत के साथ उसने इंसाफ की लड़ाई बगैर किसी के साथ  के लड़ी, वह काबिलेतारीफ थी मगर कहीं न कहीं कम से कम मैंने समाज और शख्सियतों एक खौफनाक चेहरा देखा। जज ने फैसले में कहा है कि ये सजायाफ्ता तीन आरोपी सुजैट को सबक सिखाना चाहते थे, निर्भया के साथ दरिंदगी का खेल खेलने वालों ने भी उसे सबक सिखाने के लिए ही अपनी हैवानियत दिखायी। जाहिर है कि समाज के नुमाइंदों को औरतों के आगे बढ़ने और देर रात तक बाहर रहने से परेशानी है क्योंकि दुनिया के 80 प्रतिशत मर्द तो औरतों को अपनी सम्पत्ति ही समझते हैं जिसकी जिंदगी के कायदे - कानून वह खुद तय करना अपना अधिकार समझते हैं और गाहे - बगाहे हमारे देश के स्वयंभू नेताओं ने भी अपने बयानों से महिलाओं की अस्मिता की धज्जियाँ उड़ाने में अपनी शान ही समझी हैं इसलिए मुलायम सिंह यादव को बलात्कारी भी बच्चे नजर आते हैं। 16 दिसम्बर आने वाला है और निर्भया की मौत के एक साल और गुजर जाएंगे मगर सुजैट ने तो वह जहर पीया और उसे अमृत समझकर जीती गयी। एक पल के लिए सोचिए कि उस औरत पर क्या गुजरी होगी जब उसके दो छोटे बच्चों के सामने उसे समाज के तंज सहने पड़ते होंगे। देेर रात तक घूमती है, एक क्लाइंट के साथ उसकी बहस हो गयी थी और सबसे बढ़कर जिस राज्य.की मुख्यमंत्री एक महिला हो, वह मदद करने की जगह एक भयावह सच को साजानो घटना बता रही है, इससे बढ़कर क्या विडम्बना हो सकती है। कल्पना कीजिए कि अगर दमयंती सेन जैसी महिला अधिकारी न होती तो क्या हो सकता था। दमयंती वो थीं जिन्होंने एक महिला की सच्चाई पर भरोसा किया और बदले में उनको तबादले का उपहार मिला। मुझे याद है कि सुजैट के चरित्र पर गॉसिप (इसे गॉसिप ही कहूँगी) गली - गली का विषय बन गयी थी और सब के सब निष्कर्ष निकालने में जुटे रहते थे। हमारी सरकारी वकील गुनहगारों को कम से कम सजा दिलाने में आगे रहीं और दो मुख्य आरोपी तो फरार ही हैं। दोषियों के परिवार ऊपर तक जाने की बात करते हैं और सजा पाने वालों को परिवार से लेकर शादी और बहन - भाई सब याद आ रहे हैं। क्यों नहीं उनको सुजैट का  परिवार दिखा, उसके दो छोटे बच्चे दिखे और न ही यह दिखा कि सुजैट अपने परिवार का सहारा थी। परिवार सजा पाते समय ही क्यों याद आता है और वे सुजैट के आँसू क्यों  नहीं देख सके, यह भी सोचने वाली बात है। सुजैट की सहायता करने वाली संंताश्री चौधरी से बात हुई तो उन्होंने बताया था कि वह किस कदर टूट गयी थी मगर वह खड़ी हुई और उसने सिर उठाकर सामने आने का साहस दिखाया, पार्क स्ट्रीट पीड़िता की जगह सुजैट बनकर सामने आयी। पार्क स्ट्रीट कांड का इंसाफ अभी अधूरा है मगर सुजैट और दमयंती सेन की वजह से हर औरत का सिर ऊँचा हुआ है, सुजैट ने अपनी पीड़ा को प्रेरणा बनाकर जैसे एक नया रास्ता खोला और अब जब वह सच की इस लड़ाई में अपनी जीत को देखने के लिए जीवित नहीं है, यकीनन वह एक रास्ता जरूर खोलेगी, सिर उठाकर इज्जत के साथ जीने की जिद और जीतने की राह।

रविवार, 22 नवंबर 2015

वाइ ओनली मेन



वाई ओनली मेन डांस इन इंडिया। फ्राँस से आयी शारर्टाल ने जब ये सवाल मुझसे पूछा तो मेरे पास कोई जवाब नहींं था। मैंने हमारी सभ्यता और संस्कृति की लफ्फाजी में उनको घुमाने की कोशिश की मगर छठ के हर गीत पर झूमती शार्टाल के लिए नृत्य उल्लास की अभिव्यक्ति है जो स्त्री और पुरुष का फर्क नहीं देखती मगर यह भारत है जहाँ खुलकर अभिव्यक्ति करने की छूट पितृसत्तात्मक समाज को है। स्त्रियाँ फिल्मों में पेड़ के इर्द - गिर्द नायक से गलबहियाँ करती तो अच्छी लगती हैं मगर वास्तविक जीवन में अगर कोई स्त्री इस तरह से अभिव्यक्ति करे तो सीधे उसकी परवरिश से लेकर चरित्र  पर ही सवाल उठेंगे। प्रकृति से मिले अधिकार भी लाज - संकोच और शर्म की बेड़ियों में बाँधकर हम खुद को सभ्य कहते है औऱ यही हिचक हम स्त्रियों में भी है। तुम्हारे सवाल का जवाब हमारे पास अभी नहीं है शार्टाल, उसकी तलाश जरूर कर रहे हैं हम
आइसक्रीम खाएंगे, जब मैंने रस्सी पर खेल दिखाती गौरी से बतियाने की कोशिश की तो गौरी का पहला वाक्य यही था। नीचे भीड़ खड़ी उसका तमाशा देख रही थी, पास ही कानून के पहरेदार भी थे मगर आँखों के सामने बालश्रम या यूँ कहें, कि बच्ची की जान को दाँव कर लगाकर तमाशा देखने वाले अधिक थे। गौरी 2 साल से ही सयानी हो चुकी है, घर चलाने के लिए और भाई के इलाज के लिए अपने भाई -बहनों के साथ खेल दिखाती है मगर उसकी छोटी सी आँखों में बचपन पाने की चाह को छोड़कर मैं कुछ नहीं देख पायी। माँ कहती है कि उसकी बेटी सब कर लेती है, बेटी जब खेल दिखाती है तो माँ और भाई नीचे चलतेे दिखे, भाई ऊपर जाता तो गौरी नीचे चलती। ऊँची पतली रस्सी पर खड़ी गौरी पता नहीं दुनिया को तमाशा दिखा रही थी या नीचे खड़े तमाशबीनों का तमाशा देख रही थी, पता नहीं मगर मन बहुत परेशान हो गया। गौरी मानों अब तक मेरा पीछा कर रही है, मैं उसकी कहानी पहुँचा सकूँ, इसके अलावा फिलहाल और कुछ नहीं कर सकती। माँ को भी दोष कैसे दूँ मगर दोषी फिर कौन है, गरीबी, व्यवस्था या कुछ और। पता नहीं मगर उसकी आवाज गूँज रही है - आइसक्रीम खाएंगे



मंगलवार, 3 नवंबर 2015

ऐसा लगता है कि पुरस्कार वापसी की रेल निकल पड़ी है जिसमें एक के बाद एक डिब्बे जुड़ते चले जा  रहे हैं। हर कोई खुद को धर्मनिरपेक्ष साबित करने में जुटा है, वैसे ही जैसे बच्चे कक्षा में प्रथम आने की तैयारी कर रहा हो। हर कोई रूठा है, हर किसी को शिकायत है मगर जख्म पर मरहम लगाने की अदा ही शायद लोग भूल गये हैं। दादरी से लेकर दिल्ली तक, हर जगह माँ भारती कराह रही है। पुरस्कारों से तौबा करने की जगह शायद नफरत से तौबा होती तो कोई राह भी निकलती। काश, लोग समझ पाते कि राम और रहीम, दोनों इस जमीन के ही बेटे हैं। खून किसी का भी बहे, चोट तो माँ को ही लगनी है।