गुरुवार, 26 जुलाई 2018

ठहरे हुए पानी में कंकड़ तो पड़ गया, लहरें उठती भी रहनी चाहिए


गुजरे हुए तीन दिन कोलकाता की हिन्दी पत्रकारिता के तालाब में कंकड़ डाल गये। कोलकाता प्रेस क्लब और हिन्दी...अब तक यह रिश्ता कभी समझ ही नहीं आता था। हिन्दी के पत्रकार एक साथ और वह भी तीन दिन...ये भी इस शहर के लिए आश्चर्य वाली बात थी। कटु सत्य तो यह है कि प्रेस क्लब के चुनावों को छोड़ दिया जाए तो हिन्दी के पत्रकार अब तक एक साथ बगैर किसी भेदभाव के साथ आये हों...ऐसा दिन गत 15 साल की पत्रकारिता में मेरे सामने तो नहीं आया और आया भी हो तो वह सिर्फ मान्यता प्राप्त अधिकारी पत्रकारों के लिए था मगर ये तीन दिन ऐसे नहीं थे। कोलकाता प्रेस क्लब के अध्यक्ष स्नेहाशीष दा को साधुवाद कि वे प्रेस क्लब की वर्तमान संस्कृति से उतने ही परेशान हैं जितने कि हम आम पत्रकार। इससे भी बढ़कर उनका यह सोचना कि अब तक हिन्दी पत्रकारों को कौशल प्रशिक्षण नहीं मिला और कोलकाता प्रेस क्लब की ओर से उन्होंने यह अवसर उपलब्ध करवाया, यह मेरी नजर में कोलकाता की हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास में एक क्रांति हैं। एक ऐसी जगह और एक ऐसा अवसर हम सभी नये और पुराने पत्रकारों को मिला जिसके लिए न जाने हम कब से तरस रहे थे। दूसरे शहरों के पत्रकारों से जब दिल्ली में मिली तो यह कमी अन्दर तक कचोटती रही है। पता नहीं क्यों, हम साथ काम करने वाले एक दूसरे को प्रतिभागी और सहयोगी नहीं बल्कि प्रतिद्वन्द्वी मानते रहे हैं। अपने - अपने संस्थानों के प्रति ईमानदारी रखते हुए भी हम साथ चल सकते हैं, पता नहीं क्यों, हम समझ नहीं पाये। या यूँ कहें कि हमें विरासत में एक वातावरण ही दिया गया जिसने हमें अनचाही शत्रुता थमा दी..हम ये तो नहीं चाहते थे।  अब जब बात चल रही है तो कहना पड़ेगा क्योंकि एक जगह से काम छोड़ने के बाद किसी और हाउस में चले जाना और कुछ वक्त बिताना मेरे लिए आदत थी मगर मेरे पूर्व संस्थान के लिए यह देश द्रोह से कम बड़ा अपराध नहीं था। हमें दूसरे संस्थानों के पत्रकारों से बात करने के बारे में भी सोचना पड़ता था। ये सब भड़ास तो नहीं है बल्कि वह पृष्ठभूमि है जिस पर बात किये बगैर इतिहास के पन्ने नहीं खुलेंगे क्योंकि जो हमारा आज है, वही तो हमारा इतिहास बनेगा।
मुझे याद है कि प्रभात खबर के गोपाल भइया मुझे बुलाते ही रह गये थे और मैं भय से या आने वाले तूफान की आशंका से उनकी बात नहीं मान सकी। कम से कम सलाम दुनिया में हमें यह दिक्कत नहीं है और इसका श्रेय एक खुले दिमाग के सम्पादक को जाता है। तीन दिवसीय पत्रकारिता कार्यशाला में जब तीसरे दिन जगदीश उपासने सर बात कर बता रहे थे कि पत्रकारों में शिष्टाचार और अनुभवी पत्रकारों के प्रति आदर होना चाहिए तो मैं नहीं कह सकती मेरे मन में कैसै भाव आ रहे थे क्योंकि यहाँ के सबसे बड़े प्रिंट मीडिया संस्थान में तो एक ही बात सिखायी जाती है कि जवाब देकर आओ। संवाददाता से बड़ा कोई नहीं होता और किसी भी विभाग से बात करने पर आपकी मुश्किलें बढ़ सकती थीं। भय से कई नये पत्रकार आज भी इसी बात का पालन करना सीख रहे हैं। उपासने सर, क्या आप हमारी पीड़ा समझ सकेंगे? क्या आप ये समझ सकेंगे कि नये पत्रकारों का आत्मविश्वास बढ़ाने के नाम पर उनको माध्यम बनाकर अनुभवी पत्रकारों का अपमान करवाने वाले सम्पादक भी इसी शहर में हैं। कैसा लगता है कि अनुभव ही हमारे लिए विष बना दिया जाता है और आपको पुराना कहकर इतना प्रताड़ित किया जाता है कि आप उस जगह को छोड़ने पर विवश होते हैं, जो आपकी आत्मा हुआ करता था...वफादारी का यह पुरस्कार यहीं मिलता है।

इस गलाकाट प्रतियोगिता में असुरक्षा की भावना उत्पन्न कर पत्रकारों में फूट डलवाने वाले अधिकारी पत्रकार भी उसी मिट्टी पर काम कर रहे हैं जिस पर जुगलकिशोर सुकुल ने हिन्दी पत्रकारिता की नींव उदन्त मार्तंड के रूप में  डाली थी।
कहाँ हैं प्रोत्साहित करने वाले महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे सम्पादक जिन्होंने हिन्दी को मैथिलीशरण गुप्त जैसा राष्ट्रकवि दिया? ये हमारा सौभाग्य ही है या सुकुल जी का हम सब पर आशीर्वाद कि उनके वंशधर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय की रीवां परिसर के प्रभारी जयराम शुक्ल सर लगातार तीन दिन तक हमारे बीच रहे। सर कहते हैं कि पत्रकार में सच्चाई बनी रहे...कैसे रहे सर, जब सच लिखने वाले पत्रकारों को कठघरे में खड़ा कर उनकी खबरों से खिलवाड़ करने वाले लोग भी इस क्षेत्र में हैं। ये शहर तो सुकुल जी की कर्मभूमि तक नहीं सम्भाल सका मगर हमारा प्रयास रहेगा कि वह जगह हम फिर तलाशकर उसी प्रतिष्ठा के साथ उस इतिहास की प्राण प्रतिष्ठा करें। हम आपसे क्या कहें...हमारे मन में सुकुल जी प्रतिष्ठित हैं पर हम जानते हैं कि इतना काफी नहीं। उस गली को खोजने की बहुत कोशिश की मगर लगता है कि अभी यह कोशिश जारी रहनी चाहिए।
ये तीन दिन हम सबके लिए ऑक्सीजन थे जब हम सबने पहचाना। आप सब कहते हैं कि खबर में सूचना से आगे की बात रहनी चाहिए मगर यहाँ के अखबारों के पास भाव या आगे देखने की फुरसत ही कहाँ हैं? एक साथ हम आये तो सही मगर कुछ करने के लिए तो जरूरी है न कि हम एक दूसरे को साथी समझें, शत्रु नहीं..आपने ठहरे हुए पानी में कंकड़ तो डाल दिया...मगर हलचल होती रहे...इसका ख्याल तो हम पत्रकारों को ही रखना होगा।

(एक आहत पत्रकार की कलम से)

रविवार, 17 जून 2018

समय और सदियों का निर्णायक रहा है ‘भाई’ का रिश्ता



परिवार से समाज बनता है मगर परिवार और उसके संबंध और उनके बीच होने वाले संघर्ष युगों का भविष्य भी निर्धारित कर देते हैं। भाई और भाई या भाई और बहन के संबंधों ने कई बार इतिहास बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस संबंधों की कड़ी के बीच भाई एक निर्णायक संबंध रहा है और भारतीय पुराणों और महाकाव्यों में भी उनकी सकारात्मक और नकारात्मक संबंधों की छाया पड़ी है। भाई - बहन के संबंधों को मजबूत करने के लिए भारतीय संस्कृति में रक्षा बंधन और भइया-दूज जैसे पर्व तो हैं मगर भाई और भाई के संबंध को मजबूत करने के लिए कोई पर्व या त्योहार रखा गया है, इसका जिक्र नहीं मिलता या ऐसा कोई व्रत नहीं दिखता जो भाई अपने भाई के लिए करे। इस आलेख में प्राचीन भारत से लेकर आधुनिक भारत में भाई - बहन और भाई -भाई के संबंधों पर एक नजर डालने का प्रयास किया गया है क्योंकि आज भी पारिवारिक विवादों में जितनी हिंसा और जितने अपराध व्याप्त हैं, वह इस संबंध के इर्द - गिर्द घूमते हैं - फिर चाहे वह जमीन और सम्पत्ति का बँटवारा हो या फिर माता - पिता को रखने का मामला। आमतौर पर भारतीय फिल्में भी इस संबंध के चारों और घूमती हैं..जहाँ आपको कुम्भ के मेले की तरह भाइयों का मिलना - बिछड़ना दिखता है या फिर नायक व खलनायक की स्पष्ट करती तस्वीर दिखती है। जाहिर है कि इन सभी पर हमारे पौराणिक साहित्य की गहन छाया है तो अपेक्षित है कि इसी समय से लेकर आज तक की तस्वीर को समसामायिकता के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए। 

शुरूआत रामायण काल यानी त्रेता युग से करें तो सत्य के पक्ष में श्रीराम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, शांता का संबंध आता है मगर शांता का उल्लेख रामचरित मानस में नहीं है। इन चारों भाइयों का प्रेम आज भी आदर्श माना जाता है तो सुग्रीव - बाली के संबंध भी रामायण में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। भरत ने पादुका रखकर श्रीराम की प्रतीक्षा 14 साल तक की तो लक्ष्मण श्रीराम के साथ परछाई बनकर रहे। भरत के साथ शत्रुघ्न रहे तो दूसरी ओर महाकाव्य में खलनायक के रूप में चित्रित रावण की बहन शूर्पनखा के आचरण से पूरी कथा का क्लाइमेक्स बनता है। बड़े भाई के लिए लड़ने वाला कुम्भकर्ण है जिसे रावण का स्नेह मिलता है तो दूसरी और विभीषण है जिसे श्रीराम का पक्ष लेने के कारण रावण का कोपभाजन बनना पड़ता है और अंत में रावण के वध में विभीषण की भूमिका महत्वपूर्ण होती है मगर कहावत आज तक चली आ रही है - ‘घर का भेदी लंका ढाहे’। आज तक विश्‍वासघात करने वालों को विभीषण ही कहा जा रहा है। 

महाभारत काल में महर्षि व्यास की संतानों के रूप में धृतराष्ट्र और पांडु का जन्म होता है जबकि विदुर दासी पुत्र थे। कहने की जरूरत नहीं कि दुर्योधन को गढ़ने में महाभारत के युद्ध में धृतराष्ट्र की अधूरी महत्वाकाँक्षा और पुत्र मोह की बड़ी भूमिका है। दुर्योधन की कुप्रवृत्तियों को रोकने का प्रयास कभी भी धृतराष्ट्र ने नहीं किया...एक शासक के रूप में भी वह विफल ही हैं। पांडु कथानक में बेहद कम समय के लिए हैं मगर उनके पुत्रों यानि पांडवों में आपको भातृ प्रेम की झलक मिलती है जिसे मजबूत करने में द्रोपदी की महत्वपूर्ण भूमिका है। दूसरी ओर दुर्योधन, दुशासन के साथ बहन दुःशला भी है और कौरवों में ही विकर्ण भी शामिल हैं जिन्होंने द्यूत में द्रोपदी को दाँव पर लगाने का विरोध किया तो दूसरी तरफ युयुत्सु हैं मगर उन पर ज्यादा कुछ नहीं मिलता। महाभारत में बतौर आज के किंग मेकर की तरह दो भाई श्रीकृष्ण और बलराम हैं जिनमें कई मुद्दों पर असहमति है मगर उनका प्रेम किसी भी सूरत में कम नहीं होता। इस प्रकरण में श्रीकृष्ण एक उदार चरित्र वाले लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्‍वास करने वाले भाई के रूप में सुभद्रा के प्रेम को पूर्णता पहुँचाने वाले भाई के रूप में दिखते हैं। आज जहाँ प्रेम के नाम पर ऑनर किलिंग हो रही है, वहाँ कृष्ण और सुभद्रा का स्नेह अपने आप में एक आदर्श है। आज भी पुरी में श्रीकृष्ण, बलराम, सुभद्रा की पूजा भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के रूप में की जा रही है।
 
मध्यकालीन भारत में भातृ प्रेम का लोकतांत्रिक आदर्श न के बराबर दिखता है बल्कि सम्राट अशोक से लेकर औरंगजेब तक पर भाइयों को मारकर सत्ता प्राप्त करने के प्रकरण सामने आते रहे हैं। एकमात्र महिला शासक रजिया सुल्तान को मरवाने के पीछे उसके भाई ही थे। स्वंतत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और उनकी बहन विजय लक्ष्मी पंडित एक मजबूत उदाहरण हैं।  विजयलक्ष्मी पण्डित ने भी देश की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण योगदान दिया था, जिसे भुलाया नहीं जा सकता। ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ में भाग लेने के कारण उन्हें जेल में बंद किया गया था। विजयलक्ष्मी एक पढ़ी-लिखी और प्रबुद्ध महिला थीं और विदेशों में आयोजित विभिन्न सम्मेलनों में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया था। भारत के राजनीतिक इतिहास में वह पहली महिला मंत्री थीं्। संयुक्त राष्ट्र की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष भी वही थीं। विजयलक्ष्मी पण्डित स्वतंत्र भारत की पहली महिला राजदूत थीं, जिन्होंने मॉस्को, लंदन और वॉशिंगटन में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। सामाजिक परम्पराओं और सोच का असर राजनीति पर भी पड़ता है और आज की राजनीति में भी ऐसा दिख रहा है।

 राजनीतिक परिवारों में बहनें सामने हैं मगर उनको राजनीति का चेहरा बनाने में अभी राजनेता हिचकते हैं और यह बात काँग्रेस समेत अन्य दलों पर भी लागू होती हैं। प्रियंका लाओ के तमाम नारों के बीच आज भी राहुल गाँधी ही कांग्रेस अध्यक्ष हैं। लालू प्रसाद यादव को भी मीसा भारती से अधिक भरोसा तेजप्रताप और खासकर तेजस्वी पर है। कहने की जरूरत नहीं है कि तेजप्रताप - तेज×स्वी, मुलायम सिंह यादव - शिवपाल यादव भारतीय राजनीति को दिशा देने की क्षमता रखते हैं मगर आज भारतीय राजनीति में न तो नैतिकता बची है, न ही धर्म और न ही आदर्श इसलिए वर्तमान समय भटकाव ही है। देखना यह है कि इस समय का सँक्रमण काल कौन सा आता है। वैसे भाइयों की जोड़ी राजनीति में कुछ नेता आमने सामने भी हैं, मसलन - भाजपा नेता और अब त्रिपुरा के राज्यपाल तथागत राय तथा तृणमूल सांसद सौगत राय। भाई - बहन की एक महत्वपूर्ण जोड़ी काँग्रेस के दिवंगत नेता व माधव राव सिंधिया, राजस्थान की मुख्यमंत्री व भाजपा नेत्री वसुन्धरा राजे सिंधिया और ग्वालियर की सांसद यशोधरा राजे सिंधिया की है मगर ये तीनों प्रेम के कारण नहीं बल्कि विवाद के कारण ही अधिक चर्चा में रहते हैं। 

खिलाड़ियों में युसूफ पठान व इरफान पठान के साथ हार्दिक व कुणाल पांड्या की जोड़ी मशहूर है। फिल्म उद्योग में राजकपूर, शशि कपूर और शम्मी कपूर की जोड़ी के साथ रणधीर, ऋषि और राजीव कपूर की भाइयों की ताकत की मिसाल है तो संजय दत्त - प्रिया दत्त के नाम भी अक्सर सुनायी देते हैं। भाइयों की छवि और उनकी मानसिकता पर परिवेश का गहरा असर है। यही कारण है कि आज कुछ भाई अपने भाई - बहनों के लिए जान लुटाते दिखते हैं तो दूसरी तरफ भाई पजेसिव और अपने रिश्तों खासकर बहनों पर नियंत्रण पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। बहरहाल, समय है और रिश्ते हैं तो दोनों के अच्छे या बुरे पक्षों का संतुलित आकलन होना समय की माँग है। परम्परा में जो सकारात्मक और लोकतांत्रिक भावना का परिचय देता है, उसे ग्रहण करने की जरूरत है मगर हिंसा और अपराध या बुराइयों को किसी भी रिश्ते में जगह नहीं मिलनी चाहिए चाहे वह भाई - भाई का रिश्ता हो या भाई -बहन का रिश्ता हो...उदार सकारात्मकता और खुली सोच ही इस रिश्ते को सुखद बना सकता है..परिवार के लिए भी, देश और समाज के साथ आने वाले कल के लिए भी। भातृ दिवस की शुभकामनायें।

(सलाम दुनिया में भातृ दिवस पर प्रकाशित आलेख)

बुधवार, 23 मई 2018

दिल्ली का वह सफर जिसने अपनी सीमाओं को तोड़ना सिखाया


पुराने किले की सीढ़ियों पर
सफर कैसा भी हो बहुत कुछ सिखा जाता है और किसी सफर पर निकलना अपनी सीमाओं को तोड़ने जैसा ही होता है। वैसे काम के सिलसिले में कई बाहर बाहर निकली हूँ मगर हर बार बँधा - बँधाया ढर्रा रहता है और आस - पास लोगों की भीड़। वो जो एडवेंचर कहा जाता है...वह रहता जरूर है मगर कभी अपनी हिचक को तोड़ना मुमकिन नहीं हो सका था मगर इक्तफाक बहुत कुछ बदलता है जिन्दगी भी और सोचने का तरीका भी। विमेन इकोनॉमिक फोरम में जब शगुफ्ता को सम्मानित किए जाने की सूचना मिली तो उसने अपने साथ मेरे जाने की भी व्यवस्था कर दी थी मगर मुझमें हिचक थी।

हसीन इक्तिफाक थे
टिकट को रद्द भी करवाया मगर दिल्ली मुझे बुला रही थी तो इस बीच कविता कोश के मुक्तांगन कार्यक्रम में प्रसिद्ध कवियित्री रश्मि भारद्वाज माध्यम बन गयीं। बेहद स्नेहिल स्वभाव की रश्मि जी सम्बल देना भी जानती हैं। उनके माध्यम से और कवि जयशंकर प्रसाद की प्रेरणा को लेकर लिखे गए आलेख ने अकस्मात दिल्ली यात्रा की भूमिका लिख दी। 2016 में दिल्ली पहली बार गयी थी और देश भर की महिला पत्रकारों के साथ बीते उन लम्हों ने कुछ अच्छे दोस्त भी दिये मगर घूमना न हो पाया था। ये दोनों कार्यक्रम 4-5 दिनों के अंतराल पर थे तो मेरे हाथ में 4 दिन का वक्त था। 2 मई तक तो मैं शगुफ्ता के साथ होटल पर्सना इंटरनेशनल में ठहरने वाली थी मगर इसके बाद...?
सम्मान और प्रमाण पत्र


तैयारी तो शुरू हो गयी
इस सफर की खूबसूरती इस बात में थी कि इस सफर को भी मैंने चुना था और इसके इंतजाम भी खुद किये थे। सिद्धार्थ की मदद से फ्लाइट बुक करवा ली तो अब रहने के लिए जगह देखनी थी। पहले द्वारिका सोचा क्योंकि मुक्तांगन का कार्यक्रम स्थल बिजवासन और हवाई अड्डा दोनों नजदीक थे मगर बाद में पता चला कि वह दिल्ली का न्यूटाउन है इसलिए कोई फायदा नहीं है। मित्र चंचल ने सलाह दी कि चाणक्यपुरी या आर के पुरम जैसे इलाके सही रहेंगे। माधवी (माधवी श्री) दी की सलाह पर यूथ होस्टल में डोरमेटरी और सस्ते कमरे भी देखे मगर वहाँ पहले से बुकिंग सम्भव नहीं थी और डोरमेटरी क्या होती है...मुझे यह भी पता नहीं था। दिल्ली में बंग भवन के बारे में जानती थी मगर कोई खास जानकारी नहीं थी। ऐसी स्थिति में तारणहार मेरे मित्र तथा सलाम दुनिया के सम्पादक संतोष बने और उन्होंने बंग भवन में भगत जी से परिचय करवा दिया और बात बन गयी। आनन - फानन में बुकिंग हो गयी..इत्मिनान मिला।

चलो, हवा से करें चंद बातें

दिल्ली की फ्लाइट 30 अप्रैल को थी...सुबह की। अपने शहर से शिकायतें भले ही कितनी भी हों मगर जब उसे छोड़कर जाना होता है तो मोह बढ़ जाता है और दूसरे शहर में जाकर वह इश्क बन जाता है। सुबह की खाली सड़कें और अँगड़ाई लेता मेरा कोलकाता....। ऊफ...जिन्दगी से भरा...मैं बहुत याद करने वाली थी अपना शहर। हवाई अड्डे पर शगुफ्ता से मुलाकात हुई। हम फ्लाइट में बैठे और हवा से बातें शुरू हो गयीं।

मम्मा मुझे प्लेन उड़ाना है

मेरी आगे सी सीट पर तूफान एक्सप्रेस थी....वह एक छोटी बच्ची थी जिसने यात्रा को अपनी शरारतों और बातों से बोरिंग होने से बचा दिया। मम्मी का हाथ पकड़ती और पूछती --मम्मा, मैं यहाँ क्यों बैठी हूँ, मुझे प्लेन उड़ाना है तो दूसरी ओर जहाज के ऊपर -नीचे करने के क्रम में अपनी माँ का हाथ उसने कसकर पकड़ लिया...3 साल की बच्ची और वह जोर - जोर से माँ का हाथ पकड़े रही....मैं तुम्हारे बगैर कैसे रहूँगी....बच्चे कितना सोचते हैं। हम दिल्ली पहुँचे तो उस बच्ची के साथ तस्वीर भी खिंचवा ली...वह सचमुच बहुत प्यारी थी।


हुमायूँ के मकबरे में

और...वह हुमायूँ में किसी और की तलाश

शगुफ्ता ने मेरी मुलाकात शुशा से करवायी...एक एक आजाद ख्याल...बेबाक और हँसमुख शख्सियत...वह आपको उदास नहीं रहने देगी। उससे मिलकर  हम होटल की ओर जा रहे थे और दिल्ली की कड़ी धूप से घबराए बगैर हमने तय किया कि दो दिन में जितनी जगहें देख सकते हैं...देखेंगे...तो हुमायूँ का मकबरा सामने था। हम दोनों कार से उतर पड़े...कड़ी धूप थी और लोग कम थे...। दिल्ली में लोग शायद धूप में निकलना कम पसन्द करते हैं मगर हमको कब धूप की परवाह थी और मेरी छतरी तो मेरे पास ही थी। टिकट काउंटर पर अव्यवस्था थी। बाद में आने वाले लोग पहले टिकट कटवाकर जा रहे थे। खैर टिकट तो लिया हमने और हम अन्दर गये...महीन पच्चीकारी देखी...मकबरे के ऊपर फानूस या झालर  कभी हुआ करती होगी...अब नहीं है। अफसोस यह है कि लोग घूमने आते हैं...तस्वीरें खिंचवाते हैं मगर इतिहास कुछ कहना चाहता है...वह आवाज कोई नहीं सुनता। मकबरे को और भी अधिक संरक्षण की जरूरत है और उससे भी अधिक कद्र की...। पुरातत्व विभाग अकेले कुछ नहीं कर सकता जब तक कि हम ध्यान न दें।

दिल्ली में तो सूरज भी देर तक रुकता है
साइबा जी के साथ
होटल पहुँचकर....थोड़ा आराम किया...इसके बाद दिल्ली देखने का कार्यक्रम था। इस बीच फेसबुक की मदद से साइबा जी से भी मिलना हो गया और इसके बाद थोड़ा आराम कर हम पहुँचे क्नाट प्लेस मगर ज्यादा घूमना नहीं हो पाया। करोलबाग के फुटपाथ पर लगने वाला बाजार कहीं अधिक बेहतर लगा। इससे भी मजेदार बात यह लगी कि दिल्ली में सूरज लगभग 7 बजे अस्त होता है। शाम के 6.30 बजे कोलकाता भले अन्धेरे में डूब जाए, दिल्ली रोशन रहती है। दिल्ली की लाइफ लाइन मेट्रो है और ऑटो भी, बसें कम चलती हैं तो ऑटो वालों की चाँदी तो है। यहाँ कोलकाता की तरह आप 10 - 20 और 25 रुपये में सफर नहीं कर सकते..यहाँ ऑटो का किराया 30 और 40 से लेकर 150 रुपये तक हो सकता है और अगर आप मोल - भाव करते हैं तो सीधे सुन सकते हैं - बैठना हो तो बैठो वरना उतर जाए...यह हमने भी सुना।

1 मई

होटल की दीवारों पर कबीर से एक मुलाकात
कबीर दिखे

1 मई को द्वारका के ताज में विमेन इकोनॉमिक फोरम का सम्मेलन था। शगुफ्ता को सम्मानित किया गया और मैंने हौसला अफजाई की और साथ ही मैंने होटल की खूबसूरती देखी मगर सबसे अधिक तसल्ली होटल की दीवारों पर कबीर को देखकर मिली। एक दीवार पर कबीर के दोहे बड़ी खूबसूरती से सजाये गये थे। जीवन भर शहंशाहों को दुत्कारने वाले कबीर क्या सोचते होंगे खुद इन निर्जीव दीवारों पर देखकर?   साहित्य भला किसी की सम्पत्ति थोड़े न है...और किसने कहा कि अमीरों के घरों में साहित्य नहीं जा सकता बल्कि कबीर का होना मुझे आश्वस्त कर गया। इसके बाद हम गुरुग्राम पहुँचे जो दिल्ली के एक दूसरे छोर पर ही है और किनारे पर अत्याधुनिक शहर की ऊँची - ऊँची इमारतों को देखते हुए हम आ भी गये। हम शाम को होटल से ही सरोजिनी मार्केट गये...और यहाँ सामान बेचने का अन्दाज भी निराला था चोरी का माल खुले चौराहे में....कोलकाता के ओबेराय के पास इस तरह की आवाजें आप भी सुन सकते हैं। 

ताज द्वारिका में हम

2 मई

जामा मस्जिद और पराठे वाली गली

होटल की गाड़ी जो ली थी .उसके ड्राइवर थे जोगिंदर जी और उनको ही हमने कहा था कि पुरानी दिल्ली में हमें क्या देखना था। दिल्ली में लोग काम से मतलब रखते हैं मगर उनका रवैया आप पर निर्भर करता है। ड्राइवर चचा ने बताया कि आज से 25 साल पहले दिल्ली की आबादी इतनी नहीं थी...। सुबह 11 बजे हम जामा मस्जिद में थे। बगैर पंखे के यहाँ से झरोखों से आ रही ठंडी हवाओं ने हमें भी ताजा कर दिया और मस्जिद से बाहर झाँकने पर दिखता है मीना बाजार....। इसका भी अपना इतिहास है। मस्जिद में शरीर को ढकना अनिवार्य है तो बाहर ही आपको चोगे देने के लिए लोग तैयार मिलेंगे मगर सूर्यास्त के बाद यहाँ महिलाओं को जाने की अनुमति नहीं है...धर्म के नाम पर होने वाला एक और भेदभाव मन खट्टा कर गया।
शगुफ्ता के साथ जामा मस्जिद में

लाल किले से गुजरते हुए

उस जगह पर खड़ा होना जहाँ से देश के प्रधानमंत्री जनता को सम्बोधित करते हों और शान से तिरंगा लहरा रहा हो, एक अजीब सा रोमांच भर देता है। लाल किला जाते समय ही रास्ते में ड्राइवर चाचा ने सावधान किया था और उन्होंने एक रिक्शे वाले से मोल भाव करवाने में भी मदद की। रिक्शे पर बैठते ही पहली नसीहत सामान और बैग सहेजकर रखने की नसीहत मिली। किले के बाहर विशाल प्राचीर को देखते हुए गुजरना एक अद्भुत अनुभव था। बाहर से आने वाले हर व्यक्ति को शायद ऐसा ही महसूस होता होगा मगर दिल्ली वालों के लिए यह आम बात है। किले में बिजले के तार बिछाए जा रहे हैं मगर संरक्षण पर कितना किसका ध्यान जाता है, ये सोचने वाली बात है।
लाल किला परिसर में

 ऐसा नहीं है कि किले पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। दूसरी जगहों की तुलना में इसकी स्थिति बेहतर है मगर बहुत सी चीजें आपको सँग्रहालय से गायब भी मिलेंगी..दीवारों के प्लास्टर उखड़े और भग्न दीवारें तो हर ऐतिहासिक इमारत की परेशानी है। सबसे कड़ी सुरक्षा व्यवस्था लाल किले में ही है और इसकी एक वाजिब वजह भी है। लाल किले से गुजरते हुए आपको दोनों और कलाकृतियों का बाजार मिलेगा...दिल्ली में लाल किेले को डालमिया समूह को देने की चर्चा है और लोग इससे बहुत ज्यादा खुश नहीं हैं। कल्पना कीजिए कि लाल किले पर लिखा नजर आए डालमिया सीमेंट प्रेजेंट्स...पर ये भी कहा जा रहा है कि ऐसा नहीं है क्योंकि कम्पनी सिर्फ रख - रखाव करेगी।

पराठों की खुशबू और स्वाद
जामा मस्जिद के सामने ही लाल किला है और इनके बीच में है शानदार और बेहद खास पराठे वाली गली जहाँ आपके लिए थाली में कम से कम 2 पराठे लेना अनिवार्य है और हमने भी पराठों का लुत्फ जमकर उठाया। दोपहर के 3 बज चुके थे और घूमते - घूमते भूख लग गयी थी तो हमने भी छककर खाया। इस गली में कभी 14 - 15 दुकानें हुआ करती थीं मगर अब 4 दुकानें ही रह गयी हैं। आस - पास जरी या अन्य चीजों की दुकानें हैं मगर आप आते हैं तो खुशबू पराठों के देसी घी की ही खींचती है। यहाँ के बिजेंदर कुमार बताते हैं कि कभी यह दरीबा खुर्दा नामक गाँव हुआ करता था और गली 15वीं से 16वीं सदी की है जो मुगलों ने बसाई थी।
पराठे वाली गली के पराठे

अपने ही लख्ते जिगर से खबरदार ये शहर
पुरानी दिल्ली को लेकर नयी दिल्ली के ख्याल बहुत अच्छे नहीं हैं। एक ही शहर के दो अलहदा चेहरे और हमें मिली हिदायत -पुरानी दिल्ली है, सामान सम्भालकर रखें। यहाँ गरीबी है तो अपराध भी है। आपको हर कदम पर लोग समझाते हैं कि पुरानी दिल्ली में सम्भलकर रहने की जरूरत है...ये हिदायत एक तरफ अपने ही शहर के प्रति सोच का पता देती है तो ख्याल रखने वाले एक दिल का एहसास भी दे जाता है पर यह किला देखने के लिए मुझे 3 दिन देने पड़े तो अगले दो दिनों का किस्सा भी आगे ही आने वाला है।

अपना बंगाल.....अपना बंग भवन
हेली रोड पर स्थित बंग भवन आना अपने घर आने जैसा है। 2 मई शाम 4 बजे मैं बंग भवन पहुँची। अब शगुफ्ता के जाने के बाद इस यात्रा पर अब मुझे खुद निकलना था और खुद ही देखना था। इतिहास से मुझे प्यार है और प्राचीन भारत की हर बात खींचती है। पता नहीं क्यों पहले दिन ही पुराने किले में जाकर अजीब सा खिंचाव महसूस किया और यही खिंचाव था कि इस किले को देखने 3 बार गयी और क्या पता फिर जाऊँ। बंग भवन में मेरा कमरा (जो कि डोरमेटरी था) 701था। थकी थी तो नींद आ गयी और रात को दो दक्षिण भारतीय महिलाओं ने दरवाजा खुलवाया जो बस रात गुजारने के लिए ही पहुँची थी।
हेली रोड स्थित बंग भवन


 इनमें एक हैदराबाद की थी तो दूसरी विजयवाड़ा की। रात को बंग भवन की कैंटीन में लुची व आलूदम खाया। मैंने सरल हिन्दी और थोड़ी अँग्रेजी में बात की से एक महिला हिन्दी समझती थी और मैंने भी हिन्दी में ही बात की मगर उसके साथ जो दूसरी महिला थी...उसने हिन्दी की समझ होते हुए भी जब अँग्रेजी में बात करने को कहा तो मैंने असमर्थता जता दी और बता दिया कि वह हिन्दी नहीं जानतीं तो मेरी अँग्रेजी भी अच्छी नहीं है। इसके बाद वह कुछ नहीं बोलीं और हम खिचड़ी भाषा में ही बात करते रहे। सुबह तक तक हम गप भी मारने लगे थे।

3 मई

दिल्ली के जिगर में हरियाली का टुकड़ा और वैशाली के रास्ते
दिल्ली जाने के बाद मुझे माधवी दी से मिलना था क्योंकि उनसे बगैर मिले दिल्ली का सफर अधूरा रहता है तो उनसे बात की। बंग भवन में भगत जी से मिली और वे परम हँसमुख व्यक्ति हैं। अपने घर से दूर होने पर घर की आहट भी अच्छी लगती है, यही स्थिति हर जगह है। यहाँ लोग अपने दिल में अपना घर बचाकर रखते हैं और घर की याद दिलाने वाला मिल जाए तो बात ही क्या है। बंग भवन के लोगों में भी कुछ ऐसा ही है और बांग्ला में बात करना मेरे लिए और भी अच्छा ही रहा। बंग भवन की व्यवस्था न सिर्फ किफायती है बल्कि बहुत अच्छी है। मुझे यहाँ की चाय बहुत पसन्द आयी। यहाँ के करोलबाग बाजार  में आपको सीबीआई के नाम पर ठगी करने वालों से बचने और महिलाओं का सम्मान करने की सलाह आपको लाउडस्पीकर पर हर दो कदम पर मिलेगी...कोलकाता में अब तक यह नहीं देखा।
माधवी दी के साथ लोदी गार्डेन में

चाय पीकर ही मैं निकली और और माधवी दी से मिलने चल पड़ी। हम चिन्मय मिशन के विशाल प्राँगण में मिले और यहाँ से लोदी गार्डेन चले आए जो बेहद खूबसूरत और विशाल है मगर हालत वही है। कहीं - कहीं गंदगी भी भी दिखी और मकबरों के बीच वक्त को चुराते युवा भी दिखे। माधवी दी ने महिला प्रेस क्लब की चाय पिलायी और नाश्ता भी करवा दिया।   मैं दिल्ली आयी थी और मुझे रश्मि जी से भी मिलना था जो हिन्दी की वरिष्ठ कवियित्री हैं और मुझे दिल्ली तक ले जाने का बड़ा कारण भी उनकी वजह से बना था। माधवी दी से मिलकर उनकी सलाह पर मेट्रो से राजीव चौक आयी और फिर वहाँ से वैशाली की मेट्रो पकड़ी। दिल्ली की मेट्रो में खुद ही टिकट खरीदने की सुविधा है और उससे भी अच्छी बात यह है कि यह हिन्दी में भी उपलब्ध है, सच्ची मन खुश हो गया। मेट्रो से ही दिल्ली दर्शन करके वैशाली उतरी और ऑटो के बाद रिक्शे से भटकते - भटकते उनके बताए पते पर गयी मगर इस बीच रास्ते भर रास्ता पूछना पड़ा।
रश्मि जी और  माही के साथ

 दिल्ली का उपनगरीय रूप है यह। रश्मि जी की बेटी माही बेहद प्यारी है और उनके मृदु स्वभाव ने मेरी थकान दूर कर दी। उनके फ्राइड राइस का स्वाद तो अब भी जुबान पर है। वहाँ से उनके बताने पर प्रगति मैदान तक की मेट्रो ली कि किले का सँग्रहालय भी देख डालूँ मगर जब तक गयी वह बंद हो चुका था। वहाँ के कर्मचारियों की सलाह पर अन्दर तक गयी जहाँ खुदाई चल रही थी...अन्दर तक और अधिकारियों से बातें कर एक - दो तस्वीरें लीं।

4 मई
राष्ट्रपति भवन, संसद और सँग्रहालय से होकर और इंडिया गेट के रास्ते
सुबह की चाय के बाद राष्ट्रपति भवन देखने निकल पड़ी और यह अद्भुत अनुभव था। सीढ़ियों को छुआ तो जाने क्यों आँखें छलक पड़ी...इस अनुभूति को अभिव्यक्त करना आसान नहीं है। वहीं पर एक परिवार को कहकर तस्वीर खिंचवा ली और यहीं पर मिले अनिल जी जो विदेश मंत्रालय के लिए गाड़ियाँ देते हैं। वह हर जगह रास्ता पूछकर ही निकाल रही थी और मुझे सँग्रहालय देखना था।
राष्ट्रपति भवन की सीढ़ियों पर

अनिल जी ने मुझे बिटिया का संबोधन दिया और पूछा कि कैसे जाऊँगी..मैंने कहा कि पैदल या ऑटो से निकलूँगी। पता नहीं उनके मन में क्या आया, उन्होंने अपनी गाड़ी से मुझे सँग्रहालय तक भी छोड़ दिया। दोपहर 2.15 तक मुझे संसद परिसर देखने पहुँचना था।
राष्ट्रीय सँग्रहालय परिसर में

मित्र चंचल ने व्यवस्था कर रखी थी...थोड़ी सी परेशानी के बाद मोबाइल जमा किया और भीतर घूमकर सब देखा। यह अलग बात है कि मेरे सवालों और मेरी जिज्ञासा ने सबको परेशान किया। यहाँ से निकलकर मैं बहुत थक गयी थी बाहर विशाल उद्यान में बैठ गयी और वहाँ बैठे पत्रकार बंधुओं से भी मेरा परिचय हो गया।
इसके बाद शाम को इंडिया गेट  पहुँची।  लाल किले की तरह आपको यहाँ पर भी तस्वीरें खींचने को लोग मिलेंगे। किनारों पर छोटा - मोटा बाजार भी है। वहाँ से फिर एक बार सरोजिनी मार्केट पहुँचीं।   थोड़ी सी खरीददारी कर वापस अपनी डोरमेटरी। दिल्ली की सड़कों पर पैदल यात्रियों को पहले जाने की सुविधा मिलती है और इस निर्देश का पालन भी सब करते हैं।
इंडिया गेट

5 मई

उग्रसेन की बावली...बंगाली मार्केट और इस्कॉन की शांति से गुजरना

हेली रोड के पास ही ऐतिहासिक उग्रसेन की बावली है जहाँ कभी पानी सहेजकर रखा जाता होगा। उसे देखा और उसके बाद मुझे द्वारिकाधीश मंदिर देखना था। उसका पता नहीं चला मगर इस्कॉन मंदिर को देखा। गजब का स्थापत्य और सुकून देने वाली शांति मगर बाजार तो यहाँ भी है। वस्त्रों से लेकर प्रसाद तक और एक रेस्तरां भी है। इस्कॉन मंदिर का गोविन्दा रेस्तरां यहाँ भी प्रसिद्ध है। यहाँ से फिर मेट्रो पकड़ी और पहुँची अक्षरक्षाम मंदिर जहाँ मेट्रो स्टेशन ही इसी नाम से है। हर दूसरा रिक्शा आपको मंदिर तक पहुँचाने के लिए तैयार रहता है। यहाँ भी घुटने के ऊपर के वस्त्रों पर रोक है। एक कन्या को तो मेरे सामने ही कमर से नीचे ढकने के लिए वस्त्र दिए गए। गजब  का स्थापत्य और उससे भी मजबूत सुरक्षा....मतलब छोटा -मोटा शहर ही है।  संसद की तरह ही मंदिर में मोबाइल ले जाने की इजाजत नहीं है और न ही कोई सामान। तपती दोपहर में खाली पैर चलना भी परीक्षा की तरह था मगर वह भी पार हुआ। यहाँ से वापस  से पुराने किले की अधूरी कहानी को पूरा करने निकल पड़ी और इस बार आखिरकार सँग्रहालय देखा।
इस्कॉन मंदिर

वो बर्तन भी देखे जो महाभारतकालीन बताये जा रहे हैं मगर सच कहूँ इस पौराणिक व ऐतिहासिक धरोहर को जितना मान मिलना चाहिए, वह नहीं मिल रहा है और दिल्ली की तमाम धरोहरों में यह जगह सबसे अधिक उपेक्षित है। यहाँ लोग इतिहास के मोह में न के बराबर जाते हैं और अधिकतर लोगों के लिए यह रति स्थल है...ये दुःखद है। खैर पुराने किले के बाहर मुझे वही बच्ची मिली जिससे मैंने फूल खरीदे और इंडिया गेट के पास जो पॉपकॉर्न खरीदे थे...वह उसे पैसों के साथ थमा दिये। उसकी आँखों में जो उल्सास था, वह करुणा भरी सुन्दरता लिए हुए था। यहाँ से एक बार फिर चाँदनी आयी और पराठों के साथ थोड़ा मीठा भी खरीदा। अगले दिन की तैयारी भी करनी थी इसलिए लौट आयी।

6 मई
कलात्मक संस्कृति में लिपटा साहित्य का मुक्तांगन

रविवार को दोपहर 12 बजे मैंने बंग भवन से प्रस्थान किया। भगत जी ने ओला बुक करवा दी। सब पता नहीं क्यों एक भावनात्मक लगाव से जुड़ गए थे। मैंने पानी भरने की जगह पूछी तो बोतल भी भर दी गयी..यह बहुत सुखद था।
बंग भवन और भगत जी

अब मैं बिजवासन की राह पर थी..और वहाँ कुछ जल्दी ही पहुँची जहाँ जाना था। कविता कोश का मुक्तांगन एक कैनवस की तरह है जिस पर आपको खूबसूरत तस्वीरों सी सजी दीवारें ही नहीं बल्कि हर एक फर्नीचर भी दिखता है। मन मोहने वाली जगह थी और उससे भी स्नेहिल लोग...जिनको मैं नहीं जानती थी, वे भी इतने प्रेम से मिले जैसे न जाने कब से जानते हों।
मुक्तांगन परिसर

 मेरी समझ में नहीं आ रहा था मगर रश्मि जी जैसे सब समझ रही थीं। उन्होंने न सिर्फ परिचय करवाया बल्कि मेरी फ्लाइट को देखते हुए कार्यक्रम में भी फेरबदल की। गीताश्री जी का नाम सुना था, उनको देखा भी और उनके साहित्यिक प्रसंगों में छिपे हास्य पर हँसी भी क्योंकि वह इस अंदाज में सुनातीं कि आप हँसे बगैर रह नहीं सकते। प्रज्ञा जी से मिली और अर्चना वर्मा जी के हाथों सम्मानित होना एक उपलब्धि बन गया।
आराधना जी के साथ

पँखुरी जी से मिलना न हो पाया था, यहाँ उनसे भी मुलाकात हो गयी। इन सब के बीच में आराधना जी जिस सहृदयता से सारी व्यवस्था देख रही थीं...वह अद्भुत था। मुक्तांगन के लोग और इंटिरियर के साथ वहाँ के समोसे और जलेबियाँ भी बेहद स्वादिष्ट थे।
सम्मान पाना सुखद अनुभव और उपलब्धि बना

मैंने कविता पढ़ी और मुझे अफसोस रहेगा कि मुझे बीच से ही निकलना पड़ा। तस्वीरें भी हुईं और अंत में मुझे समय से पहले एयरपोर्ट पहुँचा दिया गया...सच में ऐसे अनुभव कम होते हैं और 2018 मई की दिल्ली यात्रा मेरे सुखद अनुभवों में शामिल हो चुकी है।

अपना शहर...अपनी सड़कें...गलियाँ और अपना घर

शाम 6.30 बजे की फ्लाइट थी और यह फ्लाइट समय के पहले कोलकाता पहुँची। मेरा शहर मेरे सामने था...यहाँ कोई हड़बड़ी नहीं थी...सब आराम से हो रहा था। प्रीपेड टैक्सी बुक करवाकर लौटी..और एक सप्ताह के बाद वापस घर आ चुकी थी मगर दिल्ली की यादें मुक्तांगन से मिले प्रमाणपत्र और शील्ड के रूप में कमरे में सज चुके हैं...शुक्रिया मुक्तांगन....शुक्रिया रश्मि जी...शुक्रिया आराधना जी...शुक्रिया दिल्ली।

गुरुवार, 19 अप्रैल 2018

तर्क का उत्तर तर्क हो सकता है, उपहास नहीं..कमियाँ देखते हैं तो उपलब्धियों को स्वीकार भी कीजिए



महाभारत को लेकर त्रिपुरा के मुख्यमंत्री का बयान सुर्खियों में है...मीडिया को एक नयी स्टोरी मिली...आधी हकीकत और आधा फसाना...जैसे कार्यक्रमों के लिए एक नया मसाला मिला....सोशल मीडिया पर  मजाक उड़ाया जाना जरूरी है मगर आप अपने प्राचीन ग्रंथों...और रामायण व महाभारत जैसे ग्रन्थों पर विश्वास करते हैं तो आप एक झटके से इनको खारिज नहीं कर सकते।

 यह शोध का विषय है, उपहास का विषय नहीं है..यह मानसिकता कि सब कुछ हमें पश्चिम से मिला है..और अपनी उपलब्धियों का माखौल उड़ाना कहीं न कही हमारी पश्चिम पर निर्भरता के कारण है....आज जो चीजें परिवर्तित रूप में हमारे सामने हैं,वे किसी और रूप में पहले थीं...आपने उसे खोया है। भला यह कैसे सम्भव है कि कोई कल्पना के आधार पर एक या दो नहीं बल्कि पूरे एक लाख या उससे अधिक श्लोंकों की रचना कर डालें।

 आप नाम भले इंटरनेट का न दें...मगर महाभारत और इसके पहले कुछ तो था जिसे हम और आप नहीं जानते...मुख्यमंत्री विप्लब देब अगर संजय ने महाराज धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र का आँखों देखा हाल सुनाया तो कोई तो तकनीक ऐसी रही होगी...जिससे ये सम्भव हुआ होगा जबकि उस समय में मोबाइल फोन का सहारा भी उनको नहीं लेना पड़ा। अगर आप पुष्पक विमान को हवाई जहाज नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे? आज आप किताबें पढ़ते हैं, तब मंत्रों का प्रचलन था और मंत्रों के माध्यम से ही सिद्धि होती थी...क्या भारत में शल्य चिकित्सा का इतिहास नहीं है।

क्लोनिंग - पूर्वजों ने महाभारत काल में ही क्लोनिंग कर दिखाई थी | महाभारत के आदिपर्व में इसका वर्णन अध्याय –  115 में मिलता है | कुन्ती को सूर्य के समान तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ | यह सुनकर गांधारी ने, जिसे 2 वर्षों से गर्भ होने के बावजूद संतान की प्राप्ति नहीं हुई | जिससे परेशान होकर गांधारी ने स्वयं अपना गर्भपात कर लिया | गर्भपात होने के बाद लोहे के गोले के समान माँसपेशियाँ निकली | इस समय व्यास ऋषि को बुलाया गया | उन्होंने इस ठोस मांसपेशियों का निरीक्षण किया | व्यास ऋषि ने इस मांसपेशियों को एक कुण्ड में ठंडा कर विशेष दवाओं से सिंचित कर सुरक्षित किया |

 बाद में इन मांसपेशियों को 100 गांठ ( पर्वों ) में बाँटा तथा 100 घी से भरे कुण्डो में रख कर 2 वर्षों तक सुरक्षित रखा | 2 वर्ष बाद क्रमानुसार गांधारी के 100 पुत्र क्लोनिंग से ही जन्मे | महाभारत काल में शुक्राणु कोशिका यानी स्टेम सैल के द्वारा ही 100 कोरवों को जन्म देने की पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया का वर्णन इसमे लिखा हुआ हैं | गुरु द्रोणाचार्य भी टेस्ट ट्यूब पद्धति से जन्मे हैं। आप इस प्रसंग में नैतिकता पर प्रश्न उठा सकते हैं मगर तकनीक को नकार नहीं सकते। क्या ये टेस्ट ट्यूब बेबी की परिकल्पना के साकार होने जैसा नहीं लगता।
चक्रव्यूह 

मंत्रों से पांडवों का जन्म या द्रोपदी की पुकार पर कृष्ण का आना क्या आपको टेलिपैथी की याद नहीं दिलाता...जब कि वो तो उस समय वहाँ थे ही नहीं...क्या आपको कभी - कभी महसूस नहीं होता.। क्या वृन्दावन, मथुरा, काशी, अयोध्या...जैसे नाम आज भी प्रचलित नहीं हैं....यह कैसे सम्भव हुआ और क्या कुछ नाम परिवर्तित रूपों में नहीं हैं...क्या आपको कान्धार गान्धार का परिवर्तित रूप नहीं लगता...कुरुक्षेत्र...रामेश्वरम सेतु आज तक कैसे हमारे बीच  उपस्थित हैं...बताइए..

अगर आपको कोई याद करता है...कई बार घटनाओं का पूर्वानुमान भी क्या नहीं होता...हम क्यों बिप्लव देव पर हँस रहे हैं...आप कम से कम उनकी बात को परखिए तो सही..। हम नहीं जानते हैं तो यह हमारी कमजोरी है। द्रोपदी का जन्म अग्नि से हुआ...अगर नहीं हुआ तो सिद्ध कीजिए.....आप असहमत हो सकते हैं मगर माखौल उड़ाना तो उन प्रश्नों से भागना है जिन पर खोज करने की जरूरत है।

यह सही है कि अतीत में गलतियाँ हुईं, अन्याय भी हुआ मगर जिस तरह गलतियों से सीखा जा सकता है...उसी प्रकार अपनी उपलब्धियों और खूबियों पर बात करने में क्या हर्ज है। आज आप मिसाइलों की बात करते है और हथियारों को तो आज भी आग्नेयास्त्र कहा जाता है मगर उस समय जो वाण थे..या जिस सुदर्शन चक्र का, गांडीव धनुष का,...उल्लेख किया जाता है..क्या आप उसकी शक्ति को कमतर मान सकते हैं।


सोलर सिस्टम: विश्व के वैज्ञानिक जिस सोलर सिस्टम की खोज काफी बाद में कर पाए है उसके बारे में हमारे ऋगवेद में प्राचीन काल से वर्णन किया गया है। ऋगवेद के अनुसार ‘सूरज अपनी कक्षा में घूमता है और घूमते वक्त पृथ्वी और बाकी ग्रहों के बीच इस प्रकार संतुलन बनाए रखता है कि वे एक-दूसरे से ना टकराएं।’

धरती और सूर्य के बीच दूरी : आपने हनुमान चालीसा के बारे में तो जानते ही होंगे, जिसके एक श्लोक में कहा गया है कि “जुग सहस्त्र जोजन पर भानू, लील्यो ताहि मधुर फल जानू” इसका मतलब होता है भानु अर्थात सूर्य, पृथ्वी से जुग सहस्त्र योजन की दूरी पर है जो वैज्ञानिक खोज में सटीक पायी गयी है। अब आप सोच सकते है हनुमान चालीसा की रचना कितनी प्राचीन है।


धरती की सतह : 7वीं शताब्दी में भारतीय विद्वान ब्रह्मगुप्त ने वर्णन किया था, धरती की परिधि लगभग 36000 किलोमीटर है। बाद में वैज्ञानिकों ने गणना करने पर इसे 40075 बताया। इन दोनों आंकड़ों में केवल 1% का अंतर था। समय के अंतराल के कारण इस गणना में फेर होना जायज़ है।

ऑर्गन ट्रांसप्लैंट: आज जिस मेडिकल साइंस में ऑर्गन ट्रांसप्लांट पर खूब वाहवाही सुनने को मिलती है और इसे एक बड़ी कामयाबी माना जाता है इसके बारे में आपको बता दें कि ये तकनीक बहुत पुरानी है। पुराणों में इस बात का ज़िक्र है कि भगवान गणेश के शरीर पर हाथी का सिर लगाया गया था।

भगवान विष्णु के सर्वप्रमुख अस्त्र ने कई बार इसका प्रयोग कई रूपों में किया है।

कार्य क्षमता- यह केवल भगवान विष्णु की आज्ञा का पालन करता है और लक्ष्य को पूरी तरह तबाह कर देता है।

कलयुग समानता- मिसाइल

लाइव टेलीकास्ट : आज हम अपने घर बैठ कर टीवी पर लाखों किलोमीटर दूर की घटना या मैच का लाइव प्रसारण देखकर अपने विज्ञान का शुक्रिया अदा करते है पर आपको बता दें महाभारत काल में ये तकनीक इस्लेमाल करने का वर्णन है जिसमे संजय, धृतराष्ट्र को महाभारत का युध्द दिखाते हैं।

हमारे यहाँ अस्त्र -शस्त्रों की समुचित परिभाषा हैं। वो ज्ञान है जिसे देखने की जहमत हम नहीं करते और बड़ा कारण यह है कि कोई भी सटीक अनुवाद हमारे यहाँ उपलब्ध नहीं है और संस्कृत पढ़ना हमें पिछड़ापन लगता है लेकिन एक बात तो तय है कि आपको वर्तमान और भविष्य की बात करनी है तो आप हिन्दी. अँग्रेजी या किसी अन्य भाषा का सहारा ले सकते है मगर अतीत जानने के लिए तो आपको संस्कृत जाननी होगी।
अस्‍त्र  - प्राचीन भारत में 'अस्त्र' शब्‍द का प्रयोग दरअसल उन हथियारों के लिए किया जाता था जिन्‍हें मन्त्रों के द्वारा दूर से फेंका जाता था। इन्‍हें अग्नि, वायु, विद्युत और यान्त्रिक उपायों से प्रक्षेप किया जाता था।
शस्‍त्र  - वहीं 'शस्त्र' शब्‍द का प्रयोग ऐसे खतरनाक हथियारों के लिए किया जाता है जिनके प्रहार से चोट पहुंचती हो या मृत्‍यु तक हो सकती हो।


वैदिक काल में अस्त्र-शस्त्र - वैदिक काल में अस्‍त्र-शस्‍त्र को दो वर्गों में बांटा गया था। (1) अमुक्ता, यानी वे शस्त्र जो फेंके नहीं जाते थे। (2) मुक्ता, यानी वे शस्त्र जिन्‍हें फेंक कर हमला किया जाता था। मुक्‍ता के भी चार प्रकार हैं। इनमें, पाणिमुक्ता, यानी हाथ से फेंके जानेवाले और यंत्रमुक्ता, यानी यंत्रों द्वारा फेंके जाने वाले हथियार शामिल हैं। इसके अलावा 'मुक्तामुक्त' यानी वह शस्त्र जो फेंककर या बिना फेंके दोनों प्रकार से प्रयोग किए जाते थे। जबकि, 'मुक्तसंनिवृत्ती' वे शस्त्र हैं जो फेंककर लौटाए जा सकते थे। हम उन अस्त्रों की बात भी करते है...जिनका उल्लेख हमें मिलता है।

ये हैं महाविनाशकारी अस्‍त्र -
 महाविनाशकारी अस्‍त्रों में अधिकांश दैवीय थे। इन्‍हें मंत्र शक्‍ति के जरिए फेंककर हमला किया जाता था। हर विनाशकारी अस्‍त्रों पर अलग-अलग देवी-देवताओं का अधिकार होता है। इनके मंत्र भी अलग-अलग होते हैं। देवताओं द्वारा प्रदान किये गये इन अस्‍त्रों को दिव्‍य या मांत्रिक अस्‍त्र कहते हैं। आइए जानते हैं कौन-कौन से थे ये
आग्नेय : यह एक प्रकार का विस्फोटक अस्‍त्र था। पानी की फुहारों के समान ही यह अग्‍नि बरसाकर सबकुछ जलाकर भस्‍म कर देने में सक्षम था। इसके प्रतिकार के लिए पर्जन्‍य अस्‍त्र का प्रयोग किया जाता था। आज भी पिस्तोल और बंदूकों को खबरों में भी आग्नेयास्त्र भी लिखा जाता है।
पर्जन्य :यह भी एक प्रकार का विस्फोटक अस्‍त्र था। जल के समान अग्नि बरसाकर सब कुछ भस्मीभूत कर देने की शक्‍ति इसमें भी मौजूद थी। इसके प्रतिकार के लिए पर्जन्‍य का ही प्रयोग किया जाता था।
वायव्य :इस अस्‍त्र से भयंकर तूफान आते थे और चारो ओर अन्धकार छा जाता था।
पन्नग :इससे सर्प पैदा होते थे। इसके प्रतिकार के लिए गरुड़ अस्‍त्र छोड़ा जाता था।
गरुड़ : इस बाण के चलते गरुड़ उत्पन्न होते थे, जो सर्पों को खा जाते थे।
ब्रह्मास्त्र : यह एक अचूक और अतिविकराल अस्त्र है। इसके बारे में कहा जाता है कि यह शत्रु का नाश करके ही समाप्‍त होता है। इसका प्रतिकार दूसरे ब्रह्मास्त्र से ही हो सकता है।
पाशुपत : यह एक महाविनाशकारी अस्‍त्र है। इससे समस्‍त विश्व का नाश किया जा सकता है। बता दें कि महाभारतकाल में यह अस्‍त्र केवल कुंती पुत्र अर्जुन के पास ही था।
महाभारत का ही अवशेष है ये अवशेष शिमला से 100 किलो मीटर दूर करसोंग घडी में ममलेश्वर मंदिर में स्थित है ! यहाँ पर दो मीटर लंबा और तीन फिर उचा ढोल है इसे भीम का ढोल बताया गया है ये ढोल पांच हजार साल पुराण है इस मंदिर में करीब पांच हजार साल से ये ढोल रखा हुआ है इस ढोल के बारे में ऐसा खा जाता है की इस ढोल को भीम ने अज्ञात बास के समय बजाय था लोगो का ऐसा मानना है की यहाँ 5 हजार साल पहले अज्ञातवास के समय पांडवो ने कुछ समय इस जगह पर बिताया था उसी समय इस मंदिर में एक बड़ा ढोल भी रखा गया था !

नारायणास्त्र :यह भी पाशुपत के समान ही अत्‍यंत विकराल और महाविनाशकारी अस्त्र है। इस नारायण अस्त्र से बचाव के लिए कोई भी अस्‍त्र नहीं है। इस अस्‍त्र को एक बार छोड़ने के बाद समूचे विश्‍व में कोई भी शक्‍ति इसका मुकाबला नहीं कर सकती। मान्‍यता है कि इसका केवल एक ही प्रतिकार है और वह यह कि शत्रु अस्त्र छोड़कर नम्रतापूर्वक अपने को अर्पित कर दे। क्‍योंकि, शत्रु कहीं भी हो यह बाण वहां जाकर ही भेद करता है। इस बाण के सामने झुक जाने पर यह अपना प्रभाव नहीं करता। इन दैवीय अस्‍त्रों के अलावा 'ब्रह्मशिरा' और 'एकाग्नि' आदि विनाशकारी अस्‍त्र भी हैं।
बिहार के इस स्थान पर राजा पोन्ड्रक का राज था। पोन्ड्रक जरासंध का मित्र था और उसे लगता था कि वह कृष्ण है। उसने न केवल कृष्ण का वेश धारण किया था, बल्कि उसे वासुदेव और पुरुषोत्तम कहलवाना पसन्द था। द्रौपदी के स्वयंवर में वह भी मौजूद था। कृष्ण से उसकी दुश्मनी जगजाहिर थी। द्वारका पर एक हमले के दौरान वह भगवान श्रीकृष्ण के हाथों मारा गया।

इनके अलावा शक्‍ति, तोमर, पाश, ऋष्‍टि, वज्र, त्रिशूल, चक्र, शूल, असि, खड्ग, चंद्रहास, फरसा, मूशल
धनुष, बाण, परिघ, भिन्‍दिपाल, परशु, कुंटा, पट्टी और भुशुण्‍डी भी प्राचीन दुनिया के बेहद शक्‍तिशाली हथियार थे। ये जानकारी इंटरनेट पर भी उपलब्ध है..हम आज भी बहुत कुछ नहीं देखते मगर विश्वास करते हैं और नहीं विश्वास करते तो उसे खोजते हैं तो मजाक उड़ाने या किसी बात को सिरे से खारिज करना हो सकता है कि आसान हो मगर उसकी सच्चाई अगर आपने नहीं तलाशी तो आप किसी का मजाक नहीं उड़ा सकते। हम नहीं रहेंगे, तब भी यह धरती रहेगी और तब लोग भी हमारे होने पर सन्देह करेंगे क्योंकि उन लोगों ने भी हमको देखा नहीं होगा।
बैराठ - राजा विराट के मत्स्य प्रदेश की राजधानी के रुप में विख्यात बैराठ राजस्थान के जयपुर जिले का एक शहर है जिसे वर्तमान में विराट नगर के नाम से जाना जाता है. बताया जाता है कि इस प्राचीन नगर में पांडवों ने अपने अज्ञातवास का समय बिताया था.
आज सिन्धु घाटी की सभ्यता एक सच है....कुरुक्षेत्र और द्वारिका का पाया जाना भी एक सच है। आप चीन की दीवार पर भरोसा कर सकते हैं तो अपनी परम्परा पर बात करने में क्या परेशानी है...हम इतिहास की बुराइयों, रूढ़ियों को खारिज करें.....जो आज के समय में हम स्वीकार नहीं कर सकते मगर जिस तरह स्त्री और पिछड़े वर्ग के प्रति संवेदनहीनता एक बड़ा सच है, उसी प्रकार तकनीक और विज्ञान का होना भी सच है। आप असहमत हो सकते है मगर आप प्रमाण दीजिए कि ये गलत है...बगैर प्रमाण के किसी का मजाक उड़ाना आपको संवेदनहीन बनाता है और यह आत्ममुग्धता का प्रतीक है।
महाभारत काल में इंद्रप्रस्थ और खांडवप्रस्थ का जिक्र किया गया था. करीब पांच हजार साल पहले के इस शहर को आज भारत की राजधानी दिल्ली के तौर पर जाना जाता है.
मैंने नहीं देखा, हमारे समय में नहीं है...या प्रमाण नहीं है...कहकर खारिज करने से पहले एक बार उस पर नजर तो डाली होती...इतनी पराधीन चेतना क्यों है आपकी और आप इतने हीन क्यों हैं कि आपको विश्वास ही नहीं होता कि आपके देश में कुछ अच्छा भी हुआ होगा...दुःखद ही नहीं....दयनीय स्थिति है आपकी। वैसे भी बिप्लव देव ने कोई हेट स्पीच नहीं दी है बल्कि वह बात कही है जिस पर हम न भी सहमत हों तो एक बार विचार करें। भविष्य को मजबूत बनाने के लिए वर्तमान के प्रयत्न काफी नहीं होते बल्कि अतीत के अनुभवों की भी जरूरत पड़ती है।

रामायण और महाभारत के कुछ शहरों के बारे में बताने की कोशिश की है। इसके अतिरिक्त इन नगरों के बारे में भी जानकारी एकत्र कर प्रस्तुत की जायेगी। इतिहास पर भरोसा करना सीखिए...अतीत था तो वर्तमान है...अतीत की गलत बातों को न दोहराएं, उससे सीखिए...भविष्य तो अपने आप सुन्दर बनेगा...।




गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

इस गुनाह में आप बराबर के साझीदार हैं



सबसे आसान है अखबारों..पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को घेरना..विज्ञापनों की भरमार के लिए उनको कोसना...उनके कार्टून बनाना...और उन पर यदा - कदा कविताएं और व्हाट्स ऐप स्टेटस बनाना। कहने का मतलब यह है कि मीडिया को घेरना सरकारों की आदत तो है ही मगर उसकी अदालत जनता में सबसे ज्यादा लगती है। तो अब लगा कि जनता की अदालत में पेशी होती ही रहती है तो अपना पक्ष भी रखा जाये...मगर पत्रकार अपने लिए न के बराबर बोलते हैं। चैनलों पर और अखबारों के चेहरे पर आपको उनके मालिक और सम्पादक...एंकर या संवाददाता दिखते हैं...वह नहीं दिखते जो नेपथ्य में होते हैं...जो कभी कैमरामैन..तो कभी वीडियो एडीटर तो कभी पेजमेकर होते हैं...वह भी नहीं दिखते जो मशीनों के बीच काम कर रहे होते हैं...जिनकी अपनी जिंदगी बेरंग होती है मगर आपकी जिंदगी में रंग भरना उनकी जिम्मेदारी होती है। कोई सेवानिवृत पत्रकार या कोई बेरोजगार मीडियाकर्मी जब भूखों मर रहा होता है...वह किसी अखबार के पन्ने पर नहीं छपता...वह किसी विमर्श का भी हिस्सा नहीं होता। कोई महिला पत्रकार जब भीड़ में गुंडों से जूझ रही होती है या कभी उसके दफ्तर में उसका उत्पीड़न होता है...डेडलाइन और घर के बीच जब वह परेशान होती है....आप नहीं देख पाते और न ही उसकी आवाज सुनी जाती है क्योंकि अधिकारों की बात करने वाले अखबारों में विशाखा गाइडलाइन का लाभ महिलाओं को मिले...इसके लिए तो कोई कमेटी ही नहीं है...अलबत्ता उसे ब़ॉस को फँसाने का आरोप लगाकर नौकरी से जरूर निकाल दिया जाता है या वह उत्पीड़न से परेशान होकर खुद ही अपनी मानसिक शांति के लिए नौकरी छोड़ने को बाध्य होती है। उसके लिए कोई रैली नहीं निकाली जाती और न ही कोई भूख हड़ताल होती है। रात के 9 बजे जब उसे अपने बच्चों का ख्याल आता है तो वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती। मीडियाकर्मियों के बच्चे तो कभी माँ तो कभी पिता के साथ ही बड़े होते हैं..कई महिलाएँ बच्चों के लिए ही डेस्क पर आती हैं। महिला पत्रकारों को खबरें आसानी से मिलती हैं या नेता व अधिकारी इनकी शक्लें देखकर एक्सक्लूसिव देते हैं (आम धारणा यही है) या फिर उनको अधिकतर पेज थ्री की जिम्मेदारी भी दी जाती है..सभा संस्थाओं की जिम्मेदारी दी जाती है...इससे आगे बढ़ीं तो शिक्षा...निगम और अब अपराध और राजनीति जैसी बीट भी उनके हिस्से आ रही है...और ये करना आसान नहीं होता। कई बार एक साथ 40 - 50 कर्मचारी किसी मीडिया संस्थान से निकाल दिये जाते हैं...उनको जबरन वीआरएस दिया जाता है मगर वह किसी अखबार के पहले पन्ने पर नहीं दिखता...प्रतिद्वंद्वी भी इस मामले में साझेदारी का ख्याल रखते हैं।
हम मीडियाकर्मी जनता के सवालों को लेकर जूझते रहते हैं क्या जनता कभी हमारे लिए सोचती है? पत्रकारों की हत्याएँ होती रही हैं...पत्रकार पीटे जाते रहे.....कितने संगठन सड़क पर उतरे...बता दीजिए? ये जो गुणवत्ता का ढिंढोरा हर सेमिनार में पीटा जाता है....वो ढिंढोरा पीटने वाले लोग भी टीआरपी के पीछे भागते हैं...उनको अपने उन कार्यक्रमों में भी मंत्री चाहिए जहाँ उनकी जरूरत नहीं है...क्योकि मीडिया तो मंत्री के पीछे आता है न। मंचों पर पार्टियों को गरियाने वालों को पार्षदों के आगे - पीछे हाथ बाँधकर घूमते देखा है....और ऐसे लोग हम मीडियावालों से नैतिकता की उम्मीद करते हैं...? जरा अपने गिरेबान में झाँकिए साहेब। हम पर आरोप लगते हैं कि हम बाजार के पीछे भागते हैं मगर क्या आप नहीं भागते...क्या आपने समाचारों से अधिक विज्ञापन देने वाले अखबारों का बहिष्कार किया है? सबसे अधिक नग्न तस्वीरों से भरने वाले अखबार और सनसनी फैलाने वाले अखबार आपकी नजर में सबसे आगे हैं और आप वहीं जाते भी हैं...वही खरीदते भी हैं और बिकाऊ छोटे मीडिया संस्थान हैं। 15 साल हो रहे हैं और मैंने किसी भी संस्था को नहीं देखा जिनको मंत्री और राज्यपालों का मोह न हो...जो विज्ञापन देने के लिए प्रसार संख्या न देखे...। यहाँ तक कि साहित्यकार....प्रोफेसर और बुद्धिजीवी भी अपनी कविताओं को सबसे छपवाने के लिए गुणवत्ता और विश्वसनीयता को नहीं प्रसार संख्या को ही मापदंड बनाते हैं। वह सारे अखबारों में अपनी खबर भेजते हैं मगर जब उनके कार्यक्रम होते हैं तो छोटे - मोटे अखबार अपनी तमाम आदर्शवादिता के बावजूद उनकी सूची में नहीं होते और न ही उनको खरीदा जाता है जबकि इन अखबारों में समाचार विज्ञापन से अधिक होते हैं..लेख भी स्तरीय होते हैं...मगर बहुत से लोग जब फोन करते हैं तो उनका अंतिम प्रश्न यही होता है कि वह पत्रकार अधिक प्रसार संख्या वाले अखबार या मीडिया में किसी का सम्पर्क दे सकता है? खबर छपे भी तो फुटेज और कटिंग आप उसी अधिक प्रसार संख्या वाले अखबार की ही साझा करते हैं...जरा सोचिए क्या आप पूर्वाग्रह से मुक्त हैं?
 नतीजा यह होता है कि प्रसार संख्या कम होते जाने के कारण या तो उनको समझौते करने पड़ते हैं...या फिर न चाहते हुए भी उसी होड़ में शामिल होना पड़ रहा है तो क्या आप इस गुनाह में बराबर के साझीदार नहीं है? जो बुरा है, उसे प्रश्रय कौन दे रहा है...कभी अन्दर झाँककर देखिए...जो खुद बेईमानों की पूजा करें...उनको नैतिकता का ज्ञान देने का कोई अधिकार नहीं है...आप जनता जनार्दन हैं या सरकार हैं...मगर ये अधिकार आपको नहीं है। सनसनीखेज खबरें करने वालों को आप अव्वल बनाते हैं....अंगप्रदर्शन करने वालों की तस्वीरों से पटी सामग्री वाले अखबार आप खरीदते भी हैं और देखते भी हैं...उनकी हिम्मत बढ़ाने वाले आप ही हैं...तो ऐसे में मीडिया जब व्यावसायिक हो रहा है तो आपको शिकायत क्यों है?
नवजागरण काल में भी जनता के असहयोग के कारण ही उदन्त मार्तंड जैसा अखबार भी साल भर में बंद हो गया...जनता ने अच्छी गुणवत्ता वाले अखबारों का साथ तब ही दिया है जब सामग्री उनके अनुकूल हो। आज जब आपका टेस्ट ही अच्छा नहीं है तो मीडिया अकेले क्या करेगा...आप जब खुद बुराई को प्रश्रय देंगे तो कौन सा पत्रकार आपके लिए लड़ेगा और क्यों लड़ेगा? आप फेक न्यूज से परेशान हैं मगर उनको बगैर देखे वायरल करने वाले तो आप ही हैं...अगर आपको किसी शहीद की जगह आँख मारने वाले लड़की में दिलचस्पी है तो मीडिया भी वही दिखाएगा क्योंकि आखिरकार उसे आपको ही खुश करना है तभी तो वह टिकेगा। जब आपने ही बेईमानी...सत्ता और अहंकार के आगे घुटने टेक दिये हों तो लोकतंत्र का चौथा खम्भा आपकी मदद कैसे करेगा इसलिए जब भी मीडिया को कोसिए....तो याद रखिए....दूसरी उंगली आप पर भी उठेगी। इस गुनाह में आप भी बराबर के साझीदार हैं।