मंगलवार, 7 जनवरी 2020

वैचारिक लोकतन्त्र का मतलब अराजकता का समर्थन नहीं


अचानक ही हर कोई छात्रों के हितों को लेकर सक्रिय हो उठा है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हमला क्या हुआ, सारे देश के बुद्धिजीवी और लेखक एक साथ सक्रिय हो उठे हैं। विश्वविद्यालयों में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए मगर क्या वैचारिक लोकतांत्रिक अधिकारों के नाम पर अराजकता का समर्थन किया जा सकता है। आप जब किसी संस्थान विशेष को लेकर कुछ अधिक ही द्रवित होते हैं तो उस समय अन्य संस्थानों और विद्यार्थियों के साथ अन्याय कर रहे होते हैं....मुझे लगता है कि इस समय देश में यही हो रहा है।
क्या विरोध करने का एक बड़ा कारण यह नहीं है कि इस समय केन्द्र में जो सरकार है, वह आपको फूटी आँखों नहीं सुहाती? यह सर्वविदित सत्य है कि देश के बुद्धिजीवी वर्ग में 80 प्रतिशत वामपन्थ से प्रभावित है। साहित्य से लेकर सिनेमा और इतिहास में इनका दबदबा रहा है, इनके द्वारा गढ़ा गया इतिहास पढ़कर हम बड़े हुए हैं और वैचारिक आत्महीनता से त्रस्त रहे हैं मगर इस समय वामपन्थ को दक्षिण पन्थ से कड़ी चुनौती मिल रही है और हमेशा की तरह विद्यार्थियों को इस्तेमाल किया जा रहा है। जरा सोचिएगा, क्या हर विद्यार्थी आन्दोलन करना चाहता है, नहीं....जेयू और प्रेसिडेंसी से लेकर जेएनयू तक में ऐसे विद्यार्थी हैं जो किसी प्रकार के आन्दोलन से मतलब नहीं रखना चाहते..पढ़ना चाहते हैं मगर उन पर दबाव डालकर उनके सीनियर अपनी रैलियों में ले जाते हैं तो कई बार तो शिक्षकों ने भी अपने हितों के लिए विद्यार्थियों से धरना करवाया है। आखिर हम किस तरह के विद्यार्थियों के समर्थन में हैं...वह...जो संवाद की जगह 56 घंटे तक एक वृद्ध उपकुलपति को अपने कब्जे में रखता है..या वह जिनकी कैद में एक उपकुलपति बीमार हो जाता है,..। तय कीजिए कि आप किसके साथ खड़े हैं...वह छात्र...जो संस्थानों में बमबाजी करते हैं...बोतलें फेंकते हैं...वीसी के कक्ष के सामने कपड़े डालकर विरोध जताते हैं या वे जो अन्र्तर्वस्त्रों में उनकी मेज पर नाचते हैं....आपको किस तरह का प्रदर्शन चाहिए...छात्र राजनीति में हिंसा हमेशा से रही है मगर कभी भी बुद्धिजीवी और कलाकार इस कदर मुखर नहीं हुए...क्योंकि केन्द्र में सरकार किसी की भी हो...सत्ता उनकी ही रही...कौन नहीं जानता कि संस्थानों में किस प्रकार का भाई - भतीजावाद रहा...आप तब खामोश रहे क्योंकि आपकी सत्ता को चुनौती नहीं मिली।
क्या ऐसे ही डरे हुए शिक्षक चाहिए आपको?

आप इसे स्वतन्त्रता कह सकते हैं मगर विश्वविद्यालय परिसर में सिगरेट की राख और ऐतिहासिक शिक्षण संस्थानों में प्रेम केलियाँ करते युगल पूरी अश्लीलता के साथ सामने आते हैं...बाकायदा शराब की बोतलें..और कन्डोम...बरामद होते हैं...तो वह किसी शिक्षण संस्थान का आदर्श स्वरूप नहीं होती मगर आपके मुँह से एक शब्द नहीं निकलता...मगर इनमें से कुछ ऐसे बच्चे हैं जो असहज होते हैं...क्योंकि वे आम घरों से आने वाली लड़कियाँ भी होती हैं। बच्चे सिर्फ इस्तेमाल किये जाते हैं...
याद कीजिए 2010 में एसएफआई समर्थक स्वपन कोले की टीएमसीपी समर्थकों ने किस तरह पीट - पीटकर हत्या की थी...तब क्यों नहीं दिल काँपे आपके?
ये आपकी विचारधारा से अलग हैं इसलिए इनके साथ यही सलूक होना चाहिए? 

भारत में छात्र राजनीति का आरम्भ आज़ादी से लगभग सौ वर्ष पहले अठारह सौ अड़तालीस  में दादा भाई नौरोजी की  “स्टूडेंट सोसाइटी” की स्थापना के साथ हुआ। आज़ादी की लड़ाई में भी छात्र संगठनो ने अहम् भूमिका निभाई थी। वर्तमान में भी भारतीय राजनीति में कई बड़े चहरे हैं जिनकी शुरुआत छात्र राजनीति से हुई है असम के भूतपूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत, अरुण जेटली,लालू प्रसाद यादव आदि भी उसमे शामिल हैं।भारतीय लोकतंत्र में ऐसे कई उदाहरण हैं जिनमे छात्र शक्ति ने सत्ता को अपनी ताक़त दिखाई है और कई सफल आंदोलन किये हैं।जेपी आन्दोलन में भी छात्र संगठनो की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। पर दुर्भाग्यवश वर्तमान छात्र राजनीति से अपना इतिहास दोहराये जाने की आशा करना भी कल्पना से परे की बात है।
आपको ऐसे थके परेशान शिक्षक और प्रशासक चाहिए ?

आजकल की छात्र राजनीति में सभी छात्र-संगठन किसी न किसी राजनीतिक दल की छात्र ईकाई के रूप में कार्य कर रहे हैं जिनका एकमात्र लक्ष्य चुनाव जीतना होता है।ये छात्र संगठन चुनाव जीतने के लिए सारे हथकंडे अपनाते हैं जिनका प्रयोग मुख़्य राजनीतिक दल अपने चुनाव जीतने के लिए करते हैं।देश के अधिकतर छात्र नेता खुद अराजकता फैलाते नज़र आते हैं।राजनीतिक दलों के इशारों पर काम कर अपनी टिकट पक्की करना ही उनका एकमात्र लक्ष्य रहता है।अधिकतर छात्र नेताओं का सम्बन्ध किसी न किसी बड़े नेता से होता है और ये नेता अपने प्रियजनों को छात्र-नेता के रूप में स्थापित कर उनका राजनीतिक भविष्य बनाने के लिए अनैतिक कार्यो का सहारा लेने में कोई गुरेज़ नही करते।
ये सही है?

जिन विद्यार्थियों के पास फीस के पैसे नहीं होते, उनके पास पोस्टर, सिगरेट और शराब के पैसे कहाँ से आते होंगे...यह पूछने की जरूरत नहीं है। छात्र आन्दोलन का इतिहास नया नहीं है...आपातकाल से चला आ रहा है।  1974 में छात्र आन्दोलन आपातकाल के विरोध में शुरू हुआ। इसी दौरान अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और समाजवादी छात्रो ने पहली बार एकसाथ कर छात्र संघर्ष समिति का गठन कर आपातकाल का विरोध किया। जिसके लालू प्रसाद यादव अध्यक्ष चुने गए थे और सुशील कुमार मोदी महासचिव चुने गए थे जो आज बिहार के उप मुख्यमंत्री हैं। आपातकाल के विरोध प्रदर्शन के दौरान बहुत से छात्रों को बेरहमी से पीटा गया और उनको जेल में बंद कर दिया गया था। नेतृत्व विहीन आपातकाल आन्दोलन को नयी उर्जा के लिया जय प्रकाश नारायण को छात्रो द्वारा आमंत्रित किया गया और उसके बाद उन्होंने 'सम्पूर्ण क्रांति' का नारा दिया।

गोपालचंद्र सेन की हत्या
गांधी जब 1930 के दशक में बंगाल का दौरा कर रहे थे तो एक युवक उनके भाषणों से बहुत प्रभावित हुआ। जल्दी ही उसे एक समस्या का अहसास हुआ– गांधी को सुनने को जमा हुए लोग उन्हें ठीक से सुन नहीं पा रहे थे इसलिए उसने गांधी को एक स्वनिर्मित ‘पोर्टेबल स्पीकर’ भेंट किया– महात्मा को बहुत खुशी हुई। यह युवक गोपालचंद्र सेन थे, और उन्होंने अंत तक गांधीवादी जीवन जीया। सेन 1960 के दशक में जादवपुर विश्वविद्यालय के कुलपति बने. ये बंगाल में भारी अशांति का दौर था। खास कर युवाओं के लिए जो कि नक्सल आंदोलन से जुड़ रहे थे। जल्दी ही जादवपुर विश्वविद्यालय राजनीति और आंदोलनों का अखाड़ा बन गया। नक्सल छात्रों ने सेन से परीक्षाएं रद्द करने को कहा। सेन सहमत नहीं हुए। उनका कहना था कि जिन्हें बहिष्कार करना है वो करें पर इच्छुक छात्रों के लिए परीक्षाओं का आयोजन नहीं करना गलत होगा। परीक्षाएं हुईं। छुट्टियां शुरू हो जाने पर सेन ने पास होने का सर्टिफिकेट अपने आवास पर वितरित करने की पेशकश की। इस बीच बंगाल में नक्सलों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई में तेजी आ रही थी। 30 दिसंबर 1970 को सेन अपने आवास की तरफ बढ़ रहे थे।अगले ही दिन वह सेवानिवृत होने वाले थे। शाम के छह बजे का वक्त था और वह एक सहकर्मी की कार में बैठकर जाने के लिए राजी नहीं हुए थे।
विरोध का यह तरीका असहज करता है

परिसर में ठीक पुस्तकालय के सामने सेन की हत्या कर दी गई. किसी को नहीं पता किसने की हत्या, पर इसके पीछे नक्सलियों का हाथ बताया गया। आज उस जगह पर स्थापित स्मारक इतिहास के उस काले अध्याय की याद दिलाता है। पूर्व कुलपति अभिजीत चक्रवर्ती ने 17 सितंबर 2014 की सुबह अपने कार्यालय भवन का घेराव कर रहे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस बुलाने की वजह के रूप में सेन हत्याकांड का ही उल्लेख किया था। तब पुलिस कार्रवाई में बहुत से छात्र घायल हो गए थे।
छात्र दरअसल कैंपस में यौन दुर्व्यवहार की एक घटना पर पर्याप्त कदम नहीं उठाने और निष्क्रियता दिखाने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन का विरोध कर रहे थे। विरोध का तरीका ऐसा कि विश्वविद्यालय में पढ़ाई लगभग 6 माह के लिए ठप हो गयी। विरोध अपनी जगह है मगर क्या इसका तरीका अभद्रता होनी चाहिए? आम तौर पर जेयू का दीक्षांत समारोह 24 दिसम्बर को ही होता है। आज भी दीक्षान्त समारोह स्थल की सजावट पर लगी कालिख, बहिष्कार के नारे और अब डिग्री फाड़ने की घटना....क्या शिक्षण संस्थानों की गरिमा का हनन नहीं है..या तथाकथित फासीवादी ताकतों के विरोध का हर तरीका जायज समझकर इसे भी स्वीकार कर लेंगे आप?
वैचारिक लोकतन्त्र का मतलब क्या होता है...एक बात समझनी है...यही कि गिलानी के समर्थन में नारे लगाए जाएँ....भारत के टुकड़े करने और कश्मीर की आजादी के नारे लगाए जाएँ? वैचारिक लोकतन्त्र का मतलब हर विचारधारा को सुनना और समझना है तो किसी विशेष विचारधारा के होने के कारण अपमानित करने की छूट कैसे और क्यों दी जानी चाहिए...क्या जेयू के विद्यार्थियों ने बाबुल सुप्रियो के साथ जो बदसलूकी की...उसे स्वीकार किया जाना चाहिए या प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और वीसी अनुराधा लोहिया के साथ जो बर्ताव विद्यार्थियों ने किया...आप उसे अपनी सहमति देंगे...क्यों नहीं तब जेएनयू की तरह लोग सामने आए?
इसे स्वीकार करने जा रहे हैं क्या आप ?

इसके पहले 2013 में एसएफआई नेता सुदीप्त गुप्त की मौत हुई थी और तब हुई थी जब प्रदर्शन के बाद पुलिस वैन में उनको ले जा रही थी और बस से गिरकर उनकी मौत हो गयी थी। हालांकि माकपा का दावा रहा है कि उनकी मौत पुलिस हिरासत में हुई...कितने शिक्षक उनके लिए सड़क पर उतरे थे...यह भी सवाल उठता है?
2 साल पहले की बात है। उत्तर दिनाजपुर के इस्लामपुर में द्वारीभिटा हाई स्कूल में बांग्ला शिक्षक की नियुक्ति को की मांग पर करीब 2000 छात्रों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया था। आरोप है कि छात्र पुलिस पर ईट पत्थर आदि फेंक रहे थे। इस बीच पुलिस ने छात्रों पर आंसू गैस के गोले छोड़े, रबड़ की गोलियां चलाई और लाठीचार्ज भी किया लेकिन बाद में मौके पर पहुंचे थाना प्रभारी ने छात्रों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। पुलिस की फायरिंग में राजेश सरकार नाम के 27 साल के एक पूर्व छात्र और तापस बर्मन नाम के एक अन्य छात्र की मौत हो गयी थी। आपमें से कितने लोग सड़क पर उतरे थे....? क्या यह बर्बरता नहीं थी या इन बच्चों की जान की कीमत इसलिए नहीं थी कि ये राजधानी से नहीं बल्कि किसी जिले के सुदूर कस्बे में रहते थे...। तृणमूल का एक नेता जग से प्रहार कर शिक्षिका का सिर फोड़ देता है...तब शिक्षकों का मान खतरे में नहीं पड़ता...चयनित विरोध इस देश में लोकतन्त्र स्थापित नहीं कर सकता...बॉलीवुड के तमाम सितारे जेएनयू पहुँच सकते हैं क्योंकि जो प्रचार उनको जेएनयू देगा...वह इस्लामपुर का स्कूल नहीं दे सकता।
FILE PHOTO OF PROTESTS IN JNU AGAINST THE HANGING OF AFZAL GURU IN 2016https://freepresskashmir.com/2017/12/25/jnu-cancels-srinagar-entrance-examination-centre-its-strategy-allege-kashmiri-students/
ये जेएनयू ही है और साथ में लिंक भी है
तय कीजिए कि आपकी लड़ाई किससे है...आपको केन्द्र से, भाजपा से, संघ के होने से आपत्ति है...घृणा है क्योंकि वे हिंसा फैला रहे हैं....मगर उतनी ही कट्टरता आपके अन्दर भरी है...विद्यार्थियों का दमन सत्ता पक्ष हमेशा से करता आया है मगर आज सत्ता आपके वैचारिक विरोधी के पास है इसलिए आप विरोध कर रहे हैं,..काश कि आप विद्यार्थियों के लिए लड़ते..जिन प्रोफेसरों का वेतन लाखों में है...वह क्या चाहें तो विद्यार्थियों को नि:शुल्क नहीं पढ़ा सकते.? आप खुद से पूछिए कि आप सही मायनों में कितनी बार विद्यार्थियों के लिए उतरे हैं...उनके प्रश्न उठाए हैं...निजी स्कूलों में मोटा वेतन पाने वालों ने कितनी बार अपने संस्थानों में फीस वृद्धि का विरोध किया है ? सबको पता है कि छात्र संगठन के चुनाव वर्चस्व का मामला है, बंगाल के कॉलेजों में होने वाली हिंसा के कारण कितने प्रिंसिपल इस्तीफा दे चुके हैं...यह अराजकता आपकी चिन्ता का कारण क्यों नहीं बनती?

अगर जयचन्द गलत है तो बख्तियार खिलजी भी सही नहीं है...चयनित विरोध के कारण आम जनता साहित्य और साहित्यकारों से दूर हो रही है..सवाल यह है कि अगर आप वैचारिक लोकतन्त्र की वकालत करते हैं तो वह लोकतन्त्र किसी वाद या दल विशेष तक सीमित क्यों है...क्यों कि किसी दल विशेष का होने की वजह से किसी नेता अथवा नेत्री को अपमानित होना चाहिए...आपको दिल्ली की हिंसा दिखती है तो बंगाल की हिंसा क्यों नहीं देखते आप?
आन्दोलन का मतलब अराजकता नहीं होता और साजिशें रचने में कोई छात्र संगठन या नेता पीछे नहीं है...आप शौक से आन्दोलन कीजिए मगर जो विद्यार्थी या शिक्षक अपना काम करना चाहते हैं...उनको खींचने या धमकाकर लाने का लाइसेंस आपको किसने दे दिया.? सिर्फ इसलिए कि आप किसी पार्टा या विचारधारा को पसन्द नहीं करते....आप उनको लेकर फैसला नहीं कर सकते...जो बात एक पक्ष के लिए सही है,,,वह दूसरे पक्ष के लिए गलत नहीं होनी चाहिए और न हो सकती है..।
विद्या विनय देती है...आपने अपने विद्यार्थियों में सिर्फ अहंकार और अकड़ भरी है.....और आप इसे सफलता मानते हैं तो इससे बड़ा दुर्भाग्य कुछ नहीं है। यही अकड़ उनकी समस्याओं की जड़ है...अनुशासनहीन आन्दोलन कभी भी स्वीकार नहीं हो सकता...। सच तो यह है कि संस्थानों में इस तरह की राजनीति और राजनीतिक पार्टियों के लिए जगह होनी ही नहीं चाहिए...और अगर स्वागत करना है तो स्वागत सबका कीजिए। आन्दोलन और अराजकता के फर्क को समझिए और नहीं समझेंगे तो आने वाला इतिहास आपको माफ नहीं करेगा।

शुक्रवार, 17 मई 2019

ध्वज के एक रंग नहीं, तीन रंग चाहिए...एक रंग केसरिया भी है

श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा पर कालिख पोती गयी

इन दिनों बंगाल में लोकतंत्र की हवा बह रही है। हर कोई यहाँ लोकतंत्र का रक्षक बना हुआ है और लोकतंत्र की रक्षा का मतलब है यहाँ पर भगवा को रोकना और भाजपा को न आने देना। इसके लिए लोकतंत्र के तथाकथित समर्थक कुछ भी करने को तैयार हैं, किसी से भी हाथ मिलाने को तैयार हैं और कुछ भी भूलने को तैयार हैं। लोकतंत्र का मतलब होता है कि हर किसी का अधिकार है कि वह भारत के किसी भी राज्य में रहे और जब बात राजनीति की आती है तो हर एक राजनीतिक दल को प्रचार का, जनता तक पहुँचने का और अपनी बात रखने का अधिकार है। एक समय था जब हम वाममोर्चा सरकार की आलोचना इसलिए करते थे कि यह पार्टी हिंसा के बल पर वोट पाती आ रही थी। जब चुनाव प्रचार के समय पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की हत्या हुई सारा देश शोक में डूबा। जब गौरी लंकेश की हत्या हुई...बिलबिलाकर सारे प्रबुद्ध सोशल मीडिया पर टूट पड़े, रोहित वेमुला का शोक अब तक मनाया जा रहा है मगर इस चुनाव में छत्तीसगढ़ और कश्मीर में 2 भाजपा और एक आरएसएस नेता की हत्या कर दी गयी, कहीं कोई सुगबुगाहट तक नहीं हुई। 22 साल के सुदीप्त गुप्त की जान गयी, कोई फर्क नहीं पड़ा। आसिफा के लिए देश आँसू बहाने वाले भूल गये कि इसी राज्य में मध्यमग्राम में एक किशोरी के साथ 2 बार बलात्कार हुआ और प्रताड़ना से तंग आकर उसने जान दे दी, बिहार के रहने वाले टैक्सी चालक पिता ने तो राज्य ही छोड़ दिया...शोर हुआ और सजा भी मिली  मगर राष्ट्रीय मुद्दा नहीं बना...पता है, इन सब का कसूर क्या था....इनका खून हरा नहीं था...।
याद कीजिए कि उस समय खुद ममता बनर्जी केन्द्रीय वाहिनी चाहती थीं और आज जब सरकार इनकी है तो वही केन्द्रीय वाहिनी बाधक है। ये वही ममता बनर्जी हैं जिन्होंने तापसी मलिक की जली हुई लाश की तस्वीरें दिखाकर सहानुभूति की लहर हासिल की थीं, जिन्दा तो जिन्दा, इन्होंने एक बच्ची की मौत का फायदा उठाया।
हमारे महापुरुष किसी एक राज्य या पार्टी के रंग के मोहताज नहीं

ये वहीं ममता बनर्जी हैं जिन्होंने अपने कार्यकाल में हुए पार्क स्ट्रीट बलात्कार कांड को साजानो घटना बताया...और जब एक काबिल अपसर ने इस मामले की तह तक जाकर जाँच की तो उनको पद से हटा दिया...जी हाँ, मैं दमयन्ती सेन की ही बात कह रही हूँ। यूपी, बिहार व झारखंड के लोग इनको कभी नहीं सुहाए, वोट बैंक की मजबूरी न होती तो ये हिन्दीभाषियों को टिकट तक नहीं देतीं और आज हिन्दीभाषियों का एक धड़ा...इनको महामहिम मानने में जुटा है...खैर हिन्दीवालों को तो किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता, बिहार और भोजपुरी के नाम पर दुकानें चलाने वाले भी चुप बैठे हैं..डर से या किसी लालच से...। जो महिला खुद मुख्यमंत्री होकर एक भ्रष्टाचारी पुलिस अधिकारी को बचाने के लिए धरने पर बैठ जाती है...वह लोकतंत्र की रक्षा कैसे करती हैं...ये तो आप ही जानते हैं...हम नहीं जानते।
अनुदान और ओहदा बड़ी चीजें होती हैं। पाठ्यक्रम में इन्द्रधनुष के लिए प्रयुक्त बांग्ला शब्द में राम होने के कारण उसे बदल दिया गया और उसे रंग बना दिया गया...सिंगुर आन्दोलन को तो अब पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया है...। स्थिति यह है कि आज नन्दीग्राम और सिंगुर के लोग खुद कहते हैं कि उनको ठगा गया है मगर अन्धभक्तों को यह बात समझ नहीं आएगी। यदि बंगाल में लोकतंत्र है तो सबको इस बात की आजादी होनी चाहिए कि वह अपने तरीके से अपना जीवन जीए मगर बंगाल में क्या ऐसा है...? कौन सा लोकतंत्र ये इजाजत देता है कि कोई दल किसी राज्य में नहीं आ सकता। जब हर सभा के बाद भाजपा समर्थकों की हत्या कर पेड़ से लटकाया गया तो लोकतंत्र खतरे में नहीं पड़ा। जब मोहम्मद सलीम से लेकर बाबुल सुप्रियो तक की गाड़ी में तोड़फोड़ की गयी...तब भी लोकतंत्र खतरे में नहीं पड़ा। जब श्यामा प्रसाद की मुखर्जी की प्रतिमा को तोड़ा गया और कालिख लगायी गयी तब बंगाली अस्मिता खतरे में नहीं पड़ी थी और न ही बंगाली समाज को फर्क पड़ा था..मगर आज विद्यासागर को बंगाली अस्मिता का प्रतीक बताया जा रहा है जो शायद खुद वे भी नहीं चाहते। इसके पहले भी नेताजी, नेहरु जी की प्रतिमाओं को निशाना इसी बंगाल में बनाया गया मगर त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति के गिरने पर हाहाकार मचाने वालों को यह सब नहीं दिखता। ये लोग तब भी मौन रहे जब टीएमसीपी के गुंडों ने तीन साल पहले सीयू में प्रोफेसरों पर हाथ उठाया और उनके कपड़े फाड़े...मैं खुद उस समय थी वहाँ पर इसलिए ये नजारा मेरी नजर के सामने आज भी आ जाता है। इनके मुँह में तब भी दही जमा रहा जब मी़डियाकर्मियों को इनकी लोकतांत्रिक सरकार ने पिटवाया।   महापुरुषों का सम्मान भी क्या पार्टी का रंग देखकर तय होता है? कहते हैं कि कविगुरु रवीन्द्रनाथ की मानवता ही उनका दर्शन है, ये कौन सा मानवतावाद है जो अभिजात्यता के दम्भ में देश के दूसरे हिस्सों से आए लोगों पर हँसने की इजाजत देता है और उनको निकाल बाहर करने को उकसाता है? आपकी संस्कृति को तब खतरा क्यों नहीं पहुँचा जब प्रेसिडेंसी में वीसी की मेज पर अर्न्तवस्त्र पहनकर विद्यार्थियों ने प्रदर्शन किया...इसमें कौन सी शालीनता नजर आती है..इसका उत्तर तो मुझे हिन्दी समाज से भी चाहिए और भद्रलोक कहे जाने वाले बुद्धिजीवियों से भी। आपकी आत्मा को तब कष्ट क्यों नहीं पहुँचा जब तापस पाल ने खुद को चन्दननगर का माल बताकर विरोधियों के घरों में घुसकर स्त्रियों का बलात्कार कहने की बात कही। आपकी भुजाएँ तब क्यों नहीं फड़कतीं जब अनुब्रत जैसे लोग हिंसा की धमकी नकुलदाना खिलाकर देने की बात कहते हैं? इस राज्य में तो राहुल गाँधी तक का हेलिकॉप्टर नहीं उतरने दिया गया...अमित शाह, मोदी और योगी क्या अब इस राज्य में पासपोर्ट लेकर आएंगे? बंगाल के मनीषी...इस देश का गौरव हैं, अपनी तिजोरियों में बंद करना छोड़िए...आपको यह अधिकार ही नहीं है...और वे आपकी सम्पत्ति नहीं हैं।
नेहरु जी को कैसे भूल गये आप


आखिर क्या कारण है कि हिन्दी माध्यम स्कूलों के बच्चे बांग्ला से अनूदित पाठ्यपुस्तकें पढ़ने को विवश रहे और आपके उदार शिक्षा जगत में किसी को आपत्ति नहीं हुई। कितने शिक्षाविद् और बुद्धिजीवी इसे लेकर जागरुक हुए। अब बात विद्यासागर जी की प्रतिमा की...पहले तो लोकतंत्र में सबको प्रचार का अधिकार है तो फिर अमित शाह से आपको परेशानी क्यों है? अगर आपकी जमीन इतनी पुख्ता है तो एक रोड शो या सभा से आपका क्या बिगड़ने वाला है, वह आते और चले जाते? चलिए मान लिया कि लोकतंत्र में विरोध का भी अधिकार है, काले झंडे दिखाने पर भी आपत्ति नहीं है मगर ये रोड शो की शुरुआत में आपने क्यों नहीं दिखाए...जब वे बंगाल में उतरे तब क्यों नहीं दिखाए..? आखिर हमला किसकी तरफ से हुआ...उकसाया किसने और शाम को 7 बजे इतने विद्यार्थी कॉलेज में या सीयू के पास कर क्या रहे थे...सीसीटीवी डेढ़ माह से खराब है तो बनवाया क्यों नहीं गया...आपने जो जगह चुनी और जो तरीका चुना..वह बताता है कि दाल में काला नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली थी...सब जानते हैं कि विद्यासागर से स्वामी विवेकानन्द का घर बस कुछ कदम की दूरी पर है..दरअसल, आपकी मंशा ही यही थी कि रोड शो के दौरान विरोध के नाम पर कुछ ऐसा करना है कि न सिर्फ इसमें खलल पड़े बल्कि भाजपा को बदनाम भी किया जा सके और आपने यह काम सफलतापूर्वक किया है।
विद्यासागर की मूर्ति पर हमला हर भारतीय पर प्रहार है..जिसने भी किया उसे कड़ी सजा दीजिए मगर इन पर राजनीति करना भी इनका अपमान है और इस समय बंगाल में यही हो रहा है

 उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के जिन गुंडों की बात की जा रही है, अगर वे नहीं होते तो शायद शाह पर हमले की कालिख भी इस राज्य पर लग चुकी होती...मगर प्रतिक्रिया में भी विद्यासागर की प्रतिमा पर हमले और उसे तोड़ने का समर्थन किसी भी रूप में नहीं किया जा सकता...हम नहीं करते....कोई भी पार्टी हो...भाजपा हो या आपके समर्थक...सख्त कार्रवाई होनी चाहिए...चुनाव में जिस तरह खून बह रहा है...उसे देखकर तो सब समझ रहे हैं कि बंगाल में क्लबों को 2 -2 लाख देने का कारण क्या है और वह भी तब, जब आपके ही अनुसार राज्य कर्ज में डूबा है...जनता बेवकूफ नहीं है....उसे बरगलाने की कोशिश मत करिए....जिस तरह तिरंगा आपके हरे रंग के बगैर अधूरा है, वैसे ही वह केसरिया के बगैर भी अधूरा है...धर्मनिरपेक्षता का मतलब ध्वज के एक रंग को खारिज करना नहीं होता, उसे उसके मूल धार्मिक अधिकारों से वंचित करना नहीं होता....। जिस भगवा रंग को आपने आतंक का रंग बनाया है, मत भूलिए कि वह भगवा ही हमारे पूर्वजों का रंग है...राम और कृष्ण ने पहना, महात्मा बुद्ध ने पहना, भगवान महावीर ने पहना,  स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द ने पहना...सच तो यह है कि बंगाल ही नहीं, इस देश की आत्मा के रंग में यह रंग गहराई से शामिल है...आप इसे खारिज नहीं कर सकते..।.

गुरुवार, 25 अप्रैल 2019

मीडिया में हम, कुछ अनुभव, कुछ बातें...जो केवल किस्से नहीं हैं

देश भर की महिला पत्रकार एक दूसरे से जुड़ें..देखें कि हमारी खिड़कियों के बाहर भी एक दुनिया है

चुनौतियाँ सबके सामने होती हैं..चाहे महिला हो या पुरुष...इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में यह फर्क और कम है हिन्दी के अखबारों को इस दायरे से निकलने में वक्त लगेगा। महिलाओं के लिए काम करना आसान नहीं होता..नयी लड़कियाँ भी जिस पृष्ठभूमि से आती हैं, वहाँ समय सीमा की पाबन्दी सबसे बड़ी सीमा है..पहला युद्ध तो यहीं पर है और मीडिया शिक्षा के क्षेत्र की तरह बँधा हुआ कोना नहीं है, यहाँ हम हर तरह के लोगों से मिलते हैं, हर तरह की चीजें देखते हैं। कभी पैदल चलते हैं तो कभी हवाई जहाज में, कभी होटल में जाते हैं तो कहीं फुटपाथ पर अड्डा जमता है..कभी वाई -फाई कनेक्शन तो कभी मोबाइल नेटवर्क तक नहीं मिलता...मध्यमवर्गीय परिवारों से आने वाले बच्चे इस स्थिति के लिए तैयार नहीं रहते, वे तैयार रहते हैं तो अभिभावकों की मंजूरी नहीं मिलती। बहुत सी प्रतिभाशाली लड़कियों ने असमय यह क्षेत्र इसी वजह से छोड़ दिया। मानसिकता बड़ी समस्या है...देर से आने वाले लड़कों से भले सवाल न हों, देर से आने वाली लड़कियाँ तो सन्देह की दृष्टि से देखी ही जाती हैं। इस पर जिसने परिवार की मर्जी के खिलाफ जाकर यह क्षेत्र चुना...वह तो तलवार की धार पर चलती है..एक मानसिक तनाव 24 घंटे रहता है.....इस तनाव से हर महिला मीडियाकर्मी जूझती है। शादीशुदा लड़कियों के सामने समय प्रबन्धन बड़ी समस्या है और बच्चे हुए तो उनको सम्भालना भी एक चुनौती है। हम महिलाओं के अन्दर एक संस्कारजनित जड़ता है...सच यह है कि हमें एडजस्ट करने में दिक्कत होती है और हमें कोई सही रास्ता बताने वाला नहीं होता..एक बेहद आर्थिक जरूरतमंद लड़की के लिए ग्लैमर की चकाचौंध बड़ी चीज होती है मगर उसे उन चुनौतियों का अहसास नहीं होता जो इस क्षेत्र में हैं। सन्मार्ग को इस बात का श्रेय जरूर जाता है कि हिन्दी अखबारों में लड़कियों को बहुतायत से लाया गया मगर यह भी सच है कि इनमें से बहुत सी लड़कियों का सफर कुन्द हुआ। हम एक दूसरे से मुकाबला करती रहीं...एक दूसरे से असुरक्षित रहीं और इसका फायदा भी उठाने वालों ने खूब उठाया। इस प्रोत्साहन में जो पक्षपात रहा, उसने असन्तोष बढ़ाया और इससे मीडिया में महिलाओं को लेकर सन्देह बढ़ा। विडम्बना यह है कि हम लड़कियों ने ही दूसरी लड़कियों को कमजोर किया, उनका रास्ता रोका...और अन्त में धकेल दिये गये..। लड़कियों को आगे बढ़ाने के नाम पर लड़कों को पीछे रखने का नतीजा यह हुआ कि पुरुष पत्रकारों में प्रतिस्पर्द्धा बढ़ी..हम एक दूसरे के शत्रु नहीं हैं...। हम मीडियाकर्मी एक दूसरे से प्रतियोगिता करके कभी आगे नहीं बढ़ सकते..हमें एक दूसरे का हाथ आगे बढ़ना होगा। लम्बे अरसे से बहुत से लोग काम करते रहे हैं जिनको देखकर सीखा है..माधवी दी, वनिता दी, भारती दी, आफरीन दी, मधुछन्दा दी ऐसी तमाम महिला पत्रकार हैं जिनके अनुभवों का लाभ अब नयी पीढ़ी को मिलना चाहिए। पत्रकारिता के क्षेत्र में सन्मार्ग, प्रभात खबर, ताजा खबर और सलाम दुनिया में अच्छे -बुरे अनुभवों के बीच कई ऐसे लोग रहे जिन्होंने पक्षपात नहीं किया और वह आज भी बोलते हैं। मौका भले ही सन्मार्ग में सुरेन्द्र सर ने दिया मगर प्रोत्साहन हमेशा आनन्द भइया, ओझा भइया, गोपाल भइया, लोकनाथ भइया, रवीन्द्र भइया, अनिल राय भइया और रामकेश भइया से अधिक मिला। जिन्दगी आगे बढ़ चुकी है..। पांडेय सर और प्रसाद सर से भी स्नेह मिला..। मैं ऐसी पत्रकार रही जिसने कभी विभाग में बँधकर काम करना पसन्द नहीं किया और न ही किया...इसलिए मेरे सामने मुश्किलें भी बहुत रहीं मगर इन मुश्किलों ने मजबूत ही बनाया है। कई बार जरूरी मौकों पर बड़ों की चुप्पी खली और कई बार उनका व्यवहार समझ में नहीं आया मगर यह भी अनुभव का एक हिस्सा है..। अगर पत्रकारिता को बेहतर बनाना है तो हमारे अन्दर प्रतिरोध की क्षमता होनी चाहिए...और वरिष्ठों को आगे आना चाहिए..। विश्वम्भर नेवर सर से मैंने जमीन पर रहना सीखा है और यह कि व्यवहार बड़ी चीज है। सलाम दुनिया के सम्पादक सन्तोष सिंह से सीखने वाली बात यह है कि दिमाग शान्त रखकर ही मजबूत फैसले लिए जा सकते हैं और टीम वर्क बड़ी चीज है। आज मैं कह सकती हूँ कि काम करने का जितना शानदार माहौल सलाम दुनिया में है, वह अपनी नजर में मैंने और कहीं नहीं देखा..। मेरे कॅरियर के जो 5 साल यहाँ पर गुजरे हैं..उसने यह बात प्रमाणित की है कि अवसर मिले और अपने सपनों को जीने का मौका मिले तो भी कोई पत्रकार अपने हाउस के प्रति ईमानदारी से काम कर सकता है। आज के नये पत्रकारों में बहुत से युवा होनहार हैं और उनको आगे बढ़ने में पूरी मदद की जानी चाहिए। लड़कियाँ अपने सपनों को बड़े आराम से छोड़ने के लिए तैयार हो जाती हैं...निराशा होती है।
अधिकतर हाउस महिलाओं को समय पर छोड़ते हैं..नाइट करने की जिम्मेदारी न के बराबर है और है तो परिवहन की सुविधा नहीं है....पूरा शेड्यूल गड़बड़ हो जाता है। इसकी वजह भी है। लड़कियों पर घर - बाहर की जिम्मेदारी है और हिन्दीभाषी परिवार इतने खुले विचारवाले नहीं हैं इसलिए नाइट करना एक समस्या है मगर इससे लड़कियों के उत्साह, जोश और जुनून पर कोई फर्क नहीं पड़ा। जरूरी है कि हम युवाओं को मौका दें।
मुझे लगता है कि समय आ गया है कि कोलकाता प्रेस क्लब को एक अलग से महिलाओं के लिए विंग बनानी चाहिए और उसमें मान्यता की शर्त को दरकिनार करना चाहिए क्योंकि अधिकतर महिला पत्रकारों के पास सरकारी मान्यता वाला कार्ड नहीं है..मेरे पास भी नहीं है और अब मुझे लगता है कि इसकी जरूरत भी नहीं है...। मैं जब आयी थी तो इन्टरनेट नहीं था, फैक्स की मशीनें थीं...कम्प्यूटर की जानकारी नहीं थी मगर यह सब आज है और मैंने भी थोड़ा -बहुत तो सीखा ही है...आज एक वेबपत्रिका चला लेना और दो किताबें लिख लेना...यह सब इसी वजह से सम्भव हुआ है...सीखते रहने की जरूरत है क्योंकि जानकारी कभी पुरानी नहीं होती। अभिभावकों को अपनी बेटियों पर भरोसा करना होगा...क्योंकि परिवार का साथ उसकी शक्ति ही नहीं बढ़ाता बल्कि आवाज को मजबूती भी देता है..आपको शक्ति बनना चाहिए...कमजोरी नहीं।
बहुत तकलीफ होती है जब काम न मिलने के कारण या किसी और कारण से हमारा कोई पत्रकार साथी शहर छोड़कर दिल्ली का रुख करता है। खासकर उमेश और पूर्णिमा का जाना बहुत अखरा..अभी भी राजेश, विनय, दीपक जैसे युवा पत्रकार अच्छा काम कर रहे हैं और कुछ ऐसे युवा हैं जिनको माँजने की जिम्मेदारी उठायी जाए..ये वह लोग हैं जिनको मैं देख रही हूँ..सूची में और भी युवा शामिल हो सकते हैं।
अपने शहर में पत्रकारिता को मजबूती देने के लिए साझा प्रयास हों

एक बात तो तय है कि हिन्दी पत्रकारिता को मजबूत करने के लिए या फिर पत्रकारों के हितों की सुरक्षा के लिए कोई बाहर से नहीं आने वाला है। ऐसे में कितना अच्छा हो कि मीडिया के नामों से ऊपर उठकर, छोटे - बड़े का भेद भूलकर ऐसा कोई मंच हो जो हिन्दी पत्रकारिता के लिए काम करे..व्याख्यान हो, बाहर से लोग आएं, विचारों का आदान -प्रदान हो, एक हाउस का कोई वरिष्ठ पत्रकार दूसरे हाउस में जाकर प्रशिक्षण दे, अनुभव साझा करे। लड़कियों के लिए शक्ति के माध्यम से पिछले 4 सालों में हम बहुत सी महिला मीडियाकर्मियों को साथ ला सके हैं मगर अब वक्त है कि हम इसे आगे बढ़ाएं। मुझे पता है कि आज के दौर में जो हालात हैं, मेरी यह बात बहुत लोगों को गप या चुटकुला लग रही होगा। मगर कोई भी बदलाव पहले चुटकुला ही कहा जाता है। कम से कम हाल ही में प्रेस क्लब ने तीन दिवसीय कार्यशाला आयोजित कर एक उम्मीद तो जगायी है मगर क्या हर बात के लिए निर्भर रहना जरूरी है। ऐसे आयोजन हर महीने नहीं हो सकते मगर 3 -4 महीने या 6 महीने में तो हो ही सकते हैं। अगर मेरे वरिष्ठ पत्रकार इस बाबत कदम बढ़ाएं तो बहुत कुछ सही हो सकता है।
आज बबीता, स्वीटी, अनु, निधि, मौमिता जैसी लड़कियाँ बेहद खूबसूरती से अपने हिस्से का काम सम्भाल रही हैं...बस इतनी इच्छा है कि ये लगातार ऐसी ही बढ़ती रहें क्योंकि इनके बढ़ने में ही महिला मीडियाकर्मियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना है...गुजारिश है बहनों...यह क्षेत्र मत छोड़ना...एक पत्रकार के पीछे हटने का मतलब है कि कई सपनों का पीछे हट जाना। यह एक मिथक है कि रिपोर्टिंग ही पत्रकारिता है..इस मिथक को तोड़ना बहुत जरूरी है तभी हमारा हस्तक्षेप बढ़ेगा...क्योंकि नियन्त्रण सह सम्पादन में हैं। आप जब काम करेंगी तो मीडिया में महिलाओं के प्रति नजरिया बदलेगा...क्योंकि आप जैसे देखेंगी..वैसे कई बार कोई और नहीं देख सकता...हमें कोई जरूरत नहीं है कि हम लड़कों से प्रतियोगिता करें या उन पर बेवजह ध्यान दें...क्योंकि फील्ड में हम लड़का या लड़की देखकर काम नहीं करते...बड़े से बड़ा पत्रकार फील्ड में आपका सहकर्मी ही होता है। रिपोर्टिंग पत्रकारिता का बुनियादी हिस्सा है मगर आप इसी में सीमित रहीं तो हिन्दी अखबारों में महिला सम्पादक का सपना अधूरा रह जायेगा। रिपोर्टिंग के बाद कैमरा, डेस्क, पेज मेकिंग और विज्ञापन से लेकर विपणन में भी लड़कियों की जरूरत है..। पेज मेकिंग में मैंने अब तक एकमात्र रेखा दी को देखा है। बंगाल में एक भी हिन्दीभाषी लड़की के हाथ में कैमरा नहीं देखा...। राजस्थान पत्रिका की कमलजीत को छोड़कर मार्केटिंग में और कोई हिन्दीभाषी लड़की नहीं दिखती...ऐसे कैसे कुछ भी बदलेगा...? मेरी आँखों में अब भी एक सपना तैर रहा है, किसी हिन्दी मीडिया या अखबार में किसी महिला को इस शहर में बतौर सम्पादक देखने का..जिसके ऊपर कोई ठप्पा न हो और वह पूरी मजबूती से अपने दम पर खड़ी हो और दूसरों को खड़ा करे।
यह सब वह जगहें हैं जहाँ पर हमें काम करने की जरूरत है और यह बदलाव सिर्फ आपके हाथों में है। यही कारण है कि अब मेरा पूरा ध्यान सम्पादन पर है मगर इसका मतलब यह नहीं है कि मैंने रिपोर्टिंग छोड़ दी है मगर फोकस जरूर बदला है...यह वह जगह है जहाँ से हम हस्तक्षेप कर सकते हैं...यहाँ मेरी पत्रकार बहनों को ध्यान देना चाहिए।
हमारा समय कुछ और रहा और आने वाला समय कुछ और है...बस इतनी गुजारिश है कि जब भी आप कदम रखें, मजबूती के साथ रखें...यह जगह उतनी बुरी भी नहीं है मगर हम और आप इसे और अच्छा बना सकते हैं...।

रविवार, 17 फ़रवरी 2019

अभिजात्यता के कवच से बाहर निकलिए...रोशनी दूर तक फैली है




हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता का सम्मेलन समाप्त हो गया है। 18 साल के बाद इस तरह का आयोजन निश्चित रूप से एक अच्छी पहल है मगर इन दो दिनों में मुझे समझ में आ गया कि आज की साहित्यिक पत्रकारिता की लोकप्रियता कम क्यों हो रही है, (अगर वाकई ऐसा है)। जब से कॉलेज में गयी, विश्वविद्यालय पहुँची और पिछले 15 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में हूँ...एक ही राग सुनती आ रही हूँ...बड़ा संकट हैं, पत्रिकाएं सिमट रही हैं, लोग पढ़ना नहीं चाहते..अभिव्यक्ति का संकट है...मीडिया में साहित्य का परिदृश्य सिकुड़ रहा है..सरकार आजादी छीन रही है....और मजे की बात यह है कि ये राग अलापते हुए जो शोधार्थी थे, आज प्रोफेसर और देश के दिग्गज विद्वानों में शुमार हैं...अच्छा -खासा बैंक बैलेंस है...गाड़ी है, शोहरत है और सम्मान भी है...मगर सालों बाद भी कुछ नहीं बदला...क्योंकि ये बदलाव को देखना ही नहीं चाहते..या इनकी नजर में बदलाव सिर्फ उतना है जो उनकी दृष्टि को स्वीकार है। याद रहे कि सरकार अब भाजपा की है, ये रुदन मार्क्सवादियों के जमाने से चला आ रहा है। तब समझ में नहीं आता था मगर आज चीजों को समझ रही हूँ तो बतौर पत्रकार इन सारे आरोपों पर घोर आपत्ति है। मजे की बात यह है कि जिन साहित्यकारों के नाम पर उपेक्षा का रोना रो रहे हैं, आपने भी उनके लिए क्या किया? आप सरकार से बात नहीं करेंगे क्योंकि यह आपकी शान के खिलाफ है..और यह साहित्य का काम नहीं है आपकी नजर में....साहित्य का स्थान ऊँचा है और इतना ऊँचा हो गया है कि जमीन पर कदम रखने में उसे परेशानी होने लगी है। इतना याद रखना चाहिए कि निराला, प्रसाद या नागार्जुन से लेकर प्रेमचन्द समेत तमाम कवियों को किसी साहित्यिक पत्रिका के सम्पादक ने महान नहीं बनाया। ये सब महान बने क्योंकि इनको जनता ने अपनाया और जब जनता ने अपनाया तब जाकर आलोचकों और आप जैसे दिग्गजों ने इनको पूजा। इन सभी ने पहले आम आदमी की तकलीफों को जीया, भोगा, सरकार के प्रति इनका विद्रोह जन मन की अभिव्यक्ति था क्योंकि इन जैसा हर साहित्यकार जनता के बीच रहा। आटा, नमक और तेल की चिन्ता ने इनके साहित्य को कमतर नहीं बनाया। आज के अधिकतर सम्पादकों में जनता तक जाने की इच्छा ही नहीं है और न ही वे कोशिश करते हैं। आपको रेडिमेड वातावरण चाहिए और रेडिमेड पाठक से लेकर लोकप्रियता भी रेडिमेड चाहिए। आपका संघर्ष पत्रिका निकालने तक सीमित है..मगर कहानी, आलेख और कविता से इतर आपकी पत्रिकाएं किस सरोकार से जुड़ती हैं। आप किसानों पर बात करते हैं, किसानों के प्रति नीतियों को लेकर सरकार को कोसते हैं मगर कृषि सम्बन्धित एक भी आलेख या एक भी कार्यशाला या उससे सम्बन्धित जानकारी आपकी पत्रिकाओं में नहीं रहती..आप पत्रिका के कार्यालय में उन पर बात करते हैं जबकि जरूरत तो एक किसान तक जाने की है। किसानों की आत्महत्या का रोना बहुत रोया जाता है, कितने लेखक और सम्पादक किसानों की मदद करने पहुँचे? आपको शिकायत है कि युवा साहित्य नहीं पढ़ रहे, भाषा उनकी सही नहीं है, कितनी पत्रिकाओं ने शिक्षण संस्थानों तक ये प्रस्ताव रखा कि वे विद्यार्थियों तक जाएंगे और उनको भाषा व व्याकरण का ज्ञान देंगे...उनको साहित्यकारों से सम्बन्धित जगहें दिखाएंगे? अव्वल तो हर सम्पादक कह देगा कि यह साहित्यिक पत्रकारिता का काम ही नहीं है, इस पर वह कोशिश करेगा तो उसके दरवाजे शहरों के पॉश स्कूल, कॉलेजों या निजी शिक्षण संस्थानों के लिए खुलते हैं। हकीकत यह है कि किसी साधारण स्कूल का शिक्षक उसकी दृष्टि में कोई मायने नहीं रखता है। आप युवाओं की बात करते हैं मगर आपके लेखन में न तो युवाओं के मुद्दे हैं और न उनके लिए किसी तरह की व्यावहारिक जमीन पर उतर सकने वाली कोई पहल। अगर आप संगठन या पत्रिका से जुड़े हैं तो जरूर अपने विद्यार्थियों को इमोशनली ब्लैकमेल कर अपनी सभाओं में ले जाते हैं। भला हो यूजीसी का जिसने प्रमाणपत्र का जिसकी वजह से बच्चे आज लिख रहे हैं। आपको रेडिमेड लेखक चाहिए जो गलतियाँ न करें मगर आप युवाओं को तराशने के लिए तैयार नहीं हैं, उन पर परिश्रम नहीं करना चाहते इसलिए नए लेखकों और नए बच्चों के लिए तक आप तक पहुँच पाना ही बड़ी उपलब्धि है।
आज का मीडिया अगर टीआरपी से चल रहा है तो आप भी विवादों का सहारा लेकर और कई बार उसे गढ़कर टीआरपी चाहते हैं। ऐसा हाल ही में विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के मामले में हुआ, भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार को लेकर हुआ, जागरण संवादी को लेकर हुआ..साहित्य की इमेज आपके लिए मायने नहीं रखती। हर गलत चीज का बहिष्कार करने वाले आयोजक ऐसे विवाद खड़े करने वाले सम्पादकों का बहिष्कार कभी नहीं करते। वो बाकायदा सम्मानित अतिथि के रूप में आपके मंच पर उपस्थित हैं, आप दूसरों को क्या आदर्श सिखाएंगे और बच्चे आपसे क्या सीखेंगे। आप शोषण के खिलाफ लिखते हैं और अधिकांश साहित्यिक पत्रिकाएं अवैतनिक कार्यकर्ताओं के भरोसे चल रही हैं, क्या ये शोषण नहीं है? आप चाहते हैं कि लोग आपकी पत्रिका खरीदकर पढ़ें मगर आपकी इच्छा है कि लेखक अपनी किताबें बाकायदा डाक से अपने खर्च तक आप तक पहुँचाएं, क्या ये दोहरापन नहीं है? आज क्यों युवाओं से नहीं लिखवाया जा रहा है, अगर आपको मैथिलीशरण गुप्त चाहिए तो पहले महावीर प्रसाद द्विवेदी तो बनिए। साहित्य में कोई वाद नहीं होना चाहिए, अगर साहित्य समावेशी है तो वहाँ खेमेबाजी का क्या काम, मगर सम्पादकों में खेमेबाजी है, वामपंथ, दक्षिणपंथ और एक दूसरे को खारिज करने की प्रवृत्ति भी है तो आप कौन सी स्वायत्तता सिखा रहे हैं जब आपके अन्दर अपने से भिन्न मत वालों को स्वीकार करने और उनको सुनने की शक्ति नहीं है।
अपनी पत्रिका जनता तक पहुँचाने के लिए आप संघर्ष करते हैं,समझौते भी करते हैं तो आप आम मीडिया से अलग कैसे हैं..जबकि आप भी वही कर रहे हैं। अब बात जब मीडिया की है तो आपको पता होना चाहिए कि जो अभिजात्यता बोध और  उसका अहं साहित्यिक पत्रकारिता में चल सकता है, मीडिया में उसके लिए कोई जगह नहीं है। हम पत्रकार जरूरत पड़ने पर झोपड़ों से लेकर फुटपाथ तक पर भी काम कर सकते हैं और मुझे नहीं लगता कि किसी भी सम्पादक को इसमें शर्म आती होगी। साहित्यिक पत्रकारिता में खर्च वह नहीं है जो किसी आम मीडिया में है। हम लेखकों और प्रकाशकों तक, संस्थाओं तक और कई बार शिक्षण संस्थानों से लेकर साहित्यिक पत्रिकाओं तक जाते हैं। कुछ एक संस्थाओं को छोड़ दूँ तो याद नहीं आता कि किसी उपरोक्त माध्यमों के किसी भी प्रतिनिधि ने कोई इच्छा जतायी हो कि वह किताबों से इतर व्यावहारिक स्तर पर कुछ करना चाहता है। सच तो यह है कि सबकी नजर बड़े संचार माध्यमों और बड़े अखबारों पर रहती है, वे छोटे संचार माध्यमों से जुड़ना पसन्द नहीं करते और न ही किसी बड़े अखबार से अपने रिश्ते बिगाड़ना चाहते हैं। सम्पादकों में यह समझौतावादी रवैया ही मीडिया में साम्राज्यवाद का पोषक है। ऐसे में आप सभी अखबारों को दोष नहीं दे सकते और न आपको देना चाहिए। अगर छोटे स्तर पर कोई काम कर रहा हो तो भी 2 -3 रुपए का अखबार खरीदना आपको अपने पैसे की बर्बादी लगता है और आप चाहते हैं कि कोई आपकी 15 से 200 रुपए आपकी पत्रिका पर खर्च करे और वह भी विवाद और कुछ कहानियाँ पढ़ने के लिए..साहब ऐसा नहीं होता। आपकी नजर में जनसत्ता ही अखबार हैं और आप तमाम आकलन उसे आधार मानकर करते हैं तो आपका आकलन अधूरा भी है और एकांगी भी है। दुनिया सिर्फ बड़े अखबारों तक नहीं है।
हकीकत यह है कि आज साहित्य जनता तक जा रहा है तो उसी मीडिया के कारण जा रहा है जिसे आप गालियाँ देते नहीं थकते। हम साहित्य को हिस्सा बना सकते हैं मगर हमारे सरोकार आपकी तरह सीमित नहीं है, हमारी दुनिया आपकी तरह छोटी नहीं है। हमारे लिए संगोष्ठी जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण नल में पानी न आने से परेशान लोग हैं, कक्षाओं में टूटी बेंच है, पुलवामा के शहीद हैं, और सोने का भाव है, जाहिर है कि जगह की कमी तो होगी और इस स्थानाभाव के बावजूद हम आपके कार्यक्रमों, आपकी गतिविधियों, प्रयासों, समीक्षाओं को जगह देते हैं। आपके लिए विज्ञापन महत्व नहीं रखते मगर मीडिया में पत्रकारों से लेकर ग्रुप डी के स्टाफ व हॉकर तक को रोजगार मिलता है...उसके लिए वेतन की जरूरत पड़ती है, हमारे लिए साहित्य एक हिस्सा है, अनिवार्य हिस्सा है..हमारे लिए जनता ही सबसे बड़ा साहित्य है। आपको किसी रिक्शे वाले या पान विक्रेता को पत्रिका पढ़वाने में शर्म आती होगी, हमें नहीं आती...हर घर - घर तक जाते हैं, किताबें पढ़वाते हैं, अपने अंक पढ़वाते हैं, उनकी समस्याओं को सामने रखते हैं, डंडे खाते हैं, तब जाकर हमें वह सम्मान मिलता है। एक लेखक की हत्या हो गयी तो आपने अवार्ड वापसी शुरू कर दी मगर न जाने कितने पत्रकार पिटते और मारे जाते हैं, कई भूखे रह जाते हैं...वह आपके साहित्य के लिए अछूत हैं। आपके तमाम आयोजनों की सफलता में मीडिया का बड़ा योगदान है और एक लम्बी यात्रा तय करने में भी। आप  पत्रकारों  की मुश्किलों पर बात नहीं करते क्योंकि उनमें आपकी तरह अभिजात्यता नहीं है...वह साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता का हिस्सा नहीं है..तो यह दूरी आपने बनायी है, हमने नहीं।

हर पत्रिका व माध्यम में साहित्य है और बाकायदा साहित्यिक महोत्सव भी हैं मगर आप उसे देखना नहीं चाहते। आजतक में साहित्य है, समीक्षाएं, कई दिग्गज लेखक लिखते हैं, अमर उजाला काव्य है। कोलकाता में सलाम दुनिया में 2 दिन, रविवार और बुधवार को साहित्य परिशिष्ट निकलता है, जागरण में सप्तरंग है। प्रभात खबर से लेकर वेबदुनिया तक के साहित्यिक परिशिष्ट हैं मगर आपको साहित्य नहीं दिखता। अखबारों में हर दिन साहित्यिक गतिविधियों की खबरें छपती हैं। आप खुद नियमित तौर पर खबरें भेजते हैं मगर आपको साहित्य नहीं दिखता। कई शहरों में तो रोज कला और साहित्य का एक पेज निकलता है और ये तो मैंने भोपाल में देखा है। बाकायदा साहित्य और कला के संवाददाता हैं, छपते -छपते पिछले 30 साल से सैकड़ों पन्नों का साहित्य विशेषांक निकाल रहा है। हर अखबार की पत्रिका में साहित्य है। जागरण और आजतक से लेकर तमाम बड़े - छोटे अखबार तो साहित्यिक आयोजन करते हैं। नाटकों की समीक्षाएं भी छपती हैं। इंडिया टुडे से लेकर आउट लुक जैसी पत्रिकाओं में भी साहित्य के लिए पन्ने सुरक्षित हैं। इंडिया टुडे के साहित्यिक विशेषांक तो इतने बेस्ट सेलर रहे कि वे खत्म भी हो गये। जागरण संवादी, आजतक साहित्य, अमर उजाला का आयोजन तो बस उदाहरण हैं। एबीपी न्यूज ने बाकायदा साहित्यकारों पर तर्पण नामक श्रृंखला चलायी। आपको रवीश कुमार एनडीटीवी पर केदारनाथ सिंह नहीं दिखते। संसद में धूमिल और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना पढ़े जाते नहीं दिखते। आपको उनकी मौजूदगी की खुशी नहीं बल्कि नेताओं के मुँह से सुनने का अफसोस है, नेता क्या किसी और समाज से आते हैं? हम यह नहीं कहते कि मीडिया में सब कुछ अच्छा है मगर सब कुछ इतना बुरा भी नहीं है कि आप इससे जुड़ न सकें..जनता इतनी कमतर नहीं कि आप उसे अपनी यात्रा में शामिल करने से परहेज करें।
हम पत्रकार ही साहित्य को जनता तक ले जा रहे हैं और ले जाएंगे..तब तक ले जाएंगे क्योंकि किताबें और साहित्य किसी की सम्पत्ति नहीं है जो एक कमरे में कैद रहे, वह जनता की धरोहर है, जनता तक जाएगी, जरूर जाएगी।
सच तो यह है कि अन्धेरे को आपने अपना कवच बना लिया है। यही अन्धेरा और आपकी इसी अभिजात्यता का गौरव बोध आपको विशिष्ट बनाता है, आप अपने सम्पादक होने का अहं छो़ड़ नहीं पाते और इसलिए जो अच्छा है, उसे न तो देख पाते हैं और न ही देखना चाहते हैं...अगर यही आपका सत्य है तो...आपके प्रमाणपत्र की जरूरत किसी को नहीं है। आप अगर किसी से ईमानदारी से नहीं जुड़ते, उसका कृतित्व स्वीकार नहीं करते तो आप किसी मायने में आम मीडिया से बेहतर नहीं है।
हम आपको खारिज करते हैं।

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2019

पुलवामा : आपसी द्वेष और टीआरपी का मोह छोड़कर एक साथ खड़े होने का वक्त है ये


पुलवामा में इस कदर आतंकी हमला हुआ कि शहीद हुए 40 से अधिक जवानों के शव क्षत-विक्षत हो गए। उरी के बाद पुलवामा, हमारे सैनिकों ने शहादत दी..हम शहीद कहते जरूर हैं मगर सच तो यह है कि यह एक नृशंस हत्या है..एक कायराना हरकत। होना तो यह चाहिए कि हम एक साथ इस हमले के खिलाफ खड़े होते मगर ऐसी दुःखद और मार्मिक घड़ी में भी हम दो धड़ों में बँटे हैं। यह सही है कि सुरक्षा में चूक हुई है मगर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इसके पीछे वह लोग भी हैं जो इस देश में रहते जरूर हैं मगर उनकी आत्म पाकिस्तान में गिरवी रखी है। आश्चर्यजनक तरीके से अब भी नवजोत सिंह सिद्धू बातचीत को लेकर दलीलें दे रहे हैं और महबूबा मुफ्ती व फारुक अब्दुल्ला जैसे नेता अब भी सर्जिकल स्ट्राइक और सेना की कार्रवाई की निन्दा करने में लगे हैं..। आखिर देश का बुद्धिजीवी वर्ग कब तक आतंकियों के मानवाधिकार का ढोल पीटता रहेगा..क्या किसी सैनिक का मानवाधिकार नहीं है या वह मानव ही नहीं है। आखिर हम क्यों इतने संवेदनहीन हो गए हैं...? इस बात की पूरी आशंका है कि इसमें स्थानीय लोगों के साथ नेताओं का भी हाथ है, सब जानते हैं कि महबूबा मुफ्ती से लेकर फारुक अब्दुल्ला की सरकार सेना और सैनिकों के साथ किस तरह का व्यवहार करते हैं...आखिर जब कश्मीर जब भारत का हिस्सा है तो वहाँ के लिए अलग कानून क्यों है अब तक। हम क्यों इतनी सुविधाएं दे रहे हैं, ऐसे नेताओं को...इनकी सुरक्षा के पीछे क्यों अपने जवानों की जान दाँव पर लगा रहे हैं। यह वक्त है कि देश से अलग - थलग पड़े कश्मीर को देश की मुख्य धारा में लाया जाए..ऐसे नेताओं पर नकेल कसी जाए जो आतंकियों के प्रति हमदर्दी रखते हैं..और पाकिस्तानपरस्तों से सरकार सारी सुविधाएं और सुरक्षा छीन ले। यह तब होगा जब हम सब मिलकर इनका हर जगह से बहिष्कार करें...अगर कश्मीर में किसी और राज्य के लोग नहीं रह सकते, जमीनें नहीं खरीद सकते तो कश्मीरियों को भी इस देश के किसी हिस्से में जमीनें नहीं मिलनी चाहिए। हम जिनकी सुरक्षा के लिए अपने जाँबाज सैनिकों को तैनात कर रहे हैं, क्या वे इस लायक हैं कि इन जवानों की सुरक्षा में रहें। सरकार विपक्ष का मुँह देखकर नहीं चल सकती। केजरीवाल और राहुल गाँधी जैसे लोग सेना से सबूत माँगते रहेंगे तो क्या हम इनकी तुष्टि के लिए बैठे रहेंगे। पूरा देश कश्मीर को लेकर बहुत सोच सका है, किसी भी राज्य को अलग ध्वज की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए..कश्मीर जब भारत से अलग नहीं है तो उसके लिए अलग कानून क्यों स्वीकार किए जा रहे हैं?
पाक मीडिया का आलम तो ये है कि पाकिस्‍तान के अखबार 'द नेशन' ने इस हमले को 'फ्रीडम फाइटर' द्वारा किया गया हमला बताया है। वहीं 'द डाउन' ने इसको लेकर एक छोटी सी खबर को प्रकाशित किया है। इसको लेकर जहां भारत के लोगों में जबरदस्‍त गुस्‍सा दिखाई दे रहा है वहीं पाकिस्‍तान ने इसको लेकर भारत के आरोपों को खारिज कर दिया है। आलम ये है कि पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री इमरान खान जो भारत के साथ दोस्‍ती बनाए रखने का राग अलापते दिखाई देते हैं, ने हमले को लेकर कोई अफसोस तक जाहिर नहीं किया है। इतना ही नहीं इस हमले में संवेदना तक जताने के लिए पाकिस्‍तान सरकार का कोई मंत्री तक सामने नहीं आया। वहीं विदेश मंत्रालय के प्रवक्‍ता की तरफ से एक ट्वीट कर इसकी खानापूर्ति का काम जरूर कर दिया गया। अपने एक ट्वीट में विदेश मंत्रालय के प्रवक्‍ता डॉक्‍टर मोहम्‍मद फैजल ने घटना की निंदा की है और भारत के उन आरोपों को खारिज किया है जिसमें भारत ने इसके लिए पाकिस्‍तान को जिम्‍मेदार ठहराया था। प्रवक्‍ता का कहना है कि इसमें पाकिस्‍तान का कोई हाथ नहीं है। क्या ऐसे लोगों से भारत दोस्ती करने जा रहा है?
टीवी चैनलों पर इसको लेकर आक्रामक तरीके से कवरेज जारी है। इसे मोदी सरकार ने संज्ञान में लेते हुए निजी टीवी चैनलों को आगाह किया है। सरकार की तरफ से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने जम्मू कश्मीर के पुलवामा में गुरुवार को हुए आतंकवादी हमले की पृष्ठभूमि में सभी टीवी चैनलों से ऐसी सामग्री पेश करने से बचने को कहा है, जिससे हिंसा भड़क सकती हो अथवा देश विरोधी रुख को बढ़ावा मिलता हो। मंत्रालय की ओर से जारी परामर्श में कहा गया, ‘‘हालिया आतंकवादी हमले को देखते हुए टीवी चैनलों को सलाह दी जाती है कि वे ऐसी किसी भी ऐसी सामग्री के प्रति सावधान रहें जो हिंसा को भड़का अथवा बढ़ावा दे सकती हैं अथवा जो कानून व्यवस्था को बनाने रखने के खिलाफ जाती हो या देश विरोधी रुख को बढ़ावा देती हो या फिर  देश की अखंडता को प्रभावित करती हो।''मंत्रालय ने कहा कि सभी निजी चैनलों को इसका सख्ती से पालन करने का अनुरोध किया जाता है। मीडिया की बड़ी भूमिका है और जिम्मेदारी है। मैं हमेशा से कहती आ रही हूँ कि सुरक्षा सम्बन्धी मामलों में कवरेज के दौरान संवेदनशीलता और गोपनीयता की जरूरत है। आपका दुश्मन भी टीवी देखता है। हमें कोई जरूरत नहीं कि टीआरपी बढ़ाने के नाम पर अपनी सैन्य क्षमता, हथियारों और ठिकानों का प्रदर्शन करें...ऐसे साक्षात्कार तो प्रसारित ही नहीं होने चाहिए। विस्फोट की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा न करें...यह रक्षा मंत्रालय और सेना की अपील है। अब सरकार को इस बारे में गम्भीरता से कदम उठाने की जरूरत है। आज पाकिस्तान और आतंकी संगठन मीडिया का प्रिय विषय हैं, क्या ये अच्छा नहीं है कि पड़ोसी देश के गदहे दिखाने की जगह हम उन किसानों और उन लोगों को दिखाएं जो जमीन पर अच्छा काम कर रहे हैं। मीडिया को संवेदनशील होने की जरूरत है क्योंकि कोई टीआरपी देश की सुरक्षा से बड़ी नहीं हो सकती है।
यह वक्त दुःख का नहीं है, क्रोध का मगर इस क्रोध को बरकरार रखते हुए भी हमें एक होकर तमाम धार्मिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक मतभेदों से ऊपर उठकर साथ खड़ा होना होगा। इस देश पर, देश की सेना पर भरोसा रखिए और उन सबका बहिष्कार करिए जो इस मौके का इस्तेमाल राजनीति के लिए कर रहे हैं....हम जरूर जीतेंगे...कश्मीर हमारा था, है और रहेगा...जरूरत इस बात की है कि अब इसे भारत का हिस्सा मौखिक तौर पर नहीं, बल्कि समान कानून लागू करके बनाया जाए। हम जरूर जीतेंगे...तय है।

बुधवार, 16 जनवरी 2019

झड़ गए सब पीले पात.


सुषमा कनुप्रिया

चले जाओ, अब यहाँ दोबारा कदम मत रखना....वह गिरते - गिरते बचे...चेहरे पर मायूसी थी...हसरत से उस आलीशान इमारत को देख रहे थे...जिसकी नींव उन्होंने खुद तैयार की थी...उनके लिए यह सिर्फ इमारत नहीं थी...एक तपस्या थी...यहाँ टिके रहने के लिए उन्होंने अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया था...सब कुछ छोड़ दिया था...घर...परिवार..रिश्ते...नाते....दोस्त...सालों तक अकेले रह गये और वह भी बगैर किसी शिकायत के...यह सिर्फ मकान नहीं था....पूरी जिन्दगी थी उनकी...। अक्सर लोग ताना मारते '....अरे...ये तो अंतिम साँस भी इसी मकान में लेने वाले हैं...दफ्तर थोड़ी न है...घर है इनका....।' ठाकुर साब के लिए यह भी उनका इनाम था...उनको इस उलाहने पर भी नाज होता....वह बड़े नाज से इस मकान को देखा करते थे...यह मकान जो शहर के बीचों - बीच खड़ा था...अब यहाँ सब कुछ बदला जा रहा था...कमरे...दीवारों के रंग...कारपेट और हाँ, लोग भी....ठाकुर साब आज उसी बदलाव की चपेट में थे जिसकी वकालत वे जिन्दगी भर करते रहे।
'अरे....हम तो कहते हैं कि आपको तो पहले ही रिटायर हो जाना चाहिए था...नये बच्चों को मौका दीजिए...लेकिन नहीं....पकड़े रहेंगे...कुर्सी...अरे क्या कुर्सी लिए श्मशान तक जाएंगे..?.' पान चबाते हुए ठाकुर साब के मुँह से जब भी ये उद्गार फूटते...लोग समझ जाते...कि दफ्तर के पेड़ से आज फिर कोई पुराना पत्ता झड़ने वाला है....ठाकुर साब को पुरानी चीजें पसन्द नहीं थीं...उम्र तो 55 की थी मगर हाव - भाव और बालों के रंग तक भी इस कदर सहेजते रहे कि उमर 35 को पार न कर सके। जिसने भी गलती से एक बार भी बुढ़ापे का एहसास कराया....समझ लीजिए कि वह ठाकुर साब के राडार पर आ गया....वह झल्लाकर पहले तो किसी बहाने बेचारे की मिट्टी पलीद कर देते.....और फिर कहते....'ठाकुर कभी बूढ़े नहीं होते....समझ लीजिए, हम आज भी रोज 500 दंड बैठक कर सकते हैं...दिल से जवान हैं हम...।' इसके बाद उनका पूरा सप्ताह अपनी तोंद को छुपाने के लिए पेट सीधे करने में बीतता.....कुछ दिन तक तो टी -शर्ट और जीन्स छोड़कर कुछ और पहनते तक नहीं थे...जीन्स और वह भी लो वेस्ट...आखिर एक दिन सेठ जी ने टोक दिया....ठाकुर साब प्रोफेशनल नहीं लगता....बस उस दिन से उन्होंने प्रोफेशनल बनने की तैयारी भी कर ली थी।
पूरे दफ्तर पर उनका राज था....सेठ जी भी बगैर उनकी परमिशन के कोई कदम नहीं उठाते थे...सब जानते थे कि सेठ जी तक पहुँचना हो तो ठाकुर साब को खुश रखो...और इसके लिए वे किसी भी हद तक जाकर उनको खुश रखते...दफ्तर में रिटायरमेंट के करीब आ पहुँचे... चौधरी जी की उम्र भले ही 70 पार हो मगर वे ठाकुर साब को भइया कहकर ही पुकारते और पुकारते समय आवाज में इतनी चीनी घोल देते कि सामने वाले को डायबिटिज होने का खतरा था। चौधरी जी के बाल धूप में सफेद नहीं हुए थे...वे हवा का रुख देखकर बात करते...जिस कर्मचारी को ठाकुर साब पसन्द करते...चौधरी जी भी उसे तेल लगाने का कोई मौका नहीं छोड़ते और जिस कर्मचारी के बारे में भनक लग जाती कि वह ठाकुर साब के निशाने पर है.....उसकी खोट एक - एक करके चींटियों की तरह बताते कि चीटियाँ भी सोच में पड़ जातीं....जाहिर सी बात है कि चौधरी जी और ठाकुर साब की अच्छी बनने लगी थी....बात ऐसी नहीं थी कि चौधरी जी को ठाकुर साब से प्रेम था....बल्कि वह भी जान रहे थे कि वह भी सूखों पत्तों की तरह हो गए हैं...और ठाकुर साब उनके लिए मजबूत तना भर थे...।
कुल मिलाकर पूरा दफ्तर भारतीय लोकतंत्र पार्टी में तब्दील हो चुका था और ठाकुर साब यहाँ के प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष, दोनों थे...सेठ जी की भूमिका राष्ट्रपति भर की तरह ही थी...जो अनुशंसा न आने तक न तो कुछ देखते थे, न सुनते थे....मगर कभी - कभार लगता कि बोलना जरूरी है तो अपने अस्तित्व का एहसास दिलाने के लिए बोला करते थे। सेठ जी देखते और सुनते भी उतना ही थे...जितना ठाकुर साब दिखाया करते थे...सेठ जी को ताकत, सत्ता और लोकप्रियता, तीनों की जरूरत थी और ठाकुर साब उनके लिए वह चाबी थे...जो इन तीनों का ताला खोल सकते थे...।
नतीजा यह हुआ कि दफ्तर में बस वही लोग रह गये जो कि दुम हिला भर सकते या फिर गाँधी जी के तीन बन्दरों की तरह तमाशा देखते...विरोध और प्रतिरोध करना तो दफ्तर की संस्कृति से खत्म ही हो गया था...अब तो दफ्तर की सीढ़ियों पर चढ़ने के लिए ठाकुर साब की इजाजत चाहिए थी...। एक बार झड़ा हुआ पत्ता गलती से राह भटककर दफ्तर रूपी पेड़ में झडने की कगार पर पहुँचा और ठाकुर साब ने उसे पटककर गिरवा दिया....तब से किसी पत्ते की हिम्मत न हुई कि वह मुँह भी खोले। बाहर का मौसम भले ही कुदरत तय करती हो मगर अन्दर का तापमान तो ठाकुर साब का मिजाज ही तय करता था। ठाकुर साब अपनी इस प्रतिभा को जानते थे और उनका ख्वाब इस देश का प्रधानमंत्री भर था...राजनीति में औपचारिक तौर पर उनकी इन्ट्री भले न हुई हो मगर ये काम तो वे पिछले 30 साल से करते ही आ रहे थे।
दफ्तर में उनकी नियुक्ति हुई तो लिपिक के तौर पर थी...मगर सीखने की क्षमता और मेहनत के साथ...तिल का ताड़ बनाने की कला उनको दफ्तर में शिखर पर लायी थी...उनको देखकर उनके वरिष्ठ और वयोवृद्ध सहयोगी कुढ़ते...कई तो पीठ -पीछे गालियाँ भी देते मगर ठाकुर साब के सामने जाने पर ऐसे रंग बदलते कि गिरगिट भी शर्मा जाए...ठाकुर साब की एक खासियत थी कि जिस पर दिल आ जाए...उस पर जान छिड़कते...उसके लिए पलक - पाँवड़े बिछाया करते...उसका सामान ढोया करते मगर तभी तक जब तक कि वह शख्स उनकी जी हुजूरी करता रहे...उनका स्नेह और प्रेम तभी तक सलामत रहता जब तक उनकी कुर्सी को कोई खतरा न हो...।
ठाकुर साब के जमाने से ही महिलाओं की नियुक्ति दफ्तर में होने लगी थी....अगर आपको लगता है कि ठाकुर साब महिलाओं को सशक्त बनाने में विश्वास रखते थे...तो असल कारण भी जान लीजिए..कारण यह था कि महिलाएं वेतन को लेकर ज्यादा....तोल - मोल नहीं करती थीं....दूसरे जबान नहीं खोलती थीं...खोलती भी तो इसलिए चाय - पानी पूछने....या किसी सफर से ठाकुर साब की पसन्द की कोई चीज या लंच परोसने के लिए। दफ्तर खूबसूरत चेहरों से भरा रहता था और बाहर से आने वाले लोग ठाकुर साब को महिला सशक्तीकरण का पुरोधा मान बैठते...। एक - दो बार इन्टरव्यू भी दे चुके थे और महिलाओं की नियुक्ति के पीछे उनकी वफादारी और निष्ठा के कसीदे काढ़ चुके थे। अब ये अलग बात है कि किसी पत्रकार ने ये नहीं पूछा कि दफ्तर में अनुभवी लोग क्यों काम नहीं करते.....6 महीने में ही उनके विभाग के दर्जन भर कर्मचारियों ने उनका साथ क्यों छोड़ दिया था, छोड़ते जा रहे थे।
तो हम बता रहे थे कि महिला कर्मी कान की कच्ची थीं..हर सुबह नियमित तौर पर पूरे विभाग के कर्मियों का रोजनामचा रखतीं....शिकायतें करतीं....और विशेष होने का तमगाा प्राप्त कर लेतीं। हालांकि यह पद भी अवधि विशेष के लिए था और कई महिलाएं इस पद की शोभा बढ़ाने के बाद दाल में मक्खी की तरह फेंकी जा चुकी थीं मगर कोई खास असर अब तक नहीं पड़ा था। ठाकुर साब की गालियों को मिश्री समझकर पचा लिया करती थीं। लड़कों के साथ ऐसा कुछ मुमकिन नहीं था...वे समझदार थे...और उनकी सियासत का हिस्सा नहीं बने थे...गए भी साथ गए और साथ काम करते भी रहे मगर लड़कियों के मामले में ठाकुर साब को सफलता हासिल थी....कुछ सनकी लड़कियों ने चीजों को बदलने की कोशिश की...कई साल उनको धता बताकर टिकी रहीं पर अन्ततः उनको भी जाना पड़ा।
दफ्तर में कभी कर्मियों के हित के लिए सोसायटी हुआ करती थी मगर निजी स्वार्थों में वह भी खत्म हो गयी थी। नतीजा यह था कि कर्मियों के हक के लिए लड़ने वाला अंतिम सहारा भी खत्म हो गया था। एक बार छंटनी हुई थी तो दफ्तर में नारे लगे थे....ठाकुर साब भी जाते....और घड़ी पर नजर रखते....जैसे ही सेठ जी के आने का समय होता....चुपके से अपनी कुर्सी पर बैठ जाते और काली पट्टियाँ ड्रॉअर में चली जातीं। उन्होंने बाकायदा दूसरे कर्मियों को निकलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी और विश्वस्त बनते चले गये।
दफ्तर में विभाग के अन्य लोग सब कुछ देखते और खामोश रहते...सहानुभूति के नाम पर समझौते की सलाह देते....ठंडी सांस भरते और शायद अपनी बारी आने का इन्तजार करते रहे। वफादारी और गुलामी के बीच जो रेखा है....वह बहुत महीन है.... कई बार लोग गुलामी को वफादारी समझकर अपना विवेक, आत्मा सब गिरवी रख देते हैं...पलायन और हीनता है...दफ्तर में दशकों से यह चला आ रहा है। सबका दम घुटता था मगर कोई आवाज नहीं उठती थी....एक बार वरिष्ठ मुनीम को भी धक्के देकर निकाला गया था और तब भी सब चुप रहे थे....कहते हैं कि कम्पनी को खड़ा करने में उन मुनीम जी की बड़ी भूमिका रही थी....उन्होंने कातरता से अपने उन सभी साथियों को देखा था कि कोई उनके लिए खड़ा हो....पर सभी पत्थर बने रहे। ऐसे बहुत से कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाया गया था जो गलती से भी किसी और कम्पनी के दफ्तर में देख लिए गए। यहाँ तक कि अपने पुराने साथियों से मिलने की इजाजत भी नहीं थी...।
दफ्तर के बाहर किसी को बोलने की आजादी नहीं थी..। हुआ यह था कि...अपनी पूरी जिन्दगी एक कम्पनी को देने वाले एक वयोवृद्ध मुनीम जी......अपनी पुरानी टेक पर, आत्मसम्मान की जिद पर अड़े रहते थे...जाहिर था कि ठाकुर साब उनको फूटी आँख से भी देखना पसन्द न करते थे....बहाने की तलाश में थे...। इन पुराने मुनीम साब के अधीन काम करने वाला कर्मचारी भी प्रमोशन की राह देख रहा था तो एक दूसरी कम्पनी में काम कर रहे एक दूसरे कर्मचारी की नजर इस पद पर थी....दोनों के हित मिल रहे थे और राह का काँटा भी एक था...बस, मौका भी मिल गया.....।
उस बुजर्ग मुनीम की दिल से इज्जत करने वाला एक शख्स दूसरी कम्पनी में था....उसने एक रिपोर्टर से बात की और इन पर पूरा आलेख एक राष्ट्रीय पत्रिका में छपवा दिया...होता तो यह कि कम्पनी...उन बुजुर्ग के योगदान को सराहती जिनकी वजह से इनकी कम्पनी को पहचान गए थे....दूर - दूर से बधाइयाँ आ रही थीं....मगर उलटबाँसी बोलकर कोई चीज होती है.....ठाकुर साब समेत कई कर्मियों को यह तरक्की रास न आई। इन सबने सेठ जी को यह समझा दिया कि इस लेख में मुनीम ने अपनी जय जयकार करवा दी है और दूसरी कम्पनी से मिले हैं.....नतीजा यह हुआ कि बुर्जुग मुनीम जी को ठाकुर साब समेत अन्य कर्मियों की मेहरबानी से उस मकान से बाहर किया गया....जिसकी बुनियाद गढ़ने में उनकी पूरी मेहनत थी.....और पाठकों.....जैसा कि हमने बताया....यहाँ मौन व्रतधारी थे....जिनमें न तो आत्मा बची थी और न ही रीढ़ की हड्डी....वे अब भी तमाशा देखते रहे......किसी ने आवाज न उठायी....सबको अपनी नौकरी बचानी थी.....वे बुजुर्ग नम आँखों में दिल में आह लिए.....चले गए.....बस....कई बार पुरानी तस्वीरों को देखकर दिल भर लेते थे।
10 साल बाद.....वक्त भी पलटता है
मकान बदलता है तो वक्त भी बदलता है...इस कम्पनी का प्रबन्धन भी बदला...पुराने तरीके काम न आए....ठाकुर साब को खड़ा करने वाले लोग....उनके लिए आँसू बहाने वाले लोग कब के उनकी जिन्दगी से जा चुके हैं.....आज बदलाव की आँधी में ठाकुर साब खुद सूखे पत्ते की तरह झड़ चुके हैं....सेठ जी की नयी पीढ़ी ने कम्पनी के साथ मकान भी बेच दिया है और ठाकुर साब को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया....उमर हो चुकी है....ठीक से चला भी नहीं जाता.....। कहते हैं कि ईश्वर के घर में देर है, अन्धेर नहीं है....उसकी लाठी में आवाज नहीं होती....पर वह न्याय जरूर करता है।
जिस मकान में ठाकुर साब की मर्जी के बगैर एक पत्ता तक न हिलता था...आज उसी मकान से उनको धक्के देकर निकाला गया है। उन्होंने जब सुरक्षाकर्मी को नसीहत दी कि वह बुजुर्गों का लिहाज करना सीखे.....उनकी कहानियाँ सुन चुके उस कर्मी ने पलटकर कह दिया.....आपने सीखा था....? .इतनों की हाय ली है....जब बोया पेड़ बबूल का........ठाकुर साब के सारे हथियार खत्म हो चुके हैं....शरीर भला किसका हमेशा जवान रहा है.....ठाकुर साब अशक्त हो चुके हैं....रोज आते हैं.....उस मकान को देखते हैं.....जो कभी उनका था....जो उनकी जिन्दगी हुआ करता था....अब जब अकेले होते हैं...कलेजे में हूक सी उठती है, आवाज आती है. वह सब चेहरे दिखते हैं जिनको वह सूखा पीला पत्ता बताकर बाहर करते आ रहे हैं। आईने के सामने ठाकुर साब खुद को एक पीले पत्ते में तब्दील होते देखते हैं...घबराकर खुद को देखते हैं..वही हैं...सब तो ठीक है..मगर आईने के सामने ऐसा लग रहा है कि वह वह पत्ता बन चुके हैं....पीला पत्ता....सूखा पत्ता। आवाज आती है....बोया पेड़ बबूल का....तो आम कहाँ से होय।

शनिवार, 22 सितंबर 2018

समय की धूल में इतिहास को लपेटे मालदा का गौड़

बच्चों द्वारा आयोजित मालदा बाल फिल्म महोत्सव


मालदा बहुत विकसित जिला नहीं है। संरचना की कमी से परेशान इस जिले में विकास की जरूरत है। लोग मालदा को आम के लिए जानते हैं मगर पयर्टन के मानचित्र पर मालदा बहुत कम दिखता है। क्या पता इसकी वजह यह हो सकती है कि इस इलाके में अनुसन्धान की जरूरत जितनी थी, उतनी हुई नहीं है। ग्रामांचलों में जो संस्कृति छिपी है, उस पर ध्यान नहीं दिया गया और जो स्थल पर्यटन का केन्द्र बन सकते थे, वे राजनीति मतभेदों और वोटबैंक की राजनीति की भेंट चढ़ गये।
अगर मालदा को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखना है तो आपको गौड़ जाना चाहिए। दूसरी बाल फिल्म महोत्सव की कवरेज करने जब 22 अगस्त को मालदा पहुँचे तो हमें भी यह मौका मिला। होटल वही था मगर इस बार यात्रा ट्रेन से हुई। प्रकृति को अपनी आँखों में भरते, फरक्का की गर्जना सुनते हम रात को होटल पहुँचे थे।
शम्पा अब बड़ी हो गयी और कॉलेज जाती है

यह देखकर अच्छा लगा कि 2 साल पहले जिन बच्चों को स्कूल में देखा था, वह आज कॉलेज में जा चुके हैं। अपना बाल विवाह रोकने वाली शम्पा अब कॉलेज में पढ़ती है।
कवरेज के बाद दूसरे दिन हमने गौड़ देखा जहाँ मिथक मानकर उपेक्षित छोड़ा गया इतिहास भी है, मुगलकालीन भव्यता के अवशेष भी हैं। चैतन्य महाप्रभु का विश्वास और उनके चरण चिन्ह भी आज तक हैं यहाँ तो इस बार यात्रा गौड़ की और उतना ही जितना देखा या देख सके।
 गौड़ को ऐतिहासिक इमारतों के कारण प्रसिद्धि प्राप्त है जो एक जमाने में बंगाल की राजधानी कहा जाता था।
सबसे पहले हम पहुँचे रामकेलि गाँव। यहाँ है 500 साल पुराना मदन मोहन मंदिर। मंदिर के पुजारी के मुताबिक यहाँ श्रीराम 4 दिन ठहरे थे और सीता ने पिंडदान यहीं किया था।
आज भी महिलायें यहाँ बिहार से पिंडदान करने आती हैं। सीता का कुंड और रामायण का वटवृक्ष होने की मान्यता भी है। रामकेलि गाँव की प्रसिद्धि यहाँ स्थित मदन मोहन जिउ मंदिर के लिए है। जिस स्थान पर यह मंदिर है, वहाँ वृन्दावन की तरफ जा रहे श्री चैतन्य देव ने विश्राम किया था। आज भी एक पत्थर पर उनके चरण चिह्न हैं। इसके साथ ही कदम्ब और तमाल के वृक्ष हैं जिसके पास यह मंदिर बनाया गया है मगर रामकेलि की ख्याति का एक और कारण है जिसके बारे में बात कम होती है।
पीछे जो मंदिर हैं, वहीं सुरक्षित हैं चरण चिह्न

500 साल पुराने इस मंदिर के पुजारी पूर्णचन्द्र पाणिग्रही ने बताया कि रामकेलि वह स्थान भी है जहाँ श्रीराम चार दिन के लिए रुके थे। रामकेलि वह स्थान भी है जहाँ स्थित एक कुंड में सीता ने पिंडदान किया था। सनातन धर्म में महिलाओं को पिंडदान की अनुमति नहीं है मगर इस स्थान पर आज भी बिहार से महिलाएँ पिंडदान करने आती हैं। इस दौरान एक मेला लगता है और आम तौर पर यह ज्येष्ठ, श्रावण और आषाढ़ में लगता है। यहाँ फिरोज मीनार के पास जहाँ यह कुंड है, वहीं पर एक बरगद का वृक्ष भी है। दावा किया जाता है कि यह वृक्ष भी काफी पुराना है। पंडित पाणिग्रही के मुताबिक महाप्रभु चैतन्य देव 15 जून 1515 को रामकेलि आये थे और रूप सनातन से उनकी भेंट भी इसी स्थान पर हुई थी।
पीछे पुजारी पूर्णचन्द्र पाणिग्रही। कहते हैं कि इस जगह पर श्रीराम चार दिन रुके और यहीं पर चैतन्य महाप्रभु ने विश्राम किया था
वह बताते हैं कि इस स्थान का उल्लेख रामकेलि पंजिका में भी किया गया है। विगत 62 साल से इस मंदिर को सेवायें दे रहे पाणिग्रही के मुताबिक इस स्थान को संरक्षण की जितनी जरूरत है, वह संरक्षण नहीं मिल रहा और न ही पुनरुद्धार के लिए सरकारें तत्पर दिखायी देती हैं।
 मंदिर बड़े कष्ट से चलता है। रामायणकालीन होना और श्रीराम या सीता से इस स्थान का सम्बन्ध होना एक शोध और फिलहाल विश्‍वास का विषय हो सकता है  मगर धर्म और पर्यटन, दोनों ही दृष्टियों से रामकेलि गाँव का अपना महत्व है। मंदिर के पास स्थित कुंड की हालत भी सही नहीं है।
यहाँ पर राज्य के मंत्री कृष्णेंदु नारायण चौधरी आये थे। मंदिर के 500 साल पूरे होने पर जो समारोह आयोजित हुआ था, उस दौरान यहाँ पर स्थित महाप्रभु चैतन्य देव की प्रतिमा स्थापित हुई जिसका अनावरण उन्होंने किया था। राम के नाम पर राजनीति करने वाले और राम से जुड़े शब्द किताबों से मिटाने वाले राम के नाम पर रामकेलि को नहीं जानते। यहाँ सोचने वाली बात यह है कि अगर चैतन्य प्रभु के कारण ही इस गाँव की प्रसिद्धि है तो उनके नाम पर इस गाँव का नाम क्यों नहीं पड़ा?
क्या सत्ताधारी पार्टी को यह डर है कि अगर राम के नाम पर इस जगह को विकसित किया गया तो विरोधी पार्टी इसका लाभ उठायेगी या फिर उन पर साम्प्रदायिक कार्ड खेलने का ठप्पा लगेगा। क्या वोटबैंक के चक्कर में हम अपने ऐतिहासिक और पौराणिक स्थलों को उपेक्षित रखेंगे? क्या आपकी समझ में नहीं आता कि पर्यटन और इतिहास की दृष्टि को ध्यान में रखकर भी काम किये जा सकते हैं। बहरहाल पुरात्व विभाग इस दिशा में काम कर रहा है। सम्भव है कि सीता और राम को लेकर असहमतियाँ हों मगर पौराणिक, धार्मिक और पर्यटन की दृष्टि से रामकेलि का अपना स्थान है, इस बात से हम इनकार नहीं कर सकते और इसका संरक्षण बेहद आवश्यक है।
बड़ा सोना मस्जिद के भीतर का दृश्य

12 दुआरी मस्जिद को भी संरक्षण की जरूरत है। यहाँ के पत्थरों में काई जमती जा रही है। सुल्तान नसरत शाह ने यह मस्जिद 1526 में बनवायी थी। इसे बड़ा सोना मस्जिद भी कहते हैं। 12 दरवाजे हैं। एक गुम्बद टूट चुका है। यहाँ पर महिलाओं के लिए दीर्घा भी हुआ करती थी। अन्दर भव्य मस्जिद है और बाहर बिलखता भविष्य, जिसकी देह पर कपड़े तक नहीं हैं। जो बोर्ड है, उस पर जंग लग चुकी है।
दाखिल दरवाजा

सलामी दरवाजा दाखिल दरवाजा के नाम से भी जाना जाता है। यह गौड़ के किले का उत्तरी प्रवेश द्वार कहा जाता है। यह 1425 में बनवाया गया। इसे बरबक शाह ने बनवाया था और इसी दरवाजे से तोपों की सलामी दी जाती थी। दाखिल दरवाजा टेराकोटा और छोटे लाल ईंटों से बना एक विशाल प्रवेश द्वार है। यह राजसी संरचना 34.5 मीटर चौड़ीऔर 21 मीटर ऊंची है।
फिरोज मीनार

फिरोज मीनार का निर्माणकाल 1486 से 1489 तक का माना जाता है। इसमें 73 सीढ़ियाँ हैं। इसका निर्माण सैफुद्दीन फिरोज ने करवाया था जो एक हब्शी था और बरबक शाह की हत्या कर सुल्तान बना था। यह मीनार 26 मीटर ऊंची है और दाखिल दरवाजा के दक्षिणपूर्व दिशा में है। यह एक स्वतंत्र संरचना है जो इस स्थान पर बिना किसी सहायक इमारत के खड़ी है। मीनार की ऊपरी दो पंक्तियों का आकार गोलाकार है, जबकि निचले वाले बहुभुज आकार के हैं। कुछ अनुमानों के मुताबिक इसका निर्माण मस्जिद के लिए एक मीनार के रूप में किया गया था। इसे विजय स्मारक भी कहा जाता है। यह भी कहा जाता है कि इसका शीर्ष प्रारंभ में समतल था और यहां एक गुंबद भी बना हुआ था।
मान्यता है कि यही वह कुंड है जहाँ सीता ने पिंड दान किया था। इस पर भी शोध की जरूरत है, दावे के साथ कुछ भी कहा नहीं जा सकता

इसी के सामने वह कुंड भी बताया जाता है जहाँ मान्यता है कि सीता ने पिंडदान किया था। इसके साथ ही एक बेहद पुराना वटवृक्ष आज भी देखा जा सकता है। बहरहाल, यह शोध और विश्वास का मामला है।
कहते हैं कि यह वटवृक्ष रामायणकालीन है। बहरहाल वास्तविकता तो पुरात्व विभाग ही बता सकता है पर बताये तो

फतेहखान का मकबरा 1658 से 1707 के बीच का है। यह औरंगजेब के सेनापति दिलावर खान के बेटे फतेह खान का मकबरा है।
फतेह खान के मकबरे के भीतर का दृश्य

फतेह खान को पीर नियामतुल्लाह की हत्या के लिए भेजा गया था क्योंकि उन्होनें सुल्तान शुजा को विद्रोह का परामर्श दिया था। कहा जाता है कि गौड़ में कदम रखते ही फतेह खान को खून की उल्टियाँ होने लगीं और उसने वहीं दम तोड़ दिया।

चीका मस्जिद 1450 में बनायी गयी थी। इस मस्जिद को बनाने में एक हिन्दू मंदिर के पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। विश्वास किया जाता है कि यह कोई हिन्दू समाधि हुआ करती होगी। इसे सुल्तान हुसैन द्वारा जेल की तरह इस्तेमाल किया जाता था। कदम रसूल मस्जिद भी पास ही है। उसे ठीक से देखा तो नहीं इस स्थल से एक किवदंती भी जुड़ी है, माना जाता है कि जब भी मुहम्मद चट्टान पर चलते थे तो उनके पदचिह्नों के निशान छूट जाता करते थे। इन निशानों के आसपास कई पवित्र स्थलों का निर्माण करवाया गया था। एक ऐसा ही स्थल है कदम रसूल मस्जिद।


वक्त कम था तो यहाँ से गये हम भारत - बांग्लादेश की सीमा, महाद्वीपपुर। बाकायदा अनुमति लेकर सामने बने छोटे टीले पर चढ़े। इस रास्ते पर खड़े ट्रक कई दिन और कई बार एक महीने तक इस इन्तजार में खड़े रहते हैं। हमने लोगों को एक लकीर से बँटते देखा, सीमा पर तैनात जवानो को मुस्तैद देखा और जय हिन्द कहकर वापस लौटे।


शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

गंगा की लहरें, मायूस चेहरे. विकास की बाट जोहते काकद्वीप से मुलाकात



रविवार छुट्टी का दिन होता है मगर 15 जुलाई का दिन मेरे लिए छूट्टी का दिन नहीं था। वह दिन मैंने काम करके खुशी से बिताया और कारण था कि घूमने का मौका मिला था मुझे। हम काकद्वीप जा रहे थे जहाँ एक विद्यालय में वृक्षारोपण का कार्यक्रम क्रेडाई द्वारा आयोजित किया गया था। जो पत्रकार साथ गये थे, उसमें मैं भी शामिल हो गयी थी।  हम बस से जाने वाले थे। रविवार को सुबह 9 बजे प्रेस क्लब की जगह पार्क सर्कस स्थित क्रेडाई के कार्यालय पहुँचना था। समय पर पहुँचने के लिए मुझे टैक्सी लेनी पड़ी। अच्छी बात यह थी कि टैक्सी ने समय से पहले ही मुझे सही जगह पर पहुँचा दिया। यह पूरे कार्यक्रम की जिम्मेदारी कैंडिड पी आर एजेन्सी के कन्धों पर थी। मैं सुबह 8.30 बजे ही जिन्दल टावर पहुँच गयी थी। वहाँ पत्रकार रह चुकी पल्लवी से मुलाकात हुई।

कुछ दिनों के लिए ही सही, हम साथ काम कर चुके थे तो एक जाना - पहचाना चेहरा साथ होना अच्छी बात थी।
बस 9.05 बजे रवाना हुई और डी.एल खान रोड होते हुए सुन्दरवन की ओर चल पड़ी। 21 जुलाई को सत्ताधारी पार्टी की विख्यात शहीद रैली थी और पूरा इलाका ममता बनर्जी के पोस्टरों और बैनरों से पटा था। उस दिन लगातार बारिश हो रही थी।

10.15 बजे हमारी बस आमतला के रास्ते से गुजर रही थी। यह दक्षिण 24 परगना के विष्णुपुर का इलाका था। बीच में हम रुके और तेज बारिश में भीगते हुए हल्का नाश्ता किया। इस दौरान कच्ची सड़कों और गड्ढों से खूब सामना हुआ।

खैर, 12 बजे तक हम काकद्वीप पहुँच चुके थे। सिंचाई विभाग के बंगले में हम पत्रकारों के लिए लंच की व्यवस्था की गयी थी। हम बहुत थक चुके थे और भूख भी काफी लग गयी थी तो हम सब लंच पर टूट पड़े। मुझे जो चीज बहुत भाई. वह गुड़ की बनी मलाई करी थी जो बहुत कुछ रसमलाई जैसी ही होती है। दरअसल, यह रास्ता गंगासागर की ओर जाता है तो नदी भी हमें दिखायी जाने वाली थी। कई बार लगता कि बस बकखाली होकर जाती तो हम समुद्र भी देख लेते एक बार मगर हम सब यहाँ ड्यूटी पर थे तो थोड़ा सा इच्छाओं पर नियन्त्रण तो लाजिमी था।

2 बजे हम गंगासागर के विशाल तट के सामने थे। ऐसा लग रहा था कि आसमान और नदी, एक दूसरे से मिलने के लिए व्याकुल हैं। आसमान नदी पर झुका हुआ था। अद्भुत दृश्य था। पूरे इलाके में हरियाली थी तो गरीबी और मरियल जानवर भी थे। गंगासागर के पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित होने के कारण यहाँ पर आपको नदी तट के आस - पास यात्री निवासी और एक बेहद खूबसूरत यात्री निवास दिखेगा। कच्चे और मिट्टी के घरों के बीच खड़े पक्के मकान यहाँ लक्जरी से कम नहीं लगते। बंगाल के ग्रांमीण इलाकों में आपको संगमरमर के तुलसी पूजा के पात्र दिखेंगे।

3 बजे हम उस विद्यालय में पहुँचे जहाँ नारियल के पौधे क्रेडाई द्वारा ग्रामीणों को दिये जाने थे। पूरा पण्डाल ग्रामीणों से खचाखच भरा था, तिल रखने की भी जगह नहीं थाी मगर लोग समझदार हैं..वह सब समझते हैं। गाँव फोटों खिंचवाने की सबसे अच्छी जगह है। मुझे थोड़ा अजीब लगा क्योंकि जहाँ ये सारा कार्यक्रम चल रहा था, जहाँ वृक्षारोपण हो रहा था, नेता और मन्त्री जुटे थे, वह स्कूल प्रांगण में स्थित बच्चों के खेलने की जगह थी...उनकी मायूसी मुझे साफ दिख रही थी। यहाँ की बच्चियों ने अद्भूत कार्यक्रम किया और इस नृत्य की रिकॉर्डिंग मैंने अपराजिता के यू ट्यूब चैनल के लिए कर ली।
नेता मानें या न मानें पर ग्रामीण इस नाटक को बखूबी समझते हैं। इसके बावजूद उनकी आर्थिक हालत इस नाटक में शामिल होने पर मजबूर करती है। वृक्षारोपण के दौरान एक बुजुर्ग ने मुझसे पूछा - एक आबार कोखुन आशबे (ये लोग फिर कब आयेंगे), जवाब भी उसके पास था...5 बछर पोरे...मैं इस तंज पर अपनी हँसी न रोक सकी। ये भी एक तरह का विद्रोह है मगर दंतहीन विद्रोह है। कार्यक्रम के बाद वापस गाड़ी तक जाने में बड़ी मुश्किल हुई। कार्यक्रम में फोटू खिंचवाकर तो मंत्री महोदय चल दिये थे मगर उनके जाने के बाद जबरदस्त अफरा -तफरी मची थी। सब नारियल का पौधा पाने के लिए टूट पड़े थे। किसी तरह मैं गाड़ी के पास पहुँची।


शाम 4 बजे हम यहाँ से कोलकाता के लिए रवाना हो चुके थे। रास्ते में जाम से सामना हुआ और पैलान का भव्य मंदिर भी देखा। वापस पार्क सर्कस तो जाना था नहीं, घंटों के सफर के बाद मैं बेहला के पास उतरी। सीधी बस तो मिलनी मुश्किल थी तो धर्मतल्ला उतरी और लगभग 10 बजे तक वापस घर आ गयी। ये सफर बहुत छोटा भले हो मगर ग्रामीण अंचलों की वास्तविकता के साथ कई नाटकों से परिचय करवा दिया। साथ ही एक बार बकखाली जाने की इच्छा भी प्रबल हो गयी...देखें...तब तक के लिए अगले सफर का इन्तजार करें।

बुधवार, 29 अगस्त 2018

संघ कट्टर है तो उतने ही कट्टर और एकांगी आप भी हैं...



विरोध की अन्धी राजनीति के शिकार जब हम हो जाते हैं तो अच्छा और बुरा कुछ नहीं दिखता। हम सिर्फ बुराइयाँ देखते हैं और उसे नीचा दिखाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। भारतीय राजनीति इन दिनों इसी दौर से गुजर रही है जहाँ न सामन्जस्य दिखता है, न सौहार्द और न शिष्टाचार। काँग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी नाराज हैं कि भीमा कोरेगाँव मामले में 5 वरिष्ठ वामपंथी सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी हुई। किसी को अघोषित आपातकाल नजर आ रहा है। इन बुद्धिजीवियों पर मेरा कुछ कहना सही नहीं है इसलिए इन पर कोई टिप्पणी नहीं करूँगी मगर उदारवाद की बात करने वाले कितने उदार हैं, ये उनको अपने अन्दर झाँकना चाहिए। आप साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों की जमात में तभी शामिल हो सकते हैं जब आप मोदी, भाजपा और आरएसएस का विरोध करें...तभी आपको जगह मिलेगी और आपको सुना जाएगा...। सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे लोग और ऐसे समूह भी दिखे जो विचारधारा के विरोध से नीचे गिरकर इस गटर तक पहुँच गये हैं कि अब व्यक्तिगत हमलों पर उतर गये हैं और यह बीमारी दोनों तरफ है...फिर भी आप खुद को उदार और सामन्जस्य करने वाला कहते हैं तो शायद उदार मानसिकता का अर्थ भी खोजना होगा। सांस्कृतिक और सृजनात्मक स्तर पर आपका लेखन भी इसी दिशा में जा रहा है कि आपने अपने आस - पास भी घेरा बना लिया है और उससे बाहर निकल ही नहीं पा रहे हैं...यह बौद्धिकता का अहं भी अहंकार ही है जो किसी और की अच्छाइयों को स्वीकार करने ही नहीं दे रहा है। यह अहंकार ही है कि आपने मान लिया कि भाजपा और आरएसएस या उनकी पार्टी के नेता किसी भी ऊँचे पद या प्रधानमंत्री पद के योग्य ही नहीं हैं और यह उतना ही घटिया और खतरनाक है जितना राहुल गाँधी को पप्पू कहकर प्रधानमंत्री पद की उनकी दावेदारी को सिरे से खारिज कर देना। हाँलाकि निजी तौर पर मैं यही मानती हूँ कि राहुल से बेहतर नेता उनकी पार्टी में हैं मगर कौन नहीं जानता कि गाँधी परिवार का विकल्प बनने वालों के साथ क्या हुआ। क्या माधवराव सिंधिया और राजेश पायलट की अकस्मात हादसों में मौत महज एक संयोग थी, मैं नहीं मानती...ये बात हजम नहीं होती। लालकृष्ण आडवाणी के सम्मान को लेकर चिन्तित हो रही पार्टी को याद आना चाहिए कि उन्होंने पार्टी के पूर्व अध्यक्ष सीताराम केसरी और पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को किस तरह किनारे लगाया था। यहाँ तक कि दिल्ली में उनका अंतिम संस्कार न नहीं होने दिया गया और न ही पार्टी मुख्यालय में उनका शव लाने दिया गया...। ये कौन सा लोकतन्त्र है, अब ये तो राहुल गाँधी समझायेंगे...राजनीति का चारणकाल देखना हो तो वर्तमान कांग्रेस को देखा जा सकता है। राजनेता लड़ते हैं....समझा जा सकता है मगर कला और साहित्य के लोग विचारधारा के विरोध को व्यक्तिगत विरोध तक ले जाते हैं तो दया भी आती है और अफसोस भी होता है। जो सम्मान अटल जी को मोदी सरकार ने दिया...उसका आधा भी आपने अपने नेताओं को नहीं दिया। कौन सा प्रधानमंत्री इस तरह पैदल चला जैसे मोदी अटल जी की अंतिम यात्रा में चले...वैसे दृष्टि आपकी अपनी है, जिस रूप में देखिए।
ये आरएसएस का ही कार्यक्रम है

 वाम पार्टियों ने 40 साल तक पार्टी को सेवा देने वाले सोमनाथ चटर्जी के साथ क्या किया...ये सब जानते हैं...इसमें कौन सा आदर छुपा था? इसे लेकर मैंने किसी बुद्धिजीवी को कभी रोते नहीं देखा....ये कौन सी उदारता है? 1993 में वाममोर्चा की ही सरकार थी जब बाल पकड़कर ममता बनर्जी को धक्के देकर राइटर्स से निकाला गया। 2007 में नन्दीग्राम में 14 किसानों पर गोलियाँ चलीं...तब भी आपकी ही सरकार थी...सिंगुर और नन्दीग्राम में जब हिंसा हुई, तब भी आपकी ही सरकार थी...क्यों नहीं आप इस पर बात करते? सर्वहारा वर्ग के लिए लड़ने और आन्दोलन की बात करने वाले वामपंथियों को याद रखना चाहिए कि खुद उनके राज में उन्होंने क्या किया था। आज केरल में हिंसा हो रही है तो भी अभी आपकी ही सरकार वहाँ पर है...क्यों नहीं बोल फूटते किसी के? अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के नाम पर लानतें भेजने वाले साहित्यकार तब क्यों मौन हो जाते हैं जब तसलीमा नसरीन को वाममोर्चा और तृणमूल, दोनों ही सरकारें बंगाल नहीं आने देतीं। कोई मुझे बताये कि शहीद दिवस पर होने वाले तमाशे को सरकारी समारोह की तरह क्यों मनाया जाता है कि आम आदमी और बच्चे भी कड़ी धूप में चलने को मजबूर होते हैं....। तृणमूल के पास ऐसा कौन सा जादू है कि किसी भाजपा नेता के दौरे के बाद ही उसकी आवभगत करने वाला अगले दिन तृणमूल में शामिल हो जाता है? मीडिया को एक बार नहीं, कई बार दीदी के राज में पीटा गया है...एक किसान को जब सवाल करने पर और एक छात्रा के सवाल करने पर जब माओवादी कहा गया तब आप खामोश क्यों रहे? आप आरएसएस से पूछते हैं कि स्वाधीनता सँग्राम में उनका योगदान क्या था तो आपको यह भी बताना चाहिए कि आपने कौन सी लड़ाई लड़ी। भगत सिंह हों या कोई और क्रान्तिकारी, वे इस देश के थे और इस देश के लिए लड़े थे...किसी खास पार्टी का लेबल चस्पा करना उनका अपमान करना है। फारर्वड ब्लॉक नेताजी के साथ कांग्रेस में हुए बर्ताव को क्यों भूल जाती है। आज के वामपंथी आखिर किस वामपंथ को अपना आधार मानते हैं? क्या वे रूस के उस वामपंथ को फॉलो करते हैं जिसकी नींव मार्क्स और लेनिन के विचारों पर पड़ी थी? लेकिन उस पर तो स्टालिन ने असल इमारत बनाई थी। और उस स्टालिन ने तो वैचारिक विरोधियों को पूरी तरह से साफ करते हुए असहिष्णुता का एक पैमाना गढ़ दिया था। भगत सिंह ऐसे असहिष्णु तो नहीं थे। या फिर आज के वामपंथी चीन के उस वामपंथ को मानते हैं जिसमें ‘साम्यवाद’ और साम्रज्यवाद के सहारे अमीरों और गरीबों के बीच का फासला लगातार बढ़ता जा रहा है। भगत सिंह तो ऐसे भी नहीं थे। आज की कम्यूनिस्ट पार्टियाँ उस आदर्श पर चल भी नहीं रही हैं। खासकर इनके छात्र संगठनों को देखती हूँ तो वह अराजकता का प्रतिरूप ही लगते हैं जिनके लिए आन्दोलन का मतलब ही शिक्षकों का घेराव कर उनकी ब्लैकमेलिंग करना ही है।

अनुशासन शब्द से इनको नफरत है। ये एसएफआई के समर्थक ही थे जिन्होंने एक प्रिंसिपल पर पेट्रोल उड़ेल दिया था और अधिकतर छात्र संगठन यही रास्ता अपना रहे हैं। कांग्रेस का छात्र संगठन तो अध्यक्ष के सामने ही लड़ पड़ता है और टीएमसीपी की गुटबाजी तो जगजाहिर है। इसमें एबीवीपी भी कम नहीं हैं.....राजनीति करने का दूसरा तरीका आग लगाने वाले बयान देना हो गया है। ये कौन सा देशप्रेम है जो आपको कश्मीर में साम्राज्यवाद देखना सिखाता है, सेना को शोषक मानना सिखाता है...सुरक्षा बलों को गालियाँ देना सिखाता है? मानवतावाद का मतलब अपने घर में आग लगाकर दुश्मनों को कमान देना कब से हो गया? ये कौन सी बौद्धिकता है जो आपको परम्परा और इतिहास को खारिज करना सिखाती है? आपने जिस चीन और रूस की परम्परा को कभी आँख से खुद नहीं देखा...उसे आप सत्य मानते हैं मगर आपकी नजर में आपका अपना प्राचीन भारतीय साहित्य, कला, स्थान और यहाँ तक कि आज सेना का अभियान फर्जी है। आप अल्पसंख्यकों में असुरक्षा भरते जा रहे हैं मगर आप तीन तलाक को लेकर कभी नहीं बोलते। दूसरी तरफ तीन तलाक पर रोने वाले वैवााहिक बलात्कार के मुद्दे पर खामोश हैं। आप छोटे बच्चों पर हिंसा को लेकर खामोश हैं। आप गौरी लंकेश और कलबुर्गी को लेकर रोते हैं मगर आपके आस -पास हर रोज पत्रकार मरते हैं तो आप उनके लिए खड़े नहीं होते। आपकी मॉब लिचिंग का विरोध भी सिलेक्टिव है। आप धार्मिक स्थलों और आरक्षण में महिलाओं को स्थान दिलाने की बात पर संसद में हंगामा नहीं करते। टिकटों के मामले में तो हर पार्टी में महिलाओं की भागीदारी न्यूनतम है। आपके लिए विचारधारा का विरोध व्यक्ति विरोध में सिमट गया है और यह आपको अब अप्रासंगिक ही नहीं हास्यास्पद बना रहा है।
आज के वामपंथी आखिर किस वामपंथ को अपना आधार मानते हैं? क्या वे रूस के उस वामपंथ को फॉलो करते हैं जिसकी नींव मार्क्स और लेनिन के विचारों पर पड़ी थी? लेकिन उस पर तो स्टालिन ने असल इमारत बनाई थी। और उस स्टालिन ने तो वैचारिक विरोधियों को पूरी तरह से साफ करते हुए असहिष्णुता का एक पैमाना गढ़ दिया था। भगत सिंह ऐसे असहिष्णु तो नहीं थे। या फिर आज के वामपंथी चीन के उस वामपंथ को मानते हैं जिसमें ‘साम्यवाद’ और साम्रज्यवाद के सहारे अमीरों और गरीबों के बीच का फासला लगातार बढ़ता जा रहा है। भगत सिंह तो ऐसे भी नहीं थे।
बात अगर योगदान की है तो आलोचकों की प्रेरणा से ही मैंने राष्ट्रीय सेवक संघ के बारे में पढ़ा। पसन्द न करने का मतलब पूरी तरह खारिज कर देना हो गया है। क्या विष्णुकान्त शास्त्री, मुरली मनोहर जोशी और सावरकर जैसे नेता इसलिए खारिज किये जाएँगे कि वह संघ से जुड़े हैं? दोनों तरफ के तथाकथित बुद्धिजीवी एक दूसरे के लिए गदहे जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं...आप क्या देकर जा रहे हैं भावी पीढ़ी को...यह सोचने वाली बात है। शर्म की बात यह है कि संसद की कार्रवाई से प्रधानमंत्री के शब्द हटाने पड़ रहे हैं तो विपक्ष का नेता गले लगकर संसद में आँख मारता है।

जब बात विरोध के साथ योगदान की चली तो पूछा गया कि संघ व आरएसएस का योगदान क्या है। मेरे मन में भी जिज्ञासा हुई तो मैंने खोजा और बीबीसी हिन्दी (जी हाँ, वही बीबीसी जो संघ और भाजपा के साथ कट्टर मोदी विरोधी भी है) की वेबसाइट पर यह आलेख मिला जो मैं आपको पढ़वा रही हूँ।
साम्प्रदायिक हिंदूवादी, फ़ासीवादी और इसी तरह के अन्य शब्दों से पुकारे जाने वाले संगठन के तौर पर आलोचना सहते और सुनते हुए भी संघ को कम से कम 7-8 दशक हो चुके हैं। दुनिया में शायद ही किसी संगठन की इतनी आलोचना की गई होगी जितनी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की की गयी है वह भी बिना किसी आधार के लेकिन यही संघ की महानता है कि संघ के ख़िलाफ़ लगा हर आरोप आख़िर में पूरी तरह कपोल-कल्पना और झूठ साबित हुआ है। इसके बावजूद इसमें कोई शक नहीं है कि आज भी कई लोग संघ को इसी नेहरूवादी दृष्टि से देखते हैं। नेहरूवादी सोच इसलिए क्योंकि देश के प्रथम प्रधानमन्त्री श्री जवाहलाल नेहरू संघ के प्रति यही नफरत वाला भाव रखते थे हालांकि ख़ुद नेहरू जी को जीते-जी अपना दृष्टि-दोष ठीक करने का एक दुखद अवसर तब मिल गया था, जब 1962 में देश पर चीन का आक्रमण हुआ था। तब देश के बाहर पंचशील और लोकतंत्र वग़ैरह आदर्शों के मसीहा जवाहरलाल न ख़ुद को संभाल पा रहे थे, न देश की सीमाओं को. लेकिन संघ अपना काम कर रहा था।

आज आपको बताते हैं राष्ट्र के लिए आरएसएस के वो 10 योगदान जो आजादी के नकली ठेकेदार करना तो दूर सोच भी नहीं सकते हैं....

१- कश्मीर सीमा पर निगरानी, विभाजन पीड़ितों को आश्रय
जब 1947 में देश का विभाजन हुआ तो संघ के स्वयंसेवकों ने अक्टूबर 1947 से ही कश्मीर सीमा पर पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों पर बगैर किसी प्रशिक्षण के लगातार नज़र रखी। ये काम न नेहरू-माउंटबेटन सरकार कर रही थी, न महाराजा हरिसिंह सरकार. उसी समय, जब पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों ने कश्मीर की सीमा लांघने की कोशिश की, तो सैनिकों के साथ कई स्वयंसेवकों ने भी अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए लड़ाई में प्राण दिए थे। विभाजन के दंगे भड़कने पर, जब नेहरू सरकार पूरी तरह हैरान-परेशान थी, संघ ने पाकिस्तान से जान बचाकर आए शरणार्थियों के लिए 3000 से ज़्यादा राहत शिविर लगाए थे।
२- 1962 का युद्ध
जब 1962 में भारत चीन का युद्ध हुआ तो सेना की मदद के लिए देश भर से संघ के स्वयंसेवक जिस उत्साह से सीमा पर पहुँचे, उसे पूरे देश ने देखा और सराहा। स्वयंसेवकों ने सरकारी कार्यों में और विशेष रूप से जवानों की मदद में पूरी ताकत लगा दी - सैनिक आवाजाही मार्गों की चौकसी, प्रशासन की मदद, रसद और आपूर्ति में मदद, और यहां तक कि शहीदों के परिवारों की भी चिंता की तथा मदद की। यही कारण था कि जवाहर लाल नेहरू को 1963 में 26 जनवरी की परेड में संघ को शामिल होने का निमंत्रण देना पड़ा। परेड करने वालों को आज भी महीनों तैयारी करनी होती है, लेकिन मात्र दो दिन पहले मिले निमंत्रण पर 3500 स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित हो गए. निमंत्रण दिए जाने की आलोचना होने पर तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्री नेहरू जी ने कहा, "यह दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है, विशेष रूप से 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को आकस्मिक आमंत्रित किया गया।"
३- कश्मीर का विलय
कश्मीर के महाराजा हरि सिंह विलय का फ़ैसला नहीं कर पा रहे थे और उधर कबाइलियों के भेस में पाकिस्तानी सेना सीमा में घुसती जा रही थी तब नेहरू सरकार तो - हम क्या करें वाली मुद्रा में मौन साधकर बैठी थी तब सरदार पटेल ने गुरुजी गोलवलकर से मदद माँगी। गुरुजी श्रीनगर पहुँचे, महाराजा से मिले. इसके बाद महाराजा ने कश्मीर के भारत में विलय पत्र का प्रस्ताव दिल्ली भेज दिया।
४- 1965 के युद्ध में क़ानून-व्यवस्था संभाली
1965 में जब भारत पकिस्तान का युद्ध हुआ तो पाकिस्तान से युद्ध के समय प्रधानमन्त्री श्री लालबहादुर शास्त्री जी को भी संघ याद आया था। शास्त्री जी ने क़ानून-व्यवस्था की स्थिति संभालने में मदद देने और दिल्ली का यातायात नियंत्रण अपने हाथ में लेने का आग्रह किया, ताकि इन कार्यों से मुक्त किए गए पुलिसकर्मियों को सेना की मदद में लगाया जा सके। घायल जवानों के लिए सबसे पहले रक्तदान करने वाले भी संघ के स्वयंसेवक थे। युद्ध के दौरान कश्मीर की हवाईपट्टियों से बर्फ़ हटाने का काम संघ के स्वयंसेवकों ने किया था।
५- गोवा का विलय
1947 में देश तो आजाद हो गया था लेकिन देश के कई हिस्से इस आजादी से अछूते थे तब दादरा, नगर हवेली और गोवा के भारत विलय में संघ ने निर्णायक भूमिका निभाई थी। 21 जुलाई 1954 को दादरा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया, 28 जुलाई को नरोली और फिपारिया मुक्त कराए गए और फिर राजधानी सिलवासा मुक्त कराई गई। संघ के स्वयंसेवकों ने 2 अगस्त 1954 की सुबह पुतर्गाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा फहराया, पूरा दादरा नगर हवेली पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त करा कर भारत सरकार को सौंप दिया। संघ के स्वयंसेवक 1955 से गोवा मुक्ति संग्राम में प्रभावी रूप से शामिल हो चुके थे. गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेप करने से नेहरू के इनकार करने पर जगन्नाथ राव जोशी के नेतृत्व में संघ के कार्यकर्ताओं ने गोवा पहुंच कर आंदोलन शुरू किया, जिसका परिणाम जगन्नाथ राव जोशी सहित संघ के कार्यकर्ताओं को दस वर्ष की सजा सुनाए जाने में निकला. हालत बिगड़ने पर अंततः भारत को सैनिक हस्तक्षेप करना पड़ा और 1961 में गोवा आज़ाद हुआ।
६- आपातकाल
1975 में प्रधानमन्त्री श्री इंदिरा गांधी जी ने जब देश में आपातकाल की घोषणा कर दी तब1975 से 1977 के बीच आपातकाल के ख़िलाफ़ संघर्ष और जनता पार्टी के गठन तक में संघ की भूमिका की याद अब भी कई लोगों के लिए ताज़ा है। सत्याग्रह में हजारों स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी के बाद संघ के कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रह कर आंदोलन चलाना शुरु किया. आपातकाल के खिलाफ पोस्टर सड़कों पर चिपकाना, जनता को सूचनाएं देना और जेलों में बंद विभिन्न राजनीतिक कार्यकर्ताओं -नेताओं के बीच संवाद सूत्र का काम संघ कार्यकर्ताओं ने सम्भाला। जब लगभग सारे ही नेता जेलों में बंद थे, तब सारे दलों का विलय करा कर जनता पार्टी का गठन करवाने की कोशिशें संघ की ही मदद से चल सकी थीं।
७- भारतीय मज़दूर संघ
भारतीय मजदूर संघ आरएसएस की ही शाखा है। 1955 में बना भारतीय मज़दूर संघ शायद विश्व का पहला ऐसा मज़दूर आन्दोलन था, जो विध्वंस के बजाए निर्माण की धारणा पर चलता था। कारखानों में विश्वकर्मा जयंती का चलन भारतीय मज़दूर संघ ने ही शुरू किया था। आज यह विश्व का सबसे बड़ा, शांतिपूर्ण और रचनात्मक मज़दूर संगठन है।
८- ज़मींदारी प्रथा का ख़ात्मा
जहां बड़ी संख्या में ज़मींदार थे उस राजस्थान में ख़ुद सीपीएम को यह कहना पड़ा था कि भैरों सिंह शेखावत राजस्थान में प्रगतिशील शक्तियों के नेता हैं। संघ के स्वयंसेवक दादोसा माननीय श्री भैरों सिंह शेखावत बाद में भारत के उपराष्ट्रपति भी बने तथा आज भी न सिर्फ राजस्थान बल्कि पूरा देश शेखावत साहब को अपना नायक मानता है।


९- शिक्षा के क्षेत्र में संघ
शिक्षा के क्षेत्र में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का योगदान अतुलनीय है. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षा भारती, एकल विद्यालय, स्वदेशी जागरण मंच, विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम आदि संघ के ही स्वयंसेवी संघठन हैं। विद्या भारती आज 20 हजार से ज्यादा स्कूल चलाता है, लगभग दो दर्जन शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेज, डेढ़ दर्जन कॉलेज, 10 से ज्यादा रोजगार एवं प्रशिक्षण संस्थाएं चलाता है। केन्द्र और राज्य सरकारों से मान्यता प्राप्त इन सरस्वती शिशु मंदिरों में लगभग 30 लाख छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं और 1 लाख से अधिक शिक्षक पढ़ाते हैं। संख्या बल से भी बड़ी बात है कि ये संस्थाएं भारतीय संस्कारों को शिक्षा के साथ जोड़े रखती हैं। अकेला सेवा भारती देश भर के दूरदराज़ के और दुर्गम इलाक़ों में सेवा के एक लाख से ज़्यादा काम कर रहा है। लगभग 35 हज़ार एकल विद्यालयों में 10 लाख से ज़्यादा छात्र अपना जीवन संवार रहे हैं। उदाहरण के तौर पर सेवा भारती ने जम्मू कश्मीर से आतंकवाद से अनाथ हुए 57 बच्चों को गोद लिया है।

१०- सेवा कार्य
देश में आयी आपदा के समय भी संघ आगे बढ़कर राष्ट्र निर्माण के कार्य में अपना योगदान दिया है। 1971 में ओडिशा में आए भयंकर चंक्रवात से लेकर भोपाल की गैस त्रासदी तक, 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों से लेकर गुजरात के भूकंप, सुनामी की प्रलय, उत्तराखंड की बाढ़ और कारगिल युद्ध के घायलों की सेवा तक - संघ ने राहत और बचाव का काम हमेशा सबसे आगे होकर किया है। भारत में ही नहीं, नेपाल, श्रीलंका और सुमात्रा तक में संघ ने आपातकालीन स्थितियों में मदद की है..!!
इस सबके बाद भी कांग्रेस पार्टी क्या अन्य सभी आजादी के नकली ठेकेदारों को संघ को गाली देने का, संघ को आतंकी बोलने का, संघ की आलोचना करने का पूर्ण अधिकार है, लेकिन संघ की जितनी ज्यादा आलोचना हुई है, संघ उतना ही ज्यादा मजबूत हुआ है तथा देश के नवनिर्माण में अपनी भूमिका निभाई है. यही कारण है कि संघ आज दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संघठन है तथा अनवरत हिन्दुस्तान तथा हिन्दुस्तान की गौरवशाली संस्कृति को संजोकर रखते हुए भारतमाता को पुनः विश्वगुरु की पदवी पर विराजमान कराने के लिए प्रयत्नशील है।
बीबीसी पर प्रकाशित आलेख का लिंक यह रहा https://www.bbc.com/hindi/india-44393179

खुद राहुल जी के नाना जी संघ की तारीफ करते हैं और राहुल जी सीधे मुस्लिम ब्रदरहुड से इसे जोड़ देते हैं। संघ के अनुशासन का लोहा तो सब मानते हैं मगर क्या वह अनुशासन आज किसी और राजनीतिक दल में है। अगर वैचारिक कट्टरता और हिन्दूत्व के कारण ही आप संघियों की बुराई करते हैं तो तुष्टिकरण की राजनीति कर आप भी इसी राह पर चल रहे हैं...आपने मुस्लिम समुदाय की जड़ता का विरोध नहीं किया...वहाँ मौलवियों के शोषण से परेशान महिलाओं का साथ कभी नहीं दिया....तो आप भी उसी राह के हिमायती साबित हो रहे हैं जिनके विरोध में आप कसीदे गढ़ते हैं। धर्मनिरपेक्षता का मतलब सर्व धर्म, सम भाव होता है न कि किसी एक समुदाय,मत अथवा धर्म को उसके बहुसंख्यकप्रिय होने की सजा देना...हिन्दू होना अगर गर्व की बात नहीं है तो ऐसा कोई कारण नहीं है कि इस पर शर्म की जाए....सोच तो आप बदल नहीं सकते....एक झूठे अहंकार और बौद्धिकतावाद से ग्रस्त होना ही अगर पैठ बनाना और सामूहिकता का अंग है तो हम तो दूर ही अच्छे हैं...क्योंकि मुझे भारतीय, भारतीयता और उसकी हर बात से प्यार है...। धन्यवाद पत्थर फेंकने के लिए और फेंकिए...इमारत तो गढ़कर रहेंगे..जय हिन्द।

(सभी तस्वीरें - साभार )