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झारखंड का आंदोलन बहुत अलग है...और यहां के युवा भी

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वह कहती है पीसीएस का मेरा सपना टूट गया....ये दुख कहीं बहुत गहरा है....भीतर तक....चलो खुद के लिए कुछ न कर पाऊं पर इन बच्चों के लिए आवाज जरूर बन जाऊंगी मैं....हेमंत सोरेन ने यदि सुना नहीं तो इसी धरती पर हिसाब करके जाना पड़ेगा । वह कहती है कि सामान्य वर्ग से हूं मैं....हमारे यहां ज्यादा से ज्यादा 24 25 साल में शादी हो जाती है....मेरे पापा ने दो साल एकस्ट्रा दिया....लेकिन इन लूट मचाने वालों ने सब छीन लिया....घर नहीं जाती मैं....मेरी शादी भी नहीं हो सकती अब तो ............मैं रो भी नहीं सकती....यहां कोई भी स्टूडेंट जंतर मंतर जैसे फैंसी नहीं हैं....यहां सब गरीब हैं....यहां सब मजदूर के बच्चे हैं....यहां खाने के लिए भी एक आध सूखी रोटी मिल जाए वही बहुत है....। यह कहानी इस छात्र आन्दोलन में संघर्ष कर रहे हर दूसरे छात्र की है । झारखंड में चल रहे छात्र आन्दोलन की यह झलक है । रांची की सड़कों पर जेपीएससी और जेएसएससीपरीक्षाओं में हो रही गड़बड़ियों के खिलाफ हजारों छात्र आंदोलन कर रहे हैं। 2 जुलाई को झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) ने 14वीं संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा का रिजल्ट जारी किया था...

आप हार गए जेन जी के रहनुमाओं

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नीट के नाम पर हंगामे का अर्द्ध पटाक्षेप हो चुका है और धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षामंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया है। इस त्यागपत्र को सीजेपी की जीत बताया जा रहा है और विपक्ष अपनी पीठ खुद थपथपा रहा है । जिस तरह की भाषा प्रदर्शन के दौरान इस्तेमाल की गयी और जिस तरह की हिंसा हुई, उसे देखकर मुझे कुछ और ही लग रहा है । वामपंथ इस देश की संस्कृति, सभ्यता, पारिवारिक और सामाजिक संस्कृति के लिए दीमक बन चुके हैं और दिक्कत यह है कि चुके हुए वामपंथी शिक्षक, बुद्धिजीवी और साहित्यकार अब भी हमारे संस्थानों पर काबिज हैं । इस तरह गिर चुके हैं कि अब उठने के लिए इनको बच्चों के नन्हे कंधों का सहारा लेना पड़ रहा है। सोर्स लगाकर, नेताओं के साथ फोटो खिंचवाकर, फर्जी जाति और आयु प्रमाणपत्र खरीदकर, रिश्वत देकर अपने बच्चों की नौकरी लगवाकर , अपने चापलूस चेलों के लिए योग्य विद्यार्थियों के नंबर काटकर सीटें और नौकरियां दिलवाने वाले, पेपर लीक करवाकर, लीक किया गया पेपर खरीदकर भविष्य सेटल करने वाले आज युवा क्रांति के पुरोधा बने फिर रहे हैं...हद है । सिस्टम भ्रष्ट है तो उसका फायदा आपने भी उठाया है..ताली एक हाथ से नहीं ब...

युवाओं के आक्रोश को सही दिशा चाहिए

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जंतर - मंतर पर युवाओं ने डेरा जमा रखा है। देश भर में युवाओं का आक्रोश उबाल पर है । परीक्षाओं में पेपर लीक होने के विरोध में आंदोलन शुरू हुआ । इसके पहले भी आंदोलन होते रहे हैं मगर युवाओं के इस आक्रोश के साथ दिक्कत यह है कि जब राजनीतिक पार्टियां हस्तक्षेप करती हैं तो मुद्दा ही हाईजैक हो जाता है। भारत में इतने छात्र संगठन हैं मगर ऐसा क्यों है कि इनमें से एक भी युवाओं के लिए सामने नहीं आ रहा । आज युवाओं के पास एक भी ऐसा चेहरा ऐसा नहीं है जो उनका नेतृत्व कर सके । आज के युवाओं के सामने रोल मॉडल चुनने का संकट है । उनके आक्रोश तो है पर उसे दिशा देने वाला कोई नहीं है और न ही कोई समझने वाला है । कहीं न कहीं आत्मविश्वास अहंकार में बदल रहा है । इसकी बानगी हम होक कलरव में भी देख चुके हैं और अब जंतर - मंतर पर देख रहे हैं । युवा वर्ग बंटा हुआ है । एक वह है जो जमीन पर लड़ रहा है, व्यवस्था से लड़ रहा है। अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए उसके पास पैसे नहीं हैं, संसाधन नहीं हैं, कोई समझने वाला नहीं है और महत्वाकांक्षाएं बहुत हैं। जब वह इनको पूरा नहीं कर पाता तो यह जमा हुआ असंतोष ही आक्रोश बन ...

मिशनरी पत्रकारिता के आवरण से पत्रकारिता को बाहर निकालिए

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30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस हम मनाते हैं । पत्रकारिता को मिशन, सेवा, ध्येय मानकर साहित्य से जोड़ा जाता है और मीडिया को कोसना पत्रकारिता से जुड़े आयोजनों की परम्परा बन गयी है । मैं पत्रकार हूँ तो आज मैं पत्रकार के रूप में ही बात करूँगी और मेरी कोशिश होगी कि वह बातें भी रख सकूँ जो कोई समझने को तैयार नहीं है । शिक्षा दान महादान है, साहित्य और कला समाज का दर्पण है, चिकित्सक भगवान है...ये हम सुनते आ रहे हैं मगर यथार्थ के धरातल पर सभी कार्यक्षेत्रों को प्रोफेशन मान लिया गया है और इन क्षेत्रों में काम कर रहे लोगों के लिए कमाई के भरपूर मौके हैं । वेतन बोर्ड है, इस देश में संगठन हैं, परीक्षाएं होती हैं, सुविधाएं हैं, पेंशन हैं और इनके परिवारों के लिए एक सुरक्षित भविष्य है जबकि ये सभी क्षेत्र मिशन ही माने जाते रहे हैं। मेरा सवाल यह है कि जब समाज लगभग सभी कार्यक्षेत्रों के प्रति इतनी उदारता है तो पत्रकारिता को प्रोफेशन मानने में दिक्कत क्या है? हम पेशेवर होकर भी संगठित रहकर बेहतर काम कर सकते हैं । वह दिन गये जब जनोन्मुख पत्रकारिता होती थी, उसकी अंतिम झलक आपात काल में दिखी । फिर लोकपाल...

इस परिवर्तन ने सिर्फ राज्य नहीं, देश बचाया है

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बंगाल में 15 साल बाद सत्ता बदल चुकी है । सत्ता परिवर्तन को लेकर बहुत सी बातें कही जा रही हैं । जनता जिस तरह से खुशी मना रही है, वह ऐसा लग रहा है जैसे आजादी ही बंगाल को मिली है...बात सच भी है । बंगाल की राजनीतिक पार्टियां अपने स्वार्थ में इस हद तक अंधी हो चुकी हैं कि वो बंगाल को भारत का राज्य नहीं बल्कि एक स्वतंत्र देश ही समझ कर चल रही थीं और बौद्धिक वर्ग के लिए यह एक ऐसा कोना है जो सिर्फ उनका है, सिर्फ उनकी वामपंथी और धार्मिक तुष्टीकरण का ठिकाना है । सच यही है कि आप लोगों ने हिंदुओं और सनातन परंपरा को इतना उपेक्षित किया और सुनियोजित तरीके से दबाने की कोशिश की, और क्रूरता की हद तक दबाया । वो यह भूल गए कि बंगाल की मूल आत्मा सनातन है और यह बात 2026 के चुनावों में बंगाल की जनता ने याद दिला दी है । सच कहूँ तो बंगाल की जनता ने सिर्फ बंगाल को नहीं, देश को बचाया है । मुझे हैरत होती है जिस देश में हिंदुओं को काटा जा रहा है, घर और मंदिर जलाए जा रहे हैं, उसके प्रति लोगों में इतनी ममता कहाँ से आती है, मेरी नजर में यही देश द्रोह है । बुद्धिजीवियों के पैरों की जमीन खिसक गई है तो उसके पीछे उनका आहत...

मेसी की दीवानगी और भारतीय खेल प्रेमी

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महान मेसी का गोट दौरा यानी ग्रेटेस्ट ऑफ ऑल टाइम मेसी का दौरा अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया है। सवाल हमारी व्यवस्था पर, सवाल हमारे नेताओं पर और सबसे बड़ा सवाल हमारी अपनी हिप्पोक्रेसी पर। कोलकाता में मेसी को न देख पाने पर दर्शकों ने हंगामा किया, कुर्सिया तोड़ीं, गमले उठा ले गये, घास तक ले गये और यह सब इसलिए क्योंकि कुछ नेताओं ने मेसी को जिस तरह घेरकर रखा था, उसके कारण वे फुटबॉल के भगवान को नहीं देख सके। आयोजक गिरफ्तार हो चुका है मगर क्या इतना काफी है। अच्छा एक मिनट रुकिये और बताइए कि आपमें से कितने लोग यह जानते हैं - भारतीय फुटबॉल टीम ने सीएएफए नेशंस कप ने जीत के साथ शुरुआत की है। पहली बार टूर्नामेंट में खेल रहे भारत की टक्कर मेजबान ताजिकिस्तान से थी। इस मुकाबले को भारत ने 2-1 से अपने नाम किया। खालिद जमील के हेड कोच बनने के बाद यह भारत का पहला मुकाबला था। टीम ने इसमें जीत हासिल की। भारत की दो साल में विदेशी धरती पर पहली जीत है। घर से बाहर उनकी आखिरी जीत नवंबर 2023 में विश्व कप क्वालीफायर में कुवैत के खिलाफ हुई थी। भारत की अंडर-17 फुटबॉल टीम ने एक और बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए कोलंबो में...

बिहार चुनाव में शराबबंदी, प्रशांत किशोर और मीडिया

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बिहार चुनाव हाल ही में बीता है और नीतीश सरकार ने प्रचंड बहुमत के साथ वापसी की है। गौर करने वाली बात यह है पिछले कुछ सालों से महिलाएं खुलकर मतदान करती आ रही हैं। पुरुषों के लिए चुनाव सत्ता बदलने का माध्यम हो सकता है मगर महिलाओं के लिए हर चुनाव उनके अस्तित्व की लड़ाई होता है। बिहार में भी चुनाव ऐसा ही था। सच तो यह है कि बिहार में एनडीए की जीत से महिलाओं में खुशी थी मगर निराशा पुरुषों में ज्यादा रही। पता है, इसका प्रमुख कारण क्या था, वह यह कि विपक्ष ने वापसी के लिए शराबबंदी और गुंडागर्दी को हथियार बनाया। लोग लालू प्रसाद यादव के जंगलराज को नहीं भूले महिलाएं अपने साथ होने वाले अत्याचारों को। ऐसा नहीं है कि नीतीश राज में अपराध घटने की कोई शत-प्रतिशत गारंटी है मगर पहले से कम होने की, महिलाओं के स्वालंबन की गारंटी जरूर है। विपक्ष ने चुनाव जीतने के लिए महिलाओं की जिंदगी को दांव पर लगा दिया और हैरत की बात यह है कि ऐसा करने में वह पार्टी आगे रही जो बिहार में बदलाव की बड़ी -बड़ी बातें करती नजर आई। मेरी समझ के बाहर था कि बिहार में बदलाव लाने का यह कौन सा रास्ता था जो प्रशांत किशोर जैसे व्यक्ति न...

प्रेमकथा नहीं, भारतीय इतिहास व राजनीति की अनकही दास्तान है एडविना और नेहरू

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कैथरीन क्लेमां का नाम गूगल पर आपको मिल जाएगा पर विस्तृत जानकारी नहीं मिलेगी। जब कैथरीन की किताब एडविना और नेहरू को दूसरी बार पढ़ा था। आम तौर पर इस पुस्तक को दुर्लभ प्रेम कथाओं में जाना जाता है पर यह किताब मेरी नजर में बतौर पाठक प्रेमकथा से कहीं आगे है। भारत -पाकिस्तान के विभाजन के दौरान मचा तांडव, भारतीय नेताओं की मनोदशा...यह किताब सबके नकाब खोलती है। पुस्तक का अनुवाद निर्मला जैन ने किया है और यह एक शानदार अनुवाद है। प्राक्कथन में कैथरीना मानती हैं कि प्रेम की इस परम्परा का जन्म 12वीं शताब्दी के यूरोप में धर्मयुद्धों के समय हुआ था। (पेज -1) ...आगे वह लिखती हैं कि मैंने नेहरू और एडविना पर इसी परिप्रेक्ष्य में ऐतिहासिक उपन्यास लिखा है। मुक्त भाव से मैंने कुछ ऐसी कुछ स्थितियों जोड़ दी हैं, जो संभवतः घटित नहीं हुईं, लेकिन कुछ संकेतों के आधार पर उनका घटित होना संभव जान पड़ता है। दूसरी ओर कुछ और स्थितियां जो असंभव प्रतीत होती हैं, वास्तव में एकदम सच्ची है। (पेज -2) नेहरू और एडविना दोनों इंसान थे। दोनों में नेतृत्व का गुण था। दोनों रोमांटिक थे, उनमें भावावेश था और अपने ढंग से दोनों भारत ...

डूबतो सुरुज के जे पूजे इहे बाटे हमर बिहार

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- सुषमा त्रिपाठी बिहार के आत्मा बसेला छठ महापर्व में और हम हईं बिहारी। हमनी के इंहा मैं न चलेला, हम चलेला। गौर करे वाला बात ई ह कि हम शब्द बिहार में अहंकार के परिचय ना देवला बल्कि समूह, घर - परिवार अउरी समाज के परिचय देवेला। जहवां -जहवां बिहारी गइले...आपन समाज आपन करेजा में रखले...दुनिया के नजर में..अउरी अपने ही देस में हमनी के मजदूर कहल जाता। एगो भाषा के लेके कहियों पर आपन भाषा बोलवाए खातिर लोग आपन अहंकार में गरीब बिहारी के पीट के अपना के बड़का सेर बुझता...मगर भासा परेम के चीज ह....थोपे के न। कवनो भाषा अपना साहित्य से बढ़ेले, ओकरा प्रति जागरूकता से बढ़ेले, दूसरा के महत्व समझ के विनम्र होके साथ चलला से बढ़ेले। हम मान तनी कि भोजपुरी में अश्लील गीत से बदनाम करे वाला कलाकार बाड़े अउरी ओकरा से हमनी के माथा लाज से गड़ जाला लेकिन भोजपुरी खाली ओतने त न ह। छठ के मौका बा...बोल दीं कि शारदा सिन्हा के गीत सुन के कि राउर अंखियन से लोर न आ जाला। आज पूरा संसार में जइसे भोजपुरी लोग सुनतरे, ओइसहीं छठ पूजा भी होखता...हमनी के कवनो भासा बा संस्कृति के अपमान न करेलींजा, उ बात अलग बा कि रउरा सबके नजर ...

फेसबुक बुद्धिजीवियों से भगवान बचाए

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हमने अति आत्ममुग्ध, साहित्यजीवी,वामपंथी बुद्धिजीवी को प्रतीक्षारत देखा जो भारत में नेपाल कांड को दोहराते देखना चाहते हैं...ये वो श्वेत केशधारी बुद्धिमान हैं जिनके बच्चे well settled हैं..और क्रांति होने पर सबसे पहले अपने बच्चों को जाने से रोकेंगे..मगर Facebook पर इनको क्रांति चाहिए वो भी अपने ही देश के विरुद्ध....पहली बात आप देश द्रोही हैं...आप जैसे लोग पहले निम्न मध्य वर्ग के बच्चों को भड़काने में आगे रहते हैं और उनसे ही हाथ मिलाकर अपनी रोटी सेंकते हैं, जिनके खिलाफ बच्चों को भड़का रहे हैं....इसे कहते हैं दोगलापन... आप लोग आर जी कर पर कविता लिखते हैं और फिर इसे दबाने वाली माननीया की कृपा प्राप्त करते हैं...आपको संदेशखाली से मतलब नहीं.. आप धर्मनिरपेक्ष हैं मगर हिन्दू उत्पीड़न..मुर्शिदाबाद पर जुबान नहीं खुलती..आप कथित तौर पर देशभक्त हैं पर अशोक स्तम्भ के अपमान पर मौन हैं....आप युवाओं के शुभचिंतक हैं पर सड़क पर नौकरी गंवाने वाले बच्चों से आपको मतलब नहीं...आप अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता चाहते हैं मगर हिन्दू नर संहार और उस पर बनी फिल्म के प्रतिबन्ध पर चुप्पी साधे बैठे हैं..उसे छोड़िए...आप ...

भाषाई लोकतंत्र का नेतृत्व तो हिन्दी को ही करना है

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हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं देते हुए याद दिलाना चाहती हूँ कि अब दुकानों के बोर्ड बांग्ला में लिखना अनिवार्य कर दिया गया है। कहने का मतलब यह है कि आप किसी भी भाषा के हों, बांग्ला में ही लिखना होगा। यह अनिवार्य पहले भी था हिन्दी व अंग्रेजी के साथ बांग्ला लिखी जाती थी। उन इलाकों में जहां बांग्ला ही बोली जाती है, वहां पर यह समझ में आता है मगर जहाँ हिन्दीभाषी ही अधिक हों...वहाँ इस नियम का क्या अर्थ है, समझ के बाहर है। बंगाल सरकार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलना़डु समेत तमाम हिन्दी के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हिन्दी विद्वेषियों से पूछना चाहती हूँ कि अगर आप पर हिन्दी थोपना गलत है तो आपके राज्यों में जो हो रहा है, वह सही है। क्या सारे अधिकार क्षेत्रीयता के आधार पर निर्धारित होंगे..जब आप सिर्फ अपने राज्य की बात करते हैं तो कहीं न कहीं अपने राज्य के विस्तार को संकुचित कर रहे होते हैं। क्या आपके राज्यों में सिर्फ आपकी भाषा बोलने वाले लोग ही रहते हैं या फिर ऐसा है क्या कि वह राजस्व नहीं भरते। बंगाल का सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियां गिनवा रहा है. इस संदर्भ में, मैं यह बताना चाहूंगी कि 2011 से हमने राज्य मे...

दांव पर लगा एसएससी अभ्यर्थियों का भविष्य, आंखें खोलिए हुजूर

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-एसएससी सीजीएल में 5 लाख परीक्षार्थी, 55 हजार शिकायतें - सड़क पर उतरे शिक्षकों व विद्यार्थियों से बदसलूकी - एसएससी चेयरमैन ने गलती मानी नौकरी खासकर सरकारी नौकरी हर युवा का सपना होता है। मध्यमवर्गीय परिवारों में सरकारी नौकरी परिवारों का भाग्य बदल देती है औऱ इसके लिए अधिकतर युवा अपनी पढ़ाई के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं के फॉर्म भरते नजर आते हैं। भूख, प्यास व कष्ट सहकर, कई बार परिवार से दूर रहकर संघर्ष करते हुए कोशिश जारी रखते हैं मगर व्यवस्था को जैसे इन बच्चों की पीड़ा से कोई मतलब ही नहीं है। फिलहाल स्टाफ सलेक्शन कमिशन की नियुक्ति परीक्षाओं में गड़बड़ी को लेकर मामला गरमाया है। 194 केंद्रों पर परीक्षा रद्द हुई। 5 लाख परीक्षार्थी प्रभावित हुए। कोचिंग सेंटरों के शिक्षकों ने सड़कों पर उतरकर अपने विद्यार्थियों के हक में आवाज उठाय़ी। एसएससी के अध्यक्ष एस गोपालकृष्णन ने बताया कि कर्मचारी चयन आयोग हाल ही में हुई चयन पद चरण 13 की परीक्षा रद्द नहीं करेगा, बल्कि उन प्रभावित उम्मीदवारों के लिए दोबारा परीक्षा आयोजित कर सकता है जो उचित अवसर से वंचित रह गए थे। एसएससी सीजीएल (स्टाफ सिलेक्शन कमीशन कॉम्बाइ...

बंगाल की शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त करने वाला हथौड़ा शिक्षक नियुक्ति घोटाला

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बंगाल की शिक्षा व्यवस्था इन दिनों बेपटरी हो गयी है। पढ़ाने वाले सड़कों पर हैं और पढ़ने वाले संशय में दो पाटन के बीच पिस रहे हैं । बतौर पत्रकार शिक्षा बीट की ही खबरें की हैं और खूब की हैं। उन दिनों संवाददाता सम्मेलन होते थे तो वहां भी जाती थी और बहुत कुछ ऐसा था जिसका कारण तब समझ नहीं सकी मगर अब बात समझ रही है। 2011 के पहले भी आन्दोलन होते रहे हैं। शिक्षक सड़कों पर उतरे हैं। ऐसा नहीं है कि वाममोर्चा सरकार दूध की धुली थी मगर भ्रष्टाचार का जो घिनौना रूप अब देखने को मिल रहा है तब शायद सामने नहीं आ सका था। जो भी हो..भ्रष्टाचार की चक्की में पिसना तो निरपराधों को है। एक तरफ देश की संसद है जहां दागी भी जेल से चुनाव लड़ रहे हैं, एक बार में ही माननीयों की तनख्वाह लाखों रुपये हो जा रही है और दूसरी तरफ हमारे देश के भविष्य का निर्माण करने वाले असंख्य युवा हैं जिनके मुंह से वह रोटी भी छीनी जा रही है जिसे उन्होंने अपनी मेहनत से अर्जित किया है। 26 हजार नौकरियां मतलब 26 हजार परिवारों का भविष्य दांव पर लग जाना और हजारों स्कूलों की व्यवस्था का बेपटरी हो जाना..यह खेल नहीं है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 3 अ...

सफलता की लिफ्ट अक्सर गिराती है, सीढ़ियों का सहारा लीजिए..इस्तेमाल मत कीजिए

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पेशेवर जीवन के दो दशक से अधिक का समय बीत चला है तो आज कई बातें उन महत्वाकांक्षी युवाओं और अवसरवादी संस्थानों से कहने का मन हो रहा है जो अपने संस्थानों के विश्वसनीय एवं निष्ठावान पुराने कर्मचारियों की भावनाओं के साथ शतरंज खेलते हैं । कर्मचारी जो रसोई में तेजपत्ते की तरह होते है, पहले उनको चढ़ाया जाता है, नींबू की तरह निचोड़ा जाता है और फिर जब वह सीनियर बनते हैं तो दूध में मक्खी की तरह निकालकर फेंक दिया जाता है। आजकल सबकी शिकायत रहती है कि निष्ठावान लोग नहीं मिलते। जो नये लोग मिलते हैं..वह संस्थान को प्रशिक्षण संस्थान समझकर सीखते हैं और चल देते हैं। एक बार आइने में खड़े होकर देखिए और आपको पता चल जाएगा कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है। सबसे बड़ी बात यह है कि मालिकों को अब खुद से पूछना चाहिए कि क्या वह इस लायक हैं कि उनको कोई समर्पित कर्मचारी मिले जो उनके संस्थान के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दे। कॉरपोरेट जगत वकालत कर रहा है कि कर्मचारियों को 70 घंटे काम करना चाहिए..सवाल है क्यों करना चाहिए...और सबसे बड़ी बात आखिर इसके बाद कर्मचारियों को क्या मिलना है? क्या जिन्दगी में पैसा ही सब कुछ है और...

मैनेज करने से कुछ भी मैनेज नहीं होता...बोलना जरूरी है सही समय पर..

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आज बात परिवार व्यवस्था और पारिवारिक सम्बन्धों को लेकर करनी है। कलियुग का हवाला देकर सारा ठीकरा युवा पीढ़ी पर फोड़ दिया जाता है इसलिए बात जरूरी है। बात स्त्रियों की भूमिका और उनकी रसोई वाली राजनीति पर भी होगी और चालाकी से भरी चुप्पी पर भी होगी । पारिवारिक सेटिंग और अंडरस्टैंडिंग से उत्पन्न चुप्पी पर होगी। मतलब सम्बन्धों की आड़ में सौदेबाजी और अवसरवादिता पर भी होगी...आज चीरफाड़ होगी । इस बातचीत में अपने अनुभवों के आधार पर ही बात करनी है। कम्पनी टूटती है क्योंकि बॉस अपने कर्मचारियों को अपने अधीनस्थ विश्वासपात्रों के हाथों में उनके हाल पर छो़ड़ देता है और वह देखने की जहमत नहीं करता कि उनके अधीनस्थ बच्चों के साथ कैसा सलूक करते हैं। ठीक इसी तरह खानदान व परिवार टूटते हैं क्योंकि परिवार का मुखिया तब चुप रहता है जब उसे बोलना चाहिए और परिवार की इकाई में होने वाले घटनाक्रमों से या तो अनजान बना रहता है या जानबूझकर निष्क्रिय बना रहता है क्योंकि जो हो रहा है उसकी निजी जिन्दगी को क्षति नहीं पहुंच रही । उसका इमोशनल अटैचमेंट या तो महज औपचारिकता मात्र है...या खानदान के दूसरे सदस्य उस पर हावी होकर अपना...