शनिवार, 21 नवंबर 2020

सरंचना चाहिये तो खर्च करिये, बहाने मत बनाइये




हम सब न बड़े कनफ़्यूज़ लोग हैं, वेतन ज्यादा से ज्यादा चाहिये, भत्तों में कमी बर्दाश्त नहीं, सुविधायें ए क्लास चाहिये, हमें स्टेटस की ऐसी लत लगी है की बजट न हो, तब भी कर्ज लेकर, खर्च कम करके बच्चों को महंगे निजी स्कूलों में पढ़ायेंगे मगर सरकारी स्कूलों को सुधारने पर ध्यान नहीं देंगे। अब जरा आपत्तिजनक बात करती हूँ। इनमें से कई गरीब और जरूरतमंदों को धरने देते समय ऐसी सिगरेट पीते देखी है, जिसका एक पैकेट ही 100-150 रुपये का आता होगा, हॉस्टल्स से शराब की बोतलें भी पकड़ी गईं हैं, आउटसाइडर आते हैं, पड़े भी रहते हैं, मैने ऐसे भी विद्यार्थी देखे हैं जो कड़े परिश्रम से पढ़ते और पढ़ाते हैं, नौकरी करते हैं, और अपने सपने पूरे करते हैं। हमें सरंचना चाहिये और 10 रुपये किराये में रहना है। इस देश में गरीब हैं मगर गरीबी बाधा नहीं बनती तभी यहाँ ए पी जे कलाम हुए जिन्होने अखबार बेचकर पढ़ाई की। अगर आप अपनी वेतन वृद्घि के लिए 40 साल इन्तजार नहीं कर सकते तो किसी संस्थान को इस कड़ी प्रतियोगिता और महंगाई के बीच क्यों फीस बढ़ाने के लिए इन्तजार करना चाहिये, क्या ये बेहतर नहीं होगा की विद्यार्थियो के लिए आंशिक कार्य की व्यव्स्था करनी चाहिये, 200-300 या 600 रुपये कोई इतनी बड़ी रकम नहीं है। जितनी सहानूभूति देने में शब्द खर्च किये जाते हैं, उतने शब्द आप इन बच्चों को काम देने में कर सकते हैं और अगर इसकी अवधि में थोड़ा लचीलापन हो तो यह पढ़ाई से बिल्कुल नहीं टकरायेगा। यकीं नहीं है तो माध्यमिक और उच्च माध्यमिक के नतीजे देख लीजिये, उच्च शिक्षा में तो स्थिति बेहतर है और राजनीति बक्श दे तो और बेहतर होगी।

हम अपने युवाओं को खैरात की लत न लगने दें तो ही बेहतर है। हमारी समस्या यह है की हमें अपने संस्थानों को विश्व के शीर्ष संस्थानों में देखना है। हमें नौकरी भी लाखों की चाहिये मगर फीस हम अंग्रेजों के जमाने की ही देंगे। मेरी समझ से यह गलत है। इस देश की बढ़ती आबादी और लाखों शिक्षण संस्थानों को उन्नत कर पाना किसी सरकार के लिए सम्भव नहीं है। खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश, राजस्थान जैसे बड़े राज्यों में तो और कठिन है। दरअसल, शिक्षा विरोधी सरकार नहीं है, हम खुद हैं जो चाहते ही नहीं की कई नियमों में जकड़े सरकारी संस्थान निजी संस्थानों के समकक्ष खड़े हो सकें। किसी के हाथ -पैर बाँधकर उसे रॉकेट उड़ाने के आदेश जैसा ही है यह। सरंचना चाहिये तो खर्च करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिये।
बाकी हिप्प्क्रेसी में तो डॉक्टरेट है ही
जरूरत की सही परिभाषा रखिये।
संस्थान की गरिमा को ताक पर रखने वालों से कोई हमदर्दी नहीं मेरी, सचित्र उदाहरण भरे पड़े हैं
सरंचना चाहिये तो खर्च करिये, बहाने मत बनाइये, सहानूभूति नहीं, बच्चों को आत्मनिर्भर बनाइये परजीवी नहीं
#जे एन यू समेत हर संस्थान के लिए#

 

भारत के पर्व सांस्कृतिक और आर्थिक चेतना का उल्लास हैं....समझिए



पर्व और त्योहार ,,,,हमारी सांस्कृतिक चेतना और आर्थिक प्रगति की आवश्यकता है। इनको निशाना बनाकर अपना उल्लू सीधा करना गलत है मगर हो यही रहा है। पशुओं में भी जीव है, कुत्तों में तो जान बसती है, गाय तो फिर भी काम की नहीं और बकरा भी, इनकी जान की कोई कीमत नहीं है। पशुओं से भी भेदभाव, कुत्ता क्लास बढ़ाता है, गाड़ियों में घूम सकता है, गाय का गोबर गन्दा है और अमेज़न ऑर्गेनिक होकर बिकता है, फिर भी गाय की सेवा करने वाले दकियानूसी हैं। कुत्ता आपसे सेवा करवाता है, आप भी उसका मल उठाते हैं मगर फिर भी आप अभिजात्य हैं, कई दर्जा ऊपर हैं
एक जगह पढ़ा था जानवर कहलाना इन्सान की अपमान लगता है, और शेर कहा जाये तो उछलता है, शेर में जानवर ही न या कोई अलग श्रेणी है। कुछ लोग तो इसलिये नाराज हो जाते हैं की कुत्ता को कुत्ता क्यों कहा, कुतिया को कुतिया क्यों कहा, अब ये न कहें तो क्या कहें। जब बिल्ली को बिल्ली, बैल को बैल कह सकते हैं तो भला कुत्ते को कुत्ता क्यों न कहें? क्या ये अन्य जानवरों से अन्याय नहीं है? कुत्ते को ज्यादा भाव देकर आप उसका तुष्टिकरण कर रहे हैं
वैसे गाय मरने के बाद भी खाल दे जाती है, वह दम्भी और पागल नहीं होती, कुत्ता पागल हो जाये तो काट खाता है, 14 इन्जेक्शन लेने पड़ते हैं और अन्त में खुद को बचाने के लिये आप ही उसे नगर पालिका को देते हैं या खुद गोली मार देते हैं।




पीछे मत पड़िए, हमले का जवाब जवाबी भी होता है, हम अगर बकरीद पर बकरों की जान बचाने लगे, नकली क्रिसमस ट्री के कारण होने वाले नुकसान बताने लगे जिसकी जरूरत है
और हमारे पास तो उत्सव के हजार तरीके हैं, आपके पास तो वो भी नहीं, तो जरा सोचिये, हमने भी इनके खिलाफ अभियान छेड़ा, मामला किया और एक दिन पहले खबर आये की ईद, बकरीद, क्रिसमस पर कोई खुशी नहीं मनायेगा। अरे। हाँ, कोरोना में चर्च या मस्जिद जाने से भी तो कोरोना फैलेगा, क्रिसमस के जश्न से भी तो फैलेगा, हमारे यहाँ नदियों को पूजा जाता है, छठ के बहाने घाट और दिवाली के कारण घर साफ होते हैं। हमारे यहाँ मिट्टी के दिये हैं। आपके क्रिसमस ट्री और हर सामान में प्लास्टिक, चमकीले कागज का उपयोग है,
सयाने बुद्धिजीवियों की बुद्धि सिगरेट और जाम के बगैर खुलती ही नहीं। गुरु और शिष्य, दोनों ही मैत्री भाव से इसका सेवन कहीं भी करते हैं, एबीपी ग्रुप से लेकर तमाम अखबारों में अश्लील तस्वीरें और टी 2 में हुक्के बार वाली तस्वीर छपती है, ये भी बताया जाता है की मिलेगा कहाँ, तो अब हम सब भी पीछे पड़ेंगे
प्रोपेगेंडा का जवाब भी उसी तरीके से दिया जायेगा। हम भी अपील करवाएंगे की लोग ईद और क्रिसमस न मनाएं, चर्च और मस्जिद न जाएं।बाजार में न जाएं। सिगरेट पीने वालों के खिलाफ भी हम अब खड़े होंगे, अब आप देखते रहिये।आपकी रैलियों पर रोक लगवाएंगे

रविवार, 25 अक्तूबर 2020

बॉलीवुड को धकेल कर एक दूसरे के घाव हरे होने से बचाइए...बस यही सौहार्द है

क्या यह जरूरी था...एकता दिखाने का क्या यह एकमात्र रास्ता है जबकि हम मानसिक तौर पर तैयार ही नहीं है


जब मुझसे कोई बुरे लहजे से बात करता है..या किसी के साथ कड़वे अनुभव हों...तो मैं नजरअन्दाज कर भी दूँ तो उसे माफ नहीं कर पाती...यह आपके साथ भी होता होगा...परिवार बँट जाते हैं तो उनको अलग होना पड़ता है...वह दूर हो जाते हैं....मगर दूर होकर भी पास रहते हैं। अगर दूर नहीं भी होते तो एक सीमा बन ही जाती है....अपने - अपने दायरे में अपनी - अपनी दुनिया में हम जी रहे होते हैं....अब सवाल है कि आज यह किस्सा छिड़ा ही क्यों....सवाल तो मतभेद और असहमतियों के बीच साथ रहने का है...। बस यही वजह है...अब इस निजी घटना को देश और धर्म के चश्मे से दूर रखकर देखिए...।

गंगा - जमुनी तहजीब की बात की जाती है...रोटी - बेटी के रिश्ते की बात की जाती है...(बेटे की बात क्यों नहीं होती...ये तो अब भी नहीं पता है)...और यह सब कहते हुए यह बात भुला दी जाती है कि गंगा का भी अपना अस्तित्व है और जमुना यानी यमुना का भी....तो ये दोनों नदियाँ अपना अस्तित्व खोकर एक दूसरे में मिल जाएं,..क्या यह इतना जरूरी है औऱ सबसे बड़ी बात कि क्या हम मानसिक रूप से तैयार हैं...हमारा इतिहास उठाकर देखिए...हम मानते हैं कि पूर्वजों की गलतियों के लिए (फिर चाहे वह कहीं से भी हो, कोई भी हो) आज की पीढ़ी को दोष नहीं दिया जा सकता...देना भी नहीं चाहिए....मगर अतीतजीवी भारतीय...क्या अपना वह इतिहास भूल सकते हैं....हकीकत यह है कि नहीं भूल सकते...जमीनी धरातल पर जाकर देखिए....दोस्तियाँ गहरी निभी हैं...पीढ़ियों तक चली हैं मगर शादी का मामला....दूसरा है।


समाज..संस्कृति...खान - पान.....जब शादी की बात आती है तो ये साथ आ जाते हैं...आज भी अन्तरजातीय विवाह पूरी तरह स्वीकार नहीं किये जा रहे....200 साल तक राज करने वाले अंग्रेजों को हम भूले नहीं हैं और आप सोच रहे हैं कि क्रूरता से भरा इतिहास भूल जाया जाए...यह सम्भव नहीं है...मगर यह सम्भव है कि इतिहास की कड़वाहट से आगे बढ़ने की कोशिश की जाए...एक दूसरे से अलग रहकर भी सम्मान दिया जाए...यह ख्याल रखा जाए कि एक की वजह से दूसरे के घाव हरे न हों...।

आप आज तक मुगलों से इस बात को लेकर नाराज हैं कि उन सबने आपके मंदिर तोड़ दिए...वह गलत थे...मगर जब मंदिर तोड़ना गलत है तो मस्जिद या कोई भी धर्मस्थल तोड़ना महिमामंडित कैसे किया जा सकता है? ठीक इसी तरह....संन्यासियों की हत्या, मंदिरों को तोड़ना...ये सब सही कैसे है...एक मस्जिद टूटने का दर्द आप भूल नहीं पा रहे हैं और आप उम्मीद कर रहे हैं कि जिस देश के पुस्तकालय, मंदिर...खजाने....सब ध्वस्त कर दिये गये...वह साथ घुल - मिलकर रहें...आप उनकी जगह रहकर देखिए...क्या यह सही है...क्या ये हो सकता है...? बँटवारे के घाव, 1984 के घाव...न जाने कितने घाव हैं औऱ जब इन जख्मों को भूलने की कोशिश की जाती है...आप उनमें पिन चुभो देते हैं...

खुद को गंगा का बेटा कहने वाले राही मासूम रजा से ज्यादा प्यार कोई इस देश को करेगा...वह जिन्होंने महाभारत के संवाद लिखे...वह क्या कम भारतीय हैं.. तो फिर आप उनसे भारतीयता का सबूत क्यों माँगते हैं...जो रह नहीं सकते...आप उनको देखना तक नहीं चाहते मगर जो रहना चाहते हैं...उनके साथ आप क्या कर रहे हैं...आप औरंगजेब की क्रूरता याद रखते हैं तो दारा शिकोह को क्यों भूल जाते हैं....जिसने आपके धर्म को समझने की कोशिश की और धर्म है क्या...मानवीय आचरण को धारण करना ही तो धर्म है....क्या आप रहीम और रसखान को इसलिए भूल जाएंगे कि वह आपके धर्म के नहीं हैं...मेरा सीधा सवाल यह है कि गंगा को गंगा की तरह और यमुना को यमुना की तरह स्वीकार कर के अपनी राह पर चलना क्या इतना मुश्किल है...बीमारी का इलाज करना हो तो पहले स्वीकार करना पड़ता है कि हम बीमार हैं...और तब होता है बीमारी का उपचार...अभी आप मानिए कि मानसिक तौर पर आप गंगा और यमुना को मिलाने के लिए तैयार नहीं हैं।

इस घाव में एकतरफा खंजर घोपा है बॉलीवुड ने....जान - बूझकर हिन्दुओं को अपमानित करना, उनका गलत चरित्र - चित्रण करना, तस्करों...अपराधियों का महिमा मंडन करना...ये सब बॉलीवुड की ही देन हैं....आप लगातार किसी एक धर्म या मजहब को टारगेट करेंगे तो विरोध तो होगा...हिन्दू हैं तो मुसलमानों को गलत दिखाएंगे...मुसलमान हैं तो हिन्दुओं को गाली देंगे और ये काम अब हिन्दू निर्देशक भी करते हैं। पारम्परिक चिह्न, धर्म, पूजा....देवी - देवता...क्या इन सब का मजाक उड़ाए बगैर आप कहानी नहीं बुन सकते...गलत को गलत कहिए मगर हर तरह के गलत को गलत कहिए...किसी एक को टारगेट करना बदनीयती के अलावा कुछ नहीं...।

क्या साथ रहने के लिये रिश्ता जोड़ना जरूरी है, क्या मित्रता और सौहार्द के धागे इतने कमजोर हैं की आपको इनको विवाह का आवरण देना ही होगा। क्या हम अलग रहकर, एक दूसरे को सम्मान देकर, दूर रहकर, शान्ति से नहीं रह सकते?अगर स्नेह है, प्रेम है, सम्वेन्दनशीलता है, किसी आवरण की जरूरत नहीं है, प्रेम करने के लिये और भाईचारे के लिये खुद अपने अस्तित्व को खत्म कर देना समाधान नहीं है। 

आप ये मानिये की सदियों बाद भी हम मानसिक रूप से तैयार नहीं हैं और इतिहास देखेंगे तो इसका कारण भी दिखता है, हर धर्म, अपने अनुसार रहे, किसी को किसी के लिये ढलने की जरूरत नहीं, बस अलग भी हैं तो एक दूसरे को सम्मान दीजिये, प्रेम बना रहेगा।

घरों में देखिये, आप यही करते आ रहे हैं तो इस मामले में क्या परेशानी है? दूर रहकर प्यार बढ़ता ही है, आप एक दूसरे का महत्व समझते हैं, उनकी इज्जत करते हैं। 

अगर विज्ञापन में जो वधू है, वो हिन्दू ही रहती, और यह मुस्लिम परिवार उसे बेटी मानकर आशीर्वाद देने उसके घर जाता तो क्या प्रेम कम हो जाता? क्या किसी को प्रेम करने के लिये बहू या दामाद बनाना इतना अधिक जरूरी है, क्या ये मानसिक जड़ता नहीं है?

कुछ बातों को स्वीकार कर लेना बेहतर होता है, हर बार घाव कुरेदने की जरूरत क्या है, आप जबरन अपना सेकुलरवाद मत लादिये उन पर। 

समय आ गया है मित्रता के एंगल को ज्यादा प्रोत्साहित किया जाये, उसे उदारता से स्वीकार किया जाये। हमारी आधी समस्या का समाधान यहीं जो जायेगा।

मेरी भी दोस्त है, और वो जैसी है, मुझे उसी रूप में प्रिय है, उस पर मुझे पूरा भरोसा है और मुझे उसमें कुछ भी नहीं बदलना है। हमने एक दूसरे को कभी बदलने की कोशिश नहीं की, करेंगे भी नहीं,  और मुझे उस पर गर्व है। फ़ील्ड पर भी बहुत से ऐसे साथी हैं। वो जो हैं, जैसे हैं, वैसे स्वीकार करिये। प्रेम का मतलब दोस्ती भी है और दोस्ती से गहरा कुछ नहीं है।

जरूरत है कि आम हिन्दू और मुस्लिम इस षडयन्त्र को समझें...और एक दूसरे के लिए आवाज उठाएं...हिन्दू को मुसलमानों के लिए और मुसलमानों को हिन्दुओं के लिए खड़ा होना होगा...अपने - अपने धर्म के कट्टरपंथियों पर लगाम कसनी होगी..तभी आप शांति से बढ़ सकेंगे...मानसिक रूप से तैयार होंगे और जिस एकत्व की बात की जा रही है...उसे अपनी मर्जी से आप खुद अपना सकेंगे। कोई भी फिल्मकार हमें नहीं सिखा सकता कि हमें अपने देश में कैसे रहना है। तनिष्क के जिस विज्ञापन पर विरोध हुआ...उसे गौर से देखिए तो पता चलेगा कि एक छवि निर्मित करने की कोशिश हुई है....एक को ऊपर और एक को नीचे करने की साफ कोशिश है...विरोध इस पर है और जायज है...अगर विज्ञापन में धर्म उल्टा भी होता...तब भी इसका इतना ही विरोध होता और होना चाहिए।

सच तो यह है कि हिन्दू - मुस्लिम बगैर आपकी थोपी गयी गंगा - जमुनी तहजीब के भी एक दूसरे को स्वीकार करते हुए बहुत खुशहाली से एक दूसरे के साथ रह सकते हैं, रहते आ रहे हैं...उनको आपकी नसीहत की जरूरत नहीं है...तो जस्ट अंडरस्टैंड बॉलीवुड एंड ग्लैमर वर्ल्ड बिहेव योरसेल्फ। अपना प्रोपेगेंडा अपने जेब में रखो, दफा हो जाओ और हमें शांति से रहने दो....


शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

हिन्दी और सिनेमा : किसी काम की नहीं...हट जाने दें ये दूरियाँ



साहित्य औऱ अभिव्यक्ति के अन्य कई क्षेत्रों का एक बेहद अनूठा सम्बन्ध रहा है। खासकर हिन्दी साहित्य का सम्बन्ध पत्रकारिता से तो बहुत ही गहरा है। कहने की जरूरत नहीं है कि हिन्दी पत्रकारिता का आरम्भिक काल साहित्य को साथ लेकर चला है। भारतेन्दु जितने सफल लेखक हैं, उतने ही अच्छे पत्रकार भी हैं। उन्होंने 'बाल विबोधिनी' पत्रिका, 'हरिश्चंद्र पत्रिका' और 'कविवचन सुधा' पत्रिकाओं का संपादन किया। इस कड़ी में बाल मुकुन्द गुप्त, उपेन्द्र नाथ 'अश्क' अज्ञेय समेत अनगिनत साहित्यकारों का नाम आता है।
कहने की जरूरत नहीं है कि हिन्दी साहित्य जब तक पत्रकारिता के साथ रहा, तब तक दोनों का ही स्वर्णिम काल रहा मगर हिन्दी की समस्या यह है कि इसे शुद्धतावादियों ने ऐसी अभिजात्यता से लाद दिया है कि हिन्दी का हाथ धीरे - धीरे सबसे छूटता गया। हिन्दी के बौद्धिक दिग्गजों ने इसकी सरलता को अपने अहंकार से काट डाला और हालत यह है कि असुरक्षा के बोध से लदे हिन्दी के साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी और बुद्धिजीवियों के अहंकार ने हिन्दी को उपेक्षित और अकेला कर दिया है। 
पत्रकारिता जैसी ही स्थिति हिन्दी सिनेमा और साहित्य की है मगर दिक्कत यह है कि पत्रकारिता के मसले पर गर्व के साथ हिन्दी साहित्य को जोड़ लिया जाता है मगर बात सिनेमा की हो तो उसे 'सस्ता' और 'बाजारू' जैसे विशेषण दिये जाते हैं और इस चक्कर में सिनेमा जैसे शानदार क्राफ्ट का तिरस्कार किया जाता है, किया जाता रहा है जबकि सिनेमा एक श्रमसाध्य और सामूहिक कार्य है। सिनेमा ने हमेशा से साहित्य का दामन थामा है मगर हिन्दी वालों की अभिजात्यता ने उसका हाथ झटका है।
अब जरा कड़वी बात की जाए..तो हिन्दी को सिनेमा का ग्लैमर पसन्द है, उसके जरिए प्रचार भी पसन्द है मगर उसे अपनाना पसन्द नहीं है जबकि सिनेमा ने अक्सर हिन्दी साहित्य की श्रेष्ठ कृतियों को अपनाया है। समझने की जरूरत है कि हर क्राफ्ट का अपना एक गणित है...अपनी जरूरतें हैं और वह एक उद्योग है....साहित्य या पटकथा उसका आधार अवश्य है मगर उसके बाद एक लम्बी प्रक्रिया है..जिसे साहित्य समझ नहीं पाता या समझना नहीं चाहता। लेखक का काम एक किताब के प्रकाशन के बाद पूरा हो जाता है और प्रचार के नाम कुछ संगोष्ठियाँ मगर सिनेमा का काम इतने भर से नहीं चलता...। उद्योग तो साहित्य भी है मगर वे स्वीकार नहीं करना चाहते क्योंकि प्रचार का काम तो सम्बन्धों और मंचों से चल ही जाता है...। इस बात का दुःख है कि किताबें बिकती नहीं हैं मगर किताब के प्रचार पर धेला खर्च करने की जरूरत नहीं समझी जाती और इसके लिए प्रकाशक को भी दोष देकर लाभ नहीं है क्योंकि लेखक का काम अधिकतर मामलों में पांडुलिपि सौंपने औऱ इसके बाद रॉयल्टी की आस में दिन गिनना रह जाता है। अपने करीबियों और उच्च अधिकारियों, संस्थाओं और संगठनों तक पुस्तक पहुँचाने से हो जाता है...और न भी हो तो किताबों को आम जनता तक ले जाने के अन्य सृजनशील प्रयोग करने की जहमत वे  नहीं उठाते।
आपकी किताबों को सामने लाने का काम सिनेमा करता है..सिनेमा ने हमेशा से साहित्य को अपनाया है। कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि किसी फिल्म और धारावाहिक के बाद ही किसी किताब की माँग अचानक बढ़ गयी मगर हिन्दी का परिष्कृत साहित्यिक वर्ग सिनेमा को ऐसी हेय दृष्टि से देखता है कि उसे कलाकार नचनिया  लगते हैं, गीत फूहड़, सस्ते और बाजारू लगते हैं मगर ऐसा क्यों हुआ...यह उनके विचार में नहीं आता। मेरा सीधा सवाल यह है कि क्या आज साहित्य का सिनेमा से सीधा रिश्ता होता और आज सिनेमा में इतनी गन्दगी होती जितनी आज दिख रही है...? साहित्य सबसे अधिक सम्वेदनशील, बड़ा औऱ पुराना है, आधार है इसलिए उसकी जिम्मेदारी सबसे अधिक है। आप तालाब को गन्दा कहकर उसे साफ करने की जिम्मेदारी से नहीं बच सकते मगर अफसोस की बात यह है आज साहित्य सिनेमा में हस्तक्षेप तो नहीं करता बल्कि उसे ताने जरूर मारता है। 
मजेदार बात यह है कि सिनेमा के गीतकारों को तुच्छ ठहराने और उनको साहित्य से अलग मान लेने पर भी साहित्यकार को यह कहने में गर्व ही होता है कि फलाने - फलाने निर्माता, फलानी किताब पर फलानी फिल्म बना रहे हैं...अब ये अजीब सा कॉम्प्लेक्स है...आप कमतर समझते हैं और उस दुनिया में अंश मात्र भी जुड़ जाने पर आपको बहुत अच्छा लगता है।
साहित्य और सिनेमा का रिश्ता गहरा ही नहीं बल्कि बहुत गहरा रहा है। इस बाबत हमें सिनेमा के इतिहास को समझना होगा। सिनेमा और साहित्य दो पृथक विधाएँ हैं लेकिन दोनों का पारस्परिक संबंध बहुत गहरा है। जब कहानी पर आधारित फिल्में बनने की शुरुआत हुई तो इनका आधार साहित्य ही बना। भारत में बनने वाली पहली फीचर फिल्म दादा साहब फाल्के ने बनाई जो भारतेंदु हरिशचंद्र के नाटक 'हरिशचंद्र' पर आधारित थी। गौर कीजिए कि पत्रकारिता के क्षेत्र में भी भारतेतन्दु पूरा युग हैं। जिस प्रकार हिन्दी साहित्य में फंतासी उपन्यासों का दौर रहा, वैसे ही बोलती फिल्मों का शुरुआती दौर पारसी थिएटर की विरासत भर था जहाँ अति नाटकीयता और गीत संगीत बहुत होता था। 
अब बात मुंशी जी की करते हैं। हिंदी साहित्य के सर्वाधिक महत्वपूर्ण और लोकप्रिय कथाकार मुंशी प्रेमचंद ने यह सोचकर सिनेमा जगत में प्रवेश किया था कि वहां से होनेवाली आमदनी से उनकी आर्थिक दुश्वारियां खत्म हो जाएंगी, किंतु फिल्म लेखन में जिस प्रकार की पाबंदियां और निर्माताओं का दबाव होता है उसे उनका सजग और सरोकारी लेखकीय व्यक्तित्व स्वीकार नहीं कर सका. 1934 में वे फिल्में बनाने वाली कंपनी अजंता सिने टोन में बतौर लेखक 8 हजार रूपए सालाना वेतन पर नियुक्त हुए थे. उनकी लिखी पहली फिल्म मजदूर थी, जो की मिल मजदूरों की जिंदगी पर आधारित थी. लेकिन इसे सेंसर बोर्ड ने पास नहीं किया. करीब 11 महीने बाद इसी कहानी पर गरीब मजदूर नाम से फिल्म बनी, जिसमें यूनियन लीडर की भूमिका खुद प्रेमचंद ने निभाई थी. यह फिल्म काफी सफल रही. इसके बाद उन्होंने नवजीवन फिल्म की कहानी लिखी। सेवासदन में कहानी को तोड़ने - मोड़ने का पेश करने पर उनको दुःख हुआ और सिनेमा को उन्होंने अलविदा कह दिया। यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि सिनेमा का प्रेमचन्द से मोह भंग नहीं होता है।  वे ऐसे चंद साहित्याकारों में से थे, जिनकी कृतियों पर सर्वाधिक फिल्में बनीं. उनके निधन के दो साल बाद के. सुब्रमण्यम ने  1938 में सेवासदन उपन्यास पर फ़िल्म बनाई जिसमें सुब्बालक्ष्मी ने मुख्य भूमिका निभाई थी. 1941 में उनके उपन्यास रंगभूमि पर इसी नाम से फिल्म बनी. इसके अलावा गोदान पर 1963 और गबन पर 1966 में फिल्में बनीं. उपन्यासों के अलावा प्रेमचंद की कई कहानियों पर भी फ़िल्में भी बनी हैं.  1941 में उनकी उर्दू कहानी औरत की फितरत पर स्वामी नाम की फिल्म बनी। 1953 में आई बिमल रॉय की दो बीघा जमीन की भी कहानी प्रेमचंद की ही थी. बलराज साहनी और निरूपा राय अभिनित हीरा और मोती भी प्रेमचंद की एक कहानी दो बैल पर आधारित थी. 70 के दशक में सत्यजीत रे ने प्रेमचंद की कहानी शतरंज के खिलाड़ी पर इसी नाम से फिल्म बनाई. सत्यजीत रे ने प्रेमचंद की एक और कहानी सद्गति पर भी 1981 में इसी नाम से फिल्म बनाई थी….  1977 में मृणाल सेन ने उनकी कहानी  कफ़न पर आधारित ओका ऊरी कथा नाम से तेलुगु में फ़िल्म बनाई जिसको सर्वश्रेष्ठ तेलुगु फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला. प्रेमचंद के मशहूर उपन्यास 80 के दशक में उनके उपन्यास निर्मला पर टीवी धारावाहिक का भी निर्माण हुआ जो काफी लोकप्रिय हुआ. नई सदी में गुलजार ने भी प्रेमचंद की कहानियों पर दूरदर्शन के लिए धारावाहिक बनाए। जाहिर है कि दूरी साहित्य ने ही बनायी...
ठीक है कि साहित्य समझौता नहीं कर सकता मगर क्या साहित्य सिनेमा में अपनी जगह नहीं बना सकता? हम गीतकारों और पटकथा लेखकों को साहित्यकार क्यों नहीं मान सकते...किसी कोलाज या नाटक में किसी फिल्म का कोई बढ़िया गीत क्यों नहीं आ सकता। रही बात सस्तेपन की तो जरा रीतिकाल उठाकर देख लीजिए...उपन्यासों में भी रति वर्णन ऐसा मिलता है कि हिन्दी फिल्में भी शरमा जाएँ और आप कहते हैं कि अलग हैं हम...विद्यापति के कई पद ऐसे भी थे जिनको भरी कक्षा में पढ़ाने में शिक्षकों को भी शर्म आ जाती है। फिल्मी गीतों में अपशब्द बर्दाश्त नहीं हैं मगर धूमिल की कविता में वह क्लासिक बन जाता है। किसी फिल्म में गालियाँ हों तो बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा और काशी का अस्सी में गालियाँ हों तो....अरे, वह तो प्रामाणिकता को बढ़ाता है...और बच्चों के लिए...उनके हिस्से में तो आपने कुछ रखा ही नहीं। तो बात सिनेमा की हो रही है। 
अच्छा साहित्य को लेकर जो फिल्में बनतीं हैं या बनीं हैं, आपने उसके प्रचार के लिए कुछ किया...नहीं किया क्योंकि किया होता तो अच्छी साहित्यिक फिल्में पिटतीं नहीं। आखिर फिल्मकारों को क्यों हार मान लेनी पड़ती है? सीधा कारण है कि साहित्यकारों ने कोई रुचि ही नहीं दिखायी और न ही फिल्मकार की विवशता को समझा है। 
   'तीसरी कसम' को भले ही श्रेष्ठ फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। लेकिन, ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह असफल हुई थी, जिसके कर्ज के बोझ तले निर्माता शैलेंद्र की तनाव में मौत हो गई! कई प्रशंसित कहानियाँ लिख चुके कहानीकार राजेंद्र सिंह बेदी की किताब 'एक चादर मैली सी' पर भी जब फिल्म बनी तो उसे दर्शकों ने नकार दिया। चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी 'उसने कहा था' पर बनी फिल्म भी नहीं चली! वहीं चित्रलेखा आज भी क्लासिक फिल्म मानी जाती है। जब भी फिल्म औऱ साहित्य के बीच समझ बनी है. उसके परिणाम हमेशा अच्छे रहे हैं। ! बासु चटर्जी बांग्ला भाषी थे लेकिन उन्होंने राजेंद्र यादव के उपन्यास 'सारा आकाश' पर फिल्म बनाई जो नहीं चली! लेकिन, मन्नू भंडारी की कहानी 'यही सच' पर 'रजनीगंधा' बनाई तो वह सफल हुई। हिंदी साहित्यकारों का फिल्मों में असर 70 के दशक में ही ज्यादा नजर आया। इस दौर को लाने का श्रेय कथाकार कमलेश्वर को दिया जाना चाहिए। उपेंद्रनाथ अश्क और अमृतलाल नागर के बाद कमलेश्वर ही वह साहित्यकार थे, जिन्होंने सिनेमा की भाषा और दर्शकों की मानसिकता को समझा। बड़े टेलीविजन सीरियल के बाद वे फिल्मों में भी लंबे समय तक टिके रहे। गुलजार ने कमलेश्वर की कथा पर जब 'आंधी' और 'मौसम' बनाई तो देखने वालों का ट्रेंड ही बदल गया। इसके लिए गुलजार भी जिन्हें श्रेय दिया जा सकता है। उन्होंने कहानी की संवेदना को गहराई से समझा और दोनों फिल्मों की पटकथा, संवाद और गीत खुद ही लिखे। । हिंदी साहित्यकारों का फिल्मों में असर 70 के दशक में ही ज्यादा नजर आया। इस दौर को लाने का श्रेय कथाकार कमलेश्वर को दिया जाना चाहिए। उपेंद्रनाथ अश्क और अमृतलाल नागर के बाद कमलेश्वर ही वह साहित्यकार थे, जिन्होंने सिनेमा की भाषा और दर्शकों की मानसिकता को समझा। बड़े टेलीविजन सीरियल के बाद वे फिल्मों में भी लंबे समय तक टिके रहे। 


 प्रेमचन्द की कहानी पर सत्यजीत राय ने शतरंज की खिलाड़ी बनायी थी औऱ वह आज भी बेहतरीन और सफल फिल्म के रूप में याद की जाती है। गिरीश कर्नाड एक अच्छे अभिनेता व निर्देशक रहे और कन्नड़ में बतौर साहित्यकार भी उनको पूरा सम्मान मिला मगर हिन्दी वालों ने सिनेमा से जुड़े साहित्यकारों को कभी नहीं अपनाया। कुछ साल पहले अमृता प्रीतम के उपन्यास पिंजर पर फिल्म बनी थी, इसके बाद हाल ही में पंचलैट आई और अच्छी बात यह रही है कि इसे साहित्य जगत ने अपनाया..मगर इसमें तेजी लाने की जरूरत है। 
वरिष्ठ पत्रकार जयराम शुक्ल लिखते हैं 'सिनेमा जितना उदार रहा साहित्य उतना ही आत्मकेंद्रित। सिनेमा ने सबके लिए बाँहें फैलाकर रखीं जबकि साहित्य ने महबूब,के.आसिफ,कमाल अमरोही और यहां तक कि गुरुदत्त जैसे महान फिल्मकारों की ऐसी इज्ज़त नहीं बख्सी जैसा कि सिनेमा ने खुद को दाँव पर लगाकर साहित्यकारों को सिर माथे पर लिया। चौकसे जी सिनेमा और साहित्य के गठबंधन हैं।उनका व्याख्यान सिनेमा को न सिर्फ साहित्यिक अपितु आध्यात्मिक और दार्शनिक नजरिए से समझने का नजरिया देता है।' 
अगर किसी प्रस्तुति को किसी गीत से मजबूती मिलती है तो उसका स्वागत होना ही चाहिए...आप जिस दुनिया को कोसते हैं, उसकी तमाम विशेषताएँ समाहित हैं...साहित्य से प्रेम करने वालों की रिंगटोन पर 'मुन्नी बदनाम हुई' जैसे गीत मिलते हैं। हमारा मानना है कि हिन्दी अगर सही मायनों में आम आदमी तक जाना चाहती है तो उसे आम आदमी की पसन्द, उसके चयन को समझना होगा, उस विधा को अपनाना होगा, अन्य माध्यमों को आत्मसात करना होगा। खुले हृदय से हर क्षेत्र को सम्मान देकर उसे दूसरे माध्यमों को अपनाना चाहिए, तभी हिन्दी का अधिकार होगा कि वह अन्य विधाओं से कुछ कह सके, सिनेमा से भी।
इनपुट - बात - बेबात,  हिन्दी समय में इकबाल रिजवी का आलेख व इंटरनेट पर अन्य सामग्री

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सोमवार, 15 जून 2020

काश...सुशांत आप अपने बेस्ट फ्रेंड होते...



सुशांत सिंह राजपूत अब हमारे बीच नहीं हैं। वह सुशांत जो न जाने कितने युवाओं का आदर्श रहे और वह एक सफल जीवन जी रहे थे। आज यह कहा जा रहा है कि अवसाद ने उनकी जान ले ली। सुख की परिभाषा को लेकर नये मुहावरों से पूरा सोशल मीडिया पट गया है। यह सही है कि अवसाद की जड़ कहीं न कहीं अकेलेपन से उपजे विषाद में है मगर क्या सच इतना सा है....नहीं, सच इतना सा नहीं है। झाँकने की जरूरत है कि जिस समय आप सोशल मीडिया पर ज्ञान दे रहे हैं, आपके आस - पास और आपके अपने बच्चों को आपने कहाँ तक समझा है..समझा है या नहीं..। क्या आप उसकी जिद और जरूरतों का फर्क समझ रहे हैं?
मुझे यह सवाल करने का बड़ा मन है कि जो लोग कह रहे हैं कि अभिभावकों से बात की जाये...क्या उन अभिभावकों ने संवाद के लिए माहौल बनाया है? बच्चे आपसे डरते हैं और वह डर प्रेम नहीं है...और उनका यह डर आपको अच्छा भी लगता है। क्या आप अपने बच्चों की असहमति को सुनने और समझने का दम रखते हैं? क्या अपने बच्चों में आपने इतना साहस भरा है कि वह आपके सामने वह सब कुछ कह सकें जो आपको पसन्द नहीं हो? सबसे बड़ा प्रश्न तो यह है कि क्या भारतीय समाज में बच्चों के जन्म के पीछे का कारण सिर्फ प्रेम ही होता भी है? क्या यह सच नहीं है कि बच्चे के जन्म का कारण सामाजिक दबाव भी है...फलाना 2 बच्चों की माँ बन गयी...फलाना के बच्चे स्कूल जाने लगे...और यहाँ बंजर जमीन है...ये सब वाक्य कौन कहता है?
सच तो यह है कि हमारे यहाँ बच्चों का जन्म दम्पति की इच्छा से अधिक इसलिए होता है कि शादी को इतने साल हो गये...बच्चा नहीं हुआ...पड़ोस में बातें होने लगी हैं....समाज क्या कहेगा...वंश कैसे चलेगा...इतनी लड़कियाँ हो गयीं, अब तो कुल का एक चिराग चाहिए..........मुझे दादा - दादी, पिता, फलाना - ढिमकाना बनना है....ऐसे तानों से तंग आकर अगर कोई लड़की माँ या दम्पति अभिभावक बनते हैं तो आपको लगता है कि वह इस अनचाही सन्तान को प्रेम दे सकेंगे...जबकि वे तैयार ही नहीं हैं? आपको कोई फर्क नहीं पड़ता कि बहू या बेटी की नौकरी छूटेगी..बेटे को गृहस्थी बसानी अब तक नहीं आई...वह तैयार भी नहीं हैं...माता - पिता बनने के लिए मगर 'वह आपको खुश करने के लिए अपनी इच्छाओं की बलि चढ़ा देते हैं और आप इस जीत का बाकायदा जश्न मनाते हैं और वह बच्चा आपकी ट्रॉफी बन जाता है...खुद से पूछिए क्या यह आपका अधिकार है...।
अच्छा हमारे घर में बच्चे. कभी बच्चों की तरह जी सके हैं...बेचारे ने आँखें खोली ही नहीं कि आप उसे डॉक्टर व इंजीनियर बनाने के सपने देखने लगते हैं। उसे चित्रकार बनना है और आप उसे क्रिकेटर बनायेंगे। शर्मा जी का बेटा स्कूल में टॉप कर रहा है तो बच्चों को 10 ट्यूशन पढ़ाएँगे....बगैर यह समझे कि उस पर कितना भार पड़ रहा है....औऱ उस पर से ताने भी....इतना कुछ तो कर रहा हूँ...शहर के सबसे महँगे स्कूल में पढ़ाया...महँगे से महँगा खिलौना दिया.....और क्या चाहिए? क्या बच्चे ने कभी माँगा था यह सब कुछ? आप उसके लिए नहीं, अपनी जिद के लिए मेहनत कर रहे हैं और फल उसकी जिन्दगी को दाँव पर लगाकर पाना चाहते हैं...क्या यही प्यार है? लड़की हुई औऱ साँवली हुई तो उसे हमेशा दबी हुई रंगत की याद दिलवाने वाले भी आप ही हैं।
माफ कीजिएगा....मैं नहीं मानती कि माँ - बाप का प्यार निःस्वार्थ होता है...बिल्कुल नहीं होता...और सारे बच्चे उनके लिए बराबर भी नहीं होते। वे अपने मेधावी, प्रतिभाशाली और सुन्दर बच्चों पर अधिक ध्यान भी देते हैं और उनके कारण दूसरे बच्चों को दबाते भी हैं। सच तो यह है कि जो बच्चा उनकी आँकाक्षाओं पर खरा उतरता है, जो उनका बुढ़ापा सुरक्षित रख सकता है...वह उसी के पीछे भागते हैं, उसी के हितों की रक्षा करते हैं और उसी के लिए दूसरे हर बच्चे को दबाते हैं...आप इसे प्यार कहते होंगे...मैं नहीं मान सकती। दशरथ के चार बच्चे थे...वन में सीता - लक्ष्मण भी गये तो फिर वे राम का नाम लेकर क्यों मरे? बुढ़ापे को सुरक्षित रखने के लिए खुद माएँ बेटियों को जहर दे सकती हैं...बहुओं के साथ अन्याय कर सकती हैं...अधिकतर तब जब बेटा बड़ा हो..क्योंकि घर का मालिक वही होता है...और यही प्रश्रय पाकर उसमें वर्चस्व की भावना पनपती है...वह अपने भाई - बहनों को मनुष्य नहीं बल्कि अपना आश्रित और बहुत हद तक सम्पत्ति समझता है...आर्थिक क्षमता के कारण वह उनके जीवन और सपनों को मार देना अपना अधिकार समझता है...और इसकी जड़ माँ के उसी प्रेम में है..वरना इतनी हिम्मत युधिष्ठिर में कहाँ से आ गयी कि उसने अपने भाइयों और पत्नी तक को दाँव पर लगा दिया? अगर ऐसा न होता तो जिस बेटे ने उसके तमाम बेटों और बहू को दाँव पर लगा दिया, कुन्ती उस युधिष्ठिर के हाथ काट देती। हस्तिनापुर की पुत्रवधू के चीरहरण का प्रयास करने वाले दुर्योधन को गाँधारी उसी समय श्राप देती...विकर्ण का साथ देती मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ तो इसका कारण यही था कि दोनों को पता था कि सम्राट दोनों में से कोई एक बनेगा और उनकी वृद्धावस्था उनके साथ ही सुरक्षित रहेगी। महात्मा गाँधी होंगे बहुत महान, पर वह एक अच्छे पिता नहीं थे..बच्चों के साथ तो हमेशा कस्तूरबा ही रहीं। मैं कैसे मान लूँ कि माता - पिता के लिए हर बच्चा बराबर है जबकि यही माँ बेटी के हिस्से का घी बेटों को देती है..उसे सबके बाद खाने की नसीहत देती है...उसे बड़े बच्चों का ध्यान रहता है और उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके छोटे बच्चे अपने भाई - बहनों की सम्पत्ति बन गये हैं और पारिवारिक जिम्मेदारियों के नाम पर शोषण के शिकार हैं...। भतीजों को स्कूल छोड़ने से लेकर घर के काम तक उसके जिम्मे हैं और अगर उसने शादी नहीं की तब तो वह पूरे घर का गुलाम है...जब वह झुँझलाता है...नाराज होता है तो सबको गलती उसकी ही दिखती है मगर अपने भीतर झाँकने की हिम्मत नहीं है। क्या जिसकी शादी नहीं होती, उसका अपना कोई सुख या निजी जीवन नहीं होता...और खासकर वह लड़की हो...तब तो उसे अक्सर याद दिलाया जाता है कि...वह इस घर पर बोझ है और शादी होती तो इतने बच्चों की माँ होती। शादी करना या न करना, किसी का निजी अधिकार है...निजी चयन है...आखिर इसे तय करने वाला आपका समाज कौन होता है? मेरी बहुत से युवाओं से बात होती है और सब के सब अपने माता - पिता का बहुत आदर सम्मान करने वाले मिले...यहाँ तक कि उनके सुख के लिए उन सबने अपनी इच्छाओं का गला तक घोंटा  मगर आज तक मुझे एक भी अभिभावक ऐसा नहीं मिला जिसने यह कहा हो कि उसके लिए उसका बच्चा किसी भी बिरादरी या समाज से बड़ा है और वह उनकी इच्छा का सम्मान करते हैं? आपकी नजर में यह ममता हो सकती है, माफ कीजिए मेरी नजर में नहीं है।
जो बच्चा जितने बड़े पद पर है...वह उतना ही दुलारा है...क्योंकि उनके पैसों से सबकी जिन्दगी चलती है मगर कभी भी उसने न तो अपना बोझ बाँटा और न अपने दुःख बाँटे...और आप समझते रहिए कि आप गंगा तर गये। जब बेटियों को उनके ससुराल में कष्ट होता है तो उनको समाज की याद दिलाकर  एडजस्ट करके सह जाने की सीख देने वाले यही माता - पिता होते हैं...। दहेज हत्या हुई तो मामले को रफा - दफा करवाने में खुद लड़की के माता - पिता शामिल रहते हैं क्योंकि उनको बदनामी का डर रहता है। अशोक तोदी...प्रियंका के कौन हैं...ये बताने की जरूरत नहीं है। महानता का ये जो आवरण आपने लगा रखा है....अब उसे खोल दीजिए....घिनौना लगता है ये सब।
जो बेटी जितने बड़े और समृद्ध घर में ब्याही गयी है...उसका आदर -सत्कार उतना ही अधिक होता है....यह पक्षपात क्या  बाहर से आकर कोई करता है... समानता भारतीय परिवारों ने आखिर सिखायी कब और नहीं सिखाई तो बच्चों को घुटन नहीं होगी तो क्या होगी? बहुत कम माता - पिता होते हैं जो औसत और कमजोर बच्चों के साथ खड़े रहें और ऐसे माता - पिता हैं मगर अपवाद की तरह..यकीन न हो तो कभी किसी मानसिक अस्पताल का चक्कर लगा लीजिए।
अब बात आती है प्रेम की तो मध्यमवर्गीय परिवारों में तो बेटियों की माएँ लड़कों से बात करने की मनाही करती हैं और ऐसा न करने पर जहर खिला देने की बात भी करती हैं...आपको इसमें ममता दिखती है...मुझे नहीं दिखती...बेटी या बेटे को दुर्भाग्य या सौभाग्य से प्रेम हो गया तो सबसे पहले उसकी जासूसी होगी...समझाया जायेगा...दोस्तों को कोसा जाएगा...पढ़ाई छुड़वाने की तमाम कोशिशें (खासकर लड़कियों के मामले में) की जाएँगी और किसी भी प्रकार उनको प्रताड़ित करके उनको भटकने से बचाने की तथाकथित कोशिश होगी...बेटों के साथ भी यह होता है मगर इमोशनल ब्लैकमेलिंग होती है पर यह फैक्टर काम करता है कि लड़का है...हाथ से चला गया तो क्या करोगी...लड़कियों की जबरन शादी की जाती है या उनको मजबूरन शादी करनी पड़ती है (खासकर तब जब उसे बीच भंवर में उसके प्रेम ने छोड़ दिया हो)....तो ऐसी स्थिति में बच्चों के लिए कौन सा सुखी संसार रच रहे होते हैं...उसका ताना - बाना मैं भी समझना चाहूँगी...आप कहेंगे...मेरे भीतर आग है...जी हाँ है...जरूर है...क्योंकि मैंने अपनी क्लासमेट और सहेली को ऐसे ही खोया है.....वह बहुत मेधावी थी...उसके मोतियों जैसे अक्षर आज भी मेरी डायरी में दर्ज हैं...जब देखती हूँ..अन्दर कुछ टूटता है....।
अपराधबोध और धोखा...जब एक साथ मिले और पास में कोई न हो तो कोई क्या करे...आपके आस - पास, आपके अपने ही घर में महीनों से कोई खामोश पड़ा है...क्या आपने एक बार भी उसका हाथ पकड़कर पूछा...कि वह क्या कहना चाहता है? उसको सुनने की फुरसत है आपके पास?
आस - पास इसी दहेज के कारण जानें जाती देखी हैं...इसलिए तकलीफ तो है...मैंने युवाओं को टूटते - तड़पते देखा है इसलिए दर्द तो है...जिन्दगी भर संघर्ष रहा है तो मेरी समझ में यह सब आता है....
अब बात सुशांत की....तो पहले उनका संघर्ष देखिए...आज जो रो रहे हैं...उनमें से कई ऐसे भी होंगे जिन्होंने 'ऐ बिहारी' कहकर उनका मजाक उड़ाया होगा...सब जानते हैं कि अंकिता के साथ वे गम्भीर रिश्ते में थे...और 6 साल दोनों साथ रहे....सुशांत जिस समाज से थे क्या उनके इस अर्न्तजातीय प्यार के लिए जगह रही होगी? क्या बेटे को चुरा लेने के आरोप अंकिता पर नहीं लगे होंगे...बेटियों को जूझने और लड़ने की आदत तो पड़ ही जाती है पर क्या बेटों को हार मान लेना, जाने देना, खुद को अभिव्यक्त करना सिखाया है कभी आपने। वह यही सुनता आया है कि मर्द रोया नहीं करते...औरतों को कंट्रोल करना सिखाया है...मेल इगो आपने उसकी नस - नस में डाला है...तभी तो वह इन्कार नहीं सह पाता। जब आप अपने बच्चों को बिरादरी, स्टेटर, रुतबा और समाज का सबक सिखा रहे होते हैं तो एक बार उनकी आँखों में झाँकिये...उस वक्त उनके भीतर बहुत कुछ टूट रहा होता है। सुशांत के भीतर भी टूटा होगा...उनके और भी रिश्ते टूटे और वे किसी के सामने नहीं खुल सके। शादी कोई रिहैबिलिटेशन सेंटर नहीं है और न ही शादी कर देने से किसी समस्या का समाधान होता है मगर अधिकतर समाधान इसी में खोज लिए जाते हैं...अगर सुशांत खुद के साथ एक रिश्ता बना सकते, अपने लिए बोल सकते....लड़ सकते...तब शायद सब कुछ सही होता
आप बात प्यार की करते हैं और आपका परिवारवाद प्रतियोगिता, घृणा, द्वेष, विषमता पर टिका है..आखिर परिवारों में एक लोकतान्त्रिक परिवेश क्यों नहीं हो सकता। बकवास मत कीजिए....आपके समाज में प्रेम विवाह के लिए जगह नहीं है और अन्तर्जातीय शादियों के लिए तो बिल्कुल नहीं है। मतलब आपने बच्चों को समझ क्या रखा है...वह क्या मशीन हैं जो एक दिल निकालकर रख दिया और दूसरा फिट कर लिया....एक इन्सान को चाहने का मतलब भी आपके समाज को पता होता तो इतनी ऑनर - किलिंग नहीं होती हमारे देश में। अपने कलेजे में जहाँ पत्थर रखा है...वहाँ से एक झील निकालिए...
 मूव ऑन होना, न कहना और न को स्वीकारना, आज के युवाओं को सीखना पड़ेगा। किसी पर भी इतना अधिक निर्भर न रहें कि वह आपकी जरूरत बन जाए और आपके मानसिक शोषण व अवसाद का कारण भी...खुद से एक रिश्ता बनाइए क्योंकि आपके सबसे अच्छे दोस्त आप खुद हैं....और आपका विकल्प सिर्फ आप हैं..कोई दूसरा नहीं।

सोमवार, 30 मार्च 2020

महामारी को मात दो...फिर अपनी धरती पर लौटो,,,माटी पुकार रही है



21 दिनों के लॉकडाउन ने बहुत कुछ दिखाया...बुरे वक्त में अच्छे और बुरे कई तरह के लोग दिखे...घटनायें दिखीं....समय के साथ हर चीज आयेगी - जायेगी...मगर एक चीज कभी किसी सच्चे भारतीय खासकर बिहार, झारखंड या यूपी के रहने वालों के कलेजे में टीस बनकर रहेगी....रहनी चाहिए...यह वह आग है जिसका जिन्दा रहना बहुत जरूरी है मगर इसके लिए सुरक्षित और जिन्दा रहना जरूरी है....इसलिए तमाम दिक्कतों के बाद भी अपनी लड़ाई को जिन्दा रखने के लिए लॉकडाइन का पालन करो....मगर अपमान की इस आग को बुझने मत देना.....खुद को इसमें झोक  दो और कुन्दन बनकर लौटो..।

लौटो कि यही आग इन राज्यों को, पूर्वान्चल की उस जनता को एक नया जन्म देगी...। जब कभी आप होली के रंगों में अपने परिवार के साथ डूबे रहते हैं....जब दिवाली पर दीये जला रहते हैं...तब ये लोग अपने घरों में नहीं रहते...वह आपके घरों में फूल सजा रहे होते हैं....वह एक प्यार भरी दुलार के लिए तरस जाते हैं...क्योंकि जबकी इसकी जरूरत होती है तब आप उनसे अपनी कम्पनी की बिक्री बढ़वाते हैं...। आपकी मशीनों पर काम करते हुए न जाने कितने मर जाते हैं...कितने अपाहिज हो जाते हैं...उनकी हड़ताल आपको इतनी नागवार गुजरती है कि आप पुलिस और प्रशासन से बात करते हैं...और कारखाने बंद कर देते है...लाठीचार्ज करवाते हैं...आपके हाथ इतने लम्बे हैं कि आप उनको फँसाकर जेल भिजवा सकते हैं।
ये आपको हमेशा से खटकते थे...आप न जाने कब से अपनी राजनीति की लम्बी पारी के लिए भेजना चाहते थे...आज एक महामारी ने आपको मौका दिया है। जिन्होंने आपको रहने के लिए आलीशान इमारतें दीं, आप उनको दो दिन के लिए उसके एक कोने में नहीं रख सके। जिसने 21 साल आपके पास आपकी हर जरूरत के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया...आपके पास उसके लिए 21 दिन भी नहीं थे....जिनका उगाया हुआ अनाज खाकर आपकी चमड़ी मोटी हो गयी है...आपके पास उसके लिए एक वक्त की रोटी नहीं थी...आप रोते रहे....एक मायावी दुनिया में संवेदना बरसाते रहे...पर सड़क पर नहीं उतरे....आपको डर है कि ये मजदूर आपको बीमार कर देंगे...आप कोरोना संक्रमित हो जायेंगे...मगर संक्रमित तो आप पहले से ही हैं...आपको अभिजात्य अहंकार का संक्रमण है...आप स्वार्थ के वायरस से संक्रमित हैं....आप खोखले हो चुके हैं।

देश के कोने -कोने से खबरें आ रही हैं....वह चले जा रहे हैं...नंगे पैर....धूम में...ठीक उसी वक्त जब आप अपने मोबाइल पर स्टेटस डाल रहे होते हैं...उसी वक्त एक बच्चा चलते -चलते थककर बैठ जाता है...आप परिवार के साथ हैं...वह परिवार से दूर... पलायन का सिलसिला जारी है। हालांकि, शुक्रवार की रात के मुकाबले शनिवार रात को एक्सप्रेस वे पर पैदल यात्रियों की तादाद कुछ कम थी। इन लोगों को कहीं पुलिस से खाने को कुछ सामान मिल जाता है, तो कहीं आम नागरिकों मदद के लिए आगे आ जाते हैं। अपने बीवी-बच्चों और परिवारों के साथ अपने किराये के छोटे से कमरे को छोड़, घर की ओर पलायन करने वालों की यह भीड़ थोड़ी-थोड़ी देर में घटती-बढ़ती रहती है। कुछ गठरियां, कुछ पोटलियां और थोड़ा सा पानी लेकर लोग निकल पड़े हैं। इस आस में कि कहीं कोई बस या ट्रक मिल जाये। किसी के कॉन्ट्रेक्टर ने काम बंद कर दिया तो किसी को मकान मालिक ने निकाल दिया। किसी को दिहाड़ी के लिए कोई काम ही नहीं मिल रहा, तो कोई तीन दिन से भूखा है। कोरोना ने मानो इन लोगों की जिंदगियों पर ही ताला जड़ दिया है। कुछ तो भूख से मर भी जा रहे हैं...आखिर इस अन्यास का हिसाब कौन देगा...?
आखिर अपराध क्या है इनका कि ये गरीब हैं...मजदूर हैं...फटे कपड़े पहनते हैं...पेट की मार ने पहले गाँव -घर  सब छुड़वाया था आज सियासत ने उनको शहर के बाहर कर दिया है...शहर को उनकी जरूरत नहीं है...जरूरत होगी जब बाग में पानी देना होगा...दरवानी करनी होगी...खाना बनाना होगा...घर में पोंछा लगाना होगा...माल उठाना होगा....आपकी जो थोड़ी-बहुत सहानुभूति है वह अपने लिए है...अपनी जरूरतों के लिए है...।

आप जिनका अपमान कर रहे हैं...वह चन्द्रगुप्त....अशोक और चाणक्य के वंशज हैं...आप जिस जमीन को हिकारत से देखते हैं....उसने सिद्धार्थ को बुद्ध बनाया....मोहनदास को गाँधी बनाया....उसी धरती से राम निकले...कृष्ण निकले...आपने आज इन सबको एक साथ विस्थापित कर दिया...।
तो पूर्वांचल के योद्धाओं....कहाँ रह रहे हो...किसके लिए अपनी उम्र....अपनी प्रतिभा...सब खत्म कर रहे हो...क्यों कर रहे हो...लौट चलो...उस मिट्टी को उर्वर बनाओ कि उसकी फसल कभी तुमसे हिसाब नहीं माँगेगी...अपनी तकनीक, शिक्षा, प्रतिभा....सबके दम पर अपनी मिट्टी को खड़ा करो...यही तुम्हारा संकल्प होना चाहिए....इन सेठों और हृदयहीन सर्जकों को तुम्हारी जरूरत नहीं है....पर माँ को है...जिसने दही खिलाकर अपने कलेजे पर पत्थर रखकर तुमको विदा किया था...तुम्हारी प्रतिभा पर तुम्हारे पिता का हक है...उस आँगन का हक है जो तुम्हारे इन्तजार में पथरा चुका है...अब लौट चलो....वहीं पर...जो तुम्हारा है....ठीक है...इतनी कमाई पहले न हो...मगर परिवार का बल रहेगा...दोस्तों का साथ रहेगा....आशीर्वाद रहेगा तो तुम आसमान को भी अपने कदमों में झुका सकते हो। अगर आप अपनी दुनिया में सफल हैं तो भी अब आपकी बारी है कि अपनी मिट्टी का कर्ज उतारें.,..इसमें आपके शेयरों के भाव शायद कम हों...मगर सन्तुष्टि का सेन्सेक्स हजारों गुना पार होगा....।

https://www.shubhjita.com/

अपने गाँवों में उद्योग लगाइए और ऐसे उद्योग लगाइए जिससे ये हरी - भरी धरती फिर सज सके...स्कूल खोलिए...शौचालय की व्यवस्था कीजिए...स्टार्टअप में पैसा लगाइए...वैसे ही यूपी...बिहार....और झारखंड को फिर से खड़ा कीजिए....जैसे कभी आपकी माँ ने आपको जन्म दिया था। शिक्षा का प्रसार करिए....आधुनिकता और परम्परा से जोड़िए...दबा हुआ इतिहास खोज निकालिए...अपनी बोलियों पर काम  कीजिए....कुछ भी कीजिए मगर लौटिए...अभी पराई धरती से ज्यादा आपकी मिट्टी को आपकी जरूरत है...परायेपन से भरे आपके एकाकीपन व अपराधबोध को यही एक तरीका भर सकता है। वह तुमको श्रमिक कहते हैं...मगर तुम उनकी दुनिया के राज लेकर लौटे हो...उनके उद्योग अपने गाँवों में खड़े करो....तुम फिनिक्स पक्षी हो...अपनी राख से भी जन्म लेना जानते हो....पूर्वान्चल ने इस देश को दिशा दी है....ज्ञान दिया है....अब तुम्हारी बारी है....तुम्हारी धरती....तुम्हारी मिट्टी तुमको बुला रही है....लौटो और नवजीवन दो अपनी मिट्टी को.,..संकल्पवीरों का साथ तो ईश्वर देता है...देखना एक दिन लोग तुम सबके लिए तरसेंगे....और सब तुम्हारी तरफ ही देखेंगे...जैसे अभी पूरा देश देख रहा है....लौट चलो।

मंगलवार, 7 जनवरी 2020

वैचारिक लोकतन्त्र का मतलब अराजकता का समर्थन नहीं


अचानक ही हर कोई छात्रों के हितों को लेकर सक्रिय हो उठा है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हमला क्या हुआ, सारे देश के बुद्धिजीवी और लेखक एक साथ सक्रिय हो उठे हैं। विश्वविद्यालयों में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए मगर क्या वैचारिक लोकतांत्रिक अधिकारों के नाम पर अराजकता का समर्थन किया जा सकता है। आप जब किसी संस्थान विशेष को लेकर कुछ अधिक ही द्रवित होते हैं तो उस समय अन्य संस्थानों और विद्यार्थियों के साथ अन्याय कर रहे होते हैं....मुझे लगता है कि इस समय देश में यही हो रहा है।
क्या विरोध करने का एक बड़ा कारण यह नहीं है कि इस समय केन्द्र में जो सरकार है, वह आपको फूटी आँखों नहीं सुहाती? यह सर्वविदित सत्य है कि देश के बुद्धिजीवी वर्ग में 80 प्रतिशत वामपन्थ से प्रभावित है। साहित्य से लेकर सिनेमा और इतिहास में इनका दबदबा रहा है, इनके द्वारा गढ़ा गया इतिहास पढ़कर हम बड़े हुए हैं और वैचारिक आत्महीनता से त्रस्त रहे हैं मगर इस समय वामपन्थ को दक्षिण पन्थ से कड़ी चुनौती मिल रही है और हमेशा की तरह विद्यार्थियों को इस्तेमाल किया जा रहा है। जरा सोचिएगा, क्या हर विद्यार्थी आन्दोलन करना चाहता है, नहीं....जेयू और प्रेसिडेंसी से लेकर जेएनयू तक में ऐसे विद्यार्थी हैं जो किसी प्रकार के आन्दोलन से मतलब नहीं रखना चाहते..पढ़ना चाहते हैं मगर उन पर दबाव डालकर उनके सीनियर अपनी रैलियों में ले जाते हैं तो कई बार तो शिक्षकों ने भी अपने हितों के लिए विद्यार्थियों से धरना करवाया है। आखिर हम किस तरह के विद्यार्थियों के समर्थन में हैं...वह...जो संवाद की जगह 56 घंटे तक एक वृद्ध उपकुलपति को अपने कब्जे में रखता है..या वह जिनकी कैद में एक उपकुलपति बीमार हो जाता है,..। तय कीजिए कि आप किसके साथ खड़े हैं...वह छात्र...जो संस्थानों में बमबाजी करते हैं...बोतलें फेंकते हैं...वीसी के कक्ष के सामने कपड़े डालकर विरोध जताते हैं या वे जो अन्र्तर्वस्त्रों में उनकी मेज पर नाचते हैं....आपको किस तरह का प्रदर्शन चाहिए...छात्र राजनीति में हिंसा हमेशा से रही है मगर कभी भी बुद्धिजीवी और कलाकार इस कदर मुखर नहीं हुए...क्योंकि केन्द्र में सरकार किसी की भी हो...सत्ता उनकी ही रही...कौन नहीं जानता कि संस्थानों में किस प्रकार का भाई - भतीजावाद रहा...आप तब खामोश रहे क्योंकि आपकी सत्ता को चुनौती नहीं मिली।
क्या ऐसे ही डरे हुए शिक्षक चाहिए आपको?

आप इसे स्वतन्त्रता कह सकते हैं मगर विश्वविद्यालय परिसर में सिगरेट की राख और ऐतिहासिक शिक्षण संस्थानों में प्रेम केलियाँ करते युगल पूरी अश्लीलता के साथ सामने आते हैं...बाकायदा शराब की बोतलें..और कन्डोम...बरामद होते हैं...तो वह किसी शिक्षण संस्थान का आदर्श स्वरूप नहीं होती मगर आपके मुँह से एक शब्द नहीं निकलता...मगर इनमें से कुछ ऐसे बच्चे हैं जो असहज होते हैं...क्योंकि वे आम घरों से आने वाली लड़कियाँ भी होती हैं। बच्चे सिर्फ इस्तेमाल किये जाते हैं...
याद कीजिए 2010 में एसएफआई समर्थक स्वपन कोले की टीएमसीपी समर्थकों ने किस तरह पीट - पीटकर हत्या की थी...तब क्यों नहीं दिल काँपे आपके?
ये आपकी विचारधारा से अलग हैं इसलिए इनके साथ यही सलूक होना चाहिए? 

भारत में छात्र राजनीति का आरम्भ आज़ादी से लगभग सौ वर्ष पहले अठारह सौ अड़तालीस  में दादा भाई नौरोजी की  “स्टूडेंट सोसाइटी” की स्थापना के साथ हुआ। आज़ादी की लड़ाई में भी छात्र संगठनो ने अहम् भूमिका निभाई थी। वर्तमान में भी भारतीय राजनीति में कई बड़े चहरे हैं जिनकी शुरुआत छात्र राजनीति से हुई है असम के भूतपूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत, अरुण जेटली,लालू प्रसाद यादव आदि भी उसमे शामिल हैं।भारतीय लोकतंत्र में ऐसे कई उदाहरण हैं जिनमे छात्र शक्ति ने सत्ता को अपनी ताक़त दिखाई है और कई सफल आंदोलन किये हैं।जेपी आन्दोलन में भी छात्र संगठनो की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। पर दुर्भाग्यवश वर्तमान छात्र राजनीति से अपना इतिहास दोहराये जाने की आशा करना भी कल्पना से परे की बात है।
आपको ऐसे थके परेशान शिक्षक और प्रशासक चाहिए ?

आजकल की छात्र राजनीति में सभी छात्र-संगठन किसी न किसी राजनीतिक दल की छात्र ईकाई के रूप में कार्य कर रहे हैं जिनका एकमात्र लक्ष्य चुनाव जीतना होता है।ये छात्र संगठन चुनाव जीतने के लिए सारे हथकंडे अपनाते हैं जिनका प्रयोग मुख़्य राजनीतिक दल अपने चुनाव जीतने के लिए करते हैं।देश के अधिकतर छात्र नेता खुद अराजकता फैलाते नज़र आते हैं।राजनीतिक दलों के इशारों पर काम कर अपनी टिकट पक्की करना ही उनका एकमात्र लक्ष्य रहता है।अधिकतर छात्र नेताओं का सम्बन्ध किसी न किसी बड़े नेता से होता है और ये नेता अपने प्रियजनों को छात्र-नेता के रूप में स्थापित कर उनका राजनीतिक भविष्य बनाने के लिए अनैतिक कार्यो का सहारा लेने में कोई गुरेज़ नही करते।
ये सही है?

जिन विद्यार्थियों के पास फीस के पैसे नहीं होते, उनके पास पोस्टर, सिगरेट और शराब के पैसे कहाँ से आते होंगे...यह पूछने की जरूरत नहीं है। छात्र आन्दोलन का इतिहास नया नहीं है...आपातकाल से चला आ रहा है।  1974 में छात्र आन्दोलन आपातकाल के विरोध में शुरू हुआ। इसी दौरान अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और समाजवादी छात्रो ने पहली बार एकसाथ कर छात्र संघर्ष समिति का गठन कर आपातकाल का विरोध किया। जिसके लालू प्रसाद यादव अध्यक्ष चुने गए थे और सुशील कुमार मोदी महासचिव चुने गए थे जो आज बिहार के उप मुख्यमंत्री हैं। आपातकाल के विरोध प्रदर्शन के दौरान बहुत से छात्रों को बेरहमी से पीटा गया और उनको जेल में बंद कर दिया गया था। नेतृत्व विहीन आपातकाल आन्दोलन को नयी उर्जा के लिया जय प्रकाश नारायण को छात्रो द्वारा आमंत्रित किया गया और उसके बाद उन्होंने 'सम्पूर्ण क्रांति' का नारा दिया।

गोपालचंद्र सेन की हत्या
गांधी जब 1930 के दशक में बंगाल का दौरा कर रहे थे तो एक युवक उनके भाषणों से बहुत प्रभावित हुआ। जल्दी ही उसे एक समस्या का अहसास हुआ– गांधी को सुनने को जमा हुए लोग उन्हें ठीक से सुन नहीं पा रहे थे इसलिए उसने गांधी को एक स्वनिर्मित ‘पोर्टेबल स्पीकर’ भेंट किया– महात्मा को बहुत खुशी हुई। यह युवक गोपालचंद्र सेन थे, और उन्होंने अंत तक गांधीवादी जीवन जीया। सेन 1960 के दशक में जादवपुर विश्वविद्यालय के कुलपति बने. ये बंगाल में भारी अशांति का दौर था। खास कर युवाओं के लिए जो कि नक्सल आंदोलन से जुड़ रहे थे। जल्दी ही जादवपुर विश्वविद्यालय राजनीति और आंदोलनों का अखाड़ा बन गया। नक्सल छात्रों ने सेन से परीक्षाएं रद्द करने को कहा। सेन सहमत नहीं हुए। उनका कहना था कि जिन्हें बहिष्कार करना है वो करें पर इच्छुक छात्रों के लिए परीक्षाओं का आयोजन नहीं करना गलत होगा। परीक्षाएं हुईं। छुट्टियां शुरू हो जाने पर सेन ने पास होने का सर्टिफिकेट अपने आवास पर वितरित करने की पेशकश की। इस बीच बंगाल में नक्सलों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई में तेजी आ रही थी। 30 दिसंबर 1970 को सेन अपने आवास की तरफ बढ़ रहे थे।अगले ही दिन वह सेवानिवृत होने वाले थे। शाम के छह बजे का वक्त था और वह एक सहकर्मी की कार में बैठकर जाने के लिए राजी नहीं हुए थे।
विरोध का यह तरीका असहज करता है

परिसर में ठीक पुस्तकालय के सामने सेन की हत्या कर दी गई. किसी को नहीं पता किसने की हत्या, पर इसके पीछे नक्सलियों का हाथ बताया गया। आज उस जगह पर स्थापित स्मारक इतिहास के उस काले अध्याय की याद दिलाता है। पूर्व कुलपति अभिजीत चक्रवर्ती ने 17 सितंबर 2014 की सुबह अपने कार्यालय भवन का घेराव कर रहे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस बुलाने की वजह के रूप में सेन हत्याकांड का ही उल्लेख किया था। तब पुलिस कार्रवाई में बहुत से छात्र घायल हो गए थे।
छात्र दरअसल कैंपस में यौन दुर्व्यवहार की एक घटना पर पर्याप्त कदम नहीं उठाने और निष्क्रियता दिखाने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन का विरोध कर रहे थे। विरोध का तरीका ऐसा कि विश्वविद्यालय में पढ़ाई लगभग 6 माह के लिए ठप हो गयी। विरोध अपनी जगह है मगर क्या इसका तरीका अभद्रता होनी चाहिए? आम तौर पर जेयू का दीक्षांत समारोह 24 दिसम्बर को ही होता है। आज भी दीक्षान्त समारोह स्थल की सजावट पर लगी कालिख, बहिष्कार के नारे और अब डिग्री फाड़ने की घटना....क्या शिक्षण संस्थानों की गरिमा का हनन नहीं है..या तथाकथित फासीवादी ताकतों के विरोध का हर तरीका जायज समझकर इसे भी स्वीकार कर लेंगे आप?
वैचारिक लोकतन्त्र का मतलब क्या होता है...एक बात समझनी है...यही कि गिलानी के समर्थन में नारे लगाए जाएँ....भारत के टुकड़े करने और कश्मीर की आजादी के नारे लगाए जाएँ? वैचारिक लोकतन्त्र का मतलब हर विचारधारा को सुनना और समझना है तो किसी विशेष विचारधारा के होने के कारण अपमानित करने की छूट कैसे और क्यों दी जानी चाहिए...क्या जेयू के विद्यार्थियों ने बाबुल सुप्रियो के साथ जो बदसलूकी की...उसे स्वीकार किया जाना चाहिए या प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और वीसी अनुराधा लोहिया के साथ जो बर्ताव विद्यार्थियों ने किया...आप उसे अपनी सहमति देंगे...क्यों नहीं तब जेएनयू की तरह लोग सामने आए?
इसे स्वीकार करने जा रहे हैं क्या आप ?

इसके पहले 2013 में एसएफआई नेता सुदीप्त गुप्त की मौत हुई थी और तब हुई थी जब प्रदर्शन के बाद पुलिस वैन में उनको ले जा रही थी और बस से गिरकर उनकी मौत हो गयी थी। हालांकि माकपा का दावा रहा है कि उनकी मौत पुलिस हिरासत में हुई...कितने शिक्षक उनके लिए सड़क पर उतरे थे...यह भी सवाल उठता है?
2 साल पहले की बात है। उत्तर दिनाजपुर के इस्लामपुर में द्वारीभिटा हाई स्कूल में बांग्ला शिक्षक की नियुक्ति को की मांग पर करीब 2000 छात्रों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया था। आरोप है कि छात्र पुलिस पर ईट पत्थर आदि फेंक रहे थे। इस बीच पुलिस ने छात्रों पर आंसू गैस के गोले छोड़े, रबड़ की गोलियां चलाई और लाठीचार्ज भी किया लेकिन बाद में मौके पर पहुंचे थाना प्रभारी ने छात्रों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। पुलिस की फायरिंग में राजेश सरकार नाम के 27 साल के एक पूर्व छात्र और तापस बर्मन नाम के एक अन्य छात्र की मौत हो गयी थी। आपमें से कितने लोग सड़क पर उतरे थे....? क्या यह बर्बरता नहीं थी या इन बच्चों की जान की कीमत इसलिए नहीं थी कि ये राजधानी से नहीं बल्कि किसी जिले के सुदूर कस्बे में रहते थे...। तृणमूल का एक नेता जग से प्रहार कर शिक्षिका का सिर फोड़ देता है...तब शिक्षकों का मान खतरे में नहीं पड़ता...चयनित विरोध इस देश में लोकतन्त्र स्थापित नहीं कर सकता...बॉलीवुड के तमाम सितारे जेएनयू पहुँच सकते हैं क्योंकि जो प्रचार उनको जेएनयू देगा...वह इस्लामपुर का स्कूल नहीं दे सकता।
FILE PHOTO OF PROTESTS IN JNU AGAINST THE HANGING OF AFZAL GURU IN 2016https://freepresskashmir.com/2017/12/25/jnu-cancels-srinagar-entrance-examination-centre-its-strategy-allege-kashmiri-students/
ये जेएनयू ही है और साथ में लिंक भी है
तय कीजिए कि आपकी लड़ाई किससे है...आपको केन्द्र से, भाजपा से, संघ के होने से आपत्ति है...घृणा है क्योंकि वे हिंसा फैला रहे हैं....मगर उतनी ही कट्टरता आपके अन्दर भरी है...विद्यार्थियों का दमन सत्ता पक्ष हमेशा से करता आया है मगर आज सत्ता आपके वैचारिक विरोधी के पास है इसलिए आप विरोध कर रहे हैं,..काश कि आप विद्यार्थियों के लिए लड़ते..जिन प्रोफेसरों का वेतन लाखों में है...वह क्या चाहें तो विद्यार्थियों को नि:शुल्क नहीं पढ़ा सकते.? आप खुद से पूछिए कि आप सही मायनों में कितनी बार विद्यार्थियों के लिए उतरे हैं...उनके प्रश्न उठाए हैं...निजी स्कूलों में मोटा वेतन पाने वालों ने कितनी बार अपने संस्थानों में फीस वृद्धि का विरोध किया है ? सबको पता है कि छात्र संगठन के चुनाव वर्चस्व का मामला है, बंगाल के कॉलेजों में होने वाली हिंसा के कारण कितने प्रिंसिपल इस्तीफा दे चुके हैं...यह अराजकता आपकी चिन्ता का कारण क्यों नहीं बनती?

अगर जयचन्द गलत है तो बख्तियार खिलजी भी सही नहीं है...चयनित विरोध के कारण आम जनता साहित्य और साहित्यकारों से दूर हो रही है..सवाल यह है कि अगर आप वैचारिक लोकतन्त्र की वकालत करते हैं तो वह लोकतन्त्र किसी वाद या दल विशेष तक सीमित क्यों है...क्यों कि किसी दल विशेष का होने की वजह से किसी नेता अथवा नेत्री को अपमानित होना चाहिए...आपको दिल्ली की हिंसा दिखती है तो बंगाल की हिंसा क्यों नहीं देखते आप?
आन्दोलन का मतलब अराजकता नहीं होता और साजिशें रचने में कोई छात्र संगठन या नेता पीछे नहीं है...आप शौक से आन्दोलन कीजिए मगर जो विद्यार्थी या शिक्षक अपना काम करना चाहते हैं...उनको खींचने या धमकाकर लाने का लाइसेंस आपको किसने दे दिया.? सिर्फ इसलिए कि आप किसी पार्टा या विचारधारा को पसन्द नहीं करते....आप उनको लेकर फैसला नहीं कर सकते...जो बात एक पक्ष के लिए सही है,,,वह दूसरे पक्ष के लिए गलत नहीं होनी चाहिए और न हो सकती है..।
विद्या विनय देती है...आपने अपने विद्यार्थियों में सिर्फ अहंकार और अकड़ भरी है.....और आप इसे सफलता मानते हैं तो इससे बड़ा दुर्भाग्य कुछ नहीं है। यही अकड़ उनकी समस्याओं की जड़ है...अनुशासनहीन आन्दोलन कभी भी स्वीकार नहीं हो सकता...। सच तो यह है कि संस्थानों में इस तरह की राजनीति और राजनीतिक पार्टियों के लिए जगह होनी ही नहीं चाहिए...और अगर स्वागत करना है तो स्वागत सबका कीजिए। आन्दोलन और अराजकता के फर्क को समझिए और नहीं समझेंगे तो आने वाला इतिहास आपको माफ नहीं करेगा।

शुक्रवार, 17 मई 2019

ध्वज के एक रंग नहीं, तीन रंग चाहिए...एक रंग केसरिया भी है

श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा पर कालिख पोती गयी

इन दिनों बंगाल में लोकतंत्र की हवा बह रही है। हर कोई यहाँ लोकतंत्र का रक्षक बना हुआ है और लोकतंत्र की रक्षा का मतलब है यहाँ पर भगवा को रोकना और भाजपा को न आने देना। इसके लिए लोकतंत्र के तथाकथित समर्थक कुछ भी करने को तैयार हैं, किसी से भी हाथ मिलाने को तैयार हैं और कुछ भी भूलने को तैयार हैं। लोकतंत्र का मतलब होता है कि हर किसी का अधिकार है कि वह भारत के किसी भी राज्य में रहे और जब बात राजनीति की आती है तो हर एक राजनीतिक दल को प्रचार का, जनता तक पहुँचने का और अपनी बात रखने का अधिकार है। एक समय था जब हम वाममोर्चा सरकार की आलोचना इसलिए करते थे कि यह पार्टी हिंसा के बल पर वोट पाती आ रही थी। जब चुनाव प्रचार के समय पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की हत्या हुई सारा देश शोक में डूबा। जब गौरी लंकेश की हत्या हुई...बिलबिलाकर सारे प्रबुद्ध सोशल मीडिया पर टूट पड़े, रोहित वेमुला का शोक अब तक मनाया जा रहा है मगर इस चुनाव में छत्तीसगढ़ और कश्मीर में 2 भाजपा और एक आरएसएस नेता की हत्या कर दी गयी, कहीं कोई सुगबुगाहट तक नहीं हुई। 22 साल के सुदीप्त गुप्त की जान गयी, कोई फर्क नहीं पड़ा। आसिफा के लिए देश आँसू बहाने वाले भूल गये कि इसी राज्य में मध्यमग्राम में एक किशोरी के साथ 2 बार बलात्कार हुआ और प्रताड़ना से तंग आकर उसने जान दे दी, बिहार के रहने वाले टैक्सी चालक पिता ने तो राज्य ही छोड़ दिया...शोर हुआ और सजा भी मिली  मगर राष्ट्रीय मुद्दा नहीं बना...पता है, इन सब का कसूर क्या था....इनका खून हरा नहीं था...।
याद कीजिए कि उस समय खुद ममता बनर्जी केन्द्रीय वाहिनी चाहती थीं और आज जब सरकार इनकी है तो वही केन्द्रीय वाहिनी बाधक है। ये वही ममता बनर्जी हैं जिन्होंने तापसी मलिक की जली हुई लाश की तस्वीरें दिखाकर सहानुभूति की लहर हासिल की थीं, जिन्दा तो जिन्दा, इन्होंने एक बच्ची की मौत का फायदा उठाया।
हमारे महापुरुष किसी एक राज्य या पार्टी के रंग के मोहताज नहीं

ये वहीं ममता बनर्जी हैं जिन्होंने अपने कार्यकाल में हुए पार्क स्ट्रीट बलात्कार कांड को साजानो घटना बताया...और जब एक काबिल अपसर ने इस मामले की तह तक जाकर जाँच की तो उनको पद से हटा दिया...जी हाँ, मैं दमयन्ती सेन की ही बात कह रही हूँ। यूपी, बिहार व झारखंड के लोग इनको कभी नहीं सुहाए, वोट बैंक की मजबूरी न होती तो ये हिन्दीभाषियों को टिकट तक नहीं देतीं और आज हिन्दीभाषियों का एक धड़ा...इनको महामहिम मानने में जुटा है...खैर हिन्दीवालों को तो किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता, बिहार और भोजपुरी के नाम पर दुकानें चलाने वाले भी चुप बैठे हैं..डर से या किसी लालच से...। जो महिला खुद मुख्यमंत्री होकर एक भ्रष्टाचारी पुलिस अधिकारी को बचाने के लिए धरने पर बैठ जाती है...वह लोकतंत्र की रक्षा कैसे करती हैं...ये तो आप ही जानते हैं...हम नहीं जानते।
अनुदान और ओहदा बड़ी चीजें होती हैं। पाठ्यक्रम में इन्द्रधनुष के लिए प्रयुक्त बांग्ला शब्द में राम होने के कारण उसे बदल दिया गया और उसे रंग बना दिया गया...सिंगुर आन्दोलन को तो अब पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया है...। स्थिति यह है कि आज नन्दीग्राम और सिंगुर के लोग खुद कहते हैं कि उनको ठगा गया है मगर अन्धभक्तों को यह बात समझ नहीं आएगी। यदि बंगाल में लोकतंत्र है तो सबको इस बात की आजादी होनी चाहिए कि वह अपने तरीके से अपना जीवन जीए मगर बंगाल में क्या ऐसा है...? कौन सा लोकतंत्र ये इजाजत देता है कि कोई दल किसी राज्य में नहीं आ सकता। जब हर सभा के बाद भाजपा समर्थकों की हत्या कर पेड़ से लटकाया गया तो लोकतंत्र खतरे में नहीं पड़ा। जब मोहम्मद सलीम से लेकर बाबुल सुप्रियो तक की गाड़ी में तोड़फोड़ की गयी...तब भी लोकतंत्र खतरे में नहीं पड़ा। जब श्यामा प्रसाद की मुखर्जी की प्रतिमा को तोड़ा गया और कालिख लगायी गयी तब बंगाली अस्मिता खतरे में नहीं पड़ी थी और न ही बंगाली समाज को फर्क पड़ा था..मगर आज विद्यासागर को बंगाली अस्मिता का प्रतीक बताया जा रहा है जो शायद खुद वे भी नहीं चाहते। इसके पहले भी नेताजी, नेहरु जी की प्रतिमाओं को निशाना इसी बंगाल में बनाया गया मगर त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति के गिरने पर हाहाकार मचाने वालों को यह सब नहीं दिखता। ये लोग तब भी मौन रहे जब टीएमसीपी के गुंडों ने तीन साल पहले सीयू में प्रोफेसरों पर हाथ उठाया और उनके कपड़े फाड़े...मैं खुद उस समय थी वहाँ पर इसलिए ये नजारा मेरी नजर के सामने आज भी आ जाता है। इनके मुँह में तब भी दही जमा रहा जब मी़डियाकर्मियों को इनकी लोकतांत्रिक सरकार ने पिटवाया।   महापुरुषों का सम्मान भी क्या पार्टी का रंग देखकर तय होता है? कहते हैं कि कविगुरु रवीन्द्रनाथ की मानवता ही उनका दर्शन है, ये कौन सा मानवतावाद है जो अभिजात्यता के दम्भ में देश के दूसरे हिस्सों से आए लोगों पर हँसने की इजाजत देता है और उनको निकाल बाहर करने को उकसाता है? आपकी संस्कृति को तब खतरा क्यों नहीं पहुँचा जब प्रेसिडेंसी में वीसी की मेज पर अर्न्तवस्त्र पहनकर विद्यार्थियों ने प्रदर्शन किया...इसमें कौन सी शालीनता नजर आती है..इसका उत्तर तो मुझे हिन्दी समाज से भी चाहिए और भद्रलोक कहे जाने वाले बुद्धिजीवियों से भी। आपकी आत्मा को तब कष्ट क्यों नहीं पहुँचा जब तापस पाल ने खुद को चन्दननगर का माल बताकर विरोधियों के घरों में घुसकर स्त्रियों का बलात्कार कहने की बात कही। आपकी भुजाएँ तब क्यों नहीं फड़कतीं जब अनुब्रत जैसे लोग हिंसा की धमकी नकुलदाना खिलाकर देने की बात कहते हैं? इस राज्य में तो राहुल गाँधी तक का हेलिकॉप्टर नहीं उतरने दिया गया...अमित शाह, मोदी और योगी क्या अब इस राज्य में पासपोर्ट लेकर आएंगे? बंगाल के मनीषी...इस देश का गौरव हैं, अपनी तिजोरियों में बंद करना छोड़िए...आपको यह अधिकार ही नहीं है...और वे आपकी सम्पत्ति नहीं हैं।
नेहरु जी को कैसे भूल गये आप


आखिर क्या कारण है कि हिन्दी माध्यम स्कूलों के बच्चे बांग्ला से अनूदित पाठ्यपुस्तकें पढ़ने को विवश रहे और आपके उदार शिक्षा जगत में किसी को आपत्ति नहीं हुई। कितने शिक्षाविद् और बुद्धिजीवी इसे लेकर जागरुक हुए। अब बात विद्यासागर जी की प्रतिमा की...पहले तो लोकतंत्र में सबको प्रचार का अधिकार है तो फिर अमित शाह से आपको परेशानी क्यों है? अगर आपकी जमीन इतनी पुख्ता है तो एक रोड शो या सभा से आपका क्या बिगड़ने वाला है, वह आते और चले जाते? चलिए मान लिया कि लोकतंत्र में विरोध का भी अधिकार है, काले झंडे दिखाने पर भी आपत्ति नहीं है मगर ये रोड शो की शुरुआत में आपने क्यों नहीं दिखाए...जब वे बंगाल में उतरे तब क्यों नहीं दिखाए..? आखिर हमला किसकी तरफ से हुआ...उकसाया किसने और शाम को 7 बजे इतने विद्यार्थी कॉलेज में या सीयू के पास कर क्या रहे थे...सीसीटीवी डेढ़ माह से खराब है तो बनवाया क्यों नहीं गया...आपने जो जगह चुनी और जो तरीका चुना..वह बताता है कि दाल में काला नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली थी...सब जानते हैं कि विद्यासागर से स्वामी विवेकानन्द का घर बस कुछ कदम की दूरी पर है..दरअसल, आपकी मंशा ही यही थी कि रोड शो के दौरान विरोध के नाम पर कुछ ऐसा करना है कि न सिर्फ इसमें खलल पड़े बल्कि भाजपा को बदनाम भी किया जा सके और आपने यह काम सफलतापूर्वक किया है।
विद्यासागर की मूर्ति पर हमला हर भारतीय पर प्रहार है..जिसने भी किया उसे कड़ी सजा दीजिए मगर इन पर राजनीति करना भी इनका अपमान है और इस समय बंगाल में यही हो रहा है

 उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के जिन गुंडों की बात की जा रही है, अगर वे नहीं होते तो शायद शाह पर हमले की कालिख भी इस राज्य पर लग चुकी होती...मगर प्रतिक्रिया में भी विद्यासागर की प्रतिमा पर हमले और उसे तोड़ने का समर्थन किसी भी रूप में नहीं किया जा सकता...हम नहीं करते....कोई भी पार्टी हो...भाजपा हो या आपके समर्थक...सख्त कार्रवाई होनी चाहिए...चुनाव में जिस तरह खून बह रहा है...उसे देखकर तो सब समझ रहे हैं कि बंगाल में क्लबों को 2 -2 लाख देने का कारण क्या है और वह भी तब, जब आपके ही अनुसार राज्य कर्ज में डूबा है...जनता बेवकूफ नहीं है....उसे बरगलाने की कोशिश मत करिए....जिस तरह तिरंगा आपके हरे रंग के बगैर अधूरा है, वैसे ही वह केसरिया के बगैर भी अधूरा है...धर्मनिरपेक्षता का मतलब ध्वज के एक रंग को खारिज करना नहीं होता, उसे उसके मूल धार्मिक अधिकारों से वंचित करना नहीं होता....। जिस भगवा रंग को आपने आतंक का रंग बनाया है, मत भूलिए कि वह भगवा ही हमारे पूर्वजों का रंग है...राम और कृष्ण ने पहना, महात्मा बुद्ध ने पहना, भगवान महावीर ने पहना,  स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द ने पहना...सच तो यह है कि बंगाल ही नहीं, इस देश की आत्मा के रंग में यह रंग गहराई से शामिल है...आप इसे खारिज नहीं कर सकते..।.

गुरुवार, 25 अप्रैल 2019

मीडिया में हम, कुछ अनुभव, कुछ बातें...जो केवल किस्से नहीं हैं

देश भर की महिला पत्रकार एक दूसरे से जुड़ें..देखें कि हमारी खिड़कियों के बाहर भी एक दुनिया है

चुनौतियाँ सबके सामने होती हैं..चाहे महिला हो या पुरुष...इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में यह फर्क और कम है हिन्दी के अखबारों को इस दायरे से निकलने में वक्त लगेगा। महिलाओं के लिए काम करना आसान नहीं होता..नयी लड़कियाँ भी जिस पृष्ठभूमि से आती हैं, वहाँ समय सीमा की पाबन्दी सबसे बड़ी सीमा है..पहला युद्ध तो यहीं पर है और मीडिया शिक्षा के क्षेत्र की तरह बँधा हुआ कोना नहीं है, यहाँ हम हर तरह के लोगों से मिलते हैं, हर तरह की चीजें देखते हैं। कभी पैदल चलते हैं तो कभी हवाई जहाज में, कभी होटल में जाते हैं तो कहीं फुटपाथ पर अड्डा जमता है..कभी वाई -फाई कनेक्शन तो कभी मोबाइल नेटवर्क तक नहीं मिलता...मध्यमवर्गीय परिवारों से आने वाले बच्चे इस स्थिति के लिए तैयार नहीं रहते, वे तैयार रहते हैं तो अभिभावकों की मंजूरी नहीं मिलती। बहुत सी प्रतिभाशाली लड़कियों ने असमय यह क्षेत्र इसी वजह से छोड़ दिया। मानसिकता बड़ी समस्या है...देर से आने वाले लड़कों से भले सवाल न हों, देर से आने वाली लड़कियाँ तो सन्देह की दृष्टि से देखी ही जाती हैं। इस पर जिसने परिवार की मर्जी के खिलाफ जाकर यह क्षेत्र चुना...वह तो तलवार की धार पर चलती है..एक मानसिक तनाव 24 घंटे रहता है.....इस तनाव से हर महिला मीडियाकर्मी जूझती है। शादीशुदा लड़कियों के सामने समय प्रबन्धन बड़ी समस्या है और बच्चे हुए तो उनको सम्भालना भी एक चुनौती है। हम महिलाओं के अन्दर एक संस्कारजनित जड़ता है...सच यह है कि हमें एडजस्ट करने में दिक्कत होती है और हमें कोई सही रास्ता बताने वाला नहीं होता..एक बेहद आर्थिक जरूरतमंद लड़की के लिए ग्लैमर की चकाचौंध बड़ी चीज होती है मगर उसे उन चुनौतियों का अहसास नहीं होता जो इस क्षेत्र में हैं। सन्मार्ग को इस बात का श्रेय जरूर जाता है कि हिन्दी अखबारों में लड़कियों को बहुतायत से लाया गया मगर यह भी सच है कि इनमें से बहुत सी लड़कियों का सफर कुन्द हुआ। हम एक दूसरे से मुकाबला करती रहीं...एक दूसरे से असुरक्षित रहीं और इसका फायदा भी उठाने वालों ने खूब उठाया। इस प्रोत्साहन में जो पक्षपात रहा, उसने असन्तोष बढ़ाया और इससे मीडिया में महिलाओं को लेकर सन्देह बढ़ा। विडम्बना यह है कि हम लड़कियों ने ही दूसरी लड़कियों को कमजोर किया, उनका रास्ता रोका...और अन्त में धकेल दिये गये..। लड़कियों को आगे बढ़ाने के नाम पर लड़कों को पीछे रखने का नतीजा यह हुआ कि पुरुष पत्रकारों में प्रतिस्पर्द्धा बढ़ी..हम एक दूसरे के शत्रु नहीं हैं...। हम मीडियाकर्मी एक दूसरे से प्रतियोगिता करके कभी आगे नहीं बढ़ सकते..हमें एक दूसरे का हाथ आगे बढ़ना होगा। लम्बे अरसे से बहुत से लोग काम करते रहे हैं जिनको देखकर सीखा है..माधवी दी, वनिता दी, भारती दी, आफरीन दी, मधुछन्दा दी ऐसी तमाम महिला पत्रकार हैं जिनके अनुभवों का लाभ अब नयी पीढ़ी को मिलना चाहिए। पत्रकारिता के क्षेत्र में सन्मार्ग, प्रभात खबर, ताजा खबर और सलाम दुनिया में अच्छे -बुरे अनुभवों के बीच कई ऐसे लोग रहे जिन्होंने पक्षपात नहीं किया और वह आज भी बोलते हैं। मौका भले ही सन्मार्ग में सुरेन्द्र सर ने दिया मगर प्रोत्साहन हमेशा आनन्द भइया, ओझा भइया, गोपाल भइया, लोकनाथ भइया, रवीन्द्र भइया, अनिल राय भइया और रामकेश भइया से अधिक मिला। जिन्दगी आगे बढ़ चुकी है..। पांडेय सर और प्रसाद सर से भी स्नेह मिला..। मैं ऐसी पत्रकार रही जिसने कभी विभाग में बँधकर काम करना पसन्द नहीं किया और न ही किया...इसलिए मेरे सामने मुश्किलें भी बहुत रहीं मगर इन मुश्किलों ने मजबूत ही बनाया है। कई बार जरूरी मौकों पर बड़ों की चुप्पी खली और कई बार उनका व्यवहार समझ में नहीं आया मगर यह भी अनुभव का एक हिस्सा है..। अगर पत्रकारिता को बेहतर बनाना है तो हमारे अन्दर प्रतिरोध की क्षमता होनी चाहिए...और वरिष्ठों को आगे आना चाहिए..। विश्वम्भर नेवर सर से मैंने जमीन पर रहना सीखा है और यह कि व्यवहार बड़ी चीज है। सलाम दुनिया के सम्पादक सन्तोष सिंह से सीखने वाली बात यह है कि दिमाग शान्त रखकर ही मजबूत फैसले लिए जा सकते हैं और टीम वर्क बड़ी चीज है। आज मैं कह सकती हूँ कि काम करने का जितना शानदार माहौल सलाम दुनिया में है, वह अपनी नजर में मैंने और कहीं नहीं देखा..। मेरे कॅरियर के जो 5 साल यहाँ पर गुजरे हैं..उसने यह बात प्रमाणित की है कि अवसर मिले और अपने सपनों को जीने का मौका मिले तो भी कोई पत्रकार अपने हाउस के प्रति ईमानदारी से काम कर सकता है। आज के नये पत्रकारों में बहुत से युवा होनहार हैं और उनको आगे बढ़ने में पूरी मदद की जानी चाहिए। लड़कियाँ अपने सपनों को बड़े आराम से छोड़ने के लिए तैयार हो जाती हैं...निराशा होती है।
अधिकतर हाउस महिलाओं को समय पर छोड़ते हैं..नाइट करने की जिम्मेदारी न के बराबर है और है तो परिवहन की सुविधा नहीं है....पूरा शेड्यूल गड़बड़ हो जाता है। इसकी वजह भी है। लड़कियों पर घर - बाहर की जिम्मेदारी है और हिन्दीभाषी परिवार इतने खुले विचारवाले नहीं हैं इसलिए नाइट करना एक समस्या है मगर इससे लड़कियों के उत्साह, जोश और जुनून पर कोई फर्क नहीं पड़ा। जरूरी है कि हम युवाओं को मौका दें।
मुझे लगता है कि समय आ गया है कि कोलकाता प्रेस क्लब को एक अलग से महिलाओं के लिए विंग बनानी चाहिए और उसमें मान्यता की शर्त को दरकिनार करना चाहिए क्योंकि अधिकतर महिला पत्रकारों के पास सरकारी मान्यता वाला कार्ड नहीं है..मेरे पास भी नहीं है और अब मुझे लगता है कि इसकी जरूरत भी नहीं है...। मैं जब आयी थी तो इन्टरनेट नहीं था, फैक्स की मशीनें थीं...कम्प्यूटर की जानकारी नहीं थी मगर यह सब आज है और मैंने भी थोड़ा -बहुत तो सीखा ही है...आज एक वेबपत्रिका चला लेना और दो किताबें लिख लेना...यह सब इसी वजह से सम्भव हुआ है...सीखते रहने की जरूरत है क्योंकि जानकारी कभी पुरानी नहीं होती। अभिभावकों को अपनी बेटियों पर भरोसा करना होगा...क्योंकि परिवार का साथ उसकी शक्ति ही नहीं बढ़ाता बल्कि आवाज को मजबूती भी देता है..आपको शक्ति बनना चाहिए...कमजोरी नहीं।
बहुत तकलीफ होती है जब काम न मिलने के कारण या किसी और कारण से हमारा कोई पत्रकार साथी शहर छोड़कर दिल्ली का रुख करता है। खासकर उमेश और पूर्णिमा का जाना बहुत अखरा..अभी भी राजेश, विनय, दीपक जैसे युवा पत्रकार अच्छा काम कर रहे हैं और कुछ ऐसे युवा हैं जिनको माँजने की जिम्मेदारी उठायी जाए..ये वह लोग हैं जिनको मैं देख रही हूँ..सूची में और भी युवा शामिल हो सकते हैं।
अपने शहर में पत्रकारिता को मजबूती देने के लिए साझा प्रयास हों

एक बात तो तय है कि हिन्दी पत्रकारिता को मजबूत करने के लिए या फिर पत्रकारों के हितों की सुरक्षा के लिए कोई बाहर से नहीं आने वाला है। ऐसे में कितना अच्छा हो कि मीडिया के नामों से ऊपर उठकर, छोटे - बड़े का भेद भूलकर ऐसा कोई मंच हो जो हिन्दी पत्रकारिता के लिए काम करे..व्याख्यान हो, बाहर से लोग आएं, विचारों का आदान -प्रदान हो, एक हाउस का कोई वरिष्ठ पत्रकार दूसरे हाउस में जाकर प्रशिक्षण दे, अनुभव साझा करे। लड़कियों के लिए शक्ति के माध्यम से पिछले 4 सालों में हम बहुत सी महिला मीडियाकर्मियों को साथ ला सके हैं मगर अब वक्त है कि हम इसे आगे बढ़ाएं। मुझे पता है कि आज के दौर में जो हालात हैं, मेरी यह बात बहुत लोगों को गप या चुटकुला लग रही होगा। मगर कोई भी बदलाव पहले चुटकुला ही कहा जाता है। कम से कम हाल ही में प्रेस क्लब ने तीन दिवसीय कार्यशाला आयोजित कर एक उम्मीद तो जगायी है मगर क्या हर बात के लिए निर्भर रहना जरूरी है। ऐसे आयोजन हर महीने नहीं हो सकते मगर 3 -4 महीने या 6 महीने में तो हो ही सकते हैं। अगर मेरे वरिष्ठ पत्रकार इस बाबत कदम बढ़ाएं तो बहुत कुछ सही हो सकता है।
आज बबीता, स्वीटी, अनु, निधि, मौमिता जैसी लड़कियाँ बेहद खूबसूरती से अपने हिस्से का काम सम्भाल रही हैं...बस इतनी इच्छा है कि ये लगातार ऐसी ही बढ़ती रहें क्योंकि इनके बढ़ने में ही महिला मीडियाकर्मियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना है...गुजारिश है बहनों...यह क्षेत्र मत छोड़ना...एक पत्रकार के पीछे हटने का मतलब है कि कई सपनों का पीछे हट जाना। यह एक मिथक है कि रिपोर्टिंग ही पत्रकारिता है..इस मिथक को तोड़ना बहुत जरूरी है तभी हमारा हस्तक्षेप बढ़ेगा...क्योंकि नियन्त्रण सह सम्पादन में हैं। आप जब काम करेंगी तो मीडिया में महिलाओं के प्रति नजरिया बदलेगा...क्योंकि आप जैसे देखेंगी..वैसे कई बार कोई और नहीं देख सकता...हमें कोई जरूरत नहीं है कि हम लड़कों से प्रतियोगिता करें या उन पर बेवजह ध्यान दें...क्योंकि फील्ड में हम लड़का या लड़की देखकर काम नहीं करते...बड़े से बड़ा पत्रकार फील्ड में आपका सहकर्मी ही होता है। रिपोर्टिंग पत्रकारिता का बुनियादी हिस्सा है मगर आप इसी में सीमित रहीं तो हिन्दी अखबारों में महिला सम्पादक का सपना अधूरा रह जायेगा। रिपोर्टिंग के बाद कैमरा, डेस्क, पेज मेकिंग और विज्ञापन से लेकर विपणन में भी लड़कियों की जरूरत है..। पेज मेकिंग में मैंने अब तक एकमात्र रेखा दी को देखा है। बंगाल में एक भी हिन्दीभाषी लड़की के हाथ में कैमरा नहीं देखा...। राजस्थान पत्रिका की कमलजीत को छोड़कर मार्केटिंग में और कोई हिन्दीभाषी लड़की नहीं दिखती...ऐसे कैसे कुछ भी बदलेगा...? मेरी आँखों में अब भी एक सपना तैर रहा है, किसी हिन्दी मीडिया या अखबार में किसी महिला को इस शहर में बतौर सम्पादक देखने का..जिसके ऊपर कोई ठप्पा न हो और वह पूरी मजबूती से अपने दम पर खड़ी हो और दूसरों को खड़ा करे।
यह सब वह जगहें हैं जहाँ पर हमें काम करने की जरूरत है और यह बदलाव सिर्फ आपके हाथों में है। यही कारण है कि अब मेरा पूरा ध्यान सम्पादन पर है मगर इसका मतलब यह नहीं है कि मैंने रिपोर्टिंग छोड़ दी है मगर फोकस जरूर बदला है...यह वह जगह है जहाँ से हम हस्तक्षेप कर सकते हैं...यहाँ मेरी पत्रकार बहनों को ध्यान देना चाहिए।
हमारा समय कुछ और रहा और आने वाला समय कुछ और है...बस इतनी गुजारिश है कि जब भी आप कदम रखें, मजबूती के साथ रखें...यह जगह उतनी बुरी भी नहीं है मगर हम और आप इसे और अच्छा बना सकते हैं...।

रविवार, 17 फ़रवरी 2019

अभिजात्यता के कवच से बाहर निकलिए...रोशनी दूर तक फैली है




हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता का सम्मेलन समाप्त हो गया है। 18 साल के बाद इस तरह का आयोजन निश्चित रूप से एक अच्छी पहल है मगर इन दो दिनों में मुझे समझ में आ गया कि आज की साहित्यिक पत्रकारिता की लोकप्रियता कम क्यों हो रही है, (अगर वाकई ऐसा है)। जब से कॉलेज में गयी, विश्वविद्यालय पहुँची और पिछले 15 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूँ...एक ही राग सुनती आ रही हूँ...बड़ा संकट हैं, पत्रिकाएं सिमट रही हैं, लोग पढ़ना नहीं चाहते..अभिव्यक्ति का संकट है...मीडिया में साहित्य का परिदृश्य सिकुड़ रहा है..सरकार आजादी छीन रही है....और मजे की बात यह है कि ये राग अलापते हुए जो शोधार्थी थे, आज प्रोफेसर और देश के दिग्गज विद्वानों में शुमार हैं...अच्छा -खासा बैंक बैलेंस है...गाड़ी है, शोहरत है और सम्मान भी है...मगर सालों बाद भी कुछ नहीं बदला...क्योंकि ये बदलाव को देखना ही नहीं चाहते..या इनकी नजर में बदलाव सिर्फ उतना है जो उनकी दृष्टि को स्वीकार है। याद रहे कि सरकार अब भाजपा की है, ये रुदन मार्क्सवादियों के जमाने से चला आ रहा है। तब समझ में नहीं आता था मगर आज चीजों को समझ रही हूँ तो बतौर पत्रकार इन सारे आरोपों पर घोर आपत्ति है। मजे की बात यह है कि जिन साहित्यकारों के नाम पर उपेक्षा का रोना रो रहे हैं, आपने भी उनके लिए क्या किया? आप सरकार से बात नहीं करेंगे क्योंकि यह आपकी शान के खिलाफ है..और यह साहित्य का काम नहीं है आपकी नजर में....साहित्य का स्थान ऊँचा है और इतना ऊँचा हो गया है कि जमीन पर कदम रखने में उसे परेशानी होने लगी है। इतना याद रखना चाहिए कि निराला, प्रसाद या नागार्जुन से लेकर प्रेमचन्द समेत तमाम कवियों को किसी साहित्यिक पत्रिका के सम्पादक ने महान नहीं बनाया। ये सब महान बने क्योंकि इनको जनता ने अपनाया और जब जनता ने अपनाया तब जाकर आलोचकों और आप जैसे दिग्गजों ने इनको पूजा। इन सभी ने पहले आम आदमी की तकलीफों को जीया, भोगा, सरकार के प्रति इनका विद्रोह जन मन की अभिव्यक्ति था क्योंकि इन जैसा हर साहित्यकार जनता के बीच रहा। आटा, नमक और तेल की चिन्ता ने इनके साहित्य को कमतर नहीं बनाया। आज के अधिकतर सम्पादकों में जनता तक जाने की इच्छा ही नहीं है और न ही वे कोशिश करते हैं। आपको रेडिमेड वातावरण चाहिए और रेडिमेड पाठक से लेकर लोकप्रियता भी रेडिमेड चाहिए। आपका संघर्ष पत्रिका निकालने तक सीमित है..मगर कहानी, आलेख और कविता से इतर आपकी पत्रिकाएं किस सरोकार से जुड़ती हैं। आप किसानों पर बात करते हैं, किसानों के प्रति नीतियों को लेकर सरकार को कोसते हैं मगर कृषि सम्बन्धित एक भी आलेख या एक भी कार्यशाला या उससे सम्बन्धित जानकारी आपकी पत्रिकाओं में नहीं रहती..आप पत्रिका के कार्यालय में उन पर बात करते हैं जबकि जरूरत तो एक किसान तक जाने की है। किसानों की आत्महत्या का रोना बहुत रोया जाता है, कितने लेखक और सम्पादक किसानों की मदद करने पहुँचे? आपको शिकायत है कि युवा साहित्य नहीं पढ़ रहे, भाषा उनकी सही नहीं है, कितनी पत्रिकाओं ने शिक्षण संस्थानों तक ये प्रस्ताव रखा कि वे विद्यार्थियों तक जाएंगे और उनको भाषा व व्याकरण का ज्ञान देंगे...उनको साहित्यकारों से सम्बन्धित जगहें दिखाएंगे? अव्वल तो हर सम्पादक कह देगा कि यह साहित्यिक पत्रकारिता का काम ही नहीं है, इस पर वह कोशिश करेगा तो उसके दरवाजे शहरों के पॉश स्कूल, कॉलेजों या निजी शिक्षण संस्थानों के लिए खुलते हैं। हकीकत यह है कि किसी साधारण स्कूल का शिक्षक उसकी दृष्टि में कोई मायने नहीं रखता है। आप युवाओं की बात करते हैं मगर आपके लेखन में न तो युवाओं के मुद्दे हैं और न उनके लिए किसी तरह की व्यावहारिक जमीन पर उतर सकने वाली कोई पहल। अगर आप संगठन या पत्रिका से जुड़े हैं तो जरूर अपने विद्यार्थियों को इमोशनली ब्लैकमेल कर अपनी सभाओं में ले जाते हैं। भला हो यूजीसी का जिसने प्रमाणपत्र का जिसकी वजह से बच्चे आज लिख रहे हैं। आपको रेडिमेड लेखक चाहिए जो गलतियाँ न करें मगर आप युवाओं को तराशने के लिए तैयार नहीं हैं, उन पर परिश्रम नहीं करना चाहते इसलिए नए लेखकों और नए बच्चों के लिए तक आप तक पहुँच पाना ही बड़ी उपलब्धि है।
आज का मीडिया अगर टीआरपी से चल रहा है तो आप भी विवादों का सहारा लेकर और कई बार उसे गढ़कर टीआरपी चाहते हैं। ऐसा हाल ही में विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के मामले में हुआ, भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार को लेकर हुआ, जागरण संवादी को लेकर हुआ..साहित्य की इमेज आपके लिए मायने नहीं रखती। हर गलत चीज का बहिष्कार करने वाले आयोजक ऐसे विवाद खड़े करने वाले सम्पादकों का बहिष्कार कभी नहीं करते। वो बाकायदा सम्मानित अतिथि के रूप में आपके मंच पर उपस्थित हैं, आप दूसरों को क्या आदर्श सिखाएंगे और बच्चे आपसे क्या सीखेंगे। आप शोषण के खिलाफ लिखते हैं और अधिकांश साहित्यिक पत्रिकाएं अवैतनिक कार्यकर्ताओं के भरोसे चल रही हैं, क्या ये शोषण नहीं है? आप चाहते हैं कि लोग आपकी पत्रिका खरीदकर पढ़ें मगर आपकी इच्छा है कि लेखक अपनी किताबें बाकायदा डाक से अपने खर्च तक आप तक पहुँचाएं, क्या ये दोहरापन नहीं है? आज क्यों युवाओं से नहीं लिखवाया जा रहा है, अगर आपको मैथिलीशरण गुप्त चाहिए तो पहले महावीर प्रसाद द्विवेदी तो बनिए। साहित्य में कोई वाद नहीं होना चाहिए, अगर साहित्य समावेशी है तो वहाँ खेमेबाजी का क्या काम, मगर सम्पादकों में खेमेबाजी है, वामपंथ, दक्षिणपंथ और एक दूसरे को खारिज करने की प्रवृत्ति भी है तो आप कौन सी स्वायत्तता सिखा रहे हैं जब आपके अन्दर अपने से भिन्न मत वालों को स्वीकार करने और उनको सुनने की शक्ति नहीं है।
अपनी पत्रिका जनता तक पहुँचाने के लिए आप संघर्ष करते हैं,समझौते भी करते हैं तो आप आम मीडिया से अलग कैसे हैं..जबकि आप भी वही कर रहे हैं। अब बात जब मीडिया की है तो आपको पता होना चाहिए कि जो अभिजात्यता बोध और  उसका अहं साहित्यिक पत्रकारिता में चल सकता है, मीडिया में उसके लिए कोई जगह नहीं है। हम पत्रकार जरूरत पड़ने पर झोपड़ों से लेकर फुटपाथ तक पर भी काम कर सकते हैं और मुझे नहीं लगता कि किसी भी सम्पादक को इसमें शर्म आती होगी। साहित्यिक पत्रकारिता में खर्च वह नहीं है जो किसी आम मीडिया में है। हम लेखकों और प्रकाशकों तक, संस्थाओं तक और कई बार शिक्षण संस्थानों से लेकर साहित्यिक पत्रिकाओं तक जाते हैं। कुछ एक संस्थाओं को छोड़ दूँ तो याद नहीं आता कि किसी उपरोक्त माध्यमों के किसी भी प्रतिनिधि ने कोई इच्छा जतायी हो कि वह किताबों से इतर व्यावहारिक स्तर पर कुछ करना चाहता है। सच तो यह है कि सबकी नजर बड़े संचार माध्यमों और बड़े अखबारों पर रहती है, वे छोटे संचार माध्यमों से जुड़ना पसन्द नहीं करते और न ही किसी बड़े अखबार से अपने रिश्ते बिगाड़ना चाहते हैं। सम्पादकों में यह समझौतावादी रवैया ही मीडिया में साम्राज्यवाद का पोषक है। ऐसे में आप सभी अखबारों को दोष नहीं दे सकते और न आपको देना चाहिए। अगर छोटे स्तर पर कोई काम कर रहा हो तो भी 2 -3 रुपए का अखबार खरीदना आपको अपने पैसे की बर्बादी लगता है और आप चाहते हैं कि कोई आपकी 15 से 200 रुपए आपकी पत्रिका पर खर्च करे और वह भी विवाद और कुछ कहानियाँ पढ़ने के लिए..साहब ऐसा नहीं होता। आपकी नजर में जनसत्ता ही अखबार हैं और आप तमाम आकलन उसे आधार मानकर करते हैं तो आपका आकलन अधूरा भी है और एकांगी भी है। दुनिया सिर्फ बड़े अखबारों तक नहीं है।
हकीकत यह है कि आज साहित्य जनता तक जा रहा है तो उसी मीडिया के कारण जा रहा है जिसे आप गालियाँ देते नहीं थकते। हम साहित्य को हिस्सा बना सकते हैं मगर हमारे सरोकार आपकी तरह सीमित नहीं है, हमारी दुनिया आपकी तरह छोटी नहीं है। हमारे लिए संगोष्ठी जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण नल में पानी न आने से परेशान लोग हैं, कक्षाओं में टूटी बेंच है, पुलवामा के शहीद हैं, और सोने का भाव है, जाहिर है कि जगह की कमी तो होगी और इस स्थानाभाव के बावजूद हम आपके कार्यक्रमों, आपकी गतिविधियों, प्रयासों, समीक्षाओं को जगह देते हैं। आपके लिए विज्ञापन महत्व नहीं रखते मगर मीडिया में पत्रकारों से लेकर ग्रुप डी के स्टाफ व हॉकर तक को रोजगार मिलता है...उसके लिए वेतन की जरूरत पड़ती है, हमारे लिए साहित्य एक हिस्सा है, अनिवार्य हिस्सा है..हमारे लिए जनता ही सबसे बड़ा साहित्य है। आपको किसी रिक्शे वाले या पान विक्रेता को पत्रिका पढ़वाने में शर्म आती होगी, हमें नहीं आती...हर घर - घर तक जाते हैं, किताबें पढ़वाते हैं, अपने अंक पढ़वाते हैं, उनकी समस्याओं को सामने रखते हैं, डंडे खाते हैं, तब जाकर हमें वह सम्मान मिलता है। एक लेखक की हत्या हो गयी तो आपने अवार्ड वापसी शुरू कर दी मगर न जाने कितने पत्रकार पिटते और मारे जाते हैं, कई भूखे रह जाते हैं...वह आपके साहित्य के लिए अछूत हैं। आपके तमाम आयोजनों की सफलता में मीडिया का बड़ा योगदान है और एक लम्बी यात्रा तय करने में भी। आप  पत्रकारों  की मुश्किलों पर बात नहीं करते क्योंकि उनमें आपकी तरह अभिजात्यता नहीं है...वह साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता का हिस्सा नहीं है..तो यह दूरी आपने बनायी है, हमने नहीं।

हर पत्रिका व माध्यम में साहित्य है और बाकायदा साहित्यिक महोत्सव भी हैं मगर आप उसे देखना नहीं चाहते। आजतक में साहित्य है, समीक्षाएं, कई दिग्गज लेखक लिखते हैं, अमर उजाला काव्य है। कोलकाता में सलाम दुनिया में 2 दिन, रविवार और बुधवार को साहित्य परिशिष्ट निकलता है, जागरण में सप्तरंग है। प्रभात खबर से लेकर वेबदुनिया तक के साहित्यिक परिशिष्ट हैं मगर आपको साहित्य नहीं दिखता। अखबारों में हर दिन साहित्यिक गतिविधियों की खबरें छपती हैं। आप खुद नियमित तौर पर खबरें भेजते हैं मगर आपको साहित्य नहीं दिखता। कई शहरों में तो रोज कला और साहित्य का एक पेज निकलता है और ये तो मैंने भोपाल में देखा है। बाकायदा साहित्य और कला के संवाददाता हैं, छपते -छपते पिछले 30 साल से सैकड़ों पन्नों का साहित्य विशेषांक निकाल रहा है। हर अखबार की पत्रिका में साहित्य है। जागरण और आजतक से लेकर तमाम बड़े - छोटे अखबार तो साहित्यिक आयोजन करते हैं। नाटकों की समीक्षाएं भी छपती हैं। इंडिया टुडे से लेकर आउट लुक जैसी पत्रिकाओं में भी साहित्य के लिए पन्ने सुरक्षित हैं। इंडिया टुडे के साहित्यिक विशेषांक तो इतने बेस्ट सेलर रहे कि वे खत्म भी हो गये। जागरण संवादी, आजतक साहित्य, अमर उजाला का आयोजन तो बस उदाहरण हैं। एबीपी न्यूज ने बाकायदा साहित्यकारों पर तर्पण नामक श्रृंखला चलायी। आपको रवीश कुमार एनडीटीवी पर केदारनाथ सिंह नहीं दिखते। संसद में धूमिल और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना पढ़े जाते नहीं दिखते। आपको उनकी मौजूदगी की खुशी नहीं बल्कि नेताओं के मुँह से सुनने का अफसोस है, नेता क्या किसी और समाज से आते हैं? हम यह नहीं कहते कि मीडिया में सब कुछ अच्छा है मगर सब कुछ इतना बुरा भी नहीं है कि आप इससे जुड़ न सकें..जनता इतनी कमतर नहीं कि आप उसे अपनी यात्रा में शामिल करने से परहेज करें।
हम पत्रकार ही साहित्य को जनता तक ले जा रहे हैं और ले जाएंगे..तब तक ले जाएंगे क्योंकि किताबें और साहित्य किसी की सम्पत्ति नहीं है जो एक कमरे में कैद रहे, वह जनता की धरोहर है, जनता तक जाएगी, जरूर जाएगी।
सच तो यह है कि अन्धेरे को आपने अपना कवच बना लिया है। यही अन्धेरा और आपकी इसी अभिजात्यता का गौरव बोध आपको विशिष्ट बनाता है, आप अपने सम्पादक होने का अहं छो़ड़ नहीं पाते और इसलिए जो अच्छा है, उसे न तो देख पाते हैं और न ही देखना चाहते हैं...अगर यही आपका सत्य है तो...आपके प्रमाणपत्र की जरूरत किसी को नहीं है। आप अगर किसी से ईमानदारी से नहीं जुड़ते, उसका कृतित्व स्वीकार नहीं करते तो आप किसी मायने में आम मीडिया से बेहतर नहीं है।
हम आपको खारिज करते हैं।