बुधवार, 23 मई 2018

दिल्ली का वह सफर जिसने अपनी सीमाओं को तोड़ना सिखाया


पुराने किले की सीढ़ियों पर
सफर कैसा भी हो बहुत कुछ सिखा जाता है और किसी सफर पर निकलना अपनी सीमाओं को तोड़ने जैसा ही होता है। वैसे काम के सिलसिले में कई बाहर बाहर निकली हूँ मगर हर बार बँधा - बँधाया ढर्रा रहता है और आस - पास लोगों की भीड़। वो जो एडवेंचर कहा जाता है...वह रहता जरूर है मगर कभी अपनी हिचक को तोड़ना मुमकिन नहीं हो सका था मगर इक्तफाक बहुत कुछ बदलता है जिन्दगी भी और सोचने का तरीका भी। विमेन इकोनॉमिक फोरम में जब शगुफ्ता को सम्मानित किए जाने की सूचना मिली तो उसने अपने साथ मेरे जाने की भी व्यवस्था कर दी थी मगर मुझमें हिचक थी।

हसीन इक्तिफाक थे
टिकट को रद्द भी करवाया मगर दिल्ली मुझे बुला रही थी तो इस बीच कविता कोश के मुक्तांगन कार्यक्रम में प्रसिद्ध कवियित्री रश्मि भारद्वाज माध्यम बन गयीं। बेहद स्नेहिल स्वभाव की रश्मि जी सम्बल देना भी जानती हैं। उनके माध्यम से और कवि जयशंकर प्रसाद की प्रेरणा को लेकर लिखे गए आलेख ने अकस्मात दिल्ली यात्रा की भूमिका लिख दी। 2016 में दिल्ली पहली बार गयी थी और देश भर की महिला पत्रकारों के साथ बीते उन लम्हों ने कुछ अच्छे दोस्त भी दिये मगर घूमना न हो पाया था। ये दोनों कार्यक्रम 4-5 दिनों के अंतराल पर थे तो मेरे हाथ में 4 दिन का वक्त था। 2 मई तक तो मैं शगुफ्ता के साथ होटल पर्सना इंटरनेशनल में ठहरने वाली थी मगर इसके बाद...?
सम्मान और प्रमाण पत्र


तैयारी तो शुरू हो गयी
इस सफर की खूबसूरती इस बात में थी कि इस सफर को भी मैंने चुना था और इसके इंतजाम भी खुद किये थे। सिद्धार्थ की मदद से फ्लाइट बुक करवा ली तो अब रहने के लिए जगह देखनी थी। पहले द्वारिका सोचा क्योंकि मुक्तांगन का कार्यक्रम स्थल बिजवासन और हवाई अड्डा दोनों नजदीक थे मगर बाद में पता चला कि वह दिल्ली का न्यूटाउन है इसलिए कोई फायदा नहीं है। मित्र चंचल ने सलाह दी कि चाणक्यपुरी या आर के पुरम जैसे इलाके सही रहेंगे। माधवी (माधवी श्री) दी की सलाह पर यूथ होस्टल में डोरमेटरी और सस्ते कमरे भी देखे मगर वहाँ पहले से बुकिंग सम्भव नहीं थी और डोरमेटरी क्या होती है...मुझे यह भी पता नहीं था। दिल्ली में बंग भवन के बारे में जानती थी मगर कोई खास जानकारी नहीं थी। ऐसी स्थिति में तारणहार मेरे मित्र तथा सलाम दुनिया के सम्पादक संतोष बने और उन्होंने बंग भवन में भगत जी से परिचय करवा दिया और बात बन गयी। आनन - फानन में बुकिंग हो गयी..इत्मिनान मिला।

चलो, हवा से करें चंद बातें

दिल्ली की फ्लाइट 30 अप्रैल को थी...सुबह की। अपने शहर से शिकायतें भले ही कितनी भी हों मगर जब उसे छोड़कर जाना होता है तो मोह बढ़ जाता है और दूसरे शहर में जाकर वह इश्क बन जाता है। सुबह की खाली सड़कें और अँगड़ाई लेता मेरा कोलकाता....। ऊफ...जिन्दगी से भरा...मैं बहुत याद करने वाली थी अपना शहर। हवाई अड्डे पर शगुफ्ता से मुलाकात हुई। हम फ्लाइट में बैठे और हवा से बातें शुरू हो गयीं।

मम्मा मुझे प्लेन उड़ाना है

मेरी आगे सी सीट पर तूफान एक्सप्रेस थी....वह एक छोटी बच्ची थी जिसने यात्रा को अपनी शरारतों और बातों से बोरिंग होने से बचा दिया। मम्मी का हाथ पकड़ती और पूछती --मम्मा, मैं यहाँ क्यों बैठी हूँ, मुझे प्लेन उड़ाना है तो दूसरी ओर जहाज के ऊपर -नीचे करने के क्रम में अपनी माँ का हाथ उसने कसकर पकड़ लिया...3 साल की बच्ची और वह जोर - जोर से माँ का हाथ पकड़े रही....मैं तुम्हारे बगैर कैसे रहूँगी....बच्चे कितना सोचते हैं। हम दिल्ली पहुँचे तो उस बच्ची के साथ तस्वीर भी खिंचवा ली...वह सचमुच बहुत प्यारी थी।


हुमायूँ के मकबरे में

और...वह हुमायूँ में किसी और की तलाश

शगुफ्ता ने मेरी मुलाकात शुशा से करवायी...एक एक आजाद ख्याल...बेबाक और हँसमुख शख्सियत...वह आपको उदास नहीं रहने देगी। उससे मिलकर  हम होटल की ओर जा रहे थे और दिल्ली की कड़ी धूप से घबराए बगैर हमने तय किया कि दो दिन में जितनी जगहें देख सकते हैं...देखेंगे...तो हुमायूँ का मकबरा सामने था। हम दोनों कार से उतर पड़े...कड़ी धूप थी और लोग कम थे...। दिल्ली में लोग शायद धूप में निकलना कम पसन्द करते हैं मगर हमको कब धूप की परवाह थी और मेरी छतरी तो मेरे पास ही थी। टिकट काउंटर पर अव्यवस्था थी। बाद में आने वाले लोग पहले टिकट कटवाकर जा रहे थे। खैर टिकट तो लिया हमने और हम अन्दर गये...महीन पच्चीकारी देखी...मकबरे के ऊपर फानूस या झालर  कभी हुआ करती होगी...अब नहीं है। अफसोस यह है कि लोग घूमने आते हैं...तस्वीरें खिंचवाते हैं मगर इतिहास कुछ कहना चाहता है...वह आवाज कोई नहीं सुनता। मकबरे को और भी अधिक संरक्षण की जरूरत है और उससे भी अधिक कद्र की...। पुरातत्व विभाग अकेले कुछ नहीं कर सकता जब तक कि हम ध्यान न दें।

दिल्ली में तो सूरज भी देर तक रुकता है
साइबा जी के साथ
होटल पहुँचकर....थोड़ा आराम किया...इसके बाद दिल्ली देखने का कार्यक्रम था। इस बीच फेसबुक की मदद से साइबा जी से भी मिलना हो गया और इसके बाद थोड़ा आराम कर हम पहुँचे क्नाट प्लेस मगर ज्यादा घूमना नहीं हो पाया। करोलबाग के फुटपाथ पर लगने वाला बाजार कहीं अधिक बेहतर लगा। इससे भी मजेदार बात यह लगी कि दिल्ली में सूरज लगभग 7 बजे अस्त होता है। शाम के 6.30 बजे कोलकाता भले अन्धेरे में डूब जाए, दिल्ली रोशन रहती है। दिल्ली की लाइफ लाइन मेट्रो है और ऑटो भी, बसें कम चलती हैं तो ऑटो वालों की चाँदी तो है। यहाँ कोलकाता की तरह आप 10 - 20 और 25 रुपये में सफर नहीं कर सकते..यहाँ ऑटो का किराया 30 और 40 से लेकर 150 रुपये तक हो सकता है और अगर आप मोल - भाव करते हैं तो सीधे सुन सकते हैं - बैठना हो तो बैठो वरना उतर जाए...यह हमने भी सुना।

1 मई

होटल की दीवारों पर कबीर से एक मुलाकात
कबीर दिखे

1 मई को द्वारका के ताज में विमेन इकोनॉमिक फोरम का सम्मेलन था। शगुफ्ता को सम्मानित किया गया और मैंने हौसला अफजाई की और साथ ही मैंने होटल की खूबसूरती देखी मगर सबसे अधिक तसल्ली होटल की दीवारों पर कबीर को देखकर मिली। एक दीवार पर कबीर के दोहे बड़ी खूबसूरती से सजाये गये थे। जीवन भर शहंशाहों को दुत्कारने वाले कबीर क्या सोचते होंगे खुद इन निर्जीव दीवारों पर देखकर?   साहित्य भला किसी की सम्पत्ति थोड़े न है...और किसने कहा कि अमीरों के घरों में साहित्य नहीं जा सकता बल्कि कबीर का होना मुझे आश्वस्त कर गया। इसके बाद हम गुरुग्राम पहुँचे जो दिल्ली के एक दूसरे छोर पर ही है और किनारे पर अत्याधुनिक शहर की ऊँची - ऊँची इमारतों को देखते हुए हम आ भी गये। हम शाम को होटल से ही सरोजिनी मार्केट गये...और यहाँ सामान बेचने का अन्दाज भी निराला था चोरी का माल खुले चौराहे में....कोलकाता के ओबेराय के पास इस तरह की आवाजें आप भी सुन सकते हैं। 

ताज द्वारिका में हम

2 मई

जामा मस्जिद और पराठे वाली गली

होटल की गाड़ी जो ली थी .उसके ड्राइवर थे जोगिंदर जी और उनको ही हमने कहा था कि पुरानी दिल्ली में हमें क्या देखना था। दिल्ली में लोग काम से मतलब रखते हैं मगर उनका रवैया आप पर निर्भर करता है। ड्राइवर चचा ने बताया कि आज से 25 साल पहले दिल्ली की आबादी इतनी नहीं थी...। सुबह 11 बजे हम जामा मस्जिद में थे। बगैर पंखे के यहाँ से झरोखों से आ रही ठंडी हवाओं ने हमें भी ताजा कर दिया और मस्जिद से बाहर झाँकने पर दिखता है मीना बाजार....। इसका भी अपना इतिहास है। मस्जिद में शरीर को ढकना अनिवार्य है तो बाहर ही आपको चोगे देने के लिए लोग तैयार मिलेंगे मगर सूर्यास्त के बाद यहाँ महिलाओं को जाने की अनुमति नहीं है...धर्म के नाम पर होने वाला एक और भेदभाव मन खट्टा कर गया।
शगुफ्ता के साथ जामा मस्जिद में

लाल किले से गुजरते हुए

उस जगह पर खड़ा होना जहाँ से देश के प्रधानमंत्री जनता को सम्बोधित करते हों और शान से तिरंगा लहरा रहा हो, एक अजीब सा रोमांच भर देता है। लाल किला जाते समय ही रास्ते में ड्राइवर चाचा ने सावधान किया था और उन्होंने एक रिक्शे वाले से मोल भाव करवाने में भी मदद की। रिक्शे पर बैठते ही पहली नसीहत सामान और बैग सहेजकर रखने की नसीहत मिली। किले के बाहर विशाल प्राचीर को देखते हुए गुजरना एक अद्भुत अनुभव था। बाहर से आने वाले हर व्यक्ति को शायद ऐसा ही महसूस होता होगा मगर दिल्ली वालों के लिए यह आम बात है। किले में बिजले के तार बिछाए जा रहे हैं मगर संरक्षण पर कितना किसका ध्यान जाता है, ये सोचने वाली बात है।
लाल किला परिसर में

 ऐसा नहीं है कि किले पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। दूसरी जगहों की तुलना में इसकी स्थिति बेहतर है मगर बहुत सी चीजें आपको सँग्रहालय से गायब भी मिलेंगी..दीवारों के प्लास्टर उखड़े और भग्न दीवारें तो हर ऐतिहासिक इमारत की परेशानी है। सबसे कड़ी सुरक्षा व्यवस्था लाल किले में ही है और इसकी एक वाजिब वजह भी है। लाल किले से गुजरते हुए आपको दोनों और कलाकृतियों का बाजार मिलेगा...दिल्ली में लाल किेले को डालमिया समूह को देने की चर्चा है और लोग इससे बहुत ज्यादा खुश नहीं हैं। कल्पना कीजिए कि लाल किले पर लिखा नजर आए डालमिया सीमेंट प्रेजेंट्स...पर ये भी कहा जा रहा है कि ऐसा नहीं है क्योंकि कम्पनी सिर्फ रख - रखाव करेगी।

पराठों की खुशबू और स्वाद
जामा मस्जिद के सामने ही लाल किला है और इनके बीच में है शानदार और बेहद खास पराठे वाली गली जहाँ आपके लिए थाली में कम से कम 2 पराठे लेना अनिवार्य है और हमने भी पराठों का लुत्फ जमकर उठाया। दोपहर के 3 बज चुके थे और घूमते - घूमते भूख लग गयी थी तो हमने भी छककर खाया। इस गली में कभी 14 - 15 दुकानें हुआ करती थीं मगर अब 4 दुकानें ही रह गयी हैं। आस - पास जरी या अन्य चीजों की दुकानें हैं मगर आप आते हैं तो खुशबू पराठों के देसी घी की ही खींचती है। यहाँ के बिजेंदर कुमार बताते हैं कि कभी यह दरीबा खुर्दा नामक गाँव हुआ करता था और गली 15वीं से 16वीं सदी की है जो मुगलों ने बसाई थी।
पराठे वाली गली के पराठे

अपने ही लख्ते जिगर से खबरदार ये शहर
पुरानी दिल्ली को लेकर नयी दिल्ली के ख्याल बहुत अच्छे नहीं हैं। एक ही शहर के दो अलहदा चेहरे और हमें मिली हिदायत -पुरानी दिल्ली है, सामान सम्भालकर रखें। यहाँ गरीबी है तो अपराध भी है। आपको हर कदम पर लोग समझाते हैं कि पुरानी दिल्ली में सम्भलकर रहने की जरूरत है...ये हिदायत एक तरफ अपने ही शहर के प्रति सोच का पता देती है तो ख्याल रखने वाले एक दिल का एहसास भी दे जाता है पर यह किला देखने के लिए मुझे 3 दिन देने पड़े तो अगले दो दिनों का किस्सा भी आगे ही आने वाला है।

अपना बंगाल.....अपना बंग भवन
हेली रोड पर स्थित बंग भवन आना अपने घर आने जैसा है। 2 मई शाम 4 बजे मैं बंग भवन पहुँची। अब शगुफ्ता के जाने के बाद इस यात्रा पर अब मुझे खुद निकलना था और खुद ही देखना था। इतिहास से मुझे प्यार है और प्राचीन भारत की हर बात खींचती है। पता नहीं क्यों पहले दिन ही पुराने किले में जाकर अजीब सा खिंचाव महसूस किया और यही खिंचाव था कि इस किले को देखने 3 बार गयी और क्या पता फिर जाऊँ। बंग भवन में मेरा कमरा (जो कि डोरमेटरी था) 701था। थकी थी तो नींद आ गयी और रात को दो दक्षिण भारतीय महिलाओं ने दरवाजा खुलवाया जो बस रात गुजारने के लिए ही पहुँची थी।
हेली रोड स्थित बंग भवन


 इनमें एक हैदराबाद की थी तो दूसरी विजयवाड़ा की। रात को बंग भवन की कैंटीन में लुची व आलूदम खाया। मैंने सरल हिन्दी और थोड़ी अँग्रेजी में बात की से एक महिला हिन्दी समझती थी और मैंने भी हिन्दी में ही बात की मगर उसके साथ जो दूसरी महिला थी...उसने हिन्दी की समझ होते हुए भी जब अँग्रेजी में बात करने को कहा तो मैंने असमर्थता जता दी और बता दिया कि वह हिन्दी नहीं जानतीं तो मेरी अँग्रेजी भी अच्छी नहीं है। इसके बाद वह कुछ नहीं बोलीं और हम खिचड़ी भाषा में ही बात करते रहे। सुबह तक तक हम गप भी मारने लगे थे।

3 मई

दिल्ली के जिगर में हरियाली का टुकड़ा और वैशाली के रास्ते
दिल्ली जाने के बाद मुझे माधवी दी से मिलना था क्योंकि उनसे बगैर मिले दिल्ली का सफर अधूरा रहता है तो उनसे बात की। बंग भवन में भगत जी से मिली और वे परम हँसमुख व्यक्ति हैं। अपने घर से दूर होने पर घर की आहट भी अच्छी लगती है, यही स्थिति हर जगह है। यहाँ लोग अपने दिल में अपना घर बचाकर रखते हैं और घर की याद दिलाने वाला मिल जाए तो बात ही क्या है। बंग भवन के लोगों में भी कुछ ऐसा ही है और बांग्ला में बात करना मेरे लिए और भी अच्छा ही रहा। बंग भवन की व्यवस्था न सिर्फ किफायती है बल्कि बहुत अच्छी है। मुझे यहाँ की चाय बहुत पसन्द आयी। यहाँ के करोलबाग बाजार  में आपको सीबीआई के नाम पर ठगी करने वालों से बचने और महिलाओं का सम्मान करने की सलाह आपको लाउडस्पीकर पर हर दो कदम पर मिलेगी...कोलकाता में अब तक यह नहीं देखा।
माधवी दी के साथ लोदी गार्डेन में

चाय पीकर ही मैं निकली और और माधवी दी से मिलने चल पड़ी। हम चिन्मय मिशन के विशाल प्राँगण में मिले और यहाँ से लोदी गार्डेन चले आए जो बेहद खूबसूरत और विशाल है मगर हालत वही है। कहीं - कहीं गंदगी भी भी दिखी और मकबरों के बीच वक्त को चुराते युवा भी दिखे। माधवी दी ने महिला प्रेस क्लब की चाय पिलायी और नाश्ता भी करवा दिया।   मैं दिल्ली आयी थी और मुझे रश्मि जी से भी मिलना था जो हिन्दी की वरिष्ठ कवियित्री हैं और मुझे दिल्ली तक ले जाने का बड़ा कारण भी उनकी वजह से बना था। माधवी दी से मिलकर उनकी सलाह पर मेट्रो से राजीव चौक आयी और फिर वहाँ से वैशाली की मेट्रो पकड़ी। दिल्ली की मेट्रो में खुद ही टिकट खरीदने की सुविधा है और उससे भी अच्छी बात यह है कि यह हिन्दी में भी उपलब्ध है, सच्ची मन खुश हो गया। मेट्रो से ही दिल्ली दर्शन करके वैशाली उतरी और ऑटो के बाद रिक्शे से भटकते - भटकते उनके बताए पते पर गयी मगर इस बीच रास्ते भर रास्ता पूछना पड़ा।
रश्मि जी और  माही के साथ

 दिल्ली का उपनगरीय रूप है यह। रश्मि जी की बेटी माही बेहद प्यारी है और उनके मृदु स्वभाव ने मेरी थकान दूर कर दी। उनके फ्राइड राइस का स्वाद तो अब भी जुबान पर है। वहाँ से उनके बताने पर प्रगति मैदान तक की मेट्रो ली कि किले का सँग्रहालय भी देख डालूँ मगर जब तक गयी वह बंद हो चुका था। वहाँ के कर्मचारियों की सलाह पर अन्दर तक गयी जहाँ खुदाई चल रही थी...अन्दर तक और अधिकारियों से बातें कर एक - दो तस्वीरें लीं।

4 मई
राष्ट्रपति भवन, संसद और सँग्रहालय से होकर और इंडिया गेट के रास्ते
सुबह की चाय के बाद राष्ट्रपति भवन देखने निकल पड़ी और यह अद्भुत अनुभव था। सीढ़ियों को छुआ तो जाने क्यों आँखें छलक पड़ी...इस अनुभूति को अभिव्यक्त करना आसान नहीं है। वहीं पर एक परिवार को कहकर तस्वीर खिंचवा ली और यहीं पर मिले अनिल जी जो विदेश मंत्रालय के लिए गाड़ियाँ देते हैं। वह हर जगह रास्ता पूछकर ही निकाल रही थी और मुझे सँग्रहालय देखना था।
राष्ट्रपति भवन की सीढ़ियों पर

अनिल जी ने मुझे बिटिया का संबोधन दिया और पूछा कि कैसे जाऊँगी..मैंने कहा कि पैदल या ऑटो से निकलूँगी। पता नहीं उनके मन में क्या आया, उन्होंने अपनी गाड़ी से मुझे सँग्रहालय तक भी छोड़ दिया। दोपहर 2.15 तक मुझे संसद परिसर देखने पहुँचना था।
राष्ट्रीय सँग्रहालय परिसर में

मित्र चंचल ने व्यवस्था कर रखी थी...थोड़ी सी परेशानी के बाद मोबाइल जमा किया और भीतर घूमकर सब देखा। यह अलग बात है कि मेरे सवालों और मेरी जिज्ञासा ने सबको परेशान किया। यहाँ से निकलकर मैं बहुत थक गयी थी बाहर विशाल उद्यान में बैठ गयी और वहाँ बैठे पत्रकार बंधुओं से भी मेरा परिचय हो गया।
इसके बाद शाम को इंडिया गेट  पहुँची।  लाल किले की तरह आपको यहाँ पर भी तस्वीरें खींचने को लोग मिलेंगे। किनारों पर छोटा - मोटा बाजार भी है। वहाँ से फिर एक बार सरोजिनी मार्केट पहुँचीं।   थोड़ी सी खरीददारी कर वापस अपनी डोरमेटरी। दिल्ली की सड़कों पर पैदल यात्रियों को पहले जाने की सुविधा मिलती है और इस निर्देश का पालन भी सब करते हैं।
इंडिया गेट

5 मई

उग्रसेन की बावली...बंगाली मार्केट और इस्कॉन की शांति से गुजरना

हेली रोड के पास ही ऐतिहासिक उग्रसेन की बावली है जहाँ कभी पानी सहेजकर रखा जाता होगा। उसे देखा और उसके बाद मुझे द्वारिकाधीश मंदिर देखना था। उसका पता नहीं चला मगर इस्कॉन मंदिर को देखा। गजब का स्थापत्य और सुकून देने वाली शांति मगर बाजार तो यहाँ भी है। वस्त्रों से लेकर प्रसाद तक और एक रेस्तरां भी है। इस्कॉन मंदिर का गोविन्दा रेस्तरां यहाँ भी प्रसिद्ध है। यहाँ से फिर मेट्रो पकड़ी और पहुँची अक्षरक्षाम मंदिर जहाँ मेट्रो स्टेशन ही इसी नाम से है। हर दूसरा रिक्शा आपको मंदिर तक पहुँचाने के लिए तैयार रहता है। यहाँ भी घुटने के ऊपर के वस्त्रों पर रोक है। एक कन्या को तो मेरे सामने ही कमर से नीचे ढकने के लिए वस्त्र दिए गए। गजब  का स्थापत्य और उससे भी मजबूत सुरक्षा....मतलब छोटा -मोटा शहर ही है।  संसद की तरह ही मंदिर में मोबाइल ले जाने की इजाजत नहीं है और न ही कोई सामान। तपती दोपहर में खाली पैर चलना भी परीक्षा की तरह था मगर वह भी पार हुआ। यहाँ से वापस  से पुराने किले की अधूरी कहानी को पूरा करने निकल पड़ी और इस बार आखिरकार सँग्रहालय देखा।
इस्कॉन मंदिर

वो बर्तन भी देखे जो महाभारतकालीन बताये जा रहे हैं मगर सच कहूँ इस पौराणिक व ऐतिहासिक धरोहर को जितना मान मिलना चाहिए, वह नहीं मिल रहा है और दिल्ली की तमाम धरोहरों में यह जगह सबसे अधिक उपेक्षित है। यहाँ लोग इतिहास के मोह में न के बराबर जाते हैं और अधिकतर लोगों के लिए यह रति स्थल है...ये दुःखद है। खैर पुराने किले के बाहर मुझे वही बच्ची मिली जिससे मैंने फूल खरीदे और इंडिया गेट के पास जो पॉपकॉर्न खरीदे थे...वह उसे पैसों के साथ थमा दिये। उसकी आँखों में जो उल्सास था, वह करुणा भरी सुन्दरता लिए हुए था। यहाँ से एक बार फिर चाँदनी आयी और पराठों के साथ थोड़ा मीठा भी खरीदा। अगले दिन की तैयारी भी करनी थी इसलिए लौट आयी।

6 मई
कलात्मक संस्कृति में लिपटा साहित्य का मुक्तांगन

रविवार को दोपहर 12 बजे मैंने बंग भवन से प्रस्थान किया। भगत जी ने ओला बुक करवा दी। सब पता नहीं क्यों एक भावनात्मक लगाव से जुड़ गए थे। मैंने पानी भरने की जगह पूछी तो बोतल भी भर दी गयी..यह बहुत सुखद था।
बंग भवन और भगत जी

अब मैं बिजवासन की राह पर थी..और वहाँ कुछ जल्दी ही पहुँची जहाँ जाना था। कविता कोश का मुक्तांगन एक कैनवस की तरह है जिस पर आपको खूबसूरत तस्वीरों सी सजी दीवारें ही नहीं बल्कि हर एक फर्नीचर भी दिखता है। मन मोहने वाली जगह थी और उससे भी स्नेहिल लोग...जिनको मैं नहीं जानती थी, वे भी इतने प्रेम से मिले जैसे न जाने कब से जानते हों।
मुक्तांगन परिसर

 मेरी समझ में नहीं आ रहा था मगर रश्मि जी जैसे सब समझ रही थीं। उन्होंने न सिर्फ परिचय करवाया बल्कि मेरी फ्लाइट को देखते हुए कार्यक्रम में भी फेरबदल की। गीताश्री जी का नाम सुना था, उनको देखा भी और उनके साहित्यिक प्रसंगों में छिपे हास्य पर हँसी भी क्योंकि वह इस अंदाज में सुनातीं कि आप हँसे बगैर रह नहीं सकते। प्रज्ञा जी से मिली और अर्चना वर्मा जी के हाथों सम्मानित होना एक उपलब्धि बन गया।
आराधना जी के साथ

पँखुरी जी से मिलना न हो पाया था, यहाँ उनसे भी मुलाकात हो गयी। इन सब के बीच में आराधना जी जिस सहृदयता से सारी व्यवस्था देख रही थीं...वह अद्भुत था। मुक्तांगन के लोग और इंटिरियर के साथ वहाँ के समोसे और जलेबियाँ भी बेहद स्वादिष्ट थे।
सम्मान पाना सुखद अनुभव और उपलब्धि बना

मैंने कविता पढ़ी और मुझे अफसोस रहेगा कि मुझे बीच से ही निकलना पड़ा। तस्वीरें भी हुईं और अंत में मुझे समय से पहले एयरपोर्ट पहुँचा दिया गया...सच में ऐसे अनुभव कम होते हैं और 2018 मई की दिल्ली यात्रा मेरे सुखद अनुभवों में शामिल हो चुकी है।

अपना शहर...अपनी सड़कें...गलियाँ और अपना घर

शाम 6.30 बजे की फ्लाइट थी और यह फ्लाइट समय के पहले कोलकाता पहुँची। मेरा शहर मेरे सामने था...यहाँ कोई हड़बड़ी नहीं थी...सब आराम से हो रहा था। प्रीपेड टैक्सी बुक करवाकर लौटी..और एक सप्ताह के बाद वापस घर आ चुकी थी मगर दिल्ली की यादें मुक्तांगन से मिले प्रमाणपत्र और शील्ड के रूप में कमरे में सज चुके हैं...शुक्रिया मुक्तांगन....शुक्रिया रश्मि जी...शुक्रिया आराधना जी...शुक्रिया दिल्ली।

गुरुवार, 19 अप्रैल 2018

तर्क का उत्तर तर्क हो सकता है, उपहास नहीं..कमियाँ देखते हैं तो उपलब्धियों को स्वीकार भी कीजिए



महाभारत को लेकर त्रिपुरा के मुख्यमंत्री का बयान सुर्खियों में है...मीडिया को एक नयी स्टोरी मिली...आधी हकीकत और आधा फसाना...जैसे कार्यक्रमों के लिए एक नया मसाला मिला....सोशल मीडिया पर  मजाक उड़ाया जाना जरूरी है मगर आप अपने प्राचीन ग्रंथों...और रामायण व महाभारत जैसे ग्रन्थों पर विश्वास करते हैं तो आप एक झटके से इनको खारिज नहीं कर सकते।

 यह शोध का विषय है, उपहास का विषय नहीं है..यह मानसिकता कि सब कुछ हमें पश्चिम से मिला है..और अपनी उपलब्धियों का माखौल उड़ाना कहीं न कही हमारी पश्चिम पर निर्भरता के कारण है....आज जो चीजें परिवर्तित रूप में हमारे सामने हैं,वे किसी और रूप में पहले थीं...आपने उसे खोया है। भला यह कैसे सम्भव है कि कोई कल्पना के आधार पर एक या दो नहीं बल्कि पूरे एक लाख या उससे अधिक श्लोंकों की रचना कर डालें।

 आप नाम भले इंटरनेट का न दें...मगर महाभारत और इसके पहले कुछ तो था जिसे हम और आप नहीं जानते...मुख्यमंत्री विप्लब देब अगर संजय ने महाराज धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र का आँखों देखा हाल सुनाया तो कोई तो तकनीक ऐसी रही होगी...जिससे ये सम्भव हुआ होगा जबकि उस समय में मोबाइल फोन का सहारा भी उनको नहीं लेना पड़ा। अगर आप पुष्पक विमान को हवाई जहाज नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे? आज आप किताबें पढ़ते हैं, तब मंत्रों का प्रचलन था और मंत्रों के माध्यम से ही सिद्धि होती थी...क्या भारत में शल्य चिकित्सा का इतिहास नहीं है।

क्लोनिंग - पूर्वजों ने महाभारत काल में ही क्लोनिंग कर दिखाई थी | महाभारत के आदिपर्व में इसका वर्णन अध्याय –  115 में मिलता है | कुन्ती को सूर्य के समान तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ | यह सुनकर गांधारी ने, जिसे 2 वर्षों से गर्भ होने के बावजूद संतान की प्राप्ति नहीं हुई | जिससे परेशान होकर गांधारी ने स्वयं अपना गर्भपात कर लिया | गर्भपात होने के बाद लोहे के गोले के समान माँसपेशियाँ निकली | इस समय व्यास ऋषि को बुलाया गया | उन्होंने इस ठोस मांसपेशियों का निरीक्षण किया | व्यास ऋषि ने इस मांसपेशियों को एक कुण्ड में ठंडा कर विशेष दवाओं से सिंचित कर सुरक्षित किया |

 बाद में इन मांसपेशियों को 100 गांठ ( पर्वों ) में बाँटा तथा 100 घी से भरे कुण्डो में रख कर 2 वर्षों तक सुरक्षित रखा | 2 वर्ष बाद क्रमानुसार गांधारी के 100 पुत्र क्लोनिंग से ही जन्मे | महाभारत काल में शुक्राणु कोशिका यानी स्टेम सैल के द्वारा ही 100 कोरवों को जन्म देने की पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया का वर्णन इसमे लिखा हुआ हैं | गुरु द्रोणाचार्य भी टेस्ट ट्यूब पद्धति से जन्मे हैं। आप इस प्रसंग में नैतिकता पर प्रश्न उठा सकते हैं मगर तकनीक को नकार नहीं सकते। क्या ये टेस्ट ट्यूब बेबी की परिकल्पना के साकार होने जैसा नहीं लगता।
चक्रव्यूह 

मंत्रों से पांडवों का जन्म या द्रोपदी की पुकार पर कृष्ण का आना क्या आपको टेलिपैथी की याद नहीं दिलाता...जब कि वो तो उस समय वहाँ थे ही नहीं...क्या आपको कभी - कभी महसूस नहीं होता.। क्या वृन्दावन, मथुरा, काशी, अयोध्या...जैसे नाम आज भी प्रचलित नहीं हैं....यह कैसे सम्भव हुआ और क्या कुछ नाम परिवर्तित रूपों में नहीं हैं...क्या आपको कान्धार गान्धार का परिवर्तित रूप नहीं लगता...कुरुक्षेत्र...रामेश्वरम सेतु आज तक कैसे हमारे बीच  उपस्थित हैं...बताइए..

अगर आपको कोई याद करता है...कई बार घटनाओं का पूर्वानुमान भी क्या नहीं होता...हम क्यों बिप्लव देव पर हँस रहे हैं...आप कम से कम उनकी बात को परखिए तो सही..। हम नहीं जानते हैं तो यह हमारी कमजोरी है। द्रोपदी का जन्म अग्नि से हुआ...अगर नहीं हुआ तो सिद्ध कीजिए.....आप असहमत हो सकते हैं मगर माखौल उड़ाना तो उन प्रश्नों से भागना है जिन पर खोज करने की जरूरत है।

यह सही है कि अतीत में गलतियाँ हुईं, अन्याय भी हुआ मगर जिस तरह गलतियों से सीखा जा सकता है...उसी प्रकार अपनी उपलब्धियों और खूबियों पर बात करने में क्या हर्ज है। आज आप मिसाइलों की बात करते है और हथियारों को तो आज भी आग्नेयास्त्र कहा जाता है मगर उस समय जो वाण थे..या जिस सुदर्शन चक्र का, गांडीव धनुष का,...उल्लेख किया जाता है..क्या आप उसकी शक्ति को कमतर मान सकते हैं।


सोलर सिस्टम: विश्व के वैज्ञानिक जिस सोलर सिस्टम की खोज काफी बाद में कर पाए है उसके बारे में हमारे ऋगवेद में प्राचीन काल से वर्णन किया गया है। ऋगवेद के अनुसार ‘सूरज अपनी कक्षा में घूमता है और घूमते वक्त पृथ्वी और बाकी ग्रहों के बीच इस प्रकार संतुलन बनाए रखता है कि वे एक-दूसरे से ना टकराएं।’

धरती और सूर्य के बीच दूरी : आपने हनुमान चालीसा के बारे में तो जानते ही होंगे, जिसके एक श्लोक में कहा गया है कि “जुग सहस्त्र जोजन पर भानू, लील्यो ताहि मधुर फल जानू” इसका मतलब होता है भानु अर्थात सूर्य, पृथ्वी से जुग सहस्त्र योजन की दूरी पर है जो वैज्ञानिक खोज में सटीक पायी गयी है। अब आप सोच सकते है हनुमान चालीसा की रचना कितनी प्राचीन है।


धरती की सतह : 7वीं शताब्दी में भारतीय विद्वान ब्रह्मगुप्त ने वर्णन किया था, धरती की परिधि लगभग 36000 किलोमीटर है। बाद में वैज्ञानिकों ने गणना करने पर इसे 40075 बताया। इन दोनों आंकड़ों में केवल 1% का अंतर था। समय के अंतराल के कारण इस गणना में फेर होना जायज़ है।

ऑर्गन ट्रांसप्लैंट: आज जिस मेडिकल साइंस में ऑर्गन ट्रांसप्लांट पर खूब वाहवाही सुनने को मिलती है और इसे एक बड़ी कामयाबी माना जाता है इसके बारे में आपको बता दें कि ये तकनीक बहुत पुरानी है। पुराणों में इस बात का ज़िक्र है कि भगवान गणेश के शरीर पर हाथी का सिर लगाया गया था।

भगवान विष्णु के सर्वप्रमुख अस्त्र ने कई बार इसका प्रयोग कई रूपों में किया है।

कार्य क्षमता- यह केवल भगवान विष्णु की आज्ञा का पालन करता है और लक्ष्य को पूरी तरह तबाह कर देता है।

कलयुग समानता- मिसाइल

लाइव टेलीकास्ट : आज हम अपने घर बैठ कर टीवी पर लाखों किलोमीटर दूर की घटना या मैच का लाइव प्रसारण देखकर अपने विज्ञान का शुक्रिया अदा करते है पर आपको बता दें महाभारत काल में ये तकनीक इस्लेमाल करने का वर्णन है जिसमे संजय, धृतराष्ट्र को महाभारत का युध्द दिखाते हैं।

हमारे यहाँ अस्त्र -शस्त्रों की समुचित परिभाषा हैं। वो ज्ञान है जिसे देखने की जहमत हम नहीं करते और बड़ा कारण यह है कि कोई भी सटीक अनुवाद हमारे यहाँ उपलब्ध नहीं है और संस्कृत पढ़ना हमें पिछड़ापन लगता है लेकिन एक बात तो तय है कि आपको वर्तमान और भविष्य की बात करनी है तो आप हिन्दी. अँग्रेजी या किसी अन्य भाषा का सहारा ले सकते है मगर अतीत जानने के लिए तो आपको संस्कृत जाननी होगी।
अस्‍त्र  - प्राचीन भारत में 'अस्त्र' शब्‍द का प्रयोग दरअसल उन हथियारों के लिए किया जाता था जिन्‍हें मन्त्रों के द्वारा दूर से फेंका जाता था। इन्‍हें अग्नि, वायु, विद्युत और यान्त्रिक उपायों से प्रक्षेप किया जाता था।
शस्‍त्र  - वहीं 'शस्त्र' शब्‍द का प्रयोग ऐसे खतरनाक हथियारों के लिए किया जाता है जिनके प्रहार से चोट पहुंचती हो या मृत्‍यु तक हो सकती हो।


वैदिक काल में अस्त्र-शस्त्र - वैदिक काल में अस्‍त्र-शस्‍त्र को दो वर्गों में बांटा गया था। (1) अमुक्ता, यानी वे शस्त्र जो फेंके नहीं जाते थे। (2) मुक्ता, यानी वे शस्त्र जिन्‍हें फेंक कर हमला किया जाता था। मुक्‍ता के भी चार प्रकार हैं। इनमें, पाणिमुक्ता, यानी हाथ से फेंके जानेवाले और यंत्रमुक्ता, यानी यंत्रों द्वारा फेंके जाने वाले हथियार शामिल हैं। इसके अलावा 'मुक्तामुक्त' यानी वह शस्त्र जो फेंककर या बिना फेंके दोनों प्रकार से प्रयोग किए जाते थे। जबकि, 'मुक्तसंनिवृत्ती' वे शस्त्र हैं जो फेंककर लौटाए जा सकते थे। हम उन अस्त्रों की बात भी करते है...जिनका उल्लेख हमें मिलता है।

ये हैं महाविनाशकारी अस्‍त्र -
 महाविनाशकारी अस्‍त्रों में अधिकांश दैवीय थे। इन्‍हें मंत्र शक्‍ति के जरिए फेंककर हमला किया जाता था। हर विनाशकारी अस्‍त्रों पर अलग-अलग देवी-देवताओं का अधिकार होता है। इनके मंत्र भी अलग-अलग होते हैं। देवताओं द्वारा प्रदान किये गये इन अस्‍त्रों को दिव्‍य या मांत्रिक अस्‍त्र कहते हैं। आइए जानते हैं कौन-कौन से थे ये
आग्नेय : यह एक प्रकार का विस्फोटक अस्‍त्र था। पानी की फुहारों के समान ही यह अग्‍नि बरसाकर सबकुछ जलाकर भस्‍म कर देने में सक्षम था। इसके प्रतिकार के लिए पर्जन्‍य अस्‍त्र का प्रयोग किया जाता था। आज भी पिस्तोल और बंदूकों को खबरों में भी आग्नेयास्त्र भी लिखा जाता है।
पर्जन्य :यह भी एक प्रकार का विस्फोटक अस्‍त्र था। जल के समान अग्नि बरसाकर सब कुछ भस्मीभूत कर देने की शक्‍ति इसमें भी मौजूद थी। इसके प्रतिकार के लिए पर्जन्‍य का ही प्रयोग किया जाता था।
वायव्य :इस अस्‍त्र से भयंकर तूफान आते थे और चारो ओर अन्धकार छा जाता था।
पन्नग :इससे सर्प पैदा होते थे। इसके प्रतिकार के लिए गरुड़ अस्‍त्र छोड़ा जाता था।
गरुड़ : इस बाण के चलते गरुड़ उत्पन्न होते थे, जो सर्पों को खा जाते थे।
ब्रह्मास्त्र : यह एक अचूक और अतिविकराल अस्त्र है। इसके बारे में कहा जाता है कि यह शत्रु का नाश करके ही समाप्‍त होता है। इसका प्रतिकार दूसरे ब्रह्मास्त्र से ही हो सकता है।
पाशुपत : यह एक महाविनाशकारी अस्‍त्र है। इससे समस्‍त विश्व का नाश किया जा सकता है। बता दें कि महाभारतकाल में यह अस्‍त्र केवल कुंती पुत्र अर्जुन के पास ही था।
महाभारत का ही अवशेष है ये अवशेष शिमला से 100 किलो मीटर दूर करसोंग घडी में ममलेश्वर मंदिर में स्थित है ! यहाँ पर दो मीटर लंबा और तीन फिर उचा ढोल है इसे भीम का ढोल बताया गया है ये ढोल पांच हजार साल पुराण है इस मंदिर में करीब पांच हजार साल से ये ढोल रखा हुआ है इस ढोल के बारे में ऐसा खा जाता है की इस ढोल को भीम ने अज्ञात बास के समय बजाय था लोगो का ऐसा मानना है की यहाँ 5 हजार साल पहले अज्ञातवास के समय पांडवो ने कुछ समय इस जगह पर बिताया था उसी समय इस मंदिर में एक बड़ा ढोल भी रखा गया था !

नारायणास्त्र :यह भी पाशुपत के समान ही अत्‍यंत विकराल और महाविनाशकारी अस्त्र है। इस नारायण अस्त्र से बचाव के लिए कोई भी अस्‍त्र नहीं है। इस अस्‍त्र को एक बार छोड़ने के बाद समूचे विश्‍व में कोई भी शक्‍ति इसका मुकाबला नहीं कर सकती। मान्‍यता है कि इसका केवल एक ही प्रतिकार है और वह यह कि शत्रु अस्त्र छोड़कर नम्रतापूर्वक अपने को अर्पित कर दे। क्‍योंकि, शत्रु कहीं भी हो यह बाण वहां जाकर ही भेद करता है। इस बाण के सामने झुक जाने पर यह अपना प्रभाव नहीं करता। इन दैवीय अस्‍त्रों के अलावा 'ब्रह्मशिरा' और 'एकाग्नि' आदि विनाशकारी अस्‍त्र भी हैं।
बिहार के इस स्थान पर राजा पोन्ड्रक का राज था। पोन्ड्रक जरासंध का मित्र था और उसे लगता था कि वह कृष्ण है। उसने न केवल कृष्ण का वेश धारण किया था, बल्कि उसे वासुदेव और पुरुषोत्तम कहलवाना पसन्द था। द्रौपदी के स्वयंवर में वह भी मौजूद था। कृष्ण से उसकी दुश्मनी जगजाहिर थी। द्वारका पर एक हमले के दौरान वह भगवान श्रीकृष्ण के हाथों मारा गया।

इनके अलावा शक्‍ति, तोमर, पाश, ऋष्‍टि, वज्र, त्रिशूल, चक्र, शूल, असि, खड्ग, चंद्रहास, फरसा, मूशल
धनुष, बाण, परिघ, भिन्‍दिपाल, परशु, कुंटा, पट्टी और भुशुण्‍डी भी प्राचीन दुनिया के बेहद शक्‍तिशाली हथियार थे। ये जानकारी इंटरनेट पर भी उपलब्ध है..हम आज भी बहुत कुछ नहीं देखते मगर विश्वास करते हैं और नहीं विश्वास करते तो उसे खोजते हैं तो मजाक उड़ाने या किसी बात को सिरे से खारिज करना हो सकता है कि आसान हो मगर उसकी सच्चाई अगर आपने नहीं तलाशी तो आप किसी का मजाक नहीं उड़ा सकते। हम नहीं रहेंगे, तब भी यह धरती रहेगी और तब लोग भी हमारे होने पर सन्देह करेंगे क्योंकि उन लोगों ने भी हमको देखा नहीं होगा।
बैराठ - राजा विराट के मत्स्य प्रदेश की राजधानी के रुप में विख्यात बैराठ राजस्थान के जयपुर जिले का एक शहर है जिसे वर्तमान में विराट नगर के नाम से जाना जाता है. बताया जाता है कि इस प्राचीन नगर में पांडवों ने अपने अज्ञातवास का समय बिताया था.
आज सिन्धु घाटी की सभ्यता एक सच है....कुरुक्षेत्र और द्वारिका का पाया जाना भी एक सच है। आप चीन की दीवार पर भरोसा कर सकते हैं तो अपनी परम्परा पर बात करने में क्या परेशानी है...हम इतिहास की बुराइयों, रूढ़ियों को खारिज करें.....जो आज के समय में हम स्वीकार नहीं कर सकते मगर जिस तरह स्त्री और पिछड़े वर्ग के प्रति संवेदनहीनता एक बड़ा सच है, उसी प्रकार तकनीक और विज्ञान का होना भी सच है। आप असहमत हो सकते है मगर आप प्रमाण दीजिए कि ये गलत है...बगैर प्रमाण के किसी का मजाक उड़ाना आपको संवेदनहीन बनाता है और यह आत्ममुग्धता का प्रतीक है।
महाभारत काल में इंद्रप्रस्थ और खांडवप्रस्थ का जिक्र किया गया था. करीब पांच हजार साल पहले के इस शहर को आज भारत की राजधानी दिल्ली के तौर पर जाना जाता है.
मैंने नहीं देखा, हमारे समय में नहीं है...या प्रमाण नहीं है...कहकर खारिज करने से पहले एक बार उस पर नजर तो डाली होती...इतनी पराधीन चेतना क्यों है आपकी और आप इतने हीन क्यों हैं कि आपको विश्वास ही नहीं होता कि आपके देश में कुछ अच्छा भी हुआ होगा...दुःखद ही नहीं....दयनीय स्थिति है आपकी। वैसे भी बिप्लव देव ने कोई हेट स्पीच नहीं दी है बल्कि वह बात कही है जिस पर हम न भी सहमत हों तो एक बार विचार करें। भविष्य को मजबूत बनाने के लिए वर्तमान के प्रयत्न काफी नहीं होते बल्कि अतीत के अनुभवों की भी जरूरत पड़ती है।

रामायण और महाभारत के कुछ शहरों के बारे में बताने की कोशिश की है। इसके अतिरिक्त इन नगरों के बारे में भी जानकारी एकत्र कर प्रस्तुत की जायेगी। इतिहास पर भरोसा करना सीखिए...अतीत था तो वर्तमान है...अतीत की गलत बातों को न दोहराएं, उससे सीखिए...भविष्य तो अपने आप सुन्दर बनेगा...।




गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

इस गुनाह में आप बराबर के साझीदार हैं



सबसे आसान है अखबारों..पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को घेरना..विज्ञापनों की भरमार के लिए उनको कोसना...उनके कार्टून बनाना...और उन पर यदा - कदा कविताएं और व्हाट्स ऐप स्टेटस बनाना। कहने का मतलब यह है कि मीडिया को घेरना सरकारों की आदत तो है ही मगर उसकी अदालत जनता में सबसे ज्यादा लगती है। तो अब लगा कि जनता की अदालत में पेशी होती ही रहती है तो अपना पक्ष भी रखा जाये...मगर पत्रकार अपने लिए न के बराबर बोलते हैं। चैनलों पर और अखबारों के चेहरे पर आपको उनके मालिक और सम्पादक...एंकर या संवाददाता दिखते हैं...वह नहीं दिखते जो नेपथ्य में होते हैं...जो कभी कैमरामैन..तो कभी वीडियो एडीटर तो कभी पेजमेकर होते हैं...वह भी नहीं दिखते जो मशीनों के बीच काम कर रहे होते हैं...जिनकी अपनी जिंदगी बेरंग होती है मगर आपकी जिंदगी में रंग भरना उनकी जिम्मेदारी होती है। कोई सेवानिवृत पत्रकार या कोई बेरोजगार मीडियाकर्मी जब भूखों मर रहा होता है...वह किसी अखबार के पन्ने पर नहीं छपता...वह किसी विमर्श का भी हिस्सा नहीं होता। कोई महिला पत्रकार जब भीड़ में गुंडों से जूझ रही होती है या कभी उसके दफ्तर में उसका उत्पीड़न होता है...डेडलाइन और घर के बीच जब वह परेशान होती है....आप नहीं देख पाते और न ही उसकी आवाज सुनी जाती है क्योंकि अधिकारों की बात करने वाले अखबारों में विशाखा गाइडलाइन का लाभ महिलाओं को मिले...इसके लिए तो कोई कमेटी ही नहीं है...अलबत्ता उसे ब़ॉस को फँसाने का आरोप लगाकर नौकरी से जरूर निकाल दिया जाता है या वह उत्पीड़न से परेशान होकर खुद ही अपनी मानसिक शांति के लिए नौकरी छोड़ने को बाध्य होती है। उसके लिए कोई रैली नहीं निकाली जाती और न ही कोई भूख हड़ताल होती है। रात के 9 बजे जब उसे अपने बच्चों का ख्याल आता है तो वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती। मीडियाकर्मियों के बच्चे तो कभी माँ तो कभी पिता के साथ ही बड़े होते हैं..कई महिलाएँ बच्चों के लिए ही डेस्क पर आती हैं। महिला पत्रकारों को खबरें आसानी से मिलती हैं या नेता व अधिकारी इनकी शक्लें देखकर एक्सक्लूसिव देते हैं (आम धारणा यही है) या फिर उनको अधिकतर पेज थ्री की जिम्मेदारी भी दी जाती है..सभा संस्थाओं की जिम्मेदारी दी जाती है...इससे आगे बढ़ीं तो शिक्षा...निगम और अब अपराध और राजनीति जैसी बीट भी उनके हिस्से आ रही है...और ये करना आसान नहीं होता। कई बार एक साथ 40 - 50 कर्मचारी किसी मीडिया संस्थान से निकाल दिये जाते हैं...उनको जबरन वीआरएस दिया जाता है मगर वह किसी अखबार के पहले पन्ने पर नहीं दिखता...प्रतिद्वंद्वी भी इस मामले में साझेदारी का ख्याल रखते हैं।
हम मीडियाकर्मी जनता के सवालों को लेकर जूझते रहते हैं क्या जनता कभी हमारे लिए सोचती है? पत्रकारों की हत्याएँ होती रही हैं...पत्रकार पीटे जाते रहे.....कितने संगठन सड़क पर उतरे...बता दीजिए? ये जो गुणवत्ता का ढिंढोरा हर सेमिनार में पीटा जाता है....वो ढिंढोरा पीटने वाले लोग भी टीआरपी के पीछे भागते हैं...उनको अपने उन कार्यक्रमों में भी मंत्री चाहिए जहाँ उनकी जरूरत नहीं है...क्योकि मीडिया तो मंत्री के पीछे आता है न। मंचों पर पार्टियों को गरियाने वालों को पार्षदों के आगे - पीछे हाथ बाँधकर घूमते देखा है....और ऐसे लोग हम मीडियावालों से नैतिकता की उम्मीद करते हैं...? जरा अपने गिरेबान में झाँकिए साहेब। हम पर आरोप लगते हैं कि हम बाजार के पीछे भागते हैं मगर क्या आप नहीं भागते...क्या आपने समाचारों से अधिक विज्ञापन देने वाले अखबारों का बहिष्कार किया है? सबसे अधिक नग्न तस्वीरों से भरने वाले अखबार और सनसनी फैलाने वाले अखबार आपकी नजर में सबसे आगे हैं और आप वहीं जाते भी हैं...वही खरीदते भी हैं और बिकाऊ छोटे मीडिया संस्थान हैं। 15 साल हो रहे हैं और मैंने किसी भी संस्था को नहीं देखा जिनको मंत्री और राज्यपालों का मोह न हो...जो विज्ञापन देने के लिए प्रसार संख्या न देखे...। यहाँ तक कि साहित्यकार....प्रोफेसर और बुद्धिजीवी भी अपनी कविताओं को सबसे छपवाने के लिए गुणवत्ता और विश्वसनीयता को नहीं प्रसार संख्या को ही मापदंड बनाते हैं। वह सारे अखबारों में अपनी खबर भेजते हैं मगर जब उनके कार्यक्रम होते हैं तो छोटे - मोटे अखबार अपनी तमाम आदर्शवादिता के बावजूद उनकी सूची में नहीं होते और न ही उनको खरीदा जाता है जबकि इन अखबारों में समाचार विज्ञापन से अधिक होते हैं..लेख भी स्तरीय होते हैं...मगर बहुत से लोग जब फोन करते हैं तो उनका अंतिम प्रश्न यही होता है कि वह पत्रकार अधिक प्रसार संख्या वाले अखबार या मीडिया में किसी का सम्पर्क दे सकता है? खबर छपे भी तो फुटेज और कटिंग आप उसी अधिक प्रसार संख्या वाले अखबार की ही साझा करते हैं...जरा सोचिए क्या आप पूर्वाग्रह से मुक्त हैं?
 नतीजा यह होता है कि प्रसार संख्या कम होते जाने के कारण या तो उनको समझौते करने पड़ते हैं...या फिर न चाहते हुए भी उसी होड़ में शामिल होना पड़ रहा है तो क्या आप इस गुनाह में बराबर के साझीदार नहीं है? जो बुरा है, उसे प्रश्रय कौन दे रहा है...कभी अन्दर झाँककर देखिए...जो खुद बेईमानों की पूजा करें...उनको नैतिकता का ज्ञान देने का कोई अधिकार नहीं है...आप जनता जनार्दन हैं या सरकार हैं...मगर ये अधिकार आपको नहीं है। सनसनीखेज खबरें करने वालों को आप अव्वल बनाते हैं....अंगप्रदर्शन करने वालों की तस्वीरों से पटी सामग्री वाले अखबार आप खरीदते भी हैं और देखते भी हैं...उनकी हिम्मत बढ़ाने वाले आप ही हैं...तो ऐसे में मीडिया जब व्यावसायिक हो रहा है तो आपको शिकायत क्यों है?
नवजागरण काल में भी जनता के असहयोग के कारण ही उदन्त मार्तंड जैसा अखबार भी साल भर में बंद हो गया...जनता ने अच्छी गुणवत्ता वाले अखबारों का साथ तब ही दिया है जब सामग्री उनके अनुकूल हो। आज जब आपका टेस्ट ही अच्छा नहीं है तो मीडिया अकेले क्या करेगा...आप जब खुद बुराई को प्रश्रय देंगे तो कौन सा पत्रकार आपके लिए लड़ेगा और क्यों लड़ेगा? आप फेक न्यूज से परेशान हैं मगर उनको बगैर देखे वायरल करने वाले तो आप ही हैं...अगर आपको किसी शहीद की जगह आँख मारने वाले लड़की में दिलचस्पी है तो मीडिया भी वही दिखाएगा क्योंकि आखिरकार उसे आपको ही खुश करना है तभी तो वह टिकेगा। जब आपने ही बेईमानी...सत्ता और अहंकार के आगे घुटने टेक दिये हों तो लोकतंत्र का चौथा खम्भा आपकी मदद कैसे करेगा इसलिए जब भी मीडिया को कोसिए....तो याद रखिए....दूसरी उंगली आप पर भी उठेगी। इस गुनाह में आप भी बराबर के साझीदार हैं।

गुरुवार, 15 मार्च 2018

खबरों को खबर रहने दीजिए...ज्यादा मसाले सेहत खराब कर देंगे

सत्य तो यही है


 अब आम जनता की तरह सुप्रीम कोर्ट मीडिया से परेशान है। यह मीडिया के लिए शर्म का विषय होना चाहिए मगर खाल मोटी है, लगता नहीं कि कोई असर भी पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने बड़ी टिप्पणी करते हुए मीडिया को जिम्मेदारी से काम करने की सलाह दी है। उन्होंने एक याचिका की सुनवाई के दौरान कहा कि हम प्रेस की आजादी का सम्मान करते हैं, लेकिन प्रेस को भी अपनी जिम्मेदारी से काम करना चाहिए। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में बैठे कुछ लोग वो सोचते हैं कि वो कुछ भी लिखते हैं, कुछ लोग तख्त पर बैठकर क्या कुछ भी लिख सकते हैं. क्या ये पत्रकारिता है? वैसे भी मीडिया ट्रायल इस देश में कोई नयी बात नहीं है मगर हाल के कुछ वर्षों में इसने खतरनाक शक्ल ले ली है और एक पत्रकार न चाहते हुए भी पिस रहा है। गालियाँ भी खा रहा है और यह मीडिया प्रबंधनों की मेहरबानी से हो रहा है जिनको टीआरपी चाहिए फिर चाहे वह किसी भी कीमत पर मिले। अदालत बनकर फैसले सुनाने की तरह किसी एक पक्ष को उभारना मीडिया का काम नहीं है मगर आप कोई भी मामला उठाकर देख लीजिए यही हो रहा है। ऐसा लगता है कि कोई मुद्दा मिठाई की तरह है जिसे एक चैनल ने उभारना क्या शुरू किया, सब के सब पीछे पड़ जाते हैं। एक पत्रकार और रिपोर्टर होने के नाते मैं कह सकती हूँ कि इस तरह की खबरें संवाददाताओं या मीडियाकर्मियों की मर्जी नहीं मजबूरी हैं। 
बीबीसी का ये कार्टून एक तीखा मगर वास्तविक कटाक्ष है

यकीन मानिए कि इसके पीछे नौकरी बचाने का भय है और कुछ नहीं। एक चैनल की घटियापंथी हर पत्रकार का सिरदर्द बन जाती है। फिर चाहे वह राम –रहीम का मामला हो, श्रीदेवी की मौत हो या अब जो बंगाल में पिछले कुछ दिनों से चल रहा है। बतौर दर्शक आप भले ही मजे ले रहे हों मगर इस तरह की कवरेज करने वाले पत्रकार उस पहले चैनल को गालियाँ ही दे रहे होते हैं जिसने इसे व्यापक स्तर पर सड़ाध भरते हुए फैलाया। हर किसी का व्यक्तिगत जीवन होता है और मैं मानती हूँ कि अगर इसका असर आम जनता के हितों पर नहीं पड़ता तो इसे सामने लाया ही नहीं जाना चाहिए। प्रचार के लिए किसी भी हद तक जाने वाले सितारे कई बार अपनी हरकतों का पता खुद देते हैं या इस तरह के ट्वीट कर डालते हैं क्योंकि उनको पता है कि आप मुँह – बाये खड़े हैं उसे लपकने के लिए और आप लपक भी लेते हैं। मैं मानती हूँ कि फिल्मों की तरह कहीं न कहीं एक सीमा –रेखा तय होनी जरूरी है। आप मीडिया की आजादी की बात करते है तो आपको याद रखना होगा कि किसी की नाक (व्यक्तिगत जीवन खासकर जब वो सिर्फ स्कूप हो) जहाँ से शुरू होता है, वहाँ से आपकी आजादी खत्म हो जाती है। कई चैनलों ने बेशर्मी का परिचय देते हुए श्रीदेवी की बिकनी में तस्वीरें जारी कीं तो कई बाथटब में कूद गये...ये पत्रकारिता नहीं है। इसी दौरान जब सीरिया में बच्चे मर रहे हैं या कहीं और कोई ऐसी घटना हो रही है...नजर वहाँ पर जानी चाहिए। राजधानी दिल्ली में और अब मुम्बई में किसानों का धरना हुआ और वे कई दिनों तक चलकर नंगे – लहुलहान पैरों के साथ आये...मगर आपका कैमरा वहाँ नहीं गया...और ये तस्वीरें सोशल मीडिया पर घूमती रहीं...आपकी जवाबदेही और आपकी साख दोनों सोशल मीडिया खा रहे हैं और इसके जिम्मेदार कोई और नहीं आप हैं। कोई तुक नही है कि शमी और उनकी पत्नी के विवाद को इतना उछाला जाये...हसीन का व्हाट्सएप वायरल किया जाये...खबर दिखाइए जरूर दिखाइए मगर खबर को खबर की तरह दिखाइए...उस पर कई घंटे और दिन जाया करने का कोई मतलब  नहीं है। इन दिनों मेयर शोभन चटर्जी, उनकी पत्नी रत्ना और वैशाखी के साथ उनके रिश्तों की महाभारत पढ़ी जा रही है। मेयर के श्वसुर तक के बयान लिये जा रहे हैं....कोई बताये कि इससे जनता का कौन सा हित सधता है या यह कौन सी राष्ट्रीय समस्या है मगर एक चैनल की हरकत का खामियाजा पत्रकारों को उठाना पड़ रहा है। मुझे लगता है कि आधे से ज्यादा अपराध कम हो जायेंगे अगर मीडिया पर नियंत्रण हों...खबरों को मसाला बनाकर पेश करने वाले लोगों ने औरतों को सनसनी बना रखा है और नतीजा यह है कि जनसत्ता और एनडीटीवी जैसे चैनलों को भी इस रेस में शामिल होना पड़ रहा है, यह शर्मनाक है।
स्थिति यही हो गयी है

 आप कहते हैं कि जनता को यह पसन्द है मगर क्या आपके बच्चों को जहर खाना पसन्द है तो आप उसे जहर देंगे या उसे बेहतर विकल्प देंगे? कुछ ही चैनल ऐसे हैं जो अच्छी चीजें ला रहे हैं जिनमें से इपिक चैनल प्रमुख हैं मगर खबरिया चैनलों के लिए राजनीतिक प्रोपेगंडा ही प्रमुख है जो हुकूमत से रिश्तों के हिसाब से कवरेज करता है। जी न्यूज, इंडिया टीवी ऐसे चैनल हैं जो सरकार की नकारात्मकता को भी उपलब्धि बनाने में जुटे हैं तो एनडीटीवी है जिसे हर बात में विफलता नजर आती है। एबीपी और आजतक हैं जो सनसनीखेज खबरों को ही पत्रकारिता समझते हैं...अफसोस है। एक समय था जब हम दूरदर्शन में समाचार देखते थे तो वह भी सरकार दर्शन ही लगता था मगर फिर भी थोड़ी सी ही सही तटस्थता रहती थी। कई बार तो पत्रकार को स्पष्ट रूप से उसे कह देना पड़ रहा है कि यह खबर सरकार के विरोध या पक्ष में है इसलिए नहीं जा सकती मगर यह कहते हुए उसका सिर शर्म से कैसे झुकता है और उसे कितनी ग्लानि होती है, ये आम जनता नहीं समझेगी। बड़ी शर्म आती है जब कोई कहता है कि आपनी तो एई – शेई पार्टीर लोक....मगर हम इस शर्मिंदगी के साथ जीते हैं, जी रहे हैं...कोई नहीं समझता और न ही कोई जानता कि यह उस पत्रकार की मजबूरी है क्योंकि विकल्पहीनता ऐसी है कि हर जगह माहौल ऐसा ही है। साँप छोड़ेंगे तो अजगर से लिपटना पड़ेगा....रोजी – रोटी का मामला है। बतौर पत्रकार बड़ी कोफ्त और विचित्र स्थिति में पड़ते हैं हम जब किसी स्टोरी को करने पर ये सुनना पड़े कि ये सिंगल कॉलम जायेगी क्योंकि इसमें विज्ञापन नहीं है या किसी घटिया खबर को चार कॉलम में फैलाना होता है....कई बार लगता है कि कुछ और किया जाये...मगर आप करेंगे क्या? क्या सब छोड़कर चल देना समाधान है
ये बड़ा सवाल है

आप जब तक हैं, विरोध कर सकते हैं फिर भले ही आपकी बात सुनी जाये या न सुनी जाये मगर छोड़ देने का मतलब है कि आप अधिक गलत चीजों के लिए रास्ता बना रहे हैं सच तो यह है कि ऐसे पत्रकारों को ही हाशिये पर डाल दिया जा रहा है और फिर उसकी मदद के लिए कोई नहीं आता। अंततः कोई करे, हमें क्या...नौकरी ही तो करनी है....वाली स्थिति भी है। फिर भी स्थिति बदली जा सकती है मगर खतरा उठाना पड़ेगा। दिक्कत यह है कि एकजुटता ही नहीं है....और सबसे बड़ी बात बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधे....कम से कम खबरचियों की कहानी तो कही जा सकती है....हम वहीं कर रहे हैं मगर जिम्मेदार तो आपको होना ही पड़ेगा...वरना सुप्रीम कोर्ट ट्रेलर दिखा चुका है, पिक्चर दिखाते उसे देर नहीं लगेगी।

(सभी तस्वीरें गूगल अंकल से साभार)

मंगलवार, 13 मार्च 2018

ये पब्लिक है, सब जानती है


आपने एक गम्भीर क्षेत्र को सर्कस बनाकर छोड़ दिया है, शायद एक जोकर भी आपसे कहीं ज्यादा संवेदनशील होगा


कहते हैं कि खबर तो खबर होती है मगर आज प्रशस्ति खबर बन रही है। मीडिया में अब ग्लैमर का राज है और पत्रकारों पर बेशर्म होने का दबाव...हम एक विचित्र युग देख रहे हैं। अपनी माँगों को लेकर धरतीपुत्र किसान नंगे पैर चलकर कई दिनों का सफर तय कर शहर पहुँचते हैं। उनका सम्मान करना तो दूर की बात है, उनको शहरी माओवादी बता दिया जाता है। नंगे और छिले हुए पैर...वाले किसान के खेतों से आपको अन्न मिलता है और आप उसका ही अपमान करते हैं। उसका जायज हक तक नहीं देते। किसान आन्दोलन पर और उसके कारणों को लेकर बहुत बातें हो रही हैं...देश भर में आन्दोलन हो रहे हैं मगर हमारा मीडिया बाथ टब की तहकीकात से बाहर नहीं निकल पा रहा है।
सुन सकते हैं तो इन खामोश आँखों की चीख सुनिए
एक या दो दिन दिन नहीं बल्कि कई – कई दिनों तक आप माया के महिमा गान से निकल नहीं पा रहे हैं और आप खुद को जनता और सच्चाई की आवाज बता रहे हैं। अमिताभ बच्चन का तबीयत खराब होना राष्ट्रीय समस्या बन जाता है और आप पल – पल की खबर दिखाते हैं...। मैं खुद मीडिया में हूँ मगर मीडिया के इस बर्ताव से आहत भी हूँ और हैरान भी हूँ। दो लोगों का नितांत व्यक्तिगत जीवन आपके परदों पर छाया रहता है। आखिर किसी सेलिब्रिटी को भी जरूरत से ज्यादा फुटेज क्यों मिलनी चाहिए? आप खबर दिखाइए मगर खबर को क्या खबर की तरह नहीं दिखाया जाना चाहिए? कोई भी जरूरी मुद्दा आप के लिए बेहद छोटा बन जाता है। आपने श्रीदेवी की मौत से आगे जाकर उनके अंतिम संस्कार तक को महाकवरेज बना डाला। किसी का मरना भी आपके लिए टीआरपी है। अदालतों के पहले आप ट्रायल कर रहे हैं मगर सच तो यह है कि यह कई बार वीभत्सता की हद तक पहुँच रहा है।
इस बाथटब में ही आपने पत्रकारिता को मार डाला
खबरें और परिचर्चा मे किम जोंग और मिसाइल या भारत – पाकिस्तान के अलावा क्या आपके पास दिखाने को कुछ नहीं है। आप इसे दर्शकों की पसन्द कहते हैं मगर ये पसन्द तय कौन करता है....? आपने किसानों की हालत नत्थू जैसी बना डाली है। दाना माझी आपके लिए सेंसेशन है और किसानों के छिले हुए पैर और उनसे निकलता हुआ रक्त वक्त की बर्बादी है। प्रिया प्रकाश की आँखों में उलझे आप किम जोंग तक पहुँचते हैं मगर सीरिया में रक्तपात के शिकार बच्चों पर आपकी नजर नहीं जाती और जाती भी है तो उसे दरकिनार कर दिया जाता है। आप हैं कि श्रीदेवी को फिर जन्म देने में लगे हैं।
क्या इससे भद्दा मजाक किसी की मौत का हो सकता है
क्या संवेदनहीन होना ही सफल पत्रकार की निशानी है? चीखकर दूसरों को चुप करवा देना पत्रकारिता नहीं है। मैंने कई चैनलों पर देखा है और देख रही हूँ कि सत्ताधारी पार्टी का महिमामंडन किया जा रहा है और विपक्ष को जबरन खलनायक बनाने की कोशिश की जा रही है। आप सबकी हरकतों का खामियाजा हम जैसे लोग उठाते हैं क्योंकि एसी कमरे से बाहर सड़कों पर जब पत्रकार निकलते हैं तो मजाक उसका ही उड़ता है और सवाल भी उसी से किये जाते हैं। आप खुद को महान और नीति - निर्णायक समझ सकते हैं मगर आपका यह रवैया पत्रकारिता के लिए घातक है। क्या आपको यह अधिकार है कि आप अपने फायदे के लिए एक गम्भीर क्षेत्र को तमाशा बनाकर छोड़ दें। 
इस वीभत्स तस्वीर को भी उतार लीजिए
आम आदमी ही क्यों एक आम पत्रकार की नजर से भी आप नीचे गिर चुके हैं। आपको क्या लगता है कि लोग समझते नहीं हैं....ये पब्लिक है महोदय...सब जानती है। आपने खबरों की दुनिया को सर्कस बनाकर छोड़ दिया है मगर आम जनता के लिए आपका यह तमाशा किसी जोकर जैसा ही है...इससे ज्यादा कुछ नहीं और आप बस इस तमाशे का हिस्सा भर हैं।

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

भारतीय राजनीति के मुहावरे...खत्म होती गहराई और दम तोड़ता शिष्टाचार


सुषमा त्रिपाठी

नेताजी ने कहा था....तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा। मोहनदास करमचंद गाँधी को देश ने महात्मा कहा और फिर बापू और इसके बाद कहते हैं कि घोर विरोधी होने के बावजूद पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गाँधी को दुर्गा कहा। महात्मा गाँधी से मतभेद होने पर भी सुभाष चन्द्र बोस ने सौजन्यता बरकरार रखी। यहाँ तक कि व्यंग्य और कटाक्ष का शिकार होने पर भी आपसी व्यवहार पर इसका फर्क नहीं पड़ा। भारतीय राजनीति में मुहावरों का इस्तेमाल हमेशा से होता रहा है और साहित्य ने हमेशा राजनीति को नये - नये शब्द दिये हैं जिसका लाभ राजनेताओें को मिला है मगर वक्त बदल गया है तो अब मुहावरे भी बदल रहे हैं। हम इन बदलते मुहावरों की बात ही कर रहे हैं। बीबीसी हिन्दी की एक खबर के बारे पढ़ते हुए पता चला कि इंदिरा गाँधी अपना भाषण तैयार करती थीं, लेकिन उनके सूचना सलाहकार एचवाई शारदा प्रसाद उसे फाइन ट्यून कर देते थे। फिर अलग-अलग विभागों द्वारा अपने-अपने पॉइंट्स भेजने का चलन शुरू हुआ। विश्‍वनाथ प्रताप सिंह ने आरक्षण नीति की घोषणा स्वतंत्रता दिवस के भाषण से की। धीरे-धीरे सरकारी नीतियों की घोषणाएँ इन भाषणों से होने लगीं और आज लगभग हर नेता के भाषणों में गहराई और मुद्दे लगातार गायब होते जा रहे हैं और तंज और आपसी छीछालेदर भर रह गये हैं। कभी सोनिया प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी को मौत का सौदागरकहती हैं तो कभी मोदी शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर को ‘50 करोड़ की गर्लफ्रेंडकह देते हैं। खैर, आप यह कह सकते हैं कि ये बातें पुरानी हो चुकी हैं मगर सच तो यही है कि आज के नेताओं के भाषणों का स्तर गिरता चला जा रहा है। विपक्ष के नेता के लिए शहजादाऔर रईसशब्द का इस्तेमाल भारतीय राजनीति के इतिहास को कौन सी दिशा में ले जायेगा...यह तय करना तो इतिहासकारों के लिए भी बहुत मुश्किल होगा। इसी प्रकार जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स और सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर सैनिकों के खून की दलाली जैसे मुहावरे सौजन्य की कौन सी पारिभाषिक शब्दावली जोड़ रहे हैं, ये शायद राहुल गाँधी को पता नहीं होगा। मुहावरों का स्तर यह है कि अब हमला बोलने के लिए सूट - बूट की सरकारऔर जैकेटका सहारा लिया जाने लगा है। अटल बिहारी वाजपेयी और नेहरू के आपसी सौजन्य के दो उदाहरण हम आपको दे रहे हैं। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष अनंतशायनम अयंगर ने एक बार कहा था कि लोकसभा में अंग्रेज़ी में हीरेन मुखर्जी और हिंदी में अटल बिहारी वाजपेयी से अच्छा वक्ता कोई नहीं है। जब वाजपेयी के एक नज़दीकी दोस्त अप्पा घटाटे ने उन्हें यह बात बताई तो वाजपेयी ने ज़ोर का ठहाका लगाया और बोले, ‘तो फिर बोलने क्यों नहीं देता?’ हालांकि, उस ज़माने में वाजपेयी बैक बेंचर हुआ करते थे लेकिन नेहरू बहुत ध्यान से वाजपेयी द्वारा उठाए गए मुद्दों को सुना करते थे। किंशुक नाग अपनी किताब अटलबिहारी वाजपेयी- ए मैन फ़ॉर ऑल सीज़नमें लिखते हैं कि एक बार नेहरू ने भारत यात्रा पर आए एक ब्रिटिश प्रधानमंत्री से वाजपेयी को मिलवाते हुए कहा था, इनसे मिलिए। ये विपक्ष के उभरते हुए युवा नेता हैं। हमेशा मेरी आलोचना करते हैं लेकिन इनमें मैं भविष्य की बहुत संभावनाएं देखता हूँ।

 वाजपेयी के मन में भी नेहरू के लिए बहुत इज़्ज़त थी। 1977 में जब वाजपेयी विदेश मंत्री के रूप में अपना कार्यभार सँभालने साउथ ब्लॉक के अपने दफ़्तर गए तो उन्होंने नोट किया कि दीवार पर लगा नेहरू का एक चित्र ग़ायब है। किंशुक नाग बताते हैं कि उन्होंने तुरंत अपने सचिव से पूछा कि नेहरू का चित्र कहां है, जो यहां लगा रहता था। उनके अधिकारियों ने ये सोचकर उस चित्र को वहाँ से हटवा दिया था कि इसे देखकर शायद वाजपेयी ख़ुश नहीं होंगे। वाजपेयी ने आदेश दिया कि उस चित्र को वापस लाकर उसी स्थान पर लगाया जाए जहाँ वह पहले लगा हुआ था। कहने को तो राहुल गाँधी भी कहते हैं कि नरेन्द्र मोदी उनके भी प्रधानमंत्री हैं पर सच तो यह है कि क्या आज के इस वातावरण में इस तरह के सौहार्द की कल्पना हम कर सकते हैं? काँग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर के चायवाला सम्बोधन ने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनवा दिया तो नीच संबोधन ने गुजरात काँग्रेस से छीन लिया और अब उनका पाकिस्तान प्रेम काँग्रेस का सिरदर्द बना है। खासकर जम्मू -कश्मीर में महबूबा मुफ्ती और फारुक अब्दुल्ला जैसे नेता तो एक बार भी नहीं सोचते कि उनके बोल किस तरह देश के रक्षकों का मनोबल तोड़ रहे हैं। गुजरात के चुनाव में तो गदहों का भी जिक्र चल गया था मगर देश के शीर्ष पदों पर बैठे नेताओं से थोड़े शिष्टाचार और थोड़ी गरिमा की उम्मीद की जा सकती है मगर आज कोई भी नेता ऐसा नहीं है जो इस पर खरा उतर रहा हो। हाल ही में रेणुका चौधरी जिस तरह से संसद में असमय हँसी थीं, वह अशोभनीय था, उसी प्रकार उस हँसी में रामायणकालीन हँसी खोज लेना भी प्रधानमंत्री की गरिमा के अनुरूप नहीं है। इस लिस्ट में पक्ष - विपक्ष के कई धुरंधर नेताओं के नाम हैं जिनमें साक्षी महाराज से लेकर ओवैसी तक के नाम शामिल हैं मगर हमारा मुद्दा यह है कि क्या वजह है कि नेताओं के भाषण की गहराई खत्म होती जा रही है और उससे भी दुःखद है कि वे इस बारे में सोचने की जहमत तक नहीं उठाते।

 आज के नेताओं का भाषण मुद्दों की जगह तंज से शुरू होता है और एक दूसरे को गालियाँ देने पर खत्म होता है और कई बार स्थिति बद से बदतर हो जाती है और ये सब चुनाव को ध्यान में रखकर हो रहा है। बहरहाल, जब लोकसभा चुनाव आ रहा है तो भारतीय राजनीति के नये मुहावरे और शब्दावलियाँ और भी खतरनाक रूप लेंगी, इसमें सन्देह नहीं मगर सभी नेताओं को याद रखना चाहिए कि ये मुहावरे ही उनका इतिहास बनेंगे और उनकी छवि भी गढ़ेंगे....इसलिए जरूरी है कि इस बारे में पल भर को ही सही विचार करें....वरना इतिहास को नाम धूमिल करते देर नहीं लगती और तैयारी के साथ मसलों को उठाने वाले नेताओं का सूखाभारतीय राजनीति को सालता रहेगा।
(सलाम दुनिया में प्रकाशित आलेख)

बुधवार, 3 जनवरी 2018

अब मेरा लाइब्रेरी कार्ड अधूरा रह जायेगा


ये तस्वीर सर ने साक्षात्कार के समय दी थी
-सुषमा त्रिपाठी

जीवन में आश्वस्ति हो तो संघर्ष आसान हो जाते हैं और पुस्तकालयाध्यक्ष आश्वस्त करने वाला हो तो किताबों तक पहुँचना आसान हो जाता है। जालान पुस्तकालय में वह आश्वस्त करने वाली कुर्सी सूनी हो गयी है...तिवारी सर नहीं हैं वहाँ पर। अब मुझसे कोई नहीं कहेगा कहाँ हो आजकल। दिखायी नहीं पड़ती हो या कार्ड बनवा लिया....आज की दुनिया में ये शब्द बड़े अनमोल है, ऐसी दुनिया में जहाँ किसी के पास किसी के लिए कोई फुरसत नहीं है। मेरे जीवन में लाइब्रेरी का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है...वह मेरी शरणस्थली है और एक ऐसी जगह जहाँ मुझे आश्वस्त करने वाले, सही राह दिखाने वाले लोग मिले हैं....किताबों के बीच से जिन्दगी को जीने का रास्ता निकला है...जालान गर्ल्स कॉलेज में मैंने पास कोर्स किया था और ऑनर्स नहीं होने के कारण एम ए में मेरा दाखिला उस समय नहीं हो पा रहा था इसलिए उन दिनों स्पेशल ऑनर्स करना पड़ता था मगर मुझे कोई जानकारी नहीं थी। होती भी कहाँ से, मेरी दुनिया घर से कॉलेज और कॉलेज से घर तक सीमित थी...मधुलता मैम ने सावित्री गर्ल्स कॉलेज के बारे में बताया मगर किसी कारणवश वहाँ भी मेरा दाखिला नहीं हो पा रहा था...ऐसी स्थिति में श्रीराम तिवारी सर देवदूत बनकर आए और मेरा दाखिला हो गया...तब से लेकर आज तक...सर हमेशा मेरे लिए आदरणीय रहे। कॉलेज के हर आयोजन में उनका सहयोग मिला। तिवारी सर मुझे कभी सिर्फ पुस्तकालयाध्यक्ष लगे ही नहीं, कभी एहसास ही नहीं हुआ कि पुस्तकालय में मैं एक आम लड़की हूँ... कभी कोई औपचारिकता महसूस ही नहीं होने दी उन्होंने और भइया ने। शायद यही वजह है कि परेशान होती हूँ तो सीधे लाइब्रेरी ही जाती हूँ...थोड़ी देर किताबों के बीच रहकर फिर खड़ी हो जाती रही हूँ और किताबों से प्रेम के पीछे यह स्नेह भी सम्बल बना है। हमेशा बेखटके फोन किया या सीधे लाइब्रेरी पहुँच गयी और कभी भी वे नाराज नहीं होते थे। उनका होना पिता की छाँव जैसी आश्वस्ति देता था और लाइब्रेरी एक परिवार की तरह थी जहाँ...नोक झोंक में श्रीमोहन भइया को हम सहेलियाँ परेशान करतीं थीं और कई बार हमारे चक्कर में भइया को तिवारी सर से डाँट पड़ जाती...वे दिन दुर्लभ हैं और तमाम सफलताओं पर भारी हैं...वे जीवन के स्वर्णिम दिन हैं....भइया नियमों का हवाला देते तो तिवारी सर से बोलकर हम ज्यादा किताबें लिया करते...तब जीवन इतना जटिल नहीं था....पत्रकारिता जीवन में व्यस्तता के बावजूद समय निकालकर कुछ मिनटों के लिए ही सही मैं लाइब्रेरी जाती रही हूँ...और वहाँ सर मुझे कुल्हड़ वाली चाय पिलाना नहीं भूलते थे। मेरे लाइब्रेरी कार्ड पर उनके हस्ताक्षर रहते...अब वह लाइब्रेरी कार्ड अधूरा रह जायेगा। सर मेरी खबरें पढ़ते थे और नाम भी खोजते थे...पिता भी तो ऐसे ही होते हैं। पिछले साल जब पुस्तकालयों को लेकर स्टोरी की तो सर का साक्षात्कार लिया था...इसके बाद प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय और बड़ाबाजार के संबंधों पर स्टोरी की तो सर ने फोन करके तारीफ की...तारीफें मिलती हैं मगर सर की तारीफ मेरे लिए बहुत खास है। वह महानगरीय पुस्तकालय परम्परा के स्तम्भ हैं...पुस्तकालय और कोलकाता के इतिहास को लेकर उनके पास जितनी जानकारी थी, उसका कोई विकल्प नहीं है। तिवारी सर का जाना मेरी ही नहीं इस परम्परा की क्षति है जिसकी भरपाई कर पाना आसान नहीं होगा। सर....जहाँ भी रहें....हम सब उनके लिए बच्चे ही थे...बच्चे ही रहेंगे...और वे हमेशा हमारे आस पास हैं..।

मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

हिन्दी मेला...नयी पीढ़ी का मंच और हम सबका ऑक्सीजन



बस एक साल और पूरे 25 साल हो जाएंगे....हिन्दी मेले को। पहली बार आई तो प्रतिभागी के रूप में...सेठ सूरजमल जालान गर्ल्स कॉलेज में स्नातक की छात्रा थी और अब बतौर पत्रकार 15 साल होने जा रहे हैं और 20 साल हो रहे हैं मेले से जुड़े हुए। इन 20 सालों में उतार चढ़ाव भी देखे मगर मेला और मेला परिवार हमेशा साथ रहा। सही है कि आज बहुत से लोग जा चुके हैं मगर मेला कल भी मिलवाता था और आज भी मिलवाता आ रहा है...मेले का तो काम ही यही है। 
हमारे समय की बड़ी चुनौतियाँ भाषा और अपसंस्कृति तो है ही मगर उससे भी बड़ी चुनौती है युवाओं के साथ तमाम पीढ़ी को एक सृजनात्मक तथा संगठनात्मक राह पर लाना...मैं अपनी बात करूँ तो जब मेले में पहली बार आई तो ऐसे मोड़ पर थी जहाँ कोई राह नहीं सूझ रही थी..बहुत कुछ कहना था...बहुत कुछ करना था मगर कुछ भी समझ नहीं आ रहा था...कई बार ऐसे मोड़ भी आये....जहाँ लगा कि हर रास्ता बंद हो चुका है...निराश हुई मगर हारी नहीं तो इसके पीछे यह एक मंच था जिसने साहित्य को किताबों से निकालकर जीवन से जोड़ा। हिन्दी मेला ऐसी जगह है जिसने कभी किसी रिप्लेस नहीं किया, कभी अजनबी नहीं बनाया, कभी किसी को बाँधा नहीं और बगैर भेद भाव के सबकी बातें सुनीं और अपनाया।
मतभेद हुए मगर मनभेद नहीं बल्कि सब एक दूसरे की जरूरत में खड़े रहे...तमाम दिक्कतों और मतभेदों के बावजूद...परिवार इसे ही तो कहते हैं न। पत्रकारिता में जब मैं आयी तो स्पष्ट तौर पर कह सकती हूँ कि साहित्य को बेहद उपेक्षा से देखा जाता था...साहित्यिक विज्ञप्तियों की जगह कचरे के डब्बे में होती थी...साहित्यिक खबरें न के बराबर होती थीं और साहित्य का मतलब कहानियाँ भर होता था। कई बार मुझे कहा जाता कि साहित्य पढ़ने वाले अच्छे पत्रकार नहीं हो सकते क्योंकि वे संवेदनशील होते हैं और संवेदना के लिए अखबारों की खबरों में जगह नहीं होती...जाहिर है कि यह एक भी संघर्ष था। इस पर ये भी सच है कि ऐसे अखबार कम बेहद कम थे। अधिकतर अखबारों और मीडिया के बड़े  वर्ग का सहयोग हिन्दी मेले को मिला है। फिर भी जद्दोजहद और उपेक्षा के बीच पूरा एक दशक गुजरा और ऐसे मे हिन्दी मेला और मिशन मेरा ऑक्सीजन बने रहे और मेरी संवेदना और जीजिविषा अगर जिन्दा भी है तो इसका श्रेय हिन्दी मेले को जाता है। 

 अपनापन ही हिन्दी मेले  की संस्कृति है। आपको यहाँ भले ही तामझाम न मिले...बहुते ज्यादा सुविधाएं भी न मिलें मगर जो लगाव और अपनापन मिलेगा....वह आपको ऑक्सीजन देता है....मुझे भी मिला। हिन्दी मेले ने ऐसा परिवार दिया है जो तमाम शिकवे शिकायतों के बीच आपको एक अपनेपन की मिठास देता है...आपकी सृजनात्मकता को मंच देता है। 

सर, राजेश भइया, ऋतेश भइया....मनोज भइया..ममता.....कितने नाम लूँ.....जगह कम पड़ जाएगी....। एक ऐसी जगह जो अपरिचित को भी परिचित बनाती है....जहाँ छोटे से छोटा और नये से नया व्यक्ति भी अपनी बात रख सकता है और सबसे अच्छी बात कि उसे न सिर्फ सुना जाता है बल्कि जरूरत पड़े तो अपनाया भी जाता है। आज संवेदनशीलता ने मेरी कलम को मजबूत बनाया है क्योंकि वह सोच सकती है...उपेक्षाओं के बीच लड़ने और जीतने की जिद भी हिन्दी मेले से मिली है...अभिव्यक्तिगत स्वतंत्रता युवाओं की ही नहीं सबकी जरूरत है। वो यहाँ मिलती है। 

एक ऐसा उत्सव जो कोलकाता के पूरे साहित्यिक जगत को एक छत के नीचे ला देता है...मरुस्थल में हरीतिमा जैसा है। यहाँ छोटों की बात सुनी जाती है तो बड़ों को भी सम्मान मिलता है... अखबार जब प्रमुखता से मेले की खबरों को स्थान देते हैं तो अजीब सा संतोष मिलता है। मेले ने हर कार्यक्षेत्र को प्रतिभाएं दी हैं और वे हर जगह अपनी छाप छोड़ रहे हैं। पत्रकारिता तो है ही मगर हमारी एक अटूट पहचान य़ह है कि हम हिन्दी मेले से बोल रहे हैं और यह पहचान काफी है। मीडिया और सांस्कृतिक जगत में बगैर मान्यताप्राप्त पत्रकारों के लिए जगह तो है मगर पहचान नहीं...हिन्दी मेले की ओर से दिया जाने वाला पत्रकारिता, शिक्षा और नाट्य सम्मान इस कमी को पूरा करता है। 

लगभग 20 साल तो हो रहे हैं मगर समाज को एक स्वस्थ और संवेदनात्मक वातावरण देना है तो ऐसे एक नहीं कई मेलों की जरूरत है। कम से कम इस मुहिम को मजबूत बनाना समय की ही नहीं हमारी भी जरूरत है....आइए न हाथ बढ़ाएं। जो जा चुके हैं....एक बार फिर लौटें....अपना मेला तो अपना ही है न तो आइए एक बार.....फिर अपनी जड़ों की ओर...