रविवार, 17 फ़रवरी 2019

अभिजात्यता के कवच से बाहर निकलिए...रोशनी दूर तक फैली है




हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता का सम्मेलन समाप्त हो गया है। 18 साल के बाद इस तरह का आयोजन निश्चित रूप से एक अच्छी पहल है मगर इन दो दिनों में मुझे समझ में आ गया कि आज की साहित्यिक पत्रकारिता की लोकप्रियता कम क्यों हो रही है, (अगर वाकई ऐसा है)। जब से कॉलेज में गयी, विश्वविद्यालय पहुँची और पिछले 15 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूँ...एक ही राग सुनती आ रही हूँ...बड़ा संकट हैं, पत्रिकाएं सिमट रही हैं, लोग पढ़ना नहीं चाहते..अभिव्यक्ति का संकट है...मीडिया में साहित्य का परिदृश्य सिकुड़ रहा है..सरकार आजादी छीन रही है....और मजे की बात यह है कि ये राग अलापते हुए जो शोधार्थी थे, आज प्रोफेसर और देश के दिग्गज विद्वानों में शुमार हैं...अच्छा -खासा बैंक बैलेंस है...गाड़ी है, शोहरत है और सम्मान भी है...मगर सालों बाद भी कुछ नहीं बदला...क्योंकि ये बदलाव को देखना ही नहीं चाहते..या इनकी नजर में बदलाव सिर्फ उतना है जो उनकी दृष्टि को स्वीकार है। याद रहे कि सरकार अब भाजपा की है, ये रुदन मार्क्सवादियों के जमाने से चला आ रहा है। तब समझ में नहीं आता था मगर आज चीजों को समझ रही हूँ तो बतौर पत्रकार इन सारे आरोपों पर घोर आपत्ति है। मजे की बात यह है कि जिन साहित्यकारों के नाम पर उपेक्षा का रोना रो रहे हैं, आपने भी उनके लिए क्या किया? आप सरकार से बात नहीं करेंगे क्योंकि यह आपकी शान के खिलाफ है..और यह साहित्य का काम नहीं है आपकी नजर में....साहित्य का स्थान ऊँचा है और इतना ऊँचा हो गया है कि जमीन पर कदम रखने में उसे परेशानी होने लगी है। इतना याद रखना चाहिए कि निराला, प्रसाद या नागार्जुन से लेकर प्रेमचन्द समेत तमाम कवियों को किसी साहित्यिक पत्रिका के सम्पादक ने महान नहीं बनाया। ये सब महान बने क्योंकि इनको जनता ने अपनाया और जब जनता ने अपनाया तब जाकर आलोचकों और आप जैसे दिग्गजों ने इनको पूजा। इन सभी ने पहले आम आदमी की तकलीफों को जीया, भोगा, सरकार के प्रति इनका विद्रोह जन मन की अभिव्यक्ति था क्योंकि इन जैसा हर साहित्यकार जनता के बीच रहा। आटा, नमक और तेल की चिन्ता ने इनके साहित्य को कमतर नहीं बनाया। आज के अधिकतर सम्पादकों में जनता तक जाने की इच्छा ही नहीं है और न ही वे कोशिश करते हैं। आपको रेडिमेड वातावरण चाहिए और रेडिमेड पाठक से लेकर लोकप्रियता भी रेडिमेड चाहिए। आपका संघर्ष पत्रिका निकालने तक सीमित है..मगर कहानी, आलेख और कविता से इतर आपकी पत्रिकाएं किस सरोकार से जुड़ती हैं। आप किसानों पर बात करते हैं, किसानों के प्रति नीतियों को लेकर सरकार को कोसते हैं मगर कृषि सम्बन्धित एक भी आलेख या एक भी कार्यशाला या उससे सम्बन्धित जानकारी आपकी पत्रिकाओं में नहीं रहती..आप पत्रिका के कार्यालय में उन पर बात करते हैं जबकि जरूरत तो एक किसान तक जाने की है। किसानों की आत्महत्या का रोना बहुत रोया जाता है, कितने लेखक और सम्पादक किसानों की मदद करने पहुँचे? आपको शिकायत है कि युवा साहित्य नहीं पढ़ रहे, भाषा उनकी सही नहीं है, कितनी पत्रिकाओं ने शिक्षण संस्थानों तक ये प्रस्ताव रखा कि वे विद्यार्थियों तक जाएंगे और उनको भाषा व व्याकरण का ज्ञान देंगे...उनको साहित्यकारों से सम्बन्धित जगहें दिखाएंगे? अव्वल तो हर सम्पादक कह देगा कि यह साहित्यिक पत्रकारिता का काम ही नहीं है, इस पर वह कोशिश करेगा तो उसके दरवाजे शहरों के पॉश स्कूल, कॉलेजों या निजी शिक्षण संस्थानों के लिए खुलते हैं। हकीकत यह है कि किसी साधारण स्कूल का शिक्षक उसकी दृष्टि में कोई मायने नहीं रखता है। आप युवाओं की बात करते हैं मगर आपके लेखन में न तो युवाओं के मुद्दे हैं और न उनके लिए किसी तरह की व्यावहारिक जमीन पर उतर सकने वाली कोई पहल। अगर आप संगठन या पत्रिका से जुड़े हैं तो जरूर अपने विद्यार्थियों को इमोशनली ब्लैकमेल कर अपनी सभाओं में ले जाते हैं। भला हो यूजीसी का जिसने प्रमाणपत्र का जिसकी वजह से बच्चे आज लिख रहे हैं। आपको रेडिमेड लेखक चाहिए जो गलतियाँ न करें मगर आप युवाओं को तराशने के लिए तैयार नहीं हैं, उन पर परिश्रम नहीं करना चाहते इसलिए नए लेखकों और नए बच्चों के लिए तक आप तक पहुँच पाना ही बड़ी उपलब्धि है।
आज का मीडिया अगर टीआरपी से चल रहा है तो आप भी विवादों का सहारा लेकर और कई बार उसे गढ़कर टीआरपी चाहते हैं। ऐसा हाल ही में विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के मामले में हुआ, भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार को लेकर हुआ, जागरण संवादी को लेकर हुआ..साहित्य की इमेज आपके लिए मायने नहीं रखती। हर गलत चीज का बहिष्कार करने वाले आयोजक ऐसे विवाद खड़े करने वाले सम्पादकों का बहिष्कार कभी नहीं करते। वो बाकायदा सम्मानित अतिथि के रूप में आपके मंच पर उपस्थित हैं, आप दूसरों को क्या आदर्श सिखाएंगे और बच्चे आपसे क्या सीखेंगे। आप शोषण के खिलाफ लिखते हैं और अधिकांश साहित्यिक पत्रिकाएं अवैतनिक कार्यकर्ताओं के भरोसे चल रही हैं, क्या ये शोषण नहीं है? आप चाहते हैं कि लोग आपकी पत्रिका खरीदकर पढ़ें मगर आपकी इच्छा है कि लेखक अपनी किताबें बाकायदा डाक से अपने खर्च तक आप तक पहुँचाएं, क्या ये दोहरापन नहीं है? आज क्यों युवाओं से नहीं लिखवाया जा रहा है, अगर आपको मैथिलीशरण गुप्त चाहिए तो पहले महावीर प्रसाद द्विवेदी तो बनिए। साहित्य में कोई वाद नहीं होना चाहिए, अगर साहित्य समावेशी है तो वहाँ खेमेबाजी का क्या काम, मगर सम्पादकों में खेमेबाजी है, वामपंथ, दक्षिणपंथ और एक दूसरे को खारिज करने की प्रवृत्ति भी है तो आप कौन सी स्वायत्तता सिखा रहे हैं जब आपके अन्दर अपने से भिन्न मत वालों को स्वीकार करने और उनको सुनने की शक्ति नहीं है।
अपनी पत्रिका जनता तक पहुँचाने के लिए आप संघर्ष करते हैं,समझौते भी करते हैं तो आप आम मीडिया से अलग कैसे हैं..जबकि आप भी वही कर रहे हैं। अब बात जब मीडिया की है तो आपको पता होना चाहिए कि जो अभिजात्यता बोध और  उसका अहं साहित्यिक पत्रकारिता में चल सकता है, मीडिया में उसके लिए कोई जगह नहीं है। हम पत्रकार जरूरत पड़ने पर झोपड़ों से लेकर फुटपाथ तक पर भी काम कर सकते हैं और मुझे नहीं लगता कि किसी भी सम्पादक को इसमें शर्म आती होगी। साहित्यिक पत्रकारिता में खर्च वह नहीं है जो किसी आम मीडिया में है। हम लेखकों और प्रकाशकों तक, संस्थाओं तक और कई बार शिक्षण संस्थानों से लेकर साहित्यिक पत्रिकाओं तक जाते हैं। कुछ एक संस्थाओं को छोड़ दूँ तो याद नहीं आता कि किसी उपरोक्त माध्यमों के किसी भी प्रतिनिधि ने कोई इच्छा जतायी हो कि वह किताबों से इतर व्यावहारिक स्तर पर कुछ करना चाहता है। सच तो यह है कि सबकी नजर बड़े संचार माध्यमों और बड़े अखबारों पर रहती है, वे छोटे संचार माध्यमों से जुड़ना पसन्द नहीं करते और न ही किसी बड़े अखबार से अपने रिश्ते बिगाड़ना चाहते हैं। सम्पादकों में यह समझौतावादी रवैया ही मीडिया में साम्राज्यवाद का पोषक है। ऐसे में आप सभी अखबारों को दोष नहीं दे सकते और न आपको देना चाहिए। अगर छोटे स्तर पर कोई काम कर रहा हो तो भी 2 -3 रुपए का अखबार खरीदना आपको अपने पैसे की बर्बादी लगता है और आप चाहते हैं कि कोई आपकी 15 से 200 रुपए आपकी पत्रिका पर खर्च करे और वह भी विवाद और कुछ कहानियाँ पढ़ने के लिए..साहब ऐसा नहीं होता। आपकी नजर में जनसत्ता ही अखबार हैं और आप तमाम आकलन उसे आधार मानकर करते हैं तो आपका आकलन अधूरा भी है और एकांगी भी है। दुनिया सिर्फ बड़े अखबारों तक नहीं है।
हकीकत यह है कि आज साहित्य जनता तक जा रहा है तो उसी मीडिया के कारण जा रहा है जिसे आप गालियाँ देते नहीं थकते। हम साहित्य को हिस्सा बना सकते हैं मगर हमारे सरोकार आपकी तरह सीमित नहीं है, हमारी दुनिया आपकी तरह छोटी नहीं है। हमारे लिए संगोष्ठी जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण नल में पानी न आने से परेशान लोग हैं, कक्षाओं में टूटी बेंच है, पुलवामा के शहीद हैं, और सोने का भाव है, जाहिर है कि जगह की कमी तो होगी और इस स्थानाभाव के बावजूद हम आपके कार्यक्रमों, आपकी गतिविधियों, प्रयासों, समीक्षाओं को जगह देते हैं। आपके लिए विज्ञापन महत्व नहीं रखते मगर मीडिया में पत्रकारों से लेकर ग्रुप डी के स्टाफ व हॉकर तक को रोजगार मिलता है...उसके लिए वेतन की जरूरत पड़ती है, हमारे लिए साहित्य एक हिस्सा है, अनिवार्य हिस्सा है..हमारे लिए जनता ही सबसे बड़ा साहित्य है। आपको किसी रिक्शे वाले या पान विक्रेता को पत्रिका पढ़वाने में शर्म आती होगी, हमें नहीं आती...हर घर - घर तक जाते हैं, किताबें पढ़वाते हैं, अपने अंक पढ़वाते हैं, उनकी समस्याओं को सामने रखते हैं, डंडे खाते हैं, तब जाकर हमें वह सम्मान मिलता है। एक लेखक की हत्या हो गयी तो आपने अवार्ड वापसी शुरू कर दी मगर न जाने कितने पत्रकार पिटते और मारे जाते हैं, कई भूखे रह जाते हैं...वह आपके साहित्य के लिए अछूत हैं। आपके तमाम आयोजनों की सफलता में मीडिया का बड़ा योगदान है और एक लम्बी यात्रा तय करने में भी। आप  पत्रकारों  की मुश्किलों पर बात नहीं करते क्योंकि उनमें आपकी तरह अभिजात्यता नहीं है...वह साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता का हिस्सा नहीं है..तो यह दूरी आपने बनायी है, हमने नहीं।

हर पत्रिका व माध्यम में साहित्य है और बाकायदा साहित्यिक महोत्सव भी हैं मगर आप उसे देखना नहीं चाहते। आजतक में साहित्य है, समीक्षाएं, कई दिग्गज लेखक लिखते हैं, अमर उजाला काव्य है। कोलकाता में सलाम दुनिया में 2 दिन, रविवार और बुधवार को साहित्य परिशिष्ट निकलता है, जागरण में सप्तरंग है। प्रभात खबर से लेकर वेबदुनिया तक के साहित्यिक परिशिष्ट हैं मगर आपको साहित्य नहीं दिखता। अखबारों में हर दिन साहित्यिक गतिविधियों की खबरें छपती हैं। आप खुद नियमित तौर पर खबरें भेजते हैं मगर आपको साहित्य नहीं दिखता। कई शहरों में तो रोज कला और साहित्य का एक पेज निकलता है और ये तो मैंने भोपाल में देखा है। बाकायदा साहित्य और कला के संवाददाता हैं, छपते -छपते पिछले 30 साल से सैकड़ों पन्नों का साहित्य विशेषांक निकाल रहा है। हर अखबार की पत्रिका में साहित्य है। जागरण और आजतक से लेकर तमाम बड़े - छोटे अखबार तो साहित्यिक आयोजन करते हैं। नाटकों की समीक्षाएं भी छपती हैं। इंडिया टुडे से लेकर आउट लुक जैसी पत्रिकाओं में भी साहित्य के लिए पन्ने सुरक्षित हैं। इंडिया टुडे के साहित्यिक विशेषांक तो इतने बेस्ट सेलर रहे कि वे खत्म भी हो गये। जागरण संवादी, आजतक साहित्य, अमर उजाला का आयोजन तो बस उदाहरण हैं। एबीपी न्यूज ने बाकायदा साहित्यकारों पर तर्पण नामक श्रृंखला चलायी। आपको रवीश कुमार एनडीटीवी पर केदारनाथ सिंह नहीं दिखते। संसद में धूमिल और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना पढ़े जाते नहीं दिखते। आपको उनकी मौजूदगी की खुशी नहीं बल्कि नेताओं के मुँह से सुनने का अफसोस है, नेता क्या किसी और समाज से आते हैं? हम यह नहीं कहते कि मीडिया में सब कुछ अच्छा है मगर सब कुछ इतना बुरा भी नहीं है कि आप इससे जुड़ न सकें..जनता इतनी कमतर नहीं कि आप उसे अपनी यात्रा में शामिल करने से परहेज करें।
हम पत्रकार ही साहित्य को जनता तक ले जा रहे हैं और ले जाएंगे..तब तक ले जाएंगे क्योंकि किताबें और साहित्य किसी की सम्पत्ति नहीं है जो एक कमरे में कैद रहे, वह जनता की धरोहर है, जनता तक जाएगी, जरूर जाएगी।
सच तो यह है कि अन्धेरे को आपने अपना कवच बना लिया है। यही अन्धेरा और आपकी इसी अभिजात्यता का गौरव बोध आपको विशिष्ट बनाता है, आप अपने सम्पादक होने का अहं छो़ड़ नहीं पाते और इसलिए जो अच्छा है, उसे न तो देख पाते हैं और न ही देखना चाहते हैं...अगर यही आपका सत्य है तो...आपके प्रमाणपत्र की जरूरत किसी को नहीं है। आप अगर किसी से ईमानदारी से नहीं जुड़ते, उसका कृतित्व स्वीकार नहीं करते तो आप किसी मायने में आम मीडिया से बेहतर नहीं है।
हम आपको खारिज करते हैं।

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2019

पुलवामा : आपसी द्वेष और टीआरपी का मोह छोड़कर एक साथ खड़े होने का वक्त है ये


पुलवामा में इस कदर आतंकी हमला हुआ कि शहीद हुए 40 से अधिक जवानों के शव क्षत-विक्षत हो गए। उरी के बाद पुलवामा, हमारे सैनिकों ने शहादत दी..हम शहीद कहते जरूर हैं मगर सच तो यह है कि यह एक नृशंस हत्या है..एक कायराना हरकत। होना तो यह चाहिए कि हम एक साथ इस हमले के खिलाफ खड़े होते मगर ऐसी दुःखद और मार्मिक घड़ी में भी हम दो धड़ों में बँटे हैं। यह सही है कि सुरक्षा में चूक हुई है मगर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इसके पीछे वह लोग भी हैं जो इस देश में रहते जरूर हैं मगर उनकी आत्म पाकिस्तान में गिरवी रखी है। आश्चर्यजनक तरीके से अब भी नवजोत सिंह सिद्धू बातचीत को लेकर दलीलें दे रहे हैं और महबूबा मुफ्ती व फारुक अब्दुल्ला जैसे नेता अब भी सर्जिकल स्ट्राइक और सेना की कार्रवाई की निन्दा करने में लगे हैं..। आखिर देश का बुद्धिजीवी वर्ग कब तक आतंकियों के मानवाधिकार का ढोल पीटता रहेगा..क्या किसी सैनिक का मानवाधिकार नहीं है या वह मानव ही नहीं है। आखिर हम क्यों इतने संवेदनहीन हो गए हैं...? इस बात की पूरी आशंका है कि इसमें स्थानीय लोगों के साथ नेताओं का भी हाथ है, सब जानते हैं कि महबूबा मुफ्ती से लेकर फारुक अब्दुल्ला की सरकार सेना और सैनिकों के साथ किस तरह का व्यवहार करते हैं...आखिर जब कश्मीर जब भारत का हिस्सा है तो वहाँ के लिए अलग कानून क्यों है अब तक। हम क्यों इतनी सुविधाएं दे रहे हैं, ऐसे नेताओं को...इनकी सुरक्षा के पीछे क्यों अपने जवानों की जान दाँव पर लगा रहे हैं। यह वक्त है कि देश से अलग - थलग पड़े कश्मीर को देश की मुख्य धारा में लाया जाए..ऐसे नेताओं पर नकेल कसी जाए जो आतंकियों के प्रति हमदर्दी रखते हैं..और पाकिस्तानपरस्तों से सरकार सारी सुविधाएं और सुरक्षा छीन ले। यह तब होगा जब हम सब मिलकर इनका हर जगह से बहिष्कार करें...अगर कश्मीर में किसी और राज्य के लोग नहीं रह सकते, जमीनें नहीं खरीद सकते तो कश्मीरियों को भी इस देश के किसी हिस्से में जमीनें नहीं मिलनी चाहिए। हम जिनकी सुरक्षा के लिए अपने जाँबाज सैनिकों को तैनात कर रहे हैं, क्या वे इस लायक हैं कि इन जवानों की सुरक्षा में रहें। सरकार विपक्ष का मुँह देखकर नहीं चल सकती। केजरीवाल और राहुल गाँधी जैसे लोग सेना से सबूत माँगते रहेंगे तो क्या हम इनकी तुष्टि के लिए बैठे रहेंगे। पूरा देश कश्मीर को लेकर बहुत सोच सका है, किसी भी राज्य को अलग ध्वज की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए..कश्मीर जब भारत से अलग नहीं है तो उसके लिए अलग कानून क्यों स्वीकार किए जा रहे हैं?
पाक मीडिया का आलम तो ये है कि पाकिस्‍तान के अखबार 'द नेशन' ने इस हमले को 'फ्रीडम फाइटर' द्वारा किया गया हमला बताया है। वहीं 'द डाउन' ने इसको लेकर एक छोटी सी खबर को प्रकाशित किया है। इसको लेकर जहां भारत के लोगों में जबरदस्‍त गुस्‍सा दिखाई दे रहा है वहीं पाकिस्‍तान ने इसको लेकर भारत के आरोपों को खारिज कर दिया है। आलम ये है कि पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री इमरान खान जो भारत के साथ दोस्‍ती बनाए रखने का राग अलापते दिखाई देते हैं, ने हमले को लेकर कोई अफसोस तक जाहिर नहीं किया है। इतना ही नहीं इस हमले में संवेदना तक जताने के लिए पाकिस्‍तान सरकार का कोई मंत्री तक सामने नहीं आया। वहीं विदेश मंत्रालय के प्रवक्‍ता की तरफ से एक ट्वीट कर इसकी खानापूर्ति का काम जरूर कर दिया गया। अपने एक ट्वीट में विदेश मंत्रालय के प्रवक्‍ता डॉक्‍टर मोहम्‍मद फैजल ने घटना की निंदा की है और भारत के उन आरोपों को खारिज किया है जिसमें भारत ने इसके लिए पाकिस्‍तान को जिम्‍मेदार ठहराया था। प्रवक्‍ता का कहना है कि इसमें पाकिस्‍तान का कोई हाथ नहीं है। क्या ऐसे लोगों से भारत दोस्ती करने जा रहा है?
टीवी चैनलों पर इसको लेकर आक्रामक तरीके से कवरेज जारी है। इसे मोदी सरकार ने संज्ञान में लेते हुए निजी टीवी चैनलों को आगाह किया है। सरकार की तरफ से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने जम्मू कश्मीर के पुलवामा में गुरुवार को हुए आतंकवादी हमले की पृष्ठभूमि में सभी टीवी चैनलों से ऐसी सामग्री पेश करने से बचने को कहा है, जिससे हिंसा भड़क सकती हो अथवा देश विरोधी रुख को बढ़ावा मिलता हो। मंत्रालय की ओर से जारी परामर्श में कहा गया, ‘‘हालिया आतंकवादी हमले को देखते हुए टीवी चैनलों को सलाह दी जाती है कि वे ऐसी किसी भी ऐसी सामग्री के प्रति सावधान रहें जो हिंसा को भड़का अथवा बढ़ावा दे सकती हैं अथवा जो कानून व्यवस्था को बनाने रखने के खिलाफ जाती हो या देश विरोधी रुख को बढ़ावा देती हो या फिर  देश की अखंडता को प्रभावित करती हो।''मंत्रालय ने कहा कि सभी निजी चैनलों को इसका सख्ती से पालन करने का अनुरोध किया जाता है। मीडिया की बड़ी भूमिका है और जिम्मेदारी है। मैं हमेशा से कहती आ रही हूँ कि सुरक्षा सम्बन्धी मामलों में कवरेज के दौरान संवेदनशीलता और गोपनीयता की जरूरत है। आपका दुश्मन भी टीवी देखता है। हमें कोई जरूरत नहीं कि टीआरपी बढ़ाने के नाम पर अपनी सैन्य क्षमता, हथियारों और ठिकानों का प्रदर्शन करें...ऐसे साक्षात्कार तो प्रसारित ही नहीं होने चाहिए। विस्फोट की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा न करें...यह रक्षा मंत्रालय और सेना की अपील है। अब सरकार को इस बारे में गम्भीरता से कदम उठाने की जरूरत है। आज पाकिस्तान और आतंकी संगठन मीडिया का प्रिय विषय हैं, क्या ये अच्छा नहीं है कि पड़ोसी देश के गदहे दिखाने की जगह हम उन किसानों और उन लोगों को दिखाएं जो जमीन पर अच्छा काम कर रहे हैं। मीडिया को संवेदनशील होने की जरूरत है क्योंकि कोई टीआरपी देश की सुरक्षा से बड़ी नहीं हो सकती है।
यह वक्त दुःख का नहीं है, क्रोध का मगर इस क्रोध को बरकरार रखते हुए भी हमें एक होकर तमाम धार्मिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक मतभेदों से ऊपर उठकर साथ खड़ा होना होगा। इस देश पर, देश की सेना पर भरोसा रखिए और उन सबका बहिष्कार करिए जो इस मौके का इस्तेमाल राजनीति के लिए कर रहे हैं....हम जरूर जीतेंगे...कश्मीर हमारा था, है और रहेगा...जरूरत इस बात की है कि अब इसे भारत का हिस्सा मौखिक तौर पर नहीं, बल्कि समान कानून लागू करके बनाया जाए। हम जरूर जीतेंगे...तय है।

बुधवार, 16 जनवरी 2019

झड़ गए सब पीले पात.


सुषमा कनुप्रिया

चले जाओ, अब यहाँ दोबारा कदम मत रखना....वह गिरते - गिरते बचे...चेहरे पर मायूसी थी...हसरत से उस आलीशान इमारत को देख रहे थे...जिसकी नींव उन्होंने खुद तैयार की थी...उनके लिए यह सिर्फ इमारत नहीं थी...एक तपस्या थी...यहाँ टिके रहने के लिए उन्होंने अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया था...सब कुछ छोड़ दिया था...घर...परिवार..रिश्ते...नाते....दोस्त...सालों तक अकेले रह गये और वह भी बगैर किसी शिकायत के...यह सिर्फ मकान नहीं था....पूरी जिन्दगी थी उनकी...। अक्सर लोग ताना मारते '....अरे...ये तो अंतिम साँस भी इसी मकान में लेने वाले हैं...दफ्तर थोड़ी न है...घर है इनका....।' ठाकुर साब के लिए यह भी उनका इनाम था...उनको इस उलाहने पर भी नाज होता....वह बड़े नाज से इस मकान को देखा करते थे...यह मकान जो शहर के बीचों - बीच खड़ा था...अब यहाँ सब कुछ बदला जा रहा था...कमरे...दीवारों के रंग...कारपेट और हाँ, लोग भी....ठाकुर साब आज उसी बदलाव की चपेट में थे जिसकी वकालत वे जिन्दगी भर करते रहे।
'अरे....हम तो कहते हैं कि आपको तो पहले ही रिटायर हो जाना चाहिए था...नये बच्चों को मौका दीजिए...लेकिन नहीं....पकड़े रहेंगे...कुर्सी...अरे क्या कुर्सी लिए श्मशान तक जाएंगे..?.' पान चबाते हुए ठाकुर साब के मुँह से जब भी ये उद्गार फूटते...लोग समझ जाते...कि दफ्तर के पेड़ से आज फिर कोई पुराना पत्ता झड़ने वाला है....ठाकुर साब को पुरानी चीजें पसन्द नहीं थीं...उम्र तो 55 की थी मगर हाव - भाव और बालों के रंग तक भी इस कदर सहेजते रहे कि उमर 35 को पार न कर सके। जिसने भी गलती से एक बार भी बुढ़ापे का एहसास कराया....समझ लीजिए कि वह ठाकुर साब के राडार पर आ गया....वह झल्लाकर पहले तो किसी बहाने बेचारे की मिट्टी पलीद कर देते.....और फिर कहते....'ठाकुर कभी बूढ़े नहीं होते....समझ लीजिए, हम आज भी रोज 500 दंड बैठक कर सकते हैं...दिल से जवान हैं हम...।' इसके बाद उनका पूरा सप्ताह अपनी तोंद को छुपाने के लिए पेट सीधे करने में बीतता.....कुछ दिन तक तो टी -शर्ट और जीन्स छोड़कर कुछ और पहनते तक नहीं थे...जीन्स और वह भी लो वेस्ट...आखिर एक दिन सेठ जी ने टोक दिया....ठाकुर साब प्रोफेशनल नहीं लगता....बस उस दिन से उन्होंने प्रोफेशनल बनने की तैयारी भी कर ली थी।
पूरे दफ्तर पर उनका राज था....सेठ जी भी बगैर उनकी परमिशन के कोई कदम नहीं उठाते थे...सब जानते थे कि सेठ जी तक पहुँचना हो तो ठाकुर साब को खुश रखो...और इसके लिए वे किसी भी हद तक जाकर उनको खुश रखते...दफ्तर में रिटायरमेंट के करीब आ पहुँचे... चौधरी जी की उम्र भले ही 70 पार हो मगर वे ठाकुर साब को भइया कहकर ही पुकारते और पुकारते समय आवाज में इतनी चीनी घोल देते कि सामने वाले को डायबिटिज होने का खतरा था। चौधरी जी के बाल धूप में सफेद नहीं हुए थे...वे हवा का रुख देखकर बात करते...जिस कर्मचारी को ठाकुर साब पसन्द करते...चौधरी जी भी उसे तेल लगाने का कोई मौका नहीं छोड़ते और जिस कर्मचारी के बारे में भनक लग जाती कि वह ठाकुर साब के निशाने पर है.....उसकी खोट एक - एक करके चींटियों की तरह बताते कि चीटियाँ भी सोच में पड़ जातीं....जाहिर सी बात है कि चौधरी जी और ठाकुर साब की अच्छी बनने लगी थी....बात ऐसी नहीं थी कि चौधरी जी को ठाकुर साब से प्रेम था....बल्कि वह भी जान रहे थे कि वह भी सूखों पत्तों की तरह हो गए हैं...और ठाकुर साब उनके लिए मजबूत तना भर थे...।
कुल मिलाकर पूरा दफ्तर भारतीय लोकतंत्र पार्टी में तब्दील हो चुका था और ठाकुर साब यहाँ के प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष, दोनों थे...सेठ जी की भूमिका राष्ट्रपति भर की तरह ही थी...जो अनुशंसा न आने तक न तो कुछ देखते थे, न सुनते थे....मगर कभी - कभार लगता कि बोलना जरूरी है तो अपने अस्तित्व का एहसास दिलाने के लिए बोला करते थे। सेठ जी देखते और सुनते भी उतना ही थे...जितना ठाकुर साब दिखाया करते थे...सेठ जी को ताकत, सत्ता और लोकप्रियता, तीनों की जरूरत थी और ठाकुर साब उनके लिए वह चाबी थे...जो इन तीनों का ताला खोल सकते थे...।
नतीजा यह हुआ कि दफ्तर में बस वही लोग रह गये जो कि दुम हिला भर सकते या फिर गाँधी जी के तीन बन्दरों की तरह तमाशा देखते...विरोध और प्रतिरोध करना तो दफ्तर की संस्कृति से खत्म ही हो गया था...अब तो दफ्तर की सीढ़ियों पर चढ़ने के लिए ठाकुर साब की इजाजत चाहिए थी...। एक बार झड़ा हुआ पत्ता गलती से राह भटककर दफ्तर रूपी पेड़ में झडने की कगार पर पहुँचा और ठाकुर साब ने उसे पटककर गिरवा दिया....तब से किसी पत्ते की हिम्मत न हुई कि वह मुँह भी खोले। बाहर का मौसम भले ही कुदरत तय करती हो मगर अन्दर का तापमान तो ठाकुर साब का मिजाज ही तय करता था। ठाकुर साब अपनी इस प्रतिभा को जानते थे और उनका ख्वाब इस देश का प्रधानमंत्री भर था...राजनीति में औपचारिक तौर पर उनकी इन्ट्री भले न हुई हो मगर ये काम तो वे पिछले 30 साल से करते ही आ रहे थे।
दफ्तर में उनकी नियुक्ति हुई तो लिपिक के तौर पर थी...मगर सीखने की क्षमता और मेहनत के साथ...तिल का ताड़ बनाने की कला उनको दफ्तर में शिखर पर लायी थी...उनको देखकर उनके वरिष्ठ और वयोवृद्ध सहयोगी कुढ़ते...कई तो पीठ -पीछे गालियाँ भी देते मगर ठाकुर साब के सामने जाने पर ऐसे रंग बदलते कि गिरगिट भी शर्मा जाए...ठाकुर साब की एक खासियत थी कि जिस पर दिल आ जाए...उस पर जान छिड़कते...उसके लिए पलक - पाँवड़े बिछाया करते...उसका सामान ढोया करते मगर तभी तक जब तक कि वह शख्स उनकी जी हुजूरी करता रहे...उनका स्नेह और प्रेम तभी तक सलामत रहता जब तक उनकी कुर्सी को कोई खतरा न हो...।
ठाकुर साब के जमाने से ही महिलाओं की नियुक्ति दफ्तर में होने लगी थी....अगर आपको लगता है कि ठाकुर साब महिलाओं को सशक्त बनाने में विश्वास रखते थे...तो असल कारण भी जान लीजिए..कारण यह था कि महिलाएं वेतन को लेकर ज्यादा....तोल - मोल नहीं करती थीं....दूसरे जबान नहीं खोलती थीं...खोलती भी तो इसलिए चाय - पानी पूछने....या किसी सफर से ठाकुर साब की पसन्द की कोई चीज या लंच परोसने के लिए। दफ्तर खूबसूरत चेहरों से भरा रहता था और बाहर से आने वाले लोग ठाकुर साब को महिला सशक्तीकरण का पुरोधा मान बैठते...। एक - दो बार इन्टरव्यू भी दे चुके थे और महिलाओं की नियुक्ति के पीछे उनकी वफादारी और निष्ठा के कसीदे काढ़ चुके थे। अब ये अलग बात है कि किसी पत्रकार ने ये नहीं पूछा कि दफ्तर में अनुभवी लोग क्यों काम नहीं करते.....6 महीने में ही उनके विभाग के दर्जन भर कर्मचारियों ने उनका साथ क्यों छोड़ दिया था, छोड़ते जा रहे थे।
तो हम बता रहे थे कि महिला कर्मी कान की कच्ची थीं..हर सुबह नियमित तौर पर पूरे विभाग के कर्मियों का रोजनामचा रखतीं....शिकायतें करतीं....और विशेष होने का तमगाा प्राप्त कर लेतीं। हालांकि यह पद भी अवधि विशेष के लिए था और कई महिलाएं इस पद की शोभा बढ़ाने के बाद दाल में मक्खी की तरह फेंकी जा चुकी थीं मगर कोई खास असर अब तक नहीं पड़ा था। ठाकुर साब की गालियों को मिश्री समझकर पचा लिया करती थीं। लड़कों के साथ ऐसा कुछ मुमकिन नहीं था...वे समझदार थे...और उनकी सियासत का हिस्सा नहीं बने थे...गए भी साथ गए और साथ काम करते भी रहे मगर लड़कियों के मामले में ठाकुर साब को सफलता हासिल थी....कुछ सनकी लड़कियों ने चीजों को बदलने की कोशिश की...कई साल उनको धता बताकर टिकी रहीं पर अन्ततः उनको भी जाना पड़ा।
दफ्तर में कभी कर्मियों के हित के लिए सोसायटी हुआ करती थी मगर निजी स्वार्थों में वह भी खत्म हो गयी थी। नतीजा यह था कि कर्मियों के हक के लिए लड़ने वाला अंतिम सहारा भी खत्म हो गया था। एक बार छंटनी हुई थी तो दफ्तर में नारे लगे थे....ठाकुर साब भी जाते....और घड़ी पर नजर रखते....जैसे ही सेठ जी के आने का समय होता....चुपके से अपनी कुर्सी पर बैठ जाते और काली पट्टियाँ ड्रॉअर में चली जातीं। उन्होंने बाकायदा दूसरे कर्मियों को निकलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी और विश्वस्त बनते चले गये।
दफ्तर में विभाग के अन्य लोग सब कुछ देखते और खामोश रहते...सहानुभूति के नाम पर समझौते की सलाह देते....ठंडी सांस भरते और शायद अपनी बारी आने का इन्तजार करते रहे। वफादारी और गुलामी के बीच जो रेखा है....वह बहुत महीन है.... कई बार लोग गुलामी को वफादारी समझकर अपना विवेक, आत्मा सब गिरवी रख देते हैं...पलायन और हीनता है...दफ्तर में दशकों से यह चला आ रहा है। सबका दम घुटता था मगर कोई आवाज नहीं उठती थी....एक बार वरिष्ठ मुनीम को भी धक्के देकर निकाला गया था और तब भी सब चुप रहे थे....कहते हैं कि कम्पनी को खड़ा करने में उन मुनीम जी की बड़ी भूमिका रही थी....उन्होंने कातरता से अपने उन सभी साथियों को देखा था कि कोई उनके लिए खड़ा हो....पर सभी पत्थर बने रहे। ऐसे बहुत से कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाया गया था जो गलती से भी किसी और कम्पनी के दफ्तर में देख लिए गए। यहाँ तक कि अपने पुराने साथियों से मिलने की इजाजत भी नहीं थी...।
दफ्तर के बाहर किसी को बोलने की आजादी नहीं थी..। हुआ यह था कि...अपनी पूरी जिन्दगी एक कम्पनी को देने वाले एक वयोवृद्ध मुनीम जी......अपनी पुरानी टेक पर, आत्मसम्मान की जिद पर अड़े रहते थे...जाहिर था कि ठाकुर साब उनको फूटी आँख से भी देखना पसन्द न करते थे....बहाने की तलाश में थे...। इन पुराने मुनीम साब के अधीन काम करने वाला कर्मचारी भी प्रमोशन की राह देख रहा था तो एक दूसरी कम्पनी में काम कर रहे एक दूसरे कर्मचारी की नजर इस पद पर थी....दोनों के हित मिल रहे थे और राह का काँटा भी एक था...बस, मौका भी मिल गया.....।
उस बुजर्ग मुनीम की दिल से इज्जत करने वाला एक शख्स दूसरी कम्पनी में था....उसने एक रिपोर्टर से बात की और इन पर पूरा आलेख एक राष्ट्रीय पत्रिका में छपवा दिया...होता तो यह कि कम्पनी...उन बुजुर्ग के योगदान को सराहती जिनकी वजह से इनकी कम्पनी को पहचान गए थे....दूर - दूर से बधाइयाँ आ रही थीं....मगर उलटबाँसी बोलकर कोई चीज होती है.....ठाकुर साब समेत कई कर्मियों को यह तरक्की रास न आई। इन सबने सेठ जी को यह समझा दिया कि इस लेख में मुनीम ने अपनी जय जयकार करवा दी है और दूसरी कम्पनी से मिले हैं.....नतीजा यह हुआ कि बुर्जुग मुनीम जी को ठाकुर साब समेत अन्य कर्मियों की मेहरबानी से उस मकान से बाहर किया गया....जिसकी बुनियाद गढ़ने में उनकी पूरी मेहनत थी.....और पाठकों.....जैसा कि हमने बताया....यहाँ मौन व्रतधारी थे....जिनमें न तो आत्मा बची थी और न ही रीढ़ की हड्डी....वे अब भी तमाशा देखते रहे......किसी ने आवाज न उठायी....सबको अपनी नौकरी बचानी थी.....वे बुजुर्ग नम आँखों में दिल में आह लिए.....चले गए.....बस....कई बार पुरानी तस्वीरों को देखकर दिल भर लेते थे।
10 साल बाद.....वक्त भी पलटता है
मकान बदलता है तो वक्त भी बदलता है...इस कम्पनी का प्रबन्धन भी बदला...पुराने तरीके काम न आए....ठाकुर साब को खड़ा करने वाले लोग....उनके लिए आँसू बहाने वाले लोग कब के उनकी जिन्दगी से जा चुके हैं.....आज बदलाव की आँधी में ठाकुर साब खुद सूखे पत्ते की तरह झड़ चुके हैं....सेठ जी की नयी पीढ़ी ने कम्पनी के साथ मकान भी बेच दिया है और ठाकुर साब को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया....उमर हो चुकी है....ठीक से चला भी नहीं जाता.....। कहते हैं कि ईश्वर के घर में देर है, अन्धेर नहीं है....उसकी लाठी में आवाज नहीं होती....पर वह न्याय जरूर करता है।
जिस मकान में ठाकुर साब की मर्जी के बगैर एक पत्ता तक न हिलता था...आज उसी मकान से उनको धक्के देकर निकाला गया है। उन्होंने जब सुरक्षाकर्मी को नसीहत दी कि वह बुजुर्गों का लिहाज करना सीखे.....उनकी कहानियाँ सुन चुके उस कर्मी ने पलटकर कह दिया.....आपने सीखा था....? .इतनों की हाय ली है....जब बोया पेड़ बबूल का........ठाकुर साब के सारे हथियार खत्म हो चुके हैं....शरीर भला किसका हमेशा जवान रहा है.....ठाकुर साब अशक्त हो चुके हैं....रोज आते हैं.....उस मकान को देखते हैं.....जो कभी उनका था....जो उनकी जिन्दगी हुआ करता था....अब जब अकेले होते हैं...कलेजे में हूक सी उठती है, आवाज आती है. वह सब चेहरे दिखते हैं जिनको वह सूखा पीला पत्ता बताकर बाहर करते आ रहे हैं। आईने के सामने ठाकुर साब खुद को एक पीले पत्ते में तब्दील होते देखते हैं...घबराकर खुद को देखते हैं..वही हैं...सब तो ठीक है..मगर आईने के सामने ऐसा लग रहा है कि वह वह पत्ता बन चुके हैं....पीला पत्ता....सूखा पत्ता। आवाज आती है....बोया पेड़ बबूल का....तो आम कहाँ से होय।

शनिवार, 22 सितंबर 2018

समय की धूल में इतिहास को लपेटे मालदा का गौड़

बच्चों द्वारा आयोजित मालदा बाल फिल्म महोत्सव


मालदा बहुत विकसित जिला नहीं है। संरचना की कमी से परेशान इस जिले में विकास की जरूरत है। लोग मालदा को आम के लिए जानते हैं मगर पयर्टन के मानचित्र पर मालदा बहुत कम दिखता है। क्या पता इसकी वजह यह हो सकती है कि इस इलाके में अनुसन्धान की जरूरत जितनी थी, उतनी हुई नहीं है। ग्रामांचलों में जो संस्कृति छिपी है, उस पर ध्यान नहीं दिया गया और जो स्थल पर्यटन का केन्द्र बन सकते थे, वे राजनीति मतभेदों और वोटबैंक की राजनीति की भेंट चढ़ गये।
अगर मालदा को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखना है तो आपको गौड़ जाना चाहिए। दूसरी बाल फिल्म महोत्सव की कवरेज करने जब 22 अगस्त को मालदा पहुँचे तो हमें भी यह मौका मिला। होटल वही था मगर इस बार यात्रा ट्रेन से हुई। प्रकृति को अपनी आँखों में भरते, फरक्का की गर्जना सुनते हम रात को होटल पहुँचे थे।
शम्पा अब बड़ी हो गयी और कॉलेज जाती है

यह देखकर अच्छा लगा कि 2 साल पहले जिन बच्चों को स्कूल में देखा था, वह आज कॉलेज में जा चुके हैं। अपना बाल विवाह रोकने वाली शम्पा अब कॉलेज में पढ़ती है।
कवरेज के बाद दूसरे दिन हमने गौड़ देखा जहाँ मिथक मानकर उपेक्षित छोड़ा गया इतिहास भी है, मुगलकालीन भव्यता के अवशेष भी हैं। चैतन्य महाप्रभु का विश्वास और उनके चरण चिन्ह भी आज तक हैं यहाँ तो इस बार यात्रा गौड़ की और उतना ही जितना देखा या देख सके।
 गौड़ को ऐतिहासिक इमारतों के कारण प्रसिद्धि प्राप्त है जो एक जमाने में बंगाल की राजधानी कहा जाता था।
सबसे पहले हम पहुँचे रामकेलि गाँव। यहाँ है 500 साल पुराना मदन मोहन मंदिर। मंदिर के पुजारी के मुताबिक यहाँ श्रीराम 4 दिन ठहरे थे और सीता ने पिंडदान यहीं किया था।
आज भी महिलायें यहाँ बिहार से पिंडदान करने आती हैं। सीता का कुंड और रामायण का वटवृक्ष होने की मान्यता भी है। रामकेलि गाँव की प्रसिद्धि यहाँ स्थित मदन मोहन जिउ मंदिर के लिए है। जिस स्थान पर यह मंदिर है, वहाँ वृन्दावन की तरफ जा रहे श्री चैतन्य देव ने विश्राम किया था। आज भी एक पत्थर पर उनके चरण चिह्न हैं। इसके साथ ही कदम्ब और तमाल के वृक्ष हैं जिसके पास यह मंदिर बनाया गया है मगर रामकेलि की ख्याति का एक और कारण है जिसके बारे में बात कम होती है।
पीछे जो मंदिर हैं, वहीं सुरक्षित हैं चरण चिह्न

500 साल पुराने इस मंदिर के पुजारी पूर्णचन्द्र पाणिग्रही ने बताया कि रामकेलि वह स्थान भी है जहाँ श्रीराम चार दिन के लिए रुके थे। रामकेलि वह स्थान भी है जहाँ स्थित एक कुंड में सीता ने पिंडदान किया था। सनातन धर्म में महिलाओं को पिंडदान की अनुमति नहीं है मगर इस स्थान पर आज भी बिहार से महिलाएँ पिंडदान करने आती हैं। इस दौरान एक मेला लगता है और आम तौर पर यह ज्येष्ठ, श्रावण और आषाढ़ में लगता है। यहाँ फिरोज मीनार के पास जहाँ यह कुंड है, वहीं पर एक बरगद का वृक्ष भी है। दावा किया जाता है कि यह वृक्ष भी काफी पुराना है। पंडित पाणिग्रही के मुताबिक महाप्रभु चैतन्य देव 15 जून 1515 को रामकेलि आये थे और रूप सनातन से उनकी भेंट भी इसी स्थान पर हुई थी।
पीछे पुजारी पूर्णचन्द्र पाणिग्रही। कहते हैं कि इस जगह पर श्रीराम चार दिन रुके और यहीं पर चैतन्य महाप्रभु ने विश्राम किया था
वह बताते हैं कि इस स्थान का उल्लेख रामकेलि पंजिका में भी किया गया है। विगत 62 साल से इस मंदिर को सेवायें दे रहे पाणिग्रही के मुताबिक इस स्थान को संरक्षण की जितनी जरूरत है, वह संरक्षण नहीं मिल रहा और न ही पुनरुद्धार के लिए सरकारें तत्पर दिखायी देती हैं।
 मंदिर बड़े कष्ट से चलता है। रामायणकालीन होना और श्रीराम या सीता से इस स्थान का सम्बन्ध होना एक शोध और फिलहाल विश्‍वास का विषय हो सकता है  मगर धर्म और पर्यटन, दोनों ही दृष्टियों से रामकेलि गाँव का अपना महत्व है। मंदिर के पास स्थित कुंड की हालत भी सही नहीं है।
यहाँ पर राज्य के मंत्री कृष्णेंदु नारायण चौधरी आये थे। मंदिर के 500 साल पूरे होने पर जो समारोह आयोजित हुआ था, उस दौरान यहाँ पर स्थित महाप्रभु चैतन्य देव की प्रतिमा स्थापित हुई जिसका अनावरण उन्होंने किया था। राम के नाम पर राजनीति करने वाले और राम से जुड़े शब्द किताबों से मिटाने वाले राम के नाम पर रामकेलि को नहीं जानते। यहाँ सोचने वाली बात यह है कि अगर चैतन्य प्रभु के कारण ही इस गाँव की प्रसिद्धि है तो उनके नाम पर इस गाँव का नाम क्यों नहीं पड़ा?
क्या सत्ताधारी पार्टी को यह डर है कि अगर राम के नाम पर इस जगह को विकसित किया गया तो विरोधी पार्टी इसका लाभ उठायेगी या फिर उन पर साम्प्रदायिक कार्ड खेलने का ठप्पा लगेगा। क्या वोटबैंक के चक्कर में हम अपने ऐतिहासिक और पौराणिक स्थलों को उपेक्षित रखेंगे? क्या आपकी समझ में नहीं आता कि पर्यटन और इतिहास की दृष्टि को ध्यान में रखकर भी काम किये जा सकते हैं। बहरहाल पुरात्व विभाग इस दिशा में काम कर रहा है। सम्भव है कि सीता और राम को लेकर असहमतियाँ हों मगर पौराणिक, धार्मिक और पर्यटन की दृष्टि से रामकेलि का अपना स्थान है, इस बात से हम इनकार नहीं कर सकते और इसका संरक्षण बेहद आवश्यक है।
बड़ा सोना मस्जिद के भीतर का दृश्य

12 दुआरी मस्जिद को भी संरक्षण की जरूरत है। यहाँ के पत्थरों में काई जमती जा रही है। सुल्तान नसरत शाह ने यह मस्जिद 1526 में बनवायी थी। इसे बड़ा सोना मस्जिद भी कहते हैं। 12 दरवाजे हैं। एक गुम्बद टूट चुका है। यहाँ पर महिलाओं के लिए दीर्घा भी हुआ करती थी। अन्दर भव्य मस्जिद है और बाहर बिलखता भविष्य, जिसकी देह पर कपड़े तक नहीं हैं। जो बोर्ड है, उस पर जंग लग चुकी है।
दाखिल दरवाजा

सलामी दरवाजा दाखिल दरवाजा के नाम से भी जाना जाता है। यह गौड़ के किले का उत्तरी प्रवेश द्वार कहा जाता है। यह 1425 में बनवाया गया। इसे बरबक शाह ने बनवाया था और इसी दरवाजे से तोपों की सलामी दी जाती थी। दाखिल दरवाजा टेराकोटा और छोटे लाल ईंटों से बना एक विशाल प्रवेश द्वार है। यह राजसी संरचना 34.5 मीटर चौड़ीऔर 21 मीटर ऊंची है।
फिरोज मीनार

फिरोज मीनार का निर्माणकाल 1486 से 1489 तक का माना जाता है। इसमें 73 सीढ़ियाँ हैं। इसका निर्माण सैफुद्दीन फिरोज ने करवाया था जो एक हब्शी था और बरबक शाह की हत्या कर सुल्तान बना था। यह मीनार 26 मीटर ऊंची है और दाखिल दरवाजा के दक्षिणपूर्व दिशा में है। यह एक स्वतंत्र संरचना है जो इस स्थान पर बिना किसी सहायक इमारत के खड़ी है। मीनार की ऊपरी दो पंक्तियों का आकार गोलाकार है, जबकि निचले वाले बहुभुज आकार के हैं। कुछ अनुमानों के मुताबिक इसका निर्माण मस्जिद के लिए एक मीनार के रूप में किया गया था। इसे विजय स्मारक भी कहा जाता है। यह भी कहा जाता है कि इसका शीर्ष प्रारंभ में समतल था और यहां एक गुंबद भी बना हुआ था।
मान्यता है कि यही वह कुंड है जहाँ सीता ने पिंड दान किया था। इस पर भी शोध की जरूरत है, दावे के साथ कुछ भी कहा नहीं जा सकता

इसी के सामने वह कुंड भी बताया जाता है जहाँ मान्यता है कि सीता ने पिंडदान किया था। इसके साथ ही एक बेहद पुराना वटवृक्ष आज भी देखा जा सकता है। बहरहाल, यह शोध और विश्वास का मामला है।
कहते हैं कि यह वटवृक्ष रामायणकालीन है। बहरहाल वास्तविकता तो पुरात्व विभाग ही बता सकता है पर बताये तो

फतेहखान का मकबरा 1658 से 1707 के बीच का है। यह औरंगजेब के सेनापति दिलावर खान के बेटे फतेह खान का मकबरा है।
फतेह खान के मकबरे के भीतर का दृश्य

फतेह खान को पीर नियामतुल्लाह की हत्या के लिए भेजा गया था क्योंकि उन्होनें सुल्तान शुजा को विद्रोह का परामर्श दिया था। कहा जाता है कि गौड़ में कदम रखते ही फतेह खान को खून की उल्टियाँ होने लगीं और उसने वहीं दम तोड़ दिया।

चीका मस्जिद 1450 में बनायी गयी थी। इस मस्जिद को बनाने में एक हिन्दू मंदिर के पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। विश्वास किया जाता है कि यह कोई हिन्दू समाधि हुआ करती होगी। इसे सुल्तान हुसैन द्वारा जेल की तरह इस्तेमाल किया जाता था। कदम रसूल मस्जिद भी पास ही है। उसे ठीक से देखा तो नहीं इस स्थल से एक किवदंती भी जुड़ी है, माना जाता है कि जब भी मुहम्मद चट्टान पर चलते थे तो उनके पदचिह्नों के निशान छूट जाता करते थे। इन निशानों के आसपास कई पवित्र स्थलों का निर्माण करवाया गया था। एक ऐसा ही स्थल है कदम रसूल मस्जिद।


वक्त कम था तो यहाँ से गये हम भारत - बांग्लादेश की सीमा, महाद्वीपपुर। बाकायदा अनुमति लेकर सामने बने छोटे टीले पर चढ़े। इस रास्ते पर खड़े ट्रक कई दिन और कई बार एक महीने तक इस इन्तजार में खड़े रहते हैं। हमने लोगों को एक लकीर से बँटते देखा, सीमा पर तैनात जवानो को मुस्तैद देखा और जय हिन्द कहकर वापस लौटे।


शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

गंगा की लहरें, मायूस चेहरे. विकास की बाट जोहते काकद्वीप से मुलाकात



रविवार छुट्टी का दिन होता है मगर 15 जुलाई का दिन मेरे लिए छूट्टी का दिन नहीं था। वह दिन मैंने काम करके खुशी से बिताया और कारण था कि घूमने का मौका मिला था मुझे। हम काकद्वीप जा रहे थे जहाँ एक विद्यालय में वृक्षारोपण का कार्यक्रम क्रेडाई द्वारा आयोजित किया गया था। जो पत्रकार साथ गये थे, उसमें मैं भी शामिल हो गयी थी।  हम बस से जाने वाले थे। रविवार को सुबह 9 बजे प्रेस क्लब की जगह पार्क सर्कस स्थित क्रेडाई के कार्यालय पहुँचना था। समय पर पहुँचने के लिए मुझे टैक्सी लेनी पड़ी। अच्छी बात यह थी कि टैक्सी ने समय से पहले ही मुझे सही जगह पर पहुँचा दिया। यह पूरे कार्यक्रम की जिम्मेदारी कैंडिड पी आर एजेन्सी के कन्धों पर थी। मैं सुबह 8.30 बजे ही जिन्दल टावर पहुँच गयी थी। वहाँ पत्रकार रह चुकी पल्लवी से मुलाकात हुई।

कुछ दिनों के लिए ही सही, हम साथ काम कर चुके थे तो एक जाना - पहचाना चेहरा साथ होना अच्छी बात थी।
बस 9.05 बजे रवाना हुई और डी.एल खान रोड होते हुए सुन्दरवन की ओर चल पड़ी। 21 जुलाई को सत्ताधारी पार्टी की विख्यात शहीद रैली थी और पूरा इलाका ममता बनर्जी के पोस्टरों और बैनरों से पटा था। उस दिन लगातार बारिश हो रही थी।

10.15 बजे हमारी बस आमतला के रास्ते से गुजर रही थी। यह दक्षिण 24 परगना के विष्णुपुर का इलाका था। बीच में हम रुके और तेज बारिश में भीगते हुए हल्का नाश्ता किया। इस दौरान कच्ची सड़कों और गड्ढों से खूब सामना हुआ।

खैर, 12 बजे तक हम काकद्वीप पहुँच चुके थे। सिंचाई विभाग के बंगले में हम पत्रकारों के लिए लंच की व्यवस्था की गयी थी। हम बहुत थक चुके थे और भूख भी काफी लग गयी थी तो हम सब लंच पर टूट पड़े। मुझे जो चीज बहुत भाई. वह गुड़ की बनी मलाई करी थी जो बहुत कुछ रसमलाई जैसी ही होती है। दरअसल, यह रास्ता गंगासागर की ओर जाता है तो नदी भी हमें दिखायी जाने वाली थी। कई बार लगता कि बस बकखाली होकर जाती तो हम समुद्र भी देख लेते एक बार मगर हम सब यहाँ ड्यूटी पर थे तो थोड़ा सा इच्छाओं पर नियन्त्रण तो लाजिमी था।

2 बजे हम गंगासागर के विशाल तट के सामने थे। ऐसा लग रहा था कि आसमान और नदी, एक दूसरे से मिलने के लिए व्याकुल हैं। आसमान नदी पर झुका हुआ था। अद्भुत दृश्य था। पूरे इलाके में हरियाली थी तो गरीबी और मरियल जानवर भी थे। गंगासागर के पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित होने के कारण यहाँ पर आपको नदी तट के आस - पास यात्री निवासी और एक बेहद खूबसूरत यात्री निवास दिखेगा। कच्चे और मिट्टी के घरों के बीच खड़े पक्के मकान यहाँ लक्जरी से कम नहीं लगते। बंगाल के ग्रांमीण इलाकों में आपको संगमरमर के तुलसी पूजा के पात्र दिखेंगे।

3 बजे हम उस विद्यालय में पहुँचे जहाँ नारियल के पौधे क्रेडाई द्वारा ग्रामीणों को दिये जाने थे। पूरा पण्डाल ग्रामीणों से खचाखच भरा था, तिल रखने की भी जगह नहीं थाी मगर लोग समझदार हैं..वह सब समझते हैं। गाँव फोटों खिंचवाने की सबसे अच्छी जगह है। मुझे थोड़ा अजीब लगा क्योंकि जहाँ ये सारा कार्यक्रम चल रहा था, जहाँ वृक्षारोपण हो रहा था, नेता और मन्त्री जुटे थे, वह स्कूल प्रांगण में स्थित बच्चों के खेलने की जगह थी...उनकी मायूसी मुझे साफ दिख रही थी। यहाँ की बच्चियों ने अद्भूत कार्यक्रम किया और इस नृत्य की रिकॉर्डिंग मैंने अपराजिता के यू ट्यूब चैनल के लिए कर ली।
नेता मानें या न मानें पर ग्रामीण इस नाटक को बखूबी समझते हैं। इसके बावजूद उनकी आर्थिक हालत इस नाटक में शामिल होने पर मजबूर करती है। वृक्षारोपण के दौरान एक बुजुर्ग ने मुझसे पूछा - एक आबार कोखुन आशबे (ये लोग फिर कब आयेंगे), जवाब भी उसके पास था...5 बछर पोरे...मैं इस तंज पर अपनी हँसी न रोक सकी। ये भी एक तरह का विद्रोह है मगर दंतहीन विद्रोह है। कार्यक्रम के बाद वापस गाड़ी तक जाने में बड़ी मुश्किल हुई। कार्यक्रम में फोटू खिंचवाकर तो मंत्री महोदय चल दिये थे मगर उनके जाने के बाद जबरदस्त अफरा -तफरी मची थी। सब नारियल का पौधा पाने के लिए टूट पड़े थे। किसी तरह मैं गाड़ी के पास पहुँची।


शाम 4 बजे हम यहाँ से कोलकाता के लिए रवाना हो चुके थे। रास्ते में जाम से सामना हुआ और पैलान का भव्य मंदिर भी देखा। वापस पार्क सर्कस तो जाना था नहीं, घंटों के सफर के बाद मैं बेहला के पास उतरी। सीधी बस तो मिलनी मुश्किल थी तो धर्मतल्ला उतरी और लगभग 10 बजे तक वापस घर आ गयी। ये सफर बहुत छोटा भले हो मगर ग्रामीण अंचलों की वास्तविकता के साथ कई नाटकों से परिचय करवा दिया। साथ ही एक बार बकखाली जाने की इच्छा भी प्रबल हो गयी...देखें...तब तक के लिए अगले सफर का इन्तजार करें।

बुधवार, 29 अगस्त 2018

संघ कट्टर है तो उतने ही कट्टर और एकांगी आप भी हैं...



विरोध की अन्धी राजनीति के शिकार जब हम हो जाते हैं तो अच्छा और बुरा कुछ नहीं दिखता। हम सिर्फ बुराइयाँ देखते हैं और उसे नीचा दिखाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। भारतीय राजनीति इन दिनों इसी दौर से गुजर रही है जहाँ न सामन्जस्य दिखता है, न सौहार्द और न शिष्टाचार। काँग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी नाराज हैं कि भीमा कोरेगाँव मामले में 5 वरिष्ठ वामपंथी सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी हुई। किसी को अघोषित आपातकाल नजर आ रहा है। इन बुद्धिजीवियों पर मेरा कुछ कहना सही नहीं है इसलिए इन पर कोई टिप्पणी नहीं करूँगी मगर उदारवाद की बात करने वाले कितने उदार हैं, ये उनको अपने अन्दर झाँकना चाहिए। आप साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों की जमात में तभी शामिल हो सकते हैं जब आप मोदी, भाजपा और आरएसएस का विरोध करें...तभी आपको जगह मिलेगी और आपको सुना जाएगा...। सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे लोग और ऐसे समूह भी दिखे जो विचारधारा के विरोध से नीचे गिरकर इस गटर तक पहुँच गये हैं कि अब व्यक्तिगत हमलों पर उतर गये हैं और यह बीमारी दोनों तरफ है...फिर भी आप खुद को उदार और सामन्जस्य करने वाला कहते हैं तो शायद उदार मानसिकता का अर्थ भी खोजना होगा। सांस्कृतिक और सृजनात्मक स्तर पर आपका लेखन भी इसी दिशा में जा रहा है कि आपने अपने आस - पास भी घेरा बना लिया है और उससे बाहर निकल ही नहीं पा रहे हैं...यह बौद्धिकता का अहं भी अहंकार ही है जो किसी और की अच्छाइयों को स्वीकार करने ही नहीं दे रहा है। यह अहंकार ही है कि आपने मान लिया कि भाजपा और आरएसएस या उनकी पार्टी के नेता किसी भी ऊँचे पद या प्रधानमंत्री पद के योग्य ही नहीं हैं और यह उतना ही घटिया और खतरनाक है जितना राहुल गाँधी को पप्पू कहकर प्रधानमंत्री पद की उनकी दावेदारी को सिरे से खारिज कर देना। हाँलाकि निजी तौर पर मैं यही मानती हूँ कि राहुल से बेहतर नेता उनकी पार्टी में हैं मगर कौन नहीं जानता कि गाँधी परिवार का विकल्प बनने वालों के साथ क्या हुआ। क्या माधवराव सिंधिया और राजेश पायलट की अकस्मात हादसों में मौत महज एक संयोग थी, मैं नहीं मानती...ये बात हजम नहीं होती। लालकृष्ण आडवाणी के सम्मान को लेकर चिन्तित हो रही पार्टी को याद आना चाहिए कि उन्होंने पार्टी के पूर्व अध्यक्ष सीताराम केसरी और पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को किस तरह किनारे लगाया था। यहाँ तक कि दिल्ली में उनका अंतिम संस्कार न नहीं होने दिया गया और न ही पार्टी मुख्यालय में उनका शव लाने दिया गया...। ये कौन सा लोकतन्त्र है, अब ये तो राहुल गाँधी समझायेंगे...राजनीति का चारणकाल देखना हो तो वर्तमान कांग्रेस को देखा जा सकता है। राजनेता लड़ते हैं....समझा जा सकता है मगर कला और साहित्य के लोग विचारधारा के विरोध को व्यक्तिगत विरोध तक ले जाते हैं तो दया भी आती है और अफसोस भी होता है। जो सम्मान अटल जी को मोदी सरकार ने दिया...उसका आधा भी आपने अपने नेताओं को नहीं दिया। कौन सा प्रधानमंत्री इस तरह पैदल चला जैसे मोदी अटल जी की अंतिम यात्रा में चले...वैसे दृष्टि आपकी अपनी है, जिस रूप में देखिए।
ये आरएसएस का ही कार्यक्रम है

 वाम पार्टियों ने 40 साल तक पार्टी को सेवा देने वाले सोमनाथ चटर्जी के साथ क्या किया...ये सब जानते हैं...इसमें कौन सा आदर छुपा था? इसे लेकर मैंने किसी बुद्धिजीवी को कभी रोते नहीं देखा....ये कौन सी उदारता है? 1993 में वाममोर्चा की ही सरकार थी जब बाल पकड़कर ममता बनर्जी को धक्के देकर राइटर्स से निकाला गया। 2007 में नन्दीग्राम में 14 किसानों पर गोलियाँ चलीं...तब भी आपकी ही सरकार थी...सिंगुर और नन्दीग्राम में जब हिंसा हुई, तब भी आपकी ही सरकार थी...क्यों नहीं आप इस पर बात करते? सर्वहारा वर्ग के लिए लड़ने और आन्दोलन की बात करने वाले वामपंथियों को याद रखना चाहिए कि खुद उनके राज में उन्होंने क्या किया था। आज केरल में हिंसा हो रही है तो भी अभी आपकी ही सरकार वहाँ पर है...क्यों नहीं बोल फूटते किसी के? अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के नाम पर लानतें भेजने वाले साहित्यकार तब क्यों मौन हो जाते हैं जब तसलीमा नसरीन को वाममोर्चा और तृणमूल, दोनों ही सरकारें बंगाल नहीं आने देतीं। कोई मुझे बताये कि शहीद दिवस पर होने वाले तमाशे को सरकारी समारोह की तरह क्यों मनाया जाता है कि आम आदमी और बच्चे भी कड़ी धूप में चलने को मजबूर होते हैं....। तृणमूल के पास ऐसा कौन सा जादू है कि किसी भाजपा नेता के दौरे के बाद ही उसकी आवभगत करने वाला अगले दिन तृणमूल में शामिल हो जाता है? मीडिया को एक बार नहीं, कई बार दीदी के राज में पीटा गया है...एक किसान को जब सवाल करने पर और एक छात्रा के सवाल करने पर जब माओवादी कहा गया तब आप खामोश क्यों रहे? आप आरएसएस से पूछते हैं कि स्वाधीनता सँग्राम में उनका योगदान क्या था तो आपको यह भी बताना चाहिए कि आपने कौन सी लड़ाई लड़ी। भगत सिंह हों या कोई और क्रान्तिकारी, वे इस देश के थे और इस देश के लिए लड़े थे...किसी खास पार्टी का लेबल चस्पा करना उनका अपमान करना है। फारर्वड ब्लॉक नेताजी के साथ कांग्रेस में हुए बर्ताव को क्यों भूल जाती है। आज के वामपंथी आखिर किस वामपंथ को अपना आधार मानते हैं? क्या वे रूस के उस वामपंथ को फॉलो करते हैं जिसकी नींव मार्क्स और लेनिन के विचारों पर पड़ी थी? लेकिन उस पर तो स्टालिन ने असल इमारत बनाई थी। और उस स्टालिन ने तो वैचारिक विरोधियों को पूरी तरह से साफ करते हुए असहिष्णुता का एक पैमाना गढ़ दिया था। भगत सिंह ऐसे असहिष्णु तो नहीं थे। या फिर आज के वामपंथी चीन के उस वामपंथ को मानते हैं जिसमें ‘साम्यवाद’ और साम्रज्यवाद के सहारे अमीरों और गरीबों के बीच का फासला लगातार बढ़ता जा रहा है। भगत सिंह तो ऐसे भी नहीं थे। आज की कम्यूनिस्ट पार्टियाँ उस आदर्श पर चल भी नहीं रही हैं। खासकर इनके छात्र संगठनों को देखती हूँ तो वह अराजकता का प्रतिरूप ही लगते हैं जिनके लिए आन्दोलन का मतलब ही शिक्षकों का घेराव कर उनकी ब्लैकमेलिंग करना ही है।

अनुशासन शब्द से इनको नफरत है। ये एसएफआई के समर्थक ही थे जिन्होंने एक प्रिंसिपल पर पेट्रोल उड़ेल दिया था और अधिकतर छात्र संगठन यही रास्ता अपना रहे हैं। कांग्रेस का छात्र संगठन तो अध्यक्ष के सामने ही लड़ पड़ता है और टीएमसीपी की गुटबाजी तो जगजाहिर है। इसमें एबीवीपी भी कम नहीं हैं.....राजनीति करने का दूसरा तरीका आग लगाने वाले बयान देना हो गया है। ये कौन सा देशप्रेम है जो आपको कश्मीर में साम्राज्यवाद देखना सिखाता है, सेना को शोषक मानना सिखाता है...सुरक्षा बलों को गालियाँ देना सिखाता है? मानवतावाद का मतलब अपने घर में आग लगाकर दुश्मनों को कमान देना कब से हो गया? ये कौन सी बौद्धिकता है जो आपको परम्परा और इतिहास को खारिज करना सिखाती है? आपने जिस चीन और रूस की परम्परा को कभी आँख से खुद नहीं देखा...उसे आप सत्य मानते हैं मगर आपकी नजर में आपका अपना प्राचीन भारतीय साहित्य, कला, स्थान और यहाँ तक कि आज सेना का अभियान फर्जी है। आप अल्पसंख्यकों में असुरक्षा भरते जा रहे हैं मगर आप तीन तलाक को लेकर कभी नहीं बोलते। दूसरी तरफ तीन तलाक पर रोने वाले वैवााहिक बलात्कार के मुद्दे पर खामोश हैं। आप छोटे बच्चों पर हिंसा को लेकर खामोश हैं। आप गौरी लंकेश और कलबुर्गी को लेकर रोते हैं मगर आपके आस -पास हर रोज पत्रकार मरते हैं तो आप उनके लिए खड़े नहीं होते। आपकी मॉब लिचिंग का विरोध भी सिलेक्टिव है। आप धार्मिक स्थलों और आरक्षण में महिलाओं को स्थान दिलाने की बात पर संसद में हंगामा नहीं करते। टिकटों के मामले में तो हर पार्टी में महिलाओं की भागीदारी न्यूनतम है। आपके लिए विचारधारा का विरोध व्यक्ति विरोध में सिमट गया है और यह आपको अब अप्रासंगिक ही नहीं हास्यास्पद बना रहा है।
आज के वामपंथी आखिर किस वामपंथ को अपना आधार मानते हैं? क्या वे रूस के उस वामपंथ को फॉलो करते हैं जिसकी नींव मार्क्स और लेनिन के विचारों पर पड़ी थी? लेकिन उस पर तो स्टालिन ने असल इमारत बनाई थी। और उस स्टालिन ने तो वैचारिक विरोधियों को पूरी तरह से साफ करते हुए असहिष्णुता का एक पैमाना गढ़ दिया था। भगत सिंह ऐसे असहिष्णु तो नहीं थे। या फिर आज के वामपंथी चीन के उस वामपंथ को मानते हैं जिसमें ‘साम्यवाद’ और साम्रज्यवाद के सहारे अमीरों और गरीबों के बीच का फासला लगातार बढ़ता जा रहा है। भगत सिंह तो ऐसे भी नहीं थे।
बात अगर योगदान की है तो आलोचकों की प्रेरणा से ही मैंने राष्ट्रीय सेवक संघ के बारे में पढ़ा। पसन्द न करने का मतलब पूरी तरह खारिज कर देना हो गया है। क्या विष्णुकान्त शास्त्री, मुरली मनोहर जोशी और सावरकर जैसे नेता इसलिए खारिज किये जाएँगे कि वह संघ से जुड़े हैं? दोनों तरफ के तथाकथित बुद्धिजीवी एक दूसरे के लिए गदहे जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं...आप क्या देकर जा रहे हैं भावी पीढ़ी को...यह सोचने वाली बात है। शर्म की बात यह है कि संसद की कार्रवाई से प्रधानमंत्री के शब्द हटाने पड़ रहे हैं तो विपक्ष का नेता गले लगकर संसद में आँख मारता है।

जब बात विरोध के साथ योगदान की चली तो पूछा गया कि संघ व आरएसएस का योगदान क्या है। मेरे मन में भी जिज्ञासा हुई तो मैंने खोजा और बीबीसी हिन्दी (जी हाँ, वही बीबीसी जो संघ और भाजपा के साथ कट्टर मोदी विरोधी भी है) की वेबसाइट पर यह आलेख मिला जो मैं आपको पढ़वा रही हूँ।
साम्प्रदायिक हिंदूवादी, फ़ासीवादी और इसी तरह के अन्य शब्दों से पुकारे जाने वाले संगठन के तौर पर आलोचना सहते और सुनते हुए भी संघ को कम से कम 7-8 दशक हो चुके हैं। दुनिया में शायद ही किसी संगठन की इतनी आलोचना की गई होगी जितनी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की की गयी है वह भी बिना किसी आधार के लेकिन यही संघ की महानता है कि संघ के ख़िलाफ़ लगा हर आरोप आख़िर में पूरी तरह कपोल-कल्पना और झूठ साबित हुआ है। इसके बावजूद इसमें कोई शक नहीं है कि आज भी कई लोग संघ को इसी नेहरूवादी दृष्टि से देखते हैं। नेहरूवादी सोच इसलिए क्योंकि देश के प्रथम प्रधानमन्त्री श्री जवाहलाल नेहरू संघ के प्रति यही नफरत वाला भाव रखते थे हालांकि ख़ुद नेहरू जी को जीते-जी अपना दृष्टि-दोष ठीक करने का एक दुखद अवसर तब मिल गया था, जब 1962 में देश पर चीन का आक्रमण हुआ था। तब देश के बाहर पंचशील और लोकतंत्र वग़ैरह आदर्शों के मसीहा जवाहरलाल न ख़ुद को संभाल पा रहे थे, न देश की सीमाओं को. लेकिन संघ अपना काम कर रहा था।

आज आपको बताते हैं राष्ट्र के लिए आरएसएस के वो 10 योगदान जो आजादी के नकली ठेकेदार करना तो दूर सोच भी नहीं सकते हैं....

१- कश्मीर सीमा पर निगरानी, विभाजन पीड़ितों को आश्रय
जब 1947 में देश का विभाजन हुआ तो संघ के स्वयंसेवकों ने अक्टूबर 1947 से ही कश्मीर सीमा पर पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों पर बगैर किसी प्रशिक्षण के लगातार नज़र रखी। ये काम न नेहरू-माउंटबेटन सरकार कर रही थी, न महाराजा हरिसिंह सरकार. उसी समय, जब पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों ने कश्मीर की सीमा लांघने की कोशिश की, तो सैनिकों के साथ कई स्वयंसेवकों ने भी अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए लड़ाई में प्राण दिए थे। विभाजन के दंगे भड़कने पर, जब नेहरू सरकार पूरी तरह हैरान-परेशान थी, संघ ने पाकिस्तान से जान बचाकर आए शरणार्थियों के लिए 3000 से ज़्यादा राहत शिविर लगाए थे।
२- 1962 का युद्ध
जब 1962 में भारत चीन का युद्ध हुआ तो सेना की मदद के लिए देश भर से संघ के स्वयंसेवक जिस उत्साह से सीमा पर पहुँचे, उसे पूरे देश ने देखा और सराहा। स्वयंसेवकों ने सरकारी कार्यों में और विशेष रूप से जवानों की मदद में पूरी ताकत लगा दी - सैनिक आवाजाही मार्गों की चौकसी, प्रशासन की मदद, रसद और आपूर्ति में मदद, और यहां तक कि शहीदों के परिवारों की भी चिंता की तथा मदद की। यही कारण था कि जवाहर लाल नेहरू को 1963 में 26 जनवरी की परेड में संघ को शामिल होने का निमंत्रण देना पड़ा। परेड करने वालों को आज भी महीनों तैयारी करनी होती है, लेकिन मात्र दो दिन पहले मिले निमंत्रण पर 3500 स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित हो गए. निमंत्रण दिए जाने की आलोचना होने पर तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्री नेहरू जी ने कहा, "यह दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है, विशेष रूप से 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को आकस्मिक आमंत्रित किया गया।"
३- कश्मीर का विलय
कश्मीर के महाराजा हरि सिंह विलय का फ़ैसला नहीं कर पा रहे थे और उधर कबाइलियों के भेस में पाकिस्तानी सेना सीमा में घुसती जा रही थी तब नेहरू सरकार तो - हम क्या करें वाली मुद्रा में मौन साधकर बैठी थी तब सरदार पटेल ने गुरुजी गोलवलकर से मदद माँगी। गुरुजी श्रीनगर पहुँचे, महाराजा से मिले. इसके बाद महाराजा ने कश्मीर के भारत में विलय पत्र का प्रस्ताव दिल्ली भेज दिया।
४- 1965 के युद्ध में क़ानून-व्यवस्था संभाली
1965 में जब भारत पकिस्तान का युद्ध हुआ तो पाकिस्तान से युद्ध के समय प्रधानमन्त्री श्री लालबहादुर शास्त्री जी को भी संघ याद आया था। शास्त्री जी ने क़ानून-व्यवस्था की स्थिति संभालने में मदद देने और दिल्ली का यातायात नियंत्रण अपने हाथ में लेने का आग्रह किया, ताकि इन कार्यों से मुक्त किए गए पुलिसकर्मियों को सेना की मदद में लगाया जा सके। घायल जवानों के लिए सबसे पहले रक्तदान करने वाले भी संघ के स्वयंसेवक थे। युद्ध के दौरान कश्मीर की हवाईपट्टियों से बर्फ़ हटाने का काम संघ के स्वयंसेवकों ने किया था।
५- गोवा का विलय
1947 में देश तो आजाद हो गया था लेकिन देश के कई हिस्से इस आजादी से अछूते थे तब दादरा, नगर हवेली और गोवा के भारत विलय में संघ ने निर्णायक भूमिका निभाई थी। 21 जुलाई 1954 को दादरा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया, 28 जुलाई को नरोली और फिपारिया मुक्त कराए गए और फिर राजधानी सिलवासा मुक्त कराई गई। संघ के स्वयंसेवकों ने 2 अगस्त 1954 की सुबह पुतर्गाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा फहराया, पूरा दादरा नगर हवेली पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त करा कर भारत सरकार को सौंप दिया। संघ के स्वयंसेवक 1955 से गोवा मुक्ति संग्राम में प्रभावी रूप से शामिल हो चुके थे. गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेप करने से नेहरू के इनकार करने पर जगन्नाथ राव जोशी के नेतृत्व में संघ के कार्यकर्ताओं ने गोवा पहुंच कर आंदोलन शुरू किया, जिसका परिणाम जगन्नाथ राव जोशी सहित संघ के कार्यकर्ताओं को दस वर्ष की सजा सुनाए जाने में निकला. हालत बिगड़ने पर अंततः भारत को सैनिक हस्तक्षेप करना पड़ा और 1961 में गोवा आज़ाद हुआ।
६- आपातकाल
1975 में प्रधानमन्त्री श्री इंदिरा गांधी जी ने जब देश में आपातकाल की घोषणा कर दी तब1975 से 1977 के बीच आपातकाल के ख़िलाफ़ संघर्ष और जनता पार्टी के गठन तक में संघ की भूमिका की याद अब भी कई लोगों के लिए ताज़ा है। सत्याग्रह में हजारों स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी के बाद संघ के कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रह कर आंदोलन चलाना शुरु किया. आपातकाल के खिलाफ पोस्टर सड़कों पर चिपकाना, जनता को सूचनाएं देना और जेलों में बंद विभिन्न राजनीतिक कार्यकर्ताओं -नेताओं के बीच संवाद सूत्र का काम संघ कार्यकर्ताओं ने सम्भाला। जब लगभग सारे ही नेता जेलों में बंद थे, तब सारे दलों का विलय करा कर जनता पार्टी का गठन करवाने की कोशिशें संघ की ही मदद से चल सकी थीं।
७- भारतीय मज़दूर संघ
भारतीय मजदूर संघ आरएसएस की ही शाखा है। 1955 में बना भारतीय मज़दूर संघ शायद विश्व का पहला ऐसा मज़दूर आन्दोलन था, जो विध्वंस के बजाए निर्माण की धारणा पर चलता था। कारखानों में विश्वकर्मा जयंती का चलन भारतीय मज़दूर संघ ने ही शुरू किया था। आज यह विश्व का सबसे बड़ा, शांतिपूर्ण और रचनात्मक मज़दूर संगठन है।
८- ज़मींदारी प्रथा का ख़ात्मा
जहां बड़ी संख्या में ज़मींदार थे उस राजस्थान में ख़ुद सीपीएम को यह कहना पड़ा था कि भैरों सिंह शेखावत राजस्थान में प्रगतिशील शक्तियों के नेता हैं। संघ के स्वयंसेवक दादोसा माननीय श्री भैरों सिंह शेखावत बाद में भारत के उपराष्ट्रपति भी बने तथा आज भी न सिर्फ राजस्थान बल्कि पूरा देश शेखावत साहब को अपना नायक मानता है।


९- शिक्षा के क्षेत्र में संघ
शिक्षा के क्षेत्र में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का योगदान अतुलनीय है. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षा भारती, एकल विद्यालय, स्वदेशी जागरण मंच, विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम आदि संघ के ही स्वयंसेवी संघठन हैं। विद्या भारती आज 20 हजार से ज्यादा स्कूल चलाता है, लगभग दो दर्जन शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेज, डेढ़ दर्जन कॉलेज, 10 से ज्यादा रोजगार एवं प्रशिक्षण संस्थाएं चलाता है। केन्द्र और राज्य सरकारों से मान्यता प्राप्त इन सरस्वती शिशु मंदिरों में लगभग 30 लाख छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं और 1 लाख से अधिक शिक्षक पढ़ाते हैं। संख्या बल से भी बड़ी बात है कि ये संस्थाएं भारतीय संस्कारों को शिक्षा के साथ जोड़े रखती हैं। अकेला सेवा भारती देश भर के दूरदराज़ के और दुर्गम इलाक़ों में सेवा के एक लाख से ज़्यादा काम कर रहा है। लगभग 35 हज़ार एकल विद्यालयों में 10 लाख से ज़्यादा छात्र अपना जीवन संवार रहे हैं। उदाहरण के तौर पर सेवा भारती ने जम्मू कश्मीर से आतंकवाद से अनाथ हुए 57 बच्चों को गोद लिया है।

१०- सेवा कार्य
देश में आयी आपदा के समय भी संघ आगे बढ़कर राष्ट्र निर्माण के कार्य में अपना योगदान दिया है। 1971 में ओडिशा में आए भयंकर चंक्रवात से लेकर भोपाल की गैस त्रासदी तक, 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों से लेकर गुजरात के भूकंप, सुनामी की प्रलय, उत्तराखंड की बाढ़ और कारगिल युद्ध के घायलों की सेवा तक - संघ ने राहत और बचाव का काम हमेशा सबसे आगे होकर किया है। भारत में ही नहीं, नेपाल, श्रीलंका और सुमात्रा तक में संघ ने आपातकालीन स्थितियों में मदद की है..!!
इस सबके बाद भी कांग्रेस पार्टी क्या अन्य सभी आजादी के नकली ठेकेदारों को संघ को गाली देने का, संघ को आतंकी बोलने का, संघ की आलोचना करने का पूर्ण अधिकार है, लेकिन संघ की जितनी ज्यादा आलोचना हुई है, संघ उतना ही ज्यादा मजबूत हुआ है तथा देश के नवनिर्माण में अपनी भूमिका निभाई है. यही कारण है कि संघ आज दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संघठन है तथा अनवरत हिन्दुस्तान तथा हिन्दुस्तान की गौरवशाली संस्कृति को संजोकर रखते हुए भारतमाता को पुनः विश्वगुरु की पदवी पर विराजमान कराने के लिए प्रयत्नशील है।
बीबीसी पर प्रकाशित आलेख का लिंक यह रहा https://www.bbc.com/hindi/india-44393179

खुद राहुल जी के नाना जी संघ की तारीफ करते हैं और राहुल जी सीधे मुस्लिम ब्रदरहुड से इसे जोड़ देते हैं। संघ के अनुशासन का लोहा तो सब मानते हैं मगर क्या वह अनुशासन आज किसी और राजनीतिक दल में है। अगर वैचारिक कट्टरता और हिन्दूत्व के कारण ही आप संघियों की बुराई करते हैं तो तुष्टिकरण की राजनीति कर आप भी इसी राह पर चल रहे हैं...आपने मुस्लिम समुदाय की जड़ता का विरोध नहीं किया...वहाँ मौलवियों के शोषण से परेशान महिलाओं का साथ कभी नहीं दिया....तो आप भी उसी राह के हिमायती साबित हो रहे हैं जिनके विरोध में आप कसीदे गढ़ते हैं। धर्मनिरपेक्षता का मतलब सर्व धर्म, सम भाव होता है न कि किसी एक समुदाय,मत अथवा धर्म को उसके बहुसंख्यकप्रिय होने की सजा देना...हिन्दू होना अगर गर्व की बात नहीं है तो ऐसा कोई कारण नहीं है कि इस पर शर्म की जाए....सोच तो आप बदल नहीं सकते....एक झूठे अहंकार और बौद्धिकतावाद से ग्रस्त होना ही अगर पैठ बनाना और सामूहिकता का अंग है तो हम तो दूर ही अच्छे हैं...क्योंकि मुझे भारतीय, भारतीयता और उसकी हर बात से प्यार है...। धन्यवाद पत्थर फेंकने के लिए और फेंकिए...इमारत तो गढ़कर रहेंगे..जय हिन्द।

(सभी तस्वीरें - साभार )

सोमवार, 20 अगस्त 2018

खौफनाक गुजरा अगस्त 2018, ‘अजातशत्रु’ अटल संग गये सोमनाथ व करुणानिधि


सुषमा त्रिपाठी

सोमनाथ चटर्जी और लालकृष्ण आडवाड़ी के साथ

क्या खोया, क्या पाया जग में
मिलते और बिछुड़ते मग में
मुझे किसी से नहीं शिकायत
यद्यपि छला गया पग-पग में
एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें!

ये अगस्त खौफनाक गुजरा....और अगस्त का यह सप्ताह भारतीय राजनीति का युगान्त साबित हुआ। देश ने एक के बाद, एक नहीं तीन दिग्गज नेताओं को खोया। गत 7 अगस्त को पहले करुणानिधि और फिर गत 13 अगस्त को पूर्व लोकसभाध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी गये। देश इस सदमे से उबर भी नहीं पाया कि स्वतन्त्रता दिवस के अगले दिन गत 16 अगस्त को ही युगपुरुष अटल बिहारी वाजपेयी ने भी इस भौतिक जगत से नाता तोड़ लिया। हम शोक सन्तप्त हैं, निःशब्द हैं और रह - रहकर इतिहास अपने पन्ने पलट रहा है। हम भी पीछे मुड़कर देख रहे हैं...वह मैत्रीभाव...जिस पर न पार्टी की राजनीति हावी हो सकी और न विचारधाराओं की विभिन्नता बल्कि वहाँ तो नजर आती है परस्पर आदर की भावना..। भाजपा के वरिष्ठ नेता वाजपेयी पहली बार 1996 में 13 दिनों के लिए, 1998 में 13 महीने और फिर 1999 से 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। वाजपेयी 1991, 1996, 1998, 1999 और 2004 में लखनऊ से लोकसभा सांसद रहे हैं। वाजपेयी बतौर प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा करने वाले पहले और अब तक के एकमात्र गैर-कांग्रेसी नेता रहे हैं। केन्द्र में मोदी सरकार के आने के बाद वाजपेयी को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया।
अगर सोमनाथ चटर्जी की बात करें तो उनकी उदारता, उनकी विद्वता हमेशा याद की जाती रहेगी। सोमनाथ चटर्जी ने अपनी ही पार्टी में अपनी उपेक्षा अंत समय तक सही मगर अटल जी को उनकी पार्टी से सदैव सम्मान मिला। सम्मान की पराकाष्ठा इसके अधिक क्या होगी कि उनकी अंतिम यात्रा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उनके पीछे पैदल चले...दरअसल, यह प्रधानमंत्री का सौजन्य और अपने गुरु के प्रति आदर तो है मगर इससे भी अधिक वाजपेयी जी का उदात्त, उदार और विराट व्यक्तित्व है जिसने उनको ‘अजातशत्रु’ बना दिया। इस अजातशत्रु के सामने देश नतमस्तक है जिसने राजनीति को सौजन्य का शिखर दिया...जिनकी गर्जना ने पाकिस्तान को दहला दिया। वे ‘एक नहीं, दो नहीं करो बीसों समझौते’ कविता में दहाड़ते हैं - ‘धमकी, जेहाद के नारों से, हथियारों से/कश्मीर कभी हथिया लोगे, यह मत समझो/हमलों से, अत्याचारों से, संहारों से/भारत का भाल झुका लोगे, यह मत समझो।’ 


पूर्व लोकसभाध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी और वाजपेयी जी के सम्बन्ध बड़े गहरे थे। सोमनाथ चटर्जी वामपन्थी विचारधारा के थे लेकिन विपरीत धुरी कहलाने वाली भाजपा नेता व पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से उनके बेहतर सम्बन्ध थे, तभी तो एक बार 2002 में पद से इस्तीफा देने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने उनका हाथ पकड़कर इस्तीफा न देने की गुजारिश की थी। वहीं 2008 में सोमनाथ चटर्जी लोकसभा में अपना प्रोटोकॉल को तोड़ते हुए अटल बिहारी वाजपेयी के आने पर अपनी कुर्सी से खड़े हो गए। आज की सियासत में असमान विचारधाराओं के नेताओं के बीच न तो ऐसा सौजन्य दिखता है और न ही ऐसी मैत्री दिखती है। दोनों नेताओं के साथ संयोग था कि दोनों 10 बार सांसद रहे और दोनों 1984 के चुनाव में हारे भी। आपातकाल के दौरान जब सोमनाथ चटर्जी ने अपना पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए विदेश मंत्रालय में जमा कराया तो उन्हें पासपोर्ट वापस नहीं किया गया। इस पर चटर्जी ने विदेश जाने के लिए पश्‍चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्घार्थशंकर राय से कई बार गुहार लगाई लेकिन बात नहीं बनी। 1977 में सत्ता परिवर्तन के बाद जब वाजपेयी विदेश मंत्री बने तो सोमनाथ चटर्जी ने उन्हें आपबीती बतायी। इस पर विदेश मंत्रालय का अधिकारी उसी शाम को सोमनाथ चटर्जी के घर पर पासपोर्ट लेकर पहुँच गया। इन दोनों नेताओं की मित्रता का एक और प्रसंग आता है। 2002 के गोधराकांड पर 2005 में लोकसभा में जमकर हंगामा हुआ। तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने गोधरा कांड के लिए संघ को जिम्मेदार ठहराया। इस पर वाजपेयी कुछ बोलना चाहते थे लेकिन लालू बार-बार उन्हें टोक रहे थे। इससे नाराज चटर्जी ने कहा कि वाजपेयी के भाषण के बीच में टोका-टोकी न की जाए।  अटल जी की दृढ़ता देखिए कि वे गुजरात के तत्कालीन सीएम और अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को उनका राजधर्म याद दिलाने से नहीं चूके।
बहुत कम लोग जानते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने पिता के साथ कानून की पढ़ाई की थी। उन्होंने कानपुर के डीएवी कॉलेज से कानून में डिग्री की इच्छा अपने पिता से जताई थी, जिसके बाद उनके पिता ने भी अपने बेटे के साथ कानून की डिग्री के लिए दाखिला लिया। यहाँ तक कि कानून के छात्र के रूप में पिता-पुत्र एक साथ एक सत्र के दौरान एक ही हॉस्टल के एक कमरे में रहे। वाजपेयी जी की निष्पक्षता और उनका दृढ़ संकल्प पोखरण विस्फोट के बाद लगी आर्थिक पाबंदियों के बीच उनके अडिग रवैये से मिलता है। 11 और 13 मई 1998 को पोखरण में पाँच भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट करके अटल बिहारी वाजपेयी जी ने भारत को परमाणु शक्ति सम्पन्न देश घोषित कर दिया। इन तमाम आर्थिक प्रतिबन्धों से उबरकर विरासत में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक आर्थिक रूप से सुदृढ़ भारत ही दिया। पोखरण के बाद जब भारत को प्रतिबंधित करने की कोशिशें हुई तब भी चट्टान बने रहे। उन्हों खुद ही लिखा भी-‘दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते/ टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते।’

महाकवि नीरज और अटल जी 
कवि नीरज

यह बरबस नही बल्कि बड़ी शिद्दत से एक नाम उभरता है पंडित गोपालदास नीरज का। इस महाकवि और अटल विहारी वाजपेयी की कुंडली के सभी ग्रह एक ही जैसे रहे हैं। सिर्फ चन्द्रमा का अंतर रहा है। नीरज जी इस को लेकर कई बार चर्चा किया करते थे। यह इत्तफाक ही है कि नीरज जी ने भी अपनी अनन्त की यात्रा अभी अभी हाल ही में गत 19 जुलाई को शुरू की है। कुछ ही दिन बीते हैं। आज अटल जी उसी अनन्त यात्रा पर निकल पड़े। ये दोनों ही ऐसे यात्री हैं जिनकी संवेदना और रचना शक्ति बराबर की कही जाती रही। राजनीति में होकर भी अटल जी और नीरज जी ने एक साथ मंचों पर कविताएं पढ़ीं और खूब फाकामस्ती भी की। दोनों के संघर्ष के दिन एक जैसे रहे लेकिन जब समय आया तो दोनों की स्वरलहरी लालकिले से भी गूँजी।
अगर बात करुणानिधि की करें तो सोमनाथ चटर्जी जैसा सम्बन्ध वाजपेयी जी का करुणानिधि से नहीं है। वैसे करुणानिधि का मूल्यांकन करते समय उनके सारे पक्षों को देखना होगा। हालांकि राष्ट्रीय राजनीति से सम्पर्क होने के साथ उनका आक्रामक तमिलवाद कम से कम सार्वजनिक स्तर पर मद्धिम पड़ा। राजीव गाँधी सरकार के खिलाफ अभियान चलाने के भी वे सहभागी बने। 1989 में वी पी सिंह सरकार गठित कराने में उनकी मुख्य भूमिका थी। यहां से उनकी राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका आंरभ हुई और इसका असर उन पर अवश्य हुआ। 1996 की संयुक्त मोर्चा सरकार में द्रमुक के नेता मंत्री बने। फिर 1999 में जयललिता की अटलबिहारी वाजपेयी सरकार से समर्थन वापसी के बाद हुए चुनाव में उन्होंने भाजपा की मदद की तथा राजग सरकार में उनके सांसद मंत्री बने। अगर करुणानिधि की राजनीतिक विचारधारा को देखें तो इसे बहुत बड़ा बदलाव कहा जा सकता है। द्रमुक एक ऐसी पार्टी के नेतृत्व में सरकार में शामिल हुई जो उसकी विचारधारा के हमेशा विरुद्ध रही। जनसंघ से लेकर भाजपा न केवल हिंदुत्व के विचारों पर आधारित थी, बल्कि आर्य -द्रविड़ बँटवारे का हमेशा विरोध करती रही और हिन्दी को राजभाषा बनाने की समर्थक भी थी। इसे आप बदलाव कहिए या केन्द्रीय सत्ता में आने का अवसरवाद मगर इसे वाजपेयी जी के राजनीतिक कौशल के रूप में देखा जा सकता है कि गठबन्धन सरकार को उन्होंने 13 दिन और 13 माह की विफलता के बाद तीसरी बार पूरी तरह चलाया। 
करुणानिधि के साथ अटल जी


हालाँकि बाद में भाजपा से करुणानिधि का मतभेद हुआ एवं यूपीए के गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। 2014 तक सरकार में रहते हुए उनका आक्रामक तमिलवाद का स्वर कभी देखने को नहीं मिला। 
बच्चों की तरह मनमौजी, खाने - पाने के शौकीन रात को 2 बजे भी चिउडा और ठंडई के लिए पहुँच जाते थे। ग्वालियर के फालका बाजार स्थित नमकीन व्यवसायी सुन्नूलाल गुप्ता ‘बेडर’ की दुकान पर वे स्पेशल चिवड़ा खाने आते थे। सुन्नूलाल बताते हैं कि ‘एक बार अटलजी विदेश मंत्री रहते हुए चुनावी सभा के सिलसिले में ग्वालियर आए थे। उनके लिए चिउडा (नमकीन) तैयार करना था। चूंकि अटलजी की सारी सभाएं देर से चल रही थीं, इसलिए मैंने सोचा कि शायद आज वह ग्वालियर नहीं आएंगे और मैं दुकान बंद करके छत पर सो गया। इसी बीच, रात के 2 बजे पुलिस की गाड़ियाँ सायरन बजाती हुईं मेरी दुकान के आगे आकर रुक गयीं। जब मैं नीचे उतरा तो उन्हीं गाड़ियों के बीच एक कार में से केन्द्रीय मंत्री अटलजी उतरे और बोले- ‘मैं हूँ अटल बिहारी, चिवड़ा तैयार है ?’ अटलजी को देखकर मेरे शरीर में स्फूर्ति आ गई और मैं झट से तैयार होकर दुकान के नीचे पहुँच गया। तत्काल स्पेशल मेवों का चिवड़ा तैयार कर उन्हें दे दिया। उन्होंने मुझे मूल्य से ज्यादा पैसे दिए। ऐसा कभी नहीं हुआ कि अटल जी ने ज्यादा पैसे नहीं दिए हों।’ अटलजी जब भी मथुरा आते तो वहाँ चौक बाजार के मूँग की दाल के पकौड़े जरूर खाते। चाइनीज और फिल्मों के शौकीन तो सोमनाथ चटर्जी को आजीवन फुटबॉल से लगाव रहा। जाने कितने किस्से, जाने कितनी यादें छोड़ गयी यह त्रयी। समय गुजरेगा, इतिहास करवट लेगा मगर  एक खालीपन और एक रीतापन हमेशा रहेगा। खुद वाजपेयी जी के शब्दों में -सूर्य तो फिर भी उगेगा/ धूप तो फिर भी खिलेगी/ लेकिन मेरी बगीची की/ हरी-हरी दूब पर/ ओस की बूँद/हर मौसम में नहीं मिलेगी। फिर भी काल के कपाल पर लिखने वाले अटल जी एक उम्मीद हैं, एक प्रेरणा हैं मगर मौत भला स्मृतियों से कैसे जीत सकती है। यादें हैं और विश्‍वास है क्योंकि बकौल अटल जी - 
मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, 
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल का नहीं।

(सलाम दुनिया में 19 अगस्त को प्रकाशित आलेख)

गुरुवार, 2 अगस्त 2018

दैवीय भाव से मुंशी जी को देख रहे हैं तो अन्य साहित्यकारों से अन्याय कर रहे हैं आप



मुंशी प्रेमचन्द हिन्दी साहित्य के प्राण पुरुष माने जाते हैं और जब उनको लेकर कुछ भी लिखा जाता है तो एक भक्ति भाव उस लेखन में समाहित होता है। हम सकारात्मक बातों को खींच - खींचकर लिखते हैं मगर उनके विरोध में जाने वाली हर बात को नजरअन्दाज करते हैं जिसके कारण उस अलौकिक छवि को आघात पहुँचे या फिर उन स्थापित मान्यताओं को चोट पहुँचे जिसका पालन हम करते आ रहे हैं। जहाँ तक मेरी समझ है, वह यही कहती है कि इस तरीके से आप चारण काव्य लिख सकते हैं मगर उसे इतिहास या आलोचना नहीं कहा जा सकता। जिन लेखकों और नायकों को हमने भगवान बना लिया है, हम उनकी खामियों को लगातार नजरअन्दाज करते हैं और उन्हीं खामियों को जब दूसरे लेखकों में या दूसरे नायकों में देखते हैं तो बाल की खाल निकालकर उनको दोयम दर्जे का ठहरा देते हैं। यह निष्पक्षता तो नहीं है अपितु अन्याय जरूर है और एक बड़ा कारण है कि आज हिन्दी, बांग्ला और अँग्रेजी साहित्य विकल्पहीनता से जूझता हुआ सिमटता जा रहा है क्योंकि कोई और नाम हमें याद आता ही नहीं है। कोई भी चरित नायक या लेखक शत - प्रतिशत खरा नहीं होता। कमल किशोर गोयनका प्रेमचन्द के बड़े अध्येता माने जाते हैं मगर जब उन्होंने प्रेमचन्द की निरपेक्ष दृष्टि से देखने का प्रयास किया तो आपने उनकी भी आलोचना कर डाली...अब क्या यह हिप्पोक्रेसी नहीं है?
मेरी समझ में लेखन का आदर्श वहाँ हैं जहाँ लेखक के जीवन और साहित्य में एकरूपता हो। प्रेमचन्द साहित्य में जितने भी ऊँचे मापदण्ड बनाते हैं, वह भी एकतरफा हैं और पुरुषों को भी वे छूट लेने देते हैं। आप कर्मभूमि के अमरकान्त का चरित्र लीजिए। प्रेमचन्द अपने नायकों को यह छूट देते हैं कि स्त्री से अनबन हो तो उनका किसी और स्त्री से प्रेम होना स्वाभाविक है...इतनी ही नहीं वे यह बातें स्त्री पात्रों से कहलाते भी हैं। सुखदा के अलावा सलीमा और कुछ हद तक मुन्नी कर्मभूमि में ऐसे ही चरित्र हैं।
पता नहीं, क्यों ऐसा लगता है कि ऐसा करके वह छूट अपने लिए ले रहे हैं। सब जानते हैं कि प्रेमचन्द का पहला विवाह 15 वर्ष की उम्र में हो गया था और बाद में विच्छेद भी हो गया। उसका कारण यह है कि वह बदसूरत थीं और झगड़े करती थीं...क्या यह दो वजहें मुंशी जी की नजर में किसी स्त्री को इतने अधिकार देती हैं कि वह किसी पुरुष को छोड़े? उनकी नायिकायें किसी कमजोर नायक को भी नहीं छोड़तीं। इतना ही नहीं, वे अपना मूल चरित्र त्यागकर झुक भी जाती हैं। सुखदा और मालती का चरित्र इस बात उदाहरण है कि मुंशी को सशक्त स्त्रियाँ भाती नहीं थीं और शहरी स्त्री तो उनकी नजर में तितली है..गोदान की मालती को उन्होंने यही नाम दिया है। उनकी सारी उम्मीदें स्त्रियों से हैं और इस बहाने उन्होंने पुरुषों के लिए भरपूर छूट ली है...अब मेरी नजर में तो यह दोहरापन है, आपकी नजर में भले ही युगीन आदर्श हो क्योंकि महाकवि निराला जैसे व्यक्ति भी उसी युग में थे जिन्होंने सरोज स्मृति जैसी कविता दी...यह पहली कविता थी जिसमें बेटी को केन्द्र में रखा गया है मगर आप प्रेमचन्द की तरह निराला को याद नहीं करते क्योंकि वह आपकी पितृसत्तात्मक संरचना में फिट नहीं बैठते। प्रेमचन्द घर में प्रेमचन्द की दूसरी पत्नी शिवरानी देवी यह मसला उठाती हैं।
प्रेमचन्द यहाँ उसी सामन्ती पुरूषवादी मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते प्रतीत होते हैं, जो सिद्धान्त रूप में तो स्त्री को देवी का दर्जा देती है, परन्तु व्यवहार में एक भोग्या से ज्यादा नहीं समझती। प्रेमचन्द के मेहता की निगाह में स्त्री के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण मूल्य हैं त्याग, सेवा और समर्पण। इन मूल्यों से विचलित होकर यदि उसने पुरूष की बराबरी की आकांक्षा में घर की चौखट लांघने का प्रत्यन किया तो वह कुलटा हो जायेगी। मेहता के लिए आदर्श नारी का रोल मॉडल गोविन्दी है, जो पति के तमाम अत्याचारों और उसकी रंगीन तबीयत को सहन करते हुए भी उसकी होकर रहती है। यही कारण है कि प्रेमचन्द के हाथों एक स्वतन्त्रचेता आधुनिक सोच वाली युवती मालती का रूपान्तरण घटनाओं की तार्किक परिणति के कारण न होकर लेखक के पूर्वग्रही विचारों के कारण होता है। मेहता की नजर में स्त्री का काम घर गृहस्थी और बच्चे सम्भालना है, तभी वह देवी कहलाने की पात्र है। देवी के इस आसन से उतरकर स्त्री ने जैसे ही पुरूष के कन्धे से कन्धा मिलाकर चलने की कोशिश की, तो वह देवी के सिंहासन से च्युत होकर कुलटा बन जाती है। इसी मानसिकता के कारण मेहता सरोज के प्रेम के उपरान्त विवाह करने के विचार को गलत ठहराता है। प्रेम स्त्री को स्वतन्त्र निर्णय और चयन का अधिकार देता है। प्रेमचन्द की परम्परावादी नारीदृष्टि स्त्री को प्रेम का अधिकार कैसे दे सकती थी?

स्त्रियों की शिक्षा का विरोध मध्यकालीन सामन्ती परिवेश में देखा जा सकता है, लेकिन आश्चर्यजनक यह है कि नवजागृति की सांस लेते और आधुनिकता की पहली सीढ़ी पर पैर रखते भारतीय समाज में प्रेमचन्द ऐसे विचारों को प्रतिष्ठित कर रहे थे। प्रेमचन्द के मेहता भी स्त्रियों को पुरूषों के समान शिक्षा देना उचित नहीं समझते और उनके लिए घरदारी और शिशु पालन को ही महत्वूपर्ण शिक्षा मानते है। इनके साथ-साथ सेवा, ध्यान और समर्पण जैसे ‘स्त्रियोचित’ मूल्य तो हैं ही। ग्रामकथा में जहां प्रेमचन्द कथा का स्वाभाविक प्रवाह होने देते है, वहाँ धनिया जैसी स्त्रियों में चुटकी भर स्वातन्त्र्य चेतना दिख भी जाती है, लेकिन नगर कथा में, जहां कथा प्रवाह का पूरा नियंत्रण लेखक के हाथों में है, मालती जैसी स्वतन्त्रचेता स्त्री को प्रेमचन्द गोविन्दी जैसी सेवा, त्याग और समर्पण जैसे मूल्यों से परिपूर्ण स्त्री बनाकर ही दम लेते है। सशक्त स्त्रियाँ मुंशी जी को नहीं भातीं..क्या यह उनकी असुरक्षा नहीं है। इतना ही नहीं, वे शिवरानी देवी को भी हतोत्साहित करते रहे। शिवरानी देवी लिखती हैं - 'एक बार गोरखपुर में डा. एनी बेसेंट की लिखी हुई एक किताब आप लाए. मैंने वह किताब पढ़ने के लिए माँगी. आप बोले - तुम्हारी समझ में नहीं आएगी. मैं बोली - क्यों नहीं आएगी ? मुझे दीजिए तो सही. उसे मैं छः महीने तक पढ़ती रही। रामायण की तरह उसका पाठ करती रही. उसके एक-एक शब्द को मुझे ध्यान में चढ़ा लेना था क्योंकि उन्होंने कहा था कि यह तुम्हारी समझ में नहीं आएगी. मैं उस किताब को खतम कर चुकी तो उनके हाथ में देते हुए बोली - अच्छा, आप इसके बारे में मुझसे पूछिए। मैं इसे पूरा पढ़ गई. आप हँसते हुए बोले - अच्छा !' इतना अविश्वास....? सब जानते हैं कि शिवरानी देवी खुद अच्छी कहानीकार थीं।
 प्रेमचन्द घर में पति की पहली पत्नी के प्रति उनकी सहानुभूति दिखती भी है। प्रेमचंद का पहला विवाह पंद्रह वर्ष की आयु में हुआ था। उस समय वे नौंवी कक्षा में पढ़ते थे। 1904 में उनकी पहली पत्नी का देहांत हो गया। आपके पिता ने केवल १५ साल की आयू में आपका विवाह करा दिया। पत्नी उम्र में आपसे बड़ी और बदसूरत थी। पत्नी की सूरत और उसके जबान ने आपके जले पर नमक का काम किया। आप स्वयं लिखते हैं, "उम्र में वह मुझसे ज्यादा थी। जब मैंने उसकी सूरत देखी तो मेरा खून सूख गया।......." उसके साथ - साथ जबान की भी मीठी न थी। आपने अपनी शादी के फैसले पर पिता के बारे में लिखा है "पिताजी ने जीवन के अन्तिम सालों में एक ठोकर खाई और स्वयं तो गिरे ही, साथ में मुझे भी डुबो दिया: मेरी शादी बिना सोंचे समझे कर डाली।" हालांकि आपके पिताजी को भी बाद में इसका एहसास हुआ और काफी अफसोस किया। रंजना अरगड़े लिखती हैं कि विवाह के नियम स्त्री तथा पुरुषों, दोनों पर समान रूप से लागू किए जाएं तथा पुरुष पत्नी के जीवन काल में दूसरा विवाह न कर पाए। पुरुष की संपत्ति पर पत्नी का पूरा अधिकार हो वह या तो उसे( अपने हिस्से की संपत्ति को) रेहन पर रखे या व्यय करे।
इसमें जो पहली बात है उसका पालन तो प्रेमचन्द जी नहीं कर पाए। पहली पत्नी के होते उन्होंने शिवरानी देवी से विवाह किया था। इस संदर्भ में शिवरानी देवी ने अपनी पुस्तक में दो स्थानों पर उल्लेख किया है। चूंकि किताब में कोई समय-क्रम नहीं है अतः पहले उल्लेख(पृ 7) को बाद वाला एवं बाद वाले उल्लेख( पृ-25,26) को पहले वाला मानना चाहिए। बस्ती, 1914 में शिवरानी देवी ने उस प्रसंग को का उल्लेख किया है जब प्रेमचन्द की पूर्व-पत्नी के भाई उनसे मिलने आते हैं और अपनी बहन के दुखों का बयान करते हैं। यह संवाद शिवरानी देवी सुन लेती हैं। पूछने पर भी प्रेमचन्द बताते नहीं हैं । शिवरानी देवी के बदन का खून गरम हो रहा था (26)। इस मुद्दे पर दोनों में तीखी बहस हो जाती है। शिवरानी देवी लिखती हैं कि वही पहला दिन था जब मुझे मालूम हुआ कि वे अभी ज़िंदा हैं। मुझे तो धोखा दिया जाता रहा कि वे मर गई हैं(26)। शिवरानी देवी जब प्रेमचन्द से इस संदर्भ में जवाब-तलब करती हैं तब प्रेमचन्द का जवाब चौंकाने वाला और कम-से-कम लेखकोचित तो नहीं ही है, (फिर प्रेमचन्द जैसा लेखक) जिसको इन्सान समझे कि जीवित है, वही जीवित है। जिसे समझे मर गया, मर गया(26)। शिवरानी देवी का आग्रह था कि उन्हें भी साथ रहने बुला लिया जाए। प्रेमचन्द के मना करने पर शिवरानी देवी कहती हैं एक आदमी का जीवन मिट्टी में मिलाने का आपको क्या हक़ है । इस पर प्रेमचन्द का जवाब है-हक़ वगैरह की कोई बात नहीं है ।(4) आश्चर्य की बात यह है कि पहली पत्नी को लेकर वे भूले से भी बात नहीं करते और न ही उनके बेटे श्रीपत राय या अमृत राय के यहाँ ऐसा उल्लेख मिलता है। हिन्दी के किसी आलोचक ने भी जरूरत नहीं समझी कि इस अधूरे पक्ष पर बात की जाये और उनकी पहली पत्नी का भी पक्ष जाना जाये।
इसी संदर्भ में जब दूसरी बार बात होती है तब शिवरानी देवी कहती हैं एक की तो मिट्टी पलीद कर दी जिसकी कुरेदन मुझे हमेशा होती है। जिसको हम बुरा समझते हैं वह हमारे ही यहाँ हो और हमारे ही हाथों हो। मैं स्वयं तकलीफ़ सहने को तैयार हूँ, पर स्त्री जाति की तकलीफ़ मैं नहीं सह सकती। मेरे पिता को मालूम होता तो आपके साथ मेरी शादी हर्गिज न करते। फिर आगे वह कहती हैं कि अगर मेरा बस चलता तो मैं सब जगह ढिंढोरा पिटवाती कि कोई भी तुम्हारे साथ शादी न करे। (5)
ये पूरा प्रकरण क्या दर्शाता है? स्त्री के सतीत्व को प्रेमचंद ने भरपूर नहीं बल्कि अतिरिक्त सम्मान दिया है और उसकी पवित्रता पJ प्रश्नचिन्ह उठाने वालों के लिये वो अपने उपन्यास ‘प्रतिज्ञा’ में लिखते हैं “स्त्री हारे दर्जे ही दुराचारिणी होती है, अपने सतीत्व से ज्यादा उसे संसार की किसी वस्तु पर गर्व नहीं होता और न ही वो किसी चीज को इतना मूल्यवान समझती है” मगर पति के कर्तव्यों पर उन्होंने चुप्पी साध रखी है।
“नारी मात्र माता है और इसके उपरान्त वो जो कुछ है वह सब मातृत्व का उपक्रम मात्र। मातृत्व विश्व की सबसे बड़ी साधना, सबसे बड़ी तपस्या, सबसे बड़ा त्याग और सबसे महान् विजय है। मुंशी जी पिता के कर्तव्यों पर क्यों मौन रहे, वही जानें।
प्रेमचन्द नारी शिक्षा को आवश्यक समझते थे। उनका मत था- ‘‘जब तक सब स्त्रियाँ शिक्षित नहीं होंगी और सब कानून-अधिकार उनको बराबर न मिल जायेंगे, तब तक महज बराबर काम करने से भी काम नहीं चलेगा।’’४ अपने उपन्यासों के पात्रों के द्वारा भी उन्होंने इस बात का समर्थन किया है। ‘गबन’ नामक उपन्यास के पात्र पं. इन्द्रभूषण का कहना है- ‘‘जब तक स्त्रियों की शिक्षा का काफी प्रचार न होगा, हमारा कभी उद्धार नहीं होगा।’’५ गोदान का पात्र प्रो. मेहता भी ‘वीमेन्स लीग’ के समारोह में भाषण देते वक्त स्त्री-शिक्षा की आवश्यकता और महत्व का उद्घाटन करता है। मजे की बात यह है कि खुद अपनी बेटी की शिक्षा पर उनका इतना ध्यान नहीं जाता..और तो और वे बाकायदा दहेज देकर बेटी की शादी भी करते हैं...कहाँ रह गया जीवन में आदर्श? दूसरी ओर निराला हैं जिन्होंने अपनी पत्नी मनोहरा देवी और बेटी सरोज को पूरा सम्मान दिया बल्कि समाज का तिरस्कार भी आजीवन सहा। रंजना अरगड़े लिखती हैं कि 'लेकिन यह बात सर्वविदित है कि प्रेमचन्द ने अपनी लड़की की पढ़ाई की तरफ़ बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया था। इसका कोई खुलासा शिवरानी देवी ने नहीं किया है। परन्तु अमृत राय ने अपनी पुस्तक कलम का सिपाही में लिखा है-
मुंशीजी की बेटी के साथ भी यही बात थी। स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई का सुयोग उसे नहीं मिला—या नहीं दिया गया। कुछ रोज़ लखनऊ के महिला विद्यालय में गई मगर फिर वहाँ से भी उसे छुड़ा लिया गया।
आजकल जहाँ अनपढ़ लड़कियों पर उंगलियाँ उठती हैं, चालीस-पैंतालीस साल पहले पढ़ी-लिखी लड़की पर उठा करती थीं। लड़की को पढ़ाना अपने आप में एक क्रांति थी। मुंशीजी भी शायद इस क्रांति के लिए तैयार नहीं थे।(13)


अमृत राय बताते हैं कि प्रेमचन्द की बेटी जब छोटी थी तब वे बस्ती में रहते थे, जो एक छोटी जगह थी। जब बेटी कछ पढ़ने-लिखने लायक हुई तब उनका गोरखपुर का आबदाना छूट गया था। बाद में कहीं भी जमकर उनका रहना नहीं हो सका। फिर लड़की को बाहर भेज कर पढ़ाना संभव न था। (यहाँ इस बात को याद कर लेना चाहिए कि महादेवी जी ने लगभग सत्याग्रह कर के इलाहाबाद जा कर पढ़ने के लिए अपने माता-पिता को राज़ी किया था। ऐसा सब के लिए संभव नहीं होता।)
कुछ इत्मीनान उनको लखनऊ में मिला। पर, अमृत राय लिखते है-बेटों की पढ़ाई, जो अपनी बहन से छोटे थे, वहीं शुरु हुई लेकिन बेटी की पढ़ाई शुरु करने के लिए तब तक ज़्यादा देर हो चुकी थी। आधे मन से कुछ कोशिश ज़रूर हुई, पर आधे मन से। क़िस्सा कोताह वह पढ़ नहीं सकी और चूल्हा पकड़े बैठी रही जो कि घर की सयानी लड़की का काम है। (14) अमृत राय तर्क भी देते हैं कि माँ की बीमारी के कारण भी, हो सकता ही कि उसे स्कूल न भेजा गया हो। बहरहाल, जो कारण रहा हो, यह बेहद अफ़सोस जनक ही कहा जाएगा कि स्त्री-शिक्षा के सघन समर्थक प्रेमचन्द स्वयं अपनी बेटी को न पढ़ा सके हों। ज़माने को लानत भेज कर भी यह बात तो बनी ही रहती है कि उनकी बेटी शिक्षा से वंचित रही।'
अधिकतर लोग समझते हैं कि मुंशी जी आर्थिक अभावों में जीए थे मगर कमल किशोर गोयनका के ये तथ्य आपकी आँख पर से परदा हटाने को काफी है। जरा ध्यान दीजिए। कमल किशोर गोयनका लिखते हैं कि 'अधिकतर लोग समझते हैं कि प्रेमचंद आर्थिक तौर पर कमज़ोर थे लेकिन यह सत्य नहीं है चूंकि उनके निधन उपरांत भी उनके बैंक में पर्याप्त राशि थी। गोयनका कहते है कि "हाँ, मैंने प्रेमचंद के गरीब न होने पर लिखा था। डा. रामविलास शर्मा ने लिखा है कि प्रेमचंद गरीबी में पैदा हुए, गरीबी में जिन्दा रहे और गरीबी में ही मर गये। यह सर्वथा तथ्यों के विपरीत है। "कुछ प्रमाण प्रस्तुत हैं:-
'उनका पहला वेतन 20 रुपये मासिक था वर्ष 1900 में जब 4-5 रुपये में लोग परिवार चलाते थे। उन्होंने लिखा है कि यह वेतन उनकी ऊँची से ऊँची उडान में भी नहीं था।
प्रेमचंद ने फरवरी, 1921 में सरकारी नौकरी से इस्तीफा दिया था। तब उनका वेतन था 150 रुपये मासिक। उस समय सोना लगभग 20 रुपये तोला (लगभग 11.5 ग्राम) था। आप सोचें आज की मुद्रा में कितना रुपया हुआ ?
प्रेमचंद ने अपनी एकमात्र पुत्री कमलादेवी के विवाह में ( 1929 में) लगभग सात हजार रूपये खर्च किये थे। इसकी जानकारी मुझे स्वयं कमलादेवी ने दी थी।
वर्ष 1929 के आसपास लमही गाँव में प्रेमचंद ने 6-7 हजार रुपये लगाकर मकान बनवाया था।
'माधुरी' पत्रिका के सम्पादक बने तो वेतन था 150 रुपये मासिक।
बम्बई की फिल्म कम्पनी में नौकरी की वर्ष 1934-35 में तब वेतन था 800 रुपये मासिक। लौटने पर बेटी के लिए हीरे की लौंग लेकर आये थे। आज की धनराशि में 800 रुपये लगभग 6-7 लाख के बराबर है।
प्रेमचंद के पास दो बीमा पालिसी थीं। उस समय यह बहुत बडी बात थी।
प्रेमचंद ने वर्ष 1936 में रेडियो दिल्ली से दो कहानियों का पाठ किया और उन्हें 100 रुपये पारिश्रमिक मिला। आज उस समय के 100 रुपये लगभग एक लाख के बराबर होंगे।
प्रेमचंद की मृत्यु के 14 दिन पहले उनके दो बैंक खातों में लगभग 4500 रुपये थे।' गोयनका लिखते हैं कि "ये सारे तथ्य उपलब्ध दस्तावेज़ों के आधार पर हैं। उनकी जीवनी से इन तथ्यों को गायब करने का क्या औचित्य था ? प्रगतिशील लेखकों को इससे बडा आघात लगा और वे आज तक मुझे गालियाँ दे रहे हैं पर वे यह नहीं कहते कि ये तथ्य झूठे हैं। वे इन्हें सत्य मानते हैं लेकिन उद्घाटन करने पर गालियाँ देते हैं। इसे ही वे वैज्ञानिक आलोचना कहते हैं । उनकी तकलीफ यह है कि उनकी झूठी स्थापनाओं की कलई खुल गयी है।"कमल किशोर जी द्वारा दिये गये तथ्य भारत दर्शन पर उपलब्ध हैं और कलकत्ता विश्वविद्यालय व साहित्यिकी के सेमिनार में उन्होंने ये बातें दोहरायी थीं और वे प्रेमचन्द जब वेतन की तुलना पूरनमासी के चाँद से करते हैं तो सच मानिए बड़ा अजीब लगता है क्योंकि उस जमाने में उनके पास जो था, बहुतों के पास नहीं था।
तुलना नहीं करते हुए भी  मुझे जयशंकर प्रसाद की छोटा जादूगर, जैनेन्द्र की पाजेब..कहीं से ईदगाह से कम नहीं लगती। रेणु की रसप्रिया तथा तीसरी कसम का अपना शिल्प है...मगर पता नहीं क्यों...आप इस पर बात नहीं करना चाहते। अगर आदर्श की बात की जाए और उपेक्षित पात्रों की बात की जाए तो मैथिली शरण गुप्त मुंशी जी के बहुत पहले इसकी शुरुआत कर चुके थे। उन्होंने उर्मिला और कैकयी जैसे चरित्रों को उठाया जो कि बड़ी बात है मगर आप इनको एक युग का हिस्सा मानकर छोड़ देते हैं। महादेवी वर्मा का गद्य किस मायने में कम है, ये तो आलोचक समझें मगर आप उनको छायावाद में भी सबसे पीछे रखते हैं। आप सुभद्रा कुमारी चौहान पर बात नहीं करते जिन्होंने हमें झाँसी की रानी जैसी कविता दी। हमने ये जो सन्दर्भ हैं..वे महज हिस्सा हैं...बात करेंगे तो दूर तक जायेगी मगर हिन्दी साहित्य और भारतीय इतिहास की चर्चा को आप दूर तक ले जाना चाहते हैं तो आपको किसी भी लेखक को अलौकिक भाव से देखना बन्द करना हो, फिर वह आपके मुंशी जी ही क्यों न हों।
(सन्दर्भ - भारत दर्शन, सीयू में कमल किशोर गोयनका का व्याख्यान तथा लेखिका रंजना अरगड़े के ब्लॉग से...साभार.और बाकी जो मैं सोचती हूँ)